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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

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SHADOW KING

Supreme
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259
#212.

चैपटर-14
माया जाल:
(तिलिस्मा 5.52)

धनवंतरी की औषधि प्राप्त करने के लिये शैफाली ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गई। शैफाली के निकलते ही ऊर्जा द्वार स्वतः ही बंद हो गया। शैफाली ने एक बार पलटकर पीछे देखा और फिर आगे की ओर चल दी।

शैफाली को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि कोई उसके साथ है या नहीं ...उसे तो बस जल्दी से जल्दी इस पूरे तिलिस्म को तोड़कर कैस्पर से मिलना था।

वैसे कैस्पर के लिये शैफाली ने बहुत सूझ-बूझ के साथ एक पहेली इंद्राक्ष के माध्यम से भिजवा दी थी। उसे पूरा विश्वास था कि कैस्पर उस पहेली को अवश्य हल कर लेगा और उसमें छिपे सार को भी समझ जायेगा।

अब शैफाली ने उस स्थान पर एक नजर मारी। चारो ओर बस बर्फ ही बर्फ नजर आ रही थी। दूरदूर तक और कुछ नहीं था। इस बर्फ के अपार सागर में शैफाली को धनवंतरी की बताई हुई आग को ढूंढकर उनके पास ले जाना था।

शैफाली बर्फ पर चलती हुई आगे बढ़ने लगी। कुछ आगे जाने पर शैफाली को एक साफ पानी की झील दिखाई दी।

शैफाली ने झील के पानी को अपने हाथों में उठाकर देखा। वह जल इतना स्वच्छ था, कि उसे अंजुली में भरने के बाद भी शैफाली के हाथ की रेखाएं बिल्कुल साफ नजर आ रही थीं।

"इस तिलिस्म में हमेशा झील के अंदर कुछ ना कुछ रहा है, मुझे झील के अंदर उतरकर एक बार देख लेना चाहिये।" यह सोच शैफाली उस झील में उतर गई।

शैफाली को हर बार की तरह इस बार भी किसी भी ठंडक को अहसास नहीं हो रहा था। झील में नन्हीं-नन्हीं लाल रंग की मछलियां तैर रहीं थीं। अब शैफाली झील की तली की ओर चल दी।

झील की तली में कुछ पत्थरों और जलीय पौधों के सिवा कुछ भी नहीं था। धीरे-धीरे शैफाली ने पूरी झील को ठीक ढंग से देख लिया, पर शैफाली को वहां कुछ भी नहीं मिला।

“लगता है इस बार कैश्वर ने झील में कुछ नहीं रखा है? मुझे झील के बाहर ही चलकर कुछ ढूंढने की कोशिश करनी होगी?” यह सोच शैफाली वापस झील की तली की ओर चल दी।

तली अभी कुछ दूर थी कि तभी एक लाल रंग की मछली, शैफाली के चेहरे के आगे आकर नाचने लगी।
यह देख शैफाली उस स्थान पर रुक गई और ध्यान से उस लाल रंग की मछली को देखने लगी।

तभी अचानक वह लाल मछली बहुत ही विशाल हो गई और इससे पहले कि शैफाली कुछ समझ पाती, उस मछली ने शैफाली को अपने मुंह में भर लिया और झील में एक दिशा की ओर चल दी।
...........................................

उधर जेनिथ भी ऊर्जा द्वार को पार कर एक ऐसे स्थान पर आ पहुंची, जहां एक विशाल मैदान में एक मंदर बना हुआ था।

जेनिथ सधे कदमों से उस मंदिर की ओर बढ़ गई। दूर से देखने पर ही वह मंदर एक श..व मंदर की भांति प्रतीत हो रहा था।

उस मंदर के बाहर नंमदी की एक विशाल प्रतिमा लगी थी। जेनिथ को अब हिं.. धर्म के बारे मे काफी कुछ जानकारी हो गई थी, इसलिये उसने नंमदी के पैर को स्पर्श कर अपने माथे से लगाया और फिर अपने जूते उतारकर मंदर के अंदर पहुंच गई।

मंदर के अंदर एक विशाल मंडप बना था, जिसमें बीच में एक शव..लग उपस्थित था। उसे देखकर साफ पता चल रहा था कि अभी कुछ देर पहले ही वहां से कोई पूजा करके गया है क्यों कि शि..ग पर अक्षत, पुष्प, दूध और चंदन चढ़ा हुआ था।

जेनिथ ने अपने सिर को उससे सटाकर दंडवत प्रणाम किया। अब जेनिथ की निगाहें मंदर में चारो ओर घूमने लगी।

पर उस जगह में ऐसा कुछ विशेष नहीं था? जिससे जेनिथ को कुछ अजीब लगता। कुछ देर सोचने के बाद जेनिथ वापस बाहर की ओर चल दी। तभी जेनिथ को अपने पीछे किसी के चलने का अहसास हुआ।

जेनिथ ने पलटकर पीछे की ओर देखा। जेनिथ को अपने पीछे जमीन पर गिरा हुआ वही फूल दिखाई दिया, जिसे कि जेनिथ ने अभी शि…ग पर चढ़ा हुआ देखा था।

“यह क्या ये फूल इधर कैसे आ गया? ये तो चढ़ा हुआ था।"

तभी जेनिथ को धनवंतरी की पहेली के शब्द याद आ गये, जिसमें त्रिशूल और फूल दोनों का ही ज़िक्र किया गया था। अब जेनिथ ने झुककर उस फूल को उठाने की कोशिश की, पर जैसे ही जेनिथ का हाथ उस फूल तक पहुंचा, वह फूल जेनिथ के हाथ से स्वतः ही दूर खिसक गया।

यह देख जेनिथ आश्चर्य से उस फूल को देखने लगी। पर फूल में किसी प्रकार का कोई मूवमेंट ना देख जेनिथ ने एक बार फिर से उस फूल को उठाने की कोशिश की। पर पिछली बार की तरह इस बार भी फूल आगे बढ़कर जेनिथ से दूर चला गया।

अब जेनिथ ने अपने चारो ओर देखा, पर उसे कोई नजर नहीं आया। इस बार जेनिथ सावधानी से फूल को पकड़ने के लिये आगे बढ़ने लगी, तभी वह फूल हवा में उड़कर त्रिशूल के ऊपर नाचने लगा।

अब जेनिथ को पूरा विश्वास हो गया था कि यह फूल ही धनवंतरी ने लाने को कहा था। वह अब धीरे-धीरे त्रिशूल की ओर बढ़ने लगी।

तभी जेनिथ को फूल के ऊपर, हवा में नाच रहा एक ऊर्जा का द्वार बनता दिखाई दिया, जो कि फूल से काफी ऊंचाई पर था।

इस बार जेनिथ ने झपटकर फूल को पकड़ लिया। फूल अब जेनिथ के हाथ में था। तभी जेनिथ की नजर अपने ऊपर आकर नाच रहे उस ऊर्जा द्वार की ओर गई।

“यह क्या? यह ऊर्जा द्वार तो अभी त्रिशूल के ऊपर था, फिर यह मेरे सिर के ऊपर कैसे आ गया?...कहीं ऐसा इस फूल की वजह से तो नहीं हुआ है?" जेनिथ ने अपने हाथ में पकड़े फूल को ध्यान से देखते हुए सोचा।

उस फूल का रंग बिल्कुल सफेद था और उस फूल की हर पंखुड़ी पर एक त्रिशूल जैसी आकृति बनी थी।
जेनिथ अभी ध्यान से उस फूल को देख ही रही थी कि तभी वह फूल जेनिथ के हाथ से उछलकर ऊपर स्थित ऊर्जा द्वार की ओर चल दिया।

जेनिथ ने उछलकर उस फूल को पकड़ने की कोशिश की, पर जेनिथ के उछलते ही वह स्वयं भी उस ऊर्जा द्वार में समा गई। ऊर्जा द्वार में तीव्र प्रकाश था, जिसकी वजह से जेनिथ की आँख बंद हो गई।

जेनिथ ने जब अपनी आँखें खोलीं, तो वह एक बहुत बड़े से फूलों के उद्यान में खड़ी थी। उसके आसपास हजारों की संख्या में वही फूल लगे दिखाई दे रहे थे, जो कि अभी जेनिथ को लेकर यहां आया था।

जेनिथ ने ऊपर आसमान की ओर देखा, रात अभी खत्म हो रही थी, और चारो ओर भोर का उजाला फैलने लगा था।

“हे भगवान, वह फूल तो इन फूलों के बीच कहीं गायब हो गया। अब मैं इतने फूलों के मध्य उस फूल की पहचान कैसे कर पाऊंगी?"

जेनिथ अब उस उद्यान में इधर-उधर घूमकर सभी फूलों को देखने लगी, पर सभी फूल जेनिथ को एक समान ही दिख रहे थे।

अब जेनिथ फिर से धनवंतरी की पहेली की पंक्तियों को याद करने लगी।
“पहेली में कहा गया था कि चंद्रकिरण से जन्मे, एक सहस्त्र फूल...यानि कि ये सभी फूल चंद्रमा की रोशनी में जन्म लिये हैं...पहेली की अगली पंक्तियां....थीं कि धनवंतरी को नवनिर्मित फूल चाहिये...यानि कि जो फूल सबसे आखिर में खिला होगा, वही नवनिर्मित होगा?" अब जेनिथ सभी फूलों को फिर से ध्यान से देखने लगी।

लगभग 2 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद जेनिथ की नजर एक फूल पर जाकर टिक गई। अब उसके चेहरे पर मुस्कुराहट दिखाई देने लगी।

“यही है वह नवनिर्मित यानि कि सबसे आखिर में खिला फूल क्यों कि....क्यों कि बाकी सभी फूलों पर ओस गिरी हुई है, बस इसी फूल पर ओस की एक भी बूंद नहीं है। यानि कि अगर यह रात में खिला होता, तो इस फूल पर भी ओस की बूंदें होतीं, जबकि ऐसा नहीं है है।" यह सोचकर जेनिथ ने उस फूल को तोड़ लिया।

जेनिथ के फूल तोड़ते ही एक जोर का रोशनी का झमाका हुआ और अब जेनिथ वह फूल अपने हाथ में लिये धनवंतरी के सामने खड़ी थी।

जेनिथ ने धनवंतरी के पास उस फूल को रखा और उनके हाथ में पकड़ी औषधि को ले लिया।

इस बार औषधि गायब नहीं हुई और जेनिथ के हाथ में आ गई। उस औषधि को जैसे ही जेनिथ ने खाया, धनवंतरी के हाथ में उसी के समान दूसरी औषधि नजर आने लगी।

अब जेनिथ उस गुफा के द्वार तक पहुंच गई, जिसमें आयुर्वेद के अध्याय रखें थे। जेनिथ तीसरी गुफा में प्रवेश कर गई।

तीसरी गुफा में चारो ओर जहरीली गैस फैली थी, परंतु जेनिथ के औषधि खाने की वजह से उस गैस ने जेनिथ के शरीर को किसी भी प्रकार से हीं नुकसान नहीं पहुंचाया।

इस प्रकार जेनिथ चलते हुए उस गुफा के अंत तक पहुंच गई। गुफा के अंत में एक पत्थर पर आयुर्वेद का तीसरा अध्याय रखा था, जेनिथ ने उस किताब को उठाया और गुफा से लाकर धनवंतरी के सामने रखे तीसरे पत्थर पर रख दिया।

“बधाई हो जेनिथ, तुमने अपना कार्य सबसे पहले पूर्ण कर लिया।” नक्षत्रा ने कहा- “अब आराम से बैठकर बाकी लोगों के आने का इंतजार करो।“ नक्षत्रा की बात सुन जेनिथ वहीं पर आराम से बैठ गई।

उधर सुयश अब भी हवा में तैर रहे पत्थर पर बैठा, वहां से निकलने का कोई उपाय सोच रहा था। तभी सुयश को अपने हाथ में पकड़ी उस ऊँट की मूर्ति का ध्यान आया, जो कि उसे रेत में दबी मिली थी।

सुयश उलट-पलट कर उस ऊँट की मूर्ति को देखने लगा। तभी सुयश का हाथ उस मूर्ति के पेट में लगे एक बटन से टच हुआ। अब सुयश ध्यान से उस बटन को देखने लगा, पर कुछ देर तक देखते रहने के बाद भी सुयश को उस बटन का कुछ कार्य समझ नहीं आया।

अब सुयश ने बटन को धीरे से दबा दिया। बटन के दबते ही ऊँट की पीठ से 2 पंख निकलने लगे। सुयश आश्चर्य से उन निकलते हुए पंखों को देखने लगा।

वह सोच भी नहीं सकता था कि ऊँट के पंख भी निकल सकते हैं, पर यही तो कैश्वर का जादू था, वही ऐसी ही चीजों का निर्माण करता था, जिसके बारे में कोई सोच भी ना पाये।

उधर जैसे ही ऊँट के पूरे पंख निकले, वह ऊँट जीवित हो गया और सुयश के हाथ से निकलकर हवा में उड़ने लगा।

अब उस ऊँट का आकार भी बढ़ता जा रहा था। कुछ ही देर में उस जादुई ऊँट का आकार सामान्य ऊँट के बराबर हो गया।

ऊँट अब सुयश के आसपास हवा में चक्कर लगा रहा था। अब सुयश को कुछ सोचने की जरुरत नहीं थी, वह तुरंत छलांग लगाकर ऊँट की पीठ पर बैठ गया।

ऊँट तो जैसे सुयश के बैठने का ही इंतजार कर रहा था, सुयश के बैठते ही ऊँट उस गड्ढे के दूसरी दिशा की ओर चल दिया, जिधर से रोशनी आती दिखाई दे रही थी।

वह रोशनी एक छेद से आ रही थी। सुयश कुछ देर तक उस छेद को देखता रहा और फिर उसने उस छेद में अपना हाथ डाल दिया।

सुयश को छेद के अंदर कोई रत्न सा महसूस हुआ। सुयश ने उस रत्न को छेद से निकाल लिया। वह एक सफेद रंग का चमचमाता हीरा था, जिससे तेज रोशनी निकल रही थी।

सुयश उस हीरे को लेकर पलटा। वह ऊँट अभी भी सुयश के पीछे जमीन पर खड़ा था। तभी सुयश की नजर उस तेज प्रकाश में ऊँट की परछाई पर पड़ी, जिसे देख वह खुश हो गया।

“यही तो मांगा था देवता धनवंतरी ने....श्वेत प्रकाश में किसी जीव की छाया का होना।” यह सोच सुयश ने अपने आसपास देखा, अब उसे कुछ दूरी पर एक ऊर्जा द्वार दिखाई देने लगा था।

सुयश ने आगे बढ़कर उस ऊँट का बटन दबाकर उसे फिर से पहले के समान कर दिया और उस ऊँट व हीरे को उठाकर ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गया।

वह ऊर्जा द्वार धनवंतरी के पास में ही निकला, जहां जेनिथ एक किनारे बैठकर सभी के आने का इंतजार कर रही थी। सुयश को आता देख जेनिथ खुश हो गई।

“अरे तुम तो सबसे पहले ही आ गई।” सुयश ने जेनिथ को देखते हुए कहा।

जेनिथ ने जल्दी-जल्दी अपनी पूरी कहानी सुयश को सुना दी। जेनिथ की कहानी सुन सुयश ने भी उस ऊँट व हीरे को धनवंतरी के सामने रखा और औषधि को लेकर, गुफा से आयुर्वेद का पहला अध्याय लाकर, धनवंतरी के सामने रख दिया।

अब वह भी जेनिथ के बगल में बैठकर बाकी लोगों के आने का इंतजार करने लगा।
.............................................

क्रिस्टी अभी भी गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से हवा में झूल रही थी। उसे ऐसे ही झूलते हुए 2 घंटे बीत चुके थे।

तभी क्रिस्टी को हवा में घूमता हुआ कोई और जीव भी दिखाई दिया, जो कि उसकी ही तरह उस गुरुत्वाकर्षण के जाल में फंसा हुआ था। वह जीव तेजी से अपने पैर चलाने की वजह से हवा में घूम रहा था।

क्रिस्टी अब चाँद की रोशनी में उस जीव को अपनी ओर आते देख रही थी, जब वह जीव थोड़ा और पास आ गया, तो क्रिस्टी को पता चला कि वह एक हाथी था।

किसी हाथी को बिना गुरुत्वाकर्षण के हवा में उड़ते देखना अपने आप में एक अनोखा अनुभव था, इत्तेफाक से यह दुर्लभ दृश्य इस समय क्रिस्टी की आँखों के सामने था।

अब उस हाथी की नजर भी क्रिस्टी पर पड़ चुकी थी, वह अपने हाथ पैरों के तेजी से हिलाकर क्रिस्टी के पास आने की कोशिश करने लगा।

हाथी धीरे-धीरे हवा में तैरता हुआ क्रिस्टी के पीछे आ गया। तभी क्रिस्टी के दिमाग में एक आइडिया आया, उसने अपने पैरों को सिकोड़कर हाथी के शरीर से छुआ दिया।

कुछ सेकेण्ड तक अपने शरीर का बैलेंस बनाने के बाद क्रिस्टी ने अपने पैरों को फिर से पूर्ववत करते हुए अपने शरीर को गति प्रदान की।

अब क्रिस्टी का शरीर हवा में लहराता हुआ, गुरुत्वाकर्षण वाले क्षेत्र से बाहर आ गया।

बाहर गिरते ही क्रिस्टी तुरंत आगे भागकर गुरुत्वाकर्षण के क्षेत्र से थोड़ा दूर हो गई। बाहर आकर क्रिस्टी ने राहत की साँस ली।

तभी क्रिस्टी की नजर उस हाथी पर गई, जो अब भी हवा में नाचता हुआ, क्रिस्टी को ही देख रहा था।

क्रिस्टी की निगाह अब नीचे जमीन की ओर गई, तो क्रिस्टी को जमीन पर एक चाँदी के रंग का गोला बना दिखाई दिया। उस गोले को देख क्रिस्टी को समझते देर नहीं लगी, कि यह चाँदी के गोले वाला क्षेत्र ही गुरुत्वाकर्षण वाला क्षेत्र है।

अब क्रिस्टी ने अपने पीठ पर लदे बैग से एक छोटी सी रस्सी निकाली और उसे हाथी की ओर फेंका।
रस्सी हवा में लहराते हुए हाथी के पास पहुंच गई। रस्सी को देख हाथी ने अपनी सूंढ़ से उस रस्सी को पकड़ लिया।

चूंकि गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में किसी का भार मायने नहीं रखता, इसलिये क्रिस्टी ने आसानी से उस हाथी को खींचकर बाहर निकाल दिया।

हाथी ने एक बार क्रिस्टी को ध्यान से देखा और फिर गुस्सा होकर, वापस उस गुरुत्वाकर्षण के क्षेत्र में घुस गया। हाथी एक बार फिर हवा में उड़ने का आनंद उठा रहा था।

हाथी को इस प्रकार करते देख पहले तो क्रिस्टी को बहुत गुस्सा आया, पर उसे गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में आनंद उठाते देख क्रिस्टी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। वह समझ गई कि हाथी उस क्षेत्र में परेशान नहीं था, बल्कि अपने उड़ने का आनंद उठा रहा था।

क्रिस्टी ने धीरे से अपने सिर को झटका और वापस चाँद की ओर देखने लगी।

तभी फिर क्रिस्टी को टूटते हुए तारे दिखाई दिये। इस बार क्रिस्टी ने उन तारों के स्रोत का पता लगा लिया। वह सभी तारे, एक बड़े से पेड़ से निकल रहे थे।

परंतु उस पेड़ का आकार देख क्रिस्टी हैरान हो गई क्यों कि उस पेड़ का आकार बिल्कुल किसी बिच्छू के समान था।

यह देख क्रिस्टी को पहेली की पंक्तियां याद आ गईं, जिसमें बिच्छू के डंक का भी वर्णन था। अब क्रिस्टी उस पेड़ की ओर चल दी।

पेड़ के पास पहुंचने पर क्रिस्टी ने देखा कि उस पेड़ पर कुछ चमकीले फल लगे हुए हैं और वह बिच्छू जैसा पेड़, अपनी डंक जैसी एक डाल से, अपने ही पेड़ के फल को तोड़कर, आसमान की ओर उछाल रहा है। वही चमकते फल आसमान में टूटते तारे के समान प्रतीत हो रहे थे।

यह दृश्य देखकर क्रिस्टी के दिमाग में एक खतरनाक प्लान आया, उसे नहीं पता था कि ये प्लान सही है भी या नहीं, पर उसने अब कुछ करने को सोच लिया था।

अब क्रिस्टी धीरे से आगे बढ़कर, उस बिच्छू रुपी पेड़ पर चढ़ने लगी। कुछ ही देर में वह पेड़ की सबसे ऊंची वाली डाल पर पहुंच गई। अब क्रिस्टी ने अपने पास लगा एक चमकीले फल को पकड़ लिया।

कुछ ही देर के इंतजार के बाद, पेड़ की डंक रुपी डाल क्रिस्टी की ओर बढ़ी और उसने वो फल सहित क्रिस्टी को आसमान की ओर उछाल दिया।

बिना किसी सहारे के आसमान में इतनी ऊपर तक आने से, एक बार तो क्रिस्टी थोड़ी डर सी गई, फिर उसने अपने शरीर का बैंलेंस आसमान में भी बना लिया।

अब क्रिस्टी का शरीर चाँद के भी ऊपर था। क्रिस्टी की यह छलांग विश्व की शायद सबसे अनोखी छलांग रही होगी।

अधिकतम ऊंचाई तक पहुंचने के बाद, क्रिस्टी का शरीर नीचे की ओर आने लगा।

क्रिस्टी का शरीर अब चाँद से कुछ दूरी पर था, क्रिस्टी अपने शरीर को गोल-गोल घुमाकर चाँद के पास पहुंच गई। क्रिस्टी ने अपना हाथ बढ़ाकर उस 4 फुट के चाँद को आसमान से तोड़ लिया।

अब क्रिस्टी का शरीर तेजी से नीचे आने लगा। क्रिस्टी ने यह सोच रखा था कि उसका शरीर जैसे ही नीचे आयेगा, वह गुरुत्वाकर्षण वाले क्षेत्र की वजह से, हवा में रुक जायेगी, परंतु यहां पर क्रिस्टी की सोच गलत साबित हो गई।

क्यों कि उस क्षेत्र का गुरुत्वाकर्षण चाँद की वजह से ही था और चाँद तो अब क्रिस्टी ने ही तोड़ लिया था, इसलिये उस क्षेत्र का गुरुत्वाकर्षण अब समाप्त हो गया था। अब यह बात क्रिस्टी को भी समझ में आ गई थी, क्यों कि उसका शरीर चाँद को पकड़े हुए अनवरत गिरता ही जा रहा था।

तेजी से नीचे गिर रही क्रिस्टी को अब जमीन साफ दिखाई देने लगी थी। डर की वजह से क्रिस्टी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

तभी क्रिस्टी को अपना शरीर हवा में झूलता महसूस हुआ। ऐसा महसूस होते ही क्रिस्टी ने झट से अपनी आँखें खोल दीं।

इस समय क्रिस्टी का शरीर उसी हाथी की सूंढ़ में झूल रहा था। हाथी ने अब क्रिस्टी के शरीर को जमीन पर रख दिया, और उसे घूरने लगा।

खुशी की अधिकता से क्रिस्टी ने हाथी की सूंढ़ पर कई सारी पप्पियां दे दीं। क्रिस्टी को अपने बचने पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। वह हाथी उसे किसी भगवान के समान प्रतीत हो रहा था।

कुछ देर के बाद क्रिस्टी ने अपने भावों को नियंत्रित किया और इधर-उधर देखा।

अब क्रिस्टी को अपने सामने कुछ दूरी पर एक ऊर्जा द्वार दिखाई दिया। क्रिस्टी उस ऊर्जा द्वार की ओर बढ़ गई।

ऊर्जा द्वार में प्रवेश करने के पहले क्रिस्टी ने पलटकर एक बार हाथी को देखा और फिर उसे एक फ्लाइंग किस दे वह द्वार में प्रवेश कर गई।

वह द्वार भी धनवंतरी के पास खुला।
क्रिस्टी ने भी अपनी कहानी सुयश और जेनिथ को सुनाकर, धनवंतरी से औषधि ले, आयुर्वेद का चतुर्थ अध्याय लाकर, उसके स्थान पर रख दिया।

अब सभी को सिर्फ और सिर्फ शैफाली का इंतजार था।

.............................................
उधर शैफाली को मुंह में भरकर, वह लाल मछली झील के पानी में तैरती हुई आगे बढ़ती जा रही थी।

तभी झील में एक स्थान पर एक ऊर्जा द्वार दिखाई दिया। वह लाल मछली उस ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गई।

वह ऊर्जा द्वार एक कमरे में निकल रहा था, जहां पर ज्यादा रोशनी नहीं थी। उस कमरे में जरा सा भी पानी नहीं था।

कमरे में पहुंचकर मछली ने शैफाली को वहीं जमीन पर गिरा दिया और फिर से आकार में छोटी हो, उस कमरे में मौजूद एक काँच के जार में घुस गई।

काँच का जार पानी से भरा हुआ था। अब उस मछली को देख कोई नहीं कह सकता था कि यही मछली अभी कुछ देर पहले इतनी विशाल थी।

उधर जमीन पर गिरते ही शैफाली ने कमरे में चारो ओर देखा, एक स्थान पर अंधेरे में उसे कोई खड़ा दिखाई दिया। शैफाली दौड़कर उस व्यक्ति से लिपट गई।

उसके मुंह से सिर्फ एक ही शब्द निकला-“कैस्पर!!!!"

अब वह व्यक्ति धीरे से पलटा। वह सच में कैस्पर ही था, जिसका पूरा चेहरा आँसुओं से भरा था। वह अब शैफाली के माथे को लगातार चूमे जा रहा था। दोनों एक दूसरे के गले लगे ना जाने कितनी देर तक ऐसे ही रोते रहे।

"कोई इस तरह से जाता है क्या? वो भी बिना बताए।” कैस्पर ने शैफाली को देखते हुए कहा- “कम से कम इतना तो बता देती कि लौटकर कब आओगी?"

“इतना समय ही नहीं मिला कि तुम्हें सब कुछ बता पाती। पंचशूल ने मेरे शरीर को पूरी तरह से जला दिया था, उस जले शरीर के साथ ही मुझे बहुत से कार्य करने पड़े।” शैफाली ने अब कैस्पर से अलग होते हुए कहा “पर ये बताओ कि तुम मेरे मायावन में आने के बाद भी अभी तक मुझसे मिले क्यों नहीं?"

“मैं काफी दिनों से श्वेत महल में था, इसलिये मुझे तुम्हारे आने का पता ही नहीं चला, वो तो जब इंद्राक्ष ने तुम्हारी दी हुई पहेली मुझे बताई, तो मुझे तुम्हारे बारे में पता चला।” कैस्पर ने कहा।

“पहेली समझ में आ गई थी?" शैफाली ने कैस्पर को देखते हुए पूछा।

“तुमने क्या अभी तक मुझे बुद्धू समझ रखा है। कैस्पर ने शैफाली को देखते हुए कहा- “तुमने उस पहेली में सप्तअश्वों का ज़िक्र किया था। मैं समझ गया कि सप्तअश्वों के माध्यम से तुम तिलिस्मा के 7 द्वारों की बात कर रही हो, फिर तुमने त्रिशूल के बारे में कहा, जो कि महानदेव की शक्तियों के बारे में था। फिर तुमने बताया कि जिस समय की खिड़की से इंद्राक्ष बाहर निकला था, उसी समय की खिड़की से, मैं पांचवे द्वार के अंत में तुमसे आकर मिल सकता हूं।” बस इतना ही तो था, उस पहेली में। फिर क्या था मैंने देव की शक्तियों से उस समय की खिड़की का पता किया और फिर तुमसे मिलने आ गया।

“अरे वाह! मेरा कैस्पर तो सच में बहुत समझदार हो गया है।” शैफाली ने मुस्कुराते हुए कहा।

“अच्छा, अब समय ना बेकार करते हुए जल्दी जल्दी अपनी कहानी मुझे सुना दो। इससे पहले कि कैश्वर को मेरे बारे में पता चले, मैं यहां से निकल जाना चाहता हूं। नहीं तो कैश्वर मेरे नियम तोड़ने का हवाला देकर तुम सभी को तिलिस्म में फंसा देगा।” कैस्पर ने कहा।

कैस्पर की बात सुनकर शैफाली ने जल्दी-जल्दी अपनी पूरी कहानी कैस्पर को सुना दी। शैफाली की पूरी कहानी सुनने के बाद कैस्पर भी अपने कुछ प्लान शैफाली को बताने लगा।

कैस्पर के प्लान सुनकर शैफाली की आँखों की चमक बढ़ती जा रही थी। शैफाली को इस स्थान पर लगभग 1 घंटे बीत गये। अब कैस्पर सबकुछ शैफाली को समझा चुका था।

"तो फिर अब मैं निकलता हूं यहां से, तुम जल्दी से इस तिलिस्म को तोड़ो, तिलिस्मा के बाहर तुम्हारे निकलने का इंतजार कर रहा हूं।” कैस्पर ने कहा।

शैफाली ने धीरे से अपना सिर हिलाया और एक बार फिर कैस्पर के गले लगकर उसे विदा किया।

शैफाली के अलग होते ही काँच के जार में घूम रही लाल मछली फिर जार से बाहर निकली और हवा में आकर बड़ी हो गई।

शैफाली को मछली ने अपने मुंह में भरा और उस ऊर्जा द्वार से बाहर निकल गई। शैफाली के बाहर निकलते ही ऊर्जा द्वार कहीं गायब हो गया।

उस लाल मछली ने शैफाली को उसी स्थान पर छोड़ दिया, जहां से वह उसे लाई थी और फिर घूमकर झील में कहीं गायब हो गई।

शैफाली अब झील से निकलकर बाहर आ गई। अब उसका ध्यान पूरी तरह से अपने कार्य पर था।

शैफाली अब बर्फ में सभी ओर देखते हुए आगे बढ़ रही थी। तभी उसे एक जगह बर्फ पर बैठा हुआ एक साइबेरियन पक्षी दिखाई दिया, जो बर्फ में चोंच मारकर, कुछ निकालने की कोशिश कर रहा था।

शैफाली उस स्थान की ओर आगे बढ़ गई। शैफाली को अपनी ओर आता देख वह साइबेरियन पक्षी डर कर उड़ गया।

शैफाली को उस स्थान पर बर्फ से कुछ निकला हुआ दिखाई दिया। शैफाली ने उस स्थान की बर्फ को अपने हाथों से साफ किया। अब उसके सामने एक चमड़े का बैग दिख रहा था।

बर्फ में चमड़े का बैग देखकर शैफाली ने उस बैग को खोल लिया। उस बैग में एक लकड़ी से बनी पानी की बोतल थी। जो काफी चिकनी दिख रही थी।

"इस बोतल को कैश्वर ने यहां क्यों छिपा कर रखा है? कुछ ना कुछ तो अवश्य है इस बोतल में?" यह सोच शैफाली ने बोतल के अंदर झांका, पर बोतल के अंदर भी कुछ नहीं था।

तभी शैफाली की नजर बोतल के ढक्कन पर पड़ी, जो कि काफी चिकना और एक ओर को उभरा हुआ था।

"इस बोतल का ढक्कन तो बिल्कुल उत्तल लेंस की तरह दिख रहा है। एक बार अलबर्ट अंकल ने भी तो अपने चश्में से आग लगाई थी, तो फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि इस बोतल के ढक्कन की सहायता से आग लगाई जा सकती हो? पर आग लगाना किस चीज में है, यहां तो कोई सूखी लकड़ी भी नहीं होगी?" .....तभी शैफाली की नजर अपने हाथ में थमी बोतल की ओर गई- “अरे, कहीं इस बोतल को ही तो नहीं जलाना है? क्यों कि इस पूरे स्थान पर एकमात्र यह बोतल ही सूखी लकड़ी से बना है...और...और तभी तो इसे चमड़े के बैग में रखकर बर्फ में छिपाया गया था, जिससे इस पर नमी का कोई असर ना हो?"

यह सोचते ही शैफाली ने पुनः उस लकड़ी की बोतल को चमड़े के बैग में डाल लिया, पर उस बोतल का ढक्कन अब भी शैफाली के हाथ में था। शैफाली ने बोतल के ढक्कन को सूर्य की रोशनी में रखा, पर काफी देर के बाद भी उस ढक्कन से कुछ नहीं हुआ।

“अरे...ये तो मैंने ध्यान ही नहीं दिया कि बोतल का ढक्कन तो पारदर्शी ही नहीं है, ऐसे में यह सूर्य की किरणों को आगे ही नहीं भेज पायेगा।" अब शैफाली फिर से पहेली की पंक्तियों को याद करने लगी।

"उन पंक्तियों में बताया गया था कि बर्फ में किसी प्रकार का दाग नहीं होता, मतलब यह स्वच्छ पानी से बना होता है पर सबसे स्वच्छ पानी तो झील का ही है कहीं...कहीं इस झील के पानी का प्रयोग करके तो आग नहीं बनाना?"

यह सोच शैफाली ने एक बार फिर ध्यान से ढक्कन को देखा। अब उसके चेहरे पर मुस्कुराहट दिखाई देने लगी थी। अब शैफाली, बोतल के ढक्कन को लेकर झील के पास पहुंच गई।

शैफाली ने अब झील का स्वच्छ जल ढक्कन में भर दिया और उसे छाया में जमीन पर रखकर, एक बड़े से पत्थर के टुकड़े से उस ढक्कन को ढक दिया।

अब शैफाली उस ढक्कन के चारो ओर बहुत सी बर्फ रखकर, ढक्कन को बर्फ में पूरी तरह दबा दिया।
लगभग आधे घंटे के बाद शैफाली ने सभी चीजों को हटाकर, बोतल के ढक्कन को निकाल लिया।

बोतल के ढक्कन में अब झील का पानी बर्फ में बदल गया था। शैफाली ने अब ढक्कन को ऊपर से अपनी हथेली से रगड़ना शुरु कर दिया।

कुछ ही देर हथेली की गर्मी से ढक्कन की बर्फ निकलकर बाहर आ गई, परंतु अब वह देखने में किसी उत्तल लेंस की भांति लग रही थी, जो कि आगे से थोड़ा उभार लिये हुई थी।

शैफाली ने अब उस बर्फ से बने लेंस को, रगड़-रगड़ कर, बिल्कुल चिकना बना दिया। अब वह बिल्कुल एक पारदर्शी लेंस बन गया था, जिस पर किसी भी प्रकार का कोई दाग नहीं था।

शैफाली ने अब लकड़ी की बोतल को वापस बाहर निकाल लिया और उसे धूप में रख दिया। अब शैफाली ने अपने हाथ में थमे लेंस को इस प्रकार हाथ में ले लिया कि उस पर सीधी धूप पड़े।

लेंस अगर पारदर्शी नहीं होता, तो वह पहले स्वयं ही धूप में पिघल जाता, पर पारदर्शी होने के कारण, उस लेंस पर धूप का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। लेंस ने अब सूर्य की किरणों को एक स्थान पर संकेन्द्रित करना शुरु कर दिया।

लगभग 15 मिनट की अपार मेहनत के पश्चात् शैफाली ने आखिर उस लकड़ी बोतल को जला ही दिया।

जैसे ही लकड़ी की बोतल ने आग पकड़ी, शैफाली के सामने एक ऊर्जा द्वार दिखाई देने लगा।

शैफाली उस जलती हुई बोतल को वैसे ही पकड़कर उस ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गई। शैफाली को भी सकुशल आता देख सभी के चेहरे पर मुस्कान झलक उठी।

शैफाली ने भी सभी की भांति आयुर्वेद का दूसरा अध्याय लाकर धनवंतरी के सामने रख दिया।

जैसे ही शैफाली ने दूसरा अध्याय अपने सामने रखा, धनवंतरी की मूर्ति सहित वहां रखी सभी चीजें गायब हो गईं।

अब उस स्थान पर अगला द्वार नजर आने लगा था, जिस पर लिखा था- “तिलिस्मा भाग-6

लेकिन उस द्वार में प्रवेश करने के पहले ही सभी शैफाली से कहानी सुनने लगे। शैफाली ने कैस्पर की बातों को छोड़ सभी कुछ उन लोगों को ज्यों का त्यों बता दिया।

शैफाली की कहानी सुनकर सभी तिलिस्मा के छठे द्वार की ओर चल दिये।

पर इस समय शैफाली के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान थी, एक ऐसी मुस्कान जिसमें सदियों के मिलन की खुशबू भी थी और अपने कार्य को पूरा करने का दृढ़ विश्वास भी।


जारी रहेगा_____✍️
lovely update .sabne apni apni paheliya hal kar di .shefali ne Casper se mulakat bhi kar li .Sabse majedar scene hathi wala laga jab hathi gurutva karshan ke bina tairna ke maje le raha tha aur christi ko apne sundh se bacha liya .
 

SHADOW KING

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#213.

सूर्यांश:
(25.01.2002, शुक्रवार, मैनहट्टन, न्यूयार्क, अमेरिका)

आर्ची ने जैसे ही शलाका को उस बच्चे के कहीं और जाने की बात कही शलाका सबकुछ छोड़ उस पार्क की ओर चल दी। जेम्स भी विक्रम को देखता हुआ शलाका के पीछे भागा।

“आर्ची, मुझे रास्ता गाइड करती रहो।” शलाका ने तेज चलते हुए कहा।

“आप बिल्कुल सही रास्ते पर हो...अब सामने दिख रही सड़क को पार करके, दूसरी ओर आ जाओ।" आर्ची ने शलाका को गाइड करना शुरु कर दिया।

"एक मिनट रुको शलाका।” जेम्स ने शलाका को रोकने की कोशिश करते हुए कहा- “हम लोग ऐसे भाग क्यों रहे हैं, हम आपके जादू से भी तो वहां जा सकते हैं?"

“तुम्हें क्या लगता है कि मैं यहां न्यूयार्क के बीचो बीच खड़े होकर जादू का प्रयोग करुंगी, अगर एक भी कैमरे ने हमें ऐसा करते देख लिया, तो फिर पूरी दुनिया की समाचार एजेंसियां आज से ही हमारे पीछे पड़ जायेंगी।” शलाका ने बिना रुके चलते हुए कहा।

लेकिन अब जेम्स को समझ में आ गया था कि क्यों शलाका इस प्रकार भाग रही थी?

“अब आपके सामने, एक प्लेग्राऊंड का गेट आयेगा, उसे पार करने के बाद, पार्क का गेट, आपके सामने होगा।” आर्ची, शलाका को तेजी से गाइड कर रही थी। कुछ ही देर में शलाका को ‘फोर्ट ट्रायन पार्क' का गेट दिखाई देने लगा।

“अब इस गेट से आप पार्क के अंदर की ओर आ जाइये और फिर बांई ओर चलिये। अब वह लड़का आपसे ज्यादा दूरी पर नहीं है।” आर्ची ने शलाका को उत्साहित करते हुए कहा।

शलाका काफी तेज चल रही थी, जेम्स बड़ी मुश्किल से उसकी गति के बराबर चल पा रहा था। जेम्स की अब साँस भी फूलने लगी थीं। तभी शलाका और जेम्स को वह लड़का दिखाई दिया।


“आपके सामने जो लड़का है, वही है वह लड़का, जिसने उस दिन अमृत की शीशी म्यूजियम से चुराई थी।" आर्ची ने कहा।

शलाका उस लड़के के पास पहुंच गई, जो कि पार्क की एक बेंच पर बैठा था।

लड़का शक्ल से ही भारतीय लग रहा था, परंतु उसकी आँखें बहुत चमकीली थीं। उसका रंग गोरा और बाल काले थे। उसने इस समय एक सफेद रंग की शर्ट पर एक गाढ़े नीले रंग का जंपर पहन रखा था।

शलाका उस लड़के के बगल जाकर बैठ गई। उस लड़के ने अपना चेहरा उठाकर शलाका को देखा और फिर बिना अपनी नजर हटाये, उसे निहारता रहा।

शलाका को वह लड़का काफी भोला-भाला लगा। पर फिर भी उसने अपने दिमाग को केन्द्रित करते हुए उस बच्चे की ओर ध्यान से देखा।

"आर्ची इस बच्चे को स्कैन करो और देखो कि यह कौन है?” शलाका ने यह बात अपने मन में ही कही थी, इसलिये उस बच्चे को शलाका की आवाज सुनाई नहीं दी।

"इस बच्चे के चेहरे पर किसी प्रकार का कोई मेकअप नहीं है, इसके शरीर की ऊर्जा बताती है कि यह बहुरुपिया भी नहीं है, इसके दिल की धड़कन सामान्य है और वह किसी बालक की ही तरह धड़क रही है, इसका मतलब यह सच का ही एक बालक है इसके शरीर के सभी अंग बिल्कुल साधारण मनुष्य की भांति ही हैं, जो यह साबित करता है कि इस बालक में किसी भी प्रकार की कोई दिव्य शक्ति नहीं है। शलाका, यह एक साधारण बालक है, जिसकी उम्र लगभग ..... वर्ष है। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है।

यह सुन शलाका ने बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा- “तुम्हारा नाम क्या है और तुम कहां रहते हो?"

मगर शलाका को देखते हुए, पता नहीं क्यों उस बच्चे की आँखें भर आईं, पर वह बोला कुछ नहीं वह तो बस अनवरत शलाका को देखे जा रहा था।

“क्या हुआ, तुम कुछ बोलते क्यों नहीं?" शलाका ने उसकी भरी-भरी आँखों को देखते हुए प्यार से पूछा।

“मेरा नाम सूर्यांश है, मैं इस दुनिया में अकेला हूं और आपको देखकर मुझे मेरी माँ की याद आ गई।" सूर्यांश ने कहा।

“क्यों तुम्हारे माता-पिता कहां गये?” शलाका ने आश्चर्य से सूर्यांश को देखते हुए पूछा।

“मेरी माँ, बचपन में ही मुझे छोड़कर कहीं चली गई?” सूर्यांश ने कहा- “मैं यहां अपने अंकल के यहां रहता हूं...उनका घर यहां से कुछ दूरी पर है जब वो अपने ऑफिस चले जाते हैं, तो मैं यहां पार्क में आ जाता हूं।"

“और तुम्हारे पापा? वो कहां गये?" शलाका ने सूर्यांश के गाल को प्यार से सहलाते हुए पूछा।

“वो माँ को ढूंढने चले गये। काफी समय से उनका भी कुछ पता नहीं है?” सूर्यांश ने भी अब शलाका के चेहरे को छूते हुए कहा- “क्या मैं आपको माँ बोल सकता हूं?"

सूर्यांश के यह शब्द सुनते ही जाने क्यों शलाका का मन भर आया, उसने सूर्यांश को गले से लगाते हुए कहा- “बिल्कुल बोल सकते हो, पर पहले तुम्हें, मुझे एक चीज बतानी होगी?" शलाका की बात सुन सूर्यांश, शलाका का चेहरा देखने लगा।

“तुमने 4 दिन पहले जो म्यूजियम से एक शीशी चुराई थी, वह कहां है?”

“उस शीशी में तो कुछ भी नहीं था, मैंने उसे खोल के देखा था, उसमें तो बस एक बूंद पानी था।” सूर्यांश, शलाका का प्यार देख अब खुल के बोलने लगा था।

"तो तुमने उस शीशी के पानी का क्या किया?"

“उस समय मेरा गला सूख रहा था, इसलिये मैंने उस पानी को पी लिया और शीशी यहीं पार्क में फेंक दी थी।” सूर्यांश ने पार्क के एक ओर इशारा करते हुए कहा।

शलाका ने जेम्स की ओर देखा। जेम्स शलाका का इशारा समझ उस ओर जाकर शीशी को ढूंढने लगा, जिधर सूर्यांश ने इशारा किया था।

कुछ ही देर में जेम्स उस सुनहरी शीशी को लिये हुए, शलाका के पास पहुंचा। शलाका ने शीशी को खोलकर देखा, पर उसमें कुछ नहीं था, यानि की सूर्यांश सही कह रहा था और अब वह अमरत्व को प्राप्त कर चुका था।

अब शलाका के वहां रुके रहने का कोई औचित्य नहीं था, इसलिये उसने एक आखिरी बार सूर्यांश के सिर पर हाथ फेरा और उठकर खड़ी हो गई।

“अब मैं चलती हूं सूर्यांश, पर आप ज्यादा शैतानी मत करना और समय पर यहां से सीधे अपने घर जाना।"
यह कहकर शलाका वहां से वापस चल दी, पर शलाका अभी कुछ ही दूर जा पाई थी कि एका एक उसे कुछ याद आया- “ओह नो!"

और वह जेम्स को ले वापस भागकर उसी स्थान पर आ गई, जहां उसने अभी सूर्यांश को छोड़ा था, पर अब सूर्यांश उस जगह पर नहीं था।


“क्या हुआ? आप इस तरह से भागकर वापस क्यों आईं?" अब जेम्स से रहा ना गया, इसलिये वह पूछ बैठा।

“सूर्यांश झूठ बोल रहा था, अगर उसने अमृत पीया होता, तो आर्ची को उसके शरीर के बदलाव नजर आ जाते, पर आर्ची को वह सामान्य बालक ही लगा, इसका साफ मतलब निकलता है कि या तो उस बालक ने अमृत नहीं पिया था या फिर वह किसी प्रकार से आर्ची को धोका देकर बच निकला है?"

तभी शलाका को उस सीट पर कोई कागज रखा हुआ दिखाई दिया, जहां अभी सूर्यांश बैठा था। शलाका ने उस कागज को उठा लिया, परंतु उस कागज पर नजर पड़ते ही शलाका के दिमाग में धमाके से होने लगे।

उस कागज पर वैसा ही डिजाइनर S और दिल का निशान बना था, जैसा कि एक दिन पहले शलाका को अपने कमरे में मिला था।

“यह क्या? क्या सूर्यांश ही उस दिन मेरे कमरे में आया था? लेकिन कैसे? कैसे एक छोटा सा बालक मेरी सभी सिक्योरिटी को धता देकर, मेरे कमरे में घुस सकता है? और....और वह अंटार्कटिका कैसे पहुंच गया? कुछ तो गड़बड़ है सूर्यांश में? मुझे कैसे भी उस बालक को दोबारा ढूंढना होगा?” शलाका के दिमाग में सैकड़ों प्रश्न घुमड़-घुमड़ कर आ रहे थे।

"कहीं ऐसा तो नहीं कि हम जिस दिव्य बालक को देवोम समझ कर ढूंढ रहे हैं, यह वही बालक हो क्यों कि यह आपको माँ बोल रहा था... और इसने यह भी कहा था कि इसके माता-पिता इसे छोड़कर कहीं चले गये?" जेम्स के शब्दों ने तो कहानी को और ज्यादा उलझा दिया।

“पर महेन्द्र के कहने के हिसाब से तो देवोम कम से कम 24 से 25 वर्ष का होना चाहिये था, पर यह तो xyz से yxz वर्ष का बालक था।” शलाका ने जेम्स की ओर देखते हुए कहा।

“ये भी तो हो सकता है कि महेन्द्र जान-बूझकर झूठ बोल रहा हो, उसे डर हो कि अगर हम सच्चाई जान जायेंगे, तो फिर हम देवोम को अपने साथ लेते जायेंगे। जेम्स ने कहा।

“महेन्द्र सच बोल रहा था या नहीं, यह गुत्थी तो अभी सुलझ जायेगी।” यह कहकर शलाका ने एक बार फिर आर्ची को संबोधित किया- “आर्ची, तुम जरा पिछले 15 दिन का पुलिस का डेटा चेक करो और पता करो कि महेन्द्र ने देवोम के खोने की पुलिस कंप्लेन किसी पुलिस स्टेशन में लिखवाई है क्या?

कुछ ही देर में आर्ची की आवाज आई- “हां, महेन्द्र ने 5 दिन पहले देवोम की एक 'मिशिंग रिपोर्ट' लिखवाई है।"

“यानि कि देवोम सच में ही गायब हुआ है, पर बिना उसकी फोटो के हम उसे ढूंढे भी तो कैसे?” शलाका ने कहा।

तभी अचानक शलाका को कुछ याद आया “आर्ची, मैंने जो देवोम की फोटो, तुम्हें सेव करने को कही थी, उसे तुम अपने फ्यूचर डेटा में डाल कर बता सकती हो कि देवोम इस समय देखने में कैसा होगा? तुरंत देवोम की बचपन की फोटो से अभी की फोटो बनाकर मुझे बताओ।"

लगभग 5 मिनट के बाद आर्ची की आवाज आई“मैंने देवोम की नई फोटो बना ली है।"

“अब देवोम की इस नई फोटो को पूरे विश्व के कैमरे से स्कैन करो और देखो कि इसे आखिरी बार कहां पर देखा गया था?” शलाका ने कहा।

जेम्स तो जैसे आर्ची का फैन होता जा रहा था, इतने एडवांस कंप्यूटर के बारे में तो वह सोच भी नहीं सकता था।

"देवोम की फोटो सर्च करने के बाद पता चला कि देवोम को 15 दिन पहले, आखिरी बार फ्लोरिडा के एयरपोर्ट पर देखा गया था, जहां से वह एक हेलीकॉप्टर में बैठकर कहीं चला गया? एक मिनट रुकिये.... हमें देवोम के चेहरे से मिलता एक डेटा और मिला है, पर इस डेटा में देवोम का नाम व्योम लिखा हुआ है और यह डेटा अमेरिका की सीक्रेट सर्विस CIA का है। यानि की देवोम ने व्योम के नाम से, अमेरिकन सीक्रेट सर्विस ज्वाइन की थी और इस डेटा का आधार पर उसे जो आखिरी मिशन दिया गया था, उसका मिशन का नाम था- “डिस्कवर ऑफ सुप्रीम"

यह सुनकर तो शलाका को जैसे चक्कर आ गया। अब वह समझ चुकी थी कि क्यों देवोम की फोटो उसके घर पर नहीं मिल रही थी? जरुर CIA वालों ने देवोम के CIA ज्वाइन करने के बाद, उसकी तस्वीर को उसके घर से हटवा दिया होगा।

पर अगर देवोम ही व्योम है, तो सूर्यांश कौन है? जो भी हो शलाका इस गुत्थी को जितना सुलझाने की कोशिश कर रही थी, यह गुत्थी उतना ही और उलझती जा रही थी।

ऐसा लग रहा था कि जैसे ईश्वर ने भविष्य को स्वयं उलझा रखा हो?


°°°°°
प्रश्नावली:

दोस्तों जैसा कि आप देख रहे हैं कि प्रश्नों की संख्या अब इतनी ज्यादा हो चुकी है कि अब वह मस्तिष्क में एकत्रित नहीं हो पा रहे हैं। तो क्यों न इन सारे प्रश्नों को एक जगह पर एकत्रित कर लें

1) पंचशूल का निर्माण किसने और क्यों किया था?
2) मैग्ना का ड्रैगन, लैडन नदी की तली में क्यों सो रहा था? मेलाइट उसे क्यों जगाना चाहती थी?
3) सागरिका, वेगिका, अग्निका आदि चमत्कारी पुस्तकों का क्या रहस्य था?
4) क्या था फेरोना ग्रह के जनक, पेन्टाक्स का रहस्य?
5) एण्ड्रोनिका में जाने के बाद धरा और मयूर का क्या हुआ?
6) महावृक्ष के स्वप्जतरु में कितने रहस्य छिपे थे?
7) सुनहरी ढाल और तलवार से आकृति देवराज इंद्र से कैसे वरदान मांगना चाहती थी?
8) विक्रम बर्फ के गोले में कैसे पहुंच गया? उसकी स्मृति कैसे चली गई थी? जबकि वह एक अमर योद्धा था।
9) क्या विक्रम आकृति की दी हुई नीली अंगूठी उतारकर वारुणी से सम्पर्क कर सका?
10) क्या फासा और कागोशी को सच में कलाट ने मारा था?
11) कौन था जैगन का गुरु कुवान? क्या मकोटा को वुल्फा उसी से मिला था?
12) तीसरे पिरामिड में कुवान की मूर्ति के नीचे खड़े निष्क्रिय जीव योद्धा कौन थे?
13) क्या मकोटा सुरंग के रास्ते तिलिस्मा में प्रवेश कर सका?
14) क्या मेलाइट, रोजर को कस्तूरी मृग का रहस्य बता पाई?
15) सुर्वया के सिंहलोक में 'चतुर्भुज सिंहराज', शुभार्जना और दिव्यदृष्टि जैसी शक्तियां कहां से आयीं थीं? सुर्वया ने अपने परिवार के बारे में क्यों नहीं बताया?
16) क्या था उस रक्त भैरवी की डिबिया के अंदर, जिसे नीलाभ ने हनुका को दिया था?
17) माया ने 15 लोकों का निर्माण किस प्रकार किया? वह 15 लोक कौन-कौन से स्थान पर थे?
18) क्या नीलाभ महानदेव के अन्य रुपों से आशीर्वाद ले पाया?
19) क्या था नीलाभ के रक्त से बनी चिड़िया नीलिमा का रहस्य?
20) क्या हुआ था गिरोट के साथ, जो वह ओरस को पृथ्वी पर भेजने से डर रहा था? वह किन समय के आयामों में उलझने की बात कर रहा था?
21) ज़ेनिक्स ने संरक्षिका के बारे में अभी तक ओरस को क्यों नहीं बताया था? क्या संरक्षिका में भी कुछ रहस्य छिपे थे?
22) क्या एलात्रा और एलनिको के मरने के बाद एंड्रोवर्स पावर और खतरनाक हो गये?
23) शलाका की अति आधुनिक कंप्यूटर आर्ची का निर्माण किसने किया था?
24) क्या शलाका का आर्केडिया यान, शलाका के पिता का था? कहां था इस समय शलाका का पिता?
25) क्या कैस्पर, मेरोन और सोफिया को हेडिस की कैद से छुड़ाने अंडरवर्ल्ड जा पाया?
26) क्या कैस्पर का सत्य जानने के बाद जीयूष ने किसी प्रकार से कैस्पर की मदद की?
27) क्या कैस्पर की बताई तैयारियों को वारुणि पूरा कर पाई?
28) क्या कैस्पर और वारुणि सभी ब्रह्मांड रक्षकों को संगठित कर पाये?
29) कैसी थी विद्युम्ना की बल और छल शक्ति? क्या व्योम और त्रिकाली उन शक्तियों को परास्त कर त्रिशाल और कलिका को छुड़ा पाये?
30) क्या ऐलेक्स और तौफीक सच में मर गये थे या फिर ये भी कोई कैश्वर का जाल था?
31) वुल्फा के मरने के बाद मकोटा ने क्या किया?
32) क्या था बिल्ली वाली देवी के हाथ में पहने कड़े का रहस्य, जिसे अलबर्ट ने उतारकर स्वयं पहन लिया था?
33) क्या ब्रूनो ही डेंगो था? तो फिर लैडन नदी के अंदर सोया ड्रैगन कौन था?
34) क्या अलबर्ट तिलिस्मा में प्रवेश कर सुयश से मिल पाया?
35) साफ दिख रहा था कि ज़ेनिक्स कैश्वर के साथ है, तो क्या वह ओरस से भी झूठ बोल रही थी? ज़ेनिक्स आखिर ऐसा क्यों कर रही थी?
36) क्या कैश्वर अपने नये शरीर में प्रवेश करने के बाद और भी खतरनाक हो गया?
37) क्या ऐमू को कभी अमरकथा का भान हो पाया?
38) इंद्राक्ष से क्रिस्टी ने क्या वरदान मांगा था?
39) क्या कलाट और युगाका ने वीनस को अपना लिया?
40) भविष्य में जाने के बाद ओरस को गिरोट कैसे दिखाई दिया? क्या ज़ेनिक्स ने जान-बूझकर ओरस को भविष्य में भेजा था?
41) भविष्य की जेनिथ, ओरस, सुयश और तौफीक को क्यों नहीं जानती थी?
42) कौन था नन्हा सूर्यांश? क्या सूर्यांश ही चुपचाप शलाका के कमरे में गया था?
43) क्या वेदांत रहस्यम् में अभी और भी रहस्य छिपे थे? जिन्हें अभी शलाका देख नहीं पाई थी।
44) ज़ेनिक्स ने कैश्वर के माध्यम से फेरोना ग्रह पर संदेश क्यों भिजवाया था?
45) कैस्पर ने छिपकर शैफाली को कैसा प्लान बताया था?
46) कैसा था तिलिस्मा का आगे का मायाजाल? क्या वह आगे और कठिन होता गया?
47) क्या तिलिस्मा में घुसे सभी लोग तिलिस्मा को पार कर काला मोती प्राप्त कर सके? ऐसे ही ना जाने कितने सवाल होंगे जो आपके दिमाग में घूम रहे होंगें?

तो दोस्तों इन सारे अनसुलझे सवालों के जवाब इस कहानी के अगले भाग का जिसका नाम है- “ब्रह्मकण शक्ति' में मिलेंगे, जिसमें हम आपको ले चलेंगे, ब्रह्मलोक के एक ऐसे अद्भुत संसार में, जहां पर पृथ्वी की उत्पत्ति के रहस्य छिपे है।

*******
"दूसरों को बना ने में तमाम उम्र गुजारी है,
पंख नये हैं, पर अब मेरे उड़ने की बारी है"

दोस्तों इस कहानी को लिखने में बहुत समय और मेहनत लगी है। इसे पढ़कर कृपया “रिव्यू के माध्यम से अपने विचार जरुर व्यक्त की जियेगा।

🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼
romanchak update. ye suryansh kaun tha jisne shalaka se sach kaha ya jhooth pata nahi ,sachme usne amrit piya ya nahi .
devom hi vyom hai jo cia join karke supreme ko dhundhne gaya hai .agar Archie ko suryansh me kuch bhi badlaw najar nahi aaya to suryansh ek rahasya ban gaya hai .
 

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#214.

काला मोती (ब्रह्मकण शक्ति)
सप्तशक्ति - ब्रह्मांड के निर्माण के लिये ईश्वर ने पहले सप्तशक्तियों का निर्माण किया। ये सप्तशक्तियां थीं- वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, ध्वनि और प्रकाश। इन सभी सप्तशक्तियों ने मिलकर ब्रह्मांड में उपस्थित सभी ग्रहों की रचना की। परंतु अभी भी जीवन की उत्पत्ति संभव नहीं हो सकी थी।

जीवन की उत्पत्ति के लिये ब्र..देव ने एक कण की रचना की, जिसे बाद में ब्रह्मकण के नाम से जाना गया। इस ब्रह्मकण में जीवन की उत्पत्ति के अलावा इन सभी सप्तशक्तियों को नियंत्रित करने की शक्ति भी थी।

ब्रह्मांड की रचना के बाद देव ने इस ब्रह्मकण को एक काले मोती में समाहित कर समुद्र की अथाह गहराइयों में कहीं छिपा दिया। परंतु एक दिन एक नीली जलपरी की गलती से ‘काला मोती’ ग्रीक देवता पोसाइडन के हाथ लग गया।

इसके बाद शुरु हुई रहस्य व रोमांच से भरी ऐसी कहानी, जिसने पृथ्वी ही नहीं वरन् ब्रह्मांड के कई ग्रहों को अपनी चपेट में ले लिया। फिर शुरु हुई एक ऐसी प्रश्नावली जिसने सभी के मस्तिष्क को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया-
1) क्या हुआ जब देव का जन्म सहस्त्रदल कमल पर हुआ? क्या ब्र…ह्देव अपने जन्म के रहस्य को समझ सके?
2) क्या हुआ जब ब्रह्मकण से जन्मी लावण्या, अरिगंधा के राजकुमार मेघवर्ण को लेकर अथाह समुद्र की गहराइयों में चली गई?
3) क्या नीलाभ महानदेव की शक्तियों को प्राप्त करने के लिये, काशी जाकर का..भैरव से आशीर्वाद प्राप्त कर सका?
4) क्या हुआ जब समयचक्र ने भविष्य को बदलना शुरु कर दिया?
5) क्या हुआ जब तिलिस्मा में घूम रही 12 राशियों ने अलग-अलग प्रकार से तिलिस्मा में प्रवेश किये लोगों पर आक्रमण कर दिया?
6) क्या था काँच की तितली का रहस्य, जो लोगों का अपहरण कर उनका रुप धर लेती थी?
7) क्या हुआ जब व्योम का युद्ध यम व महान…ली से हुआ?
8) क्या सुयश व शैफाली कैलाश पर्वत पर लिपटी महानदेव की जटा को खोलकर मायाजाल को पार कर सके?
9) क्या था रावम की बालरुप वाली मूर्ति का रहस्य, जिसे लेने के लिये नीलाभ को गरुणाक्ष पर्वत पर जाना पड़ा?
10) क्या था ब्लैकून के अंदर छिपे फीनीक्स पक्षी का रहस्य?
11) क्या था न्यूयार्क शहर में स्थित ‘एटर्नल फ्लेम’ का रहस्य, जो झरने के नीचे भी सदियों से जल रही थी?
12) क्या था सीरीनिया के जंगलों में छिपे ‘निम्फिया महल’ का रहस्य, जिसे आर्टेमिस ने अपनी सबसे प्रिय सुनहरी हिरनी के लिये बनाया था?
13) क्या क्रिस्टी रोम के पौराणिक शहर ‘ट्रॉय’ के तिलिस्म को पार कर सकी?

तो दोस्तों इन सभी प्रश्नों के उत्तर को जानने के लिये आइये पढ़ते हैं, एक ऐसी महा गाथा, जिसने मनुष्य ko हिलाकर रख दिया। जिसका नाम है-
“काला मोती -ब्रह्मकण शक्ति”

चैपटर-1
ब्रह्मज्ञान :
(सतयुग, क्षीर सागर)

क्षीरसागर का दुग्ध के समान श्वेत जल, सागर की सतह पर हिलोरें मार रहा था। दूर-दूर तक लहरों की हलचल और उसकी तेज ध्वनि के सिवा कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। नीला आसमान अपनी छाया को, क्षीर सागर के श्वेत जल में निहार कर मुग्ध हो रहा था।

तभी वातावरण में एक सुनहरा दिव्य प्रकाश उत्पन्न हुआ, जो कि नीले आसमान से निकलकर, क्षीर सागर के श्वेत जल को, एक स्थान पर स्पर्श करने लगा। दिव्य प्रकाश का श्वेत जल के स्पर्श करते ही, उस श्वेत जल के मध्य से, एक गुलाबी रंग की आकृति ने उभरना शुरु कर दिया। कुछ ही देर में देखते ही देखते, वह गुलाबी आकृति पूर्ण रुप से, श्वेत जल की सतह पर आ गई।

अब उस गुलाबी आकृति ने, एक विशाल दिव्य कमल के पुष्प का आकार ले लिया, पर यह पुष्प अभी खिला नहीं था। यह तो मात्र एक पवित्र कली थी, जो किसी अद्भुत शक्ति के दिव्य प्रकाश से जन्म ले रही थी।

कली के प्रकट होते ही, श्वेत जल हवा में तेज हिलोरें मारने लगा। श्वेत जल कमल की उस कली को उछलकर, इस प्रकार स्पर्श कर रहा था, मानों वह दुग्ध जल, उस पवित्र कली के पैर पखार रहा हो। तभी वातावरण में ‘ऊँ’ की एक ध्वनि उत्पन्न हुई, जो कि कुछ ही पलों में सम्पूर्ण सृष्टि में फैल गई। यह ध्वनि निरंतर वातावरण में एक मधुर रस घोल रही थी।

लगातार ‘ऊँ’ के स्पंदन से, कमल की कली ने कुनमुनाकर अपनी आँखें खोलना शुरु कर दिया। एक-एक कर कली की पंखुड़ियां खुलती जा रहीं थीं।

कुछ ही देर में इस सहस्त्रदल कमल की एक हजार पंखुड़ियों ने, अपनी निद्रा भंग कर, इस अपूर्ण सृष्टि के दर्शन किये। सभी पंखुड़ियों के खुल जाने के बाद, उस सहस्त्रदल कमल पर एक दिव्य पुरुष लेटे हुए दिखाई दिये, जिनकी पलकें अभी विश्राम की अवस्था में थीं।

प्रकाश की किरणें अभी भी प्रस्फुटित होकर, पवित्र कमल को स्पर्श कर रही थीं। उधर ‘ऊँ’ का निनाद भी अपने चरम पर था। तभी क्षीर सागर की कुछ बूंदों ने, हवाओं के झूले पर बैठ, उस दिव्य पुरुष की पलकों का एक चुम्बन लिया।

अब उस दिव्य पुरुष ने अपने नेत्रों को खोल दिया। कुछ क्षणों तक सृष्टि का अवलोकन करने के बाद, उन्होंने अपने सीप के समान अधरों को खोला- “मैं कौन हूं? मेरा जन्म क्यों हुआ? यह कौन सा स्थान है?”

तभी कमल पर पड़ रहा दिव्य प्रकाश कुछ कम हुआ और उससे एक ध्वनि वातावरण में गुंजायमान हुई- “मैं निराकार परमब्रह्म हूं, मैंने ही तुम्हें इस सृष्टि की रचना को पूर्ण करने के लिये अवतरित किया है।”

“हे परमब्रह्म, तो कृपा करके मेरा नामकरण करते हुए मेरा मार्गदर्शन कीजिये।” दिव्य पुरुष ने अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा।

“तुम्हारा अवतरण ब्रह्मज्ञान को अर्जित कर, सृष्टि को पूर्ण करने के लिये हुआ है, इसलिये आज से तुम्हारा नाम ब्र…देव होगा। आज से समस्त संसार तुम्हें ब्रह्देव, सृष्टिकर्ता, आदि नामों से जानेगा। पर इस नामकरण को चरितार्थ करने के लिये, तुम्हें पहले ब्रह्मज्ञान लेना होगा।” परमब्रह्म ने कहा- “उस ब्रह्मज्ञान के बिना, तुम्हारी उत्पत्ति अर्थरहित है।”

“तो फिर मुझे उस ब्रह्मज्ञान का श्रवण कराइये परमब्रह्म।” ब्र..देव ने कहा - “मैं उस ब्रह्मज्ञान को पाने के लिये व्यग्र हूं।”

“वह ब्रह्मज्ञान तुम्हें स्वयं से प्राप्त करना होगा। इसलिये अभी से तुम उस ब्रह्मज्ञान को तलाशना शुरु कर दो। जिस क्षण तुम्हें उस ब्रह्मज्ञान के दर्शन हो जायेंगे, तुम मेरी वाणी को फिर से सुन पाओगे।” यह कहकर परमब्रह्म का दिव्य प्रकाश और वाणी कहीं वातावरण में लुप्त हो गई? अब ‘ऊँ’ की प्रतिध्वनि भी वायुमण्डल में विलीन हो गई।

“पर परमब्रह्म.... मुझे तो यह भी नहीं पता कि मुझे ब्रह्मज्ञान कहां से और कैसे प्राप्त होगा ?” देव ने परमब्रह्म से कहा। पर अब कुछ भी कहना व्यर्थ था, परमब्रह्म वहां से जा चुके थे।

कुछ देर की प्रतीक्षा के बाद ब्र..देव समझ गये कि अब उन्हें स्वयं ही ब्रह्मज्ञान के रहस्य को तलाशना होगा। अतः वह कमल के पुष्प की सभी पंखुड़ियों को निहारने लगे। सभी पंखुड़ियां आकार में छोटी-बड़ी थीं।

“यह सभी पंखुड़ियां छोटी-बड़ी क्यों हैं? अर्थात् प्रकृति में सबकुछ एक समान नहीं होता।......यह श्वेत जल, नील गगन, पाटल (गुलाबी) पंखुड़ियां, हरित दलपत्र...सबकुछ भिन्न-भिन्न रंगों से बना है.....वायु, जल, गगन, प्रकाश, ध्वनि...यह सब प्रकृति में विद्यमान हैं...पर इनका नियंत्रण कौन करता है?....लगता है मुझे इन सब चीजों के बारे में जानने से पहले, अपनी उत्पत्ति के कारक के बारे में जानना होगा?” ऐसे अनेकोंनेक प्रश्न थे, जो देव के मस्तिष्क को उलझा रहे थे।

आखिरकार बहुत सोचने के बाद देव, उस सहस्त्रदल कमल की डंठल में प्रवेश कर गये। जैसे-जैसे डंठल में आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे डंठल का आकार चौड़ा होता जा रहा था। देव को उस डंठल में चलते हुए कई घंटे बीत गये।

आखिरकार देव उस डंठल के उद्गम स्थल तक पहुंच ही गये। वह डंठल एक ब्रह्मांड रुपी विशाल वृक्ष की बेल से निकला था। इस विशाल वृक्ष की 7 शाखाएं थीं और हर एक शाखा में पत्तियों के स्थान पर करोड़ों ग्रह विचरण कर रहे थे। उस विशाल ब्रह्मांडीय वृक्ष के आगे, देव को अपना शरीर, एक कण के समान प्रतीत हो रहा था।

“मैं तो यहां पर एक साधारण से पुष्प की उत्पत्ति के बारे में जानने के लिये आया था, पर अब तो यहां मुझे विशाल ब्रह्मांडीय वृक्ष दिख रहा है....जो कि एक धरा पर लगा है। यानि कि अब मुझे इस ब्रह्मांडीय वृक्ष की जड़ में जाना होगा....वहीं से मुझे इस वृक्ष के स्रोत पता चल सकता है।”

यह सोच देव ने धरा के कणों को टटोलकर देखा और फिर स्वयं उस ब्रह्मांडीय वृक्ष की जड़ों में प्रवेश कर गये। देव वृक्ष की जड़ों को पकड़े हुए धरा के अंदर चले जा रहे थे। कुछ समय के बाद वृक्ष की वह जड़ें देव को लेकर, धरा के अंदर स्थित एक सुरंग में पहुंच गईं।

वह पूरी सुरंग भूरे रंग की चट्टानों से निर्मित थी। अब देव ने उस सुरंग की यात्रा शुरु कर दी।

लगभग एक घंटे तक अनवरत् चलने के बाद, वह सुरंग एक विशाल मैदान में निकली, जहां पर एक वर्गाकार सफेद पत्थर की बड़ी सी चट्टान रखी थी।

उस चट्टान में एक द्वार बना हुआ था। चट्टा न में द्वार देख, देव उस द्वार में प्रवेश कर गये। वह द्वार देव को एक वर्गाकार कमरे में ले आया, जिसके बीच में एक सफेद पत्थर की चौकी पर, एक विलक्षण बालक पालथी मारकर आसन की मुद्रा में बैठा था।

पूरा कमरा बिल्कुल श्वेत नजर आ रहा था। यहां तक कि उस बालक ने भी श्वेत वस्त्र ही धारण कर रखे थे।
उस बालक ने अपने सिर के घनेरे बालों से, किसी ऋषि की भांति अपने सिर पर एक छोटा सा जूड़ा बना रखा था।

उस बालक के चेहरे पर दिव्यता विद्यमान थी, जिसका ओज उसके चेहरे के चारो ओर, एक गोलाकार आकृति में प्रस्फुटित हो रहा था। वह बालक इस समय ध्यान की मुद्रा में था, इसलिये देव उस बालक के सामने जाकर बैठ गये और अपने नेत्रों से उस दिव्य बालक की मनोहारी छवि को निहारने लगे।

कुछ क्षणों के बाद उस दिव्य बालक ने अपनी आँखें खोल दीं और देव की ओर उत्सुकता से देखने लगा।

“मेरा ना म ब्रह..देव है।” देव ने उस विलक्षण बालक के सम्मुख हाथ जोड़कर कहा- “मैं यहां ब्रह्मज्ञान की तलाश में आया हूं। आप कौन हैं दिव्य बालक? कृपया मुझे अपने बारे में बताएं।”

“मेरा नाम नरयण है, परंतु मुझे स्वयं नहीं पता कि मैं कौन हूं?” नरा..ण ने कहा- “और मैं कितने समय से यहां पर हूं? तो फिर मैं आपको ब्रह्मज्ञान कैसे दे सकता हूं? परंतु आप चाहें तो पूर्व दिशा से इसके बारे में पूछ सकते हैं।” यह कहकर नराय.. ने पूर्व दिशा की ओर इशारा किया।

इशारा देख, देव ने अपने सिर को पूर्व दिशा की ओर घुमाने की चेष्टा की, परंतु वह असफल रहे।

“मैं अपना शीश पूर्व दिशा की ओर क्यों नहीं घुमा पा रहा?” देव के चेहरे पर उलझन के भाव उभरे।

“अगर आप इतना छोटा सा कार्य नहीं कर पा रहे हैं, तो आप ब्रह्मज्ञान को कैसे तलाश कर पायेंगे देव?” नारयण ने कहा।

नन्हे बालक के कटाक्ष सुन देव ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर, अपने शीश को पूर्व दिशा की ओर घुमाया।
अति कठोर प्रयास से, देव का सिर तो पूर्व दिशा में नहीं घूमा, परंतु पूर्व दिशा की ओर उनका एक सिर और उत्पन्न हो गया। अब देव के 2 सिर हो गये।

“यह मेरे 2 शीश कैसे हो गये?” देव ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा।

“हमें तो नहीं पता...पर हमें लगता है कि आपको ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने लगा है।” नरयण ने मुस्कुराते हुए कहा।

अब देव को पूर्व दिशा में जलती हुई अग्नि दिखाई देने लगी थी। अब नारयण, देव से बिना कुछ बोले, पश्चिम दिशा की ओर देखने लगे।

उन्हें इस प्रकार पश्चिम दिशा की ओर देखते पाकर, देव ने अपने सिर पश्चिम दिशा की ओर घुमाया।

इस बार फिर देव का एक सिर और बढ़ गया। अब उनके 3 सिर हो गये थे। पश्चिम दिशा में देव को जल दिखाई दिया। कुछ सोचने के बाद देव ने स्वतः ही अपना सिर पीछे यानि कि उत्तर दिशा की ओर किया। अब देव के 4 सिर हो गये। उत्तर दिशा में विशाल आकाश नजर आ रहा था।

तभी देव के सामने की ओर, यानि की दक्षिण दिशा में धरा तत्व नजर आने लगा। “लगता है कि 4 दिशाओं में देखने के लिये परमब्रह्म ने मुझे 4 शीश प्रदान किये हैं?”

“पर दिशाएं तो 10 होती हैं।” नरयण ने कहा- “पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, आग्नेय, वायव्य, नैऋत्य, ऊर्ध्व (ऊपर) और अधो (नीचे)। लगता है कि आपको बाकी दिशाओं में भी देखना चाहिये?”

नरयण के वचन सुन, जैसे ही ब्रह्मदेव ने ईशान, आग्नेय, वायव्य और नैऋत्य दिशा की ओर देखा, हर एक दिशा में देखने पर, उनके प्रत्येक शीश के मस्तिष्क में एक ऊर्जा प्रवेश कर गई। अब सिर्फ 2 दिशाएं बची थीं- “ऊर्ध्व और अधो ”।

अब देव ने ऊपर की ओर देखा, जिसके प्रभाव से उनके ऊपर भी एक शीश प्रकट हो गया। पर पांचवा शीश प्रकट होते ही विलोप भी हो गया।

“यह एक शीश प्रकट होने के बाद विलोप क्यों हो गया?” देव ने नारयण से पूछा।

“वह शीश अदृश्य अवस्था में रहेगा। जब आपको उसकी आवश्यकता होगी, तभी वह प्रकट होगा।” नरयण ने कहा।

वचनों को सुन अब देव ने नीचे की ओर देखा। परंतु जैसे ही नीचे देखा, देव की आँखों से एक प्रकाश की तीव्र किरण निकलकर भूमि पर पड़ी। उस प्रकाश की किरण ने एक मानव शरीर को जन्म दिया, जो कि
उत्पन्न होते ही उठकर खड़ा हो गया।

“देव को वास्तुपुरुष का प्रणाम।” वास्तुपुरुष ने हाथ जोड़कर देव की ओर देखते हुए कहा- “हे परमपिता, मैं दसों दिशाओं में विराजमान वास्तुपुरुष हूं, मेरा जन्म आपके प्रत्येक निर्माण में सहयोग प्रदान करने के लिये हुआ है। इसलिये मैं आपको यह वचन देता हूं कि मैं सृष्टि के प्रत्येक निर्माण में उपस्थित रहूंगा और उस निर्माण को सदैव शुभ फलदायी देने के लिये प्रयत्नशील रहूंगा।” यह कहकर वास्तुपुरुष हवा में विलीन हो गया।

वास्तुपुरुष के हवा में विलीन होते ही देव फिर से नरयण को देखने लगे। ऐसा लग रहा था, मानो वह नारयण से पूछना चाह रहे थे कि अब उन्हें क्या करना चाहिये?

उन्हें इस प्रकार से उलझन में पड़ा देख, नरयण बोल उठे- “आपने दसों दिशाओं में तो नियंत्रण प्राप्त कर लिया ब्र…देव। अब आपको इन सप्तशक्तियों पर नियंत्रण प्राप्त करना होगा।”

“परंतु कैसे? मैं इन सप्त शक्तियों पर कैसे नियंत्रण कर सकता हूं?” ब..ह्म ने उलझन भरे नेत्रों से नारा..ण की ओर देखते हुए पूछा।

“आप अपने गुरु या ईष्टदेव को याद करिये देव, वही आपको सप्तशक्तियों पर नियंत्रण करने का मार्ग प्रशस्त करेंगे।” नरयण के शब्द अर्थ से परिपूर्ण थे।

नारा..ण के शब्द सुन देव और विचलित हो गये क्यों कि उन्हें अपने गुरु के बारे में पता ही नहीं था। आखिरकार देव ने अपने चारो मुखों के नेत्रों को बंद कर लिया और मन में ही परमब्रह्म का आहवान किया।

अब देव को अपने मन में फिर से वही ब्रह्मांडीय वृक्ष दिखाई देने लगा, परंतु इस बार उस ब्रह्मांडीय वृक्ष में नरयण का अद्भुत बालरुप भी झलक रहा था।

देव ने मन ही मन उस ब्रह्माडीय वृक्ष को प्रणाम किया और फिर अपने नेत्रों को खोल दिया, परंतु अब उनके चेहरे पर असीम शांति दिख रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे वह सम्पूर्ण ब्रह्मांड को एक क्षण में समझ गये हों।

शायद यही ब्रह्मज्ञान था, जिसमें कमल की उत्पत्ति का कारक भी था और ब्रह्मांड की अद्भुत बेल के दर्शन भी। अब ब्रह्म, नरायण के सामने हाथ जोड़कर बैठ गये।

“हे ना..यण, मैं आपको ही अपने गुरु रुप में स्वीकार करता हूं। मैंने आपके दिव्य दर्शन भी प्राप्त कर लिये। अब आप ही मुझे इन सप्तशक्तियों के नियंत्रण का रहस्य प्रदान करें, जिससे मैं सृष्टि का निर्माण आरंभ कर
सकूं।” देव के शब्दों में अथाह भक्ति झलक रही थी।

देव के शब्दों को सुन नरयण मुस्कुराये और बोल उठे- “मैं आपको सप्तशक्तियों के नियंत्रण की शक्ति तो प्रदान कर दूंगा देव, परंतु आपने मुझे गुरु माना है, इसलिये उसके पहले आपको मुझे गुरुदक्षिणा प्रदान करनी होगी। गुरुदक्षिणा के बिना किसी भी गुरु का ज्ञान अपूर्ण होता है।”

नरयण के शब्द सुन इस बार देव विचलित नहीं हुए। वह मुस्कुराये और भूमि पर पालथी मारकर बैठ गये। देव ने अब अपनी आँखें कुछ क्षणों के लिये बंद कर लीं।

अब देव के सभी मस्तकों से एक ऊर्जा की तेज किरण निकलीं और उनके गोद में जाकर पड़ने लगी।

इस ब्रह्मऊर्जा ने एक दिव्य पुरुष को उत्पन्न कर दिया, जो कि देखने में लगभग नरयण के समान ही प्रतीत हो रहे थे। देव ने उस दिव्य पुरुष को भूमि पर उतारा और स्वयं उठकर खड़े हो गये।

“इस सम्पूर्ण सृष्टि में आपकी भक्ति के समान कुछ नहीं होगा नरयण। परंतु आपकी शक्ति और भक्ति का ज्ञान भी प्रत्येक जीव के लिये आवश्यक होगा। अतः मैं गुरुदक्षिणा के रुप में आपको, आपकी भक्ति के प्रसार के लिये, अपने प्रथम मानस पुत्र को समर्पित करता हूं। आज से मेरे इस मानस पुत्र का नाम ‘नरद’ होगा और इनका सम्पूर्ण जीवन आपकी भक्ति के प्रसार में रत रहेगा।”

देव की बात सुनकर नरद, नरयण के सामने अपने हाथों को जोड़कर बैठ गये। तभी देव के हाथों में एक वीणा दिखाई देने लगी, जो उन्होंने नरद को दे दी।

“इस वीणा का नाम ‘महती’ होगा नरद। इस वीणा से सदैव नरयण की ध्वनि उत्पन्न होगी।” देव ने कहा- “जाओ और जाकर सम्पूर्ण सृष्टि में नरयण की भक्ति का गुणगान करो।”

“जो आज्ञा परमपिता।” नरद ने कहा और वीणा को लेकर अदृश्य हो गये।

“हम आपकी गुरुदक्षिणा से अत्यंत प्रसन्न हुए देव।” नरयण ने कहा- “अब हम आपको इन सप्तशक्तियों के नियंत्रण की शक्ति सौंपते हैं।” यह कहकर नरयण ने अपने दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली को हवा में उठाया।

अब नरयण के हाथ में चक्र नजर आने लगा, जो द्रुत गति से उनकी उंगली के मध्य घूर्णन कर रहा था।
उस चक्र के मध्य सम्पूर्ण ब्रह्मांड दिखाई दे रहा था। तभी उस चक्र के मध्य से एक कण निकला और हवा में तैरता हुआ देव के हाथ में पहुंच गया।

देव आश्चर्य से उस सूक्ष्म कण को देखने लगे।

“यह सृष्टि का प्रथम कण है देव, यह प्रथम कण आज से ब्रह्मकण के नाम से जाना जायेगा। इसी ब्रह्मकण के अंदर इन सप्तशक्तियों को नियंत्रित करने की शक्ति है और इसी ब्रह्मकण से आप इस सृष्टि का निर्माण भी कर सकते हैं।”

इसी के साथ एक तेज रोशनी उत्पन्न हुई, जिसकी वजह से देव के नेत्र एक क्षण के लिये बंद हो गये।
जब आँखें खुलीं, तो उन्होंने स्वयं को वापस सहस्त्रदल कमल के ऊपर पाया।

परंतु अब देव को ब्रह्मज्ञान और ब्रह्मकण दोनों ही प्राप्त हो चुके थे। अतः देव ने एक बार फिर अपने हाथ में उपस्थित कण को देखा और फिर सृष्टि का निर्माण करने में जुट गये।

एक हजार वर्ष के अनवरत प्रयास के बाद देव ने संपूर्ण सृष्टि का निर्माण कर दिया। अब उनकी दृष्टि वापस उस ब्रह्मकण पर थी।

“निर्माणकार्य तो पूरा हो गया, परंतु अब समस्या इस छोटे से मूलकण को सुरक्षित रखने की है। कहीं यह किसी बुरी शक्ति के प्रभाव में आ गया? तो बहुत मुश्किल हो जायेगी। इसलिये इसे किसी ऐसे सुरक्षित
स्थान पर रखना होगा, जहां पर किसी भी जीव की दृष्टि इस पर ना पड़े।”

यह सोच देव अनंत सागर की गहराई की ओर चल दिये। गहराई में पहुंचने के बाद देव ने एक अद्भुत सीप का निर्माण किया और उस ब्रह्मकण को एक छोटे से काले मोती में छिपाकर, सीप के अंदर रख दिया।

देव ने उस काले मोती को एक बार देखा और फिर पता नहीं क्या सोचकर अपने हाथ की अंगूठी को निकालकर उस सीप में रख दिया?

ब्रह्मदेव की वह अंगूठी, सुनहरे रंग की धातु से निर्मित थी, जिसके आगे एक गोल काले रंग का रत्न लगा था। पूरी अंगूठी तेज चमक बिखेर रही थी।

अब देव ने सीप को बंद किया और उसके चारो ओर एक सुरक्षा कवच बना दिया। सुरक्षा कवच के कारण अब वह सीप अदृश्य हो गया।

देव अब पूरी तरह से संतुष्ट दिखाई देने लगे। उन्हें लग रहा था कि अब इस ब्रह्मकण को कोई प्राप्त नहीं कर सकता? अतः वह वहां से वापस क्षीरसागर की ओर चल दिये।


जारी रहेगा______✍️
lovely update. padhkar ekdam maja Aa gaya .Kaise brmadev ki utpatti huyi ,kaise brmahkan ko dev ne surakshit jagah chhipa diya .dekhte hai brmahkan ko kaise jalpari chura pati hai .
 
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lovely update .sabne apni apni paheliya hal kar di .shefali ne Casper se mulakat bhi kar li .Sabse majedar scene hathi wala laga jab hathi gurutva karshan ke bina tairna ke maje le raha tha aur christi ko apne sundh se bacha liya .
Aapko update pasand aaya, apni mehnat safal hui😊 sath bane rahiye, Thank you very much for your wonderful review and support bhai :hug:
 
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romanchak update. ye suryansh kaun tha jisne shalaka se sach kaha ya jhooth pata nahi ,sachme usne amrit piya ya nahi .
devom hi vyom hai jo cia join karke supreme ko dhundhne gaya hai .agar Archie ko suryansh me kuch bhi badlaw najar nahi aaya to suryansh ek rahasya ban gaya hai .
Suryansh wakai me ek rahasay hai mitra, aur jab isse parda hatega to aap sab chaunk jaoge ye vaada hai.
Thank you very much for your wonderful review and support bhai :thankyou:
 
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lovely update. padhkar ekdam maja Aa gaya .Kaise brmadev ki utpatti huyi ,kaise brmahkan ko dev ne surakshit jagah chhipa diya .dekhte hai brmahkan ko kaise jalpari chura pati hai .
Bas yahi se saara khel suru hota hai, wahi brahmkann posidan ke pas pahuchega, aur uske baad kya kya hua ye aap jaante ho :dazed:
Thank you very much for your wonderful review and support bhai , sath bane rahiye :hug:
 

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