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मैं काव्या, एक बेहद खूबसूरत लड़की…
रंग मेरा दूध जैसा गोरा है और बदन नरम, चिकना सा… जैसे अभी जवानी अपने पूरे शबाब पर खड़ी हो।
इस उम्र में मन भी अपने ही रास्ते ढूँढने लगता है…
कभी सपनों में खो जाता है, तो कभी अनजाने सवालों में उलझ जाता है।
और मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही है…
मेरे दिल में भी वही अरमान हैं, जो इस उम्र की हर लड़की के होते हैं…
एक अपना इंसान… एक ऐसा साथी, जो सिर्फ नाम का नहीं, दिल से अपना हो।
कौन होगा मेरे सपनों का राजकुमार…
कैसा होगा वो…
क्या उसकी आँखों में मेरे लिए वही अपनापन होगा, जिसकी मुझे तलाश है…
क्या वो मुझे सच में प्यार करेगा…
या फिर ये सब भी बस एक सपना ही रहेगा…
और सबसे बड़ा सवाल…
कब मिलेगा वो मुझसे…
कभी-कभी मैं खुद से ही पूछती हूँ…
क्या मैं उसे इस भीड़ में पहचान पाऊँगी…
इतनी बडी दुनिया में क्या वो सिर्फ एक इंसान होगा… या कुछ ऐसा खास, जो उसे बाकी सबसे अलग बना देगा…
कुछ तो खास होगा उसमें…
शायद उसकी मुस्कान…
शायद उसकी बातें…
या फिर वो एहसास, जो मुझे उसके पास होने पर मिलेगा…
क्या वो मेरे जज़्बातों को समझेगा… बिना कुछ कहे ही मेरे अंदर की खामोशी को पढ़ पाएगा…
क्या मैं उसे खुश रख पाऊँगी… या वो मुझे इतना अपना लगेगा कि मैं खुद को ही भूल जाऊँगी…
ये सारे सवाल आज भी मेरे दिल और दिमाग के बीच हर रोज़ टकराते रहते हैं…
कभी दिन में अचानक… कभी रात की खामोशी में…
और हर बार मुझे बस एक ही एहसास छोड़ जाते हैं — इंतज़ार।
लेकिन इस इंतज़ार में भी एक अजीब सी मिठास है…
एक हल्की सी चुभन… जो दर्द भी देती है और सुकून भी…
जैसे दिल को पता हो कि कुछ बहुत खास आने वाला है… लेकिन वक्त अभी उसका नहीं आया।
और मैं… बस उसी पल का इंतज़ार कर रही हूँ…
कब मिलेगा मेरे इन सारे सवालों का जवाब…
कब खत्म होगा ये इंतज़ार…
कब मेरी ये अधूरी सी दुनिया किसी अपने के आने से पूरी होगी…
मैं अपने बिस्तर पर लेटी हुई अपने हाथ में एक डायरी लिए हुए थी और उस मीठे से एहसास को कागज़ के पन्नों पर उतार रही थी।
दिल में हजारों सपने थे और मन में रंगीन ख्वाब, जिन्हें मैं शब्दों का रूप दे रही थी।
ये एहसास मेरे लिए बिल्कुल नया सा था। अभी तक मेरी जिंदगी में किसी लड़के की एंट्री नहीं हुई थी।
दोस्ती के ऑफर तो मुझे बहुत आए थे, लेकिन मेरा दिल आज भी उसी प्यार को तलाश रहा था, जिसे मैं बचपन से अपने सपनों में देखती आ रही थी।
मुझे पूरा यकीन था कि मेरे सपनों का राजकुमार मुझे ज़रूर मिलेगा, लेकिन कब मिलेगा, इसकी न कोई तारीख थी और न कोई जगह।
बस एक इंतज़ार था, जो हर दिन मेरे साथ चलता रहता था।
तभी अचानक मेरी मम्मी की आवाज़ मेरे कानों में गूँजती है और मैं एक बार फिर अपने सपनों की उस हसीन दुनिया से बाहर आ जाती हूँ।
ये उनका रोज़ का काम था, जैसे वो हमेशा मेरे ख्वाबों को तोड़ने आ जाती थीं।
मगर कॉलेज भी तो जाना था मुझे…
इसलिए मैंने ज़्यादा कुछ नहीं सोचा और फटाफट अपनी डायरी छुपाकर ड्रॉयर में रख दी।
फिर उठकर मैं फ्रेश होने के लिए बाथरूम की तरफ चल पड़ी।
उधर मम्मी रोज़ की तरह अपना “रामायण” सुनाने में लगी थीं… वही रोज़ की बातें, वही डाँट-फटकार।
लेकिन सच कहूँ तो उनकी बातों का मुझ पर कोई खास असर नहीं पड़ता था। मैं अपनी ही दुनिया में रहती थी।
जैसे ही मैं बाथरूम के दरवाज़े के पास पहुँची, सामने से मुझे आरव आता हुआ दिखाई दिया।
वो मुझसे एक साल छोटा था और हमारा रिश्ता हमेशा लड़ाई-झगड़ों वाला ही रहा था।
उसकी और मेरी कभी नहीं बनती थी। वो शुरू करता था तो मैं खत्म करती थी… और अगर मैं शुरू कर दूँ, तो वो भी पीछे नहीं रहता था।
मैं उसे देखकर बिना कुछ बोले सीधे बाथरूम में घुस गई। आरव का चेहरा देखने लायक था।
एक पल के लिए मुझे उसकी हालत देखकर हँसी भी आ गई, लेकिन मुझे और लेट नहीं होना था, इसलिए मैं जल्दी से अंदर चली गई और फ्रेश होने लगी।
बाहर आरव वहीं खड़ा था और अपने सिर के बाल खींचते हुए मेरी मम्मी से मेरी शिकायतें लगा रहा था…
बाहर आरव अपने सिर के बाल खींचते हुए मम्मी से मेरी शिकायत कर रहा था। उसकी बातें मुझे अंदर तक साफ सुनाई दे रही थीं।
उसे ऐसे गुस्से में देखकर अंदर ही अंदर मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था और मेरी हँसी रुक ही नहीं रही थी।
सच कहूँ तो मुझे उसे चिढ़ाने में बहुत मज़ा आता था। वो मेरा कुछ बिगाड़ तो नहीं सकता था, लेकिन मुझ पर गुस्सा बहुत करता था।
और वैसे भी… मुझसे नाराज़ होकर वो कर ही क्या सकता था?
खैर, थोड़ी देर बाद मैं बाथरूम से बाहर आई तो वो तुरंत गुस्से में मुझे घूरता हुआ अंदर चला गया।
उस वक्त उसका चेहरा सच में देखने लायक था। चेहरे पर मेरे लिए गुस्सा अब भी साफ दिखाई दे रहा था।
मैं हल्का सा मुस्कुराते हुए उसे और चिढ़ाकर अपने कमरे में चली आई।
थोड़ी देर बाद मैंने अलमारी से अपना नीले रंग का सूट निकाला और उसके साथ नीचे सफेद रंग की लेगिंग पहन ली। कपड़े मेरे बदन से हल्के से चिपक रहे थे, जिससे मेरी फिगर साफ उभरकर नजर आ रही थी।
वैसे मुझे जीन्स पहनना कभी ज्यादा पसंद नहीं था।
उसमें ना तो मुझे आराम महसूस होता था और ना ही वो मुझ पर उतनी अच्छी लगती थी, जितना सूट। इसलिए ज्यादातर मैं ऐसे ही कपड़े पहनना पसंद करती थी...।
मैंने अपने बाल सँवारे, जो नहाने की वजह से अभी पूरी तरह गीले थे। फिर आँखों में हल्का सा काजल लगाया और माथे पर उसी रंग की छोटी सी मैचिंग बिंदी। थोड़ा सा मेकअप और आखिरी टच देने के बाद मैं कमरे से बाहर निकली और सीधे ड्रॉइंग रूम में आकर डाइनिंग चेयर पर बैठ गई। अब मैं बस नाश्ता आने का इंतज़ार कर रही थी।
तभी मुझे आरव बाथरूम से बाहर निकलता हुआ दिखाई दिया। उसके चेहरे पर गुस्सा अब भी साफ नजर आ रहा था। वैसे सच कहूँ तो वो मुझे गुस्से में थोड़ा ज्यादा ही क्यूट लगता था।
थोड़ी देर बाद वो भी वहीं आकर डाइनिंग टेबल पर मेरे सामने वाली चेयर पर बैठ गया। लेकिन उसकी नजरें अब भी मुझ पर टिकी हुई थीं, जैसे अभी भी सुबह वाली बात उसके दिमाग से निकली न हो।
तभी मम्मी कमरे में आईं। उनके हाथों में नाश्ते की ट्रे थी। मम्मी की उम्र करीब छियालीस साल थी। दिखने में वो थोड़ी हेल्दी थीं, लेकिन चेहरे पर एक अलग ही सादगी थी। रंग उनका भी मेरी तरह गोरा था।
शायद अपनी जवानी के दिनों में वो बहुत खूबसूरत रही होंगी… लेकिन वक्त के साथ चेहरे की चमक थोड़ी फीकी पड़ चुकी थी। फिर भी उनकी आँखों में आज भी वही अपनापन और घर संभालने वाली औरत की नरमी साफ दिखाई देती थी।
मेरी माँ का नाम प्रियंका था।
“क्यों शहज़ादी…”
माँ ने मेरी तरफ देखते हुए कहा,
“अब तो तुम इतनी बड़ी हो गई हो… कभी तुम्हारे अंदर ज़िम्मेदारी नाम की कोई चीज़ आएगी भी या नहीं…?
या सारी उम्र ऐसे ही गुज़ारने का इरादा है?”
मैं चुपचाप उनकी बातें सुन रही थी, क्योंकि मुझे पता था कि अब उनका रोज़ वाला भाषण शुरू हो चुका है।
“अरे, कुछ दिनों में तेरी शादी हो जाएगी। क्या तू अपने ससुराल में भी ऐसे ही रहेगी?
तुझे ज़रा भी होश नहीं रहता कि घर पर काम भी होता है। मैं अकेले थक जाती हूँ…
तुझे मेरा हाथ बँटाना चाहिए, लेकिन तू तो सुबह तक सोती रहती है… आखिर ऐसा कब तक चलेगा?”
माँ बिना रुके बोले जा रही थीं और मैं सामने बैठी उनका चेहरा देख रही थी।
“क्या माँ…”
मैंने हल्का सा मुँह बनाते हुए कहा, “आपका ये प्रवचन सुन-सुन कर मैं तो तंग आ गई हूँ। जब देखो तब मेरी शादी के पीछे पड़ी रहती हो।
अरे, अच्छी-खासी आज़ाद हूँ मैं… और आप हो कि मेरी आज़ादी छीनने पर तुली हुई हो…”
“और आपको क्या लगता है कि मैं अभी से घर की सारी ज़िम्मेदारियाँ अकेले निभा पाऊँगी…?
देखो ना माँ, अभी मेरी उम्र ही कितनी हुई है इन सब चीज़ों के लिए…” मैंने हल्के से मुँह बनाते हुए कहा और फिर चुपचाप नाश्ता करने लगी।
माँ अचानक मेरे कान पकड़ लेती हैं — “कुछ तो शर्म कर… तेरी जैसी लड़कियाँ आज पूरे घर का काम अकेले संभालती हैं। थोड़ा उनसे भी सीख लेती तो तेरे साथ-साथ मेरा भी कुछ भला हो जाता…”
मैं दर्द से हल्का सा मुँह बनाकर उनका हाथ हटाने की कोशिश करने लगी। वहीं सामने बैठा आरव मुझे देखकर मज़े ले रहा था।
जब भी मुझे डाँट पड़ती, उसके चेहरे पर अलग ही खुशी दिखाई देने लगती थी।
तभी पापा कमरे में आते हैं। उनकी उम्र लगभग 50 साल के आसपास थी। आँखों पर चश्मा चढ़ाए और हाथों में अख़बार लिए वो आकर अपनी चेयर पर बैठ गए।
उनका नाम राजेश था।
“अरे, ये सुबह-सुबह क्या हो रहा है…?” पापा ने अख़बार टेबल पर रखते हुए कहा,
“क्या करती हो प्रियंका तुम…? बेचारी इतनी अच्छी तो मेरी लाडली बेटी है और तुम इससे ऐसे पेश आती हो…”
“हाँ - हाँ…
और चढ़ाओ इसे अपने सिर पर,” माँ तुरंत बोलीं, “पहले ही क्या कम लाड़-प्यार दिया है आपने इसे? घर का काम करने के बजाय सुबह तक सोती रहती है…”
“...शाम को पढ़ने का बहाना बनाती है। आखिर कब तक चलेगा ये सब? अभी से ये घर का काम नहीं सीखेगी तो आगे इसका क्या होगा…” माँ नाराज़गी से बोलीं।
“सीख जाएगी… अभी तो इसकी उम्र कहाँ हुई है…” पापा ने आराम से कहा।
पापा की बातें सुनकर मैं मुस्कुरा दी।
“आपने तो इसे और सिर पर चढ़ा रखा है।
आप तो ऐसे बोल रहे हैं जैसे ये कोई दूध पीती बच्ची हो…” माँ ने कहा और फिर वापस किचन में चली गईं।
उधर आरव के चेहरे पर हँसी थी, मगर मैं भला उसे ऐसे खुश कैसे देख सकती थी। उसका और मेरा तो छत्तीस का आँकड़ा था।
“पापा, पता है… कल आरव कॉलेज बंक मारकर अपने दोस्तों के साथ मूवी गया था। वो तो मेरी सहेली है, उसने इसको जाते हुए देखा और सुना। आजकल इसका पढ़ाई में बिल्कुल मन नहीं लगता है। दिन भर ये अपने दोस्तों के साथ इधर-उधर घूमता रहता है…”
पापा गुस्से से एक बार आरव की तरफ देखते हैं। आरव के चेहरे पर जो थोड़ी देर पहले हँसी थी, वो अब पूरी तरह गायब हो चुकी थी।
अब उसके चेहरे पर डर और परेशानी साफ झलक रही थी।
वो गुस्से से मुझे घूर रहा था, जैसे मुझे वहीं खा जाएगा।
“दिस इज़ नॉट फेयर, आरव…” पापा ने सख्त आवाज़ में कहा, “कह देता हूँ, अगर इस साल तुम्हारा रिजल्ट खराब आया ना…
तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। बी कॉन्सेंट्रेटेड इन योर स्टडीज़। दिस इज़ माय लास्ट वॉर्निंग… नेक्स्ट टाइम नो एक्सक्यूज़ेस… अंडरस्टैंड!”
बेचारा आरव भी क्या करता… वो चुपचाप अपना सिर नीचे झुका लेता है और पापा की डाँट सुनता रहता है।
ये तो जैसे रोज़ का काम था। मैं अक्सर आरव की ऐसी ही टाँग खींचा करती थी और वो चाहकर भी मेरा कुछ नहीं कर पाता था।
करीब आधे घंटे बाद हम दोनों तैयार होकर बस स्टॉप पर पहुँच जाते हैं और बस के आने का इंतज़ार करने लगते हैं…
आरव और काव्या दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। जहाँ काव्या बी.कॉम कर रही थी, वहीं आरव बी.एससी कर रहा था। दोनों रोज़ एक ही बस से कॉलेज जाते थे।
आज एक तरफ काव्या खड़ी थी, वहीं दूसरी तरफ कोने में आरव चुपचाप सिर नीचे झुकाए खड़ा था। वो अब भी काव्या से बहुत नाराज़ था। और होता भी क्यों ना… काव्या ने जान-बूझकर उसे पापा से डाँट सुनवाई थी।
“आई एम सॉरी, आरव…
अब तो मुस्कुरा दे…” काव्या ने धीरे से कहा।
आरव एक नजर उसकी तरफ देखता है, फिर तुरंत अपना मुँह दूसरी तरफ फेर लेता है।
“मुझे तुझसे कोई बात नहीं करनी…”
उसने नाराज़गी से कहा।
काव्या तुरंत अपने बैग से एक कैडबरी निकालकर उसके हाथ में रख देती है।
“मैंने जो किया तेरे भले के लिए किया… चल अब पहले की तरह मुस्कुरा दे…”
फिर हल्का सा मुस्कुराकर वो बोली
“वैसे एक बात बोलूँ… तू गुस्से में और भी ज्यादा अच्छा लगता है…”
“जो किया तेरे भले के लिए किया… चल अब पहले की तरह मुस्कुरा दे। वैसे एक बात बोलूँ… तू गुस्से में और भी ज़्यादा अच्छा लगता है। अब ऐसे क्या देख रहा है? चुपचाप टॉफ़ी खा ले, नहीं तो वो भी मैं तुझसे छीन लूँगी…”
आरव चाहकर भी कुछ नहीं बोल पाता और अगले ही पल उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ जाती है।
काव्या रोज़ इसी तरह पहले आरव को डाँट सुनवाती और फिर बाद में उसे मना भी लेती थी। मगर आरव भी काव्या से बहुत प्यार करता था।
उसे काव्या के ये सारे नखरे अच्छे लगते थे। भले ही वो उस पर गुस्सा क्यों ना हो, लेकिन काव्या पल भर में उसका सारा गुस्सा गायब कर देती थी।
तभी थोड़ी देर बाद बस आ जाती है। रोज़ की तरह आज भी बस भीड़ से पूरी खचाखच भरी हुई थी।
आरव तो जैसे-तैसे बस में चढ़ जाता है, मगर जैसे ही काव्या अपना एक पैर बस में रखती है, तभी बस चल पड़ती है…
बस के अचानक चल पड़ने से काव्या का हाथ फिसल जाता है और वो तुरंत पीछे की तरफ गिरने लगती है। तभी एक मज़बूत हाथ उसकी बाँहों को थाम लेता है।
वो मज़बूत बाँहें और किसी की नहीं बल्कि आरव की थीं।
आरव तुरंत उसे अपनी तरफ खींच लेता है और अगले ही पल काव्या बस के अंदर होती है। इस वक्त दोनों के चेहरों पर एक प्यारी सी मुस्कान थी।
थोड़ी देर बाद आरव आगे बढ़कर अपने दोस्तों के पास चला जाता है और काव्या वहीं खड़ी रहती है। तभी उसे अपने कंधे पर किसी का हाथ महसूस होता है।
वो हाथ उसकी बेस्ट फ्रेंड सोनाली का था। वो उसकी क्लासमेट भी थी…
सोनाली दिखने में गोरी और सुंदर थी, मगर काव्या के सामने वो थोड़ी फीकी लगती थी। हाइट में सोनाली काव्या से थोड़ी लंबी थी और उसका शरीर भी थोड़ा भरा हुआ था। वो भी दिखने में काफी अट्रैक्टिव थी।
“क्यों… बस में ठीक से चढ़ नहीं पाती क्या?” सोनाली ने मुस्कुराते हुए कहा, “आज अगर तेरे भाई ने सही समय पर तेरा हाथ नहीं पकड़ा होता ना, तो तू तो सीधा ऊपर जाने वाली थी।
काश मैं तेरी जगह होती… मैं तो आरव के सीने से लग जाती और वहीं उससे चिपक जाती… ये सब मेरे साथ क्यों नहीं होता यार…”
“प्लीज़ स्टॉप इट, सोनाली…” काव्या ने उसे घूरते हुए कहा, “तुझे बक-बक के अलावा और कुछ नहीं सूझता क्या? जब देखो तब तू हमेशा लड़कों की बातें ही करती रहती है…”
“तो क्या करूँ…” सोनाली तुरंत बोली, “लड़कों के बारे में तुझसे बात ना करूँ तो क्या अपने बारे में बात करूँ…?”
“बात तो तू ऐसे कर रही है जैसे तुझे लड़कों में कोई इंटरेस्ट ही नहीं है…” सोनाली ने मुस्कुराते हुए कहा।
“मैं तेरी तरह फालतू नहीं हूँ…
जब देखो तब तू बस इन्हीं सब बातों में लगी रहती है…” काव्या ने उसे जवाब दिया।
सोनाली की बातें सुनकर मैं कुछ पल के लिए यूँ ही खामोश हो गई। मैं अच्छी तरह जानती थी कि बहस में मैं उससे कभी नहीं जीत सकती।
लेकिन ना जाने क्यों… आज पहली बार मैं आरव के बारे में सोचने पर मजबूर हो गई थी।
बार-बार मेरे दिमाग में वही पल घूम रहा था, जब उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे गिरने से बचाया था। इससे पहले भी ना जाने कितनी बार वो मेरा हाथ पकड़ चुका था, मगर मैंने कभी उस बात पर इतना ध्यान नहीं दिया था।
लेकिन आज… आज ना जाने ऐसा क्या अलग था, जो मैं बार-बार उसी बारे में सोच रही थी।
शायद ये सब सोनाली की बातों का असर था…
आज पहली बार मुझे ऐसा महसूस हुआ कि आरव अब पहले जैसा नहीं रहा। वो अब पूरा जवान हो चुका था…
उसका शरीर भी अब पहले जैसा नहीं रहा था। अब वो पहले से कहीं ज़्यादा मजबूत और आकर्षक लगने लगा था।
शायद हर लड़की के दिल में कहीं ना कहीं ये ख्वाहिश छुपी होती है कि कोई उसे अपनी मजबूत बाहों में थामे… ऐसा एहसास दे, जहाँ वो खुद को सुरक्षित और खास महसूस कर सके।
और शायद आज मेरे अंदर भी कुछ ऐसा ही एहसास धीरे-धीरे जन्म ले रहा था।
बार-बार वही पल मेरी आँखों के सामने आ रहा था, जब आरव ने मुझे गिरने से बचाकर अपनी बाहों में थाम लिया था। ना जाने क्यों, उस एक पल को याद करते ही मेरे दिल की धड़कन तेज हो जाती थी।
ये सब सोचते-सोचते मेरे चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई, जो सोनाली की नजरों से बच ना सकी। वो बड़े गौर से मेरे चेहरे को देख रही थी, जैसे मेरी इस मुस्कान की वजह समझने की कोशिश कर रही हो।
और इधर ये सब सोचकर मेरा चेहरा शर्म से हल्का लाल पड़ चुका था।
“क्या बात है जान…” सोनाली ने मुझे छेड़ते हुए कहा, “तेरे चेहरे पर ऐसी मुस्कुराहट क्यों है…?”
“क्या मैं इस मुस्कुराहट की वजह जान सकती हूँ…?” सोनाली ने मुझे ध्यान से देखते हुए पूछा।
“कुछ नहीं सोनाली… बस यूँ ही…” मैंने नज़रें चुराते हुए कहा।
सोनाली मेरे चेहरे पर अपने दोनों हाथ रख देती है और मुझे अपनी तरफ देखने का इशारा करती है। मेरा चेहरा शर्म से और भी लाल पड़ चुका था।
मैंने एक नज़र उसकी आँखों में देखा, लेकिन अगले ही पल मेरी नज़रें खुद-ब-खुद नीचे झुक गईं।
वो भी मुझसे कुछ और ना पूछ सकी और बस मेरे चेहरे को ऐसे ही देखती रही… शायद वो मेरे चेहरे से मेरे दिल का हाल जानने की कोशिश कर रही थी।
तभी मेरे पीछे खड़ा एक लड़का बार-बार मुझे धक्के दे रहा था। वो इस वक्त मेरे बिल्कुल पीछे खड़ा था।
शक्ल से वो काला सा था और काफी मोटा भी। वो बार-बार अपनी पैंट एडजस्ट कर रहा था।
इस वक्त उसका लंड मेरी गांड से पूरी तरह चिपका हुआ था। बस में भीड़ इतनी ज़्यादा थी कि आगे जाना भी मुमकिन नहीं था।
…वो इसी बात का फ़ायदा उठा रहा था।
मेरे साथ अक्सर ये सब होता आया था। मैं जानती थी कि ऐसे सिचुएशन में मुझे क्या करना है।
मैंने अपनी नज़रें उसकी तरफ की तो वो मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था… जैसे मुझसे पूछ रहा हो कि क्या तुम्हें भी मज़ा आ रहा है।
मैंने उससे कुछ कहा तो नहीं, बस एक नज़र उसे घूरकर देखती रही। फिर अपना एक हाथ बालों पर ले गई और वहाँ से धीरे से अपना हेयरपिन निकाल लिया। उसके बाद मैं धीरे-धीरे अपने हाथ को नीचे की ओर ले जाने लगी।
अगली बार जब बस अगले स्टॉप पर रुकी, तो एक बार फिर उसने मुझे ज़ोर का धक्का दिया। मैं उस भीड़ में बुरी तरह पिस रही थी और वो आदमी उसी भीड़ का पूरा फायदा उठा रहा था।
मैं भी सही मौके का इंतज़ार कर रही थी।
जैसे ही बस फिर से चली, वो जान-बूझकर मुझे फिर धक्का देने के लिए अपनी कमर आगे की तरफ बढ़ाने लगा। उसी पल मैंने अपने हाथ में रखा हुआ हेयरपिन उसके हथियार पर दे मारा…
मैं तुरंत पलटकर उसके चेहरे की तरफ देखने लगी। उसके चेहरे पर अभी भी मुस्कान थी, मगर उस मुस्कुराहट के पीछे दर्द की एक हल्की सी लकीर अब साफ दिखाई दे रही थी।
भले ही उसने अपने मुँह से कोई आवाज़ ना निकाली हो, लेकिन उसकी आँखें उस दर्द को साफ बयान कर रही थीं।
उसका असर भी मुझे तुरंत देखने को मिल गया। वो धीरे-धीरे वहाँ से सरकता हुआ आगे की तरफ बढ़ गया।
उसकी हालत देखकर अब मेरे चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई थी।
थोड़ी देर बाद कॉलेज आ गया और एक-एक करके सारे स्टूडेंट्स बस से बाहर निकलने लगे।
सोनाली ने भी ये सब देख लिया था। वो मुझे देखकर बस मुस्कुरा रही थी और जवाब में मैं भी उसे देखकर मुस्कुरा पड़ी।
“क्या बात है काव्या…” सोनाली ने मुझे छेड़ते हुए कहा, “आज तेरे चेहरे से मुस्कान हट ही नहीं रही। कोई मिल गया क्या तुझे…? कहीं तेरे सपनों का राजकुमार तो नहीं मिल गया…?”
“अपनी बक-बक बंद कर…” काव्या ने उसे घूरते हुए कहा, “कभी तो कोई और बात किया कर मुझसे… और जब मेरे सपनों का राजकुमार मुझे मिलेगा ना, तो तुझे सबसे पहली खबर करूँगी…”
जवाब में सोनाली बस उसे देखकर मुस्कुराती रही।
थोड़ी देर बाद लेक्चर शुरू हो गया और उधर आरव भी अपने क्लास की तरफ चला गया। सुबह तो पढ़ाई में थोड़ा मन लग जाता था, मगर जैसे-जैसे वक्त गुजरता, ऐसा लगता था मानो टाइम ही रुक गया हो।
दोपहर में लंच के दौरान हम सब कॉलेज के गार्डन में जाकर बैठते और इधर-उधर की बातें किया करते थे। आज मेरी कई फ्रेंड्स कॉलेज नहीं आई थीं, जिसकी वजह से मुझे और भी ज्यादा बोरियत महसूस हो रही थी।
मगर सोनाली तो थी ही मुझे पकाने के लिए।
“तूने मुझे बताया नहीं काव्या…” सोनाली ने मुस्कुराते हुए कहा, “तू अपने भाई से मुझे कब मिलवा रही है…? कसम से जान, क्या आइटम लगता है तेरा भाई… हाई, मैं मर जावां… जैसे तू एक पीस है ना, वैसे ही तेरा भाई भी…”
मैं बस उसका चेहरा देखती रह गई और वो बिना रुके बोले जा रही थी।
“अगर मैं तेरी जगह होती ना, तो अपने भाई से कब का चुद चुकी होती… चाहे जमाना मुझे कुछ भी कहता। और सबसे अच्छी बात तो ये कि घर की बात घर में ही रह जाती…
बदनामी का खतरा भी कम रहता। मगर अफसोस… मेरा कोई भाई नहीं है। और एक तू है… घर में इतना मस्त माल है और तू बेकार में अपने सपनों के राजकुमार के बारे में सोचती फिरती है…”
सोनाली हँसते हुए आगे बोली — “ये तो वही बात हुई ना कि हिरण को कस्तूरी की तलाश रहती है और उसे खुद नहीं पता होता कि जिसकी उसे तलाश है, वो तो उसके पास ही है…”
“ओह गॉड! इट्स टू मच, सोनाली…” काव्या ने माथा पकड़ते हुए कहा, “पता नहीं तू कब सुधरेगी। जब देखो तब बस ऐसी ही बातें…”
फिर मैंने उसकी तरफ देखकर कहा — “अगर तुझे आरव इतना ही पसंद है ना, तो जाकर खुद उससे बोल दे। वैसे भी मेरा भाई बहुत शरीफ इंसान है… वो तेरे जैसी लड़की के चक्कर में कभी नहीं आएगा…”
“…और तू ये बेफिजूल की बातें हमेशा मुझसे करती रहती है। भला कौन भाई अपनी बहन पर ऐसी नजर डालेगा? ये सब सिर्फ कहानियों में अच्छा लगता है। तू हमेशा ऐसी उल्टी-सीधी स्टोरीज़ पढ़ती रहती है, इसलिए तेरे दिमाग में ये सारी बातें आती रहती हैं। मुझे ही देख ले… क्या मैंने कभी अपने भाई के बारे में ऐसा कुछ सोचा है?”
“लगता है तुझे मुझसे जलन हो रही है…” सोनाली ने तुरंत कहा, “कहीं तुझे डर तो नहीं कि मैं तेरे भाई को तुझसे चुरा लूँ…? अगर यही बात है ना, तो मैं तेरे रास्ते से हट जाती हूँ। आखिर सहेली हूँ तेरी… तेरे लिए इतना तो कर ही सकती हूँ…”
फिर उसने नकली नाराज़गी दिखाते हुए कहा — “और क्या मैं तुझे फालतू लगती हूँ…? यही कहना चाहती है ना तू…? ठीक है, तो आज से तेरी-मेरी दोस्ती खत्म…”
“ओह गॉड…!” काव्या ने माथा पकड़ लिया, “तू हमेशा उल्टी-सीधी बातें ही करती रहती है। अच्छा बाबा, अब मैं तुझे इस बारे में कुछ नहीं कहूँगी… अब तो चुप हो जा मेरी माँ। आई एम सॉरी… जो मुझसे गलती हो गई…”
इतना कहकर काव्या मजाक में अपने कान पकड़ लेती है।
“अब तो मान जा…”
जवाब में सोनाली उसे देखकर धीरे से मुस्कुरा देती है।
ऐसे ही धीरे-धीरे वक्त गुजरता जाता है और सोनाली रोज़ काव्या को नए-नए किस्से सुनाया करती थी, खासकर रिश्तों और छुपी हुई चाहतों से जुड़ी बातें।
शुरुआत में काव्या को ये सब सुनना बिल्कुल पसंद नहीं था। वो हर बार सोनाली को टोक देती थी, लेकिन धीरे-धीरे उसने सोचना शुरू किया कि सिर्फ सुन लेने में आखिर बुराई ही क्या है।
बस फिर क्या था… उसके बाद वो खुद सोनाली से रोज़ नई-नई बातें और कहानियाँ सुनने लगी।
हालाँकि उन बातों का असर अब धीरे-धीरे उसके मन पर भी होने लगा था… कई बार कुछ बातें सुनकर उसका दिल अजीब सी बेचैनी से भर जाता और घर पहुँचने के बाद उसे खुद को सामान्य करने में काफी वक्त लग जाता था…
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