Thank you Ajju Landwalia Iron Man Luckyloda king1969 sunoanuj for your continued supportप्रातः पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अपनी कुटीर में से बाहर निकल कर नदी में स्नान किया और फिर मंदिर में पूजा कर राज सभा के लिए वस्त्र पहने।
कुटीर के बाहर अंगद को देख शांत चेहरे से, “आर्य, क्या राजकुमारी शुभदा ने मुझे बुलाया है?”
अंगद ने मना करते हुए पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को अपने साथ सैनिक शिक्षा केंद्र में कुछ दिखाने लाया। वहां तीरंदाजी के निशान से सौ गज दूर खड़े होकर अंगद ने धनुष उठाकर तीर लगाया।
अंगद गूढ़ चेहरे से, “पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, हम आपसे क्षमा मांगना चाहते हैं। चार वर्ष मैंने आपका सामर्थ्य गलत आंका। अब मैं आप को अपना सामर्थ्य दिखाना चाहता हूं।”
सौ गज पर भी बाण को लगातार सही निशाना लगाकर अंगद ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की आंखों में देखते हुए,
“बारह वर्ष का था जब मेरे पिता ने नवजात राजकुमारी शुभदा को मेरे हाथों में रखा। उस दिन से आज तक मैंने उनकी रक्षा में अपने प्राण लगाए हैं। यदि किसी ने उनको या उनके हृदय को चोट पहुंचाई तो…”
एक और बाण निशाने पर लगा तो पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को संपूर्ण संदेश मिल गया।
राज सभा में सभासद पैनी नजरों से राजकुमारी शुभदा को देख रहे थे जब वह कल रात्रि की क्रीड़ा के कारण कुछ धीमी गति से लेकिन राजसी मुद्रा में चलती सिंहासन की ओर बढ़ी।
वृद्ध सभासद, “रुक जाइए राजकुमारी शुभदा। आप अभी सिंहासन पर नहीं बैठ सकती। आप के पिता और पति के मृत्यु को केवल तीन दिन हुए हैं। आप को शुद्धिकरण के लिए तेरह दिन रुकना होगा। तब तक राज्य को चलाने के लिए आपके पिता के सबसे पुराने सभासदों के मंडल को नियुक्त करना चाहिए।”
राजकुमारी शुभदा मुड़कर सभा के सामने, “इस मंडल में कौन कौन होंगे और इस मंडल की कार्य सीमा क्या होगी?”
राजकुमारी शुभदा को अपनी बात मानते देख सभासद, “मंडल के मुख्य में सबसे ज्येष्ठ सभासद यानी मैं रहूंगा। बाकी के और चार पुराने सभासद होंगे। हम मिलकर राज्य की दैनंदिन को संभालेंगे। यदि आप गर्भवती रही तो आप को एक वर्ष के लिए विश्रांति की आवश्यकता होगी तब यही मंडल कार्य संभालेगा। और यदि आप गर्भवती नहीं रही तो मंडल को निर्णय लेना होगा कि आप कब उस दुख से बाहर निकलकर राज्य चलाने के योग्य होंगी। हम आप की सहायता करने हेतु एकत्र आए हैं पर आप भी मानेंगी की राज्य को एक रोती दुखी राजकुमारी नहीं पर एक सशक्त और स्थिर शासक की आवश्यकता है।”
राजकुमारी शुभदा, “सेनापति को इस मंडल में क्यों नहीं लिया जाता?”
सभासद, “क्षमा राजनंदिनी पर सभी लोग प्रथम दिन से समझ गए थे कि सेनापति अचलसेन की रणनीति अत्यंत दोषपूर्ण थी। उनके युवा बंधु पर राज्य की जिम्मेदारी का भार देना मतलब उसी परेशानी को वापस बुलाना।”
राजकुमारी शुभदा, “पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को मंडल में क्यों नहीं लिया जा सकता?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की ओर हीनता से देख कर सभासद, “राजा खड़गराज जानते थे कि यह हीन कुल की उत्पत्ति है। इसे विदूषक या नर्तक का कार्य योग्य है। कुछ गीत पठन कर शूद्र ब्राह्मण नहीं बनता और एक बार साहस दिखाने से शूद्र क्षत्रिय नहीं बनता।”
राजकुमारी शुभदा, “सभी सभासदों ने हमारे ज्येष्ठ सभासद की बातें सुन ली हैं तो सबसे पहले हम शुद्धिकरण के मुद्दे पर आते हैं। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, शास्त्र क्या कहते हैं?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “शास्त्र इस बात को बताते हैं कि घर में पिता या पति की मृत्यु पर स्त्री को तेरह दिन घर में रहना होगा। (सभासद विजयी हास्य देने लगे) किंतु राजा, या यहां राजकुमारी, को यह बंधन नहीं क्योंकि ईश्वर ने उन्हें पूर्ण राज्य की जिम्मेदारी दी है। आप दाहसंस्कार के बाद स्नान कर के शुद्धिकरण प्राप्त कर चुकी हो।”
मंडल के सभासद हक्काबक्का रह गए जब बाकी सभासद कतराते हुए मुस्कुराए।
राजकुमारी शुभदा, “बात रही हमारी योग्यता और आपकी योग्यता की तो, जब सब समझ चुके थे कि सेनापति अचलसेन की रणनीति अत्यंत दोषपूर्ण थी तो आप में से किसी ने भी उन्हें रोका क्यों नहीं? पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने अपनी बताई योजना को कार्यान्वित कर नृत्यशाला से युद्ध जीता! आप सब उस समय क्यों नहीं बोले?”
सभासद, “उस समय राजा खड़गराज ने सेनापति अचलसेन को स्वीकृत किया था।”
राजकुमारी शुभदा, “तो सभा का कार्य क्या है? राजा की हर बात को हां कहना या उन्हें योग्य मार्गदर्शन करना? क्योंकि पहला उत्तर गलत है और दूसरा आपने किया नहीं। ऐसे सभासद राज्य कैसे चलाएंगे?”
बाकी सारे सभासद आपस में बात करने लगे तो मंडल सभासद गुस्से से, “एक स्त्री, जो युवा है, विधवा है और संभवतः गर्भवती है, वह अस्थिर होती है। ऐसी स्त्री राज्य नहीं चला सकती। यदि राजवंश को युद्ध से पदच्युत किया गया तो आप और राजमाता की अति मानहानि होगी। हम तो आप को चुपके से दूर जाने का सरल मार्ग दे रहे हैं! यह नगर ऐसी स्त्री को शासक नहीं मानेगा जो वर्ण से भेद करते पिता की पुत्री हो, जो मूर्खता की परिसीमा लांघते सेनापति की पत्नी हो, संभवतः एक ऐसे बालक की माता हो जो कभी अपने पिता को न जाने और संपूर्ण समाज जानता है कि एक रात्रि की पत्नी को क्या कहते हैं।”
राज सभा में लोग आपस में बातें करने लगे जब सबकी आवाज को भेदते हुए राजकुमारी शुभदा की शांत आवाज सुनाई दी।
राजकुमारी शुभदा मुस्कुराकर, “तो बात अब पात्रता पर आई है। यह सत्य है कि मेरे पिता ने क्षत्रिय वर्ण को प्रधान्य दिया किंतु फिर भी उन्होंनेही सभी वर्ण के सभासद नियुक्त किए। क्या इस सभा में ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र वर्ण के सभासद नहीं हैं? यहां तो पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को भी राजा खड़गराज ने सभा का मान दिया जब वह दो भिन्न वर्ण के एकत्रित रूप हैं।”
मंडल के सभासद बस बुदबुदाते रह गए पर बाकी सभा अब एकाग्रता से अपनी राजकुमारी शुभदा को सुन रही थी।
राजकुमारी शुभदा, “विवाह की हमारी एक रात्रि के बाद हमें अपने पति संग मंदिर में जाना था पर इस अस्थिर रोती चंचल राजकुमारी ने अपने पति को उनका कर्तव्य पूर्ण करने राज सभा में भेजा और स्वयं मंदिर में अकेली गईं। दोपहर को जब हमें युद्ध की योजना के बारे में पता चला तब हम युद्धसभा में राजा खड़गराज और सेनापति अचलसेन को रोकने आईं थी पर हमें युद्धसभा से भेज दिया गया। आप, मंडल के सभासद वहां यह सब देख कर चुप रहे। जब राजा उग्रवीर के दूत आए तब किसी को मेरे शुद्धिकरण की याद नहीं आई? जब राजा उग्रवीर के दूत ने नागरिकों की सुरक्षा के लिए चर्चा की तो यही रोती चंचल राजकुमारी थी जिसने अपनी अप्रतिष्ठा के बदले नागरिकों की सुरक्षा का वचन लिया, तब मंडल को हमारी चंचलता या अस्थिरता दिखी नहीं? पूर्ण रात्रि को नगरकोट पर हमने युद्ध की तैयारी की तब मंडल को हम में स्त्री की दुर्बलता नहीं दिखी? प्रातः जब पूर्ण नगर को लगा कि राजा उग्रवीर अपने संपूर्ण सेना को लेकर यहां पहुंच गए हैं तब हमने नगर सुरक्षा हेतु दासत्व स्वीकार किया तब मंडल को हमारी कम आयु या कम अनुभव नहीं दिखा? हारे हुए युवराज को सम्मान से हमने लौटाकर उस राज्य में गृहयुद्ध छेड़ा तब मंडल को हमारी अल्पबुद्धि नहीं दिखी? (संपूर्ण सभा को संबोधित करते हुए) हे नगर के नागरिकों, हे राज्य के गण, यदि आप को लगता है कि हम सिंहासन के योग्य नहीं तो हमें अभी समाप्त कर दें पर हमें ऐसे मंडल के पिजड़े की हंसिनी ना बनाएं! हमें उत्तर दें या मृत्यु दें!!”
मंडल अध्यक्ष सभासद आवेश से चीखा, “पंडित की आकस्मिक वीरता को अपने नाम न लें राजनंदिनी! आप ने तो उन्हें अपने चाबुक से मरवाकर, अपमानित कर नगर से निष्कासित किया था!!”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ऊंचे स्वर में, “इसी को छद्मयुद्ध कहते हैं आर्य। चाबुक के इतने प्रहार होकर भी मेरी काया पर एक निशान नहीं क्योंकि वह चाबुक और चाबुक चलाता व्यक्ति दोनों को ज्ञात था कि यह सब छल था युवराज को दिखाने के लिए। मेरी योजना मैंने स्वयं उस रात्रि राजकुमारी शुभदा को बताई थी। यदि आप योजना और गोपनीयता का अर्थ नहीं समझते तो राजकुमारी शुभदा को दोष न दें!”
मंडल अध्यक्ष सभासद अपनी तलवार खींचते हुए, “वह एक स्त्री है!! राज्य का शासक राजा होता है न कि रानी!!”
सभासदों को समझ आने से पहले, मंडल अध्यक्ष सभासद की तलवार म्यान से बाहर निकलने से पहले मंडल अध्यक्ष सभासद के गले पर तीन तलवारें लगी हुई थीं। अंगद, पंडित ज्ञानदीप शास्त्री और सेनापति गरुड़वीर।
अंगद, “राजकुमारी जी, आज तक इस राज सभा में कभी रक्त नहीं बहा। आज्ञा दें तो शेष कार्य बाहर जाकर पूर्ण करूं।”
मंडल के सभी सभासदों को सैनिकोंने और बाकी सभासदों ने पकड़ लिया था। राजकुमारी शुभदा ने उन सब को सर्दिली आंखों से देखा।
राजकुमारी शुभदा, “मृत्यु ही राजद्रोह का परिणाम है पर इन सब को हम जीवित छोड़ेंगे। बदले में हम इन्हें अलग पीड़ा देंगे। इन्हें नगर पर राज्य करना था तो अब इनका पूर्ण नगर में वास होगा। हम, राजकुमारी शुभदा, घोषणा करते हैं कि आज और अभी से यह पांच लोग सभासद का सम्मान खो बैठे हैं। राज्य इनकी और इनके परिवार की संपूर्ण संपत्ति जप्त कर रही है। इन से या इनके परिवार से इस राज्य में कोई भी किसी भी तरह का लेनदेन नहीं कर सकता। अंत में इन पांच लोगोंको नगर त्यागने से रोक दिया जाता है!”
हमेशा की तरह lajawab update....राजकुमारी शुभदा सिंहासन की ओर बढ़ी पर सिंहासन के बगल में अपने पूर्व के स्थान पर बैठ गई। राजकुमारी शुभदा की आंखें पंडित ज्ञानदीप शास्त्री से मिली और राजकुमारी शुभदा ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की आंखों में उसके लिए प्रशंसा को देख एक अनोखा आनंद महसूस किया।
राजकुमारी शुभदा सभा को संबोधित करते हुए, “बीमारी का इलाज बीमारी को पहचानकर ही शुरू होता है। राजा खड़गराज ने वर्ण व्यवस्था को योग्यता की जगह जन्म से माना। इसी कारण उन्होंने सेनापति अचलसेन के बाहुबल को युवा गरुड़वीर के बुद्धिकौशल से सेना के लिए बेहतर माना। उन्होंने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की नृत्य कला को समझा पर बाकी विशेषताएं नहीं देखी। उनकी २१ कलाओं में शस्त्र विद्या भी हैं। यह बात कहकर हम न राजा खड़गराज और ना ही सेनापति अचलसेन की मरणोपरांत निंदा करती हैं पर सभा को बता रहे हैं कि राज्य और गण की प्रगति के लिए नई प्रणाली को लेकर आ रही हैं।”
सभा मंडल के राजद्रोह से उभरने से पहले ही नए विस्फोट की चपेट में आ गई। स्तब्ध हो कर सब राजकुमारी शुभदा की बातें सुनने लगे।
राजकुमारी शुभदा, “राजा खड़गराज ने सभा को योग्य पद्धति से नियुक्त किया था पर नियुक्ति के बाद उन पर कोई अंकुश नहीं था। वह कार्य करें या ना करें, जब तक राजा खड़गराज उन पर प्रसन्न थे वह अपनी जगह निश्चित थे। इसी वजह से उन्होंने राजा खड़गराज को गलत योजना पर सावधान नहीं किया।”
सभासद अपने पद के लिए चिंतातुर होने लगे पर राजकुमारी शुभदा की बात गलत नहीं थी। मंडल षड्यंत्र प्रमाण था कि सभासद अपने पद पर इतने निश्चिंत थे कि वह सिंहासन पर झपटने को तैयार हो गए थे।
राजकुमारी शुभदा, “हमारा पहला आदेश है कि राज्य के हर गांव में एक गुरुकुल बनेगा जिस में आठ से पंधरा वर्ष के हर बालक को राज्य की ओर से शिक्षा दी जाएगी। हर नगर में विद्यापीठ होगा जहां योग्य विद्यार्थी को योग्यता अनुसार कला विज्ञान या अन्य ज्ञान राज्य अनुदान से मिलेगा। अतिप्रतिभाशाली विद्यार्थी को राज्य काशी, नालंदा या तक्षशिला विश्वविद्यापित भेजेगा यदि वह राज्य में लौटकर राज्य के लिए काम करने का वचनपत्र दे। ऐसा निर्णय लेकर हम योग्य लोग निर्माण कर रहे हैं।
योग्य लोग किस लिए तो, आज से सभासदों में तीन वर्ग होंगे।
एक होंगे अमात्य। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री से विचार विनिमय कर हमने दस अमात्य और एक महा अमात्य की नियुक्ति करने का विचार किया है। अमात्य राज्य का एक एक अंग का दायित्व लेंगे। जैसे सेनापति, कृषि और अन्न अमात्य, स्वस्थ अमात्य, वित्त अमात्य, इत्यादि। महामात्य को सेनापति के अलावा सारे अमात्य के काम पर लक्ष्य देते हुए राज्य के अंदर सुशासन रखना होगा। किंतु अमात्य का पद सीमित काल का होगा और हर पांच वर्ष के बाद शासक अमात्य के किए कार्य को जांच कर उनकी पुनर्नियुक्ति या नए अमात्य का चयन करेंगे।
यह जांच दूसरा वर्ग करेगा जो होगा राज्य परिषद। राज्य परिषद के सौ सदस्यों का चयन राज्य के अनेक विभागों और वर्णों से होगा। यह परिषद अपने विभाग और वर्ण का ज्ञान विषय अनुसार राज सभा को देगी और संबंधित अमात्य को सहयोग करेगी। इनका काल भी पांच वर्ष का होगा पर ढाई वर्ष बाद यह अमात्य के कार्य की जांच करेंगे। यदि इन्होंने गलत जांच की तो इनकी पुनर्नियुक्ति पर प्रश्न होगा।
अंत में होंगी नगर सभा। यह राज्य के हर गांव और हर नगर में स्वतंत्र होगी। नगर सभा का आकर पंधरा सदस्यों का होगा तो ग्रामसभा पांच सदस्यों की होगी। यह ग्रामपंचायत और नगर सभा गांव या नगर के आंतरिक समस्याओं पर मध्यस्थता कर सास बहु या पड़ोसियों के झगड़े को प्रेम से सुलझाकर सबकी सहायता करेगी। इस सभा के सदस्यों का कार्यकाल भी पांच वर्ष होगा और अपने कार्य को अयोग्य पद्धति से करने पर इन्हें बदला जाएगा।
किसी को कोई प्रश्न?”
एक सभासद आगे बढ़कर, “क्षमा राजनंदिनी, किंतु इतने ग्राम और नगर राज्य में हैं कि आप हर ग्राम और नगर के लोगों में से चयन कैसे करेंगी? शासक का संपूर्ण समय केवल नियुक्ति करने में जाएगा।”
राजकुमारी शुभदा मुस्कुराकर, “चयन शासक नहीं करेगा। चयन गण करेंगे। नागरिक नगर सभा के पंधरा लोगों को चुनेंगे, ग्रामस्थ पंचायत को चुनेंगे, और सारे गण अपने विभाग के राज्य परिषद के सदस्य को चुनेंगे। यदि कोई सदस्य योग्य कार्य नहीं करता तो उसे राजा को सुवर्ण देकर खुश करने से कोई लाभ नहीं। उसे उन्हीं गण को उत्तर देना होगा जिनका कार्य उसने नहीं किया।”
सभासदों में चिंता और आश्चर्य दौड़ गया। अनेक सभासद तो पीढ़ियों से सभासद रहे थे। इसी वजह से वह विरोध कर रहे थे।
सभासद, “लोग अज्ञानी होते हैं। कोई उन्हें मूर्ख बना सकता है। ऐसे लोगों को चयन का अधिकार क्यों दें?”
राजकुमारी शुभदा, “इसी लिए सभी बालकों के लिए पंधरा वर्ष तक शिक्षा अनिवार्य है। योग्य बालक विद्यापीठ में ज्ञान अर्जन कर सक्षम युवा होंगे और आगे जाकर अमात्य बनने के पात्र होंगे। जो पंधरा वर्ष के बाद कार्य शुरू करेंगे उनके पास न केवल कुछ ज्ञान होगा पर समझदारी भी होगी कि वह योग्य व्यक्ति को चुन पाएं।”
सभासद डरते हुए, “क्या स्त्रियां भी परिषद या सभा का हिस्सा बनेंगी?”
राजकुमारी शुभदा मुस्कुराकर, “यदि शासक स्त्रीलिंग हो सकता है तो अमात्य, सभासद और चुनने वाली व्यक्ति भी स्त्री हो सकती है।”
सभासद, “क्या बालक भी चयन करेंगे?”
राजकुमारी शुभदा, “बालक अबोध होते हैं। गुरुकुल हर गांव में होगा ताकि सारे शिक्षित और अनुभवी व्यक्ति चुनाव कर सके। अभी बीस वर्ष से सभी नागरिकों को चुनने और चुने जाने का अधिकार होगा।”
एक सभासद गुस्से से, “इस प्रकार से राज्य चलाना असंभव होगा!!”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री आगे बढ़कर, “यह शासन पद्धति अनेक राज्यों में चलती आ रही है। इन्हें गणराज्य कहते हैं। यहां राजा को भी अमात्य और सभा की बात सुननी पड़ती है और यदि राजा दुराचारी या व्यसनाधीन हो तो सभा राजा को पदच्युत कर उसे बदलने का अधिकार रखती है!”
सभी सभासदों ने हैरानी से राजकुमारी शुभदा की ओर देखा और ऐसा कहने पर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के निष्कासन की आज्ञा का इंतजार किया। पर राजकुमारी शुभदा ने अपने सर को हिलाकर हां कहा और पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को समर्थन देते हुए अपने अमात्य चुने।
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री महामात्य बनकर भी सेनाधिकारी गरुड़वीर की शिक्षा को अपने हाथ में लेकर उन्हें सेनापति पद के योग्य बनाएंगे। बाकी अमात्य योग्य सभासदों में से चुने गए जब बाकी सभासदों को अस्थाई रूप से राज्य परिषद या नगर सभा में शामिल कर लिया गया।
सभा बर्खास्त होने से पहले एक वृद्ध ब्राह्मण सभासद ने राजकुमारी शुभदा से बोलने की आज्ञा मांगी। राजकुमारी शुभदा की मंजूरी पर वह अपनी बात कहने लगा।
वृद्ध ब्राह्मण, “राजकुमारी शुभदा, आप को मेरी बात गलत लगे तो मेरे प्राण हर लें। ईश्वर आप की निष्ठा और मेहनत देख रहा है किंतु आप को अगले एक माह तक अनुष्ठान करना होगा ताकि पुत्रप्राप्ति के लिए ईश्वर को प्रसन्न कर पाएं। हम सब राज्य की स्थिरताऔर अखंडता के लिए यह कामना करते हैं।”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री आगे बढ़कर, “पुरोहित सभासद का कहना योग्य है राजकुमारी शुभदा। यदि आप की अनुमति हो तो कल के मुहूर्त से हर सुबह का यह अनुष्ठान मैं आप को मंदिर में करा दूंगा।”
पुरोहित सभासद पंडित ज्ञानदीप शास्त्री का साथ पाकर कुछ भय पर काबू पाकर हां में सर हिलाने लगे। सभी सभासदों को ऐसा करते देख राजकुमारी शुभदा ने अपनी मंजूरी दे दी।
राजकुमारी शुभदा ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने पर सर रखकर उनकी स्थिर होती धड़कनों को सुनते हुए, “अब हमें पूर्ण रात्रि घोड़ी बनाकर पीछे से फटकारते हुए पुत्रप्राप्ति क्रीड़ा के बाद सुबह पुत्रप्राप्ति अनुष्ठान कराएंगे? आपको निद्रा की आवश्यकता नहीं होती होगी पर हमारा क्या? सुबह हमें चलते हुए अपने यौन अंगों में क्रीड़ा के कारण छिला हुआ लग रहा था। क्या हमें हर सुबह अब अनुष्ठान मैं भी उस एहसास के साथ बैठना होगा?”
राजकुमारी शुभदा के माथे को चूमकर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “गण को देखने दो की मैंने आप को अनुष्ठान करवाया। यदि हमारी संतान मेरे जैसी दिखी तो उसे अनुष्ठान का कारण आप दे पाएंगी।”
राजकुमारी शुभदा अपना सर उठाकर ऊपर से देखते हुए, “इतने दूर भविष्य का सोच रहे हैं आप?”
राजकुमारी शुभदा को अपनी ओर खींचकर उनका चुम्बन लेकर, “राज्य चलाना चाहती हो तो राजनीति अपने वैयक्तिक जीवन में भी रखिए राजनंदिनी। राज आज्ञा से नियोग कर हम आप को त्याग नहीं सकते। कल का अनुष्ठान हमने आपके लिए अलग से रचा है।”
राजकुमारी शुभदा शर्माकर, “जैसे आप प्रत्येक रात्रि अलग तरह से नियोग करते हो वैसे अलग या पठित पाठ के योग्य उच्चारण जैसा अलग?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा को अपनी बाहों में पकड़ लिया और राजकुमारी शुभदा को अपने प्रश्न के उत्तर की रुचि नहीं रही।
Thank you for your prompt reply and appreciationहमेशा की तरह lajawab update....
Maja aa gya pdh kear
राजकुमारी शुभदा सिंहासन की ओर बढ़ी पर सिंहासन के बगल में अपने पूर्व के स्थान पर बैठ गई। राजकुमारी शुभदा की आंखें पंडित ज्ञानदीप शास्त्री से मिली और राजकुमारी शुभदा ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की आंखों में उसके लिए प्रशंसा को देख एक अनोखा आनंद महसूस किया।
राजकुमारी शुभदा सभा को संबोधित करते हुए, “बीमारी का इलाज बीमारी को पहचानकर ही शुरू होता है। राजा खड़गराज ने वर्ण व्यवस्था को योग्यता की जगह जन्म से माना। इसी कारण उन्होंने सेनापति अचलसेन के बाहुबल को युवा गरुड़वीर के बुद्धिकौशल से सेना के लिए बेहतर माना। उन्होंने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री की नृत्य कला को समझा पर बाकी विशेषताएं नहीं देखी। उनकी २१ कलाओं में शस्त्र विद्या भी हैं। यह बात कहकर हम न राजा खड़गराज और ना ही सेनापति अचलसेन की मरणोपरांत निंदा करती हैं पर सभा को बता रहे हैं कि राज्य और गण की प्रगति के लिए नई प्रणाली को लेकर आ रही हैं।”
सभा मंडल के राजद्रोह से उभरने से पहले ही नए विस्फोट की चपेट में आ गई। स्तब्ध हो कर सब राजकुमारी शुभदा की बातें सुनने लगे।
राजकुमारी शुभदा, “राजा खड़गराज ने सभा को योग्य पद्धति से नियुक्त किया था पर नियुक्ति के बाद उन पर कोई अंकुश नहीं था। वह कार्य करें या ना करें, जब तक राजा खड़गराज उन पर प्रसन्न थे वह अपनी जगह निश्चित थे। इसी वजह से उन्होंने राजा खड़गराज को गलत योजना पर सावधान नहीं किया।”
सभासद अपने पद के लिए चिंतातुर होने लगे पर राजकुमारी शुभदा की बात गलत नहीं थी। मंडल षड्यंत्र प्रमाण था कि सभासद अपने पद पर इतने निश्चिंत थे कि वह सिंहासन पर झपटने को तैयार हो गए थे।
राजकुमारी शुभदा, “हमारा पहला आदेश है कि राज्य के हर गांव में एक गुरुकुल बनेगा जिस में आठ से पंधरा वर्ष के हर बालक को राज्य की ओर से शिक्षा दी जाएगी। हर नगर में विद्यापीठ होगा जहां योग्य विद्यार्थी को योग्यता अनुसार कला विज्ञान या अन्य ज्ञान राज्य अनुदान से मिलेगा। अतिप्रतिभाशाली विद्यार्थी को राज्य काशी, नालंदा या तक्षशिला विश्वविद्यापित भेजेगा यदि वह राज्य में लौटकर राज्य के लिए काम करने का वचनपत्र दे। ऐसा निर्णय लेकर हम योग्य लोग निर्माण कर रहे हैं।
योग्य लोग किस लिए तो, आज से सभासदों में तीन वर्ग होंगे।
एक होंगे अमात्य। पंडित ज्ञानदीप शास्त्री से विचार विनिमय कर हमने दस अमात्य और एक महा अमात्य की नियुक्ति करने का विचार किया है। अमात्य राज्य का एक एक अंग का दायित्व लेंगे। जैसे सेनापति, कृषि और अन्न अमात्य, स्वस्थ अमात्य, वित्त अमात्य, इत्यादि। महामात्य को सेनापति के अलावा सारे अमात्य के काम पर लक्ष्य देते हुए राज्य के अंदर सुशासन रखना होगा। किंतु अमात्य का पद सीमित काल का होगा और हर पांच वर्ष के बाद शासक अमात्य के किए कार्य को जांच कर उनकी पुनर्नियुक्ति या नए अमात्य का चयन करेंगे।
यह जांच दूसरा वर्ग करेगा जो होगा राज्य परिषद। राज्य परिषद के सौ सदस्यों का चयन राज्य के अनेक विभागों और वर्णों से होगा। यह परिषद अपने विभाग और वर्ण का ज्ञान विषय अनुसार राज सभा को देगी और संबंधित अमात्य को सहयोग करेगी। इनका काल भी पांच वर्ष का होगा पर ढाई वर्ष बाद यह अमात्य के कार्य की जांच करेंगे। यदि इन्होंने गलत जांच की तो इनकी पुनर्नियुक्ति पर प्रश्न होगा।
अंत में होंगी नगर सभा। यह राज्य के हर गांव और हर नगर में स्वतंत्र होगी। नगर सभा का आकर पंधरा सदस्यों का होगा तो ग्रामसभा पांच सदस्यों की होगी। यह ग्रामपंचायत और नगर सभा गांव या नगर के आंतरिक समस्याओं पर मध्यस्थता कर सास बहु या पड़ोसियों के झगड़े को प्रेम से सुलझाकर सबकी सहायता करेगी। इस सभा के सदस्यों का कार्यकाल भी पांच वर्ष होगा और अपने कार्य को अयोग्य पद्धति से करने पर इन्हें बदला जाएगा।
किसी को कोई प्रश्न?”
एक सभासद आगे बढ़कर, “क्षमा राजनंदिनी, किंतु इतने ग्राम और नगर राज्य में हैं कि आप हर ग्राम और नगर के लोगों में से चयन कैसे करेंगी? शासक का संपूर्ण समय केवल नियुक्ति करने में जाएगा।”
राजकुमारी शुभदा मुस्कुराकर, “चयन शासक नहीं करेगा। चयन गण करेंगे। नागरिक नगर सभा के पंधरा लोगों को चुनेंगे, ग्रामस्थ पंचायत को चुनेंगे, और सारे गण अपने विभाग के राज्य परिषद के सदस्य को चुनेंगे। यदि कोई सदस्य योग्य कार्य नहीं करता तो उसे राजा को सुवर्ण देकर खुश करने से कोई लाभ नहीं। उसे उन्हीं गण को उत्तर देना होगा जिनका कार्य उसने नहीं किया।”
सभासदों में चिंता और आश्चर्य दौड़ गया। अनेक सभासद तो पीढ़ियों से सभासद रहे थे। इसी वजह से वह विरोध कर रहे थे।
सभासद, “लोग अज्ञानी होते हैं। कोई उन्हें मूर्ख बना सकता है। ऐसे लोगों को चयन का अधिकार क्यों दें?”
राजकुमारी शुभदा, “इसी लिए सभी बालकों के लिए पंधरा वर्ष तक शिक्षा अनिवार्य है। योग्य बालक विद्यापीठ में ज्ञान अर्जन कर सक्षम युवा होंगे और आगे जाकर अमात्य बनने के पात्र होंगे। जो पंधरा वर्ष के बाद कार्य शुरू करेंगे उनके पास न केवल कुछ ज्ञान होगा पर समझदारी भी होगी कि वह योग्य व्यक्ति को चुन पाएं।”
सभासद डरते हुए, “क्या स्त्रियां भी परिषद या सभा का हिस्सा बनेंगी?”
राजकुमारी शुभदा मुस्कुराकर, “यदि शासक स्त्रीलिंग हो सकता है तो अमात्य, सभासद और चुनने वाली व्यक्ति भी स्त्री हो सकती है।”
सभासद, “क्या बालक भी चयन करेंगे?”
राजकुमारी शुभदा, “बालक अबोध होते हैं। गुरुकुल हर गांव में होगा ताकि सारे शिक्षित और अनुभवी व्यक्ति चुनाव कर सके। अभी बीस वर्ष से सभी नागरिकों को चुनने और चुने जाने का अधिकार होगा।”
एक सभासद गुस्से से, “इस प्रकार से राज्य चलाना असंभव होगा!!”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री आगे बढ़कर, “यह शासन पद्धति अनेक राज्यों में चलती आ रही है। इन्हें गणराज्य कहते हैं। यहां राजा को भी अमात्य और सभा की बात सुननी पड़ती है और यदि राजा दुराचारी या व्यसनाधीन हो तो सभा राजा को पदच्युत कर उसे बदलने का अधिकार रखती है!”
सभी सभासदों ने हैरानी से राजकुमारी शुभदा की ओर देखा और ऐसा कहने पर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के निष्कासन की आज्ञा का इंतजार किया। पर राजकुमारी शुभदा ने अपने सर को हिलाकर हां कहा और पंडित ज्ञानदीप शास्त्री को समर्थन देते हुए अपने अमात्य चुने।
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री महामात्य बनकर भी सेनाधिकारी गरुड़वीर की शिक्षा को अपने हाथ में लेकर उन्हें सेनापति पद के योग्य बनाएंगे। बाकी अमात्य योग्य सभासदों में से चुने गए जब बाकी सभासदों को अस्थाई रूप से राज्य परिषद या नगर सभा में शामिल कर लिया गया।
सभा बर्खास्त होने से पहले एक वृद्ध ब्राह्मण सभासद ने राजकुमारी शुभदा से बोलने की आज्ञा मांगी। राजकुमारी शुभदा की मंजूरी पर वह अपनी बात कहने लगा।
वृद्ध ब्राह्मण, “राजकुमारी शुभदा, आप को मेरी बात गलत लगे तो मेरे प्राण हर लें। ईश्वर आप की निष्ठा और मेहनत देख रहा है किंतु आप को अगले एक माह तक अनुष्ठान करना होगा ताकि पुत्रप्राप्ति के लिए ईश्वर को प्रसन्न कर पाएं। हम सब राज्य की स्थिरताऔर अखंडता के लिए यह कामना करते हैं।”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री आगे बढ़कर, “पुरोहित सभासद का कहना योग्य है राजकुमारी शुभदा। यदि आप की अनुमति हो तो कल के मुहूर्त से हर सुबह का यह अनुष्ठान मैं आप को मंदिर में करा दूंगा।”
पुरोहित सभासद पंडित ज्ञानदीप शास्त्री का साथ पाकर कुछ भय पर काबू पाकर हां में सर हिलाने लगे। सभी सभासदों को ऐसा करते देख राजकुमारी शुभदा ने अपनी मंजूरी दे दी।
राजकुमारी शुभदा ने पंडित ज्ञानदीप शास्त्री के सीने पर सर रखकर उनकी स्थिर होती धड़कनों को सुनते हुए, “अब हमें पूर्ण रात्रि घोड़ी बनाकर पीछे से फटकारते हुए पुत्रप्राप्ति क्रीड़ा के बाद सुबह पुत्रप्राप्ति अनुष्ठान कराएंगे? आपको निद्रा की आवश्यकता नहीं होती होगी पर हमारा क्या? सुबह हमें चलते हुए अपने यौन अंगों में क्रीड़ा के कारण छिला हुआ लग रहा था। क्या हमें हर सुबह अब अनुष्ठान मैं भी उस एहसास के साथ बैठना होगा?”
राजकुमारी शुभदा के माथे को चूमकर पंडित ज्ञानदीप शास्त्री, “गण को देखने दो की मैंने आप को अनुष्ठान करवाया। यदि हमारी संतान मेरे जैसी दिखी तो उसे अनुष्ठान का कारण आप दे पाएंगी।”
राजकुमारी शुभदा अपना सर उठाकर ऊपर से देखते हुए, “इतने दूर भविष्य का सोच रहे हैं आप?”
राजकुमारी शुभदा को अपनी ओर खींचकर उनका चुम्बन लेकर, “राज्य चलाना चाहती हो तो राजनीति अपने वैयक्तिक जीवन में भी रखिए राजनंदिनी। राज आज्ञा से नियोग कर हम आप को त्याग नहीं सकते। कल का अनुष्ठान हमने आपके लिए अलग से रचा है।”
राजकुमारी शुभदा शर्माकर, “जैसे आप प्रत्येक रात्रि अलग तरह से नियोग करते हो वैसे अलग या पठित पाठ के योग्य उच्चारण जैसा अलग?”
पंडित ज्ञानदीप शास्त्री ने राजकुमारी शुभदा को अपनी बाहों में पकड़ लिया और राजकुमारी शुभदा को अपने प्रश्न के उत्तर की रुचि नहीं रही।
बहुत ही शानदार अपडेट दिया है ! और राज्य व्यवस्था एक दम चाक चौबंद बना दी है !
बहुत ही अच्छा लिख रहे हैं आप !
Mazedar update