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Adultery सज्जनपुर की कहानी

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Arthur Morgan

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मित्रगण कहानी का नया अध्याय नंबर 22, पेज संख्या 43 पर पोस्ट कर दिया है। अच्छे से रिव्यू दें लाइक करें।
अपडेट जल्दी जल्दी दे रहा हूं पर रिव्यू नहीं आ रहे हैं उस अनुसार, थोड़ा सा समय लगाएं जिससे मेरी भी इच्छा हो आगे और जल्दी लिखने की।
।।बहुत बहुत धन्यवाद।।
 
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netsunil

मैं काग़ज़ बेरंग.. तू रंगरेज़ मेरे अल्फ़ाज़ों का
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nice story
 

Arthur Morgan

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ये सोच कर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई जिसे भुला कर वो बोला: अरे चाची चिंता मत करो बुरा वक्त सदा नहीं रहता, सब सही हो जाएगा।
हलवाइन: हो जाए तो भला लल्ला,
हलवाइन निराशा से बोली, कर्मा और सोनू समोसे खा कर बाहर निकले और कर्मा सोनू को देख कर मुस्कुरा के बोला: हलवाइन को चोदेगा?
सोनू उसकी बात पर हैरान हो गया और बोला: अरे ऐसे कैसे?
कर्मा: बस देखता जा।

अध्याय 18

कर्मा और सोनू बापिस हवेली की ओर बढ़ गए, सोनू थोड़ा सोच में था उसे पता था कि कर्मा के दिमाग में कोई न कोई योजना चल ही रही है, हवेली पहुंच कर जहां सोनू कुछ काम में लग गया तो कर्मा हवेली में अंदर चल गया।
इधर कम्मू के घर में चहल पहल थी आज दोनों लड़कियां यानी मंजू और अनामिका, साथ ही सुमन, झुमरी और बिंदिया ये सब बाज़ार गए थे, जतन, धीरज और कम्मू भी अनाज बेचने मंडी गए थे,
दूसरी ओर फूल सिंह खेत से लौट कर घर में घुसे थे आंगन में आने से पहले ही खांस कर अपने आने का संकेत देना फूल सिंह की आदत थी ताकि बहू आदि अपने आप को तैयार कर सकें। आकर आंगन में बैठे तो आंगन खाली था, वहीं पड़ी खाट पर बैठ गए,
फूल सिंह: अरे अंजू, अनामिका लाओ पानी वानी पिलादो भाई।
फूल सिंह ने आवाज़ लगाते हुए कहा,
कुछ पल बाद ही उनकी पत्नी कुसुम हल्की पसीने से नम बदन लिए हाथ में लोटा और गिलास लेकर आई।
कुसुम: लो पानी।
फूल सिंह: बच्चे नहीं दिख रहे कोई?
कुसुम: अरे सब के सब बाहर है आज, बस लल्ला (अजीत) सो रहे हैं।
फूल सिंह: बाहर कहां?
हाथ में गिलास पकड़ते हुए कहा,
कुसुम: अरे सुमन और लड़कियां बाजार गई हैं और लड़कों को तुमने ही मंडी भेजा है
फूल सिंह: अच्छा हां, अजीत ने खाना खा लिया?
कुसुम: हां खा पी कर सोए हैं, तुम्हारे लिए छाछ लाऊँ,
फूल सिंह: ले आओ।
कुसुम वहां से अंदर जाती है और कमरे के अंदर आते ही दरवाज़े के पीछे अचानक से उसे उसका देवर अजीत पकड़ लेता है, और तुरंत ही उसके होंठों से अपने होंठ मिला कर चूसने लगता है

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कुसुम उससे छूटने की कोशिश करती है पर अजीत की पकड़ मजबूत थी, पति कमरे के बाहर आंगन में बैठा था और वो अपने देवर के साथ कामलीला में लगी थी, इस परिस्थिति को सोच कर ही उसका बदन डर और एक पाप की वर्जित उत्तेजना से कांपने लगता है, यही वर्जित उत्तेजना अजीत को और उत्तेजित कर रही थी, अपने बड़े भाई के होते हुए उनकी पत्नी, अपनी भाभी के बदन को यूं भोगना, दोनों के बीच सिर्फ एक दीवार थी, कुछ पल बाद ही न चाह कर भी कुसुम भी अपने देवर का साथ दे रही थी, वहीं अजीत के हाथ कुसुम के बदन पर फिसलने लगे, उसकी कामुक भरी हुई कमर को मसल रहे थे,
अपनी पत्नी और भाई की हरकतों से बेखबर फूल सिंह बाहर बैठ कर ठंडे पानी से अपना गला तर कर रहे थे, वहीं उनका भाई उनकी पत्नी के गरम बदन का स्वाद लेकर अपनी प्यास बुझा रहा था,
कुछ पल बाद कुसुम को जैसे होश आया तो उसने अजीत को धकेल कर खुद से दूर कर दिया, और खुद तुरंत अंदर भाग गई, और कुछ पल बाद ही हाथ में लोटा लिए बाहर चली गई, अजीत किवाड़ के पीछे अब भी छुपा था,
फूल सिंह को छाछ देते हुए भी कुसुम के मन में अपने देवर के साथ बिताए हुए पल याद आ रहे थे वो जानती थी अगर अभी वो अंदर जाएगी, तो फिर से अजीत कुछ न कुछ ज़रूर करेगा और ये सोच कर ही उसका सीना ऊपर नीचे हो रहा था,
फूल सिंह: अजीत कब से सोया है?
कुसुम: यही कोई घंटे भर से,
कुसुम ने घबराते हुए कहा,
फूल सिंह: ठीक है फिर सोने दो।
कुसुम: तुम्हारे लिए खाना लगाऊँ?
फूल सिंह: खाना बाद में थोड़ा मट्ठा ले आओ नमक डाल कर।
कुसुम: अभी लाई।
कुसुम धीमे पैरों से अंदर बढ़ी उसे पता था कि उसका देवर कुछ न कुछ करेगा ही जो दरवाज़े के पीछे घात लगाए बैठा है, पर इस इसकी उत्सुकता उसे भी थी, ये रोमांच और डर का मिश्रित आभास उसे भी उत्तेजित कर रहा था, उसके सीने में धक धक हो रही थी, जैसे ही वो कमरे के अंदर प्रवेश करके आई अजीत ने उसे दबोच लिया और उसे घुमा कर दीवार से सटा दिया, और फिर खुद नीचे बैठकर उसकी नाभि और पेट को चाटने लगा, चूमने लगा,

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इस बार कुसुम को भी अंदाज़ था और उसने स्वयं को तैयार भी कर लिया था इसलिए वो भी अपने देवर की जीभ को अपने बदन पर महसूस कर मस्त होने लगी, मन में पति के होते हुए ये सब करने का डर और रोमांच उसे और उत्तेजित कर रहा था, वहीं अजीत तो अपनी भाभी के कामुक पेट के बीच में गहरे और मादकता से भरे नाभि रूपी कुएं में जीभ का गोता लगा कर अपनी प्यास बुझा रहा था,
कुसुम के मन में एक साथ ढेरों विचार चल रहे थे और फिर उसने हिम्मत जुटाते हुए अजीत को पीछे धकेल दिया और ख़ुद अंदर भाग गई। अजीत ने भी सोचा अधिक खतरा मोल लेना ठीक नहीं है इसलिए वो भी बाहर अपने बड़े भाई के साथ जा कर बैठ गया,

शाम हो गई थी और रजनी के घर जाने का समय हो गया था उसके मन में आज जो हुआ बस वही सब घूम रहा था उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो कैसे सोनू का सामना करे हवेली से बाहर निकलने से वो झिझक रही थी, वैसे रोज वो और सोनू एक साथ हवेली से जाते थे पर आज वो सोनू के सामने जाने से कतरा रही थी, उसने झांक कर देखा और सोनू को किसी काम में व्यस्त पाया तो निकल गई, अकेले ही और घर पहुंचने पर जब मनीषा ने सोनू के बारे में पूछा तो उसने बहाना बना दिया कि वो कुछ काम में लगा था निपटा कर आएगा, इधर सोनू ने देखा उसकी मां अभी तक बाहर नहीं आई तो उसने जाकर पूछा तो उसे पता चला वो तो चली गई सोनू को अजीब भी लगा पर कहीं न कहीं वो समझ रहा था अपनी मां की मनोदशा को भी, वो अकेले घर आया तो भी उसकी मां उसके सामने आने में और उससे नज़रें मिलाने में कतरा रही थी,

अंधेरा होने तक कम्मू के यहां भी पूरा परिवार आ चुका था सब लड़कियां और औरतें अपने नए नए कपड़े देखने और दिखाने में व्यस्त थी और बड़ी उत्सुकता से दिखा रही थी, सुमन अपने और अपनी जेठानी के लिए नई नई साड़ियां खरीद कर लाई थी, और दोनों ही पहन पहन कर देख रही थीं, कम्मू भी अपनी मां को नई साड़ी में छुप चुप कर देख रहा था, तभी एक साड़ी को देख सुमन के चेहरे के भाव बदल गए उसके बीच में छेद था,
सुमन: हाय दैय्या ये तो छेद है।
कुसुम: कहां दिखा तो,
सुमन ने कुसुम को दिखाया,
कुसुम: अरे सही में, तूने देखी नहीं थी क्या ठीक से,
सुमन: मैने तो देखी थी जीजी, पर तब दिखा ही नहीं।
कुसुम: बताओ नासपीटे ने फटी साड़ी दे दी।
सुमन: अब क्या होगा जीजी।
कम्मू: अरे इसमें होना क्या है कल जाकर बदल जाएगी।
सुमन: अरे लल्ला पर वो दुकान वाला किसी और को बदल कर नहीं देगा न। मुझे ही जाना पड़ेगा। क्योंकि मंजू अनामिका दूसरी दुकान पर थीं तब सूट ले रही थी।
कम्मू: तो कल चल लेना मां, मुझे भी बाल कटवाने जाना है तुम भी साथ चलना।
सुमन को अपने बेटे की बात सुन थोड़ी राहत मिली।

कुसुम: हां बन्नो यही सही रहेगा, तू और कम्मू चले जाना।

सुमन को इस बात से राहत थी कि उसकी साड़ी बदल जाएगी और कम्मू को मन ही मन खुशी थी कि वो अपनी मां के साथ अकेले शहर जाएगा। अगर पहले ये सब हुआ होता तो उसका मां के साथ शहर जाने के नाम से मुंह बन गया होता पर अभी उसके लिए सब कुछ बदल चुका था। खाने के बाद सबके सोने का समय हो चुका था और सब अपने बिस्तर की ओर बढ़ रहे थे, वहीं कम्मू के पिता अजीत दोपहर से ही अपनी भाभी के बदन के लिए तड़प रहे थे
 
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Arthur Morgan

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Abhi tak ki sari update padhi bhai bahut gajab ja rahi hai story isi tarah aage badhate raho, aapki writing ka to koi tod hi nahi hai, seedhe shabdo mein ful lustfull enviornment create kar dete ho aap, bahut hi gajab aise hi likhte raho..
बहुत बहुत आभार भाई, अब आपके फैसले के बाद मैं भी सोच में पड़ गया हूं मुझे लगता है मुझे भी आप ही की तरह एक ठोस क़दम उठाना होगा क्योंकि समय की कमी से तो मैं भी परेशान हूं।
 
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