Update - 6
दोस्तों सच्चाई तो यही थी कि मुझे खुद भी नहीं पता था कि आज मैं क्यों जा रहा था मोनिका जी के घर की तरफ़, बस दिल में एक ही तमन्ना थी कि बस एक बार देखने के लिए मिल जाए मुझे, बस एक बार आंखों की प्यास बुझ जाए आज, बस यही सब सोंचते हुए मैं पहुंच गया उनके मोहल्ले में और फिर पहुंच गया उनकी गली में और अंत में पहुंच गया उनके घर के सामने, मैं अपनी बाइक में था, हेलमेट लगा रखा था मैने और जैसे ही उनके घर के सामने पहुंचा तो देखा कि उनके घर का दरवाजा बंद है, ऊपर बालकनी में नज़र गई तो वहां भी बस कुछ कपड़े पड़े थे शायद सुखाने के उद्देश्य से मोनिका जी ने डाले होंगे दोपहर में, खैर मेरे सारे अरमान टूट गए क्योंकि जिस तमन्ना से मैं आया था वो तो पूरी ही नहीं हो पाई, और मैं मायूस सा चेहरा लिए सीधे उनके घर के सामने से निकल गया, मैं कुछ दूर पहुंचा ही था कि अचानक मेरा फोन बजने लगा, मैने बाइक अपनी साइड में लगाई और मैने मोबाइल निकाल के देखा तो विक्रम का फोन था, विक्रम सिंह परिहार ।
विक्रम मेरा बचपन का दोस्त है, हम दोनो कक्षा 12 तक साथ में ही पढ़े थे, वो मूल रूप से मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले का रहने वाला है लेकिन वो बचपन से ही अपने नाना नानी के यहां पर रह के पला बढ़ा था यानी मेरे ही शहर में, खैर मैंने उसकी कॉल रिसीव की तो उसने मुझे ये बताने के लिए फोन किया था कि भाई मेरा मध्य प्रदेश पुलिस में दरोगा के पद पर सेलेक्शन हो गया है, उसके सेलेक्शन की खबर सुन के मैने उसको बधाई दी फिर मैंने पूंछा पोस्टिंग कहां मिली तो उसने बताया कि भाई बस आ रहा हूं तेरे शहर में, मैंने पूंछा सतना में पोस्टिंग मिली है तो उसने कहा हां बे लैंडे के जब तू सतना में है और तेरे शहर आ रहा हूं तो सतना ही मिली होगी ना, मैने पूछा किस थाने में तो उसने कहा बस जो तेरे एरिया का थाना है उसी में, उसकी बात सुन के मैं बड़ा खुश हुआ, खुश इसलिए हुआ कि चलो कोई तो अपना रहेगा इस शहर में, उस वक्त मुझे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि अप्रत्यक्ष रूप से मुझे मेरी मोनिका के करीब जाने में मदद मिलेगी, खैर उससे बात खत्म करने के बाद मैने वापस बाइक स्टार्ट की और चल दिया अपने फ्लैट की तरफ, रात के 8 बज चुके थे जब मैं अपने फ्लैट में पहुंचा और पहुंचने के बाद फिर वही रोज की बोरिंग सी दिनचर्या, बर्तन धुलना खाना बनाना, खाना खाना, ये सब से निपटने के बाद रात के 10 बजे जब मैं बिस्तर में लेटा तो फिरसे एक बार मेरे खयालों में मोनिका जी ने दस्तक दी, और उनका खयाल आते ही मैंने मोबाइल उठाया, व्हाट्सएप खोला और उनका चैट बॉक्स ओपन किया तो देखा मोनिका जी ऑनलाइन हैं, मेरा दिल जोर जोर से चिल्ला चिल्ला कर मुझसे कह रहा था कि मैसेज भेज दे Hi लिख के भेज दे पर मेरी हिम्मत नहीं हुई उनको मैसेज करने की क्योंकि मेरे पास कोई वजह नहीं थी मैसेज करने की और रात के 10 बजे किसी महिला को बेवजह मैसेज करना पूरी तरह से छिछोरेपन का परिचय देना था इसलिए यही सब सोच के मैने मैसेज नहीं बस कुछ देर ऐसे ही उनको ऑनलाइन देखता रहा और देखते देखते मैं कब नींद के आगोश में समा गया मुझे पता ही नहीं चला।
सुबह फिरसे मेरी नीद अलार्म बजने के साथ खुली और फिर से एक बार मेरी रोज की दिनचर्या ने खुद को दोहराना शुरू कर दिया, आज फिर से जिम गया, फिरसे बैंक गया फिरसे शाम हुई और शाम को बैंक से निकलने के बाद मैने फिरसे आज अपनी बाइक मोनिका जी के घर की तरफ मोड़ दी, आज फिरसे वही तमन्ना थी कि बस एक बार देखने के लिए मिल जाए, फिरसे उनके घर के सामने पहुंचा आज भी दरवाजा बंद था बालकनी भी खाली थी आज फिर से नहीं दिखीं वो मुझे और मैं आज भी मायूस होकर वापस आ गया अपने फ्लैट में, अब ये मेरा रोज का रूटीन सा बन गया था, शाम को बैंक से निकल के मोनिका जी के घर की तरफ़ जाना और उसके बाद अपने फ्लैट में जाना, इसी तरह दिन गुजर रहे थे कि लगभग 10 या 12 दिन बाद जब आज शाम को मैं बैंक से निकलने के बाद मोनिका जी के घर के सामने पहुंचा तो शायद आज मेरी किस्मत अच्छी थी, अच्छी नहीं शायद बहुत ज्यादा अच्छी थी क्योंकि जैसे ही मैं मोनिका जी के घर की गली में मुड़ा तो मुझे दूर से दिखाई दिया कि आज घर का दरवाजा भी खुला हुआ है और दरवाजे पर मोनिका जी भी खड़ी हुई हैं, और घर के बाहर खड़ी हुई थी ओला की एक कैब जिसमे पीछे की सीट पर मोनिका जी की मम्मी बैठी हुई थी और कैब बस निकलने के लिए तैयार थी, मैने उनके घर के चार कदम पहले अपनी बाइक रोकी और अपना मोबाइल निकाल के ऐसे ही फोन में कुछ देखने का नाटक करने लगा जबकी हेलमेट के अंदर से मेरी नजर बस मोनिका जी को ही देख रही थी, उन्होंने अपनी मम्मी को बाय बोला और कैब चल पड़ी, मुझे नहीं पता वो कैब कहां जा रही थी, मैं तो बस मोनिका जी को ही देखे जा रहा था और वो उस कैब को देखती रहीं दरवाजे पर खड़े जब तक वो दिखाई देती रही, कुछ इस तरह खड़ी थी आज मोनिका जी दरवाजे पर......

कसम से कितने फुरसत से बनाया था ऊपर वाले ने मोनिका जी को, उनकी खूबसूरती के सागर में मैं गोते लगा ही रहा था अचानक पता नहीं क्या हुआ मुझे और मैंने तुरंत अपनी बाइक स्टार्ट की और मैं चल दिया उस कैब के पीछे पीछे, मुझे नहीं पता वो कैब कहां जा रही थी और उसके पीछे पीछे मैं कहां जा रहा था, बस मेरे मन में एक खयाल था कि अगर मुझे मोनिका जी के करीब जाना है तो उसके पहले मुझे उनके जो अपने हैं उनके थोड़ा करीब जाना पड़ेगा और उनके अपनों की लिस्ट में फिलहाल मेरे पास एक ही नाम था और वो थीं मोनिका जी की मम्मी, बस यही सब बातें मेरे दिमाग में चल रही थी और मैं उस कैब के पीछे पीछे चलते चला जा रहा था और अचानक से वो कैब रेलवे स्टेशन के रास्ते की तरफ मुड़ गई तो मेरे मन ने मुझसे कहा कि जरूर ये स्टेशन ही जा रही होंगी, खैर मैं तो निकला ही था ये जानने के लिए कि ये कहां जा रही हैं तो मैं भी बस चले जा रहा था और कुछ दूर चलने के बाद कैब स्टेशन के पास पहुंच के रुक गई, और मैने भी अपनी बाइक रोक दी, अब मेरे पास सोचने के लिए उस वक्त बिल्कुल भी वक्त नहीं था कि अब आगे क्या करना है मुझे क्योंकि अब तक मुझे पता चल चुका था कि इनको ट्रेन ही पकड़नी है कहीं जाने के लिए तो मैने आव देखा ना ताव और बगल में बने बाइक स्टैंड में मैने अपनी बाइक घुसा दी और जल्दी से स्टैंड में बाइक खड़ी करने के बाद मैं बाहर निकल के आया तो देखा कि कैब जा चुकी थी और मैं भागते हुए स्टेशन के एंट्री गेट के पास तक आया तो देखा मोनिका जी की मम्मी धीरे धीरे चलते हुए प्लेटफार्म की तरफ जा रही हैं, उनको देख कर मुझे थोड़ा सुकून मिला वरना कुछ पल के लिए तो मुझे ऐसा लगा जैसे कि कहां गायब हो गई कैब, अब कैसे ढूढूंगा मैं मोनिका जी की मम्मी को, मैने अपना मोबाइल निकाल के देखा कि रात के 8 बजकर 10 मिनट हो चुके हैं और फिर मोबाइल रख के मैने सामने देखा तो मोनिका जी की मम्मी प्लेटफार्म नंबर 1 में खड़ी किसी ट्रेन का इंतजार कर रही थी तो मैं भी उनसे कुछ दूरी पर जा कर खड़ा हो गया और इस बात का पूरा ध्यान रखा मैने कि वो मुझे ना देख पाएं और तकरीबन 20 मिनट के गुजरने के बाद एक ट्रेन आकार प्लेटफार्म पर रुकी और मैने देखा कि मोनिका जी की मम्मी स्लीपर कोच की तरफ जाने लगी हैं तो मैं भी उनके पीछे पीछे चल दिया और मैने देखा कि वो S4 कोच में चढ़ चुकी हैं तो मैने थोड़ी सी चाल बढ़ाई और मैं भी S5 कोच में चढ़ गया और ट्रेन के चलने के इंतजार करने लगा और तब मेरे मन में खयाल आया कि यार मैं कहा जा रहा हूं, कहां जाना है मोनिका जी की मम्मी को और कल बैंक कैसे जाऊंगा मैं, क्या बोलूंगा मैनेजर को वगैरह वगैरह.....
इन सब खयालों से मैं तब बाहर आया जब ट्रेन के चलने पर लगने वाले झटके ने मुझे गिराने का भरसक प्रयास किया और मैंने संभलते हुए सोचा कि अब जब ओखली में सर डाल ही दिए हो मोहित शर्मा तो फिर अब क्या गिनना कि कितने पड़ते हैं बस खाते रहो और यही सोचते सोचते मैने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और मैने अपने ब्रांच मैनेजर को फोन किया ये बताने के लिए कि सर एक इमरजेंसी की वजह से मुझे बाहर जाना है मैं कल बैंक नहीं आ पाऊंगा, खैर बताने का कोई खास मतलब नहीं होता क्योंकि एब्सेंट तो लिखा ही जाना है फिरभी बताना इसलिए जरूरी होता है ताकि मेरे काउंटर की जिम्मेदारी किसी और को सौंपनी है ये पहले से ब्रांच मैनेजर को पता होना चाहिए, अपने मैनेजर से बात करने के बाद मैं चल पड़ा S5 से S4 की तरफ़ और बड़े ही बारीकी से ये देखते हुए जा रहा था कि मोनिका जी की मम्मी किस सीट में बैठी हुई हैं और S4 में चार कदम चलने के बाद मैने देखा कि एक सीट में विंडो की तरफ बाहर की ओर देखते हुए बैठी हुई हैं मोनिका जी की मम्मी और बाकी की पूरी सीट खाली है, और इतना देखते ही मैं भी चुप चाप एक किनारे उसी सीट पर बैठ गया और मैने तिरछी नज़रों से देखा कि वो अभी भी बाहर की तरफ ही देख रही हैं, अब मैं इंतजार करने लगा एक ऐसे मौके की कि जब मैं उनकी तरफ मुड़ कर देखूं तो मेरी नजरें उनकी नजरों से सीधी मिलनी चाहिए क्योंकि "अरे मैने आपको अभी देखा" मुझे इस स्थिति में आना था, और मेरी नजर सीधे उनकी नजरों से मिले ऐसा तभी संभव था जब वो बाहर के बजाय कोच के अंदर ही देखना शुरू करे इसलिए मैं इंतजार करने लगा उनके सिर घुमाने का और बीच बीच में अपनी तिरछी नजरों से देखता रहा, लगभग 10 मिनट बाद उन्होंने अपना सिर घुमाया और जैसे ही उन्होंने अपना सिर घुमाया तुरंत मैने भी अपना सिर घुमा करके उनकी तरफ देखा और सीधे हम दोनों की नजरें मिल गई......