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Part -- 07
अगले ही पल, रंगा उस घर की दहलीज पर साक्षात यमराज की तरह खड़ा था। वीना ने कांपते हुए अपने पल्लू को और भी कसकर अपने बदन पर लपेट लिया, जैसे वह उसकी दरिंदा नज़रों से खुद को ढंकने की कोशिश कर रही हो। "आइए भैयाजी..." उसने भर्राई हुई आवाज़ में उसका स्वागत किया। रंगा ने अपनी धोती को एक बार कसकर बांधा और बड़ी ठसक के साथ घर के अंदर दाखिल हुआ। उसकी आँखें वीना के शरीर को मथ रही थीं, लेकिन उसके चेहरे के हाव-भाव किसी 'मसीहा' जैसे बने हुए थे।
वीना की चार साल की बच्ची को उठाकर उसने अपनी गोद में बिठा लिया और उसे पुचकारते हुए राजेश के ठीक सामने किसी राजा की तरह सोफे पर पसर गया।
"आइए भैयाजी, बैठिए... अभी मैं वीना से आपकी ही तारीफ कर रहा था। आप इतनी जल्दी आ जाएंगे, मैंने उम्मीद नहीं की थी," राजेश ने अपनी उन बेनूर आँखों से आवाज़ की दिशा में देखते हुए बड़े ही भावुक मन से कहा।
रंगा ने राजेश की तरफ देखते हुए वीना को अपनी नज़रों से एक बार फिर टटोला। "अरे... क्या राजेश भाई, आप भी कैसी बात करते हैं? जैसे ही वीना ने फोन करके मुसीबत बताई, यह भैयाजी क्या हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता? अपने घर की बात समझकर भागा चला आया," जब रंगा ने 'अपने घर की बात' कहा, तो उस शब्द में छिपी दरिंदगी सिर्फ वीना ही समझ पा रही थी।
गोद में बैठी बच्ची को चॉकलेट खिलाते हुए वह आगे बोला, "मुझसे मदद माँगते हुए बेचारी वीना कितनी घबरा रही थी... इसीलिए मैं तुरंत पैसों का इंतज़ाम करके यहाँ पहुँच गया।"
राजेश की आँखों में आंसू आ गए। उसने हाथ जोड़कर कहा, "भैयाजी... यह बहुत बड़ी मदद है। इसे हम कभी कैसे उतार पाएंगे, हमें समझ नहीं आ रहा।"
रंगा ने वीना की आँखों में बड़ी गहराई से देखा और उसकी नज़रें उसके उभारों पर जाकर टिक गईं। "अरे उतारने की बात क्यों करते हो राजेश भाई? वीना जी तो पहले ही सब बातों के लिए मान चुकी हैं... क्यों वीना, सही कहा न मैंने?" रंगा ने एक खौफनाक मुस्कान के साथ पूछा। वीना को ऐसा लगा मानो ज़मीन फट जाए और वह उसमें समा जाए।
"हाँ... हाँ... भैयाजी जो कह रहे हैं, मैंने उसे स्वीकार कर लिया है," वीना ने सिर झुकाकर धीमी आवाज़ में कहा। एक तरफ उसकी बच्ची की हंसी थी, दूसरी तरफ पति का सुकून... इन दोनों के बीच अपनी अस्मत की बलि चढ़ते देख उसका शरीर थरथराहट से भर गया था।
तभी बाहर बिजली विभाग का वह अधिकारी आपा खो बैठा और चिल्लाने लगा। "क्या हुआ मैडम? पैसे रखने को बोलकर गया था, अभी तक अंदर क्या कर रही हो?" उसकी कड़क आवाज़ पूरी गली में गूँज रही थी, जिससे वीना की इज़्ज़त सरेआम नीलाम हो रही थी। उसे क्या पता था कि घर के अंदर जो बैठा है, वह यमराज का भी बाप है!
"अंधा पति है, यह सोचकर रहम क्या किया, तुम लोग तो सिर पर चढ़ गए... बाहर आओ!" उसने दरवाज़ा इतनी ज़ोर से पीटा कि वीना पसीने से तर-बतर हो गई। रंगा की गोद में बैठी बच्ची डर के मारे उछली और रंगा की कमीज़ को कसकर पकड़ लिया।
रंगा की आँखों में एक खौफनाक चमक उठी। उसने उस नन्ही बच्ची को प्यार से नीचे उतारा, जेब से एक और चॉकलेट निकाली और थमा दी। "बेटा... जाओ अंदर कमरे में जाकर खाओ, मामा अभी आता है," उसे अंदर भेजकर वह दरवाज़े की तरफ किसी भूखे शेर की तरह बढ़ा।
उधर अधिकारी का पारा सातवें आसमान पर था, "कितनी अकड़ है तुममें? इतना बोलने के बाद भी दरवाज़ा नहीं खोल रही?" उसने जैसे ही दरवाज़े पर लात मारी, दरवाज़ा 'धड़ाम' से खुल गया। लेकिन सामने खड़े साये को देखते ही उस अधिकारी की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। साक्षात मौत को सामने देखकर उसकी रूह काँप उठी। रंगा अपने हाथ का भारी कड़ा घुमाते हुए उसके सामने चट्टान की तरह खड़ा था।
"भैयाजीजीजी..." वह अधिकारी बुरी तरह चीखते हुए रंगा के पैरों में गिर पड़ा। "माफ कर दीजिए भैयाजी... मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि आप यहाँ हैं!" डर के मारे उसकी आवाज़ नहीं निकल रही थी।
यह सब देख रही वीना को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। क्या यह वही आदमी था जो अभी कुछ देर पहले उस पर चिल्ला रहा था और उसे डरा रहा था? रंगा ने उसका कॉलर पकड़ा और उसे झटके से ऊपर खींच लिया।

"अगर आज के बाद तू इस इलाके में भी नज़र आया... तो तुझे यहीं ज़िंदा गाड़ दूँगा!" रंगा ने दाँत पीसते हुए गुर्रा कर कहा। वह अधिकारी डर के मारे इस कदर कांप रहा था कि लग रहा था वहीं पैंट गीली कर देगा।
रंगा के डर से उस अधिकारी को दुम दबाकर भागते देख, इतनी बड़ी मुसीबत और तनाव के बीच भी वीना के चेहरे पर एक पल के लिए हल्की सी मुस्कान आ गई। उसे लगा कि रंगा के होने से कम से कम बाहर की दुनिया का डर तो खत्म हुआ।
लेकिन बेचारा राजेश, जो देख नहीं सकता था, वह रंगा के उस खौफनाक चेहरे और उसकी आँखों में नाचती दरिंदगी को भांप नहीं पाया। "क्या हुआ भैयाजी... क्या उस अधिकारी ने आपको बहुत परेशान किया? उसने बदतमीजी तो नहीं की?" उसने बड़ी चिंता से पूछा।
"अरे नहीं राजेश भाई! कुछ नहीं... जान-पहचान का आदमी निकला, बस दो-चार बातें सुनाईं और भेज दिया। अब वह इस तरफ सिर उठाकर भी नहीं देखेगा," रंगा ने बड़े ही कुटिल अंदाज़ में कहा।
"वीना... ओ वीना! भैयाजी के लिए ज़रा एक गिलास बढ़िया कॉफी बनाकर लाओ," राजेश ने आवाज़ दी, पर रंगा ने तुरंत उसे रोक दिया।
"नहीं राजेश भाई... मैं कॉफी नहीं पीता!"
"तो फिर... चाय मँगवाऊँ?"
"नहीं... मुझे 'दूध' चाहिए!" रंगा ने इस शब्द पर इतना ज़ोर दिया और वीना की आँखों में आँखें डालकर ऐसा गंदा इशारा किया कि वीना के जिस्म में बिजली सी दौड़ गई।
वीना के चेहरे पर आई वह दो सेकंड की मुस्कान पत्थर की तरह जम गई और फिर गायब हो गई। उसे समझ आ गया कि रंगा किस 'दूध' की माँग कर रहा है। लेकिन उसका अपना ही पति अनजाने में उस दरिंदे के लिए रास्ता बना रहा था, यह सोचकर उसका दम घुटने लगा।
"वीना... घर में दूध है न?" राजेश ने बड़ी मासूमियत से पूछा। वीना का सिर चकराने लगा। 'हाए... आपको पता भी नहीं कि वह किस दूध की माँग कर रहा है, और आप खुद ही मुझे उसकी तरफ धकेल रहे हैं!' वह बुरी तरह तड़प उठी, पर कोई और रास्ता न देख, बस इतना ही बुदबुदाई, "हूँ... है..."
"फिर क्या बात है भैयाजी? आप रुकिए... वीना आपको दूध पिलाएगी, उसे आप एकदम तृप्ति के साथ पीकर ही जाइएगा!" राजेश ने बड़े ही खुले दिल से कहा।
रंगा अपनी मूँछों पर ताव देते हुए, एक शिकारी की तरह अपनी शिकार (वीना) को घूर रहा था। उसकी वह विक्षिप्त और गंदी नज़रों वाली निगाहें वीना के शरीर को आग की तरह झुलसा रही थीं।
"सुनिए... आइए, आपकी आँखों में दवाई डालनी है," कहकर वीना ने अपने पति को सहारा दिया और उसे धीरे से बेडरूम की तरफ ले गई। उसे बिस्तर पर लिटाकर उसने उसकी दोनों आँखों में ड्रॉप्स डाल दिए। वह जानती थी कि यह दवाई असर करते ही अगले 30 मिनट तक राजेश न तो अपनी आँखें खोल पाएगा और न ही बिस्तर से हिल पाएगा। अपने पति को कुछ देर के लिए एक अंधेरी दुनिया में धकेलकर, वह उसकी इज़्ज़त बचाने के लिए अपनी बलि देने को तैयार हो गई।
वहाँ से निकलकर वह सीधे पालने के पास गई और अपने सोते हुए नन्हे बच्चे को एक बार बड़ी हसरत भरी निगाहों से देखा। फिर अपनी चार साल की बेटी को कुछ खिलौने थमाते हुए कहा, "बेटा, शोर मत करना, यहीं खेलो," और उस कमरे का दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया।
सीधे बाथरूम जाकर वीना ने वहाँ लगे आईने में खुद को देखा। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरा पीला पड़ चुका था। "क्या... क्या यह करना ही होगा वीना? क्या अपने पति और बच्चों के लिए तुझे यह भी सहना होगा?" उसने खुद से सवाल किया। लेकिन, वह एक लाख रुपये की गड्डियाँ और मकान मालकिन की वो धमकियाँ उसके दिमाग में जवाब बनकर गूँज उठीं।

उसने अपना चेहरा अच्छे से धोया, एक लंबी और भारी सांस ली, अपनी साड़ी को एक बार फिर ठीक किया और हॉल में आ गई।
वहाँ भैयाजी (रंगा) बड़ी शान से बैठा था। वीना ने धीरे से कदम बढ़ाए और हॉल के मुख्य दरवाज़े की कुंडी लगा दी। अब उस घर में, एक तरफ अपनी बेबसी में डूबा अंधा पति था, दूसरी तरफ अबोध बच्चे... और बीच में खड़ा था एक शिकारी और उसके जाल में फँसी एक बेबस औरत!
वीना ने नम आँखों से उस कमरे की तरफ देखा जहाँ उसका पति राजेश बेबस पड़ा था। उसका दिल किसी युद्ध के मैदान की तरह धड़क रहा था। रंगा की ओर बढ़ाया गया उसका हर कदम ऐसा था जैसे वह जलते अंगारों पर चल रही हो।
उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई—क्या सारी खिड़कियाँ ठीक से बंद हैं? दरवाज़े की झिरी से भी रोशनी की एक किरण अंदर नहीं आनी चाहिए! "हे ईश्वर, गलती से भी कोई यह न देख ले... मेरी इज़्ज़त इन चार दीवारों के बीच ही दफन हो जाए," उसने मन ही मन प्रार्थना की। लेकिन वह ईश्वर इस वक्त रंगा के रूप में उसके सामने खड़ा था।
रंगा अपनी कुर्सी से उठा और उसके करीब आया। उसके बदन से आती शराब की गंध और वह मर्दाना घमंड वीना को अंदर तक झकझोर रहा था।
अचानक रंगा ने वीना की कलाई पकड़ ली। वीना के फूल जैसे कोमल हाथ उसकी लोहे जैसी पकड़ में फंसकर रह गए। मद्धम रोशनी में उसके नाखूनों पर लगी नेल पॉलिश चमक रही थी। उसके चिकने और ठंडे हाथ डर के मारे बुरी तरह कांप रहे थे।
लेकिन वीना को उसकी पकड़ दहकती आग की तरह महसूस हुई। पत्थर तोड़ने वाले मजदूर की तरह रंगा की हथेलियाँ खुरदरी और सख्त थीं।
"क्या बात है वीना... तुम्हारे हाथ तो..." रंगा ने कुछ कहना चाहा, लेकिन उसकी आवाज़ सुनकर वीना डर गई कि कहीं राजेश न सुन ले। उसने झट से अपने बाएं हाथ से रंगा मुँह को बंद करदी (राजेश अंदर ही है... शोर मत कीजिए, कुछ मत बोलिए) का इशारा किया। उसकी आँखों में छटपटाहट और डर साफ़ दिख रहा था—डर अपने पति के सामने बेआबरू होने का, डर अपनी इज़्ज़त की नीलामी का।

रंगा एक पल के लिए बिल्कुल शांत हो गया। लेकिन वह वीना की चेतावनी से डरकर नहीं, बल्कि उसके हाथों के जादू से शांत हुआ था। उसकी खुरदरी और बदसूरत शख्सियत के सामने वीना की वह कोमल हथेली, जो किसी छोटे बच्चे के गाल की तरह मुलायम और रेशमी थी, जब उसके होंठों पर दबी, तो रंगा उस अहसास में डूब गया। उसकी मूंछों के बाल जब वीना की हथेली में चुभे, तो वीना ने झटके से शर्म और संकोच में अपना हाथ हटा लिया।
उसने रंगा का हाथ पकड़ा और उसे घसीटते हुए रसोई की ओर ले गई। वहाँ की मद्धम रोशनी में, वह रंगा के बिल्कुल करीब खड़ी हो गई। इतनी करीब कि उन दोनों की सांसें आपस में टकरा रही थीं।
वीना ने बहुत ही धीमी और कांपती हुई फुसफुसाहट में कहा, "देखिए... मैं आपको ज्यादा देर तक घर के अंदर नहीं रख सकती। राजेश को कभी भी होश आ सकता है या उसकी नींद खुल सकती है। जो भी करना है... जल्दी खत्म कीजिए और यहाँ से चले जाइए।"
जब वीना फुसफुसा रही थी, तो उसके मुँह से आती वह हल्की सी खुशबू और उस अंधेरे में उसके होंठों की थिरकन ने रंगा को एक भूखे दरिंदे में बदल दिया। रंगा जानता था कि उस एक लाख रुपये के बदले वह आज क्या हासिल करने वाला है।
रंगा ने बिना कोई वक्त गंवाए वीना को कमर से पकड़ा और उसे हवा में उठाते हुए सीधे किचन के स्लैब (मेज़) पर बैठा दिया। वीना के पैर हवा में झूलने लगे और रंगा उसके दोनों पैरों के बीच इतनी करीब आकर खड़ा हो गया कि उनके शरीर एक-दूसरे में धँस रहे थे। रंगा ने अपने खुरदरे हाथ से वीना के गाल को सहलाया और फिर अपने अंगूठे से उसके रेशमी होंठों पर एक लकीर सी खींची। "ओह... क्या मखमली होंठ हैं!" रंगा वासना से पागल हो रहा था।
जैसे ही रंगा उसके होंठों का रस चखने के लिए नीचे झुका, वीना ने नफरत और मजबूरी के मिले-जुले अहसास में झटके से अपना चेहरा दूसरी तरफ मोड़ लिया। रंगा का वह गंदा और गीला चुंबन उसके गाल पर जा गिरा। वह छुअन वीना को दहकते कोयले की तरह लगी, जैसे उसके चेहरे की खाल जल गई हो।

रंगा ने हार नहीं मानी। उसने अपने खुरदरे और मजबूत हाथ से वीना का चेहरा दबोचा और अपनी तरफ घुमा लिया। जैसे ही वह दोबारा उसके होंठों की तरफ बढ़ा, वीना ने बिजली की फुर्ती से अपनी छोटी सी हथेली से अपने होंठों को कसकर ढँक लिया। उसकी आँखों में एक मूक चीख थी, जो साफ कह रही थी—"मैं इसके लिए तैयार नहीं हूँ..."

रंगा के पास वह ताकत और रसूख तो था ही, जिससे वह उसे उसी वक्त अपनी मुट्ठी में भींच सकता था। लेकिन इस वक्त वह सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि एक शातिर शिकारी था। उसने मन ही मन सोचा, "शिकार करने के लिए यह कोई मामूली गाय नहीं है... यह तो एक बेहद खूबसूरत हिरनी है! इसे जल्दबाजी में मसलना नहीं है, बल्कि मजे से, एक-एक कतरे का स्वाद लेकर इसका भोग करना है।" वह अपनी इस गंदी सोच पर अंदर ही अंदर मुस्कुरा उठा।
रंगा की भूखी नजरें वीना की गर्दन की ढलानों से फिसलती हुई नीचे उतरीं और उसके उभारों पर जाकर जैसे लंगर डाल दिया। उसकी वह निगाह किसी नुकीले भाले की तरह वीना के बदन को छलनी कर रही थी।
वीना ने अपने पल्लू को जितनी मजबूती और सलीके से खींचकर खुद को ढंकने की कोशिश की, उसके दिल की धड़कनें उतनी ही बेकाबू होकर उस कपड़े की ओट से दिखाई देने लगीं। डर और जिल्लत के मारे उसकी सांसें उखड़ गई थीं। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी, और हर सांस के साथ उसके यौवन का उतार-चढ़ाव एक अजीब से खौफनाक लय में थरथरा रहा था।
रंगा की आँखों में अब वहशीपन तैर रहा था। उसने वीना की खूबसूरती को घूरते हुए, उसके कंधे पर टिके पल्लू को धीरे से सरका दिया, जो सरक कर नीचे फर्श पर जा गिरा। उसकी बड़ी-बड़ी चूची एकदम से पके हुए पपाया की तरह ब्लाउज में कसी हुई नजर आने लगी जो कि एकदम नुकीली लग रही थी, अब वीना का ऊपरी हिस्सा उस तंग ब्लाउज के साथ रंगा की नज़रों के सामने पूरी तरह नुमाया था। हालाँकि ब्लाउज के सभी हुक मजबूती से लगे थे, लेकिन वीना के उभारों के भारीपन को सँभालने में वह कपड़ा भी जैसे दम तोड़ रहा था।

उन दो पहाड़ों के बीच की गहरी घाटी... उस ढलान पर पसीने की बूंदें ओस की तरह चमक रही थीं। अंदर किसी भी तरह का अंतर्वस्त्र (Bra) न होने की वजह से, उसके वक्षों का असली आकार उस ब्लाउज की सिलाइयों को चीरकर बाहर आने के लिए बेताब दिख रहा था। दो हुकों के बीच के उस छोटे से फासले से झांकता हुआ उसका मांसल बदन रंगा के रगों में दौड़ते खून को और भी खौला रहा था।
रंगा ने धीरे से अपना दायां हाथ ऊपर उठाया। उन गहरे वक्षों की घाटी में जमा पसीने को उसने अपनी उंगलियों से सहलाया। उसकी वह खुरदरी तर्जनी उंगली, उन दोनों उभारों के बीच की उस गहरी दरार में धीरे से उतर गई।
जैसे ही उसकी वह पराई छुअन वीना के सीने को छुई... वीना शर्म और जिल्लत के मारे अपना सिर पीछे दीवार से टिकाकर सिसक उठी। उसका दिल दीवार पर बजने वाले नगाड़े की तरह धड़क रहा था। रंगा अपनी उंगली को उस दरार के अंदर यहाँ-वहाँ फिराने लगा। जहाँ-जहाँ उसकी उंगली छुई, वहाँ वीना का गोरा बदन लाल पड़ने लगा।
अगर रंगा अपनी उंगली को थोड़ा और गहराई में ले जाता, तो शायद उस ब्लाउज की सिलाइयां ही टूट जातीं। उसने धीरे से अपना हाथ बाहर निकाला और पहले हुक पर उंगली टिका दी। 'टक' की आवाज़ के साथ जैसे ही पहला हुक खुला, एक उभार आज़ाद होने के लिए ऊपर की ओर उछला। अगले ही पल, उसने दूसरे हुक को भी ढीला कर दिया।

वीना के उभारों की वह तड़प जैसे रंगा से भीख मांग रही थी, "हमें इस कैद से आज़ाद करो!" बिना किसी अंतर्वस्त्र (Bra) के उसका यौवन उस तंग कपड़े को धकेलकर बाहर आने के लिए बेताब था। रंगा ने एक कुटिल और कामुक मुस्कान के साथ, उन आखिरी दो हुकों को भी बहुत ही धीरे और मजे ले-लेकर खोल दिया।

जैसे किसी विशाल किले के कपाट खुलते हैं, वैसे ही उस ब्लाउज के दोनों हिस्से अगल-बगल हट गए। अगले ही पल... वीना के दोनों वक्ष उस चोली को चीरकर पूरी तरह बाहर आ गए और आज़ादी में थरथराने लगे। लहरें मारते हुए समंदर की तरह, उसकी उखड़ी हुई सांसों की रफ्तार के साथ वे ऊपर-नीचे हो रहे थे।
रसोई की उस मद्धम और पीली रोशनी में वीना का चूचियों बदन किसी मलाई की तरह चमक रहा था, जिसे देख रंगा की आँखें फटी की फटी रह गईं। तंग ब्लाउज उतारने के बाद उसके गोरे वक्षों के किनारों पर लाल लकीरें साफ़ उभर आई थीं, जो उसकी कोमलता का सबूत दे रही थीं। रंगा ने आज तक कई औरतों को अपनी उँगलियों पर नचाया होगा, पर वीना जैसी 'भरपूर' काया उसने पहले कभी नहीं देखी थी।

उसके उभार किसी सजी हुई मूरत की तरह सुडौल और भारी थे। गोरे बदन के उस समंदर के बीचों-बीच उन दो शिखरों पर मौजूद वे गहरी सांवली और अकड़ी हुई कलियां (Nipples) रंगा को अपनी ओर खींच रही थीं। वे कलियां ममता के बोझ और डर की वजह से पत्थर की तरह तन गई थीं, जैसे रंगा को अपनी ओर बुला रही हों।
पर उस हुस्न से भी ज़्यादा रंगा को एक और चीज़ ने पागल कर दिया था—उन भारी वक्षों में छिपा वो 'अमृत' जो बाहर आने को बेताब था।
उन दोनों वक्षों के बीच की गहरी घाटी में, राजेश द्वारा बाँधा गया वह मंगलसूत्र झूल रहा था।

वह काली धागा और सोने का वीना के मांसल उभारों के बीच धँसा हुआ था। एक स्त्री की पवित्रता का प्रतीक वह मंगलसूत्र, रंगा की दरिंदगी भरी नज़रों के सामने एक बेबस गवाह बनकर पड़ा था। रंगा बुदबुदाया, "ओह... क्या गजब की खूबसूरती है!"
रंगा ने धीरे से अपना दायां हाथ वीना के बाएं स्तन के नीचे रखा और उसे किसी भारी खजाने की तरह अपनी हथेली पर उठा लिया। बड़ी-बड़ी चूचियों को दशहरी आम की तरह दबाना शुरू कर दिया था उसका खुरदरा अंगूठा, उसकी चली छुहारा जैसी निप्पलको के चारों ओर के काले घेरे को बड़ी बेरहमी से रगड़ने लगा। उत्तेजना और वासना में अंधे होकर, रंगा ने उस सख़्त खड़ी nipple को अपनी दो उंगलियों के बीच पकड़कर पूरी ताकत से मसल दिया।

रंगा के उस ज़ोरदार दबाव से, "सीथ..." की एक बारीक सी आवाज़ के साथ वीना के वक्ष से दूध की तेज़ धार फूटी और रंगा के हाथों पर जा गिरी। उस गुनगुने और ताज़े 'अमृत' का अहसास जैसे ही रंगा की हथेलियों को छुआ, उसके दिमाग की नसें फटने लगीं। अब उसके लिए खुद पर काबू पाना नामुमकिन था।
एक भूखे भेड़िए की तरह वह नीचे झुका और 'लपक' कर वीना की तनी हुई निप्पल को अपने पूरे मुँह में भर लिया। रंगा की लार और वीना का वह पवित्र दूध आपस में मिल गए... और वह पागलों की तरह उसे चूसने लगा। उसकी जीभ वीना की उस घुंडी के चारों ओर किसी नाग की तरह घूमने लगी। "सीथ... सीथ..." की आवाज़ के साथ वह सफ़ेद दूध रंगा के हलक के नीचे उतरने लगा।.और दूसरे हाथ से उसकी दुसरी चुची को लगातार दबा रहा था,,
रंगा की भूख अब और भी ज़्यादा बढ़ गई थी। एक वक्ष को निचोड़ने के बाद, उसने बिना देर किए वीना की दूसरी चूची को अपने हाथ में भरा और उसे भी अपने मुँह में दबोच लिया। रंगा अब बारी-बारी से वीना के दोनों स्तनों का स्तनपान करने लगा, जैसे कोई भूखा जानवर अपने शिकार को नोचता है।
उसे इसमें बेइंतहा मज़ा आ रहा था। वह गर्म-गर्म, ताज़ा और मीठा दूध जब उसकी ज़ुबान पर लग रहा था, तो उसका स्वाद रंगा को मदहोश कर रहा था। वह उसे सिर्फ़ पी नहीं रहा था, बल्कि अपनी प्यास बुझाने के लिए वीना के मांसल उभारों को और भी तेज़ दबाकर सारा दूध हलक के नीचे उतार रहा था। "गप्प-गप्प" की आवाज़ें उस खामोश रसोई में गूँज रही थीं।
अब तक जो वीना डर और शर्म के मारे पत्थर बनी दीवार से चिपकी खड़ी थी, उसके भीतर अचानक एक अनजाना बदलाव आने लगा। रंगा का वह वहशीपन और उसकी मर्दाना ताकत वीना की सोई हुई नसों को जैसे झकझोरने लगी। बेइज्जती और जिल्लत के उस गहरे समंदर के बीच, एक अजीब सी शारीरिक उत्तेजना उसके दिमाग पर हावी होने लगी, जिसने उसकी सोचने-समझने की शक्ति को सुन्न कर दिया।
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वीना ने अपने होंठों को इतनी ज़ोर से काटा कि उनमें से खून रिसने लगा, लेकिन दर्द के बजाय उसे एक सिहरन महसूस हुई। खुद पर से काबू खोते ही, उसने अनजाने में अपनी कमर को हल्का सा मोड़ा और अपनी चूची (स्तन) को रंगा के मुँह की ओर और भी ज़्यादा आक्रामक तरीके से धकेल दिया, ताकि वह उसे और गहराई से चूस सके।
उसकी आँखें नशे में डूबकर आधी बंद हो गईं। वह पूरी तरह भूल गई कि उसका पति राजेश बगल के कमरे में लाचार पड़ा है। वीना के हाथ अब रंगा के बालों में पहुँच गए थे और वह धीरे-धीरे उन्हें सहलाते हुए रंगा के उस शिकारी अंदाज़ को खुद में समेटने लगी। उसने इस 'शिकार' के आगे खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया था।
बाएं स्तन पर अपनी दरिंदगी पूरी करने के बाद, रंगा अगले ही पल दाईं चूची पर टूट पड़ा। एक भूखे जानवर की तरह उसने अपना मुँह जितना हो सके उतना फैलाया और पूरी आक्रामकता के साथ उसकी चूची को अपने भीतर भर लिया। वह उसे इतनी बुरी तरह चूसने लगा जैसे वह वीना के शरीर से उसका सारा वजूद खींच लेना चाहता हो।
वीना अब पूरी तरह से सुध-बुध खो चुकी थी। आत्मसम्मान और जिस्म की प्यास के बीच चल रही जंग में, उसकी उत्तेजना ने उसे धोखा दे दिया था। उसे अब होश नहीं था कि वह क्या कर रही है। उसने खुद ही रंगा के सिर को पकड़कर अपनी चूची के साथ और भी ज़ोर से चिपका लिया, जैसे वह उसकी इस दरिंदगी को और गहराई से महसूस करना चाहती हो।
रसोई की मेज़ पर बैठी वीना के पैर, जो अब तक हवा में झूल रहे थे, अचानक ऊपर उठे और रंगा की भारी और खुरदरी कमर के चारों ओर कस गए। उसने अपनी टाँगों से रंगा को इस कदर जकड़ लिया कि उनके बीच की दूरी पूरी तरह मिट गई। रंगा की दाढ़ी के बाल जब उसकी संवेदनशील चूची और नाजुक त्वचा पर रगड़ खा रहे थे, तो वीना की कमर बिजली की तरह लचक रही थी।
बाएं स्तन से दाएं और दाएं से फिर बाएं... रंगा किसी भूखे दरिंदे की तरह वीना की दोनों चूचियों के बीच झपट रहा था। उसकी भारी सांसें और वीना की बेतहाशा तड़प ने उस रसोई को एक कामुक युद्ध के मैदान में बदल दिया था। इसी बीच, वीना की चूचियों के बीच झूलता हुआ वह मंगलसूत्र बार-बार रंगा के चेहरे और होंठों से टकरा रहा था।
जब वीना ने महसूस किया कि उसके पति की दी हुई वह आखिरी निशानी रंगा की हवस के रास्ते में कांटा बन रही है, तो उसने एक पल के लिए भी नहीं सोचा।
उसने अपने कांपते हुए हाथों से उस पवित्र मंगलसूत्र को पकड़ा और उसे खींचकर अपने गले के पीछे की तरफ डाल दिया। उसका यह कदम ऐसा था जैसे वह अपनी मर्यादा के आखिरी धागे को भी खुद ही तोड़ रही हो। "अब कोई बाधा नहीं है..." उसके इस कृत्य ने जैसे रंगा को खुली छूट दे दी। राजेश के प्रति वफादारी और मंगलसूत्र की पवित्रता से कहीं ज्यादा, इस वक्त रंगा का वह खुरदरा स्पर्श वीना के लिए एक गहरा नशा बन चुका था।
बिना किसी बाधा के सामने मौजूद उस बेपर्दा खूबसूरती को देखकर रंगा और भी ज़्यादा जंगली हो गए। उन्होंने वीना की दोनों चूचियों को एक साथ अपने हाथों में भींच लिया और अपने चेहरे को उन मांसल उभारों के बीच रगड़ने लगे। रंगा की खुरदरी मूंछें और बढ़ी हुई दाढ़ी जब वीना की कोमल चूचियों और निप्पल्स पर चुभ रही थीं, तो वीना की सिहरन और बढ़ गई। जिस खुरदरे और भारी बदन से वह अब तक डर रही थी, वही अब उसे अपनी सुध-बुध खोने पर मजबूर कर रहा था।
रसोई के उस अंधेरे कोने में जब यह शिकारी अपनी हवस के चरम पर था और वीना मदहोश होकर उनकी बाहों में झुली जा रही थी, तभी अचानक एक आवाज़ गूँजी।
"टप... टप... वीना!"
अंदर के कमरे से राजेश की आवाज़ पूरे सन्नाटे को चीरती हुई आई। शायद नींद में उसने करवट बदली थी या वह पानी माँगने के लिए जाग गया था।
उस एक पल में राजेश की आवाज़ सुनकर वीना जैसे पत्थर की हो गई। बिजली गिरने जैसा अहसास हुआ और उसकी सारी कामुक भावनाएं पल भर में दम तोड़ गईं। "हे भगवान... मैं ये क्या कर रही हूँ? मेरा पति पास में ही है और मैं..." यह आत्मग्लानि और अपराधबोध उसके दिल में किसी ज़हरीले तीर की तरह चुभ गया।
उसने झटके से अपनी टाँगें, जो रंगा की कमर पर कसी हुई थीं, ढीली कर दीं। जिस रंगा के सिर को वह अभी तक अपनी चूचियों से चिपकाए हुए थी, उसे अब एक घिनौने अहसास के साथ पूरी ताकत से पीछे धकेल दिया।
"हाय राम... वो जाग गए!" उसने कांपती हुई आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा।
तभी राजेश की आवाज़ और भी ज़ोर से गूँजी। "वीना... दरवाज़ा खोलो! ये अंदर से बंद क्यों है? टप... टप..." दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ ने वीना के पेट में खौफ की लहर दौड़ दी। उसे अहसास हो गया कि नींद की दवा का असर खत्म हो चुका है और उसका पति बिस्तर से उठकर अब रसोई की तरफ आ सक्ता है।
रंगा का मन बिल्कुल नहीं भर रहा था। उस 'अमृत' (दूध) के स्वाद और वीना के जिस्म की गर्माहट में डूबे हुए वह जैसे किसी दूसरी दुनिया में थे। जब वीना ने उन्हें धकेला, तो उन्होंने बहुत बेमन से अपना चेहरा उसकी चूचियों से अलग किया। उनके होंठों पर अभी भी वीना के दूध की सफेदी और नमी चिपकी हुई थी।
वीना घबराहट के चरम पर थी। मौत के डर से कांपते हुए उसने अपने ब्लाउज के हुक एक-एक करके लगाने शुरू किए। डर के मारे उसके हाथ इतना थरथरा रहे थे कि एक हुक तो फँस ही नहीं रहा था। वह फौरन रसोई के स्लैब से नीचे कूदी और रंगा के कंधे पकड़कर उन्हें पीछे के दरवाजे की ओर धकेलने लगी।
"जल्दी जाइए भैयाजी... वो आ गए! अब यहाँ एक पल भी मत रुकिए... जाइए!" वह पागलों की तरह उन्हें बाहर निकालने की कोशिश कर रही थी।
उसने झटके से अपनी पीठ पर लटके मंगलसूत्र को वापस आगे खींचा और सीने पर सजा लिया। अपने बिखरे हुए बालों को समेटते हुए और साड़ी के पल्लू को आनन-फानन में ठीक कर वह मुख्य दरवाजे की ओर भागी, जहाँ राजेश लगातार दस्तक दे रहा था।
रंगा के चेहरे पर रत्ती भर भी डर नहीं था। वीना उन्हें बाहर निकालने के लिए पागलों की तरह धक्का दे रही थी, लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। उलटा, वे बड़े आराम से चलते हुए हॉल में गए और वहां रखी कुर्सी पर ऐसे बैठ गए जैसे कुछ हुआ ही न हो।
वीना ने किसी तरह अपनी अस्त-व्यस्त साड़ी को संभाला और अपने चेहरे पर छाई दहशत को जज्ब करते हुए राजेश के कमरे की कुंडी खोली। राजेश अपनी बैसाखी के सहारे लड़खड़ाते हुए बाहर निकला। उसके चेहरे पर उलझन थी। "क्या हुआ वीना? तुमने बाहर से दरवाजा क्यों बंद कर दिया था? मैं कब से आवाज लगा रहा हूँ!" उसने शक भरी नज़रों से वीना की ओर देखा।
वीना का दिल जैसे सीने को फाड़कर बाहर आ जाएगा। "वो... वो... गुड़िया खेल रही थी, शायद उसी ने गलती से बाहर से कुंडी लगा दी होगी," उसने हकलाते हुए झूठ बोला और बात को रफा-दफा करने की कोशिश की।
तभी राजेश ने हॉल की ओर गर्दन घुमाई, "भैयाजी चले गए क्या?"
अभी राजेश की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि रंगा कुर्सी से उठा । उनके चेहरे पर वही शिकारी और वंचक मुस्कान थी। उन्होंने एक तिरछी नज़र वीना के उस पल्लू पर डाली जो अभी भी ठीक से संभला नहीं था, और बिना कुछ बोले बड़े रौब के साथ मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ गए। जाते-जाते उन्होंने पलटकर वीना की आँखों में देखा, जैसे कह रहे हों—"अभी तो बस दूध चखा है, पूरा जाम अभी बाकी है।"
हाँ, वो चले गए," वीणा ने नीची निगाहें किए हुए किसी तरह अपनी आवाज़ को संभाला और कहा।
राजेश ने उसकी ओर देखते हुए अपनी आवाज़ में एक अजीब सी उत्सुकता के साथ पूछा, "अच्छा... और वो दूध? तूने उन्हें पिलाया कि नहीं? भैयाजी काफी देर से उसी की आस में बैठे थे।"
राजेश का सवाल सुनते ही वीणा का चेहरा शर्म और ग्लानि से सुर्ख लाल हो गया। उसके कानों में अभी भी रसोई की वो 'सीथ-सीथ' वाली आवाज़ें और भैयाजी के होठों की छुअन गूँज रही थी। घबराहट में उसके मुँह से सच और झूठ का एक मिला-जुला और खतरनाक जुमला निकल गया।
उसने अपने ब्लाउज पर पड़े दूध के धब्बों को पल्लू से ढंकते हुए कहा, "हाँ... वो... वो तो मन भर कर पीकर गए हैं।"
कहते ही उसे एहसास हुआ कि उसने क्या बोल दिया है। उसने बात तो दूध के गिलास के संदर्भ में कहने की कोशिश की थी, लेकिन उसके शब्द और उसका लहजा रंगा की उस दरिंदगी की गवाही दे रहे थे जो अभी-अभी उसकी चूचियों के साथ हुई थी।
रंगा जब अपनी दुकान पर पहुँचे, तो उसे अपनी किस्मत पर यकीन नहीं हो रहा था। जिस वीना को उन्होंने अब तक सिर्फ दूर से हसरत भरी निगाहों से देखा था, जो उन्हें देखकर अपना रास्ता बदल लेती थी, आज उसी की चूचियों का 'अमृत' वे जी भरकर पीकर आए थे। उनकी जुबान पर अभी भी वीना के दूध का मीठा और नमकीन स्वाद चढ़ा हुआ था।
लेकिन उस 'अमृत' ने उनकी प्यास बुझाने के बजाय उनकी रगों में आग लगा दी थी। रंगा की हालत अब बहुत खराब हो रही थी। वीना के बदन की गर्मी और उसकी चूचियों के उस एहसास ने उनके भीतर के सोए हुए शैतान को जगा दिया था।
लुंगी के नीचे उसका लंड किसी तपती हुई लोहे की छड़ की तरह सख्त होकर पत्थर बन चुका था। उसकी नसें तनाव के मारे इस कदर फूल गई थीं कि लग रहा था अभी खाल फाड़कर बाहर निकल आएंगी। वीना के उस दूधिया बदन के अहसास ने उसके लंड में इतनी जान भर दी थी कि वह बार-बार लुंगी को फाड़ देने की जिद कर रहा था।
उसकी आँखों में वहशीपन उतर आया था। वो बुरी तरह हांफ रहा था । उसे अब किसी भी कीमत पर एक गहरी योनि चाहिए थी जिसमें अपना यह सारा जहर, सारी हवस और वह उफनता हुआ तनाव खाली कर सकें। उसका रोम-रोम एक छेद के लिए तड़प रहा था।वह दुकान के भीतर एक पिंजरे में बंद शेर की तरह चक्कर काट रहे थे। पसीना उनके माथे से बहकर उनकी आँखों में जा रहा था, लेकिन उनका हाथ बार-बार अपनी लुंगी के उस भारी उभार को मसल रहा था।
भैयाजी ने कांपते हाथों से अपना फोन उठाया और कॉन्टैक्ट लिस्ट को पागलों की तरह स्क्रॉल करने लगे। उनकी आँखों के सामने बस जिस्मों के नाम घूम रहे थे। उनकी उंगलियाँ स्क्रीन पर तेज़ी से चल रही थीं, जबकि लुंगी के नीचे उनका लंड हर बीतते सेकंड के साथ और भी ज़्यादा पत्थर होता जा रहा था।
"कामनी... नहीं, वो तो मायके गई है, हाथ नहीं आएगी," उन्होंने दाँत पीसते हुए बुदबुदाया। उनकी साँसें तेज़ हो गई थीं। फिर उनकी नज़र एक और नाम पर रुकी।
"जानकी? धत... वो तो बीमार पड़ी है, उसका छेद तो अभी किसी काम का नहीं होगा।"
भैयाजी का गुस्सा और हवस अब उनके सिर चढ़कर बोल रही थी। उनका लंड इतना सख़्त हो चुका था कि उन्हें चलने में भी दर्द महसूस हो रहा था। उन्हें बस एक 'छेद' चाहिए था, चाहे वह कितना ही महंगा क्यों न पड़े या उसके लिए उन्हें कितनी ही ज़बरदस्ती क्यों न करनी पड़े।
रंगा की बेचैनी जब अपने चरम पर थी, तभी कुदरत ने जैसे उसकी पुकार सुन ली। दूर से एक साया अपनी ओर आता देख रंगा की आँखों में चमक आ गई। वह और कोई नहीं, शर्मा जी अपनी पत्नी पूजा शर्मा के साथ उसकी दुकान की ओर बढ़ रहे थे।
पूजा शर्मा...
जिसे देखते ही रंगा के मन में वासना का सैलाब उमड़ पड़ा। पूजा के पति रेलवे में दूसरे राज्य में काम करते थे, और जब भी वे बाहर होते, रंगा पूजा के घर जाकर उसके जिस्म की गहरी खाइयों को घंटों तक नापता था। उसे कई बार अपनी हवस का निशाना बना चुका रंगा जानता था कि पूजा का 'मैदान' कितना उपजाऊ है। लेकिन आज वह अपने पति के साथ क्यों आ रही थी?
खैर, रंगा को इससे क्या फर्क पड़ता? उसका लंड ने अपना निशाना साध लिया था। रंगा ने अपने चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान ओढ़ी और अपनी लुंगी के उस उभार को ढंकते हुए उनका स्वागत किया।
"अरे! आइए... आइए शर्मा जी! पूजा जी... आज कैसे आना हुआ? बड़ा शुभ दिन है जो आप दोनों एक साथ पधारे," रंगा ने अपनी आवाज़ में चाशनी घोलते हुए कहा, जबकि उसकी नज़रें पूजा के उन भरे हुए अंगों को स्कैन कर रही थीं जो साड़ी के भीतर से झाँक रहे थे।
रंगा की आँखों में अब एक शिकारी की चमक थी। उसका पत्थर जैसा सख़्त लंड अब पूजा के जिस्म की गहराई में उतरने के लिए बेताब था। रंगा अब एक ऐसा खतरनाक खेल खेलने वाले हैं जहाँ शर्मा जी की आँखों के सामने उनकी पत्नी पूजा शर्मा की योनि को चीरने की तैयारी में होंगे।
क्या पूजा अपने पति के डर से खामोश रहकर रंगा का वह खौफनाक 'प्रहार' झेलेगी? क्या रंगा शर्मा जी के सामने ही पूजा के बदन से अपनी हवस की आग बुझा पाएंगे?..अगले भाग के लिए तैयार रहिए...
अगले ही पल, रंगा उस घर की दहलीज पर साक्षात यमराज की तरह खड़ा था। वीना ने कांपते हुए अपने पल्लू को और भी कसकर अपने बदन पर लपेट लिया, जैसे वह उसकी दरिंदा नज़रों से खुद को ढंकने की कोशिश कर रही हो। "आइए भैयाजी..." उसने भर्राई हुई आवाज़ में उसका स्वागत किया। रंगा ने अपनी धोती को एक बार कसकर बांधा और बड़ी ठसक के साथ घर के अंदर दाखिल हुआ। उसकी आँखें वीना के शरीर को मथ रही थीं, लेकिन उसके चेहरे के हाव-भाव किसी 'मसीहा' जैसे बने हुए थे।
वीना की चार साल की बच्ची को उठाकर उसने अपनी गोद में बिठा लिया और उसे पुचकारते हुए राजेश के ठीक सामने किसी राजा की तरह सोफे पर पसर गया।
"आइए भैयाजी, बैठिए... अभी मैं वीना से आपकी ही तारीफ कर रहा था। आप इतनी जल्दी आ जाएंगे, मैंने उम्मीद नहीं की थी," राजेश ने अपनी उन बेनूर आँखों से आवाज़ की दिशा में देखते हुए बड़े ही भावुक मन से कहा।
रंगा ने राजेश की तरफ देखते हुए वीना को अपनी नज़रों से एक बार फिर टटोला। "अरे... क्या राजेश भाई, आप भी कैसी बात करते हैं? जैसे ही वीना ने फोन करके मुसीबत बताई, यह भैयाजी क्या हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता? अपने घर की बात समझकर भागा चला आया," जब रंगा ने 'अपने घर की बात' कहा, तो उस शब्द में छिपी दरिंदगी सिर्फ वीना ही समझ पा रही थी।
गोद में बैठी बच्ची को चॉकलेट खिलाते हुए वह आगे बोला, "मुझसे मदद माँगते हुए बेचारी वीना कितनी घबरा रही थी... इसीलिए मैं तुरंत पैसों का इंतज़ाम करके यहाँ पहुँच गया।"
राजेश की आँखों में आंसू आ गए। उसने हाथ जोड़कर कहा, "भैयाजी... यह बहुत बड़ी मदद है। इसे हम कभी कैसे उतार पाएंगे, हमें समझ नहीं आ रहा।"
रंगा ने वीना की आँखों में बड़ी गहराई से देखा और उसकी नज़रें उसके उभारों पर जाकर टिक गईं। "अरे उतारने की बात क्यों करते हो राजेश भाई? वीना जी तो पहले ही सब बातों के लिए मान चुकी हैं... क्यों वीना, सही कहा न मैंने?" रंगा ने एक खौफनाक मुस्कान के साथ पूछा। वीना को ऐसा लगा मानो ज़मीन फट जाए और वह उसमें समा जाए।
"हाँ... हाँ... भैयाजी जो कह रहे हैं, मैंने उसे स्वीकार कर लिया है," वीना ने सिर झुकाकर धीमी आवाज़ में कहा। एक तरफ उसकी बच्ची की हंसी थी, दूसरी तरफ पति का सुकून... इन दोनों के बीच अपनी अस्मत की बलि चढ़ते देख उसका शरीर थरथराहट से भर गया था।
तभी बाहर बिजली विभाग का वह अधिकारी आपा खो बैठा और चिल्लाने लगा। "क्या हुआ मैडम? पैसे रखने को बोलकर गया था, अभी तक अंदर क्या कर रही हो?" उसकी कड़क आवाज़ पूरी गली में गूँज रही थी, जिससे वीना की इज़्ज़त सरेआम नीलाम हो रही थी। उसे क्या पता था कि घर के अंदर जो बैठा है, वह यमराज का भी बाप है!
"अंधा पति है, यह सोचकर रहम क्या किया, तुम लोग तो सिर पर चढ़ गए... बाहर आओ!" उसने दरवाज़ा इतनी ज़ोर से पीटा कि वीना पसीने से तर-बतर हो गई। रंगा की गोद में बैठी बच्ची डर के मारे उछली और रंगा की कमीज़ को कसकर पकड़ लिया।
रंगा की आँखों में एक खौफनाक चमक उठी। उसने उस नन्ही बच्ची को प्यार से नीचे उतारा, जेब से एक और चॉकलेट निकाली और थमा दी। "बेटा... जाओ अंदर कमरे में जाकर खाओ, मामा अभी आता है," उसे अंदर भेजकर वह दरवाज़े की तरफ किसी भूखे शेर की तरह बढ़ा।
उधर अधिकारी का पारा सातवें आसमान पर था, "कितनी अकड़ है तुममें? इतना बोलने के बाद भी दरवाज़ा नहीं खोल रही?" उसने जैसे ही दरवाज़े पर लात मारी, दरवाज़ा 'धड़ाम' से खुल गया। लेकिन सामने खड़े साये को देखते ही उस अधिकारी की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। साक्षात मौत को सामने देखकर उसकी रूह काँप उठी। रंगा अपने हाथ का भारी कड़ा घुमाते हुए उसके सामने चट्टान की तरह खड़ा था।
"भैयाजीजीजी..." वह अधिकारी बुरी तरह चीखते हुए रंगा के पैरों में गिर पड़ा। "माफ कर दीजिए भैयाजी... मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि आप यहाँ हैं!" डर के मारे उसकी आवाज़ नहीं निकल रही थी।
यह सब देख रही वीना को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। क्या यह वही आदमी था जो अभी कुछ देर पहले उस पर चिल्ला रहा था और उसे डरा रहा था? रंगा ने उसका कॉलर पकड़ा और उसे झटके से ऊपर खींच लिया।

"अगर आज के बाद तू इस इलाके में भी नज़र आया... तो तुझे यहीं ज़िंदा गाड़ दूँगा!" रंगा ने दाँत पीसते हुए गुर्रा कर कहा। वह अधिकारी डर के मारे इस कदर कांप रहा था कि लग रहा था वहीं पैंट गीली कर देगा।
रंगा के डर से उस अधिकारी को दुम दबाकर भागते देख, इतनी बड़ी मुसीबत और तनाव के बीच भी वीना के चेहरे पर एक पल के लिए हल्की सी मुस्कान आ गई। उसे लगा कि रंगा के होने से कम से कम बाहर की दुनिया का डर तो खत्म हुआ।
लेकिन बेचारा राजेश, जो देख नहीं सकता था, वह रंगा के उस खौफनाक चेहरे और उसकी आँखों में नाचती दरिंदगी को भांप नहीं पाया। "क्या हुआ भैयाजी... क्या उस अधिकारी ने आपको बहुत परेशान किया? उसने बदतमीजी तो नहीं की?" उसने बड़ी चिंता से पूछा।
"अरे नहीं राजेश भाई! कुछ नहीं... जान-पहचान का आदमी निकला, बस दो-चार बातें सुनाईं और भेज दिया। अब वह इस तरफ सिर उठाकर भी नहीं देखेगा," रंगा ने बड़े ही कुटिल अंदाज़ में कहा।
"वीना... ओ वीना! भैयाजी के लिए ज़रा एक गिलास बढ़िया कॉफी बनाकर लाओ," राजेश ने आवाज़ दी, पर रंगा ने तुरंत उसे रोक दिया।
"नहीं राजेश भाई... मैं कॉफी नहीं पीता!"
"तो फिर... चाय मँगवाऊँ?"
"नहीं... मुझे 'दूध' चाहिए!" रंगा ने इस शब्द पर इतना ज़ोर दिया और वीना की आँखों में आँखें डालकर ऐसा गंदा इशारा किया कि वीना के जिस्म में बिजली सी दौड़ गई।
वीना के चेहरे पर आई वह दो सेकंड की मुस्कान पत्थर की तरह जम गई और फिर गायब हो गई। उसे समझ आ गया कि रंगा किस 'दूध' की माँग कर रहा है। लेकिन उसका अपना ही पति अनजाने में उस दरिंदे के लिए रास्ता बना रहा था, यह सोचकर उसका दम घुटने लगा।
"वीना... घर में दूध है न?" राजेश ने बड़ी मासूमियत से पूछा। वीना का सिर चकराने लगा। 'हाए... आपको पता भी नहीं कि वह किस दूध की माँग कर रहा है, और आप खुद ही मुझे उसकी तरफ धकेल रहे हैं!' वह बुरी तरह तड़प उठी, पर कोई और रास्ता न देख, बस इतना ही बुदबुदाई, "हूँ... है..."
"फिर क्या बात है भैयाजी? आप रुकिए... वीना आपको दूध पिलाएगी, उसे आप एकदम तृप्ति के साथ पीकर ही जाइएगा!" राजेश ने बड़े ही खुले दिल से कहा।
रंगा अपनी मूँछों पर ताव देते हुए, एक शिकारी की तरह अपनी शिकार (वीना) को घूर रहा था। उसकी वह विक्षिप्त और गंदी नज़रों वाली निगाहें वीना के शरीर को आग की तरह झुलसा रही थीं।
"सुनिए... आइए, आपकी आँखों में दवाई डालनी है," कहकर वीना ने अपने पति को सहारा दिया और उसे धीरे से बेडरूम की तरफ ले गई। उसे बिस्तर पर लिटाकर उसने उसकी दोनों आँखों में ड्रॉप्स डाल दिए। वह जानती थी कि यह दवाई असर करते ही अगले 30 मिनट तक राजेश न तो अपनी आँखें खोल पाएगा और न ही बिस्तर से हिल पाएगा। अपने पति को कुछ देर के लिए एक अंधेरी दुनिया में धकेलकर, वह उसकी इज़्ज़त बचाने के लिए अपनी बलि देने को तैयार हो गई।
वहाँ से निकलकर वह सीधे पालने के पास गई और अपने सोते हुए नन्हे बच्चे को एक बार बड़ी हसरत भरी निगाहों से देखा। फिर अपनी चार साल की बेटी को कुछ खिलौने थमाते हुए कहा, "बेटा, शोर मत करना, यहीं खेलो," और उस कमरे का दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया।
सीधे बाथरूम जाकर वीना ने वहाँ लगे आईने में खुद को देखा। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरा पीला पड़ चुका था। "क्या... क्या यह करना ही होगा वीना? क्या अपने पति और बच्चों के लिए तुझे यह भी सहना होगा?" उसने खुद से सवाल किया। लेकिन, वह एक लाख रुपये की गड्डियाँ और मकान मालकिन की वो धमकियाँ उसके दिमाग में जवाब बनकर गूँज उठीं।

उसने अपना चेहरा अच्छे से धोया, एक लंबी और भारी सांस ली, अपनी साड़ी को एक बार फिर ठीक किया और हॉल में आ गई।
वहाँ भैयाजी (रंगा) बड़ी शान से बैठा था। वीना ने धीरे से कदम बढ़ाए और हॉल के मुख्य दरवाज़े की कुंडी लगा दी। अब उस घर में, एक तरफ अपनी बेबसी में डूबा अंधा पति था, दूसरी तरफ अबोध बच्चे... और बीच में खड़ा था एक शिकारी और उसके जाल में फँसी एक बेबस औरत!
वीना ने नम आँखों से उस कमरे की तरफ देखा जहाँ उसका पति राजेश बेबस पड़ा था। उसका दिल किसी युद्ध के मैदान की तरह धड़क रहा था। रंगा की ओर बढ़ाया गया उसका हर कदम ऐसा था जैसे वह जलते अंगारों पर चल रही हो।
उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई—क्या सारी खिड़कियाँ ठीक से बंद हैं? दरवाज़े की झिरी से भी रोशनी की एक किरण अंदर नहीं आनी चाहिए! "हे ईश्वर, गलती से भी कोई यह न देख ले... मेरी इज़्ज़त इन चार दीवारों के बीच ही दफन हो जाए," उसने मन ही मन प्रार्थना की। लेकिन वह ईश्वर इस वक्त रंगा के रूप में उसके सामने खड़ा था।
रंगा अपनी कुर्सी से उठा और उसके करीब आया। उसके बदन से आती शराब की गंध और वह मर्दाना घमंड वीना को अंदर तक झकझोर रहा था।
अचानक रंगा ने वीना की कलाई पकड़ ली। वीना के फूल जैसे कोमल हाथ उसकी लोहे जैसी पकड़ में फंसकर रह गए। मद्धम रोशनी में उसके नाखूनों पर लगी नेल पॉलिश चमक रही थी। उसके चिकने और ठंडे हाथ डर के मारे बुरी तरह कांप रहे थे।
लेकिन वीना को उसकी पकड़ दहकती आग की तरह महसूस हुई। पत्थर तोड़ने वाले मजदूर की तरह रंगा की हथेलियाँ खुरदरी और सख्त थीं।
"क्या बात है वीना... तुम्हारे हाथ तो..." रंगा ने कुछ कहना चाहा, लेकिन उसकी आवाज़ सुनकर वीना डर गई कि कहीं राजेश न सुन ले। उसने झट से अपने बाएं हाथ से रंगा मुँह को बंद करदी (राजेश अंदर ही है... शोर मत कीजिए, कुछ मत बोलिए) का इशारा किया। उसकी आँखों में छटपटाहट और डर साफ़ दिख रहा था—डर अपने पति के सामने बेआबरू होने का, डर अपनी इज़्ज़त की नीलामी का।

रंगा एक पल के लिए बिल्कुल शांत हो गया। लेकिन वह वीना की चेतावनी से डरकर नहीं, बल्कि उसके हाथों के जादू से शांत हुआ था। उसकी खुरदरी और बदसूरत शख्सियत के सामने वीना की वह कोमल हथेली, जो किसी छोटे बच्चे के गाल की तरह मुलायम और रेशमी थी, जब उसके होंठों पर दबी, तो रंगा उस अहसास में डूब गया। उसकी मूंछों के बाल जब वीना की हथेली में चुभे, तो वीना ने झटके से शर्म और संकोच में अपना हाथ हटा लिया।
उसने रंगा का हाथ पकड़ा और उसे घसीटते हुए रसोई की ओर ले गई। वहाँ की मद्धम रोशनी में, वह रंगा के बिल्कुल करीब खड़ी हो गई। इतनी करीब कि उन दोनों की सांसें आपस में टकरा रही थीं।
वीना ने बहुत ही धीमी और कांपती हुई फुसफुसाहट में कहा, "देखिए... मैं आपको ज्यादा देर तक घर के अंदर नहीं रख सकती। राजेश को कभी भी होश आ सकता है या उसकी नींद खुल सकती है। जो भी करना है... जल्दी खत्म कीजिए और यहाँ से चले जाइए।"
जब वीना फुसफुसा रही थी, तो उसके मुँह से आती वह हल्की सी खुशबू और उस अंधेरे में उसके होंठों की थिरकन ने रंगा को एक भूखे दरिंदे में बदल दिया। रंगा जानता था कि उस एक लाख रुपये के बदले वह आज क्या हासिल करने वाला है।
रंगा ने बिना कोई वक्त गंवाए वीना को कमर से पकड़ा और उसे हवा में उठाते हुए सीधे किचन के स्लैब (मेज़) पर बैठा दिया। वीना के पैर हवा में झूलने लगे और रंगा उसके दोनों पैरों के बीच इतनी करीब आकर खड़ा हो गया कि उनके शरीर एक-दूसरे में धँस रहे थे। रंगा ने अपने खुरदरे हाथ से वीना के गाल को सहलाया और फिर अपने अंगूठे से उसके रेशमी होंठों पर एक लकीर सी खींची। "ओह... क्या मखमली होंठ हैं!" रंगा वासना से पागल हो रहा था।
जैसे ही रंगा उसके होंठों का रस चखने के लिए नीचे झुका, वीना ने नफरत और मजबूरी के मिले-जुले अहसास में झटके से अपना चेहरा दूसरी तरफ मोड़ लिया। रंगा का वह गंदा और गीला चुंबन उसके गाल पर जा गिरा। वह छुअन वीना को दहकते कोयले की तरह लगी, जैसे उसके चेहरे की खाल जल गई हो।

रंगा ने हार नहीं मानी। उसने अपने खुरदरे और मजबूत हाथ से वीना का चेहरा दबोचा और अपनी तरफ घुमा लिया। जैसे ही वह दोबारा उसके होंठों की तरफ बढ़ा, वीना ने बिजली की फुर्ती से अपनी छोटी सी हथेली से अपने होंठों को कसकर ढँक लिया। उसकी आँखों में एक मूक चीख थी, जो साफ कह रही थी—"मैं इसके लिए तैयार नहीं हूँ..."

रंगा के पास वह ताकत और रसूख तो था ही, जिससे वह उसे उसी वक्त अपनी मुट्ठी में भींच सकता था। लेकिन इस वक्त वह सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि एक शातिर शिकारी था। उसने मन ही मन सोचा, "शिकार करने के लिए यह कोई मामूली गाय नहीं है... यह तो एक बेहद खूबसूरत हिरनी है! इसे जल्दबाजी में मसलना नहीं है, बल्कि मजे से, एक-एक कतरे का स्वाद लेकर इसका भोग करना है।" वह अपनी इस गंदी सोच पर अंदर ही अंदर मुस्कुरा उठा।
रंगा की भूखी नजरें वीना की गर्दन की ढलानों से फिसलती हुई नीचे उतरीं और उसके उभारों पर जाकर जैसे लंगर डाल दिया। उसकी वह निगाह किसी नुकीले भाले की तरह वीना के बदन को छलनी कर रही थी।
वीना ने अपने पल्लू को जितनी मजबूती और सलीके से खींचकर खुद को ढंकने की कोशिश की, उसके दिल की धड़कनें उतनी ही बेकाबू होकर उस कपड़े की ओट से दिखाई देने लगीं। डर और जिल्लत के मारे उसकी सांसें उखड़ गई थीं। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी, और हर सांस के साथ उसके यौवन का उतार-चढ़ाव एक अजीब से खौफनाक लय में थरथरा रहा था।
रंगा की आँखों में अब वहशीपन तैर रहा था। उसने वीना की खूबसूरती को घूरते हुए, उसके कंधे पर टिके पल्लू को धीरे से सरका दिया, जो सरक कर नीचे फर्श पर जा गिरा। उसकी बड़ी-बड़ी चूची एकदम से पके हुए पपाया की तरह ब्लाउज में कसी हुई नजर आने लगी जो कि एकदम नुकीली लग रही थी, अब वीना का ऊपरी हिस्सा उस तंग ब्लाउज के साथ रंगा की नज़रों के सामने पूरी तरह नुमाया था। हालाँकि ब्लाउज के सभी हुक मजबूती से लगे थे, लेकिन वीना के उभारों के भारीपन को सँभालने में वह कपड़ा भी जैसे दम तोड़ रहा था।

उन दो पहाड़ों के बीच की गहरी घाटी... उस ढलान पर पसीने की बूंदें ओस की तरह चमक रही थीं। अंदर किसी भी तरह का अंतर्वस्त्र (Bra) न होने की वजह से, उसके वक्षों का असली आकार उस ब्लाउज की सिलाइयों को चीरकर बाहर आने के लिए बेताब दिख रहा था। दो हुकों के बीच के उस छोटे से फासले से झांकता हुआ उसका मांसल बदन रंगा के रगों में दौड़ते खून को और भी खौला रहा था।
रंगा ने धीरे से अपना दायां हाथ ऊपर उठाया। उन गहरे वक्षों की घाटी में जमा पसीने को उसने अपनी उंगलियों से सहलाया। उसकी वह खुरदरी तर्जनी उंगली, उन दोनों उभारों के बीच की उस गहरी दरार में धीरे से उतर गई।
जैसे ही उसकी वह पराई छुअन वीना के सीने को छुई... वीना शर्म और जिल्लत के मारे अपना सिर पीछे दीवार से टिकाकर सिसक उठी। उसका दिल दीवार पर बजने वाले नगाड़े की तरह धड़क रहा था। रंगा अपनी उंगली को उस दरार के अंदर यहाँ-वहाँ फिराने लगा। जहाँ-जहाँ उसकी उंगली छुई, वहाँ वीना का गोरा बदन लाल पड़ने लगा।
अगर रंगा अपनी उंगली को थोड़ा और गहराई में ले जाता, तो शायद उस ब्लाउज की सिलाइयां ही टूट जातीं। उसने धीरे से अपना हाथ बाहर निकाला और पहले हुक पर उंगली टिका दी। 'टक' की आवाज़ के साथ जैसे ही पहला हुक खुला, एक उभार आज़ाद होने के लिए ऊपर की ओर उछला। अगले ही पल, उसने दूसरे हुक को भी ढीला कर दिया।

वीना के उभारों की वह तड़प जैसे रंगा से भीख मांग रही थी, "हमें इस कैद से आज़ाद करो!" बिना किसी अंतर्वस्त्र (Bra) के उसका यौवन उस तंग कपड़े को धकेलकर बाहर आने के लिए बेताब था। रंगा ने एक कुटिल और कामुक मुस्कान के साथ, उन आखिरी दो हुकों को भी बहुत ही धीरे और मजे ले-लेकर खोल दिया।

जैसे किसी विशाल किले के कपाट खुलते हैं, वैसे ही उस ब्लाउज के दोनों हिस्से अगल-बगल हट गए। अगले ही पल... वीना के दोनों वक्ष उस चोली को चीरकर पूरी तरह बाहर आ गए और आज़ादी में थरथराने लगे। लहरें मारते हुए समंदर की तरह, उसकी उखड़ी हुई सांसों की रफ्तार के साथ वे ऊपर-नीचे हो रहे थे।
रसोई की उस मद्धम और पीली रोशनी में वीना का चूचियों बदन किसी मलाई की तरह चमक रहा था, जिसे देख रंगा की आँखें फटी की फटी रह गईं। तंग ब्लाउज उतारने के बाद उसके गोरे वक्षों के किनारों पर लाल लकीरें साफ़ उभर आई थीं, जो उसकी कोमलता का सबूत दे रही थीं। रंगा ने आज तक कई औरतों को अपनी उँगलियों पर नचाया होगा, पर वीना जैसी 'भरपूर' काया उसने पहले कभी नहीं देखी थी।

उसके उभार किसी सजी हुई मूरत की तरह सुडौल और भारी थे। गोरे बदन के उस समंदर के बीचों-बीच उन दो शिखरों पर मौजूद वे गहरी सांवली और अकड़ी हुई कलियां (Nipples) रंगा को अपनी ओर खींच रही थीं। वे कलियां ममता के बोझ और डर की वजह से पत्थर की तरह तन गई थीं, जैसे रंगा को अपनी ओर बुला रही हों।
पर उस हुस्न से भी ज़्यादा रंगा को एक और चीज़ ने पागल कर दिया था—उन भारी वक्षों में छिपा वो 'अमृत' जो बाहर आने को बेताब था।
उन दोनों वक्षों के बीच की गहरी घाटी में, राजेश द्वारा बाँधा गया वह मंगलसूत्र झूल रहा था।

वह काली धागा और सोने का वीना के मांसल उभारों के बीच धँसा हुआ था। एक स्त्री की पवित्रता का प्रतीक वह मंगलसूत्र, रंगा की दरिंदगी भरी नज़रों के सामने एक बेबस गवाह बनकर पड़ा था। रंगा बुदबुदाया, "ओह... क्या गजब की खूबसूरती है!"
रंगा ने धीरे से अपना दायां हाथ वीना के बाएं स्तन के नीचे रखा और उसे किसी भारी खजाने की तरह अपनी हथेली पर उठा लिया। बड़ी-बड़ी चूचियों को दशहरी आम की तरह दबाना शुरू कर दिया था उसका खुरदरा अंगूठा, उसकी चली छुहारा जैसी निप्पलको के चारों ओर के काले घेरे को बड़ी बेरहमी से रगड़ने लगा। उत्तेजना और वासना में अंधे होकर, रंगा ने उस सख़्त खड़ी nipple को अपनी दो उंगलियों के बीच पकड़कर पूरी ताकत से मसल दिया।

रंगा के उस ज़ोरदार दबाव से, "सीथ..." की एक बारीक सी आवाज़ के साथ वीना के वक्ष से दूध की तेज़ धार फूटी और रंगा के हाथों पर जा गिरी। उस गुनगुने और ताज़े 'अमृत' का अहसास जैसे ही रंगा की हथेलियों को छुआ, उसके दिमाग की नसें फटने लगीं। अब उसके लिए खुद पर काबू पाना नामुमकिन था।
एक भूखे भेड़िए की तरह वह नीचे झुका और 'लपक' कर वीना की तनी हुई निप्पल को अपने पूरे मुँह में भर लिया। रंगा की लार और वीना का वह पवित्र दूध आपस में मिल गए... और वह पागलों की तरह उसे चूसने लगा। उसकी जीभ वीना की उस घुंडी के चारों ओर किसी नाग की तरह घूमने लगी। "सीथ... सीथ..." की आवाज़ के साथ वह सफ़ेद दूध रंगा के हलक के नीचे उतरने लगा।.और दूसरे हाथ से उसकी दुसरी चुची को लगातार दबा रहा था,,
रंगा की भूख अब और भी ज़्यादा बढ़ गई थी। एक वक्ष को निचोड़ने के बाद, उसने बिना देर किए वीना की दूसरी चूची को अपने हाथ में भरा और उसे भी अपने मुँह में दबोच लिया। रंगा अब बारी-बारी से वीना के दोनों स्तनों का स्तनपान करने लगा, जैसे कोई भूखा जानवर अपने शिकार को नोचता है।
उसे इसमें बेइंतहा मज़ा आ रहा था। वह गर्म-गर्म, ताज़ा और मीठा दूध जब उसकी ज़ुबान पर लग रहा था, तो उसका स्वाद रंगा को मदहोश कर रहा था। वह उसे सिर्फ़ पी नहीं रहा था, बल्कि अपनी प्यास बुझाने के लिए वीना के मांसल उभारों को और भी तेज़ दबाकर सारा दूध हलक के नीचे उतार रहा था। "गप्प-गप्प" की आवाज़ें उस खामोश रसोई में गूँज रही थीं।
अब तक जो वीना डर और शर्म के मारे पत्थर बनी दीवार से चिपकी खड़ी थी, उसके भीतर अचानक एक अनजाना बदलाव आने लगा। रंगा का वह वहशीपन और उसकी मर्दाना ताकत वीना की सोई हुई नसों को जैसे झकझोरने लगी। बेइज्जती और जिल्लत के उस गहरे समंदर के बीच, एक अजीब सी शारीरिक उत्तेजना उसके दिमाग पर हावी होने लगी, जिसने उसकी सोचने-समझने की शक्ति को सुन्न कर दिया।
[FONT=-apple-system, BlinkMacSystemFont,]
https://ibb.co/F4BFZRt9[FONT=-apple-system, BlinkMacSystemFont,] [/FONT][/FONT]वीना ने अपने होंठों को इतनी ज़ोर से काटा कि उनमें से खून रिसने लगा, लेकिन दर्द के बजाय उसे एक सिहरन महसूस हुई। खुद पर से काबू खोते ही, उसने अनजाने में अपनी कमर को हल्का सा मोड़ा और अपनी चूची (स्तन) को रंगा के मुँह की ओर और भी ज़्यादा आक्रामक तरीके से धकेल दिया, ताकि वह उसे और गहराई से चूस सके।
उसकी आँखें नशे में डूबकर आधी बंद हो गईं। वह पूरी तरह भूल गई कि उसका पति राजेश बगल के कमरे में लाचार पड़ा है। वीना के हाथ अब रंगा के बालों में पहुँच गए थे और वह धीरे-धीरे उन्हें सहलाते हुए रंगा के उस शिकारी अंदाज़ को खुद में समेटने लगी। उसने इस 'शिकार' के आगे खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया था।
बाएं स्तन पर अपनी दरिंदगी पूरी करने के बाद, रंगा अगले ही पल दाईं चूची पर टूट पड़ा। एक भूखे जानवर की तरह उसने अपना मुँह जितना हो सके उतना फैलाया और पूरी आक्रामकता के साथ उसकी चूची को अपने भीतर भर लिया। वह उसे इतनी बुरी तरह चूसने लगा जैसे वह वीना के शरीर से उसका सारा वजूद खींच लेना चाहता हो।
वीना अब पूरी तरह से सुध-बुध खो चुकी थी। आत्मसम्मान और जिस्म की प्यास के बीच चल रही जंग में, उसकी उत्तेजना ने उसे धोखा दे दिया था। उसे अब होश नहीं था कि वह क्या कर रही है। उसने खुद ही रंगा के सिर को पकड़कर अपनी चूची के साथ और भी ज़ोर से चिपका लिया, जैसे वह उसकी इस दरिंदगी को और गहराई से महसूस करना चाहती हो।
रसोई की मेज़ पर बैठी वीना के पैर, जो अब तक हवा में झूल रहे थे, अचानक ऊपर उठे और रंगा की भारी और खुरदरी कमर के चारों ओर कस गए। उसने अपनी टाँगों से रंगा को इस कदर जकड़ लिया कि उनके बीच की दूरी पूरी तरह मिट गई। रंगा की दाढ़ी के बाल जब उसकी संवेदनशील चूची और नाजुक त्वचा पर रगड़ खा रहे थे, तो वीना की कमर बिजली की तरह लचक रही थी।
बाएं स्तन से दाएं और दाएं से फिर बाएं... रंगा किसी भूखे दरिंदे की तरह वीना की दोनों चूचियों के बीच झपट रहा था। उसकी भारी सांसें और वीना की बेतहाशा तड़प ने उस रसोई को एक कामुक युद्ध के मैदान में बदल दिया था। इसी बीच, वीना की चूचियों के बीच झूलता हुआ वह मंगलसूत्र बार-बार रंगा के चेहरे और होंठों से टकरा रहा था।
जब वीना ने महसूस किया कि उसके पति की दी हुई वह आखिरी निशानी रंगा की हवस के रास्ते में कांटा बन रही है, तो उसने एक पल के लिए भी नहीं सोचा।
उसने अपने कांपते हुए हाथों से उस पवित्र मंगलसूत्र को पकड़ा और उसे खींचकर अपने गले के पीछे की तरफ डाल दिया। उसका यह कदम ऐसा था जैसे वह अपनी मर्यादा के आखिरी धागे को भी खुद ही तोड़ रही हो। "अब कोई बाधा नहीं है..." उसके इस कृत्य ने जैसे रंगा को खुली छूट दे दी। राजेश के प्रति वफादारी और मंगलसूत्र की पवित्रता से कहीं ज्यादा, इस वक्त रंगा का वह खुरदरा स्पर्श वीना के लिए एक गहरा नशा बन चुका था।
बिना किसी बाधा के सामने मौजूद उस बेपर्दा खूबसूरती को देखकर रंगा और भी ज़्यादा जंगली हो गए। उन्होंने वीना की दोनों चूचियों को एक साथ अपने हाथों में भींच लिया और अपने चेहरे को उन मांसल उभारों के बीच रगड़ने लगे। रंगा की खुरदरी मूंछें और बढ़ी हुई दाढ़ी जब वीना की कोमल चूचियों और निप्पल्स पर चुभ रही थीं, तो वीना की सिहरन और बढ़ गई। जिस खुरदरे और भारी बदन से वह अब तक डर रही थी, वही अब उसे अपनी सुध-बुध खोने पर मजबूर कर रहा था।
रसोई के उस अंधेरे कोने में जब यह शिकारी अपनी हवस के चरम पर था और वीना मदहोश होकर उनकी बाहों में झुली जा रही थी, तभी अचानक एक आवाज़ गूँजी।
"टप... टप... वीना!"
अंदर के कमरे से राजेश की आवाज़ पूरे सन्नाटे को चीरती हुई आई। शायद नींद में उसने करवट बदली थी या वह पानी माँगने के लिए जाग गया था।
उस एक पल में राजेश की आवाज़ सुनकर वीना जैसे पत्थर की हो गई। बिजली गिरने जैसा अहसास हुआ और उसकी सारी कामुक भावनाएं पल भर में दम तोड़ गईं। "हे भगवान... मैं ये क्या कर रही हूँ? मेरा पति पास में ही है और मैं..." यह आत्मग्लानि और अपराधबोध उसके दिल में किसी ज़हरीले तीर की तरह चुभ गया।
उसने झटके से अपनी टाँगें, जो रंगा की कमर पर कसी हुई थीं, ढीली कर दीं। जिस रंगा के सिर को वह अभी तक अपनी चूचियों से चिपकाए हुए थी, उसे अब एक घिनौने अहसास के साथ पूरी ताकत से पीछे धकेल दिया।
"हाय राम... वो जाग गए!" उसने कांपती हुई आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा।
तभी राजेश की आवाज़ और भी ज़ोर से गूँजी। "वीना... दरवाज़ा खोलो! ये अंदर से बंद क्यों है? टप... टप..." दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ ने वीना के पेट में खौफ की लहर दौड़ दी। उसे अहसास हो गया कि नींद की दवा का असर खत्म हो चुका है और उसका पति बिस्तर से उठकर अब रसोई की तरफ आ सक्ता है।
रंगा का मन बिल्कुल नहीं भर रहा था। उस 'अमृत' (दूध) के स्वाद और वीना के जिस्म की गर्माहट में डूबे हुए वह जैसे किसी दूसरी दुनिया में थे। जब वीना ने उन्हें धकेला, तो उन्होंने बहुत बेमन से अपना चेहरा उसकी चूचियों से अलग किया। उनके होंठों पर अभी भी वीना के दूध की सफेदी और नमी चिपकी हुई थी।
वीना घबराहट के चरम पर थी। मौत के डर से कांपते हुए उसने अपने ब्लाउज के हुक एक-एक करके लगाने शुरू किए। डर के मारे उसके हाथ इतना थरथरा रहे थे कि एक हुक तो फँस ही नहीं रहा था। वह फौरन रसोई के स्लैब से नीचे कूदी और रंगा के कंधे पकड़कर उन्हें पीछे के दरवाजे की ओर धकेलने लगी।
"जल्दी जाइए भैयाजी... वो आ गए! अब यहाँ एक पल भी मत रुकिए... जाइए!" वह पागलों की तरह उन्हें बाहर निकालने की कोशिश कर रही थी।
उसने झटके से अपनी पीठ पर लटके मंगलसूत्र को वापस आगे खींचा और सीने पर सजा लिया। अपने बिखरे हुए बालों को समेटते हुए और साड़ी के पल्लू को आनन-फानन में ठीक कर वह मुख्य दरवाजे की ओर भागी, जहाँ राजेश लगातार दस्तक दे रहा था।
रंगा के चेहरे पर रत्ती भर भी डर नहीं था। वीना उन्हें बाहर निकालने के लिए पागलों की तरह धक्का दे रही थी, लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। उलटा, वे बड़े आराम से चलते हुए हॉल में गए और वहां रखी कुर्सी पर ऐसे बैठ गए जैसे कुछ हुआ ही न हो।
वीना ने किसी तरह अपनी अस्त-व्यस्त साड़ी को संभाला और अपने चेहरे पर छाई दहशत को जज्ब करते हुए राजेश के कमरे की कुंडी खोली। राजेश अपनी बैसाखी के सहारे लड़खड़ाते हुए बाहर निकला। उसके चेहरे पर उलझन थी। "क्या हुआ वीना? तुमने बाहर से दरवाजा क्यों बंद कर दिया था? मैं कब से आवाज लगा रहा हूँ!" उसने शक भरी नज़रों से वीना की ओर देखा।
वीना का दिल जैसे सीने को फाड़कर बाहर आ जाएगा। "वो... वो... गुड़िया खेल रही थी, शायद उसी ने गलती से बाहर से कुंडी लगा दी होगी," उसने हकलाते हुए झूठ बोला और बात को रफा-दफा करने की कोशिश की।
तभी राजेश ने हॉल की ओर गर्दन घुमाई, "भैयाजी चले गए क्या?"
अभी राजेश की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि रंगा कुर्सी से उठा । उनके चेहरे पर वही शिकारी और वंचक मुस्कान थी। उन्होंने एक तिरछी नज़र वीना के उस पल्लू पर डाली जो अभी भी ठीक से संभला नहीं था, और बिना कुछ बोले बड़े रौब के साथ मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ गए। जाते-जाते उन्होंने पलटकर वीना की आँखों में देखा, जैसे कह रहे हों—"अभी तो बस दूध चखा है, पूरा जाम अभी बाकी है।"
हाँ, वो चले गए," वीणा ने नीची निगाहें किए हुए किसी तरह अपनी आवाज़ को संभाला और कहा।
राजेश ने उसकी ओर देखते हुए अपनी आवाज़ में एक अजीब सी उत्सुकता के साथ पूछा, "अच्छा... और वो दूध? तूने उन्हें पिलाया कि नहीं? भैयाजी काफी देर से उसी की आस में बैठे थे।"
राजेश का सवाल सुनते ही वीणा का चेहरा शर्म और ग्लानि से सुर्ख लाल हो गया। उसके कानों में अभी भी रसोई की वो 'सीथ-सीथ' वाली आवाज़ें और भैयाजी के होठों की छुअन गूँज रही थी। घबराहट में उसके मुँह से सच और झूठ का एक मिला-जुला और खतरनाक जुमला निकल गया।
उसने अपने ब्लाउज पर पड़े दूध के धब्बों को पल्लू से ढंकते हुए कहा, "हाँ... वो... वो तो मन भर कर पीकर गए हैं।"
कहते ही उसे एहसास हुआ कि उसने क्या बोल दिया है। उसने बात तो दूध के गिलास के संदर्भ में कहने की कोशिश की थी, लेकिन उसके शब्द और उसका लहजा रंगा की उस दरिंदगी की गवाही दे रहे थे जो अभी-अभी उसकी चूचियों के साथ हुई थी।
रंगा जब अपनी दुकान पर पहुँचे, तो उसे अपनी किस्मत पर यकीन नहीं हो रहा था। जिस वीना को उन्होंने अब तक सिर्फ दूर से हसरत भरी निगाहों से देखा था, जो उन्हें देखकर अपना रास्ता बदल लेती थी, आज उसी की चूचियों का 'अमृत' वे जी भरकर पीकर आए थे। उनकी जुबान पर अभी भी वीना के दूध का मीठा और नमकीन स्वाद चढ़ा हुआ था।
लेकिन उस 'अमृत' ने उनकी प्यास बुझाने के बजाय उनकी रगों में आग लगा दी थी। रंगा की हालत अब बहुत खराब हो रही थी। वीना के बदन की गर्मी और उसकी चूचियों के उस एहसास ने उनके भीतर के सोए हुए शैतान को जगा दिया था।
लुंगी के नीचे उसका लंड किसी तपती हुई लोहे की छड़ की तरह सख्त होकर पत्थर बन चुका था। उसकी नसें तनाव के मारे इस कदर फूल गई थीं कि लग रहा था अभी खाल फाड़कर बाहर निकल आएंगी। वीना के उस दूधिया बदन के अहसास ने उसके लंड में इतनी जान भर दी थी कि वह बार-बार लुंगी को फाड़ देने की जिद कर रहा था।
उसकी आँखों में वहशीपन उतर आया था। वो बुरी तरह हांफ रहा था । उसे अब किसी भी कीमत पर एक गहरी योनि चाहिए थी जिसमें अपना यह सारा जहर, सारी हवस और वह उफनता हुआ तनाव खाली कर सकें। उसका रोम-रोम एक छेद के लिए तड़प रहा था।वह दुकान के भीतर एक पिंजरे में बंद शेर की तरह चक्कर काट रहे थे। पसीना उनके माथे से बहकर उनकी आँखों में जा रहा था, लेकिन उनका हाथ बार-बार अपनी लुंगी के उस भारी उभार को मसल रहा था।
भैयाजी ने कांपते हाथों से अपना फोन उठाया और कॉन्टैक्ट लिस्ट को पागलों की तरह स्क्रॉल करने लगे। उनकी आँखों के सामने बस जिस्मों के नाम घूम रहे थे। उनकी उंगलियाँ स्क्रीन पर तेज़ी से चल रही थीं, जबकि लुंगी के नीचे उनका लंड हर बीतते सेकंड के साथ और भी ज़्यादा पत्थर होता जा रहा था।
"कामनी... नहीं, वो तो मायके गई है, हाथ नहीं आएगी," उन्होंने दाँत पीसते हुए बुदबुदाया। उनकी साँसें तेज़ हो गई थीं। फिर उनकी नज़र एक और नाम पर रुकी।
"जानकी? धत... वो तो बीमार पड़ी है, उसका छेद तो अभी किसी काम का नहीं होगा।"
भैयाजी का गुस्सा और हवस अब उनके सिर चढ़कर बोल रही थी। उनका लंड इतना सख़्त हो चुका था कि उन्हें चलने में भी दर्द महसूस हो रहा था। उन्हें बस एक 'छेद' चाहिए था, चाहे वह कितना ही महंगा क्यों न पड़े या उसके लिए उन्हें कितनी ही ज़बरदस्ती क्यों न करनी पड़े।
रंगा की बेचैनी जब अपने चरम पर थी, तभी कुदरत ने जैसे उसकी पुकार सुन ली। दूर से एक साया अपनी ओर आता देख रंगा की आँखों में चमक आ गई। वह और कोई नहीं, शर्मा जी अपनी पत्नी पूजा शर्मा के साथ उसकी दुकान की ओर बढ़ रहे थे।
पूजा शर्मा...
जिसे देखते ही रंगा के मन में वासना का सैलाब उमड़ पड़ा। पूजा के पति रेलवे में दूसरे राज्य में काम करते थे, और जब भी वे बाहर होते, रंगा पूजा के घर जाकर उसके जिस्म की गहरी खाइयों को घंटों तक नापता था। उसे कई बार अपनी हवस का निशाना बना चुका रंगा जानता था कि पूजा का 'मैदान' कितना उपजाऊ है। लेकिन आज वह अपने पति के साथ क्यों आ रही थी?
खैर, रंगा को इससे क्या फर्क पड़ता? उसका लंड ने अपना निशाना साध लिया था। रंगा ने अपने चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान ओढ़ी और अपनी लुंगी के उस उभार को ढंकते हुए उनका स्वागत किया।
"अरे! आइए... आइए शर्मा जी! पूजा जी... आज कैसे आना हुआ? बड़ा शुभ दिन है जो आप दोनों एक साथ पधारे," रंगा ने अपनी आवाज़ में चाशनी घोलते हुए कहा, जबकि उसकी नज़रें पूजा के उन भरे हुए अंगों को स्कैन कर रही थीं जो साड़ी के भीतर से झाँक रहे थे।
रंगा की आँखों में अब एक शिकारी की चमक थी। उसका पत्थर जैसा सख़्त लंड अब पूजा के जिस्म की गहराई में उतरने के लिए बेताब था। रंगा अब एक ऐसा खतरनाक खेल खेलने वाले हैं जहाँ शर्मा जी की आँखों के सामने उनकी पत्नी पूजा शर्मा की योनि को चीरने की तैयारी में होंगे।
क्या पूजा अपने पति के डर से खामोश रहकर रंगा का वह खौफनाक 'प्रहार' झेलेगी? क्या रंगा शर्मा जी के सामने ही पूजा के बदन से अपनी हवस की आग बुझा पाएंगे?..अगले भाग के लिए तैयार रहिए...
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