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Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

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What should be Vaibhav's role in this story..???

  • His role should be the same as before...

    Votes: 19 9.9%
  • Must be of a responsible and humble nature...

    Votes: 22 11.5%
  • One should be as strong as Dada Thakur...

    Votes: 75 39.1%
  • One who gives importance to love over lust...

    Votes: 44 22.9%
  • A person who has fear in everyone's heart...

    Votes: 32 16.7%

  • Total voters
    192
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Thakur

असला हम भी रखते है पहलवान 😼
Prime
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अध्याय - 95
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अगले दिन नाश्ता करने के बाद मैं खेतों की तरफ जाने के लिए निकला ही था कि बाहर बैठक में एक बार मैंने यूं ही नज़र डाली लेकिन अगले ही पल मुझे अपनी जगह पर जाम सा हो जाना पड़ा। कारण, बैठक में सुनील और चेतन को देख लिया था मैंने। उन दोनों से क़रीब दो क़दम की दूरी पर शेरा खड़ा था। मैं फ़ौरन ही बैठक कक्ष में दाखिल हो गया। बैठक में पिता जी के अलावा वो व्यक्ति भी था जिसे पिता जी ने मेरे ननिहाल से बुलाया था और जिसे पिता जी ने अपना नया मुंशी नियुक्त कर दिया था।

(यहां पर मैं इस नए मुंशी और उसके परिवार के बारे में संक्षिप्त में बता देना ज़रूरी समझता हूं।)

✮ किशोरी लाल सिंह (उम्र - 40 के क़रीब)
☞ निर्मला सिंह (किशोरी लाल की पत्नी/उम्र - 35 के क़रीब)

किशोरी लाल और निर्मला के दो बच्चे हैं, जिनमें से सबसे बड़ी बेटी है और फिर एक बेटा।

☞ कजरी सिंह (किशोरी और निर्मला की बेटी/ उम्र - 18)
☞ मोहित सिंह (किशोरी और निर्मला का बेटा/ उम्र **)

किशोरी लाल मेरे ननिहाल माधवगढ़ का रहने वाला है। उसका एक बड़ा भाई है जिसका नाम समय लाल है। समय लाल मेरे नाना जी का मुंशी है। इसके पहले इनके पिता मुंशी का काम करते थे। कहने का मतलब ये कि इन लोगों के बारे में मेरे नाना जी लोगों को अच्छी तरह पता है और क्योंकि ये उनकी नज़र में भरोसेमंद और योग्य थे इस लिए नाना जी ने उसे मेरे पिता जी के पास भेजा था। मेरा ख़याल है कि नए मुंशी का इतना परिचय काफी है इस कहानी के लिए। अतः अब कथानक की तरफ रुख करते हैं।

सुनील और चेतन पिता जी के सामने सिर झुकाए खड़े थे। मैंने दोनों को ध्यान से देखा और फिर आगे बढ़ते हुए एक कुर्सी पर बैठ गया।

"इन दोनों को हमारे सामने लाने में तुम्हें इतना समय क्यों लग गया?" पिता जी ने शेरा की तरफ देखते हुए उससे पूछा।

"माफ़ कीजिए मालिक।" शेरा ने खेदपूर्ण भाव से कहा____"दरअसल ये दोनों यहां थे ही नहीं। पता करने पर पता चला कि ये दोनों अपने ननिहाल गए हुए हैं। तब मैं अपने साथ कुछ आदमियों को ले कर इनके ननिहाल समयपुर गया। वहां जब इन दोनों ने मुझे देखा तो ये भाग खड़े हुए। बड़ी मुश्किल से हाथ लगे तो इन्हें ले कर यहां आया।"

शेरा की बात सुन कर पिता जी ने सख़्त नज़रों से सुनील और चेतन की तरफ देखा तो वो दोनों एकदम से सिमट गए। चेहरे पर मारे घबराहट के ढेर सारा पसीना उभर आया था।

"ठीक है अब तुम जाओ।" पिता जी ने शेरा से कहा तो वो चला गया। शेरा के जाने के बाद पिता जी ने उन दोनों की तरफ देखते हुए सख़्त भाव से कहा____"हम तुम दोनों से सिर्फ एक ही सवाल करेंगे और उम्मीद करते हैं कि तुम हमारे सवाल का जवाब सच के रूप में ही दोगे।"

"हमें माफ़ कर दीजिए ताऊ जी।" चेतन घबरा कर एकदम से पिता जी के पैर पकड़ कर बोल पड़ा____"हमसे बहुत बड़ा अपराध हो गया है।"

"क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम दोनों ने जो अपराध किया है।" पिता जी ने कहा____"उसके लिए तुम दोनों को माफ़ी मिलनी चाहिए? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम्हारे जिस मित्र ने तुम्हें हमेशा अपना सच्चा मित्र मान कर अपने साथ किसी साए की तरह रखा उसके साथ इस तरह का विश्वास घात करने के बाद तुम्हें माफ़ कर देना चाहिए?"

"हम जानते हैं ताऊ जी कि हमारा अपराध माफ़ी के लायक नहीं है।" सुनील भी पिता जी के पैरों के पास घुटनों के बल बैठ कर लगभग रोते हुए बोला____"लेकिन हम दोनों मजबूर थे। अगर हम ऐसा नहीं करते तो हमारे परिवार को ख़त्म कर दिया जाता।"

"पूरी बात बताओ।" पिता जी ने उसी सख़्ती के साथ कहा____"हम जानना चाहते हैं कि आख़िर किसने तुम्हें इस क़दर मजबूर कर दिया था कि तुम उसके कहने पर अपने मित्र के साथ विश्वास घात करने के साथ साथ उसकी जान के भी दुश्मन बन गए?"

"ये तब की बात है जब आपने वैभव को इस गांव से निष्कासित कर दिया था।" पिता जी के पैरों के पास से उठ कर सुनील ने दो क़दम पीछे हट कर कहा_____"उस दिन हमें बड़ा दुख लगा था जब हमारा दोस्त वैभव हमसे दूर चला गया। आख़िर उसकी वजह से ही तो हम दोनों का जीवन अच्छे से गुज़र रहा था और हमें किसी चीज़ का अभाव नहीं रहता था। उस दिन पंचायत में हमने भी आपका फ़ैसला सुना था जिसमें आपने कहा था कि गांव का कोई भी व्यक्ति वैभव से किसी भी तरह का ताल्लुक नहीं रखेगा और ना ही कोई उसकी मदद करेगा। अगर किसी ने ऐसा किया तो उसके साथ भी वही सुलूक किया जाएगा। आपकी इस बात से हम थोड़ा सहम तो गए थे लेकिन अपने दोस्त को इस तरह अकेले मुसीबत में पड़ गया देख भी नहीं सकते थे इस लिए हम दोनों ने फ़ैसला किया कि हम दोनों सबकी नज़र बचा कर अपने दोस्त वैभव से ज़रूर मिला करेंगे और हमसे जिस तरह से भी हो सकेगा हम वैभव की मदद करेंगे।"

"यही सोच कर एक दिन हम दोनों अपने अपने घर से निकल कर अपने ठिकाने पर मिले।" सुनील सांस लेने के लिए रुका तो जैसे चेतन ने कमान सम्हालते हुए कहा____"शाम पूरी तरह से हो गई थी और हर तरफ अंधेरा फैल गया था। आस पास का मुआयना करने के बाद हम दोनों जैसे ही अपने ठिकाने से निकले तो एकदम से अंधेरे में एक चमकता हुआ साया हमारे सामने आ कर खड़ा हो गया। इतना ही नहीं उसके साथ दो काले साए और भी आ कर हमारे अगल बगल खड़े हो गए। दोनों के हाथ में लट्ठ थे। अपने इतने क़रीब किसी जिन्न की तरह अचानक से उन लोगों को प्रगट हो गया देख डर के मारे हमारी चीख निकल गई थी। हमें समझ नहीं आया था कि आख़िर वो लोग कौन थे जो खुद को इस तरह से छुपाए हुए थे। पहले जो चमकीला साया आया था उसके पूरे शरीर पर सफेद लिबास था और जो दो लोग उसके बाद उसी समय आ कर हम दोनों के अगल बगल खड़े हो गए थे उनके शरीर पर काले रंग का लिबास था। यहां तक कि उन सबका चेहरा भी सफेद और काले रंग के नक़ाब में छुपा हुआ था। हम दोनों की तो उन्हें देख कर हालत ही ख़राब हो गई थी।"

"वो तीनों हमें इस तरह से घेर कर खड़े हो गए थे कि हम कहीं भाग ही नहीं सकते थे।" चेतन सांस लेने के लिए रुका तो सुनील ने आगे बताना शुरू किया____"पहले तो हमें लगा कि वो तीनों आपके ही कोई आदमी होंगे जो हम पर नज़र रखे हुए थे किंतु जल्दी ही हमारी ये ग़लतफहमी दूर हो गई। उन तीनों में से सफ़ेद लिबास पहने साए ने अपनी अजीब सी आवाज़ में हमसे कहा कि अब से हम दोनों को वही करना होगा जो वो कहेगा। अगर हमने उसके कहे अनुसार उसका कोई नहीं किया तो अंजाम के रूप में हमें अपने अपने परिवार के लोगों से हाथ धोना पड़ जाएगा।"

"यानि तुम दोनों उस सफ़ेदपोश के धमकाने पर अपने दोस्त के साथ विश्वास घात करने पर मजबूर हो गए?" सहसा पिता जी ने दोनों को बारी बारी से देखते हुए कहा____"ख़ैर, हम ये जानना चाहते हैं कि वो सफ़ेदपोश व्यक्ति तुम दोनों से क्या करवाता था या यूं कहें कि तुम दोनों उसके कहने कर क्या करते थे?"

"पहले तो उसने वैभव के बारे में हमसे सारी जानकारी ली।" सुनील ने कहा____"जैसे कि वैभव क्या क्या करता है और उसके किस किस से संबंध हैं? ये भी कि वैभव की पहुंच कहां तक है? हमसे ये सब जानने के बाद उसने हमें सिर्फ एक ही काम करने को कहा और वो काम था नज़र रखना। वैभव पर नज़र रखने के साथ साथ हमें ये भी देखते रहना था कि वैभव कहां कहां जाता है और खुद उसके पीछे कौंन कौंन है?"

"इस बात का क्या मतलब हुआ?" पिता जी के साथ साथ मैं भी चौंका था, उधर पिता जी ने पूछा____"वैभव के पीछे कौन कौन है इस बात को देखते रहने के लिए क्यों कहा था उसने तुम लोगों को?"

"हमें इस बारे में कुछ नहीं पता।" चेतन ने सिर झुका कर दबी आवाज़ में कहा____"हम खुद भी इस बारे में सोचते थे मगर कुछ समझ नहीं आया हमें। कई बार हमने आपको या वैभव को सब कुछ बताने का सोचा और एक दो बार आप दोनों के पास आने की कोशिश भी की मगर नाकाम रहे। पता नहीं कैसे उसे पता चल जाता था और उसके दोनों काले नक़ाबपोश आदमी हमारे सामने जिन्न की तरह आ कर खड़े हो जाते थे। आख़िरी बार उसने हमें धमकी दी थी कि अब अगर हमने फिर से आपको या वैभव को इस बारे में कुछ बताने का सोचा तो हमारे लिए अच्छा नहीं होगा।"

"सफ़ेदपोश से तुम लोगों की मुलाक़ात कैसे होती थी?" पिता जी ने पूछा____"और अभी आख़िरी बार कब मिले थे उससे?"

"हम दोनों अपनी मर्ज़ी से नहीं मिल सकते थे उससे।" चेतन ने कहा____"क्योंकि एक तो हमें उसके बारे में कुछ पता ही नहीं था और दूसरे उसने खुद ही हमें बोला हुआ था कि हम लोग भूल कर भी उससे मिलने की या उसके पीछे आने की कोशिश न करें। क्योंकि ऐसी सूरत में हमें बहुत बुरा अंजाम भुगतना पड़ सकता है। इस लिए हम अपनी मर्ज़ी से उससे मिल ही नहीं सकते थे। किंतु जब उसको हमसे मिलना होता था तो उसके दोनों काले नकाबपोश आदमी रात के अंधेरे में हमारे सामने प्रगट हो जाते थे और हमें उस सफ़ेदपोश व्यक्ति के पास ले जाते थे। सफ़ेदपोश के पूछने पर हम उसको सारी बातें बताते और फिर उसके अगले आदेश पर वापस चले जाते थे।"

"हम्म्म्म।" पिता जी ने लंबी हुंकार सी भरी, फिर बोले____"तो जैसा कि उस सफ़ेदपोश व्यक्ति के अनुसार तुम दोनों वैभव पर नज़र रखते थे और ये भी कि इसके पीछे कौन कौन है ये भी पता करते थे तो अब हमें बताओ कि तुम लोगों ने वैभव के पीछे किन किन लोगों को देखा था?"

"कई लोगों को देखा था हमने।" सुनील ने बताया____"लेकिन रात के अंधेरे में हम ये जान ही नहीं पाए थे कि वो लोग कौन थे जो वैभव के पीछे थे? किंतु हां, हरि शंकर के बेटे रूपचंद्र को वैभव पर नज़र रखते हुए हमने बहुतों बार देखा था।"

"कमाल है।" पिता जी ने एक नज़र मेरी तरफ देखने के बाद कहा____"तुम लोगों ने रूपचंद्र को तो कई बार देखा लेकिन बाकी लोगों को देखा तो ज़रूर मगर उन्हें पहचाना नहीं। ये कैसे हो सकता है भला? जब तुम दोनों का काम ही था ऐसे लोगों पर नज़र रखते हुए उनका पता लगाना तो फिर कैसे तुम लोगों को उनके बारे में पता नहीं चला?"

"ऐसा इस लिए क्योंकि वो लोग हमेशा रात के अंधेरे में ही कभी कभी वैभव के पीछे हमें नज़र आते थे।" चेतन ने कहा____"जबकि रूपचंद्र दिन में भी वैभव पर नज़र रखता था, इस वजह से हमें उसके बारे में अच्छे से पता चल गया था। दिन के उजाले में वैभव के पीछे हमने रूपचंद्र के अलावा कभी किसी को नहीं देखा।"

चेतन की ये बात सुन कर पिता जी फ़ौरन कुछ न बोले। उनके चेहरे पर सोचो के भाव उभर आए थे। मैं खुद भी सोच में पड़ गया था किंतु सहसा मुझे एहसास हुआ कि वो दोनों इस बारे में झूठ नहीं बोल रहे थे। यकीनन रात के अंधेरे में ऐसे व्यक्तियों के बारे में जान पाना आसान नहीं रहा होगा दोनों के लिए।

"पिछली बार कब मिले थे तुम दोनों उस सफ़ेदपोश से?" सहसा मैंने दोनों की तरफ देखते हुए पूछा।

"बहुत दिन हो गए।" सुनील ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"तब से अभी तक उससे हमारी मुलाक़ात नहीं हुई लेकिन....।"

"लेकिन??" मैंने घूरा उसे।

"पिछली बार अजीब बात हुई थी।" सुनील ने कहा____"हमेशा तो उसके काले नकाबपोश आदमी हमें लेने आते थे और वही हमें उस सफ़ेदपोश से मिलवाते थे लेकिन पिछली बार ऐसा नहीं हुआ।"

"क्यों?" पिता जी ने पूछा।

"पहले हमें भी पता नहीं चला था।" चेतन ने गहरी सांस ली____"फिर हमें कहीं से पता चला कि उसके दोनों नकाबपोश आदमी मर चुके हैं। तभी तो पिछली बार सफ़ेदपोश व्यक्ति खुद ही चल कर हमारे सामने आया था।"

"तुम दोनों के अलावा और किस किस को उस सफ़ेदपोश ने अपना मोहरा बना रखा है?" मैंने पूछा।

"एक दो बार मैंने पास वाले गांव के एक आदमी को देखा था।" सुनील ने बताया____"उसका नाम जगन था। उसके अलावा और किसी के बारे में हमें नहीं पता। हो सकता है कि हमारे अलावा भी उसके कई और मोहरे हों जिनसे वो अलग अलग समय पर मिलता हो।"

"पास के गांव में छुपे क्यों बैठे थे तुम दोनों?" मैंने पूछा____"क्या ऐसा करने के लिए तुम्हारे आका ने कहा था तुम लोगों से?"

"नहीं ऐसी कोई बता नहीं है।" चेतन ने झिझकते हुए कहा____"असल में काफी समय से हमारी उस सफ़ेदपोश व्यक्ति से मुलाक़ात नहीं हुई थी। हमें समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर इसकी क्या वजह हो सकती है? हालाकि इससे कहीं न कहीं हम ये सोच कर खुश भी थे कि उसके कहने पर हमें फिलहाल कहीं भटकना नहीं पड़ रहा है लेकिन फिर ये सोच कर डर भी जाते थे कि कहीं वो हमें आजमा न रहा हो। यानि अगर हम उसकी मर्ज़ी के खिलाफ़ कुछ करेंगे तो हमें लेने के देने ना पड़ जाएं। इधर जब काफी दिनों से सफ़ेदपोश हमसे मिलने नहीं आया तो हम और भी ज़्यादा असमंजस में पड़ गए। हमें ये भी डर सताता रहता था कि किसी दिन आप हमें पकड़ न लें। इतना तो हम समझ ही चुके थे कि अब तक आप लोगों को हम पर शक हो ही गया होगा, ख़ास कर वैभव को। इसी डर से हम इस गांव में ज़्यादा रहते ही नहीं थे। अपने घर वालों को भी समझा दिया था कि वो इस बारे में न तो हमारी फ़िक्र करें और ना ही किसी को बताएं। बस यही बात थी कि हम दोनों दूसरे गांव में छुप के रहते थे।"

"हमें माफ़ कर दीजिए ताऊ जी।" चेतन की बात पूरी होते ही सुनील अपने हाथ जोड़ कर बोल पड़ा____"हमने जो भी किया है वो सब मजबूरी में किया है।" कहने के साथ वो मेरी तरफ पलटा, फिर बोला____"तुम भी हमें माफ़ कर दो वैभव। तुम तो हम दोनों को बचपन से जानते हो कि हम कैसे हैं। ये ऊपर वाला ही जानता है कि तुमसे गद्दारी करने की वजह से हम कितना दुखी थे और कितना शर्मिंदा महसूस करते थे। मन करता था कि अपने आप को मिटा डालें मगर फिर ये सोच कर ऐसा क़दम नहीं उठाया कि ऐसा करने से हमारे घर वालों पर क्या गुज़रेगी?"

"ठीक है मैंने माफ़ किया तुम दोनों को।" मैंने एक नज़र पिता जी पर डालने के बाद कहा____"और उम्मीद करता हूं कि अब से वफ़ादारी दिखाओगे।"

"अभी इन लोगों से वफ़ादारी की उम्मीद करना उचित नहीं है।" पिता जी ने कहा____"क्योंकि इन दोनों को अभी भी उस सफ़ेदपोश से ख़तरा है। वो बहुत ही शातिर और ख़तरनाक व्यक्ति है। संभव है कि उसे ये पता चल गया हो कि ये दोनों हमारे पास पहुंच चुके हैं और हमारे पूछने पर इन लोगों ने हमें सब कुछ बता दिया हो। ऐसे में इन दोनों पर अब उसका ख़तरा बढ़ गया है। हमारा ख़याल ये है कि इन दोनों को फिलहाल वैसा ही करते रहना चाहिए जैसा अब तक ये करते आए थे। सफ़ेदपोश से अगर दुबारा इन लोगों की मुलाक़ात होती है तो ये किसी तरीके से हमें इशारा कर देंगे। इनका इशारा पाने के लिए हमारे कुछ लोग गुप्त रूप से इन दोनों के आस पास ही मौजूद रहेंगे।"

पिता जी की बात से मैं भी सहमत था इस लिए यही फ़ैसला हुआ कि वो दोनों फिलहाल पहले जैसा बर्ताव करते रहें। उन दोनों के जाने के बाद पिता जी कुछ देर तक जाने क्या सोचते रहे।

"क्या लगता है तुम्हें?" पिता जी ने सहसा मुझसे पूछा____"तुम्हारे वो दोनों दोस्त वाकई में सच बोल रहे थे या उन्होंने हमसे झूठ बोला था?"

"मुझे नहीं लगता पिता जी कि वो दोनों झूठ बोल रहे थे।" मैंने ठोस लहजे में कहा____"वैसे भी झूठ बोलने की कोई वजह नहीं थी उनके पास। मैं दोनों को बहुत अच्छे से जानता हूं। यकीनन वो दोनों सफ़ेदपोश के द्वारा इस क़दर मजबूर किए गए थे कि दोनों को ऐसा करना पड़ा।"

"ऐसा तुम इस लिए कह रहे हो क्योंकि तुम अभी भी उन दोनों को दोस्त मानते हो और उन्हें दोस्त के नज़रिए से ही देख रहे हो।" पिता जी ने मानो तर्क़ देते हुए कहा____"जबकि तुम्हें सबसे ज़्यादा इस बात पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि ये वही दोस्त हैं जो सफ़ेदपोश के द्वारा मजबूर कर दिए गए थे और फिर उन्होंने तुम्हारे साथ विश्वास घात किया। मान लेते हैं कि दोनों के दिल साफ हैं और वो तुमसे गद्दारी करने का नहीं सोच सकते लेकिन ये भी मत भूलो कि इंसान मजबूरी में कुछ भी कर गुज़रता है। हो सकता है कि उनका हमारे सामने वो सब कहना भी उनकी मजबूरी का ही हिस्सा रहा हो। आख़िर मजबूरी में वो तुमसे कहीं ज़्यादा अपने परिवार के बारे में ही सोचेंगे।"

"यानि आपको उन दोनों पर शक है?" मैंने कहा____"और आपके अनुसार उन्होंने जो कुछ भी हमसे कहा है वो सब सफ़ेदपोश के सिखाए अनुसार ही कहा है।"

"क्या ऐसा नहीं हो सकता?" पिता जी ने उल्टा सवाल कर दिया मुझसे।
"होने को तो कुछ भी हो सकता है पिता जी।" मैंने कहा____"लेकिन मेरा दिल कहता है कि वो दोनों बेकसूर है"

"हमने ये कब कहा कि वो बेकसूर नहीं हैं?" पिता जी ने अजीब भाव से कहा____"हम तो सिर्फ ये कह रहे हैं कि संभव है कि उन्होंने अभी जो कुछ भी हमसे कहा है या बताया है वो सब उन्हें उस सफ़ेदपोश ने ही सिखाया रहा हो। शायद वो समझता था कि किसी न किसी दिन इन दोनों पर हम शक करेंगे ही और फिर इन्हें पकड़ने का भी सोचेंगे। सफ़ेदपोश ने इसी बात को समझते हुए इन्हें पहले ही सिखा पढ़ा दिया रहा होगा कि हमारे द्वारा पकड़े जाने पर इन्हें हमसे क्या कहना है।"

"बेशक ऐसा हो सकता है।" मैंने कुछ पल सोचने के बाद कहा____"किंतु सवाल है कि इससे सफ़ेदपोश का अपना क्या फ़ायदा होता? कहने का मतलब ये कि अगर दोनों ने वही सब कुछ हमें बताया है जो आपके अनुसार उन्हें सफ़ेदपोश ने सिखाया पढ़ाया रहा होगा तो इन सब बातों के द्वारा सफ़ेदपोश का क्या लाभ हो सकता है और क्या नुकसान हो सकता है? मुझे तो ऐसा लगता है पिता जी कि आप बेवजह ही इतना दूर का सोच रहे हैं। दोनों ने जो कुछ भी हमें बताया है वो सब स्वाभाविक बातें हैं जो उनकी परिस्थिति के अनुसार वाजिब ही लगती हैं।"

"मानते हैं।" पिता जी ने सिर हिलाया____"किंतु हमें सिर्फ एक पहलू के बारे में नहीं सोचना चाहिए बल्कि मौजूदा हालात के अनुसार दोनों पहलुओं पर सोचना चाहिए। हमारे लिए यही हितकर भी रहेगा।"

मैं पिता जी की इस बात से सहमत था इस लिए दुबारा कोई तर्क वितर्क नहीं किया। उधर पिता जी ने आगे कहा____"शेरा को बोलो कि वो अपने कुछ आदमियों को उन दोनों पर नज़र रखने को कहे।"

"क्या ऐसा करना ज़रूरी है?" मैंने बैठक से ही एक दरबान को आवाज़ देने के बाद पिता जी से कहा।

इससे पहले कि पिता जी मेरी बात का कोई जवाब देते एक दरबान फ़ौरन ही हाज़िर हो गया जिसको मैंने शेरा को बुलाने को कहा तो वो चला गया।

"बिल्कुल ज़रूरी है।" दरबान के जान के बाद पिता जी ने मेरी बात का जवाब देते हुए कहा____"ये मत भूलो कि सफ़ेदपोश के मोहरों में से फिलहाल हम तुम्हारे दोस्तों के बारे में ही जानते हैं। जगन तो मर चुका है इस लिए सुनील और चेतन के द्वारा ही हम सफ़ेदपोश तक पहुंच सकते हैं।"

"वो कैसे?" मेरे माथे पर सोचने वाले भाव उभर आए।

"काफी समय से सफ़ेदपोश ने कोई हरकत नहीं की है और ना ही उसके बारे में हमें कहीं से कोई ख़बर मिली है।" पिता जी ने कहा____"संभव है कि वो किसी बड़े काम को अंजाम देने की फ़िराक में हो। अब क्योंकि हमारे पास उसके पास पहुंचने का कोई रास्ता अथवा जरिया नहीं है तो सुनील और चेतन ही ऐसे हैं जिनके द्वारा हम सफ़ेदपोश तक पहुंच सकते हैं, बशर्ते कि सफ़ेदपोश इनसे मिलने की कोशिश करे। हमने इसी लिए दोनों पर नज़र रखने के लिए कहा है कि अगर सफ़ेदपोश उन दोनों से मिलने की कोशिश करे तो दोनों पर नज़र रख रहे हमारे आदमियों को भी सफ़ेदपोश दिख जाए और फिर वो फ़ौरन ही हमें इस बात की सूचना दे दें।"

मैं अभी कुछ बोलने ही वाला था कि शेरा बैठक में दाखिल हुआ। पिता जी ने उसे समझा दिया कि उसे क्या करना है। सारी बात समझने के बाद शेरा चला गया।

"ये सब तो ठीक है लेकिन रघुवीर की हत्या का जो मामला सामने आया है उसके बारे में आपका क्या ख़याल है?" मैंने उत्सुकतावश ही पूछा पिता जी से____"क्या लगता है आपको? रघुवीर की हत्या किसने की होगी? क्या चंद्रकांत ने खुद ही अपने बेटे की हत्या कर के हमें फंसाने की साज़िश की हो सकती है?"

"नहीं, हर्गिज़ नहीं।" पिता जी ने पूरी मजबूती से इंकार में सिर हिला कर कहा____"चंद्रकांत बदले की भावना में इतना भी अंधा नहीं हो सकता कि वो अपने ही हाथों अपने इकलौते बेटे की हत्या कर के अपने वंश का नाश कर बैठे। उसके बेटे की हत्या यकीनन किसी और ने ही की है।"

"किसने की होगी?" मैंने सवाल किया____"क्या उसकी हत्या हमारे मामले की वजह से हुई या फिर किसी और ने ही चंद्रकांत से उसके बेटे की हत्या कर के अपनी दुश्मनी निकाल ली है?"

"जहां तक हम दोनों बाप बेटे को जानते और समझते हैं उससे हम यही कहेंगे कि दोनों की किसी से ऐसी दुश्मनी नहीं थी जिसके चलते कोई उनमें से किसी की हत्या कर दे।" पिता जी ने गंभीरता से कहा____"लेकिन हम ये भी समझते हैं कि इंसान किसी के बारे में पूर्ण रूप से सब कुछ नहीं जान रहा होता है। कहने का मतलब ये कि संभव है कि उसका ऐसा कोई दुश्मन बन ही गया रहा हो जिसके बारे में हमें फिलहाल पता नहीं था।"

"चंद्रकांत ने तो रूपचंद्र पर भी इल्ज़ाम लगाया था।" मैंने कहा____"उसकी बहू ने अपने और रूपचंद्र के विषय में जो बातें बताई थी तो क्या ऐसा हो सकता है कि रूपचंद्र ने गुस्से में आ कर रघुवीर की हत्या कर दी हो?"

"ये तो अपने ही हाथों अपने पैर में कुल्हाड़ी मार लेने वाली बात होती।" पिता जी ने कहा____"हमें नहीं लगता कि रूपचंद्र ने इस तरह की बेवकूफी की होगी। अगर उसे रजनी की बातों पर इतना ही गुस्सा आ गया था तो वो उसी समय रजनी पर ही अपना गुस्सा मिटा देता। अपने गुस्से को शांत करने के लिए वो रात होने का इंतज़ार नहीं करता और ना ही फिर वो रघुवीर की हत्या करता। इंसान जिस पर गुस्सा होता है ज़्यादातर वो उसी पर अपना गुस्सा निकालता है।"

"अगर ऐसा है।" मैंने कहा____"तो फिर यही ज़ाहिर होता है कि रघुवीर की हत्या करने वाला कोई और ही है। अब सवाल ये है कि रघुवीर ने आख़िर किसी के साथ ऐसा क्या बुरा किया था जिसके चलते उसे अपनी जान से हाथ धो लेना पड़ा?"

"महेंद्र सिंह इसकी तहक़ीकात कर रहे हैं।" पिता जी ने कहा____"हमें पूरा यकीन है कि जल्द से जल्द रघुवीर के हत्यारे का पता चल जाएगा। एक बात और, तुम्हें इस तरह के मामले से बिल्कुल ही दूर रहना है। हम चाहते हैं कि तुम ऐसे काम करो जिसके चलते लोगों के अंदर से तुम्हारी ख़राब छवि मिट जाए और लोग तुम्हें एक अच्छा इंसान मान कर तुम्हें सम्मान की दृष्टि से देखने लगें।"

"मैं पूरी कोशिश कर रहा हूं पिता जी।" मेरे मन में अचानक ही एक बात आई तो मैंने कहा____"और इसके लिए मैंने एक अहम कार्य करने का भी सोचा है। अगर आप कहें तो अपने उस कार्य के बारे में आपको बताऊं?"

"हां क्यों नहीं।" पिता जी ने कहा____"हम भी जानना चाहते हैं कि तुम अच्छा बनने के लिए ऐसा कौन सा कार्य करना चाहते हो?"

"मैं चाहता हूं कि एक दिन गांव के सभी लोगों को हवेली के विशाल प्रांगण में बुलाया जाए।" मैंने कहा____"और फिर उन सभी लोगों को ये बताया जाए कि गांव के जिन लोगों ने हमसे कर्ज़ ले रखा है उन सबका कर्ज़ हम पूरी तरह से माफ़ करते हैं। मेरा ख़याल है कि कर्ज़ माफ़ी की बात सुन कर गांव वाले बेहद खुश हो जाएंगे और पिछले कुछ समय से जिस वजह से लोगों के अंदर हमारे प्रति ग़लत विचार पैदा हुए होंगे वो जड़ से समाप्त हो जाएंगे।"

"हम्म्म्म! काफ़ी अच्छा ख़याल है ये।" पिता जी ने सिर हिलाते हुए कहा____"गांव वालों के लिए ऐसा कार्य करना बड़ी बात है। यकीनन इससे गांव वाले काफी खुश और प्रभावित होंगे। हमें अच्छा लगा कि तुमने इतनी बड़ी बात सोची और ऐसा कार्य करने का निर्णय लिया है।"

"आपने बिल्कुल सही कहा ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने खुशी से मुस्कुराते हुए पिता जी से कहा____"छोटे कुंवर का ऐसा सोचना और इस गांव के लोगों के लिए ऐसा कार्य करना वाकई में बड़ी अच्छी बात है।"

"तो फिर ये तय रहा।" पिता जी ने कहा____"हम पंडित जी से कोई अच्छा सा मुहूर्त निकलवा कर इस कार्य को करवा देते हैं।"

थोड़ी देर और इसी संबंध में हमारी बातें हुईं उसके बाद मैं अपनी मोटर साईकिल ले कर खेतों की तरफ निकल गया। पिता जी काफी खुश और प्रभावित नज़र आए थे मुझे।

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अध्याय - 97
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अगले दस पंद्रह दिन ऐसे ही गुज़र गए। इस बीच पिता जी शहर गए थे जहां पर उन्होंने अपने किसी जान पहचान वाले से मुलाक़ात की और उन्हें बताया कि वो अपने भतीजों को यानि विभोर और अजीत को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजना चाहते हैं। पिता जी की इस बात से उस व्यक्ति ने पिता जी को बताया कि इसमें कोई समस्या की बात नहीं है, बस कुछ कागज़ी कार्यवाही करनी पड़ेगी।

उस व्यक्ति के दिशा निर्देश पर पिता जी सारी कागज़ी कार्यवाही संपन्न करने के काम पर लग गए। ऐसे कामों में वक्त लगना था किंतु पिता जी के लिए कोई समस्या नहीं थी क्योंकि उनकी पहुंच काफी ऊपर तक थी इस लिए कम समय में ही सारा काम हो गया। हवेली में अब विभोर और अजीत की विदेश भेजने की तैयारी होने लगी। विभोर और अजीत का विदेश जाने का मन तो नहीं था लेकिन चाची के समझाने पर आख़िर वो दोनों मान ही गए। मैंने भी दोनों को आश्वस्त किया कि उन्हें यहां किसी की फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है। उनका काम सिर्फ इतना है कि वो दोनों हर चिंता से मुक्त हो कर विदेश में अच्छी तरह से अपनी शिक्षा ग्रहण करें।

आख़िर वो दिन आ ही गया जब विभोर और अजीत विदेश जाने लगे। दोनों अपने पिता को याद कर के बहुत रो रहे थे। उनके साथ चाची भी रो रहीं थी। हम सब भी अंदर से दुखी थे किंतु बात उनके उज्ज्वल भविष्य की थी इस लिए हम सभी को अपने आपको कठोर बनाना था। पिता जी जीप में दोनों को बैठा कर तथा अपने साथ कुछ हथियारबंद आदमियों को ले कर शहर के लिए रवाना हो गए। उस दिन हवेली में एकदम से सन्नाटा सा छा गया था। मां और भाभी मेनका चाची को सम्हालने में लगी हुईं थी। नए मुंशी किशोरी लाल की बीवी निर्मला भी वहीं थी, जबकि उसकी बेटी कजरी और कुसुम थोड़ी दूरी पर बैठी हुईं थी।

ऐसे ही दिन गुज़र गया और फिर शाम ढलते ढलते पिता जी शहर से वापस आ गए। उन्होंने सबको बताया कि दोनों बच्चे सकुशल हवाई जहाज में बैठ कर विदेश जा चुके हैं। विदेश में उनके रहने की तथा हर सुविधा संपन्न कराने की व्यवस्था पिता जी के उस परिचित को करनी थी। इसके लिए जितना भी खर्च लगने वाला था वो पिता जी ने दे दिया था उसे और साथ ही ये भी कह दिया था कि महीना पूरा होने से पहले ही वो आगे के खर्च के लिए पैसा भेजवा दिया करेंगे।

हमारे गांव से ही नहीं बल्कि आस पास गावों से भी कोई व्यक्ति अब तक उच्च शिक्षा के लिए विदेश नहीं गया था। ये हमारे लिए बड़े ही गर्व वाली बात थी। पिता जी को इस बात से बड़ा संतोष हुआ था कि उनके मरहूम छोटे भाई के दोनों बच्चों का भविष्य अब बेहतर बन जाएगा।

अगली सुबह नाश्ता करने के बाद पिता जी और मुंशी किशोरी लाल बैठक कक्ष में चले गए जबकि मैं खेतों की तरफ जाने की तैयारी करने लगा। इतने दिनों में मैंने महसूस किया था कि किशोरी लाल की बेटी कजरी कुछ अलग ही तरह से मुझसे बर्ताव करने लगी थी। मैं जब भी अपने कमरे में अकेले होता था तो वो किसी न किसी बहाने मेरे कमरे में आ धमकती थी। उसके बाद उसकी द्विअर्थी बातें शुरू हो जाती थीं जिसके चलते मैं असहज हो जाता था। अगर बात अच्छा इंसान बनने की न होती तो वो अब से पहले ही मेरे पलंग पर मेरे लंड की सवारी कर चुकी होती किंतु अब बात अलग थी। मैंने महसूस किया था कि पिछले कुछ दिनों से उसकी हिम्मत कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई थी और मुझे डर था कि उसे अपनी इस हिम्मत के लिए मेरे द्वारा कोई बुरा ख़ामियाजा न भुगतना पड़ जाए। अगर ऐसा हुआ तो हवेली में एक बड़ा हंगामा हो जाना तय था।

मैं तैयार हो कर अपने कमरे से निकला और भाभी के कमरे की तरफ बढ़ चला। पिछले दिन मैंने भाभी से कहा था कि वो मेरे साथ खेतों पर चलेंगी और उन्हें मेरे साथ चलना ही पड़ेगा। काफी समय से वो बहाने बना रहीं थी। असल में भाभी को अपने साथ ले जाने के पीछे एक खास वजह भी थी।

बहरहाल मैं जैसे ही भाभी के कमरे की तरफ मुड़ने वाले गलियारे के पास पहुंचा तो देखा भाभी अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर रहीं थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो हल्के से मुस्कुराईं। सफ़ेद साड़ी में वो अलग ही नज़र आती थीं जिसके चलते मेरे अंदर एक टीस सी उभर जाया करती थी।

"आख़िर अपनी बात मनवा ही ली तुमने मुझसे।" भाभी ने दरवाज़ा बंद कर के मेरी तरफ आते हुए कहा____"अगर पिता जी ने नाराज़गी ज़ाहिर की तो तुम्हारे साथ साथ मेरी भी ख़ैर नहीं होगी।"

"अरे! कोई कुछ नहीं कहेगा।" मैंने कहा____"मां तो कब से आपको मेरे साथ खेत घूमने जाने के लिए बोल रहीं थी लेकिन आप ही नखरे दिखा रहीं थी।"

"अच्छा बच्चू।" भाभी ने आंखें फैला कर मेरी तरफ देखा____"मैं नखरे दिखा रही थी सबको?"
"और नहीं तो क्या?" मैंने हल्के से हाथ झटकते हुए कहा____"इतने नखरे तो रूपा या अनुराधा ने भी कभी मुझे नहीं दिखाए जितना आप दिखाती हैं।"

"उन्होंने इस लिए नहीं दिखाया क्योंकि वो बेचारी तुमसे डरती हैं।" भाभी ने कहा____"जबकि मैं रत्ती भर भी नहीं डरती तुमसे।"

"हां ये भी सही कहा आपने।" मैंने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया____"और मैं चाहता भी नहीं हूं कि आप मुझसे डरें, बल्कि मैं तो ये चाहता हूं कि मेरी प्यारी भाभी हमेशा मेरी टांगें खींचें ताकि उन्हें खुशी मिले।"

"बहुत बातें बनाने लगे हो आज कल।" भाभी ने मुझे घूर कर देखा____"मां जी से शिकायत करनी पड़ेगी तुम्हारी।"

"अरे! मां को तकलीफ़ क्यों देंगी आप?" मैंने चौंक कर कहा____"अगर मुझसे कोई ग़लती हो जाए तो आप खुद मुझे डांट सकती हैं और हां पीट भी सकती हैं मुझे।"

"अच्छा सच में??" भाभी ने सीढ़ियों की तरफ बढ़ने से पहले मेरी तरफ हैरानी से देखा तो मैंने कहा____"हां सच में। आप मेरी भाभी हैं, मुझसे बड़ी हैं। इस लिए आपको पूरा हक़ है मुझे डांटने और पीटने का।"

"फिर तो ठीक है।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"अब जब मेरी दोनों देवरानियां आ जाएंगी तो उनके सामने ही तुम्हें डांटा करूंगी और तुम्हारी पिटाई भी किया करूंगी। बहुत मज़ा आएगा तब।"

"अरे! ये क्या कह रही हैं आप?" मैं उनकी बात से बुरी तरह चौंका____"मतलब आप उनके सामने मेरी इज्ज़त का कचरा करेंगी? ये तो ग़लत बात है भाभी। अपने भोले भाले और मासूम से देवर के साथ इतना बड़ा अत्याचार करेंगी आप?"

"तुम भोले भाले और मासूम?" भाभी जो आधी सीढियां उतर चुकी थीं मेरी बात सुनते ही एकदम पलट कर बोलीं____"कुछ तो शर्म करो। ये तो वैसी ही बात हो गई कि नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने चली।"

मैं भाभी की इस बात से अनायास ही मुस्कुरा उठा। इस वक्त भाभी से ऐसी बातें करने में जाने क्यों मुझे मज़ा आ रहा था। बहरहाल हम नीचे आ चुके थे इस लिए मैंने फिर कुछ नहीं कहा। आंगन से होते हुए हम दोनों जैसे ही दूसरी तरफ के बरामदे में पहुंचे तो मां और चाची ने हमें देखा।

"मां, मैं भाभी को खेतों पर घुमाने ले जा रहा हूं।" मैंने मां से कहा_____"आपको इनसे कोई काम तो नहीं है ना?"

"अरे! मुझे इससे कोई काम नहीं है।" मां ने झट से कहा____"तू ले जा इसे। मैं तो कब से कह रही हूं इसे कि वैभव के साथ घूम आया कर लेकिन ये मेरी सुने तब न।"

"आज इन्हें सुनना पड़ा मां।" मैंने इस तरह कहा जैसे मैंने बहुत बड़ा काम किया हो____"आख़िर मेरी बात टालने का साहस कौन कर सकता है यहां?"

"ज़्यादा बोलेगा तो टांगें तोड़ दूंगी तेरी।" मां ने आंख दिखाते हुए मुझसे कहा____"और हां, मेरी बेटी को अच्छे से खेत घुमाना और सम्हाल कर ले जाना।" कहने के साथ ही मां भाभी से मुखातिब हुईं____"अगर ये तुझे परेशान करे तो आ कर मुझसे बताना। मैं अच्छे से इसकी ख़बर लूंगी।"

मां की बात सुन कर भाभी के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई। मेनका चाची, कुसुम, निर्मला काकी और उसकी बेटी कजरी भी मुस्कुरा पड़ी।

"आप तो ऐसे बोल रहीं हैं जैसे मैं अपनी भाभी का जन्मजात शत्रु हूं जो इन्हें किसी तरह की तकलीफ़ पहुंचा दूंगा।" मैंने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा____"ये तो हद हो गई। मेरे जैसे मासूम लड़के के साथ इतना बड़ा अन्याय?"

मेरी बात सुनते ही कुसुम और कजरी खिलखिला कर हंसने लगीं। मेनका चाची और निर्मला काकी भी मुस्कुरा उठीं जबकि मां ने मुझे घूर कर देखा। इससे पहले कि मां मुझे कुछ कहतीं मैंने फ़ौरन ही भाभी को चलने का इशारा किया और खुद तेज़ी से आगे बढ़ गया।

बैठक के सामने से जैसे ही मैं गुज़रा तो मेरी नज़र बैठक कक्ष में बैठे गौरी शंकर पर पड़ गई। इतने दिनों बाद उसे यहां देख मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि ये यहां किस लिए आया होगा? ख़ैर मैंने इस बात पर ज़्यादा सोचना मुनासिब नहीं समझा और बाहर निकल गया।

मैं जीप ले कर जैसे ही मुख्य द्वार के सामने आया तो भाभी सीढ़ियों से उतरते हुए जीप के पास आ गईं और फिर मेरे बगल वाली सीट पर चढ़ कर बैठ गईं। उनके चेहरे पर अजीब से भाव थे। वो कुछ असहज सी प्रतीत हो रहीं थी। सफेद साड़ी से उन्होंने हल्का सा अपना चेहरा ढंक रखा था। ज़ाहिर है वो बैठक के सामने से गुज़र कर आईं थी जहां पर पिता जी और बाकी लोग बैठे हुए थे। उनके सामने वो अपना चेहरा उजागर नहीं कर सकतीं थी। ख़ैर उनके बैठते ही मैंने जीप को आगे बढ़ा दिया। महिंद्रा कमांडर वाली जीप जल्दी ही हाथी दरवाज़े को पार कर गई। कच्ची सड़क पर मैं आराम से ही जीप को दौड़ा रहा था ताकि भाभी को ज़्यादा तकलीफ़ ना हो। भाभी चुपचाप गांव का नज़ारा देखने लगीं थी।

✮✮✮✮

"अरे! ये हम किस तरफ जा रहे हैं?" गांव से दूर आने के बाद जैसे ही मैंने जीप को पगडंडी वाले रास्ते की तरफ मोड़ा तो भाभी ने सहसा चौंक कर मुझसे पूछा।

"हम सही रास्ते पर ही जा रहे हैं भाभी।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर कहा____"वैसे आपकी जानकारी के लिए सिर्फ इतना ही बता सकता हूं कि मैं आपको आपके काम से ही कहीं ले जा रहा हूं।"

"क...क्या मतलब??" भाभी ने मेरी बात सुन कर हैरानी से मेरी तरफ देखा____"तुम मुझे मेरे ही काम से कहीं ले जा रहे हो? मेरा भला कहीं पर कौन सा काम है?"

"ज़्यादा मत सोचिए।" मैंने मन ही मन हंसते हुए कहा____"जल्दी ही आपको पता चल जाएगा।"

भाभी मेरी बात सुन कर अपलक मेरी तरफ देखने लगीं और साथ ही सोचने भी लगीं कि भला उनके ऐसे कौन से काम से मैं उन्हें ले जा रहा हूं। मैंने कनखियों से उनकी तरफ देखा तो पाया कि वो कुछ सोच रही हैं।

"ओह! अच्छा अब समझी मैं।" अचानक ही भाभी बड़े उत्साहित भाव से बोल पड़ीं____"मैं समझ गई कि तुम मुझे कहां लिए जा रहे हो लेकिन इसमें भला मेरा काम कहां हुआ? इसमें तो तुम्हारा अपना ही निजी काम है जिसे तुम्हारा स्वार्थ भी कहा जा सकता है।"

"अरे! ये आप क्या कह रही हैं?" मैंने हड़बड़ा कर उनकी तरफ देखा____"इसमें मेरा भला कौन सा निजी स्वार्थ है भाभी? आप ही ने तो कहा था कि मैं आपको उससे मिलवाऊँ।"

"अब बातें न बनाओ तुम।" भाभी ने सहसा घूरते हुए कहा____"इतनी भी बुद्धू नहीं हूं, सब समझती हूं मैं। मुझे तुमने माध्यम बनाया है जबकि सच ये है कि तुम खुद ही अपनी उस माशूका से मिलने के लिए मरे जा रहे थे।"

"नहीं भाभी ये सच नहीं है।" मैं एकदम से झेंपते हुए बोल पड़ा____"असल में आपको उससे मिलवाने का ख़याल अभी कुछ देर पहले ही मेरे ज़हन में आया था, वरना मैं तो आपको हमारे खेतों पर ही लिए जा रहा था।"

"अच्छा, क्या सच में?" भाभी ने अजीब भाव से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"पर तुम्हारे चेहरे के भाव तो यही बता रहे हैं कि तुम झूठ बोल रहे हो।"

"अब मैं आपको कैसे यकीन दिलाऊं?" मुझसे कुछ कहते ना बन पड़ा था। सच ही तो कह रहीं थी वो। मैं झूठ बोल कर अब बहाना ही तो बना रहा था। फिर भी खुद को सही ठहराने की कोशिश करते हुए कहा____"मेरा यकीन कीजिए भाभी। मैं सच में.....!"

"रहने दो।" भाभी ने बीच में ही मेरी बात काट दी____"अपने झूठ को छुपाने के लिए तुम चाहे जितने भी बहाने बना लो पर मैं यकीन करने वाली नहीं हूं। वैसे अगर तुम सच कबूल कर लोगे तो भला कौन सा गुनाह हो जाएगा तुमसे?"

भाभी की इस बात से मैं कुछ ना बोल सका। मेरे मन में ख़याल उभरा कि बात तो बिल्कुल ठीक ही है। मैं अगर सच कबूल कर लूंगा तो भला क्या हो जाएगा?

"अच्छा ठीक है।" फिर मैंने जैसे हथियार डालते हुए कहा____"मैं कबूल करता हूं कि मैं जान बूझ कर आपको उससे मिलवाने लिए जा रहा हूं। अब ठीक है ना?"

"आय हाय देखो तो।" भाभी ने मुझे छेड़ते हुए कहा____"देखो तो इन आशिक़ को। अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए कैसे बहाने बना रहे हैं।"

"ये ग़लत बात है भाभी।" मैंने एकदम से झेंपते हुए कहा____"आप इस तरह से मेरी टांग नहीं खींच सकती।"

"क्यों नहीं खींच सकती भला?" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा_____"भूलो मत, तुमने ही कहा था कि मैं तुम्हारी टांग भी खींच सकती हूं और तुम्हारी पिटाई भी कर सकती हूं। अब क्या तुम अपनी ही कही बात से मुकर जाओगे?"

"नहीं भाभी।" मैंने कहा____"मैं बिल्कुल भी मुकरने वाला नहीं हूं। ठीक है, आपको मेरी टांग ही खींचनी है तो जितना मर्ज़ी खींच लीजिए। बस आप इसी तरह हमेशा खुशी से मुस्कुराती रहें।"

मेरी बात सुनते ही भाभी के चेहरे के भाव बड़ी तेज़ी से बदले। वो मेरी तरफ अपलक देखने लगीं। उनकी आंखों में मेरे लिए अथाह स्नेह दिखाई देने लगा था।

"अच्छा अब ये तो बताइए कि वहां उससे मिलने पर उसके साथ क्या बात करने वाली हैं आप?" मैंने झट से माहौल को पहले जैसा बनाने की गरज से पूछा____"क्या उसके सामने भी आप मेरी टांग खींचेंगी?"

"अब ये तो परिस्थितियों पर निर्भर करता है वैभव।" भाभी ने इस बार सामान्य भाव से कहा____"मैं तो बस उस लड़की को देखना चाहती हूं जिसने तुम्हारे जैसे इंसान को बदल दिया है। मैं उसके सामने जा कर महसूस करना चाहती हूं कि उसमें ऐसी क्या ख़ास बात है?"

"क्या आपको लगता है कि एक मामूली से किसान की बेटी में कोई ख़ास बात होगी?" मैंने भाभी की तरफ देखते हुए कहा।

"बिल्कुल होगी।" भाभी ने झट से कहा____"जिसने ठाकुर वैभव सिंह जैसे महान चरित्र वाले लड़के की फितरत बदल दी उसमें ज़रूर ख़ास बात होगी। वो लड़की मामूली हो ही नहीं सकती जिसे वैभव जैसा व्यक्ति प्रेम करने लगा हो।"

मुझे समझ न आया कि भाभी की इन बातों पर क्या प्रतिक्रिया दूं अथवा क्या कहूं। जीप कच्ची पगडंडी में बढ़ी चली जा रही थी। मुरारी काका का घर नज़र आने लगा था। मैंने महसूस किया कि मेरा दिल एकाएक ही तेज़ी से धड़कने लगा था। ज़हन में सवाल उभरने लगे कि अनुराधा से मिलने के बाद भाभी क्या सोचेंगी अथवा वो उससे क्या बातें करेंगी? क्या अनुराधा मेरे साथ साथ भाभी को भी देख कर सहज महसूस करेगी?

कुछ ही देर में हम मुरारी काका के घर के सामने आ गए। मैंने जीप रोक कर उसका इंजिन बंद कर दिया। मैंने देखा घर का दरवाज़ा अंदर से बंद था। उधर भाभी अपनी तरफ के दरवाज़े से नीचे उतरीं तो उन्हें उतरता देख मैं भी धड़कते दिल से नीचे उतर आया।

"क्या यही उसका घर है?" जीप से उतरने के बाद भाभी ने बंद दरवाज़े की तरफ देखते हुए मुझसे पूछा तो मैंने हां में सिर हिला दिया। मेरे इशारा करने पर भाभी आगे बढ़ चलीं तो मैं भी उनके पीछे दरवाज़े की तरफ बढ़ चला। भाभी नज़र घुमा घुमा कर चारो तरफ देख रहीं थी।

अभी हम दरवाज़े के थोड़ा ही क़रीब पहुंचे थे कि तभी घर का दरवाज़ा एक झटके से खुला और खुले दरवाज़े के बीचो बीच जो शख्सियत नज़र आई उसे देख कर जैसे मेरी धड़कनें ही थम गईं। भाभी की नज़र भी उस पर पड़ चुकी थी। उन्होंने फ़ौरन ही पलट कर मेरी तरफ देखा और आंखों के इशारे से ही मुझसे पूछा कि क्या यही है वो? भाभी के इस तरह पूछने पर मैंने अपने धाड़ धाड़ बजते दिल के साथ पलकें झपका कर हां में जवाब दे दिया। उधर दरवाजे पर खड़ी अनुराधा की नज़र जैसे ही मुझ पर और मेरे साथ साथ भाभी पर पड़ी तो उसके चेहरे पर बड़े अजीब से भाव उभर आए।

✮✮✮✮

"ये क्या कह रहे हो तुम?" बैठक में गौरी शंकर की बातें सुनते ही दादा ठाकुर ने बड़े आश्चर्य के साथ कहा____"हमें तो यकीन ही नहीं हो रहा कि तुम जो कह रहे हो वो सच भी हो सकता है।"

"मैं तो इस बात से हैरान हूं ठाकुर साहब कि अपने बेटे के बारे में इतनी बड़ी बात आपको पता कैसे नहीं है?" गौरी शंकर ने कहा____"या फिर शायद आप अंजान बनने का दिखावा कर रहे हैं।"

"हमें इस बारे में थोड़ी बहुत जानकारी तो थी गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने गंभीर भाव से कहा____"लेकिन हमें ये नहीं पता था कि हमारा बेटा मुरारी की बेटी से प्रेम भी करता है। हमारे लिए तो ये बड़े ही आश्चर्य की बात है कि हमारा बेटा किसी लड़की से प्रेम भी कर सकता है। यकीन नहीं होता।"

"अगर आपको इस बात का यकीन नहीं हो रहा तो आप खुद वैभव से पूछ लीजिएगा।" गौरी शंकर ने दृढ़ता से कहा____"वैसे इतना तो आप भी समझते हैं कि आपका बेटा वैभव अब पहले जैसा नहीं रहा है। उसमें आए परिवर्तन को देख कर शुरू शुरू में हम सबके साथ साथ आप खुद भी तो हैरान हुए होंगे? उसके बाद से अब तक वो जो कुछ भी करता आया है वो भी हैरान कर देने वाला ही तो रहा है। अगर अब तक के उसके सारे कार्य सच हैं तो उसका किसी मुरारी की लड़की प्रेम करना भी सच ही है।"

गौरी शंकर जाने क्या क्या बोलता चला जा रहा था जबकि इधर दादा ठाकुर एकाएक ही जाने किस सोच में पड़ गए थे?

"क्या सोचने लगे ठाकुर साहब?" गौरी शंकर ने जैसे उन्हें वर्तमान में लाते हुए कहा____"अगर वाकई में आपका बेटा किसी लड़की से प्रेम करता है तो आप भी इस बात को अच्छे से समझ सकते हैं कि ऐसे में मेरी भतीजी के साथ उसका वैवाहिक जीवन कुछ ठीक नहीं होगा।"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" दादा ठाकुर ने एकदम से चौंकते हुए कहा____"आख़िर क्या कहना चाहते हो तुम?"

"यही कि एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकतीं।" गौरी शंकर ने कहा____"अगर वैभव मुरारी की लड़की के साथ ही विवाह कर के खुश रह सकता है तो उसका विवाह उस लड़की से ही कर दीजिए। आपने मेरी भतीजी रूपा के बारे में इतना सोचा यही हमारे लिए बड़ी बात है किंतु ऐसे विवाह का क्या लाभ जिसमें मेरी भतीजी को खुशियां ही न मिल सकें।"

"नहीं गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने स्पष्ट भाव से कहा____"हमने तुम्हें वचन दिया है कि तुम्हारी भतीजी इस हवेली में बहू बन कर आएगी तो समझो वो आएगी। हमारे बेटे के साथ उसका विवाह ज़रूर होगा। रही बात उस लड़की से उसके प्रेम की तो इसके बारे में भी हम जल्द ही कोई फ़ैसला करेंगे।"

"छोटा मुंह बड़ी बात किंतु आपको मेरी सलाह है ठाकुर साहब कि ऐसा कोई भी फ़ैसला नहीं कीजिएगा जिससे आपके बेटे को धक्का लग जाए और वो अपने सही रास्ते पर चलते हुए अचानक पलट जाए।" गौरी शंकर ने कहा_____"ऊपर वाले की कृपा से उसमें इतना बढ़िया सुधार आया है तो उसे अपने हिसाब से चलने दीजिए। अगर आपने दो प्रेम करने वालों को जुदा करने का सोचा तो मुझे यकीन है कि इसका अंजाम अच्छा नहीं होगा।"

"हम ये सब समझते हैं गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने गभीरता से कहा____"किंतु ऐसा भी तो नहीं हो सकता कि तुम्हें दिया हुआ अपना वचन हम तोड़ दें। ख़ैर, तुम फ़िक्र मत करो। इस बात का यकीन करो कि तुम्हारी भतीजी इस हवेली की बहू ज़रूर बनेगी और उसका वैवाहिक जीवन भी खुशी से गुज़रेगा।"

"पर ये भला कैसे संभव है ठाकुर साहब?" गौरी शंकर ने बेयकीनी से कहा____"माना कि आपके कहने पर अथवा मजबूर करने पर वैभव मेरी भतीजी से विवाह कर लेगा लेकिन प्रेम तो वो किसी और से ही करता है ना? ऐसे में वो मेरी भतीजी को वैसा प्रेम और वैसा हक़ कैसे देगा जो उसे अपनी पत्नी के रूप में मेरी भतीजी को देना चाहिए?"

"हमने कहा न गौरी शंकर कि तुम इस बारे में ज़्यादा मत सोचो।" दादा ठाकुर ने ज़ोर देते हुए कहा_____"हम पर यकीन रखो। हम ऐसा हर्गिज़ नहीं होने देंगे जैसे कि तुम्हें फ़िक्र है।"

गौरी शंकर इस बारे में अभी कहना तो और भी बहुत कुछ चाहता था लेकिन फिर ये सोच कर उसने अपना इरादा बदल लिया कि ज़्यादा बहसबाजी करने से कहीं दादा ठाकुर उससे नाराज़ ना हो जाएं। वैसे भी अब वो दादा ठाकुर से किसी भी तरह का मन मुटाव नहीं होने देना चाहता था।

उसके बाद गौरी शंकर ने अपने उस मुद्दे की बात शुरू कर दी जो उसकी भतीजियों के शादी वाले रिश्ते से संबंधित थी। उसने दादा ठाकुर को अपनी सारी परेशानी बता दी और फिर उनसे आग्रह किया कि इस मामले में दादा ठाकुर उसकी सहायता करें।

"फ़िक्र मत करो गौरी शंकर।" सारी बातें सुनने के बाद दादा ठाकुर ने कहा____"हमने पहले भी तुमसे कहा था कि तुम्हारी बेटियों को हम अपनी बेटियां ही मानते हैं इस लिए उनकी ज़िम्मेदारी भी अब हमारी ही है। तुम अपनी दोनों भतीजियों के विवाह के बारे में किसी प्रकार की चिंता मत करो। जब उचित समय आएगा तो हम खुद तुम्हारे साथ चल कर इस रिश्ते की रजामंदी करवाएंगे।"

"आपका बहुत बहुत धन्यवाद ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने अधीरता से अपने हाथ जोड़ते हुए कहा____"आपके ऐसा कहने से सच में अब मैं चिंता से मुक्त हो गया हूं।"

थोड़ी देर और इसी संबंध में गौरी शंकर की दादा ठाकुर से बातें हुईं उसके बाद वो दादा ठाकुर को प्रणाम कर के अपने घर चला गया। उसके जाने के बाद दादा ठाकुर एक गहरी सोच में डूब गए। उनके ज़हन में जाने कैसे कैसे विचार उभरने लगे थे।



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बहुत ही सुंदर लाजवाब और अद्भुत रमणिय अपडेट है भाई मजा आ गया
 

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अध्याय - 98
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"कौन आया है अनू?" अनुराधा स्तब्ध सी खड़ी हमें देखे ही जा रही थी कि तभी अंदर से सरोज काकी की आवाज़ से वो चौंकी और हड़बड़ा कर दरवाज़े से एक तरफ हट गई।

इधर मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि ऐसी परिस्थिति में मैं क्या कहूं अथवा क्या करूं? उधर भाभी ख़ामोशी से एकटक अनुराधा को ही देखे जा रहीं थी। दूसरी तरफ अनुराधा अजीब सी हालत में कभी मेरी तरफ देखती तो कभी भाभी की तरफ। उसके चेहरे पर अजीब सी कसमकस तारी हो गई थी और साथ ही लाज की सुर्खी भी दिखने लगी थी। बार बार वो लाज के चलते अपनी नज़रें नीचे कर लेती थी। तभी उसके पीछे सरोज काकी आती हुई दिखी। शायद अनुराधा से कोई जवाब न पा कर वो खुद ही ये देखने के लिए दरवाज़े के पास आ गई थी कि कौन आया है?

"अरे! वैभव बेटा तुम..??" काकी की आवाज़ से मेरी और भाभी की तंद्रा टूटी तो हम दोनों ही चौंक पड़े। उधर काकी की नज़र जब भाभी पर पड़ी तो उसके चेहरे पर एकदम से हैरत के भाव उभर आए। फिर एकदम से सम्हल कर तथा बड़े ही आदर सम्मान के साथ बोली____"अरे! बहू रानी आप यहां? मुझ गरीब की कुटिया के द्वार पर आप आईं ये तो मेरे लिए बड़े ही सौभाग्य की बात है। आइए आइए...अंदर आइए बहू रानी, आप इस तरह बाहर क्यों खड़ी हैं? अनू...ओ अनू....अरे कहां खोई है तू? द्वार पर बहू रानी आईं हैं और तूने इन्हें अंदर आने तक को नहीं कहा? हे भगवान! कितनी बेसहूर लड़की है ये...जाने कब अकल आएगी इसे।"

सरोज मारे हड़बड़ाहट के जाने क्या क्या बोले जा रही थी जबकि उसकी इस हड़बड़ाहट और बौखलाहट पर भाभी के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई। उधर अनुराधा ने अपनी मां की डांट को सुन कर लाज और घबराहट के चलते अपना सिर झुका लिया था। अपने दोनों हाथों को आपस में मसलने लगी थी वो। इधर मेरी भी हालत कुछ ठीक नहीं थी। मेरी धड़कनें धाड़ धाड़ कर के बज रहीं थी और ज़हन में बड़े अजीब अजीब से ख़याल उभर रहे थे।

"अरे! क्यों डांट रही हैं आप इस मासूम को?" सरोज की बातें सुन कर भाभी ने मुस्कुराते हुए किंतु बड़े प्रेम भाव से कहा____"इसमें इसकी कोई ग़लती नहीं है। हमें यहां देख कर शायद इसे कुछ समझ ही नहीं आया होगा कि क्या करे? मैं इसकी हालत को बखूबी समझती हूं।"

कहने के साथ ही भाभी ने दरवाजे के अंदर क़दम रखा तो उनके पीछे मैं भी धड़कते दिल से अंदर की तरफ चल पड़ा। सरोज को कदाचित स्वप्न में भी उम्मीद नहीं थी कि मेरे साथ हवेली की बहू उसके घर में यूं अचानक आ टपकेंगी। यही वजह थी कि उसे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि वो उनका किस तरह से स्वागत करे? मैंने देखा वो कुछ ज़्यादा ही हड़बड़ाई और बौखलाई हुई नज़र आ रही थी। बरामदे में रखी चारपाई को जल्दी ही उसने आंगन में बिछा दिया और फिर भागते हुए वो अंदर कमरे में गई और फ़ौरन ही एक गद्दा ले आई जिसे उसने बड़े सलीके से चारपाई पर बिछा दिया। अनुराधा बरामदे के अंदर एक कोने में जा कर चुपचाप खड़ी हो गई थी। उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे उसने कोई अपराध कर दिया हो जिसके बोझ तले दबी वो एक कोने में जा दुबकी थी।

"अरे! इस सबकी कोई ज़रूरत नहीं है मां जी।" भाभी ने सरोज को मां जी कहा तो वो एकदम से उछल पड़ी, इधर मैंने भी चौंक कर भाभी की तरफ देखा। जबकि भाभी ने सामान्य भाव से आगे कहा____"मैं कोई मेहमान नहीं हूं जिसके स्वागत के लिए आपको ये सब करना चाहिए। अरे! अनू की तरह मैं भी आपकी बेटी ही हूं तभी तो आपको मां जी कहा है। मेरे मां जी कहने पर आपको बुरा तो नहीं लगा न?"

"य...ये आप क्या कह रही हैं बहू रानी?" सरोज चकित भाव से बड़ी मुश्किल से बोल पाई____"मुझ जैसी एक मामूली औरत को आप मां कह रही हैं। हे भगवान! ये कैसी लीला है तेरी?"

"आप खुद को मामूली क्यों कह रही हैं मां जी?" भाभी ने आगे बढ़ कर सरोज के कंधे पर हाथ रखते हुए बड़े आदर भाव से कहा____"इस धरती पर कोई भी व्यक्ति मामूली नहीं होता। ईश्वर ने सबको समान रूप से बना कर इस धरती पर भेजा है।"

"पर हम तो मामूली ग़रीब लोग ही हैं न बहू रानी?" सरोज ने अपनी हालत को किसी तरह सम्हालते हुए कहा____"आपके सामने हमारी क्या औकात है भला?"

"जहां प्रेम होता है वहां औकात के कोई मायने नहीं होते मां जी।" भाभी ने कहा____"बल्कि मैं तो ये कहूंगी कि सबसे बड़ी औकात प्रेम की ही होती है। उसकी औकात के सामने बड़े से बड़े औकात वाले भी घुटने टेक देते हैं। ख़ैर मेरे देवर ने आप लोगों के बारे में मुझे सब कुछ बताया है और मैं इस बात से बेहद खुश हूं कि ऊपर वाले ने मेरे देवर को इस घर तक पहुंचाया। इस धरती में अगर ये घर न होता और इस घर में रहने वाले लोग न होते तो मेरे देवर का चरित्र कभी अच्छे चरित्र में न बदलता। ये सब प्रेम के चलते ही संभव हुआ है मां जी। जिस घर में प्रेम बसता हो मेरी नज़र में वही सबसे बड़ा औकात वाला है।"

सरोज को कुछ समझ न आया कि वो भाभी की बातों का क्या जवाब दे? उनकी बातों से उसे अब ये पता चल चुका था कि उन्हें मेरे और उसकी बेटी के संबंधों का पता चल चुका है। बरामदे में खड़ी अनुराधा भी भाभी की बातों को सुन रही थी। उसे देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसकी सांसें उसके हलक में आ कर अटकी हुई हैं। इधर मेरे अंदर भी अजीब सा झंझावात चालू था।

"चिंता मत कीजिए मां जी।" भाभी ने फिर से सरोज काकी के कंधे को हल्के से दबाते हुए कहा____"और मुझे यहां देख कर आपको घबराने की भी कोई ज़रूरत नहीं है। मैंने आपको मां जी इसी लिए कहा है क्योंकि अब आप मेरी मां ही हैं। वैभव ने जब मुझे अपने और अनुराधा के प्रेम संबंध के बारे में बताया तो पहले तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन फिर ये सोच कर अत्यंत खुशी हुई कि मेरे देवर का प्रेम के चलते हृदय परिवर्तन हो गया जोकि मेरी नज़र में असंभव था। मैं उस लड़की को अपनी आंखों से देखने के लिए व्याकुल हो उठी थी जिसने वैभव के चरित्र को बदल कर उसके अंदर प्रेम जगा दिया और इतना ही नहीं उसे अच्छा इंसान बनने पर भी मजबूर कर दिया। आज यहां मैं उसी लड़की को देखने आई हूं।"

कहने के साथ ही भाभी ने गर्दन घुमा कर बरामदे में चुपचाप खड़ी अनुराधा की तरफ देखा जिससे वो एकदम से सिमट गई और सिर झुका लिया। मेरी धड़कनें एक बार फिर से तेज़ हो गईं थी। उधर सरोज काकी को जैसे अभी भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि वो जो देख सुन रही थी वो सच है या नहीं?

"क्या मैं अपनी छोटी बहन से अकेले में मिल सकती हूं मां जी?" भाभी ने सरोज से मुखातिब हो कर पूछा।

"हां...हां क्यों नहीं बहू रानी।" सरोज ने हड़बड़ा कर जल्दी से कहा।

"मैंने आपको मां जी कहा है।" भाभी ने कहा____"तो अब मैं आपकी बेटी हो गई हूं और बेटी को आप नहीं कहा जाता। अनुराधा क्योंकि उमर में मुझसे छोटी है इस लिए अब से वो आपकी छोटी बेटी है और मैं आपकी बड़ी बेटी। ठीक है ना?"

भाभी ने इतने प्यार और स्नेह से कहा कि सरोज काकी की आंखों से आंसू छलक पड़े। कुछ कहने की उसने कोशिश तो की लेकिन अल्फाज़ उसके होठों से बाहर न निकल सके। भाभी ने जब ये देखा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए बड़े स्नेह के साथ अपने हाथों से उसके आंसू पोंछे।

"क्या बड़ी बेटी के मिलने की खुशी में आपकी आंखों से ये आंसू निकले हैं?" फिर उन्होंने सवालिया निगाहों से देखते हुए सरोज से पूछा तो सरोज ने अपने आंचल से अपने आंसू पोंछते हुए जल्दी से हां में सिर हिलाया। उसके होठ कांप रहे थे।

"फिर तो अच्छी बात है मां जी।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"अब मैं चाहती हूं कि आप अपनी इस बड़ी बेटी को एक बार अपने गले से भी लगा लें। बड़ी बेटी को भी तो अपनी मां से प्यार और स्नेह मिलना चाहिए, है ना?"

सरोज ने हां में सिर हिलाते हुए झट से भाभी को अपने गले से लगा लिया। एक बार फिर से उसकी आंखों से आंसू बह चले। इधर मैं ये सोच कर आश्चर्यचकित हो गया था कि भाभी ने कितनी आसानी से या फिर ये कहें की कितनी समझदारी से सरोज से अपना एक नया संबंध बना लिया था। मैं चकित तो था ही किंतु उनकी समझदारी और उनके प्रेम भाव को देख कर मंत्रमुग्ध भी हो गया था। मुझे एकदम से अपनी भाभी पर बड़ा ही गर्व महसूस हुआ। एकाएक उनकी किस्मत का ख़याल आते ही मेरे अंदर एक टीस सी उभरी जिसके चलते मुझे उनके लिए बड़ा ही दुख महसूस हुआ।

उधर भाभी कुछ देर तक सरोज के गले लगी रहीं फिर अलग हो कर उन्होंने एक बार फिर से सरोज के आंसू पोंछे और कहा____"अपनी इस बड़ी बेटी से वादा कीजिए कि अब से आप रोएंगी नहीं।"

"हां अब नहीं रोऊंगी मैं।" सरोज जबरन मुस्कुराते हुए बोली____"ऊपर वाले ने एक पल में जिसे इतना प्रेम करने वाली बेटी दे दी हो वो रोएगी क्यों? बल्कि वो तो ये सोच कर खुशी से फूली नहीं समाएगी कि उसे दुनिया की सबसे बड़ी खुशी मिल गई है।"

"मुझे भी तो एक मां मिल गई है।" भाभी ने उसी स्नेह के साथ कहा____"अच्छा अब आप वैभव के पास बैठ कर इससे बातें कीजिए। मैं भी अब अपनी छोटी बहन से अकेले में ढेर सारी बातें करने जा रही हूं।"

सरोज ने सिर हिला कर सहमति दी, जिसके बाद भाभी पलट कर अनुराधा की तरफ बढ़ चलीं। उधर अनुराधा ने जैसे ही भाभी को अपनी तरफ आते देखा तो वो और भी ज़्यादा लाज से सिमट गई और साथ ही असहज सी हो गई। ज़ाहिर है उसके अंदर अजीब सी घबराहट भर गई थी। उसकी ये हालत देख कर मुझे मन ही मन हंसी तो आई ही किंतु उस पर प्यार भी बहुत आया। आज काफी समय बाद उसे देख रहा था और सच कहूं तो अब मेरा बहुत जी कर रहा था कि उससे ढेर सारी बातें करूं। पहले की तरह उसे ठकुराईन कह कर छेड़ूं और उसे प्यार से अपने गले लगाऊं लेकिन शायद अभी इसके लिए मुझे इंतज़ार करना ही लिखा था।

भाभी अनुराधा के पास पहुंच चुकी थीं और उसे बड़े ध्यान से देखने लगीं थीं। उनके इस तरह देखने से अनुराधा और भी ज़्यादा छुईमुई नज़र आने लगी। ये देख भाभी बरबस ही मुस्कुरा उठीं। फिर उन्होंने अनुराधा से कुछ कहा जिससे अनुराधा ने सिर उठा कर उन्हें देखा और फिर वो सिर हिला कर अपने कमरे की तरफ बढ़ चली। उसके पीछे भाभी भी चल पड़ीं। इधर मेरी धड़कनें अब ये सोच कर तेज़ हो गईं कि अनुराधा के साथ अकेले में जाने भाभी क्या बातें करेंगी?

"हाय राम!" अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी काकी की आवाज़ से चौंका। उधर उसने मेरी तरफ देखते हुए लेकिन बौखलाए हुए लहजे से कहा____"अनू को अकल न होने की बात कह रही थी मैं और यहां तो मुझमें ही धेले भर की अकल नहीं है।"

"क्या हुआ काकी?" मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए पूछा____"ये क्या कह रही हो तुम?"

"सच ही तो कह रही हूं वैभव।" काकी ने एकाएक परेशान हो कर कहा____"मेरे घर में बहू रानी पहली बार आईं हैं और मैंने अभी तक उन्हें पानी तक नहीं पिलाया। हे भगवान! क्या सोच रही होंगी वो मेरे बारे में? हाय राम! कितनी नासमझ हूं मैं। उन्होंने मुझे अपनी मां तक बना लिया और मैंने उन्हें एक ग्लास पानी तक का नहीं पूछा।"

सरोज काकी की आंखें पलक झपकते ही छलक पड़ीं। ये देख मैं मुस्कुरा उठा। यकीनन इस वक्त वो इस बात के चलते खुद को दोषी मान रही थी और साथ ही उसे बहुत बुरा भी महसूस हो रहा था किंतु मैं समझ सकता था कि ऐसी परिस्थिति में उसे ऐसी औपचारिकता का ख़याल ही नहीं आया था।

"फ़िक्र मत करो काकी।" मैंने उसे आश्वस्त करने के इरादे से कहा____"इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है। वैसे भी मेरी भाभी इतनी अच्छी हैं कि वो इतनी मामूली सी बात के बारे में सोचती ही नहीं हैं।"

"वो सोचें या ना सोचें लेकिन मुझे तो सोचना चाहिए था ना वैभव?" सरोज काकी जैसे अपराध बोझ से दब सी गई थी इस लिए बोली____"मुझे तो अपना धर्म निभाना चाहिए था ना। ऊपर वाला मुझे माफ़ नहीं करेगा अब।"

"अरे! तुम बेकार में ही खुद को इतना कोस रही हो काकी।" मैंने कहा____"मैंने कहा न कि इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है।"

"ये सब तुम मेरा दिल रखने के लिए कह रहे हो वैभव।" काकी ने कहा____"जबकि मेरी अंतरात्मा तो चीख चीख कर मुझसे कह रही है कि मैंने ठीक नहीं किया है। उन्होंने मुझे मां कहा है और मैंने भी उन्हें अपनी बड़ी बेटी मान लिया है। हे भगवान! मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि इतने बड़े खानदान की बहू ने मुझ जैसी मामूली सी औरत को मां कहा है। ये सब मेरी बेटी के भाग्य से ही हुआ है। ये सब उसी के पूर्व जन्मों के अच्छे कर्मों के फल से हुआ है। मैं तो पापिन हूं। मैंने तो....मैंने तो तुम्हारे साथ...।"

कहने के साथ ही सरोज काकी झट से अपने मुख में हथेली रख कर फूट फूट कर रोने लगी। उसकी आख़िरी बात सुन कर मुझे एकदम से झटका लगा। ज़हन में वो यादें उभर आईं जो मैंने उसके साथ ग़लत कर्म कर के बना ली थीं। एकाएक ही इस बात के चलते मुझे बेहद आत्मग्लानि सी होने लगी। मैं उस वक्त को कोसने लगा जब मैंने सरोज के साथ उस तरह का ग़लत संबंध बनाया था। हालाकि इसमें सिर्फ मेरा ही बस कसूर नहीं था बल्कि सरोज का भी बराबर का दोष था किंतु आज के वक्त में उसकी वजह से हम दोनों ही उस ग़लत कर्म की वजह से खुद को कोस रहे थे और आत्मग्लानि में डूबे जा रहे थे। सरोज की बेटी से मैंने ब्याह की बात पक्की कर दी थी, उस नाते अब वो मेरी होने वाली सास थी जोकि यकीनन मां के समान ही होती है। ये ऐसी बात थी जो अब मेरे ज़मीर को भाले के जैसे चुभने लगी थी।

सरोज काकी फूट फूट कर रोए जा रही थी और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कैसे उसे शांत कराऊं? सच कहूं तो उसके समीप जाने की हिम्मत ही न हुई मुझमें। एकदम से मुझे ये वक्त बड़ा ही अजीयत से भरा लगने लगा था जिसके पलक झपकते ही गुज़र जाने की मैं अब बस दुआ ही कर सकता था। ख़ैर कुछ ही देर में सरोज का रोना धीरे धीरे बंद हो गया जिससे मैंने राहत की सांस ली।

"हमारे बीच अतीत में जो कुछ हुआ है।" फिर उसने बिना मेरी तरफ देखे बेहद ही गंभीर भाव से कहा____"मैं चाहती हूं कि हम दोनों ही उसे एक बुरा सपना या बुरा हादसा समझ कर भूल जाएं।"

"तुम्हें ऐसा कहने की ज़रूरत नहीं है काकी।" मैंने भी संजीदा हो कर कहा____"मैं उस मनहूस घड़ी को खुद भी अपने ज़हन से निकाल देना चाहता हूं। वैसे सच कहूं तो मैं निकाल भी चुका हूं। मैं ऊपर वाले का शुक्र गुज़ार हूं कि उसने मुझे अनुराधा से मिलाया और मेरे दिल में उसके प्रति प्रेम पैदा किया जिसके चलते मैं ग़लत कर्मों को त्याग कर अब एक अच्छा इंसान बनने की राह पर चल पड़ा हूं। अब तो बस एक ही ख़्वाईश है कि अनुराधा हमेशा के लिए मेरी पत्नी बन कर मेरे जीवन में आ जाए और मैं उसके साथ एक खुशहाल जीवन गुज़ारने लगूं।"

"अपने साथ आज यहां बहू रानी को ला कर तुमने मुझे पूरी तरह से यकीन दिला दिया है कि तुमने मुझे जो वचन दिया है उसमें कोई फ़रेब नहीं है।" काकी ने कहा____"यकीन मानो उस दिन तुम्हारे वचन देने पर भी मुझे पूरी तरह तुम पर भरोसा नहीं हुआ था, लेकिन अब हो चुका है। अब मुझे पूरी तरह से इस बात का भरोसा हो गया है कि तुम मेरी बेटी के साथ किसी भी तरह का छल नहीं करना चाहते हो बल्कि सच में उसे अपनी पत्नी बनाना चाहते हो।"

"मैंने भाभी को अनुराधा के साथ अपने प्रेम संबंध के बारे सब कुछ बता दिया है।" मैंने सरोज की तरफ देखते हुए कहा____"और उनसे ये भी कह दिया है कि जिस लड़की की वजह से मेरे अंदर बदलाव आया है और जिससे मैं प्रेम करने लगा हूं उसी से ब्याह भी करूंगा। मेरी ये बात सुन कर भाभी ने हमारे रिश्ते को मंजूरी दे दी है। वो अनुराधा से मिलने के लिए व्याकुल थीं इस लिए मैं आज उन्हें यहां लाया हूं।"

"ये बहुत अच्छा किया तुमने बेटा।" काकी ने अधीरता से कहा____"मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे इस घर में इतने बड़े खानदान की बहू अपने क़दम रखने खुद आएगी। अनू के बापू के जाने के बाद आज मैं पहली बार इतना खुश हुई हूं। तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद वैभव कि तुम बहू रानी को मेरे घर में ला कर मेरे साथ साथ मेरे इस घर को भी धन्य कर दिया है।"

"ये सब तो ठीक है काकी।" मैंने सहसा गंभीर हो कर कहा____"लेकिन एक ऐसी बात भी है जिसके बारे में मैं तुम्हें बता देना ज़रूरी समझता हूं।"

"क...कैसी बात बेटा?" काकी ने असमंजस जैसे भाव से मेरी तरफ देखा।

"वो बात बहुत ही गंभीर है काकी।" मैंने धड़कते दिल से सरोज की तरफ देखते हुए कहा____"हो सकता है कि उस बात को सुन कर तुम परेशान हो जाओ लेकिन पहले मेरी बात ध्यान से सुन लो।"

सरोज काकी मेरी ये बात सुन कर अजीब भाव से मेरी तरफ देखती रह गई। चेहरे पर कई तरह के भाव नाचते नज़र आए उसके। मैंने जब उसके चेहरे पर बात को सुनने की उत्सुकता को देखा तो गहरी सांस ली।

"बात दरअसल ये है कि मेरे पिता जी ने गांव के साहूकार हरि शंकर की बेटी से मेरे ब्याह की बात पक्की कर दी है।" फिर मैंने बेहद ही संतुलित भाव से कहा____"असल में ऐसा इस लिए हुआ कि साहूकार की लड़की मुझसे बहुत पहले से ही प्रेम करती आ रही है और कुछ महीने पहले जो हमारे साथ हादसे हुए थे उसमें उसने अपने ही परिवार के खिलाफ़ जा कर मेरी जान बचाने का कार्य भी किया था। अब जबकि साहूकारों से हमारे रिश्ते फिर से सुधर गए हैं तो आपसी रिश्तों को मजबूत करने के लिए उस लड़की के साथ पिता जी ने मेरा रिश्ता भी तय कर दिया। पिता जी को भी ये पता चल चुका है कि साहूकार की वो लड़की मुझसे प्रेम करती है और उसने प्रेम के चलते ही मेरी जान बचाने का काम किया था। ये सब जान कर पिता जी ने गौरी शंकर से उसकी भतीजी का हाथ अपनी बहू के रूप में मांग लिया है।"

"य....ये क्या कह रहे हो तुम?" सरोज काकी एकदम से चकित हो कर बोली____"हे भगवान! अब क्या होगा? तुम्हारे पिता जी ने खुद साहूकार की लड़की से तुम्हारा ब्याह तय कर दिया है तो अब तुम्हें उससे ब्याह करना ही पड़ेगा। ऐसे में फिर मेरी बेटी का क्या होगा....तुम्हारे वचन का क्या होगा?"

"मेरी पूरी बात तो सुनो काकी।" मैंने एकदम से ही चिंतित हो उठी काकी से कहा____"मैं जानता हूं कि इस बात के चलते मेरे सामने बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो गई है लेकिन यकीन करो, इसके बावजूद मैं अपना वचन निभाऊंगा और अनुराधा से ब्याह करूंगा।"

"म...मगर कैसे?" सरोज सहसा हताश भाव से बोल पड़ी____"भला अब ये कैसे संभव हो सकेगा वैभव? मैं तो पहले ही ये सोच कर चिंतित थी कि मुझ मामूली और ग़रीब औरत की बेटी से दादा ठाकुर अपने बेटे का ब्याह कभी करने का सोचेंगे तक नहीं। वो तो मैंने तुम पर और तुम्हारे वचन देने के चलते भरोसा कर लिया था। अब जबकि तुम्हारे पिता जी ने खुद ही साहूकार की लड़की से तुम्हारा ब्याह तय कर दिया है तो भला वो तुम्हारा ब्याह किसी और लड़की से कैसे करने का सोचेंगे? नहीं नहीं, अब ये मुमकिन नहीं है। मैं अच्छी तरह जानती हूं कि दादा ठाकुर के फ़ैसले के खिलाफ़ जा कर तुम मेरी बेटी से ब्याह नहीं कर सकते। हे ईश्वर! अब क्या होगा मेरी बेटी का?"

कहने के साथ ही सरोज काकी एकदम से हताश और दुखी हो गई। उसकी आंखों से आंसू बह चले। मैं समझ सकता था कि अपनी बेटी के उज्ज्वल भविष्य का सोच कर और साथ ही इतने बड़े खानदान की रानी ना बन पाने की बात सोच कर उसे अब बेहद दुख होने लगा था।

"अरे! तुम बेकार में ही हलकान हो रही हो काकी।" मैंने मजबूत लहजे से उसे समझाते हुए कहा____"तुम्हें ये सब सोच कर दुखी होने की कोई ज़रूरत नहीं है। हां मैं समझता हूं कि परिस्थितियां बेहद ही गंभीर हैं लेकिन तुम्हें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि मैं अनुराधा से प्रेम करता हूं। मैं ये कैसे सहन कर लूंगा कि जिससे मैं प्रेम करता हूं वो मेरे जीवन से हमेशा के लिए दूर हो जाए? नहीं काकी, ऐसा कभी नहीं होगा।"

"मुझे झूठी तसल्ली मत दो वैभव।" काकी ने दुखी भाव से कहा____"दूर दूर तक के लोग जानते हैं कि दादा ठाकुर ने एक बार जो फ़ैसला कर लिया फिर कोई उनके फ़ैसले के खिलाफ़ नहीं जा सकता। मैं ही मूर्ख थी जो उस दिन तुम्हारी बातों में आ गई और तुम्हारे साथ अपनी बेटी के रिश्ते की मंजूरी दे दी। मुझे ये नहीं भूलना चाहिए था कि मैं और मेरी बेटी क्या हैं और दादा ठाकुर के सामने हमारी औकात क्या है।"

"अपने आपको सम्हालो काकी और अपने दिमाग़ को थोड़ा शांत करो।" मैंने फिर से उसे समझाने के इरादे से कहा____"मैं भी ये मानता हूं कि दादा ठाकुर के फ़ैसले के खिलाफ़ कोई कुछ नहीं कर सकता लेकिन तुम ये क्यों भूल रही हो कि इस वक्त तुम्हारे घर में कौन मौजूद है?"

"क...क्या मतलब??" काकी एकदम से मूर्खों की तरह मुझे देखने लगी।

"इस वक्त तुम्हारे घर में दादा ठाकुर की बहू मौजूद है काकी।" मैंने ठोस लहजे में कहा____"और दादा ठाकुर की उस बहू को मेरा और अनुराधा का रिश्ता मंज़ूर है।"

"हां लेकिन बहू रानी भी तो दादा ठाकुर के फ़ैसले के खिलाफ़ नहीं जा सकतीं।" काकी ने अभी भी हताश भाव से कहा।

"ऐसा तुम सोचती हो काकी।" मैंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"जबकि तुम्हें अभी ये पता ही नहीं है कि हवेली में भाभी की अहमियत क्या है। हां काकी, हवेली में भाभी को हर कोई बड़ा स्नेह देते हैं और उनकी हर खुशी का ख़याल रखते हैं। जब दादा ठाकुर को ये पता चलेगा कि उनकी बहू को तुम्हारी बेटी के साथ मेरा रिश्ता मंज़ूर है और वो चाहती हैं कि मेरा ब्याह अनुराधा से हो तो यकीन मानो दादा ठाकुर को उनकी खुशी के आगे झुकना पड़ जाएगा।"

"क....क्या तुम सच कह रहे हो?" काकी के चेहरे पर आश्चर्य के साथ साथ पहली बार राहत और खुशी के भाव उभरते नज़र आए।

"क्या तुम्हें लगता है कि ऐसी गंभीर परिस्थिति में मैं तुमसे झूठ बोलूंगा?" मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा____"मैं तुमसे जो कुछ भी कह रहा हूं वो सोलह आने सच है काकी। भाभी को ये रिश्ता मंज़ूर है और वो इस बात से बेहद खुश भी हैं कि तुम्हारी बेटी ने उनके देवर को बदल कर एक अच्छा इंसान बनने पर मजबूर कर दिया है। उन्होंने मुझसे खुद कहा है कि वो इस रिश्ते के लिए मेरे साथ हैं और इतना ही नहीं वो अनुराधा से मेरा ब्याह करवाने के लिए खुद दादा ठाकुर से बात करेंगी।"

"अगर ऐसी बात है तो फिर ठीक है बेटा।" काकी ने राहत की गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन साहूकार की उस लड़की का क्या जिससे दादा ठाकुर ने तुम्हारा ब्याह तय कर दिया है? क्या वो उस लड़की से फिर तुम्हारा ब्याह नहीं करेंगे?"

"ऐसा नहीं है काकी।" मैंने ठंडी सांस खींचते हुए कहा____"दादा ठाकुर क्योंकि गौरी शंकर को वचन दे चुके हैं और वो खुद भी चाहते हैं कि जिस लड़की ने अपने प्रेम के चलते उनके बेटे की जान बचाई है वो उनकी बहू बने। मतलब कि उस लड़की से मेरा ब्याह होना पक्का है लेकिन उसके साथ साथ अनुराधा से भी मेरा ब्याह होगा ये भी पक्की बात है।"

"तुम्हारा मतलब है कि दो दो लड़कियों से ब्याह करोगे तुम?" सरोज काकी ने एकाएक आश्चर्य से देखा मेरी तरफ।

"शायद यही नियति में लिखा है काकी।" मैंने गंभीरता से कहा____"वैसे अगर गहराई से सोचा जाए तो ऐसा होना भी चाहिए। जैसे मैं अनुराधा से प्रेम करता हूं और चाहता हूं कि वो पत्नी बन कर हमेशा मेरे साथ रहे उसी तरह साहूकार की लड़की रूपा भी तो मुझसे प्रेम करती है। ज़ाहिर है उसके मन में भी यही हसरत होगी। तुम खुद सोचो काकी कि क्या ऐसी लड़की के प्रेम को मुझे ठुकरा देना चाहिए? क्या ऐसी लड़की को मुझे ठुकरा देना चाहिए जिसने अपने प्रेम के चलते अपना सब कुछ मुझे समर्पण कर दिया हो और इतना ही नहीं मेरी जान भी बचाई हो? अगर मैं ही न रहता इस दुनिया में तो क्या कोई कुछ कर लेता?"

"सही कह रहे हो तुम?" सरोज काकी ने गहरी सांस ली____"ऐसी लड़की को ठुकरा देना बिल्कुल भी अच्छा नहीं होगा। तुम्हारी बातें सुन कर तो मुझे भी अब ये लग रहा है कि तुम्हारे जीवन पर सबसे ज़्यादा हक़ उस लड़की का ही है। मैं तो अभी भी ये सोच के हैरत में पड़ जाती हूं कि मेरी बेटी ने तो ऐसा कुछ किया ही नहीं है जिसके चलते तुम उसे प्रेम करने लगे और उसे अपना बनाना चाहते हो।"

"ऐसा तुम्हें लगता है काकी।" मैं अनायास ही मुस्कुरा उठा____"जबकि सच तो ये है कि अनुराधा ने वो किया है जो अब से पहले कोई नहीं कर सका था। उसने मेरे जैसे इंसान का चरित्र बदल दिया है काकी। उसने मेरे जैसे इंसान को एक अच्छा इंसान बनने के लिए मजबूर कर दिया है। हालाकि मैं इसे मजबूर कर देना भी नहीं समझता क्योंकि मैं तो खुशी खुशी पूरी ईमानदारी से अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने लगा हूं।"

मेरी बात सुन कर काकी अभी कुछ बोलने ही वाली थी कि तभी हमने देखा कि भाभी अनुराधा के कमरे से निकल कर हमारी तरफ ही आ रहीं थी। उनके पीछे अनुराधा भी थी जो सिर झुकाए और हल्की मुस्कान होठों पर सजाए चली आ रही थी। भाभी के चेहरे पर भी अलग ही तरह के खुशी के भाव नज़र आ रहे थे।

भाभी हमारे क़रीब आ कर काकी से जाने की इजाज़त मांगने लगीं तो काकी हड़बड़ाते हुए बोली कि ऐसे कैसे? अभी तो उसने उनका कोई स्वागत ही नहीं किया है। काकी के बहुत ज़ोर देने पर भाभी ने मुस्कुराते हुए सिर्फ इतना ही कहा कि वो किसी दिन फिर आएंगी और वैसे भी अब तो वो इस घर की बड़ी बेटी हैं इस लिए स्वागत करने की कोई ज़रूरत नहीं है। काकी जब इतने पर भी न मानी तो उन्होंने एक ग्लास पानी पिया और फिर मुझे इशारा कर दरवाज़े की तरफ बढ़ चलीं।

मैंने भाभी और काकी की नज़र बचा कर अनुराधा की तरफ देखा। जैसे ही हम दोनों की नज़रें मिलीं तो वो एकदम से शर्मा गई और अपनी नज़रें झुका ली। मैं उसकी यूं छुईमुई हो गई दशा को देख कर मुस्कुरा उठा और फिर ये सोच कर भाभी के पीछे चल पड़ा कि किसी दिन अकेले में तसल्ली से अपनी अनुराधा से मुलाक़ात करूंगा। कुछ ही देर में मैं भाभी को जीप में बैठाए वापस अपने गांव की तरफ चल पड़ा था।




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बहुत ही सुंदर लाजवाब और मन को मोह लेने वाला मनमोहक अपडेट हैं भाई मजा आ गया
अगले रोमांचकारी धमाकेदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा
 
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वैभव के साथ एक अजीब बात हो रहा है । लोग-बाग आमतौर पर दूसरी शादी अपनी पहली शादी के बहुत दिनों बाद करते है । वैवाहिक होने के बाद अगर वो किसी लड़की के साथ एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर मे पड़ जाते हैं तो या तो उस लड़की को अपना कैप्ट बना लेते है , या लिव इन रिलेशनशिप मे रहने लगते है , या फिर अपनी पत्नी और समाज से छुपाकर दूसरी शादी कर लेते है । यह सब मै सनातन धर्म मानने वालों के लिए कह रहा हूं।
और अगर पहली पत्नी की सहमति हो तो दूसरी शादी पारम्परिक रूप से हो जाती है ।
आज तक ऐसा कभी नही हुआ कि एक लड़का एक ही वक्त मे एक साथ दो लड़कियों से शादी किया हो । इसलिए इस मामले मे वैभव एक इतिहास तो अवश्य ही रचने वाला है , बशर्ते अनु और रूपा के साथ वास्तव मे उसकी शादी होने वाली हो।
बाकी देखते हैं भविष्य के गर्भ मे क्या छुपा हुआ है !
बहुत ही खूबसूरत अपडेट शुभम भाई।
आउटस्टैंडिंग एंड अमेजिंग अपडेट।
 

Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
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आज तक ऐसा कभी नही हुआ कि एक लड़का एक ही वक्त मे एक साथ दो लड़कियों से शादी किया हो । इसलिए इस मामले मे वैभव एक इतिहास तो अवश्य ही रचने वाला है , बशर्ते अनु और रूपा के साथ वास्तव मे उसकी शादी होने वाली हो।
बाकी देखते हैं भविष्य के गर्भ मे क्या छुपा हुआ है !
बहुत ही खूबसूरत अपडेट शुभम भाई।
आउटस्टैंडिंग एंड अमेजिंग अपडेट।
शुभम भाई तो कजरी को हीरोइन बता रहे थे कुछ दिन पहले। क्या पता शादी में ही सफेदपोश का वार हो और :dontknow:
 

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
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nice update .chetan aur sunil ne sab bata diya ki kaise wo safedposh ke jaal me faskar vaibhav ki jasusi ki .dada thakur ka kehna bhi sahi hai ki kahi ye dono safedposh ki juban to nahi bol rahe .
shera aur uske aadmiyo ko in dono ke pichhe rehne ka kehke sahi kiya .

gauri shankar aur fulwati ki baato me rupa ke liye chinta jhakak rahi hai ,unka sochna bhi sahi hai ki vaibhav prem karta hai dusri ladki se to rupa kaise khush reh payegi haweli me .
sahukaro se har koi rishta tod raha hai shayad ab dada thakur kuch kar paaye aur unki 2 betiyo ki shadi ho jaaye .

सबसे पहले तो शुभम भाई आपका धन्यवाद, इस कहानी को फिर से शुरू करने के लिए।

दोनो ही अपडेट उम्दा थे। एक ओर जहां अनुराधा को एक उम्मीद मिली है, वहीं दूसरी ओर वैभव के दिल में कोई और दस्तक देने भी लगा है।

वैभव के दोनो दोस्तों पर दादा ठाकुर का शक पूरी तरह जायज है, क्योंकि सफेदपोश जो भी हो, इतना ताकतवर नहीं था कि बिना किसी घर वाले को कब्जे में लिए दोनो को डरा धमका कर वैभव से धोखा करवा सकता था।

Excellent update bro

Outstanding updates

lovely update ..gauri shankar ki samasya ka hal hai dada thakur ke paas ..
unke kehne se shayad ladke wale maan jaaye sahukaro ki ladkiyo se shadi karne ..

vibhor aur ajit ko bahar bhejkar achcha kiya ab unpar koi khatra nahi ..

par kya gaonwalo ka karja puri tarah maaf karna sahi faisla hai vaibhav ka 🤔🤔.apni khoyi huyi ijjat bachane ke liye faisala kiya hai vaibhav ne par agar gaon wale kuch aur hi sochne lage to .

धागा खोल दिए भाई, एक दिन में 3–3 अपडेट
पढ़ कर बहुत सुकून मिला और तीनों ही शानदार थी।

अच्छा लगा देख कर की वैभव रागिनी को वापस नॉर्मल करने में कामयाब हो रहा, जैसे जैसे स्टोरी आगे बढ़ेगी रागिनी का रोल और ज्यादा महत्वपूर्ण होगा , वैभव के जीवन में already उसने काफी महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर लिया है।

अब रागिनी ने कह तो दिया है की वह वैभव की शादी कराएगी अनुराधा से लेकिन कैसे ये देखने लायक रहेगा

अनुराधा ये सोच कर खुश है की finally वैभव उसे मिल ही जायेगा, लेकिन जब उसे पता चलेगा की आधा ही तो दुखी तो भी होगी।

हां रूपा के लिए ये win win situation होगी, afterall एक टाइम जो काम impossible लग रहा था अब finally possible नजर आ रहा है पर रूपा ने इसके लिए काफी कुछ खोया भी है ।

अत्यंत सुंदर अपडेट भाई, अगले अपडेट की प्रतीक्षा में
स्वस्थ रहे मस्त रहे ❣️

इस अपडेट से तो दिल बाग बाग हो गया भाई
:10: :love3::yourock:

अब जरा रूप से भी मिलवा दो भाभी को

Nice update

Shandar update

lovely update ...vaibhav ne faisla kar liya hai ki wo dono ladkiyo se shadi karega aur ye baat saroj ko bhi bata di ..
ab thakur sahab ka faisla kya hoga ye dekhna hai .

बहुत ही सुंदर लाजवाब और अद्भुत मनमोहक अपडेट हैं भाई मजा आ गया

Behtreen update ...Rupa aur Anuradha ..dono hi dilo jaan se vaibhav se pyaar karti hai.. lekin Rupa ka pyaar Kai guna jyada hai Anuradha se mujhe aisa lagta hai

ये तीनो भी जबरदस्त अपडेट थे, और सबसे बेहतरीन पार्ट रागिनी का अनुराधा के घर जाना लिखा आपने। बेहद शानदार हिस्सा था वो इस पूरे अपडेट्स का।

ये देख भी अच्छा लगा कि अब साहूकार के परिवार में भी अपने कृत्यों के नतीजे समझ आने लगे हैं और पुरानी घटनाओं पर अब ध्यान देना लगभग बंद हो रहा है।

अब बस देखना ये है कि देवर भाभी दादा ठाकुर को अनुराधा के लिए कैसे मनाएंगे।

Wah TheBlackBlood Shubham Bhai,

Sabhi charo updates ek se badhkar ek he...............

Ye kajari namak garam cheej, badi hi chalak lagi mujhe............jaisa wo dikhti he vaisi he nahi.................sath hi sath iske pita ka bhi character abhi tak nahi samajh pa raha hoon.............kehne ko to munshi he..........lekin kuch na kuch kaand ye baap beti jarur karenge

Rupa aur Anu, dono ke beech me ab vaibhav fans gaya he..............rahi sahi kasar rupa ke kaka ne dada thakur ke kaan bharkar puri kar di he...........ab use kewal bhabhi ka sahara he....................Bhabhi hi is samasaya ka ant kar sakti.........

Keep posting Bhai

वैभव को चेतन और सुनील बेगुनाह लगते हैं लेकिन ठाकुर साहब को लगता है कि ये झूठ बोल रहे हैं हमे भी लगता है कि ये झूठ बोल रहे हैं क्योंकि सफेद नकाबपोश ने जिनको मोहरा बनाया था उनको कुछ लालच या उनके परिवार के किसी सदस्य को अपने कब्जे में लेकर अपना काम करवाया है लेकिन इनके साथ ऐसा कुछ भी नही हुआ है

सुंदर अती सुंदर और अद्भुत रमणिय अपडेट है भाई मजा आ गया

Thanks for restarting this story bhai sa :love:
khair ye jo Anu ki naye pyar ki khushiya inko najar na lage :kiss:

:claps: :applause: Bohot khub

बहुत ही सुंदर लाजवाब और अद्भुत रमणिय अपडेट है भाई मजा आ गया

Keep posting Bhai


बहुत ही सुंदर लाजवाब और मन को मोह लेने वाला मनमोहक अपडेट हैं भाई मजा आ गया
अगले रोमांचकारी धमाकेदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा

Mast update

Thanks for restarting this lovely story :vhappy1:

वैभव के साथ एक अजीब बात हो रहा है । लोग-बाग आमतौर पर दूसरी शादी अपनी पहली शादी के बहुत दिनों बाद करते है । वैवाहिक होने के बाद अगर वो किसी लड़की के साथ एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर मे पड़ जाते हैं तो या तो उस लड़की को अपना कैप्ट बना लेते है , या लिव इन रिलेशनशिप मे रहने लगते है , या फिर अपनी पत्नी और समाज से छुपाकर दूसरी शादी कर लेते है । यह सब मै सनातन धर्म मानने वालों के लिए कह रहा हूं।
और अगर पहली पत्नी की सहमति हो तो दूसरी शादी पारम्परिक रूप से हो जाती है ।
आज तक ऐसा कभी नही हुआ कि एक लड़का एक ही वक्त मे एक साथ दो लड़कियों से शादी किया हो । इसलिए इस मामले मे वैभव एक इतिहास तो अवश्य ही रचने वाला है , बशर्ते अनु और रूपा के साथ वास्तव मे उसकी शादी होने वाली हो।
बाकी देखते हैं भविष्य के गर्भ मे क्या छुपा हुआ है !
बहुत ही खूबसूरत अपडेट शुभम भाई।
आउटस्टैंडिंग एंड अमेजिंग अपडेट।

शुभम भाई तो कजरी को हीरोइन बता रहे थे कुछ दिन पहले। क्या पता शादी में ही सफेदपोश का वार हो और :dontknow:
Thanks all
 
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