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Incest माँ बेटा पैसा प्यार

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भाग 123
अगली सुबह जब धूप लिविंग रूम की बड़ी खिड़की से छनकर अंदर आ रही थी, तो घर का माहौल बहुत शांत था। माँ रसोई में नाश्ता तैयार कर रही थीं और छोटू डाइनिंग टेबल पर चुपचाप बैठा था। उसके चेहरे पर अब भी अपने पुराने माहौल को खोने का एक सन्नाटा था। मैं अपने हाथ में कुछ कागज़ात और एक महँगा पेन लेकर उसके पास जाकर बैठ गया। ये मुंबई के एक नामी इंटरनेशनल स्कूल के एडमिशन फॉर्म्स थे।
मैंने फॉर्म छोटू के सामने फैलाए और शांत आवाज़ में कहा, "छोटू, बापू के जाने के बाद तुम्हारी पढ़ाई बीच में नहीं छूटनी चाहिए। मैंने इस शहर के सबसे बेहतरीन स्कूल में तुम्हारे एडमिशन की बात कर ली है। अगले सोमवार से तुम्हें जाना है।"
छोटू ने फॉर्म्स को देखा। उसकी नज़र जैसे ही 'फादर्स नेम' (पिता का नाम) वाले कॉलम पर पड़ी, उसकी आँखें थोड़ी उदास हो गईं। उसने धीरे से कहा, "भैया... यहाँ बापू का नाम लिखना होगा ना? पर वो तो अब..." उसकी आवाज़ लड़खड़ा गई।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और बेहद ठंडे, नपे-तुले लेकिन भारी स्वर में कहा, "नहीं छोटू। बापू अब इस दुनिया में नहीं हैं। और मुंबई के इस बड़े, हाई-प्रोफाइल स्कूल में अगर तुम्हें सम्मान से जीना है और आगे बढ़ना है, तो उन्हें एक ऐसे गार्जियन की ज़रूरत है जो न सिर्फ ज़िंदा हो, बल्कि जिसका इस शहर में बड़ा नाम और रुतबा हो। अगर हम यहाँ बापू का नाम लिखेंगे, तो रोज़ नए सवाल पूछे जाएंगे जो मैं नहीं चाहता।"
छोटू ने हैरान होकर मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए फॉर्म के उस कॉलम में पेन से अपना नाम—'रवि' लिख दिया।
"इस नए शहर में तुम्हारी पुरानी पहचान का अंत हो चुका है, छोटू," मैंने उसके चेहरे के करीब आकर बेहद सम्मोहक और कड़े लहजे में कहा। "बाहर की दुनिया के लिए, तुम्हारे स्कूल के लिए और इस नए समाज के लिए... मैं तुम्हारा भाई नहीं हूँ। मैं तुम्हारा कानूनी पिता हूँ। जब स्कूल में तुम्हारा इंटरव्यू होगा या कोई भी बाहर का इंसान पूछेगा, तो तुम्हारे मुँह से 'भैया' नहीं, 'पापा' निकलना चाहिए। यही इस घर का और तुम्हारी नई ज़िंदगी का पहला नियम है।"
चौदह-पंद्रह साल का छोटू उस वक्त मेरी आर्थिक ताकत, इस आलीशान घर के वैभव और मेरी इस भारी, हुक्म चलाती आवाज़ के सामने पूरी तरह सुन्न हो गया। वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन उसके पास विरोध करने की न तो उम्र थी और न ही कोई सहारा। उसने सहमकर, धीरे से हामी में अपना सिर हिला दिया।
तभी माँ रसोई से पोहा लेकर आईं। उन्होंने टेबल पर प्लेट रखते हुए छोटू के काँपते चेहरे और मेरी आँखों की उस शातिर चमक को देख लिया था। उन्होंने छोटू के सिर पर हाथ फेरा और मेरे फैसले का मूक समर्थन करते हुए बेहद धीमी आवाज़ में कहा, "रवि जो कह रहा है छोटू, वही सही है। अब से तुम्हारी दुनिया यही है।" माँ के मुँह से मेरे लिए 'रवि' सुनना और इस खेल में उनका साथ देना, छोटू के दिमाग पर आख़िरी चोट थी।​
 
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भाग 124
शाम को स्कूल के इंटरव्यू की तैयारी के लिए मैंने छोटू को फिर से लिविंग रूम में बुलाया। वह अपनी नई किताबों और स्कूल के ब्रोशर को हाथ में लिए सोफे के एक कोने में सिमटकर बैठ गया। उसका पूरा शरीर इस नए माहौल और मेरे बनाए नियमों के दबाव में थोड़ा थका हुआ लग रहा था। मैं उसके ठीक सामने वाले सोफे पर बैठ गया, और माँ हमारे लिए चाय और दूध लेकर वहीं पास में आकर बैठ गईं।
"तो छोटू, कल सुबह तुम्हारा इंटरव्यू है," मैंने कॉफी की चुस्की लेते हुए बहुत ही शांत लेकिन पैनी आवाज़ में कहा। "वहाँ प्रिंसिपल तुमसे तुम्हारे परिवार के बारे में पूछेंगे। तुम्हारे पिता के बिज़नेस के बारे में पूछेंगे। बताओ, क्या जवाब दोगे?"
छोटू ने एक पल के लिए माँ की तरफ देखा, जैसे वह उनसे कोई मदद माँग रहा हो। लेकिन माँ ने अपनी नज़रें नीचे झुका लीं। उन्हें पता था कि इस खेल में दखल देने का मतलब मेरे गुस्से को दावत देना था।
छोटू की आवाज़ थोड़ी काँपी, "मैं... मैं कहूँगा कि मेरे पापा... रवि..." वह 'रवि' कहने के बाद रुक गया, उसके गले में 'पापा' शब्द जैसे अटक रहा था। बरसों से जिस इंसान को उसने भाई माना था, उसे अचानक इस नए दर्जे में स्वीकार करना उसके बाल-मन के लिए एक भारी बोझ था।
मैंने अपना कप मेज़ पर थोड़ा ज़ोर से रखा। उस हल्की सी आवाज़ से भी छोटू चौंक गया। मैंने उसकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा, "अटक क्यों गए, छोटू? मैंने कल ही समझाया था कि वहाँ कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। अगर तुम वहाँ ज़रा भी लड़खड़ाए, तो सब गड़बड़ हो जाएगा। एक बार फिर से साफ़-साफ़ बोलो।"
कमरे में कुछ पलों के लिए भारी सन्नाटा छा गया। छोटू ने गहरी सांस ली, अपने हाथों को आपस में भींचा और इस बार मेरी आँखों के तीखे दबाव को झेलते हुए धीरे से कहा, "कल सुबह मेरे पापा... यानी आप, मेरे साथ स्कूल चलेंगे।"
उसके मुँह से 'पापा' और 'आप' सुनना मेरे पौरुष और मेरे इस पूरे नियंत्रण की बहुत बड़ी जीत थी। मेरे होठों पर एक गहरी, शातिर मुस्कान उभर आई। मैंने आगे बढ़कर उसके सिर को थपथपाया, "बहुत अच्छे। मुझे तुमसे यही उम्मीद थी। अब जाओ और अपने कमरे में आराम करो।"
छोटू चुपचाप उठा और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। जैसे ही उसके कमरे का दरवाज़ा बंद हुआ, मैंने सोफे पर माँ का हाथ पकड़कर उन्हें अपने करीब खींच लिया। उनका बदन इस पूरे मनोवैज्ञानिक ड्रामे की वजह से थोड़ा काँप रहा था, लेकिन मेरी बाहों के घेरे में आते ही वे ढीली पड़ गईं। मैंने उनके कान के पास झुककर कहा, "देखा माँ, मैंने कहा था ना... वह बहुत जल्दी सीख जाएगा।" माँ ने बिना कुछ कहे अपनी आँखें बंद कर लीं और मेरे सीने पर अपना सिर टिका दिया, यह जानते हुए कि इस नए शहर में अब हमारी इस अजीब और वर्जित दुनिया का कोई विकल्प नहीं बचा था।​
 
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भाग 125
अगली सुबह इंटरव्यू का दिन था। पूरा घर एक अलग ही किस्म की उत्सुकता और तनाव से भरा हुआ था। मैं अपने कमरे में आईने के सामने खड़ा होकर एक बेहद कीमती और शार्प सूट पहन रहा था। तभी माँ कमरे में आईं। उन्होंने लाल रंग की एक खूबसूरत साड़ी पहनी थी, जिसमें वे किसी बड़े घराने की संभ्रांत महिला लग रही थीं। वे आहिस्ते से मेरे पास आईं और मेरी टाई की नॉट को सलीके से सँभालने लगीं। उनकी उंगलियों का वह कोमल स्पर्श जब मेरी छाती से टकराया, तो मैंने उनकी कलाई को हल्के से थाम लिया।
"बहुत जच रहे हो रवि," उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए बेहद धीमी और मखमली आवाज़ में कहा। अब उनकी नज़रों में पुराने शहर का वह डर नहीं था, बल्कि मेरे प्रति एक गहरा गर्व और समर्पण था।
"आज से दुनिया हमें इसी रूप में देखेगी, माँ... एक मुकम्मल, आधुनिक और सफल परिवार के रूप में," मैंने उनके गाल को छूते हुए कहा, तो उन्होंने मुस्कुराकर अपनी आँखें झुका लीं।
जब हम दोनों कमरे से बाहर आए, तो छोटू लिविंग रूम में अपनी नई औपचारिक पोशाक में तैयार खड़ा था। वह थोड़ा नर्वस था और अपनी उंगलियों को कसमसा रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर कल की ट्रेनिंग का असर साफ़ दिख रहा था। वह बिना कुछ बोले चुपचाप हमारे पीछे-पीछे गाड़ी तक आया। पूरे रास्ते वह खिड़की के बाहर देखता रहा, मानो अपने भीतर चल रहे द्वंद्व को शांत करने की कोशिश कर रहा हो।
मुंबई के उस बेहद मशहूर और आलीशान इंटरनेशनल स्कूल का कैंपस किसी भव्य इमारत जैसा था। जब हम प्रिंसिपल के केबिन में दाखिल हुए, तो वहाँ का माहौल पूरी तरह कॉर्पोरेट और प्रोफेशनल था। एक रसूखदार बिजनेसमैन के रूप में मेरा कड़क व्यक्तित्व और माँ की शालीनता देखकर प्रिंसिपल काफी प्रभावित हुए।
प्रिंसिपल ने एडमिशन फॉर्म पर नज़र दौड़ाई, फिर चश्मा उतारकर मुस्कुराते हुए कहा, "मिस्टर रवि, आपका प्रोफाइल बहुत प्रभावशाली है। और आपकी वाइफ... मिसेज मेघना, इस नए शहर में आपका स्वागत है।"
बाहरी दुनिया के किसी अजनबी के मुँह से खुद के लिए 'वाइफ' शब्द सुनते ही माँ के बदन में एक पल के लिए हल्की सी सिहरन दौड़ी। उनके गालों पर एक लजीली सुर्खी आई, लेकिन उन्होंने तुरंत अपनी सधी हुई मुस्कान के पीछे उसे छुपा लिया और शालीनता से सिर झुका दिया। इस अजनबी शहर ने पहली ही मुलाकात में उन्हें मेरी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था।
तभी प्रिंसिपल सीधे छोटू की तरफ़ मुड़े और दोस्ताना अंदाज़ में बोले, "तो यंग मैन... तुम्हारे पापा इस शहर के एक बड़े बिजनेसमैन हैं। क्या तुम भी बड़े होकर अपने पापा की तरह बनना चाहते हो? तुम्हारा रोल मॉडल कौन है?"
उस आलीशान केबिन में एक पल के लिए भारी सन्नाटा छा गया। माँ ने घबराहट के मारे साड़ी के पल्लू को अपनी उंगलियों में कसकर भींच लिया। मैंने अपनी पैनी, स्थिर और कड़क नज़रें छोटू के चेहरे पर टिका दीं। यह हमारे इस नए सफर की सबसे बड़ी परीक्षा थी।
छोटू ने एक सेकंड के लिए मेरी तरफ देखा। मेरी आँखों में छिपे उस अचूक अधिकार और ताकत को महसूस करते हुए, उसने एक गहरी सांस ली। इस बार उसके चेहरे पर कोई हिचकिचाहट नहीं थी। उसने प्रिंसिपल की तरफ देखकर पूरी सहजता और आत्मविश्वास से कहा, "जी सर। मेरे पापा मेरे रोल मॉडल हैं। मैं आगे चलकर बिल्कुल अपने पापा जैसा ही बनना चाहता हूँ।"
छोटू के मुँह से समाज के सामने निकला वह 'पापा' शब्द उस केबिन के सन्नाटे को चीर गया। बगल में बैठी माँ के चेहरे पर तसल्ली की एक गहरी सांस उभर आई। मुझे अपने भीतर एक असीम और गहरी जीत का अहसास हुआ। मेरा मनोवैज्ञानिक खेल पूरी तरह सफल हो चुका था। हमारे इस नए, वर्जित लेकिन बेहद मज़बूत रिश्ते पर अब बाहरी दुनिया ने भी अपनी मुहर लगा दी थी।​
 
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भाग 126
प्रिंसिपल के केबिन से बाहर निकलते ही एडमिशन पक्का होने की औपचारिकताएं पूरी हो गईं। प्रिंसिपल ने मुस्कुराते हुए मुझसे हाथ मिलाया और कहा, "कांग्रेचुलेशंस मिस्टर रवि, छोटू मंडे से क्लासेस जॉइन कर सकता है।"
जैसे ही हम स्कूल की भव्य इमारत से बाहर निकलकर गाड़ी में बैठे, घर का भारी तनाव पूरी तरह से हवा हो चुका था। मैंने ड्राइविंग सीट पर बैठते ही बैक मिरर में छोटू की तरफ देखा, जो खिड़की से बाहर देखते हुए थोड़ा शांत लेकिन सहज लग रहा था। मैंने आगे बढ़कर उसकी पीठ थपथपाई और बेहद दोस्ताना लहजे में कहा, "शाबाश छोटू, आज तुमने मेरा दिल जीत लिया। तुमने बहुत समझदारी दिखाई। आज शाम को तुम्हें वो नया गेमिंग कंसोल मिल जाएगा जो तुम कल इंटरनेट पर देख रहे थे।"
नया और महँगा तोहफा मिलने की बात सुनकर चौदह-पंद्रह साल के छोटू के चेहरे पर एक राहत भरी और मासूम मुस्कान तैर गई। उसे धीरे-धीरे यह समझ आने लगा था कि इस नए घर के नियमों को मानने और मुझे 'पापा' का दर्जा देने का इनाम कितना शानदार और आरामदायक था। उसकी बची-खुची हिचकिचाहट भी उस महँगे तोहफे के आकर्षण के पीछे दब गई।
घर पहुँचते ही छोटू खुश होकर अपने नए गैजेट्स देखने अपने कमरे में चला गया। जैसे ही उसके कमरे का दरवाज़ा बंद हुआ, हॉल में एक अलग ही तरह की तप्त खामोशी छा गई। माँ जो अब तक खुद को बेहद सलीके से संभाले हुए थीं, अचानक उन्होंने पीछे से आकर मेरी पीठ पर अपना चेहरा टिका दिया और अपनी दोनों बाहें मेरी छाती पर कस दीं। उनके बदन की सिहरन साफ़ बता रही थी कि वे इस बहुत बड़ी परीक्षा के सफल होने से कितनी भावुक थीं।
"रवि... मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था," उन्होंने मुझे अपनी तरफ़ घुमाते हुए बेहद धीमी और काँपती हुई आवाज़ में कहा। उनकी आँखों में ख़ुशी के दो कतरे छलक आए थे। "जब प्रिंसिपल ने मुझे 'मिसेज़ मेघना' कहकर बुलाया, तो पल भर के लिए मेरी सांसें अटक गई थीं। लेकिन जब छोटू ने तुम्हें सबके सामने 'पापा' कहा... तो मेरे भीतर का सारा डर हमेशा के लिए मिट गया। तुमने सब कुछ कितना बदल दिया।"
मैंने आगे बढ़कर उनके चेहरे को अपनी हथेलियों में ऊपर उठाया और उनकी भीगी आँखों में देखते हुए बेहद गर्व और अधिकार से कहा, "मैंने कहा था ना माँ, इस नए शहर में हम अपनी शर्तों पर जिएंगे। आज दुनिया ने भी मान लिया कि तुम मेरी पत्नी हो और यह परिवार मेरा है।"
मेरे इन शब्दों ने उनके भीतर की बची-खुची लाज को भी पिघला दिया। दोपहर की उस शांत रोशनी में, उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और खुद को पूरी तरह मेरी बाहों में सौंप दिया। मैंने झुककर उनके रसीले होठों को अपनी गिरफ्त में ले लिया—एक ऐसा चुंबन जो हमारी इस नई, वर्जित और बेहद मज़बूत जीत का मुकम्मल जश्न था।​
 
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भाग 127
शनिवार की दोपहर तक घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। लिविंग रूम से आ रही वीडियो गेम की गोलियों और गाड़ियों की तेज़ आवाज़ें साफ़ बता रही थीं कि छोटू अपने नए गेमिंग कंसोल की दुनिया में पूरी तरह खो चुका है। वह चौदह-पंद्रह साल की उम्र का एक बच्चा ही तो था, जिसे महँगे गैजेट्स, आलीशान कमरे और मुंबई के ठाठ-बाठ ने इस कदर उलझा दिया था कि वह बापू के चले जाने का गम और पुरानी यादें धीरे-धीरे भूलने लगा था। मेरे दिए हुए सुख-सुविधाओं के इस जाल ने उसके बाल-मन पर अपना पूरा असर दिखा दिया था।
मैं हॉल में सोफे पर बैठा लैपटॉप पर अपना नया बिज़नेस प्लान देख रहा था। तभी माँ रसोई से शाम की चाय और नाश्ता लेकर बाहर आईं। उनकी चाल में अब एक अलग किस्म का ठहराव और गरिमा थी। उन्होंने हल्के पीले रंग की साड़ी पहनी थी—बिल्कुल वैसी ही जैसी मुंबई की हाई-सोसाइटी की औरतें पहनती हैं। उन्होंने टेबल पर कप रखा और छोटू के कमरे की तरफ़ देखा, जहाँ से लगातार आवाज़ें आ रही थीं।
"वह सुबह से बस उसी गेम में लगा हुआ है, रवि। खाने के लिए भी बड़ी मुश्किल से उठा था," माँ ने मेरे बगल में बैठते हुए बेहद धीमी आवाज़ में कहा। उनकी आवाज़ में अब चिंता कम और एक सुकून ज़्यादा था।
मैंने मुस्कुराते हुए लैपटॉप बंद किया और चाय का कप उठाते हुए कहा, "उसे वहीं रहने दो, माँ। जितनी जल्दी वह इन चीज़ों का आदी होगा, उतनी ही जल्दी वह हमारी इस नई ज़िंदगी को अपना मुकम्मल सच मान लेगा। अब उसे इस घर में कोई कमी या कोई डर महसूस नहीं होना चाहिए।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में एक बार फिर मेरे लिए वही अगाध समर्पण उभर आया जो कल की परीक्षा के बाद और भी गहरा हो गया था। उन्होंने सोफे के नीचे धीरे से अपना पैर मेरे पैर से छुआया। छोटू बगल के ही कमरे में था, इसलिए इस तरह की छोटी और छिपी हुई छुअन हमारे भीतर एक अलग ही रोमांच और कामुक तपिश पैदा कर रही थी।
"सोमवार से उसका स्कूल शुरू हो रहा है," माँ ने अपने पल्लू को सँभालते हुए कहा, "वहाँ के लोग, नए दोस्त... सब उसे तुम्हारे नाम से ही जानेंगे।"
"हाँ," मैंने टेबल पर कप वापस रखा और सोफे के नीचे ही उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया। उनकी उंगलियों पर हल्का दबाव बनाते हुए मैंने कहा, "और घर के भीतर भी अब यही हकीकत रहेगी। हम दोनों ने मिलकर जो रास्ता चुना है, उस पर अब कोई पीछे मुड़कर देखने का सवाल ही नहीं उठता। अब इस घर में तुम सिर्फ़ उसकी माँ नहीं हो... तुम इस पूरे घर की मालकिन हो, और मेरी दुनिया हो।"
मेरी इस अधिकारपूर्ण बात पर माँ ने शरमाकर अपनी आँखें झुका लीं, लेकिन उनका हाथ मेरे हाथ में और कस गया। बाहर मुंबई की शाम ढल रही थी, और इस बंद फ्लैट के भीतर हमारा यह नया, बेनाम लेकिन बेहद मज़बूत रिश्ता अपनी जड़ें और गहरी कर रहा था।​
 
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भाग 128
शनिवार की वह रात मुंबई की अपनी रफ्तार में ढल रही थी। लगभग ग्यारह बजे लिविंग रूम का सन्नाटा गहरा गया क्योंकि कई घंटों तक लगातार गेम खेलने के बाद छोटू आखिरकार थककर अपने कमरे में गहरी नींद सो चुका था। नए गैजेट्स की थकान और इस आलीशान घर के एकांत ने उसे पूरी तरह शांत कर दिया था। जब मैंने उसके कमरे का दरवाज़ा धीरे से बंद किया, तो हॉल में सिर्फ नाइट लैंप की मद्धम नीली रोशनी चमक रही थी, जो खिड़की से दिखने वाले मुंबई के समंदर और दूर जगमगाती इमारतों की रोशनी से मिलकर एक अद्भुत माहौल रच रही थी।
मैंने मुड़कर देखा, माँ बालकनी के पास खड़ी थीं। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू अपनी कोहनी पर लपेटा हुआ था और ठंडी हवा उनके गीले बालों को उड़ा रही थी। इस नए शहर की दो दिनों की आज़ादी ने उनके भीतर के संकोच को बहुत हद तक कम कर दिया था। मैं दबे कदमों से उनके पीछे गया और बिना कोई आवाज किए अपनी मज़बूत बाहें उनकी पतली कमर के गिर्द कस दीं।
"रवि..." वे चौंककर आहिस्ते से सिहरीं, लेकिन उन्होंने खुद को मेरी बाहों से छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की। बल्कि, उन्होंने अपना सिर पीछे झुकाकर मेरे कंधे पर टिका दिया।
"छोटू सो गया माँ," मैंने उनके कान के पास झुककर अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए फुसफुसाया। "अब इस रात पर, इस ठंडी हवा पर और इस पूरे घर पर सिर्फ हमारा हक है।"
मैंने उन्हें अपनी तरफ घुमाया। उस मद्धम नीली रोशनी में उनका चेहरा किसी ख्वाब जैसा हसीन लग रहा था। कल तक जो औरत समाज के तानों और बापू के खौफ में जी रही थी, आज वह मुंबई के एक महंगे फ्लैट की बालकनी में पूरी तरह एक मदहोश कर देने वाली प्रेमिका के रूप में मेरे सामने थी। मेरी हथेलियाँ उनकी रेशमी कमर के उतार-चढ़ाव को सहलाते हुए धीरे-धीरे ऊपर बढ़ने लगीं। मेरे इस सीधे और अधिकारपूर्ण स्पर्श से उनकी सांसें एक बार फिर भारी होने लगीं।
> बाहर पूरा शहर जाग रहा था, गाड़ियों की मद्धम आवाज़ें आ रही थीं, लेकिन उस सत्रहवीं मंज़िल की बालकनी के एकांत में हम दोनों अपनी ही एक मुकम्मल दुनिया बना चुके थे।
>
"रवि, मुझे कभी-कभी डर लगता है कि यह कोई सपना तो नहीं?" उन्होंने मेरी आँखों में अपनी बड़ी-बड़ी आँखें डालकर बेहद भावुक स्वर में कहा। "यहाँ का यह ऐशो-आराम, तुम्हारी यह बेपनाह चाहत... और छोटू का तुम्हें पापा कहना। सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि मुझे यकीं नहीं होता।"
मैंने मुस्कुराते हुए उनके होंठों पर अपनी उंगली रख दी। "यह कोई सपना नहीं है माँ... यह हमारा आने वाला कल है।" इस नए मोड़ पर भी जब मैंने उन्हें उसी अधिकार से 'माँ' कहकर पुकारा, तो उस शब्द में अब पुराना संकोच नहीं, बल्कि एक असीम कामुक खिंचाव और गहरा हक था। मेरी आवाज़ की उस भारी दृढ़ता को सुनकर उनका पूरा वजूद भीतर तक काँप उठा। उन्होंने लज्जा और असीम प्यार से अपनी आँखें और कसकर भींच लीं।
मैंने बिना एक पल गंवाए उन्हें अपनी बाहों में ऊपर उठाया और बालकनी से सीधे हमारे शयनकक्ष की तरफ बढ़ गया। उस रात, सोमवार को छोटू के स्कूल शुरू होने से पहले, हम दोनों इस अजनबी शहर की ओट में अपने इस वर्जित और मुकम्मल मिलन की एक और खूबसूरत और तप्त इबारत लिखने जा रहे थे।​
 
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भाग 129
शयनकक्ष के भीतर आते ही मैंने उन्हें आहिस्ते से बेड के नर्म गद्दों पर लिटा दिया। कमरे में खिड़की से आती चाँदनी और नाइट लैंप की मद्धम रोशनी मिलकर एक मायावी समां बांध रही थीं। माँ ने जैसे ही बेड की मखमली चादर को महसूस किया, उनकी आँखें एक बार फिर लज्जा और पूर्ण समर्पण से मूँद गईं। उनके खुले हुए बाल तकिए पर बिखर गए थे, जो उनके गोरे चेहरे की रंगत को और भी निखार रहे थे।
मैंने बिना एक पल गंवाए उनके ऊपर अपना नियंत्रण बनाया। मेरी छाती जब उनके भारी और तेज़ी से उठते-गिरते सीने से टकराई, तो उनके मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकली। मेरे होंठ उनके काँपते हुए होठों पर जा टिके, और एक गहरा, तप्त चुंबन हमारे बीच शुरू हो गया। मेरी जीभ उनके मुँह में घुस गई, उनके होंठों को चूसते हुए, दाँतों को चाटते हुए। माँ ने भी अपनी जीभ से जवाब दिया। इस चुंबन में अब कोई झिझक या अपराधबोध नहीं था, बल्कि इस नए शहर में अपनी आज़ादी का एक अनोखा और तीव्र जश्न था। वह पूरी तरह मेरी बाँहों में ढीली पड़ गईं और मेरे इस वेग का साथ देने लगीं।
मैंने एक हाथ से उनकी साड़ी का पल्लू खींचा। दूसरा हाथ ब्लाउज़ के हुकों पर गया। एक-एक करके खोले। ब्लाउज़ के खुलते ही उनके भारी स्तन बाहर आ गए—गोरे, गोल, निप्पल्स पहले से सख्त। मैंने मुँह झुकाया और एक निप्पल को होंठों में ले लिया। जीभ से धीरे-धीरे घेरा, चूसा, फिर हल्के दाँत गड़ाए। माँ की कमर उछल पड़ी। उन्होंने मेरे बालों में उँगलियाँ फँसा लीं। मैंने दूसरा स्तन हाथ से दबाया, निप्पल को अंगूठे से मरोड़ा। दोनों स्तनों को बारी-बारी से मुँह में लेते हुए मैंने उनकी साड़ी और पेटीकोट को कमर तक ऊपर खींच दिया।
अंडरवियर को एक उंगली से किनारे किया। उनकी योनि पहले से गीली थी। मैंने मध्यमा और तर्जनी उँगलियाँ अंदर धकेलीं। अंदर की दीवारें गर्म, चिकनी और सिकुड़ रही थीं। उँगलियों को अंदर-बाहर करते हुए क्लिटोरिस पर अंगूठा फेरने लगा। माँ की साँसें तेज़ हो गईं। उनके मुँह से दबी-दबी सिसकियाँ निकलने लगीं—
“रवि… धीरे…”
मैंने उँगलियाँ और गहराई तक पहुँचाईं, घुमाईं। उनके अंदर का पानी मेरी हथेली तक बह आया। कुछ देर बाद मैंने उँगलियाँ निकालीं और उनके पैरों के बीच अपना मुँह ले गया। जीभ को उनकी योनि की दरार पर फिराया, क्लिटोरिस को चूसा, फिर जीभ अंदर धकेल दी। माँ की दोनों जाँघें मेरे सिर के दोनों तरफ़ कस गईं। उन्होंने तकिए को मुँह से दबा लिया ताकि आवाज़ न निकले। मैंने उनकी योनि को जीभ से चाटा, चूसा, उँगलियाँ फिर से अंदर डाल दीं। उनके बदन में सिहरन दौड़ रही थी।
जब मैंने महसूस किया कि वे चरम के करीब हैं, तो रुका। मैंने अपने कपड़े उतारे। मेरा लिंग पूरी तरह खड़ा था—मोटी, नसों से भरी, सिर पर प्री-कम चमक रहा था। माँ ने आँखें खोलीं और उसे देखा। उनकी साँसें और तेज़ हो गईं। मैं उनके ऊपर चढ़ा। लिंग का सिरा उनकी गीली योनि पर रखा और धीरे-धीरे धकेलना शुरू किया। हर इंच के साथ माँ की आँखें बंद होती गईं। पूरा अंदर जाने पर दोनों रुक गए। अंदर की तंग गर्माहट ने मुझे पागल कर दिया।
मैंने हिलेना शुरू किया—पहले बहुत धीमी, गहरी ठोकरें। हर धक्के के साथ उनके स्तन हिल रहे थे। मैंने एक स्तन मुँह में ले रखा था, दूसरा हाथ से दबा रहा था। माँ के नाखून मेरी पीठ पर गड़ने लगे। गति धीरे-धीरे बढ़ाई। बेड की चरमराहट और हमारी साँसों की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी।
मैंने उनकी एक टाँग अपने कंधे पर चढ़ाई। कोण बदलते ही लिंग और गहराई तक पहुँचा। माँ की चीख दब गई। मैंने दोनों टाँगें कंधों पर चढ़ा दीं और तेज़ ठोकरें मारने लगा। उनकी योनि से पानी की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। माँ की अंदर की दीवारें सिकुड़ने लगीं।
“रवि… मैं… …” वे हाँफते हुए बोलीं।
मैंने गति और बढ़ाई। क्लिटोरिस को अंगूठे से रगड़ते हुए लगातार ठोकरें मारीं। माँ का पूरा बदन अकड़ गया। उनकी योनि ने मेरे लिंग को कसकर जकड़ लिया। गर्म तरल बह निकला। चरम के साथ उनकी आँखों से आँसू निकल आए।
मैंने भी अपने आप को नहीं रोका। आखिरी कुछ गहरी ठोकरों के साथ उनके अंदर ही वीर्य की धार छोड़ दी। पूरा शरीर काँप रहा था। मैं उनके ऊपर गिरा, फिर भी अंदर ही रहा। दोनों पसीने से लथपथ, हाँफते हुए एक-दूसरे से चिपके रहे।
कुछ देर बाद मैंने लिंग निकाला। वीर्य उनकी योनि से धीरे-धीरे बाहर बह रहा था। मैं उनके बगल में लेट गया और उन्हें अपनी बाँहों में समेट लिया। माँ ने अपना सिर मेरे सीने पर रख दिया। उनकी साँसें अभी भी तेज़ थीं।
मैंने उनके बाल सहलाते हुए फुसफुसाया—
“अब यह हमारा घर है, माँ। और यह हमारा रिश्ता।”
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया। बस मेरे सीने पर और कसकर चिपक गईं। चाँदनी खिड़की से आती रही। बाहर की दुनिया दूर थी। कमरे के भीतर सिर्फ़ हम दोनों थे—और वह नई गृहस्थी, जो अब पूरी तरह शुरू हो चुकी थी।​
 
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भाग 130
रविवार की सुबह जब शयनकक्ष के भारी पर्दों को चीरकर सूरज की तीखी रोशनी अंदर आई, तो रात का वह मदहोश कर देने वाला सन्नाटा सुबह की ताज़गी में बदलने लगा था। मैंने अपनी आँखें खोलीं और देखा कि माँ मेरे सीने पर अपना सिर रखे अब भी गहरी और सुकून भरी नींद सो रही थीं। उनके चेहरे पर रात के उस असीम सामीप्य की थकान और एक अजीब सी संतुष्टि साफ़ झलक रही थी। उनके बिखरे हुए बाल मेरी छाती पर फैले थे। मैंने बेहद आहिस्ते से उनके माथे को चूमा और बिना उन्हें जगाए बिस्तर से उठकर बालकनी की तरफ़ बढ़ गया।
बाहर मुंबई का विशाल समंदर सुबह की धूप में चांदी की तरह चमक रहा था। कुछ ही देर में माँ भी नहा-धोकर, लाल रंग की बिंदी और एक खूबसूरत कॉटन साड़ी में पूरी तरह सज-धज कर रसोई में पहुँच चुकी थीं। उनके चेहरे का वह लजीलापन और मेरी नज़रों से नज़रे मिलाने की वह कशमकश अब हमारे बीच का एक खूबसूरत रोज़मर्रा का नियम बन चुकी थी।
इस नए शहर में हमारी सुबह अब किसी डर या अपराधबोध से नहीं, बल्कि एक-दूसरे पर अटूट अधिकार और आने वाले सुनहरे कल की मुकम्मल तैयारियों से शुरू होती थी।
डाइनिंग टेबल पर जब हम नाश्ते के लिए बैठे, तो छोटू भी अपने कमरे से बाहर आ चुका था। कल जब उसने प्रिंसिपल के सामने मुझे 'पापा' कहा था, उसके बाद से उसके बर्ताव में मेरे प्रति एक गहरा आदर और पूर्ण आज्ञाकारिता आ चुकी थी। वह नए गैजेट्स और इस आलीशान घर के ठाठ-बाठ में अपनी पुरानी कड़वी यादों को पूरी तरह भुला चुका था।
"छोटू, कल तुम्हारा स्कूल का पहला दिन है," मैंने पराठे का निवाला तोड़ते हुए बेहद गंभीर और रोबीली आवाज़ में कहा। "तुम्हारी यूनिफॉर्म और बुक्स माँ ने तैयार कर दी हैं। सुबह ठीक आठ बजे गाड़ी नीचे तैयार मिलेगी।"
छोटू ने पूरी निष्ठा से अपना सिर हिलाया, "जी पापा, मैं ध्यान रखूँगा और मन लगाकर पढूँगा।"
उसका इतनी सहजता से मुझे 'पापा' कहना अब इस घर का सबसे बड़ा और अंतिम सच बन चुका था। बगल में बैठी माँ ने जब छोटू के मुँह से यह सुना, तो उनकी आँखों में तसल्ली के आँसू आ गए। उन्होंने चुपके से टेबल के नीचे से मेरा पैर छुआ। उस छुअन में एक अजीब सी राहत, गर्व और मेरे इस मज़बूत नियंत्रण के लिए एक मौन समर्पण था।
शाम को जब छोटू अपने कमरे में सोने चला गया, तो मैं और माँ एक बार फिर बालकनी में आकर खड़े हो गए। ठंडी हवा के झोंके माँ के आँचल को उड़ा रहे थे। मैंने उन्हें पीछे से अपनी मज़बूत बाहों में भींच लिया। अब हमारे जीवन में न तो बापू का कोई साया था, न समाज की बंदिशें और न ही कोई पुराना डर। हमने अपने साहस और सूझबूझ से अपनी एक नई, महफूज़ और खूबसूरत दुनिया बसा ली थी।
"रवि, आज मैं पूरी तरह शांत हूँ। तुमने इस बिखरे हुए परिवार को एक नया वजूद और मुझे मेरा असली हक दे दिया," उन्होंने पीछे मुड़कर मेरी आँखों में देखते हुए पूरी शिद्दत से कहा।
मैंने उनके होंठों पर अपनी आख़िरी मुहर लगाते हुए उन्हें अपने सीने से लगा लिया। बाहर मुंबई की रौशनी चमक रही थी, और इस बंद फ्लैट के भीतर हमारा यह अनोखा, वर्जित और मुकम्मल रिश्ता हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो चुका था। अब हम एक ऐसे मुकाम पर थे जहाँ से पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं था, और न ही हमें उसकी कोई चाहत थी। यह हमारी नई शुरुआत थी, हमारा अपना एक मुकम्मल और अटूट संसार था।
 
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