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Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Upcoming psycho Kavita par kam kar rahi hu.
मै कही कवी ना बन जाऊं तेरे ......क... :D वही वाली क्या?
 

Raj_sharma

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Laila oh Laila
Eeasi tu Laila
Her koi Mila chaahee
Tujhse akela
Oh lela kaha kaha is majnu
Ne tujhe dhuda akela akela
Wo such me akele milne walii laila hai bhidu🤣🤣 peeche pad gai to peecha kaise chudaon ye poochte firoge:D
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Raj_sharma bhai ne kabhi bataya nahi yaha per Desi item bhi hai
Attitude to eeasa lekin name se thoda alag
Desi Priya nahi Nakhreelii Priya hona chahey name Inka😂😂😂😂😂
:DWo hamari priye hai dear, desi tadka with angreji beat:declare:
 

Shetan

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मै कही कवी ना बन जाऊं तेरे ......क... :D वही वाली क्या?
Na us story ka name hoga parinda
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Devilal

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UPDATE 4

गांव में हर साल एक मेला लगा करता है जहा पे ठकूरो के कुलदेवी का मंदिर था हर साल वहा पे बंजारे आते थे 10 से 15 दिन के लिए और तभी मेला शुरू हो जाता था गांव। में 10 से 15 दिन तक मेले के चलते पूरा गांव इक्कठा हो जाता था जैसे कोई त्योहार हो गांव वाले वहा जाते झूला झूलते बंजारों से नई नई प्रकार के वस्तु खरीदते साथ ही कुल देवी की पूजा करते थे ठाकुरों के साथ और उस वक्त ठाकुर अपने परिवार के साथ मेले में घूमते फिरते थे लेकिन इस बार गांव वालो की हिम्मत जवाब दे गईं थी कर्ज के चलते

इन सब बातो से अंजान हवेली में अभय के गम में डूबी हुई थी संध्या जिसका फायदा उठा रहा था रमन जो गांव वालो को जमीन को हड़प रहा था कर्ज और ब्याज के नाम पे ताकि डिग्री कॉलेज की स्थापना करवा सके जिसकी स्वीकृति रमन को संध्या से लेनी थी हवेली में गमहीन माहोल के चलते रमन इस बारे में बात नही कर पा रहा था संध्या से

जबकि संध्या अमन का मुंह देख कर जीने लगी थीं, लेकिन हर रात अभय की यादों में आंसू बहाती थी, और ये उसका रोज का रूटीन बन गया था।

और इस तरफ गांव वालों की हर रोज़ मीटिंग होती थीं , की ठाकुराइन से जाकर इस बारे में पूछे की उसने ऐसा क्यूं किया? क्यूं उनकी ज़मीन हड़प ली उसने? पर गांव वाले भी ये समय सही नहीं समझे।

दीन बीतता गया, संध्या भी अब नॉर्मल होने लगी थीं, वो अमन को हद से ज्यादा प्यार करने लगी थीं। हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी ख्वाहिश अमन की यूं ही पूरी हो जाती।

देखते ही देखते महीने सालों में व्यतीत होने लगे,,


एक दिन की बात है हवेली में सब नाश्ते की टेबल पर बैठे थे, अमन के सामने पड़ी प्लेट मे देसी घी के पराठे पड़े थे। जिसे वो बहुत चाव से खा रहा था। और मालती अमन को ही गौर से देख रही थीं, की संध्या कितने प्यार से अमन को अपने हाथों से खिला रही थीं।

अमन --"बस करो ना बड़ी मां, अब नहीं खाया जाता, मेरा पेट भर गया हैं।"

संध्या --"बस बेटा, ये आखिरी पराठा, हैं। खा ले।"

अमन ने किसी तरह वो पराठा खाया, मालती अभि भी उन दोनो को ही देख रही थीं कि तभी उसे पुरानी बात याद आई।

जब एक दिन इसी तरह से सब नाश्ता कर रहे थे, अभय भी नाश्ता करते हुऐ गपागप ४ पराठे खा चुका था और पांचवा पराठा खाने के लिऐ मांग रहा था तब

संध्या – (पराठा देते हुऐ अभय से बोली) और कितना खायेगा तेरा तो पेट नहीं भर रहा हैं।

अभय –(हस्ते हुए) तेरे हाथ के पराठे जितने खाऊं पेट तो भर जाता है लेकिन दिल नही भरता

वो दृश्य और आज के दृश्य से मालती किस बात का अनुमान लगा रही थीं ये तो नहीं पता, पर तभी संध्या की नज़रे भी मालती पर पड़ती हैं तो पाती हैं की, मालती उसे और अमन को ही देख रही थीं।
मालती को इस तरह दिखते हुऐ संध्या बोल पड़ी...

संध्या --"तू ऐसे क्या देख रही हैं मालती? नज़र लगाएगी क्या मेरे बेटे को?

संध्या की बात मालती के दिल मे चुभ सी गई,और फिर अचानक ही बोल पड़ी।

मालती --"नहीं दीदी बस पुरानी बातें याद आ गई थीं, अभय की।

और कहते हुऐ मालती अपने कमरे में चली जाती है। संध्या मालती को जाते हुऐ वही खड़ी देखती रहती है......

मालती के जाते ही, संध्या भी अपने कमरे में चली गई। संध्या गुम सूम सी अपने बेड पर बैठी थीं, उसे अजीब सी बेचैनी हो रही थीं। वो मालती की कही हुई बात पर गौर करने लगी। वो उस दीन को याद करने लगी जब उसने अभय की जम कर पिटाई की थीं। उस दीन हवेली के नौकर भी अभय की पिटाई देख कर सहम गए थे।

बात कुछ यूं थीं की, रमन हवेली में लहू लुहान हो कर अपना सर पकड़े पहुंचा। संध्या उस समय हवेली के हॉल में ही बैठी थीं। संध्या ने जब देखा की रमन के सर से खून बह रहा है, और रमन अपने सर को हाथों से पकड़ा है, तो संध्या घबरा गई। और सोफे पर से उठते हुऐ बोली...

संध्या --" ये...ये क्या हुआ तुम्हे? सर पर चोट कैसे लग गई?

बोलते हुऐ संध्या ने नौकर को आवाज लगाई और डॉक्टर को बुलाने के लिऐ बोली....

संध्या की बात सुनकर रमन कुछ नहीं बोला, बस अपने खून से सने हांथ को सर पर रखे कराह रहा था। रमन को यूं ख़ामोश दर्द में करहता देख, संध्या गुस्से में बोली....

संध्या --"मैं कुछ पूंछ रही हूं तुमसे? कैसे हुआ ये?

"अरे ये क्या बताएंगे बड़ी ठाकुराइन, मैं बताता हूं..."

इस अनजानी आवाज़ ने सांध्य का ध्यान खींचा, तो पाई सामने मुनीम खड़ा था। मुनीम को देख कर रमन गुस्से में चिल्लाया....

रमन --"मुनीम जी, आप जाओ यहां से, कुछ नहीं हुआ है भाभी। ये बस मेरी गलती की वजह से ही अनजाने में लग गया।"

"नहीं बड़ी ठाकुराइन, झूंठ बोल रहे है छोटे मालिक। ये तो आपके...."

रमन --"मुनीम जी... मैने कहा ना आप जाओ।

रमन ने मुनीम की बात बीच में ही काटते हुऐ बोला। मगर इस बार सांध्या ने जोर देते हुऐ कहा....

संध्या --"मुनीम जी, बात क्या है... साफ - साफ बताओ मुझे?"

संध्या की बात सुनकर, मुनीम बिना देरी के बोल पड़ा....

मुनीम --"वो... बड़ी ठाकुराइन, छोटे मालिक का सर अभय बाबा ने पत्थर मार कर फोड़ दीया।"

ये सुनकर संध्या गुस्से में लाल हो गई.…

संध्या --"अभय ने!! पर वो ऐसा क्यूं करेगा?"

मुनीम --"अब क्या बताऊं बड़ी ठाकुराइन, छोटे मालिक और मै बाग की तरफ़ जा रहे थे, तो देखा अभय बाबा गांव के नीच जाति के बच्चों के साथ खेल-कूद कर रहे थे। पता नहीं कौन थे चमार थे, केवट था या पता नहीं कौन से जाति के थे वो बच्चे। यही देख कर छोटे मालिक ने अभय को डाट दिया, ये कहते हुऐ की अपनी बराबरी के जाति वालों के बच्चों के साथ खेलो, हवेली का नाम मत खराब करो। ये सुन कर अभय बाबा, छोटे मालिक से जुबान लड़ाते हुए बोले

अभय – ये सब मेरे दोस्त है, और दोस्ती जात पात नहीं देखती, अगर इनसे दोस्ती करके इनके साथ खेलने में हवेली का नाम खराब होता है तो हो जाए, मुझे कुछ फरक नहीं पड़ता।"

संध्या --"फिर क्या हुआ?

मुनीम --"फिर क्या बड़ी मालकिन, छोटे मालिक ने अभय बाबा से कहा की, अगर भाभी को पता चला तो तेरी खैर नहीं, तो इस पर अभय बाबा ने कहा, अरे वो तो बकलोल है, दिमाग नाम का चीज़ तो है ही नहीं मेरी मां में, वो क्या बोलेगी, ज्यादा से ज्यादा दो चार थप्पड़ मारेगी और क्या, पर तेरा सर तो मै अभी फोडूंगा। और कहते हुऐ अभय बाबा ने जमीन पर पड़ा पत्थर उठा कर छोटे मालिक को दे मारा, और वहां से भाग गए।"

मुनीम की बात सुनकर तो मानो सांध्य का पारा चरम पर था, गुस्से मे आपने दांत की किटकिती बजाते हुऐ बोली...

सांध्य --"बच्चा समझ कर, मैं उसे हर बार नज़र अंदाज़ करते गई। पर अब तो उसके अंदर बड़े छोटे की कद्र भी खत्म होती जा रही है। आज रमन का सर फोड़ा है, और मेरे बारे में भी बुरा भला बोलने लगा है, हद से ज्यादा ही बिगड़ता जा रहा है, आने दो उसे आज बताती हूं की, मैं कितनी बड़ी बकलोल हूं..."

.... भाभी, भाभी... कहां हो तुम, अंदर हों क्या?

इस आवाज़ ने, सांध्य को भूत काल की यादों से वर्तमान की धरती पर ला पटका, अपनी नम हो चुकी आंखो के कोने से छलक पड़े आंसू के कतरों को अपनी हथेली से पोछते हुऐ, सुर्ख पड़ चुकी आवाज़ में बोली...

सांध्य --"हां, अंदर ही हूं।"

बोलते हुऐ वो दरवाज़े की तरफ़ देखने लगी... कमरे में रमन दाखिल हुआ, और संध्या के करीब आते हुऐ बेड पर उसके बगल में बैठते हुऐ बोला।

रमन --"भाभी, मैने सोचा है की, गांव में पिता जी के नाम से एक डिग्री कॉलेज बनवा जाए, अब देखो ना यहां से शहर काफी दूर है, आस - पास के कई गांव के विद्यार्थी को दूर शहरों में जाकर पढ़ाई करनी पड़ती है। अगर हमने अपना डिग्री कॉलेज बनवा कर मान्यता हंसील कर ली, तो विद्यार्थियों को पढ़ाई में आसानी हो जाएंगी।"

रमन की बात सुनते हुऐ, सांध्य बोली.....

संध्या --"ये तो बहुत अच्छी बात है, तुम्हारे बड़े भैया की भी यही ख्वाहिश थीं, वो अभय के नाम पर डिग्री कॉलेज बनाना चाहते थे, पर अब तो अभय रहा ही नहीं, बनवा दो अभय के नाम से ही... वो नहीं कम।से कम मेरे बच्चे का नाम तो रहेगा।"

रमन --"ओ... हो भाभी, तो पहले ही बताना चाहिए था, मैने तो मान्यता लेने वाले फॉर्म पर पिता जी के नाम से भर कर अप्लाई कर दिया। ठीक हैं मैं मुनीम से कह कर चेंज करवाने की कोशिश करूंगा।"

रमन की बात सुनकर संध्या ने कहा...

संध्या --"नहीं ठीक है, रहने दो। पिता जी का नाम भी ठीक है।"

रमन --"ठीक है भाभी, जैसा तुम कहो।"

और ये कह कर रमन जाने लगा तभी... सन्ध्या ने रमन को रोकते हुऐ....

संध्या --"अ... रमन।"

रमन रुकते हुऐ, संध्या की तरफ़ पलटते हुऐ...

रमन --"हां भाभी।"

संध्या --"एक बात पूंछू??"

संध्या की ठहरी और गहरी आवाज़ में ये बात सुनकर रमन एक पल के लिऐ सोच की उलझन में उलझते हुऐ, उलझे हुऐ स्वर मे बोला...

संध्या --"क्या उस रात अभय ने तुम्हे मेरे कमरे में आते देखा था ?

संध्या की ये बात सुन के रमन हड़बड़ा गया उसे हैरानी होने लगी की इतने साल के बाद आज संध्या ऐसी बात क्यों पूछ रही है

रमान -- (अपना थूक निगलते हुए) म..मु..मुझे नहीं लगता भाभी , अभय ने देखा होगा , वैसे भी वो तो 9 साल का बच्चा था भाभी, उसे भला कैसे पता चलेगा? पर आज इतने सालों बाद क्यूं?"
संध्या अपनी गहरी और करुण्डता भरे लहज़े में बोली...
संध्या – उस मनहूस रात के बाद ना जाने क्यूं , मुझे बेचैनी सी होती रहती है, ऐसा लगता है की मेरा दिल भटक रहा है किसी के लिऐ, मुझे पता है की मेरा दिल मेरे अभय के लिऐ भटकता रहता है, मैं खुद से ही अंदर अंदर लड़ती रहती हूं, रात भर रोती रहती हूं, सोचती हूं की मेरा अभय कही से आ जाए बस, ताकी मैं उसे बता सकूं की मैं उससे कितना प्यार करती हूं, माना की मैने बहुत गलतियां की हैं, मैंने उसे जानवरों की तरह पीटा, पर ये सब सिर्फ़ गुस्से में आकर। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई, मैं ये ख़ुद को नहीं समझा पा रही हूं, उसे कैसे समझाती। मैं थक गई हूं, जिंदगी बेरंग सी लगने लगी हैं। हर पल उसे भुलाने की कोशिश करती हूं, लेकिन मेरा दिल मुझसे हर बार कहता है की, मेरा अभय आएगा एक दिन जरूर आएगा तू इंतजार कर ? (रोते हुए) हे भगवान क्या करूं? कहां जाऊं? कोई तो राह दिखा दे तू ? नही तो मेरे अभय को वापस भेज दे मेरे पास
कहते हुऐ सन्ध्या फिर रोने लगती है...!
अब रो कर कुछ हासिल नहीं होगा दीदी,"
इस आवाज को सुन रमन और संध्या ने नज़र उठा कर देखा तो सामने मालती खड़ी थीं, संध्या रुवांसी आंखो से मालती की तरफ़ देखते हुऐ थोड़ी चेहरे बेबसी की मुस्कान लाती हुई संध्या मालती से बोली...
संध्या --"एक मां को जब, उसके ही बेटे के लिऐ कोई ताना मारे तो उस मां पर क्या बीतती है, वो एक मां ही समझ सकती है।"
संध्या की बात मालती समझ गई थीं की सन्ध्या का इशारा आज सुबह नाश्ता करते हुऐ उसकी कही हुई बात की तरफ़ थीं
मालती --"अच्छा! तो दीदी आप ताना मारने का बदला ताना मार कर ही ले रही है।"
संध्या को बात भी मालती की बात समझते देरी नहीं लगी, और झट से छटपटाते हुऐ बोली...
संध्या --"नहीं... नहीं, भगवान के लिऐ तू ऐसा ना समझ की, मैं तुझे ताना मार रही हूं। तेरी बात बिलकुल ठीक थीं, मैने कभी अपने अभय को ज्यादा खाना खाने पर ताना मारी थीं, मेरी मति मारी गई थीं, बुद्धि भ्रष्ट हो गई थीं, इस लिऐ ऐसे शब्द मुंह से निकल रहे थे।"
मालती चुप चाप खड़ी संध्या की बात सुनते हुऐ भावुक हो चली आवाज़ मे बोली...
मालती --"भगवान ने मुझे मां बनने का सौभाग्य तो नहीं दीया, पर हां इतना तो पता है दीदी की, बुद्धि हीन मां हो चाहे मति मारी गई मां हो, पागल मां हो चाहे शैतान की ही मां क्यूं ना हो... अपने बच्चे को हर स्थिति में सिर्फ प्यार ही करती है।"
कहते हुऐ मालती रोते हुए अपने कमरे से चली जाति है... और इधर मालती की बातें संध्या को अंदर ही अंदर एक बदचलन मां की उपाधि के तख्ते पर बिठा गई थीं, जो संध्या बर्दाश्त नहीं कर पाई।।
और जोर - जोर से उस कमरे में इस तरह चिल्लाने लगी जैसे पागल खाने में पागल व्यक्ति...
संध्या – ..... हां.... हां मैं एक गिरी हुई औरत हूं, यही सुनना चाहती है ना तू, लेकिन एक बात सुन ले तू भी, मेरे बेटे को मुझसे ज्यादा कोई प्यार नहीं कर सकता है इस दुनिया में...
मालती – अब क्या फ़ायदा दीदी, अब तो प्यार करने वाला रहा ही नहीं... फिर किसको सुना रही हो?"
चिल्लाती हुई संध्या की बात सुनकर मालती भी चिल्लाकर कमरे से बाहर निकलते हुई बोली और फिर वो भी नम आंखों के साथ अपने कमरे में चली गई....इस बीच इन सब बातो के चलते रमन को वहा रुकना खतरे से खाली न लगा इसीलिए चुप चाप कमरे से पहले ही निकल गया रमन
संध्या रोते रोते जाने लगी अपने कमरे की तरफ लेकिन तभी अपने कमरे में ना जाके अभय के कमरे की तरफ चली गई अभय के कमरे को गौर से देखने लगी तभी संध्या की नजर टेबल पर पड़ी जहा अभय पढ़ाई करता था टेबल में रखी अभय की स्कूल की किताबो को देख इसे टेबल की दराज में रखने के दराज को खोलते ही संध्या की नजर पेंटिंग पर पड़ी उसे दराज से नकलते ही संध्या पेंटिंग को देखने लगी हर पेंटिंग के नीचे कुछ लाइनें लिखी थी अभय ने
1 = पेंटिंग

images-74
रिश्तों की इस किताब में, माँ-बाप का पन्ना सबसे खास,
उनके बिना ज़िंदगी लगे बिल्कुल उदास।
वो छांव हैं, तपते सूरज में आराम जैसे,
माँ की वो एक नजर, और पापा का वो एक नाम जैसे।






2 = पेंटिंगimages-9
ज़िन्दगी में मां बाप के सिवा कोई अपना नहीं होता,
टूट जाए ख्वाब तो सपना पूरा नहीं होता,
ज़िंदगी भर पूजा करूगा अपने मां बाप की ,
क्यों की मां बाप से बड़ा भगवान नहीं होता।


3 = पेंटिंग
images-2
तेरे साथ गुजरे लम्हे ही तो
अब मेरे जीने का सहारा है
तुझे कैसे बताऊं बाबा
तेरी यादों का हमें हर हिस्सा प्यारा है बाबा



4 = पेंटिंग
images-39
माता पिता के बिना दुनिया की हर चीज कोरी हैं, दुनिया का सबसे सुंदर संगीत मेरी माँ की लोरी हैं..!!
5 = पेंटिंगimages-71
जिस के होने से मैं खुद को मुक्कम्मल मानता हूँ, मेरे पिता के बाद मैं बस अपने माँ को जानता हूँ..!!
6 = पेंटिंग
images-72
दिल में दर्द सा होता है आँखें ये भर-भर जाती हैं, माँ तेरे साथ बिताये पलों की यादें मुझे जब जब आती हैं।


अभय की बनाई आखरी तस्वीर में सूखे हुए आसू का कतरा देख समझ गई संध्या की तस्वीर बनाते वक्त अभय रो रहा था साथ उसमे लिखी कविता को पड़ के संध्या जमीन में बैठ तस्वीरों को अपने सीने से लगाए रोते रोते बोलने लगी
संध्या – लौट आ लौट आ मेरे बच्चे , तेरी मां तेरे बिना बिल्कुल अधूरी हो गई है , तू जो सजा दे दे सब मंजूर है मुझे , बस एक बार तू लौट के आजा अभय , तुझे कबी नही रोकूगी चाहे कुछ भी कर तू
रोते रोते संध्या जमीन में सो गईं
.
.
.
जारी रहेगा ✍️✍️
Emotional update
 

Shetan

Well-Known Member
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वाह कविताई भी होगी और कहानी भी :applause:
Bas esa hi samazlo. Har bar kuchh alag karne ka irada hai.
 
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