भाग 123
अगली सुबह जब धूप लिविंग रूम की बड़ी खिड़की से छनकर अंदर आ रही थी, तो घर का माहौल बहुत शांत था। माँ रसोई में नाश्ता तैयार कर रही थीं और छोटू डाइनिंग टेबल पर चुपचाप बैठा था। उसके चेहरे पर अब भी अपने पुराने माहौल को खोने का एक सन्नाटा था। मैं अपने हाथ में कुछ कागज़ात और एक महँगा पेन लेकर उसके पास जाकर बैठ गया। ये मुंबई के एक नामी इंटरनेशनल स्कूल के एडमिशन फॉर्म्स थे।
मैंने फॉर्म छोटू के सामने फैलाए और शांत आवाज़ में कहा, "छोटू, बापू के जाने के बाद तुम्हारी पढ़ाई बीच में नहीं छूटनी चाहिए। मैंने इस शहर के सबसे बेहतरीन स्कूल में तुम्हारे एडमिशन की बात कर ली है। अगले सोमवार से तुम्हें जाना है।"
छोटू ने फॉर्म्स को देखा। उसकी नज़र जैसे ही 'फादर्स नेम' (पिता का नाम) वाले कॉलम पर पड़ी, उसकी आँखें थोड़ी उदास हो गईं। उसने धीरे से कहा, "भैया... यहाँ बापू का नाम लिखना होगा ना? पर वो तो अब..." उसकी आवाज़ लड़खड़ा गई।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और बेहद ठंडे, नपे-तुले लेकिन भारी स्वर में कहा, "नहीं छोटू। बापू अब इस दुनिया में नहीं हैं। और मुंबई के इस बड़े, हाई-प्रोफाइल स्कूल में अगर तुम्हें सम्मान से जीना है और आगे बढ़ना है, तो उन्हें एक ऐसे गार्जियन की ज़रूरत है जो न सिर्फ ज़िंदा हो, बल्कि जिसका इस शहर में बड़ा नाम और रुतबा हो। अगर हम यहाँ बापू का नाम लिखेंगे, तो रोज़ नए सवाल पूछे जाएंगे जो मैं नहीं चाहता।"
छोटू ने हैरान होकर मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए फॉर्म के उस कॉलम में पेन से अपना नाम—'रवि' लिख दिया।
"इस नए शहर में तुम्हारी पुरानी पहचान का अंत हो चुका है, छोटू," मैंने उसके चेहरे के करीब आकर बेहद सम्मोहक और कड़े लहजे में कहा। "बाहर की दुनिया के लिए, तुम्हारे स्कूल के लिए और इस नए समाज के लिए... मैं तुम्हारा भाई नहीं हूँ। मैं तुम्हारा कानूनी पिता हूँ। जब स्कूल में तुम्हारा इंटरव्यू होगा या कोई भी बाहर का इंसान पूछेगा, तो तुम्हारे मुँह से 'भैया' नहीं, 'पापा' निकलना चाहिए। यही इस घर का और तुम्हारी नई ज़िंदगी का पहला नियम है।"
चौदह-पंद्रह साल का छोटू उस वक्त मेरी आर्थिक ताकत, इस आलीशान घर के वैभव और मेरी इस भारी, हुक्म चलाती आवाज़ के सामने पूरी तरह सुन्न हो गया। वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन उसके पास विरोध करने की न तो उम्र थी और न ही कोई सहारा। उसने सहमकर, धीरे से हामी में अपना सिर हिला दिया।
तभी माँ रसोई से पोहा लेकर आईं। उन्होंने टेबल पर प्लेट रखते हुए छोटू के काँपते चेहरे और मेरी आँखों की उस शातिर चमक को देख लिया था। उन्होंने छोटू के सिर पर हाथ फेरा और मेरे फैसले का मूक समर्थन करते हुए बेहद धीमी आवाज़ में कहा, "रवि जो कह रहा है छोटू, वही सही है। अब से तुम्हारी दुनिया यही है।" माँ के मुँह से मेरे लिए 'रवि' सुनना और इस खेल में उनका साथ देना, छोटू के दिमाग पर आख़िरी चोट थी।
अगली सुबह जब धूप लिविंग रूम की बड़ी खिड़की से छनकर अंदर आ रही थी, तो घर का माहौल बहुत शांत था। माँ रसोई में नाश्ता तैयार कर रही थीं और छोटू डाइनिंग टेबल पर चुपचाप बैठा था। उसके चेहरे पर अब भी अपने पुराने माहौल को खोने का एक सन्नाटा था। मैं अपने हाथ में कुछ कागज़ात और एक महँगा पेन लेकर उसके पास जाकर बैठ गया। ये मुंबई के एक नामी इंटरनेशनल स्कूल के एडमिशन फॉर्म्स थे।
मैंने फॉर्म छोटू के सामने फैलाए और शांत आवाज़ में कहा, "छोटू, बापू के जाने के बाद तुम्हारी पढ़ाई बीच में नहीं छूटनी चाहिए। मैंने इस शहर के सबसे बेहतरीन स्कूल में तुम्हारे एडमिशन की बात कर ली है। अगले सोमवार से तुम्हें जाना है।"
छोटू ने फॉर्म्स को देखा। उसकी नज़र जैसे ही 'फादर्स नेम' (पिता का नाम) वाले कॉलम पर पड़ी, उसकी आँखें थोड़ी उदास हो गईं। उसने धीरे से कहा, "भैया... यहाँ बापू का नाम लिखना होगा ना? पर वो तो अब..." उसकी आवाज़ लड़खड़ा गई।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और बेहद ठंडे, नपे-तुले लेकिन भारी स्वर में कहा, "नहीं छोटू। बापू अब इस दुनिया में नहीं हैं। और मुंबई के इस बड़े, हाई-प्रोफाइल स्कूल में अगर तुम्हें सम्मान से जीना है और आगे बढ़ना है, तो उन्हें एक ऐसे गार्जियन की ज़रूरत है जो न सिर्फ ज़िंदा हो, बल्कि जिसका इस शहर में बड़ा नाम और रुतबा हो। अगर हम यहाँ बापू का नाम लिखेंगे, तो रोज़ नए सवाल पूछे जाएंगे जो मैं नहीं चाहता।"
छोटू ने हैरान होकर मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए फॉर्म के उस कॉलम में पेन से अपना नाम—'रवि' लिख दिया।
"इस नए शहर में तुम्हारी पुरानी पहचान का अंत हो चुका है, छोटू," मैंने उसके चेहरे के करीब आकर बेहद सम्मोहक और कड़े लहजे में कहा। "बाहर की दुनिया के लिए, तुम्हारे स्कूल के लिए और इस नए समाज के लिए... मैं तुम्हारा भाई नहीं हूँ। मैं तुम्हारा कानूनी पिता हूँ। जब स्कूल में तुम्हारा इंटरव्यू होगा या कोई भी बाहर का इंसान पूछेगा, तो तुम्हारे मुँह से 'भैया' नहीं, 'पापा' निकलना चाहिए। यही इस घर का और तुम्हारी नई ज़िंदगी का पहला नियम है।"
चौदह-पंद्रह साल का छोटू उस वक्त मेरी आर्थिक ताकत, इस आलीशान घर के वैभव और मेरी इस भारी, हुक्म चलाती आवाज़ के सामने पूरी तरह सुन्न हो गया। वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन उसके पास विरोध करने की न तो उम्र थी और न ही कोई सहारा। उसने सहमकर, धीरे से हामी में अपना सिर हिला दिया।
तभी माँ रसोई से पोहा लेकर आईं। उन्होंने टेबल पर प्लेट रखते हुए छोटू के काँपते चेहरे और मेरी आँखों की उस शातिर चमक को देख लिया था। उन्होंने छोटू के सिर पर हाथ फेरा और मेरे फैसले का मूक समर्थन करते हुए बेहद धीमी आवाज़ में कहा, "रवि जो कह रहा है छोटू, वही सही है। अब से तुम्हारी दुनिया यही है।" माँ के मुँह से मेरे लिए 'रवि' सुनना और इस खेल में उनका साथ देना, छोटू के दिमाग पर आख़िरी चोट थी।