SHADOW KING
Supreme
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lovely update .sabne apni apni paheliya hal kar di .shefali ne Casper se mulakat bhi kar li .Sabse majedar scene hathi wala laga jab hathi gurutva karshan ke bina tairna ke maje le raha tha aur christi ko apne sundh se bacha liya .#212.
चैपटर-14
माया जाल: (तिलिस्मा 5.52)
धनवंतरी की औषधि प्राप्त करने के लिये शैफाली ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गई। शैफाली के निकलते ही ऊर्जा द्वार स्वतः ही बंद हो गया। शैफाली ने एक बार पलटकर पीछे देखा और फिर आगे की ओर चल दी।
शैफाली को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि कोई उसके साथ है या नहीं ...उसे तो बस जल्दी से जल्दी इस पूरे तिलिस्म को तोड़कर कैस्पर से मिलना था।
वैसे कैस्पर के लिये शैफाली ने बहुत सूझ-बूझ के साथ एक पहेली इंद्राक्ष के माध्यम से भिजवा दी थी। उसे पूरा विश्वास था कि कैस्पर उस पहेली को अवश्य हल कर लेगा और उसमें छिपे सार को भी समझ जायेगा।
अब शैफाली ने उस स्थान पर एक नजर मारी। चारो ओर बस बर्फ ही बर्फ नजर आ रही थी। दूरदूर तक और कुछ नहीं था। इस बर्फ के अपार सागर में शैफाली को धनवंतरी की बताई हुई आग को ढूंढकर उनके पास ले जाना था।
शैफाली बर्फ पर चलती हुई आगे बढ़ने लगी। कुछ आगे जाने पर शैफाली को एक साफ पानी की झील दिखाई दी।
शैफाली ने झील के पानी को अपने हाथों में उठाकर देखा। वह जल इतना स्वच्छ था, कि उसे अंजुली में भरने के बाद भी शैफाली के हाथ की रेखाएं बिल्कुल साफ नजर आ रही थीं।
"इस तिलिस्म में हमेशा झील के अंदर कुछ ना कुछ रहा है, मुझे झील के अंदर उतरकर एक बार देख लेना चाहिये।" यह सोच शैफाली उस झील में उतर गई।
शैफाली को हर बार की तरह इस बार भी किसी भी ठंडक को अहसास नहीं हो रहा था। झील में नन्हीं-नन्हीं लाल रंग की मछलियां तैर रहीं थीं। अब शैफाली झील की तली की ओर चल दी।
झील की तली में कुछ पत्थरों और जलीय पौधों के सिवा कुछ भी नहीं था। धीरे-धीरे शैफाली ने पूरी झील को ठीक ढंग से देख लिया, पर शैफाली को वहां कुछ भी नहीं मिला।
“लगता है इस बार कैश्वर ने झील में कुछ नहीं रखा है? मुझे झील के बाहर ही चलकर कुछ ढूंढने की कोशिश करनी होगी?” यह सोच शैफाली वापस झील की तली की ओर चल दी।
तली अभी कुछ दूर थी कि तभी एक लाल रंग की मछली, शैफाली के चेहरे के आगे आकर नाचने लगी।
यह देख शैफाली उस स्थान पर रुक गई और ध्यान से उस लाल रंग की मछली को देखने लगी।
तभी अचानक वह लाल मछली बहुत ही विशाल हो गई और इससे पहले कि शैफाली कुछ समझ पाती, उस मछली ने शैफाली को अपने मुंह में भर लिया और झील में एक दिशा की ओर चल दी।
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उधर जेनिथ भी ऊर्जा द्वार को पार कर एक ऐसे स्थान पर आ पहुंची, जहां एक विशाल मैदान में एक मंदर बना हुआ था।
जेनिथ सधे कदमों से उस मंदिर की ओर बढ़ गई। दूर से देखने पर ही वह मंदर एक श..व मंदर की भांति प्रतीत हो रहा था।
उस मंदर के बाहर नंमदी की एक विशाल प्रतिमा लगी थी। जेनिथ को अब हिं.. धर्म के बारे मे काफी कुछ जानकारी हो गई थी, इसलिये उसने नंमदी के पैर को स्पर्श कर अपने माथे से लगाया और फिर अपने जूते उतारकर मंदर के अंदर पहुंच गई।
मंदर के अंदर एक विशाल मंडप बना था, जिसमें बीच में एक शव..लग उपस्थित था। उसे देखकर साफ पता चल रहा था कि अभी कुछ देर पहले ही वहां से कोई पूजा करके गया है क्यों कि शि..ग पर अक्षत, पुष्प, दूध और चंदन चढ़ा हुआ था।
जेनिथ ने अपने सिर को उससे सटाकर दंडवत प्रणाम किया। अब जेनिथ की निगाहें मंदर में चारो ओर घूमने लगी।
पर उस जगह में ऐसा कुछ विशेष नहीं था? जिससे जेनिथ को कुछ अजीब लगता। कुछ देर सोचने के बाद जेनिथ वापस बाहर की ओर चल दी। तभी जेनिथ को अपने पीछे किसी के चलने का अहसास हुआ।
जेनिथ ने पलटकर पीछे की ओर देखा। जेनिथ को अपने पीछे जमीन पर गिरा हुआ वही फूल दिखाई दिया, जिसे कि जेनिथ ने अभी शि…ग पर चढ़ा हुआ देखा था।
“यह क्या ये फूल इधर कैसे आ गया? ये तो चढ़ा हुआ था।"
तभी जेनिथ को धनवंतरी की पहेली के शब्द याद आ गये, जिसमें त्रिशूल और फूल दोनों का ही ज़िक्र किया गया था। अब जेनिथ ने झुककर उस फूल को उठाने की कोशिश की, पर जैसे ही जेनिथ का हाथ उस फूल तक पहुंचा, वह फूल जेनिथ के हाथ से स्वतः ही दूर खिसक गया।
यह देख जेनिथ आश्चर्य से उस फूल को देखने लगी। पर फूल में किसी प्रकार का कोई मूवमेंट ना देख जेनिथ ने एक बार फिर से उस फूल को उठाने की कोशिश की। पर पिछली बार की तरह इस बार भी फूल आगे बढ़कर जेनिथ से दूर चला गया।
अब जेनिथ ने अपने चारो ओर देखा, पर उसे कोई नजर नहीं आया। इस बार जेनिथ सावधानी से फूल को पकड़ने के लिये आगे बढ़ने लगी, तभी वह फूल हवा में उड़कर त्रिशूल के ऊपर नाचने लगा।
अब जेनिथ को पूरा विश्वास हो गया था कि यह फूल ही धनवंतरी ने लाने को कहा था। वह अब धीरे-धीरे त्रिशूल की ओर बढ़ने लगी।
तभी जेनिथ को फूल के ऊपर, हवा में नाच रहा एक ऊर्जा का द्वार बनता दिखाई दिया, जो कि फूल से काफी ऊंचाई पर था।
इस बार जेनिथ ने झपटकर फूल को पकड़ लिया। फूल अब जेनिथ के हाथ में था। तभी जेनिथ की नजर अपने ऊपर आकर नाच रहे उस ऊर्जा द्वार की ओर गई।
“यह क्या? यह ऊर्जा द्वार तो अभी त्रिशूल के ऊपर था, फिर यह मेरे सिर के ऊपर कैसे आ गया?...कहीं ऐसा इस फूल की वजह से तो नहीं हुआ है?" जेनिथ ने अपने हाथ में पकड़े फूल को ध्यान से देखते हुए सोचा।
उस फूल का रंग बिल्कुल सफेद था और उस फूल की हर पंखुड़ी पर एक त्रिशूल जैसी आकृति बनी थी।
जेनिथ अभी ध्यान से उस फूल को देख ही रही थी कि तभी वह फूल जेनिथ के हाथ से उछलकर ऊपर स्थित ऊर्जा द्वार की ओर चल दिया।
जेनिथ ने उछलकर उस फूल को पकड़ने की कोशिश की, पर जेनिथ के उछलते ही वह स्वयं भी उस ऊर्जा द्वार में समा गई। ऊर्जा द्वार में तीव्र प्रकाश था, जिसकी वजह से जेनिथ की आँख बंद हो गई।
जेनिथ ने जब अपनी आँखें खोलीं, तो वह एक बहुत बड़े से फूलों के उद्यान में खड़ी थी। उसके आसपास हजारों की संख्या में वही फूल लगे दिखाई दे रहे थे, जो कि अभी जेनिथ को लेकर यहां आया था।
जेनिथ ने ऊपर आसमान की ओर देखा, रात अभी खत्म हो रही थी, और चारो ओर भोर का उजाला फैलने लगा था।
“हे भगवान, वह फूल तो इन फूलों के बीच कहीं गायब हो गया। अब मैं इतने फूलों के मध्य उस फूल की पहचान कैसे कर पाऊंगी?"
जेनिथ अब उस उद्यान में इधर-उधर घूमकर सभी फूलों को देखने लगी, पर सभी फूल जेनिथ को एक समान ही दिख रहे थे।
अब जेनिथ फिर से धनवंतरी की पहेली की पंक्तियों को याद करने लगी।
“पहेली में कहा गया था कि चंद्रकिरण से जन्मे, एक सहस्त्र फूल...यानि कि ये सभी फूल चंद्रमा की रोशनी में जन्म लिये हैं...पहेली की अगली पंक्तियां....थीं कि धनवंतरी को नवनिर्मित फूल चाहिये...यानि कि जो फूल सबसे आखिर में खिला होगा, वही नवनिर्मित होगा?" अब जेनिथ सभी फूलों को फिर से ध्यान से देखने लगी।
लगभग 2 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद जेनिथ की नजर एक फूल पर जाकर टिक गई। अब उसके चेहरे पर मुस्कुराहट दिखाई देने लगी।
“यही है वह नवनिर्मित यानि कि सबसे आखिर में खिला फूल क्यों कि....क्यों कि बाकी सभी फूलों पर ओस गिरी हुई है, बस इसी फूल पर ओस की एक भी बूंद नहीं है। यानि कि अगर यह रात में खिला होता, तो इस फूल पर भी ओस की बूंदें होतीं, जबकि ऐसा नहीं है है।" यह सोचकर जेनिथ ने उस फूल को तोड़ लिया।
जेनिथ के फूल तोड़ते ही एक जोर का रोशनी का झमाका हुआ और अब जेनिथ वह फूल अपने हाथ में लिये धनवंतरी के सामने खड़ी थी।
जेनिथ ने धनवंतरी के पास उस फूल को रखा और उनके हाथ में पकड़ी औषधि को ले लिया।
इस बार औषधि गायब नहीं हुई और जेनिथ के हाथ में आ गई। उस औषधि को जैसे ही जेनिथ ने खाया, धनवंतरी के हाथ में उसी के समान दूसरी औषधि नजर आने लगी।
अब जेनिथ उस गुफा के द्वार तक पहुंच गई, जिसमें आयुर्वेद के अध्याय रखें थे। जेनिथ तीसरी गुफा में प्रवेश कर गई।
तीसरी गुफा में चारो ओर जहरीली गैस फैली थी, परंतु जेनिथ के औषधि खाने की वजह से उस गैस ने जेनिथ के शरीर को किसी भी प्रकार से हीं नुकसान नहीं पहुंचाया।
इस प्रकार जेनिथ चलते हुए उस गुफा के अंत तक पहुंच गई। गुफा के अंत में एक पत्थर पर आयुर्वेद का तीसरा अध्याय रखा था, जेनिथ ने उस किताब को उठाया और गुफा से लाकर धनवंतरी के सामने रखे तीसरे पत्थर पर रख दिया।
“बधाई हो जेनिथ, तुमने अपना कार्य सबसे पहले पूर्ण कर लिया।” नक्षत्रा ने कहा- “अब आराम से बैठकर बाकी लोगों के आने का इंतजार करो।“ नक्षत्रा की बात सुन जेनिथ वहीं पर आराम से बैठ गई।
उधर सुयश अब भी हवा में तैर रहे पत्थर पर बैठा, वहां से निकलने का कोई उपाय सोच रहा था। तभी सुयश को अपने हाथ में पकड़ी उस ऊँट की मूर्ति का ध्यान आया, जो कि उसे रेत में दबी मिली थी।
सुयश उलट-पलट कर उस ऊँट की मूर्ति को देखने लगा। तभी सुयश का हाथ उस मूर्ति के पेट में लगे एक बटन से टच हुआ। अब सुयश ध्यान से उस बटन को देखने लगा, पर कुछ देर तक देखते रहने के बाद भी सुयश को उस बटन का कुछ कार्य समझ नहीं आया।
अब सुयश ने बटन को धीरे से दबा दिया। बटन के दबते ही ऊँट की पीठ से 2 पंख निकलने लगे। सुयश आश्चर्य से उन निकलते हुए पंखों को देखने लगा।
वह सोच भी नहीं सकता था कि ऊँट के पंख भी निकल सकते हैं, पर यही तो कैश्वर का जादू था, वही ऐसी ही चीजों का निर्माण करता था, जिसके बारे में कोई सोच भी ना पाये।
उधर जैसे ही ऊँट के पूरे पंख निकले, वह ऊँट जीवित हो गया और सुयश के हाथ से निकलकर हवा में उड़ने लगा।
अब उस ऊँट का आकार भी बढ़ता जा रहा था। कुछ ही देर में उस जादुई ऊँट का आकार सामान्य ऊँट के बराबर हो गया।
ऊँट अब सुयश के आसपास हवा में चक्कर लगा रहा था। अब सुयश को कुछ सोचने की जरुरत नहीं थी, वह तुरंत छलांग लगाकर ऊँट की पीठ पर बैठ गया।
ऊँट तो जैसे सुयश के बैठने का ही इंतजार कर रहा था, सुयश के बैठते ही ऊँट उस गड्ढे के दूसरी दिशा की ओर चल दिया, जिधर से रोशनी आती दिखाई दे रही थी।
वह रोशनी एक छेद से आ रही थी। सुयश कुछ देर तक उस छेद को देखता रहा और फिर उसने उस छेद में अपना हाथ डाल दिया।
सुयश को छेद के अंदर कोई रत्न सा महसूस हुआ। सुयश ने उस रत्न को छेद से निकाल लिया। वह एक सफेद रंग का चमचमाता हीरा था, जिससे तेज रोशनी निकल रही थी।
सुयश उस हीरे को लेकर पलटा। वह ऊँट अभी भी सुयश के पीछे जमीन पर खड़ा था। तभी सुयश की नजर उस तेज प्रकाश में ऊँट की परछाई पर पड़ी, जिसे देख वह खुश हो गया।
“यही तो मांगा था देवता धनवंतरी ने....श्वेत प्रकाश में किसी जीव की छाया का होना।” यह सोच सुयश ने अपने आसपास देखा, अब उसे कुछ दूरी पर एक ऊर्जा द्वार दिखाई देने लगा था।
सुयश ने आगे बढ़कर उस ऊँट का बटन दबाकर उसे फिर से पहले के समान कर दिया और उस ऊँट व हीरे को उठाकर ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गया।
वह ऊर्जा द्वार धनवंतरी के पास में ही निकला, जहां जेनिथ एक किनारे बैठकर सभी के आने का इंतजार कर रही थी। सुयश को आता देख जेनिथ खुश हो गई।
“अरे तुम तो सबसे पहले ही आ गई।” सुयश ने जेनिथ को देखते हुए कहा।
जेनिथ ने जल्दी-जल्दी अपनी पूरी कहानी सुयश को सुना दी। जेनिथ की कहानी सुन सुयश ने भी उस ऊँट व हीरे को धनवंतरी के सामने रखा और औषधि को लेकर, गुफा से आयुर्वेद का पहला अध्याय लाकर, धनवंतरी के सामने रख दिया।
अब वह भी जेनिथ के बगल में बैठकर बाकी लोगों के आने का इंतजार करने लगा।
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क्रिस्टी अभी भी गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से हवा में झूल रही थी। उसे ऐसे ही झूलते हुए 2 घंटे बीत चुके थे।
तभी क्रिस्टी को हवा में घूमता हुआ कोई और जीव भी दिखाई दिया, जो कि उसकी ही तरह उस गुरुत्वाकर्षण के जाल में फंसा हुआ था। वह जीव तेजी से अपने पैर चलाने की वजह से हवा में घूम रहा था।
क्रिस्टी अब चाँद की रोशनी में उस जीव को अपनी ओर आते देख रही थी, जब वह जीव थोड़ा और पास आ गया, तो क्रिस्टी को पता चला कि वह एक हाथी था।
किसी हाथी को बिना गुरुत्वाकर्षण के हवा में उड़ते देखना अपने आप में एक अनोखा अनुभव था, इत्तेफाक से यह दुर्लभ दृश्य इस समय क्रिस्टी की आँखों के सामने था।
अब उस हाथी की नजर भी क्रिस्टी पर पड़ चुकी थी, वह अपने हाथ पैरों के तेजी से हिलाकर क्रिस्टी के पास आने की कोशिश करने लगा।
हाथी धीरे-धीरे हवा में तैरता हुआ क्रिस्टी के पीछे आ गया। तभी क्रिस्टी के दिमाग में एक आइडिया आया, उसने अपने पैरों को सिकोड़कर हाथी के शरीर से छुआ दिया।
कुछ सेकेण्ड तक अपने शरीर का बैलेंस बनाने के बाद क्रिस्टी ने अपने पैरों को फिर से पूर्ववत करते हुए अपने शरीर को गति प्रदान की।
अब क्रिस्टी का शरीर हवा में लहराता हुआ, गुरुत्वाकर्षण वाले क्षेत्र से बाहर आ गया।
बाहर गिरते ही क्रिस्टी तुरंत आगे भागकर गुरुत्वाकर्षण के क्षेत्र से थोड़ा दूर हो गई। बाहर आकर क्रिस्टी ने राहत की साँस ली।
तभी क्रिस्टी की नजर उस हाथी पर गई, जो अब भी हवा में नाचता हुआ, क्रिस्टी को ही देख रहा था।
क्रिस्टी की निगाह अब नीचे जमीन की ओर गई, तो क्रिस्टी को जमीन पर एक चाँदी के रंग का गोला बना दिखाई दिया। उस गोले को देख क्रिस्टी को समझते देर नहीं लगी, कि यह चाँदी के गोले वाला क्षेत्र ही गुरुत्वाकर्षण वाला क्षेत्र है।
अब क्रिस्टी ने अपने पीठ पर लदे बैग से एक छोटी सी रस्सी निकाली और उसे हाथी की ओर फेंका।
रस्सी हवा में लहराते हुए हाथी के पास पहुंच गई। रस्सी को देख हाथी ने अपनी सूंढ़ से उस रस्सी को पकड़ लिया।
चूंकि गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में किसी का भार मायने नहीं रखता, इसलिये क्रिस्टी ने आसानी से उस हाथी को खींचकर बाहर निकाल दिया।
हाथी ने एक बार क्रिस्टी को ध्यान से देखा और फिर गुस्सा होकर, वापस उस गुरुत्वाकर्षण के क्षेत्र में घुस गया। हाथी एक बार फिर हवा में उड़ने का आनंद उठा रहा था।
हाथी को इस प्रकार करते देख पहले तो क्रिस्टी को बहुत गुस्सा आया, पर उसे गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में आनंद उठाते देख क्रिस्टी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। वह समझ गई कि हाथी उस क्षेत्र में परेशान नहीं था, बल्कि अपने उड़ने का आनंद उठा रहा था।
क्रिस्टी ने धीरे से अपने सिर को झटका और वापस चाँद की ओर देखने लगी।
तभी फिर क्रिस्टी को टूटते हुए तारे दिखाई दिये। इस बार क्रिस्टी ने उन तारों के स्रोत का पता लगा लिया। वह सभी तारे, एक बड़े से पेड़ से निकल रहे थे।
परंतु उस पेड़ का आकार देख क्रिस्टी हैरान हो गई क्यों कि उस पेड़ का आकार बिल्कुल किसी बिच्छू के समान था।
यह देख क्रिस्टी को पहेली की पंक्तियां याद आ गईं, जिसमें बिच्छू के डंक का भी वर्णन था। अब क्रिस्टी उस पेड़ की ओर चल दी।
पेड़ के पास पहुंचने पर क्रिस्टी ने देखा कि उस पेड़ पर कुछ चमकीले फल लगे हुए हैं और वह बिच्छू जैसा पेड़, अपनी डंक जैसी एक डाल से, अपने ही पेड़ के फल को तोड़कर, आसमान की ओर उछाल रहा है। वही चमकते फल आसमान में टूटते तारे के समान प्रतीत हो रहे थे।
यह दृश्य देखकर क्रिस्टी के दिमाग में एक खतरनाक प्लान आया, उसे नहीं पता था कि ये प्लान सही है भी या नहीं, पर उसने अब कुछ करने को सोच लिया था।
अब क्रिस्टी धीरे से आगे बढ़कर, उस बिच्छू रुपी पेड़ पर चढ़ने लगी। कुछ ही देर में वह पेड़ की सबसे ऊंची वाली डाल पर पहुंच गई। अब क्रिस्टी ने अपने पास लगा एक चमकीले फल को पकड़ लिया।
कुछ ही देर के इंतजार के बाद, पेड़ की डंक रुपी डाल क्रिस्टी की ओर बढ़ी और उसने वो फल सहित क्रिस्टी को आसमान की ओर उछाल दिया।
बिना किसी सहारे के आसमान में इतनी ऊपर तक आने से, एक बार तो क्रिस्टी थोड़ी डर सी गई, फिर उसने अपने शरीर का बैंलेंस आसमान में भी बना लिया।
अब क्रिस्टी का शरीर चाँद के भी ऊपर था। क्रिस्टी की यह छलांग विश्व की शायद सबसे अनोखी छलांग रही होगी।
अधिकतम ऊंचाई तक पहुंचने के बाद, क्रिस्टी का शरीर नीचे की ओर आने लगा।
क्रिस्टी का शरीर अब चाँद से कुछ दूरी पर था, क्रिस्टी अपने शरीर को गोल-गोल घुमाकर चाँद के पास पहुंच गई। क्रिस्टी ने अपना हाथ बढ़ाकर उस 4 फुट के चाँद को आसमान से तोड़ लिया।
अब क्रिस्टी का शरीर तेजी से नीचे आने लगा। क्रिस्टी ने यह सोच रखा था कि उसका शरीर जैसे ही नीचे आयेगा, वह गुरुत्वाकर्षण वाले क्षेत्र की वजह से, हवा में रुक जायेगी, परंतु यहां पर क्रिस्टी की सोच गलत साबित हो गई।
क्यों कि उस क्षेत्र का गुरुत्वाकर्षण चाँद की वजह से ही था और चाँद तो अब क्रिस्टी ने ही तोड़ लिया था, इसलिये उस क्षेत्र का गुरुत्वाकर्षण अब समाप्त हो गया था। अब यह बात क्रिस्टी को भी समझ में आ गई थी, क्यों कि उसका शरीर चाँद को पकड़े हुए अनवरत गिरता ही जा रहा था।
तेजी से नीचे गिर रही क्रिस्टी को अब जमीन साफ दिखाई देने लगी थी। डर की वजह से क्रिस्टी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
तभी क्रिस्टी को अपना शरीर हवा में झूलता महसूस हुआ। ऐसा महसूस होते ही क्रिस्टी ने झट से अपनी आँखें खोल दीं।
इस समय क्रिस्टी का शरीर उसी हाथी की सूंढ़ में झूल रहा था। हाथी ने अब क्रिस्टी के शरीर को जमीन पर रख दिया, और उसे घूरने लगा।
खुशी की अधिकता से क्रिस्टी ने हाथी की सूंढ़ पर कई सारी पप्पियां दे दीं। क्रिस्टी को अपने बचने पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। वह हाथी उसे किसी भगवान के समान प्रतीत हो रहा था।
कुछ देर के बाद क्रिस्टी ने अपने भावों को नियंत्रित किया और इधर-उधर देखा।
अब क्रिस्टी को अपने सामने कुछ दूरी पर एक ऊर्जा द्वार दिखाई दिया। क्रिस्टी उस ऊर्जा द्वार की ओर बढ़ गई।
ऊर्जा द्वार में प्रवेश करने के पहले क्रिस्टी ने पलटकर एक बार हाथी को देखा और फिर उसे एक फ्लाइंग किस दे वह द्वार में प्रवेश कर गई।
वह द्वार भी धनवंतरी के पास खुला।
क्रिस्टी ने भी अपनी कहानी सुयश और जेनिथ को सुनाकर, धनवंतरी से औषधि ले, आयुर्वेद का चतुर्थ अध्याय लाकर, उसके स्थान पर रख दिया।
अब सभी को सिर्फ और सिर्फ शैफाली का इंतजार था।
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उधर शैफाली को मुंह में भरकर, वह लाल मछली झील के पानी में तैरती हुई आगे बढ़ती जा रही थी।
तभी झील में एक स्थान पर एक ऊर्जा द्वार दिखाई दिया। वह लाल मछली उस ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गई।
वह ऊर्जा द्वार एक कमरे में निकल रहा था, जहां पर ज्यादा रोशनी नहीं थी। उस कमरे में जरा सा भी पानी नहीं था।
कमरे में पहुंचकर मछली ने शैफाली को वहीं जमीन पर गिरा दिया और फिर से आकार में छोटी हो, उस कमरे में मौजूद एक काँच के जार में घुस गई।
काँच का जार पानी से भरा हुआ था। अब उस मछली को देख कोई नहीं कह सकता था कि यही मछली अभी कुछ देर पहले इतनी विशाल थी।
उधर जमीन पर गिरते ही शैफाली ने कमरे में चारो ओर देखा, एक स्थान पर अंधेरे में उसे कोई खड़ा दिखाई दिया। शैफाली दौड़कर उस व्यक्ति से लिपट गई।
उसके मुंह से सिर्फ एक ही शब्द निकला-“कैस्पर!!!!"
अब वह व्यक्ति धीरे से पलटा। वह सच में कैस्पर ही था, जिसका पूरा चेहरा आँसुओं से भरा था। वह अब शैफाली के माथे को लगातार चूमे जा रहा था। दोनों एक दूसरे के गले लगे ना जाने कितनी देर तक ऐसे ही रोते रहे।
"कोई इस तरह से जाता है क्या? वो भी बिना बताए।” कैस्पर ने शैफाली को देखते हुए कहा- “कम से कम इतना तो बता देती कि लौटकर कब आओगी?"
“इतना समय ही नहीं मिला कि तुम्हें सब कुछ बता पाती। पंचशूल ने मेरे शरीर को पूरी तरह से जला दिया था, उस जले शरीर के साथ ही मुझे बहुत से कार्य करने पड़े।” शैफाली ने अब कैस्पर से अलग होते हुए कहा “पर ये बताओ कि तुम मेरे मायावन में आने के बाद भी अभी तक मुझसे मिले क्यों नहीं?"
“मैं काफी दिनों से श्वेत महल में था, इसलिये मुझे तुम्हारे आने का पता ही नहीं चला, वो तो जब इंद्राक्ष ने तुम्हारी दी हुई पहेली मुझे बताई, तो मुझे तुम्हारे बारे में पता चला।” कैस्पर ने कहा।
“पहेली समझ में आ गई थी?" शैफाली ने कैस्पर को देखते हुए पूछा।
“तुमने क्या अभी तक मुझे बुद्धू समझ रखा है। कैस्पर ने शैफाली को देखते हुए कहा- “तुमने उस पहेली में सप्तअश्वों का ज़िक्र किया था। मैं समझ गया कि सप्तअश्वों के माध्यम से तुम तिलिस्मा के 7 द्वारों की बात कर रही हो, फिर तुमने त्रिशूल के बारे में कहा, जो कि महानदेव की शक्तियों के बारे में था। फिर तुमने बताया कि जिस समय की खिड़की से इंद्राक्ष बाहर निकला था, उसी समय की खिड़की से, मैं पांचवे द्वार के अंत में तुमसे आकर मिल सकता हूं।” बस इतना ही तो था, उस पहेली में। फिर क्या था मैंने देव की शक्तियों से उस समय की खिड़की का पता किया और फिर तुमसे मिलने आ गया।
“अरे वाह! मेरा कैस्पर तो सच में बहुत समझदार हो गया है।” शैफाली ने मुस्कुराते हुए कहा।
“अच्छा, अब समय ना बेकार करते हुए जल्दी जल्दी अपनी कहानी मुझे सुना दो। इससे पहले कि कैश्वर को मेरे बारे में पता चले, मैं यहां से निकल जाना चाहता हूं। नहीं तो कैश्वर मेरे नियम तोड़ने का हवाला देकर तुम सभी को तिलिस्म में फंसा देगा।” कैस्पर ने कहा।
कैस्पर की बात सुनकर शैफाली ने जल्दी-जल्दी अपनी पूरी कहानी कैस्पर को सुना दी। शैफाली की पूरी कहानी सुनने के बाद कैस्पर भी अपने कुछ प्लान शैफाली को बताने लगा।
कैस्पर के प्लान सुनकर शैफाली की आँखों की चमक बढ़ती जा रही थी। शैफाली को इस स्थान पर लगभग 1 घंटे बीत गये। अब कैस्पर सबकुछ शैफाली को समझा चुका था।
"तो फिर अब मैं निकलता हूं यहां से, तुम जल्दी से इस तिलिस्म को तोड़ो, तिलिस्मा के बाहर तुम्हारे निकलने का इंतजार कर रहा हूं।” कैस्पर ने कहा।
शैफाली ने धीरे से अपना सिर हिलाया और एक बार फिर कैस्पर के गले लगकर उसे विदा किया।
शैफाली के अलग होते ही काँच के जार में घूम रही लाल मछली फिर जार से बाहर निकली और हवा में आकर बड़ी हो गई।
शैफाली को मछली ने अपने मुंह में भरा और उस ऊर्जा द्वार से बाहर निकल गई। शैफाली के बाहर निकलते ही ऊर्जा द्वार कहीं गायब हो गया।
उस लाल मछली ने शैफाली को उसी स्थान पर छोड़ दिया, जहां से वह उसे लाई थी और फिर घूमकर झील में कहीं गायब हो गई।
शैफाली अब झील से निकलकर बाहर आ गई। अब उसका ध्यान पूरी तरह से अपने कार्य पर था।
शैफाली अब बर्फ में सभी ओर देखते हुए आगे बढ़ रही थी। तभी उसे एक जगह बर्फ पर बैठा हुआ एक साइबेरियन पक्षी दिखाई दिया, जो बर्फ में चोंच मारकर, कुछ निकालने की कोशिश कर रहा था।
शैफाली उस स्थान की ओर आगे बढ़ गई। शैफाली को अपनी ओर आता देख वह साइबेरियन पक्षी डर कर उड़ गया।
शैफाली को उस स्थान पर बर्फ से कुछ निकला हुआ दिखाई दिया। शैफाली ने उस स्थान की बर्फ को अपने हाथों से साफ किया। अब उसके सामने एक चमड़े का बैग दिख रहा था।
बर्फ में चमड़े का बैग देखकर शैफाली ने उस बैग को खोल लिया। उस बैग में एक लकड़ी से बनी पानी की बोतल थी। जो काफी चिकनी दिख रही थी।
"इस बोतल को कैश्वर ने यहां क्यों छिपा कर रखा है? कुछ ना कुछ तो अवश्य है इस बोतल में?" यह सोच शैफाली ने बोतल के अंदर झांका, पर बोतल के अंदर भी कुछ नहीं था।
तभी शैफाली की नजर बोतल के ढक्कन पर पड़ी, जो कि काफी चिकना और एक ओर को उभरा हुआ था।
"इस बोतल का ढक्कन तो बिल्कुल उत्तल लेंस की तरह दिख रहा है। एक बार अलबर्ट अंकल ने भी तो अपने चश्में से आग लगाई थी, तो फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि इस बोतल के ढक्कन की सहायता से आग लगाई जा सकती हो? पर आग लगाना किस चीज में है, यहां तो कोई सूखी लकड़ी भी नहीं होगी?" .....तभी शैफाली की नजर अपने हाथ में थमी बोतल की ओर गई- “अरे, कहीं इस बोतल को ही तो नहीं जलाना है? क्यों कि इस पूरे स्थान पर एकमात्र यह बोतल ही सूखी लकड़ी से बना है...और...और तभी तो इसे चमड़े के बैग में रखकर बर्फ में छिपाया गया था, जिससे इस पर नमी का कोई असर ना हो?"
यह सोचते ही शैफाली ने पुनः उस लकड़ी की बोतल को चमड़े के बैग में डाल लिया, पर उस बोतल का ढक्कन अब भी शैफाली के हाथ में था। शैफाली ने बोतल के ढक्कन को सूर्य की रोशनी में रखा, पर काफी देर के बाद भी उस ढक्कन से कुछ नहीं हुआ।
“अरे...ये तो मैंने ध्यान ही नहीं दिया कि बोतल का ढक्कन तो पारदर्शी ही नहीं है, ऐसे में यह सूर्य की किरणों को आगे ही नहीं भेज पायेगा।" अब शैफाली फिर से पहेली की पंक्तियों को याद करने लगी।
"उन पंक्तियों में बताया गया था कि बर्फ में किसी प्रकार का दाग नहीं होता, मतलब यह स्वच्छ पानी से बना होता है पर सबसे स्वच्छ पानी तो झील का ही है कहीं...कहीं इस झील के पानी का प्रयोग करके तो आग नहीं बनाना?"
यह सोच शैफाली ने एक बार फिर ध्यान से ढक्कन को देखा। अब उसके चेहरे पर मुस्कुराहट दिखाई देने लगी थी। अब शैफाली, बोतल के ढक्कन को लेकर झील के पास पहुंच गई।
शैफाली ने अब झील का स्वच्छ जल ढक्कन में भर दिया और उसे छाया में जमीन पर रखकर, एक बड़े से पत्थर के टुकड़े से उस ढक्कन को ढक दिया।
अब शैफाली उस ढक्कन के चारो ओर बहुत सी बर्फ रखकर, ढक्कन को बर्फ में पूरी तरह दबा दिया।
लगभग आधे घंटे के बाद शैफाली ने सभी चीजों को हटाकर, बोतल के ढक्कन को निकाल लिया।
बोतल के ढक्कन में अब झील का पानी बर्फ में बदल गया था। शैफाली ने अब ढक्कन को ऊपर से अपनी हथेली से रगड़ना शुरु कर दिया।
कुछ ही देर हथेली की गर्मी से ढक्कन की बर्फ निकलकर बाहर आ गई, परंतु अब वह देखने में किसी उत्तल लेंस की भांति लग रही थी, जो कि आगे से थोड़ा उभार लिये हुई थी।
शैफाली ने अब उस बर्फ से बने लेंस को, रगड़-रगड़ कर, बिल्कुल चिकना बना दिया। अब वह बिल्कुल एक पारदर्शी लेंस बन गया था, जिस पर किसी भी प्रकार का कोई दाग नहीं था।
शैफाली ने अब लकड़ी की बोतल को वापस बाहर निकाल लिया और उसे धूप में रख दिया। अब शैफाली ने अपने हाथ में थमे लेंस को इस प्रकार हाथ में ले लिया कि उस पर सीधी धूप पड़े।
लेंस अगर पारदर्शी नहीं होता, तो वह पहले स्वयं ही धूप में पिघल जाता, पर पारदर्शी होने के कारण, उस लेंस पर धूप का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। लेंस ने अब सूर्य की किरणों को एक स्थान पर संकेन्द्रित करना शुरु कर दिया।
लगभग 15 मिनट की अपार मेहनत के पश्चात् शैफाली ने आखिर उस लकड़ी बोतल को जला ही दिया।
जैसे ही लकड़ी की बोतल ने आग पकड़ी, शैफाली के सामने एक ऊर्जा द्वार दिखाई देने लगा।
शैफाली उस जलती हुई बोतल को वैसे ही पकड़कर उस ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गई। शैफाली को भी सकुशल आता देख सभी के चेहरे पर मुस्कान झलक उठी।
शैफाली ने भी सभी की भांति आयुर्वेद का दूसरा अध्याय लाकर धनवंतरी के सामने रख दिया।
जैसे ही शैफाली ने दूसरा अध्याय अपने सामने रखा, धनवंतरी की मूर्ति सहित वहां रखी सभी चीजें गायब हो गईं।
अब उस स्थान पर अगला द्वार नजर आने लगा था, जिस पर लिखा था- “तिलिस्मा भाग-6
लेकिन उस द्वार में प्रवेश करने के पहले ही सभी शैफाली से कहानी सुनने लगे। शैफाली ने कैस्पर की बातों को छोड़ सभी कुछ उन लोगों को ज्यों का त्यों बता दिया।
शैफाली की कहानी सुनकर सभी तिलिस्मा के छठे द्वार की ओर चल दिये।
पर इस समय शैफाली के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान थी, एक ऐसी मुस्कान जिसमें सदियों के मिलन की खुशबू भी थी और अपने कार्य को पूरा करने का दृढ़ विश्वास भी।
जारी रहेगा_____![]()


