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कामिनी का चेहरा और जिस्म उत्तेजना और अभी अभी की गई हरकत से लाल था, उसकी धड़कन अभी भी एज़ चल रही थी,
कमरे में एक भारी खामोशी थी, जिसमें सिर्फ़ रघु की भारी सांसें और कामिनी के दिल की धड़कनें सुनाई दे रही थीं।
उसने अभी-अभी एक ऐसा कृत्य किया था, जिसके बारे में सोचना भी किसी सभ्य समाज में अपराध था। उसने एक शराबी नौकर के मुंह में अपना पेशाब त्याग दिया था।
शारीरिक रूप से, उसका मूत्राशय (Bladder) खाली हो चुका था। वह दबाव, वह फटने वाला दर्द अब शांत था।
लेकिन... कामुक रूप से?
वह अभी भी प्यासी थी। बल्कि, उस 'त्याग' ने उसकी प्यास को और भड़का दिया था।
उसकी चूत के अंदर की नसों में अभी भी फड़फड़ाहट हो रही थी। उसे घर्षण (Friction) चाहिए था। उसे रगड़ चाहिए थी। उसे एक ऐसे चरम सुख (Orgasm) की तलाश थी जो उसे तोड़ दे।
वह पलटने ही वाली थी कि उसकी नज़र पास पड़े स्टूल पर रखी हलवे की कटोरी पर पड़ी।
स्टील की कटोरी में रखा वह गाजर का लाल हलवा, बल्ब की पीली रोशनी में चमक रहा था।
उसमें पड़ा देसी घी जमने लगा था, लेकिन उसकी महक अभी भी हवा में थी।
कामिनी के दिमाग में रघु की आवाज़ गूंजी— "गरम गाजर का हलवा...तो मुझे भी बहुत पसंद है, मलाई... दाल के खाने मे आनंद आता है...उफ्फ्फ!"
ना जाने क्यों कामिनी के होठों पर एक कुटिल मुस्कान रेंग गई।
एक अजीब सा विचार, जो किसी विषैले सांप की तरह उसके दिमाग में कुंडली मारकर बैठा था, अब फन फैला रहा था।
'रघु को हलवा पसंद है, भूखा भी होगा सुबह से " कामिनी के मन मे दया के साथ साथ एक अजीब सा वहसी विचार भी कोंध रहा था.
आज बरसाती रात मे खड़ी ये कामिनी अलग थी, बरसो रमेश की मार, अपमान, आवेहलाना झेल झेल कर कामिनी के अंदर भी एक रमेश पैदा हो गया था, जिसका उसे खुद नहीं पता था.
जुल्म सहने सहते इंसान खुद जुल्मी भी बन जाता है.
एक अजीब से विचार ने कामिनी के शरीर में एक सिहरन पैदा कर दी, यह सिर्फ़ सेक्स नहीं था, यह भोजन का अपमान और मर्यादा का चीरहरण था। और यही बात उसे सबसे ज्यादा उत्तेजित कर रही थी।
कामिनी खटिया के पास वापस आई।
उसने कटोरी उठाई। हलवा अब गुनगुना भी नहीं रहा, वह ठंडा हो चुका था।
उसने अपनी लंबी, पतली उंगलियों को कटोरी में डाला।
उसने एक बड़ा हिस्सा—जिसमें गाजर के कद्दूकस किए हुए रेशे और जमा हुआ घी था—अपनी उंगलियों पर उठाया।
हलवा उसकी उंगलियों पर चिपचिपा और भारी महसूस हुआ।
कामिनी ने अपना गाउन फिर से ऊपर किया।
उसने अपनी टांगें चौड़ी कीं।
उसकी चूत अभी भी पेशाब और काम-रस से गीली थी।
कामिनी ने वह हलवा अपनी योनि के मुहाने पर रखना शुरू किया।
चप...चप। थप...
हलवे का ठंडा और चिपचिपा स्पर्श उसकी संवेदनशील त्वचा पर लगा।
"सीईईईई.... इस्स्स्स.... आअह्ह्ह...." कामिनी की लाल आँखों मे वहशीपन साफ दिख रहा था.
कामिनी ने आंखें बंद कर लीं।
उसने अपनी उंगलियों से उस हलवे को किसी मरहम की तरह अपनी चूत पर पोतना शुरू किया।
गाजर के छोटे-छोटे दाने (Grains) उसकी क्लिटोरिस (सुपारी) पर रगड़ खाने लगे। घी की चिकनाई उसकी योनि के होठों (Labia) पर एक लेप की तरह चढ़ गई।
उसने हलवे को सिर्फ़ बाहर नहीं लगाया, बल्कि अपनी उंगलियों से थोड़ा अंदर धकेल दिया।
अब उसकी पूरी निजता, उसका पूरा स्त्रीत्व, गाजर के हलवे और घी की एक मोटी परत से ढक चुका था।
वह एक स्वादिष्ट और गंदी डिश बन चुकी थी।
कामिनी फिर से रघु के चेहरे के ऊपर आई।
रघु अभी भी उसी मुद्रा में लेटा था, मुंह खुला हुआ, जिसमें अभी भी कामिनी के पेशाब का स्वाद बाकी था।
कामिनी ने सोचा— "ऐसा हलवा तूने कभी नहीं खाया होगा "
धप...
कामिनी ने अपनी हलवे से सनी हुई चूत को पूरी ताकत से रघु के मुंह पर जमा दिया।
इस बार संपर्क (Contact) गीला और फिसलन भरा था।
हलवे की परत ने रघु के होंठों और कामिनी की चूत के बीच एक कुशन का काम किया।
जैसे ही रघु की जीभ को मिठास मिली, उसके नशे में डूबे दिमाग ने करवट ली।
कड़वी शराब और नमकीन पेशाब के बाद... अचानक यह मिठास?
रघु के अवचेतन मन ने इसे 'खाना' समझा।
उसकी जीभ, जो अब तक शांत थी, सक्रिय हो गई।
लप... लप... चप... चप...
उसने चाटना शुरू किया।
लेकिन इस बार यह सिर्फ़ चाटना नहीं था।
कामिनी के लिए यह एक अनुभव था।
जब रघु की जीभ हलवे को चाटने के लिए बाहर निकलती, तो वह गाजर के रेशों को कामिनी की क्लिटोरिस पर रगड़ देती।
गाजर के वो छोटे-छोटे टुकड़े किसी हज़ारों नन्हे ब्रश की तरह कामिनी की चूत को रगड़ रहे थे।
"आह्ह्ह्ह.... माँ..... रघु.... हाँ....इस्स्स.... उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़......"
कामिनी ने रघु के बालों को पकड़ लिया।
रघु हलवा खाने की कोशिश कर रहा था। वह अपनी जीभ को घुमा-घुमाकर कामिनी की दरारों में फंसा हुआ हलवा निकाल रहा था।
सुड़प-सुड़प-चप...
कमरे में अजीब सी आवाज़ें गूंजने लगीं।
घी की वजह से रघु की जीभ बहुत आसानी से फिसल रही थी, और गाजर की वजह से वह आवश्यक घर्षण (Friction) पैदा कर रही थी।
कामिनी ने अपनी कमर को एक लय (Rhythm) में हिलाना शुरू किया।
वह अपनी गांड को रघु के मुंह पर गोल-गोल (Grinding) मथने लगी।
जैसे चक्की में दाने पीसे जाते हैं, वैसे ही वह रघु के मुंह और अपनी चूत के बीच उस हलवे को पीस रही थी।
हलवा, पेशाब, काम-रस और रघु की लार—सब मिलकर एक सफेद-लाल झाग बन गए थे।
यह एक घिनौना मिश्रण था, लेकिन रघु के लिए यह अमृत था। एयर अमृत पिलाने वाली अप्सरा कामिनी.
रघु की जीभ अब उसकी योनि के अंदर तक जाने की कोशिश कर रही थी, वहां छुपी हुई मिठास को खोजने के लिए।
कामिनी की सांसें उखड़ने लगीं।
"खा जा.... पूरा साफ़ कर....... मेरा हलवा खा.... चाट मेरी चुत को... उफ्फ.... आअह्ह्ह.... आउच.."
वह पागलों की तरह बड़बड़ा रही थी।
रघु के दाँत बार बार हलवा चबाने मे कामिनी की चुत की पंखुडियो को काटबडे रहे थे, उसके दाने पर काटव के निशान उभर आये थे.
रघु की जीभ उसके दाँत कामिनी को यौन उत्तेजना का कामुकता अहसास करवा रहे थे,
वो खुद से अपने स्तनों को मसल रही थी, मदमस्त हिरणी पागलो की तरह उछल रही थी, अपने जिस्म की आग को टटोल रही थी.
रघु की जीभ कामिनी की योनि को चाट रही थी, लेकिन कामिनी का मन अब कहीं और भटकने लगा था।
उसकी चूत गीली थी, संतुष्ट हो रही थी, लेकिन उसके शरीर का पिछला हिस्सा—उसकी भारी, चौड़ी गांड—अभी भी अछूती थी।
अचानक, उसके दिमाग में एक आवाज़ कौंधी। यह रवि की कोमल आवाज़ नहीं थी, यह एक भारी, मर्दानी और रौबीली आवाज़ थी।
शमशेर।
रमेश के दोस्त शमशेर की वह खूंखार नज़र उसे याद आ गई।
कामिनी ने कल्पना की— अगर शमशेर यहाँ होता, तो वह मेरी चूत नहीं चाटता... वह मुझे पलट देता। वह मेरी गांड के दोनों पट्टों को पकड़कर फैला देता और कहता— "साली, इतनी बड़ी गांड पाल रखी है... मार-मार के लाल कर दूंगा और छेद खोल दूंगा तेरा।"
इस हिंसक कल्पना ने कामिनी के अंदर एक बिजली दौड़ा दी।
उसे अपनी गांड के छेद (Anus) में एक अजीब सी फड़कन महसूस हुई। एक मीठा दर्द, एक खालीपन जो भरने के लिए चीख रहा था।
उसे अहसास हुआ कि उसे सिर्फ़ आगे का मज़ा नहीं चाहिए, उसे अपनी गांड भी चटवानी है। उसे वह अपमान, वह गंदगी महसूस करनी है।
उसने नीचे देखा। रघु का मुंह अभी भी खुला था, जीभ बाहर थी। रघु कामिनी की चुत मे लिपटा और फंसा हुआ गाजर का हलवा खोद खोद कर खा चूका था.
उसकी जीभ और की उम्मीद मे लापलपा रही थी.
कामिनी की आँखों में एक शैतानी चमक आ गई।
'तुझे और हलवा खाना है ना? रूक खिलाती हूँ, शराबी इंसान...'
कामिनी जिस्म कांप रहा था, रमेश के प्रति नफरत उसके चेहरे से साफ झलक रही थी, उसका कृत्य ही सबूत था की रमेश का रखा अंश उसमे भी कहीं बस गया है.
कामिनी रघु के चेहरे से उठी।
उसने फिर से स्टूल पर रखी कटोरी की तरफ हाथ बढ़ाया।
हलवा अब पूरी तरह ठंडा और सख्त हो चुका था। घी जम गया था।
कामिनी ने अपनी पूरी हथेली भरकर हलवा निकाला।
उसने अपनी कमर मोड़ी और अपनी बाएं हाथ से अपने बाएं नितम्ब (Buttock) को खींचकर गांड की दरार खोल दी।
उसका गुलाबी, सिकुड़ा हुआ गांड का छेद (Anal Sphincter) बल्ब की रोशनी में 'आँख मिचोली' खेल रहा था।
कामिनी ने वह हलवे का लोथड़ा सीधा अपनी गांड के छेद पर थोप दिया।
चप... छापक....
ठंडा हलवा और जमा हुआ घी उसकी गरम गांड की दरार में भर गया।
लेकिन कामिनी इतने पर ही नहीं रुकी।
उसने अपनी उंगली से गाजर के रेशों को अपनी गांड के अंदर ठूंसना शुरू कर दिया।
"आह्ह्ह.... उफ्फ्फ...आउच.... " कामिनी की ये करतूत कोई देख लेता तो उसे हैवान समझता, चुड़ैल ही मान बैठता.
लेकिन देखने वाला क्या जाने, कामपिपासु औरत ऐसी ही होती है, वो औरत जिसे प्यास सम्भोग के बदले सिर्फ मार और अपमान ही मिला हो.
गाजर के टुकड़े और घी की चिकनाई उसकी तंग गुदा के अंदर घुस गई।
अब उसकी गांड सिर्फ़ एक अंग नहीं, बल्कि एक "मीठी गुफा" बन चुकी थी जो चाटे जाने के लिए तैयार थी।
कामिनी फिर से रघु के ऊपर आई।
लेकिन इस बार उसने अपनी दिशा बदल दी। उसका चेहरा रघु के पैरो की तरफ था, सामने रघु का सोया लंड जांघो पर लुड़का पड़ा था.
उसने अपनी भारी गांड को रघु के चेहरे की तरफ किया और धीरे-धीरे नीचे बैठने लगी।
उसने निशाना साधा—सीधा रघु के मुंह पर।
धप...
कामिनी की भारी गांड रघु के चेहरे पर आ गिरी।
उसका हलवे से सना हुआ गांड का छेद ठीक रघु के होंठों और जीभ के ऊपर टिक गया।
जैसे ही रघु की जीभ को गांड की गर्मी और हलवे की मिठास मिली, उसने अपना काम शुरू कर दिया।
लप... लप... लपाक...
रघु की जीभ ने कामिनी के गांड के छेद (Rim) को चाटा।
"ओह्ह्ह्ह्ह्ह माँ.... ईईईईई.....ससससद... आउच"
कामिनी का पूरा शरीर हवा में उछल गया।
यह अहसास... यह बिल्कुल नया था।
आज तक किसी ने उसकी गांड को छुआ तक नहीं था, और आज एक शराबी नौकर की जीभ उसके उस वर्जित अंग को कुरेद रही थी।
रघु की जीभ हलवा खाने के चक्कर में उसकी गांड की सिलवटों को खोल रही थी।
वह अपनी नोकदार जीभ से गांड के छेद के अंदर फंसे गाजर के टुकड़ों को निकालने की कोशिश कर रहा था।
जब उसकी जीभ छेद के अंदर घुसने (Probing) की कोशिश करती, तो कामिनी को लगता जैसे उसकी रीढ़ की हड्डी में करंट दौड़ गया हो।
यह सुख नहीं था, यह पागलपन था।
कामिनी अपने दोनों हाथों से खटिया के पायों को जकड़कर चीखने लगी (दबी आवाज़ में)।
रघु को हलवा खाने में दिक्कत हो रही थी क्योंकि वह गांड की दरार में गहराई तक चिपका था।
नशे और भूख में झुंझलाकर, रघु ने सिर्फ़ जीभ का नहीं, बल्कि अपने दाँतों का इस्तेमाल शुरू कर दिया।
उसने हलवे को खुरचने के लिए अपने दाँत गड़ा दिए।
कच... कच्चाक...
रघु के दाँत कामिनी की गांड के मुहाने और नीचे लटकती हुई चूत के दानों से रगड़ खा गए।
"आह्ह्ह्ह्ह्ह..... मार डाला..... उउउउफ्फ्फ.... माँ.... आअह्ह्ह......"
कामिनी दर्द से तड़प उठी, लेकिन वह हटी नहीं।
उसे उस दर्द में मज़ा आ रहा था।
रघु के दाँत उसकी कोमल त्वचा को काट रहे थे, चबा रहे थे, हलवे के साथ-साथ उसकी चमड़ी को भी नोच रहे थे।
गाजर के रेशे रघु के दाँतों और कामिनी की गांड के बीच रेगमाल (Sandpaper) का काम कर रहे थे।
यह खुरदरापन कामिनी को शमशेर की याद दिला रहा था।
उसे लगा जैसे शमशेर उसे नोच रहा है।
कामिनी ने अपनी गांड को और ज़ोर से रघु के मुंह पर दबा दिया।
"खा जा.... काट ले.... नोच ले मेरी गांड को.... हरामखोर खा जा...."
वह बार-बार उठती, अपनी उंगलियों से और हलवा अपनी गांड और चूत के अंदर ठूंसती, और फिर धप से रघु के मुंह पर बैठ जाती।
वह रघु के मुंह को टॉयलेट और डाइनिंग टेबल दोनों की तरह इस्तेमाल कर रही थी।
रघु का पूरा चेहरा, नाक, आँखें कामिनी की गांड के बीच दबकर रह गए थे। वह सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहा था और इसी संघर्ष में वह और ज़ोर-जोर से चाट और काट रहा था।
अब कामिनी उस मुकाम पर थी जहाँ वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
रघु की जीभ उसकी गांड के छेद में लगभग आधी घुस चुकी थी, और उसके दाँत उसकी चूत के दाने (Clitoris) को कुचल रहे थे।
दर्द + अपमान + हवस + गुदा मैथुन का सुख।
यह सब मिलकर एक ज्वालामुखी बन गया।
कामिनी का रोम-रोम सिहर उठा।
उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
"रघघघघघुउउउउ........ उफ्फ्फ्फ्फ्फ..... मर गईईईईई......"
एक भयानक, रूह कंपा देने वाला ऑर्गस्म (Orgasm) उसे हुआ।
यह सामान्य झड़ना नहीं था।
ऐसा लगा जैसे किसी ने उसकी आत्मा को निचोड़ दिया हो।
उसकी गांड का छेद बार-बार सिकुड़ने और खुलने लगा (Throbbing), रघु की जीभ को अपने अंदर जकड़ने लगा।
उसकी चूत से पानी की एक और बाढ़ आई, जिसने रघु के पूरे चेहरे को नहला दिया।
कामिनी का शरीर अकड़ गया, उसके पैर हवा में कांपने लगे।
धड़ाम...
वह अपना संतुलन खो बैठी।
वह रघु के मुंह से लुढ़ककर साइड में खटिया से होती ठंडी जमीन पर गिर गई।
वह बुरी तरह हांफ रही थी। उसका सीना धौंकनी की तरह चल रहा था।
उसकी आँखें पथरा गई थीं, मुंह खुला था, लार टपक रही थी।
वह पूरी तरह टूट चुकी थी और बिखर चुकी थी।
हंफ... हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़... उउफ्फ्फ... हमफ़्फ़्फ़...कामिनी नीचे जमीन पड़ी थी, बेसुध सी हांफ रही थी, रघु को एक टक देखे जा रही थी,
लेकिन रघु?
रघु अभी भी नशे में था। उसे पता ही नहीं चला कि कामिनी हट गई है।
उसका मुंह अभी भी चल रहा था।
उसकी जीभ हवा में लपलपा रही थी।
लप-लप-लप...
वह अभी भी उस स्वाद— गाजर का हलवा, घी, पेशाब, काम-रस और गांड का पसीना—को अपनी जीभ और होंठों से चाट रहा था।
कामिनी ने अपनी धुंधली आँखों से देखा।
रघु के मुंह के चारों तरफ लाल हलवा और सफ़ेद तरल लगा था। वह किसी भूखे जानवर जैसा लग रहा था जो शिकार के बाद भी तृप्त नहीं हुआ।
कामिनी की जांघों के बीच से अभी भी पानी रिस रहा था।
कामिनी पूर्णरूप से तृप्त थी, उसकी आंखे बंद होने की कगार पर थी.
लेकिन... नहीं... नहीं... यहाँ नहीं.
जैसे तैसे उसने खुद को संभाला, खड़ा किया, पास पड़ी छतरी उठाई और लड़खड़ाते कदमो से अपने बैडरूम की ओर चल दी.
वो उन्माद मे ये भी ना देख सकी की हलवे की खाली कटोरी रघु के सीने पर सान से पड़ी हुई है.
क्रमशः.....
****************
सुबह की पहली किरण जब स्टोर रूम की टूटी हुई खिड़की से छनकर अंदर आई, तो धूल के कण नाचते हुए दिखाई दे रहे थे। बाहर परिंदों की चहचहाहट थी, जो रात के उस भयानक और वहशी सन्नाटे को चीर रही थी।
रघु की आँखें भारी थीं। उसका सिर ऐसे फट रहा था जैसे किसी ने अंदर हथौड़े चलाए हों। कल रात की देसी शराब का असर अभी भी उसके ज़हन पर हावी था। उसने करवट लेनी चाही, लेकिन तभी उसे अपने सीने पर किसी ठंडी और सख्त चीज़ का अहसास हुआ।
उसने झटके से आँखें खोलीं और अपनी धुंधली नज़रों को नीचे टिकाया।
उसके नंगे, बालों वाले सीने पर स्टील की एक खाली कटोरी रखी थी।
"हईं... ये कहाँ से आई?" वह बुदबुदाया। उसकी आवाज़ फटी हुई थी।
जैसे-जैसे होश लौटा, उसे अपने चेहरे पर एक अजीब सी जकड़न (Stiffness) महसूस हुई। उसकी दाढ़ी के बाल आपस में चिपके हुए थे, जैसे उन पर कोई गोंद सूख गई हो। उसके होंठों पर एक पपड़ी सी जमी थी।
रघु ने अपनी जीभ बाहर निकाली और अपने होंठों को चाटा।
स्वाद...
वह स्वाद बड़ा ही अजीब था। उसमें गाजर के हलवे की मिठास थी, घी की चिकनाई थी, लेकिन साथ ही एक तीखा, कसैला और नमकीन अहसास भी था जो सीधा उसके दिमाग की नसों को झनझना गया।
अचानक... कल रात की धुंधली यादें उसके दिमाग में बिजली की तरह कौंधने लगीं।
बारिश... अँधेरा... कोई साया... वो खुशबू...
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, जैसे कोई सपना देखा हो, लेकिन कैसा सपना, हलवे की कटोरी तो उसके सामने थी.
उसने कटोरी उठाई। उसमें हलवे के कुछ लाल रेशे और घी की परत अभी भी लगी थी।
"मेमसाब..." उसके गले से एक घुरघुराहट निकली।
*************
इधर घर के अंदर
रात का वह स्याह तूफ़ान अब थम चुका था, लेकिन कामिनी के वजूद के अंदर एक ऐसा जलजला आया था जिसने उसकी आत्मा की नींव हिला दी थी। सुबह जब उसकी आँख खुली, तो सबसे पहले उसे अपनी जांघों के बीच एक तीखी, मीठी जलन महसूस हुई।
उसने चादर हटाकर अपने जिस्म को देखा। उसकी जांघों पर कल रात के निशान थे—रघु के दाँतों की खरोंचें और गाजर के रेशों की रगड़ से हुई लालिमा। कामिनी को खुद से घिन आने लगी। उसे लगा जैसे वह कोई अपराधी है जिसने अपनी मर्यादा का खून किया है।
वह आईने के सामने खड़ी हुई। चेहरा वही था, लेकिन आँखों में वह चमक नहीं थी। उसने खुद से नज़रें चुराईं।
'ये मैंने क्या कर दिया? मैं इतनी कैसे गिर गई?'
उसने तुरंत स्नान किया, गर्म पानी जब उसके जख्मों पर पड़ा तो वह सिसक उठी। वह जलन उसे बार-बार याद दिला रही थी कि कल रात उसने एक शराबी नौकर के साथ क्या 'वहशीपन' किया था। लेकिन उसका मन किसी पिंजरे में बंद पंछी की तरह फड़फड़ा रहा था।
कामिनी रसोई में थी। वह अभी-अभी नहाकर आई थी। उसने सफेद रंग की साफ़-सुथरी सूती साड़ी पहनी थी, बालों को जूड़े में बांधा था और माथे पर एक लाल बिंदी सजाई थी। ऊपर से देखने पर वह साक्षात पवित्रता की मूरत लग रही थी।
लेकिन सिर्फ़ कामिनी जानती थी कि साड़ी के नीचे उसके शरीर का क्या हाल था।
जैसे ही वह रसोई से तुलसी के पौधे को जल चढ़ाने के लिए बाहर निकली, उसके कदम लड़खड़ाए।
उसकी जांघों के बीच, उसकी योनि और गांड के मुहाने पर एक तेज़ और तीखी जलन हो रही थी। रघु के दाँतों के निशान और गाजर के रेशों की रगड़ ने उसकी कोमल त्वचा को छील दिया था। हर कदम के साथ जब उसकी जांघें आपस में रगड़ खातीं, तो उसे एक 'करंट' सा लगता।
उसने आंगन में खड़े होकर तुलसी को जल चढ़ाया। आँखें बंद कीं और हाथ जोड़े।
अजीब विडंबना थी... हाथ भगवान के सामने जुड़े थे, लेकिन मन में अभी भी वह दृश्य घूम रहा था जब वह रघु के मुंह पर अपनी गांड पटक रही थी। उसे अपनी साड़ी के अंदर से अपनी ही गंध आ रही थी।
खेर जैसे तैसे कामिनी ने खुद को संभाला 9 बजने को थे, बहार मैन गेट पर किसी की दस्तक हुई.
रमेश आ चूका था, चेहरे पे थकान साफ झलक रही थी.
"कहाँ रह गए थे आप " कामिनी ने रमेश का बेग सँभालते हुए पूछा.
रमेश घर के अंदर दाखिल हुआ, लेकिन कामिनी की रूह कांप रही थी। उसे लग रहा था कि उसकी आँखों में रात का सारा 'कीचड़' साफ़ दिख रहा होगा। रमेश थका हुआ था, उसने कामिनी की तरफ ठीक से देखा भी नहीं और सोफे पर ढह गया। कामिनी ने राहत की सांस ली, लेकिन यह राहत अस्थायी थी।
पानी पी कर रमेश नहाने चला गया,
रसोई में काम करते वक्त (नाश्ता बनाते वक़्त) कामिनी का वजूद उसे धिक्कार रहा था। कल रात उसने जो कुछ किया—वह पेशाब की धार, वह गाजर का हलवा और वह गांड का रगड़ना—वह सब उसकी बंद आँखों के सामने बार-बार घूम रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि वह एक अपराधी है जिसने अपने ही घर की मर्यादा की बलि चढ़ा दी है।
लेकिन उसका शरीर? शरीर तो कल की वहशियत का गवाह बना बैठा था। हर कदम के साथ उसकी जांघों के बीच एक तीखा और मीठा दर्द उठता। रघु के दाँतों ने जहाँ-जहाँ उसकी चूत की पंखुड़ियों और गांड के मुहाने को काटा था, वहाँ अब नीले निशान उभर आए थे। सूती साड़ी की खुरदरी सतह जब उन जख्मों से टकराती, तो कामिनी के हलक से एक दबी हुई सिसकी निकल जाती।
थोड़ी ही देर मे रमेश नाश्ते की टेबल पर मौजूद था,
नाश्ते की मेज पर जब रवि और बंटी आए, तो कामिनी ने अपनी नज़रें झुका लीं।
रवि से नजर मिला पाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी, कल शाम तक रवि उसके लिए एक मासूम लड़का था बंटी जैसा ही था, लेकिन आज वह उसे देख कर सहम रही थी।
उसे रवि पर गुस्सा भी आ रहा था कि उसी ने उसके अंदर की 'बुझी हुई आग' को हवा दी, लेकिन उसका मासूम चेहरा देख कर वह सारा दोष खुद पर मढ़ लेती। उसने सोचा था— 'आज रवि से अकेले में माफ़ी मांग लूंगी। उसे समझा दूंगी कि हम दोनों से गलती हुई है। अब सब खत्म करना होगा.
"आओ ना आंटी आप भी बैठो ना " रवि ने अपनी पास की कुर्सी की तरफ इशारा कर कहाँ.
"ममम.... मै.. ननन... नहीं..." कामिनी सकपका गई, जैसे चाबुक पड़ा हो कमर पर.
"अभी काम है... बाद मे " कामिनी बिना किसी को देखे ही किचन की तरफ भागी.
तभी चरररररर...... बाहर एक चमचमाती कार रुकी। दरवाज़ा खुलने और बंद होने की आवाज़ आई और कुछ ही क्षणों में टिंग टोंग.... घर की डोर बेल बज उठी.....
"कामिनी देखो तो कौन है?" रमेश अख़बार मे आंखे गाढ़ाये बोला.
कोई 5सेकंड मे ही दरवाजा खुला.
दरवाजा खुलते ही हॉल की साधारण हवा में एक ऐसी तेज़ और मादक खुशबू घुली, जैसे किसी ने मोगरे और महंगे विदेशी परफ्यूम का सैलाब छोड़ दिया हो। कामिनी की नज़रें दरवाजे पर टिकी थीं, सामने उसी की हम उम्र औरत खड़ी थी।
उसने पिस्ता रंग का एक सिल्क का सलवार-सूट पहना था, लेकिन उसे 'सूट' कहना गलत होगा—वह उसके बदन पर चढ़ी हुई एक 'दूसरी खाल' की तरह था।
"जज... जी आप?" कामिनी के चेहरे पे प्रश्न था.
"नमस्ते! आप कामिनी जी हैं ना? रवि ने आपके बारे में बताया था फोन पर.
"ओह... मै सुनयना रवि की मम्मी" सुनयना ने हाथ मिलाते हुए कहा। उसकी हथेलियाँ मक्खन जैसी कोमल थीं।
"जी नमस्ते... आइये ना," कामिनी ने जैसे-तैसे अपनी घबराहट पर काबू पाया।
सुनयना मुस्कुराते हुए अंदर आई। उसकी आँखों में एक अजीब सा आत्मविश्वास था, जो कामिनी को दबोच रहा था।
जैसे ही सुनयना हॉल में आई, कमरे का तापमान जैसे अचानक बढ़ गया। सूट की फिटिंग इतनी 'बेरहम' थी कि उसके बदन का हर घुमाव चीख-चीख कर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा था।
सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली चीज़ थी सुनयना की बेबाकी। उसने दुपट्टा नहीं लिया था। उसके कुर्ते का गला 'U' आकार में इतना गहरा था कि उसके विशाल और संगमरमरी स्तनों की गोलाई (Deep Cleavage) आधी से ज्यादा बाहर झाँक रही थी।
उसके दोनों स्तनों के बीच की वह गहरी घाटी (Cleft) पसीने की एक नन्ही बूँद से चमक रही थी। कुर्ता इतना तंग था कि उसकी छाती के उभार हर सांस के साथ जैसे कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब थे। उसकी ब्रा की लेस की आउटलाइन कुर्ते के बारीक कपड़े से साफ़ झलक रही थी, जो यह बता रही थी कि अंदर का मंजर कितना भारी है।
रमेश, जो अब तक अखबार में खोया था, सुनयना को देखते ही जैसे जड़ (Stone) हो गया। चाय का कप उसके होंठों के पास ही रुक गया। उसकी आँखों में वही पुरानी, चिर-परिचित हवस की चमक लौट आई थी। वह किसी भूखे शिकारी की तरह सुनयना के उन खुले हुए स्तनों की घाटी को घूर रहा था।
रमेश ने मन ही मन एक ठंडी आह भरी— "कहाँ ये सादगी की मूरत कामिनी, और कहाँ ये साक्षात अप्सरा!" रमेश की नज़रें सुनयना के चेहरे से फिसलकर सीधा उसके सीने पर जाकर चिपक गईं। वह एक पल के लिए भूल गया कि उसकी पत्नी और बच्चे भी वहीं मौजूद हैं।
सुनयना जब अंदर की ओर बढ़ी, तो उसकी चाल में एक ऐसी लचक थी जो किसी सधी हुई नर्तकी की होती है। चूड़ीदार पायजामे में उसकी भारी और मांसल जांघें आपस में रगड़ खा रही थीं। सबसे घातक थी उसकी गांड (Hips)। उम्र के इस पड़ाव पर उसकी गांड और भी चौड़ी और भारी हो गई थी। हर कदम के साथ उसके कूल्हे एक लय में ऊपर-नीचे हो रहे थे, जो देखने वाले के दिमाग में एक हवस भरी हलचल पैदा कर रहे थे।
कामिनी के लिए यह नज़ारा किसी ज़हर के घूँट जैसा था। एक तरफ तो उसकी जांघों के बीच रघु के दाँतों के निशान जलन और दर्द दे रहे थे, और दूसरी तरफ रमेश की नज़रों का यह 'खुला भटकाव' उसके कलेजे को चीर रहा था।
कामिनी को अपने सूती कपड़ों और साधारण लुक पर पहली बार शर्म महसूस हुई। उसे जलन हुई कि वह कभी इतनी 'खुली' और 'बेबाक' क्यों नहीं हो पाई। उसने देखा कि सुनयना को रमेश की गंदी नज़रों से कोई आपत्ति नहीं थी, बल्कि वह और ज्यादा इठलाकर चल रही थी, जिससे उसकी भारी गांड की थिरकन और ज्यादा नुमाया हो रही थी।
"नमस्ते! माफ़ करना, बिना बताए आ गई," सुनयना ने अपनी खनकती आवाज़ में कहा और रमेश की ओर देखकर एक ऐसी मुस्कान दी, जिसने रमेश के अंदर के सोए हुए 'जानवर' को जगा दिया।
"अरे... नहीं... आप... आपका ही घर है," रमेश हकलाते हुए बोला।
उसकी आवाज़ में वही 'लार' टपक रही थी जो कभी-कभी कामिनी को बिस्तर पर डराती थी।
सुनयना ने बैठते समय अपनी टांग पर टांग रखी, जिससे उसकी सफ़ेद और सुडौल जांघ का हिस्सा कुर्ते के कट से हल्का सा दिखाई दिया। वह काफ़ी 'खुले विचारों' की लग रही थी।
उसने बताया कि उसका वहाँ मन नहीं लगा और रवि की चिंता हो रही थी, इसलिए वह जल्दी आ गई।
कामिनी ने देखा कि रवि अपनी माँ के पास ऐसे सटकर बैठा है जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका के पास बैठता है। रवि का हाथ सुनयना की कमर पर था। कामिनी के मन में एक अजीब सी हलचल हुई। उसने कभी बंटी को ऐसे गले नहीं लगाया था।
**************
थोड़ी देर की औपचारिक बातचीत के बाद, रमेश भारी मन से ऑफिस के लिए निकल गया। जाते-जाते भी उसकी एक आखिरी नज़र सुनयना के स्तनों के उस गहरे उभार पर टिकी रही। कामिनी ने यह सब देखा, और उसके अंदर नफरत की एक लहर दौड़ गई।
रमेश के जाते ही सुनयना ने बंटी और रवि को स्कूल के प्रोजेक्ट के लिए चलने को कहा। "चलो बच्चों, मैं तुम्हें ड्रॉप कर देती हूँ।
"अच्छा कामिनी जी फुर्सत मे आती हूँ" सुनयना चलने को हुई.
"आज रात डिनर हमारे साथ ही कर लीजिये ना, " कामिनी ने रात के खाने का औपचारिक न्योता दिया.
"क्यों नहीं... बिल्कुल आपसे बात भी हो जाएगी " सुनयना ने सहज़ ही न्योता स्वीकार कर लिया.
जिसकी उम्मीद कामिनी ने नहीं की थी.
"कामिनी जी, रात को मिलते हैं फिर!"
जब सुनयना बच्चों को लेकर बाहर निकली, तो कामिनी उसे पीछे से जाते हुए देखती रही। सुनयना का वह सुडौल जिस्म, उसकी वह आज़ादी और रमेश की वह हवस... कामिनी को लगा जैसे वह अपनी ही दुनिया में पराई हो गई है।
अब घर में फिर से वही खामोशी थी।
रमेश ऑफिस में था, बच्चे स्कूल जा चुके थे।
और स्टोर रूम में रघु जाग चुका था।
कामिनी अपनी रसोई की स्लैब को कसकर पकड़ लिया। उसकी चूत और गांड की वह जलन अब तेज हो रही थी। उसे लग रहा था कि वह एक तरफ रमेश के अपमान से जल रही है और दूसरी तरफ रघु की उस 'रात' की यादों से सुलग रही है। क्रमशः......
घर में पसरा वह गहरा सन्नाटा कामिनी को काट खाने को दौड़ रहा था। रमेश ऑफिस जा चुका था और बच्चे स्कूल। रसोई में बर्तनों की खनक के बीच कामिनी का दिल किसी ढोल की तरह बज रहा था। उसकी जांघों के बीच की वह 'मीठी टीस' उसे बार-बार कल रात के उस अंधेरे कमरे में खींच ले जा रही थी।
वह मन ही मन डर रही थी— 'अगर रघु को कुछ याद रहा तो? अगर उसने रमेश से कुछ कह दिया तो?'
टिंग टोंग.... घर के दरवाजे की घंटी बज उठी.
कामिनी ने दरवाजा खोला, उसका डर उसके सामने हलवे की खाली कटोरी लिए खड़ा था.
कामिनी की सांसें गले में ही अटक गईं। सामने रघु खड़ा था। उसकी आँखें झुकी हुई थीं और चेहरा उतरा हुआ। कामिनी को लगा जैसे अभी कोई धमाका होने वाला है।
"म-मेमसाब..." रघु की आवाज़ में एक थरथराहट थी।
कामिनी ने कसकर दरवाजे के हैंडल को पकड़ लिया, उसके पाप का घड़ा जैसे फूटने को था, दिल बैठा जा रहा था, उसका शरीर पत्थर जैसा हो गया।
उसे याकायाक अफ़सोस होने लगा की उसने कल रात ऐसा कैसे कर दिया?
वह कुछ कहती, इससे पहले ही रघु उसके पैरों के पास घुटनों के बल बैठ गया।
"मुझे माफ़ कर देना मैडम जी... मैं बड़ा नीच हूँ, लालची हो गया था।" रघु गिड़गिड़ाने लगा।
"आपने कल गाजर लाने के लिए पैसे दिए थे, लेकिन रस्ते में दुकान खुली देखी तो नीयत डोल गई। मैं शराब पीने बैठ गया... फिर पुराने दोस्त मिल गए और जाम पर जाम चलता गया। मैं नशे में इतना धुत्त था कि मुझे कुछ होश ही नहीं रहा।"
हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.... कामिनी ने एक लंबी, गहरी सांस ली। उसके सीने पर रखा हुआ वह भारी पत्थर जैसे पल भर में गायब हो गया। माथे की सिल्वटे वापस से खूबसूरती मे बदलने लगी,
रघु आगे बोलता गया, "आप बहुत बड़ी और दयालु हैं मैडम जी... आपने कल रात मेरे लिए गाजर का हलवा तक रख दिया था। मैंने उसे कब खाया, मुझे तो पता भी नहीं चला। उसका स्वाद तो अभी भी मेरे मुँह में है।"
कामिनी के होंठों पर एक कुटिल और विजयी मुस्कान रेंग गई। वह समझ गई कि रघु को कुछ याद नहीं। उसके लिए वह 'वहशी रात' सिर्फ़ एक शराबी का सपना बनकर रह गई थी।
कामिनी का आत्मविश्वास अचानक से लौट आया। जो औरत दो मिनट पहले अपराधी महसूस कर रही थी, वह पल भर में "चोर से साहूकार" बन गई।
उसने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और कड़क आवाज़ में बोली:
"तुमने गलती तो बहुत बड़ी की है रघु। तुम्हें पता है न, अगर ये बात साहब को मालूम पड़ जाती तो तुम्हारा क्या हाल होता? इसी वक्त धक्के मारकर बाहर निकाल देते तुम्हें!"
रघु ने हाथ जोड़ लिए, उसकी आँखों में डर साफ़ था। उसे इस घर में छत और खाना मिला था, जिसे वह खोना नहीं चाहता था।
"माफ़ कर दो मैडम जी, अब से ऐसी गलती नहीं होगी। आप जैसा बोलोगी मैं वैसा करूँगा, बस साहब को मत बताना।"
कामिनी ने उसे माफ़ करने का नाटक किया। उसकी जीत सफल हुई थी। उसे एक अजीब सी सत्ता (Power) का अहसास होने लगा—एक ऐसा राज जो सिर्फ़ उसे पता था।
"ठीक है, माफ़ किया। लेकिन अब से ध्यान रखना," कामिनी ने रोब झाड़ते हुए कहा।
"कोई काम हो तो बतायें मेमसाब, मैं अभी कर देता हूँ।" रघु ने विनती की।
कामिनी को याद आया कि घर के भारी परदे और चादरें काफी दिनों से गंदे पड़े थे। "ठीक है, कुछ पर्दे और चादरे है उसे गार्डन वाले नल पर ले जाकर धो दो।"
वह अंदर गई और भारी चादरों का ढेर ले आई। आते-आते वह बाथरूम की तरफ मुड़ी जहाँ रमेश और बंटी के कुछ गंदे कपड़े पड़े थे। कामिनी का दिमाग अभी भी कल रात की उत्तेजना और आज की राहत के बीच झूल रहा था।
उसने बिना सोचे-समझे बाल्टी में रखे रमेश के कुर्ते और बंटी की टी-शर्ट के साथ अपनी वह सफ़ेद रेशमी कच्छी (Panty) भी उठा ली, जिसे उसने कल शाम रवि की मुलाक़ात के बाद उतार फेंका था, कामिनी की ये कच्छी पूरी तरह से उसके चुत रस मे सनी हुई थी,
अनजाने में, कल शाम की मदहोशी का वह गीला गवाह अब उन कपड़ों के ढेर के बीच छिपकर टब में आ गया था।
कामिनी वह कपड़ों से भरा भारी टब उठाकर गार्डन की तरफ ले आई, जहाँ एक तरफ दीवार के पास नल लगा था।
धप...
उसने टब रघु के सामने रख दिया। "लो, इन्हें अच्छी तरह धो दो। मैं तब तक रसोई में खाना बना लेती हूँ।"
धूप तेज़ थी। बंटी कभी भी घर आ सकता था, लंच भी तैयार करना था, वो अंदर रसोई की तरफ बढ़ चली, बेफिक्र....उसे पता नहीं था कि वह अनजाने में रघु को अपनी आबरू का वह सबसे निजी हिस्सा सौंप चुकी है।
रसोई की गर्मी और चूल्हे पर चढ़ी दाल की खुशबू के बीच कामिनी का शरीर किसी और ही आग में सुलग रहा था। वह कड़छी चला रही थी, लेकिन उसकी आँखें बार-बार खिड़की के बाहर गार्डन की ओर खिंच रही थीं। बाहर धूप तेज़ थी और रघु नल के नीचे बैठा जोर-जोर से चादरें रगड़ रहा था। उसने कुर्ता खोल साइड रख दिया था, लुंगी गीली हो कर उसकी जांघो से चिपकी हुई थी.
कामिनी अपनी ही सोच में डूबी थी। पिछले कुछ दिनों में उसका जीवन कितना बदल गया था। वह संस्कारी बहू, पत्नी जो कभी ऊँची आवाज़ में बात नहीं करती थी,
कल एक नौकर के मुँह पर अपनी हवस का 'हलवा' परोस कर आई थी। वह इन्हीं ख्यालों में थी कि अचानक उसकी नज़र बाहर पड़ी और उसके हाथ से कड़छी छूटते-छूटते बची।
उसकी नजर अनायास ही खिड़की से बहार पड़ी.. धाकम... धक... से उसका दिल पूरी स्पीड मे धड़क उठा.
रघु के हाथों में चादर नहीं थी। उसने टब के नीचे से कामिनी की वही नन्हीं सी गुलाबी कच्छी निकाली थी। रघु उसे दोनों हाथों से फैलाकर ऐसे देख रहा था जैसे किसी ने उसके हाथ में कोई अजूबा थमा दिया हो।
रघु के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो कामिनी ने पहले कभी नहीं देखी थी, ऐसी मुस्कान जैसे वो कच्छी देख उसे पहनने वाली के अंग का अंदाजा लगा रहा हो.
रघु उस रेशमी कपड़े की छोटी सी बनावट को देख रहा था और शायद वही सोच रहा था जो कामिनी ने डरते हुए महसूस किया— "इतनी नन्हीं सी चड्डी में मेमसाब की इतनी भारी और मांसल गांड कैसे समा जाती होगी?"
कामिनी रसोई की चौखट पकड़ कर खड़ी हो गई। उसकी सांसें तेज़ चलने लगीं। वह बाहर जाकर उसे डांटना चाहती थी, पर उसका शरीर जैसे लकवाग्रस्त हो गया था।
तभी रघु ने वह किया जिसकी उम्मीद कामिनी को नहीं थी। रघु ने इधर-उधर देखा और फिर बड़ी बेबाकी से उस कच्छी को अपनी नाक के पास ले गया।
"स्निफ़फ़फ़फ़.... उउउउफ्फ्फ़!"
रघु ने एक लम्बी और गहरी सांस ली। उस रेशमी कपड़े में रची-बसी कामिनी के जिस्म की सोंधी खुशबू और कल रात के काम-रस की महक ने रघु के दिमाग में धमाका कर दिया।
रघु को वह स्वाद याद आ गया जो कल रात उसे 'सपने' में मिला था।
उसकी आँखों के सामने कुछ धुंधला सा उभरने लगा, ये खुसबू उसे पहले दिन खिड़की से फ़ेंकी गई गाजर मे भी मिली थी, और कल रात हलवे मे भी यही गंध समाई हुई थी,
उसने कन्फर्म करने के लिए... शनिफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ग.... इसस्स.... शनिफ्फग्ग.... एक बार फिर कच्छी के उस हिस्से को सुंघा जहाँ कामिनी की चुत टिकी होती थी.
खिड़की के पीछे खड़ी कामिनी का बुरा हाल था। उसकी चूत ने जैसे ही यह देखा, वह पानी छोड़ने लगी। उसकी जांघों के बीच एक गीलापन महसूस हुआ जो बढ़ता ही जा रहा था। उसका जिस्म किसी दहकते हुए कोयले की तरह जलने लगा।
रघु अब पूरी तरह वहशी हो चुका था। उसे परवाह नहीं थी की कामिनी देख लेगी, या कोई आ जायेगा, उसका लंड इस खुसबू को पा कर झटके मार रहा था।
उसने अपनी लुंगी की गांठ को धीरे से ढीला किया। उसकी जांघों के बीच से उसका काला, मोटा और पत्थर जैसा खड़ा लंड आधा बाहर झांकने लगा।
धूप की तेज़ रोशनी में रघु के लंड का ऊपरी हिस्सा (मुंड) लालिमा लिए चमक रहा था। रघु ने कामिनी की कच्छी को अपने हाथ में लपेटा और उसे सीधा अपने खड़े हुए लंड की टोपी पर घिसने लगा।
सप-सप... चप-चप...
वह रेशमी कपड़ा रघु के गरम और सख्त अंग पर आगे-पीछे हो रहा था। कामिनी यह देख कर पागल होने लगी। एक नौकर उसकी पहनी हुई कच्छी को अपने लंड पर रगड़ रहा था और वह उसे रोकने के बजाय अपनी जांघें आपस में भींच रही थी। उसे याद आया कि कैसे यही अंग कल रात उसके मुँह के पास था और कैसे रघु की जीभ ने उसकी चूत को मरहम लगाया था।
कामिनी का हाथ खुद-ब-खुद अपनी साड़ी के नीचे चला गया। वह अपनी गीली चूत को मसलने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह बाहर जाकर रघु को तमाचा मारे या खुद बाहर जाकर उस खड़े हुए लंड पर बैठ जाए।
कामिनी की रूह कांप उठी, और उसकी जांघों के बीच से काम-रस का एक और सैलाब बह निकला।
****************
गार्डन की वह दोपहर अब किसी तंदूर की तरह तप रही थी। बाहर रघु अपनी ही दुनिया में मदमस्त था, कामिनी की उस नन्हीं सी कच्छी को अपने पत्थर जैसे लंड पर रगड़ते हुए वह किसी भूखे जानवर की तरह बड़बड़ा रहा था। खिड़की के पीछे खड़ी कामिनी की हालत बेकाबू हो चुकी थी।
वह अपनी जांघों को आपस में ज़ोर-ज़ोर से भींच रही थी। उसका हाथ साड़ी के ऊपर से ही अपनी चूत को तेज़ी से मसल रहा था। उसे अहसास था कि अगर उसने अपनी उंगली साड़ी के अंदर डाल दी, तो वह वहीं फर्श पर ढेर हो जाएगी।
वह रघु को देख रही थी—कैसे एक मर्द उसकी मामूली सी कच्छी को सूंघकर, उसे अपने अंग पर घिसकर चरम सुख के करीब पहुँच चुका था।
रघु का चेहरा पसीने से तर-बतर था और उसकी आँखें कामिनी की तलाश में खिड़की की ओर टिकी थीं। रघु झड़ने ही वाला था कि तभी...
"चरररररर......"
मुख्य गेट के भारी लोहे के दरवाज़े के खुलने की कर्कश आवाज़ ने सन्नाटे को चीर दिया। यह आवाज़ किसी धमाके की तरह कामिनी के कानों में गूंजी। रघु के हाथ जैसे वहीं जम गए और कामिनी का हाथ अपनी चूत से झटके से हट गया।
दोनों के वजूद पर जैसे किसी ने बर्फीला पानी डाल दिया हो।
कामिनी ने कांपती नज़रों से गेट से अंदर आते रास्ते की तरफ देखा।
बंटी स्कूल बैग कंधे पर टांगे, पसीने में लथपथ अंदर चला आ रहा था। कामिनी का कलेजा हलक में आ गया। वह तुरंत खिड़की से पीछे हटी और अपनी बिखरी हुई साड़ी और उखड़ी हुई सांसों को संभालने लगी। उसका चेहरा लाल था और शरीर कांप रहा था।
उसने तुरंत घर का दरवाजा खोला...
"आ... आ गया मेरा बेटा? तू... तू हाथ-मुँह धो ले बंटी, मैं बस खाना लगाती हूँ," कामिनी ने अपनी आवाज़ को जितना हो सके सामान्य रखने की कोशिश की, लेकिन उसकी धड़कनें अभी भी बेकाबू थीं।
बंटी बाथरूम की तरफ बढ़ा, तो कामिनी की नज़र अनायास ही फिर से खिड़की के बाहर रघु पर गई।
रघु ने बिजली की फुर्ती दिखाई थी। उसने पलक झपकते ही अपनी लुंगी की गांठ कसी और कामिनी की उस कच्छी को पानी के टब में डुबो दिया। जब कामिनी ने उसे देखा, तो रघु पत्थर पर उसी कच्छी को रखकर पूरी ताकत से साबुन लगाकर घिस रहा था।
धप... धप.... घिसड़... घिसड़.....
रघु के हाथ पत्थर पर तेज़ी से चल रहे थे। वह उस नन्हे से रेशमी कपड़े को इतनी बेरहमी से रगड़ रहा था जैसे सारा मैल निकाल देना चाहता हो। लेकिन कामिनी के लिए यह सिर्फ़ कपड़ा नहीं था।
रसोई की स्लैब को पकड़े हुए कामिनी को महसूस हुआ कि रघु उस पत्थर पर कच्छी को नहीं, बल्कि कामिनी की चूत को घिस रहा है।
हर बार जब रघु का हाथ पत्थर पर जोर से पड़ता, कामिनी के बदन में एक सिहरन दौड़ जाती।
उसे लगा जैसे वह पत्थर पर लेटी हो और रघु अपनी खुरदरी उंगलियों से उसकी निजता को रगड़ रहा हो।
वह 'घिसड़-घिसड़' की आवाज़ कामिनी के दिमाग की नसों में हथौड़े की तरह बज रही थी। उसे याद आया कि अभी कुछ पल पहले यही कच्छी रघु के खड़े हुए लंड पर रगड़ खा रही थी, और अब वही हाथ इसे साफ़ कर रहे हैं।
कामिनी की जांघों के बीच से पानी का एक आखिरी कतरा फिर से रिस गया।उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। बंटी अंदर था, रमेश ऑफिस में था, लेकिन कामिनी का मन अभी भी उस गार्डन वाले नल के पास, रघु के उन 'खुरदरे हाथों' में फंसा हुआ था।
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बंटी खाना खाकर अपने कमरे में जा चुका था। घर के अंदर एक भारी सन्नाटा पसरा था, जिसे सिर्फ़ छत के ऊपर घूमते पंखे की आवाज़ काट रही थी। रसोई में खड़ी कामिनी का दिल अभी भी तेज़ धड़क रहा था,
तभी आंगन में रघु की भारी परछाईं उभरी। वह गीले कपड़ों से भरा हुआ टब लिए खड़ा था।
उसका जिस्म पसीने और पानी से तर-बतर था, भीगी हुई लुंगी उसकी जांघों के साथ ऐसे चिपकी थी जैसे उसकी दूसरी खाल हो। आंगन की हवा में साबुन, पानी और एक मर्द के पसीने की सोंधी और तीखी गंध फैल गई थी, जो कामिनी के नथुनों को बेचैन कर रही थी।
"मैडम जी, कपड़े धो दिए हैं। कहाँ सुखा दूँ?" रघु की आवाज़ में एक अजीब सी खुरदराहट थी।
कामिनी घबरा गई। उसे लगा कि अगर रघु अकेले कपड़े सुखाएगा, तो वह फिर से उसकी कच्छी के साथ वही वहशी हरकत करेगा।
"तुम रहने दो... मैं सुखा दूँगी," उसने हड़बड़ाकर कहा।
"अरे आप रहने दें, बहुत भारी है..." रघु ने टब उठाया और सीढ़ियों की ओर बढ़ गया।
कामिनी के पास और कोई रास्ता नहीं था, वह भी उसके पीछे-पीछे छत की ओर खिंची चली गई। उसका दिल किसी ढोल की तरह धाड़-धाड़ बज रहा था।
छत पर सूरज अपनी पूरी तेज़ रोशनी बिखेर रहा था। रघु ने एक-एक करके भारी चादरें और परदे तार पर फैला दिए। कामिनी अभी खुद को संभाल ही रही थी कि रघु के खुरदरे हाथों ने टब के नीचे से वही नन्ही सी सफ़ेद कच्छी उठा ली।
वह उसे तार पर टांगने ही वाला था कि कामिनी की लज्जा ने आखिरी बार अंगड़ाई ली।
"अरे... उसे रहने दो!" कामिनी ने झपट्टा मारकर अपनी कच्छी का एक सिरा पकड़ लिया।
दृश्य यह था कि कच्छी का एक हिस्सा रघु के हाथ में था और दूसरा कामिनी की मुट्ठी में। दोनों के बीच सिर्फ़ वह रेशमी पट्टी थी। कामिनी शर्म और घबराहट से पसीने-पसीने हो रही थी, उसकी उंगलियां रघु के पोरों से टकरा रही थीं।
तभी रघु ने सीधे कामिनी की आँखों में झांका और वह सवाल दाग दिया जिसने कामिनी के वजूद को हिला दिया:
"आपका दर्द अब ठीक तो है ना मैडम जी?"
कामिनी की सांसें अटक गईं। "क... कैसा दर्द?"
"चूत का दर्द..." रघु बिना किसी खौफ के, पूरी नग्नता के साथ बोल गया।
'चूत' शब्द जैसे ही कामिनी के कानों में पड़ा, उसके शरीर का निचला हिस्सा जैसे पिघल गया। यह शब्द उसके लिए किसी बिजली के झटके जैसा था। उसकी जांघों के बीच से काम-रस का एक सैलाब बह निकला।
वह उसे डांटना चाहती थी, पर उसके हलक से कोई आवाज़ नहीं निकली। वह सिर्फ़ एक असहाय 'हाँ' में सिर हिलाकर रह गई।
इसी छीना-झपटी और उत्तेजना के बीच, रघु की भीगी हुई लुंगी की गांठ अचानक ढीली होकर खुल गई। वह गीला कपड़ा सरसराता हुआ ज़मीन चाटने लगा। कामिनी की पकड़ अपनी कच्छी पर ढीली पड़ गई।
उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सामने, दोपहर की सुनहरी और तीखी धूप में रघु का एकदम खड़ा, लोहे जैसा सख्त और काला लंड पूरी शान से तना हुआ था। वह किसी मदांध हाथी की सूँड की तरह झटके मार रहा था।
सूरज की रोशनी उस अंग की चिकनी त्वचा और उभरी हुई नसों पर चमक रही थी।
कामिनी का हलक सूख गया। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में इतना खूंखार और भयानक अंग नहीं देखा था।
हालांकि उसने रघु के लंड को आज से पहले भी छुवा था, उसे मुँह मे लिया था, लेकिन तब रघु को इस बात का अहसास नहीं था. वो चोरी थी..... कामिनी के दुवारा की गई हवस की चोरी, लेकिन आज बेबाक रघु अपना लंड ताने खड़ा था.
रघु ने लुंगी उठाने की कोई कोशिश नहीं की। उसे पता था कामिनी की नजर उसके लंड पर जमीं हुई है,
रघु ने अपनी एक कुटिल मुस्कान के साथ कामिनी के हाथ से वह धूलि हुई साफ़ कच्छी पूरी तरह छीन ली। उसने उसे तार पर नहीं टांगा।
बड़ी बेबाकी से रघु ने उस रेशमी कच्छी को अपने उस खड़े, गरम और लोहे जैसे लंड पर टांग दिया।
कामिनी हैरानी और वहशत से फटी आँखों से यह नज़ारा देख रही थी।
उसकी इज़्ज़त, उसकी आबरू, एक नौकर के नंगे और खड़े अंग पर झटके खा रही थी। वह सफ़ेद रेशम उस काले और सख्त अंग पर किसी पदक की तरह लटका हुआ था।
"ये... ये क्या बदतमीज़ी है? इधर दो इसे..." कामिनी की आवाज़ कांप रही थी, पर उसके पैरों ने एक कदम भी पीछे नहीं हटाया।
रघु ने अपनी कमर को एक हल्का सा झटका दिया, जिससे वह सफ़ेद रेशम उस काले और पत्थर जैसे सख्त लंड पर थिरकने लगा।
"ले लीजिये ना खुद ही... मना किसने किया है? आपके सामने ही तो टंगी है आपकी चड्डी ..." रघु की आवाज़ में कोई डर नहीं था, सिर्फ़ एक वहशी चुनौती थी।
कामिनी की आँखों के सामने जैसे खून उतर आया। उसे रघु की वह गंदगी, उसकी अनगढ़ मर्दानगी और वह सोंधी महक पागल कर रही थी।
उसकी जांघों के बीच से काम-रस का सैलाब बहकर उसकी साड़ी को गीला कर रहा था।
कामिनी का आत्मविश्वास पिघलकर उसकी जांघों के रास्ते बह रहा था। उसने एक बार भी इधर-उधर नहीं देखा। बंटी नीचे सो रहा था, दुनिया बाहर थी, लेकिन इस छत पर वह सिर्फ़ एक 'जिस्मानी प्यासी औरत' थी और सामने उसका 'शिकार' खड़ा था।
ना जाने क्या जादू हुआ, कामिनी के पैर आगे को बढ़ गए, जैसे उसका जिस्म उसके काबू मे ही नहीं था. जाँघे काँपने लगी, लगा जैसे उसका वजन सँभालने की क्षमता अब उसके पैरो मे नहीं है.
बिना एक शब्द बोले, कामिनी धीरे से घुटनों के बल बैठ गई। या खुद उसके घुटनो ने दम तोड़ दिया.
रघु की आँखों में चमक बढ़ गई। उसके ठीक सामने रघु का काला लंड झटके खा रहा था, उसके लंड से निकली गंदी गंध कामिनी की नाक से होती नाभि के नीचे उतर रही थी,
कामिनी ने अपने कांपते हाथों से रघु के उस भारी अंग पर लटकी अपनी कच्छी को हटाया। वह कच्छी अब रघु की काम-रस(pre-cum) की बूंदों से और भी गीली हो चुकी थी।
कामिनी ने रघु के उस काले, मोटे और खुरदरे लंड को अपनी नज़रों से 'पी' लिया। उसने देखा कि रघु के लंड की टोपी (मुंड) के नीचे और उसकी नसों के बीच पसीने और मेल (Grime) की एक परत जमी थी।
कामिनी ने अपनी आँखों को बंद किया और फिर धीरे से खोला। उसे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था कि वह क्या करने जा रही है। लेकिन उसके भीतर की वह 'भूखी औरत', जिसे वर्षों से रमेश के फीकेपन, नमर्दानगी ने मार डाला था, आज जाग चुकी थी।
उसे रघु के बदन से आ रही पसीने, साबुन और अनगढ़ मर्दानगी की गंध पागल कर रही थी।
उसने अपने कांपते हुए गुलाबी होंठों को रघु के उस खुरदरे अंग के करीब लाया। उसने अपनी जीभ बाहर निकाली और सबसे पहले लंड की उस गरम टोपी (मुंड) को अपनी जीभ की नोक से छुआ।वह स्पर्श कड़वा, खारा और पसीने से भरा था। कामिनी के दिमाग में एक धमाका हुआ। उसे उस गंदगी में एक अनोखा सुख महसूस हुआ।
रघु कई दिनों से नहाया नहीं था, और कामिनी को आज उसी गंदगी में एक अनोखा आकर्षण महसूस हुआ। उसके हाथो ने मजबूती से रघु के लंड को अपने कब्जे मे ले लिया,
"सुड़प... सुड़प... गप... गपाक!"
चप... चप... चाट... कामिनी की गुलाबी जबान रघु के गंदे लंड पर रेंगने लगी, या यूँ कहिये उस गंदे हिस्से को साफ करने लगी.
वह संस्कारी बहू, पत्नी एक माँ जो हमेशा महंगे इत्र मे डूबी होती थी, आज एक शराबी नौकर के हफ़्तों के जमे हुए मेल और पसीने को अपनी जीभ से चाटने लगी। वह रघु के मुंड के नीचे जमी उस सफेद गंदगी (Smegma) को अपनी जीभ से खुरच-खुरच कर साफ़ कर रही थी, जैसे वह कोई रसीला फल हो।
उसका गाढ़ा थूक रघु के लंड के उस काले मेल के साथ मिलकर एक चिपचिपे तरल में बदल गया, जो रघु के लंड से होता जांघों पर नीचे टपकने लगा। कामिनी को उस गंदगी की गंध उत्तेजना के सातवें आसमान पर ले जा रही थी।
कामिनी को रघु का लंड उत्तेजित कर रहा था, उसे और चाहिए था, और ज्यादा.... वो इस लंड को पूरी तरह से महसूस करना चाहती थी.
कामिनी ने अपने मुँह को पूरा खोल दिया जितना हो सकता था उतना, उसने अपनी मर्यादा की आखिरी दीवार को भी ढहा दिया। उसने रघु के उस पूरे भारी अंग को एक ही झटके में अपने मुँह के अंधेरे और गीले हिस्से में उतार लिया।
"गप... सुड़प... चप-चप..."
कामिनी का मुँह पूरा भर चुका था। रघु के लंड की मोटाई इतनी थी कि कामिनी के जबड़े में खिंचाव महसूस हो रहा था।
लेकिन उसे उस दर्द में मज़ा आ रहा था। उसका गरम थूक रघु के लंड की खुरदरी त्वचा और कामिनी के मखमली होंठों के बीच एक चिकनाई पैदा कर रहा था।
जैसे-जैसे कामिनी अपने मुँह को आगे-पीछे कर रही थी, रघु के लंड पर उभरी हुई एक-एक मोटी नस कामिनी के तालू और उसके कोमल मसूड़ों को रगड़ रही थी।
कामिनी पागलों की तरह चूस रही थी। उसने रघु की गांड को कसकर पकड़ लिया और खुद को उस मर्दानगी में डुबो दिया।
वह रघु के लंड के आखिरी हिस्से से उठती उस तीखी और गंदी गंध को अपने फेफड़ों में भर रही थी।
उसे इस 'गिरावट' में ही अब अपनी आज़ादी दिख रही थी।
रघु का वह अंग खुरदरा था, उस पर कुछ बाल उलझे थे, और कामिनी अपनी जीभ से एक-एक हिस्से को टटोल रही थी।
उसने सिर्फ़ लंड पर ही बस नहीं किया। वह और नीचे झुकी और रघु के उन भारी और पसीने से भीगे टट्टों को अपने मुँह में भर लिया। वह उन्हें किसी रसीले फल की तरह अपनी जीभ से सहलाने लगी।रघु की जांघों के पास की वह तीखी और मर्दाना गंध कामिनी के दिमाग की नसों को फाड़ रही थी।
कामिनी पागल हो चुकी थी। उसने आज तक रमेश का लंड भी इतनी वहशत से नहीं छुआ था। वह रघु के उस बदबूदार और सख्त अंग को ऐसे चूस रही थी जैसे उसका पूरा वजूद उसी एक अंग में समा गया हो।
रघु ने अपने दोनों हाथों से कामिनी के बालों को कसकर जकड़ लिया और अपनी कमर को झटके मार-मार कर कामिनी के हलक तक उतारने लगा। कामिनी की आँखों से आंसू निकल रहे थे, वह हांफ रही थी, लेकिन उसने चूसना बंद नहीं किया। वह उस गंदे मेल को अपनी जीभ से खुरच-खुरच कर 'पी' रही थी।
छत की उस सुनसान दोपहर में सिर्फ़ "चप... चप... सुड़प... सुड़प" की आवाज़ें गूँज रही थीं। एक संस्कारी माँ, एक वफादार पत्नी, आज एक नौकर के नंगे जिस्म के सामने अपनी पूरी इज़्ज़त और मर्यादा को उस थूक और मेल के साथ निगल रही थी।
रघु अब बेकाबू हो चुका था। कामिनी के मुँह की गर्मी और उसकी जीभ की कलाकारी ने उसे एक जंगली जानवर बना दिया था। रघु का शरीर कांपने लगा और उसके मुँह से एक घुरघुराहट निकली। कामिनी को अहसास हुआ कि रघु अब झड़ने (Ejaculate) वाला है।
उसने घबराकर मुँह हटाना चाहा, लेकिन रघु ने अपनी पूरी ताक़त से कामिनी के रेशमी बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया।उसने कामिनी का चेहरा अपने लंड पर इतनी जोर से दबाया कि कामिनी की नाक भी उसके अंग से चिपक गई। उसके गंदे झांट के बाल कामिनी के नाक के बालो से उलझ गए.
फच... फचम... फच....
गरम, गाढ़ा और सफ़ेद वीर्य (Sperm) झटके के साथ कामिनी के गले की गहराई तक उतरने लगा। कामिनी को उबकाई आ रही थी, उसकी आँखों से पानी निकल रहा था, लेकिन रघु ने उसे हटने नहीं दिया। वह अपनी मर्दानगी का आखिरी कतरा कामिनी के हलक में उतार देना चाहता था। कामिनी का मुँह, उसका गला और उसकी नाक उस तीखी और कड़वी गंध से भर गई।उसे लगा जैसे वह रघु की सारी गंदगी को अपने अंदर निगल रही है।
जब रघु की पकड़ ढीली हुई, कामिनी फर्श पर पीछे की ओर लुढ़क गई। दोनों हांफ रहे थे। कामिनी के होंठों से, उसकी ठुड्डी से रघु का वीर्य रिसकर फर्श पर गिर रहा था। वह बुरी तरह बिखरी हुई थी। उसकी साड़ी अस्त-व्यस्त थी, पल्लू ज़मीन पर था और उसका ब्लाउज खिंच जाने के कारण उसके सुडौल स्तनों का आधा हिस्सा बाहर झाँक रहा था।
कामिनी और रघु एक-दूसरे को देख रहे थे। वहां कोई शर्म नहीं थी, सिर्फ़ एक ख़ालीपन था। तभी नीचे से वह आवाज़ आई जो सब कुछ खत्म कर देने के लिए काफ़ी थी।
"मम्मी! मम्मी! कहाँ हो?"
बंटी की आवाज़ ने कामिनी की रूह कंपा दी। वह एक झटके में उस हवस के नशे से बाहर आ गई। रघु ने फुर्ती से अपनी लुंगी उठाई और उसे कमर पर लपेट लिया। वह सीढ़ियों की तरफ भागा, लेकिन रुककर उसने एक नज़र कामिनी को देखा।
ना जाने कामिनी ने कैसे उसकी आँखों मे लिखी इबारत को पढ़ लिया,
कामिनी ने कांपते हाथों से अपने ब्लाउज के अंदर से 200 का नोट निकाला और रघु की ओर फेंक दिया। रघु ने उस नोट को किसी शिकारी की तरह लपका और बिना पीछे मुड़े भाग गया।
कामिनी वहीं फर्श पर बैठी रह गई। उसने अपनी साड़ी से अपने चेहरे पर लगा वह चिपचिपा तरल साफ़ किया।
"मर्द के वादे तभी तक है जब तक उसके लंड मे वीर्य है, वो बहार निकला की मर्द अपनी औकात पर आ जाता है. "
रघु का पैसे ले कर दारू पीने भागना कामिनी को कड़वी हक़ीक़त बता गया था.
भारी कदमो से सीढिया उतरने लगी,
वो सफ़ेद पैंटी अभी भी छत के फर्श पर पड़ी धूल फांक रही थी.