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अपडेट - 9
रीतेश को घर से बाहर गये करीब 8 घंटे हो गये थे......रुपा , शीतल और सुलेखा परेशान हो रहे थे!!
रुपा - ना जाने कहां गया होगा......कुछ खाया पीया भी नही है!!
रुपा का मन एक दम लटक गया था......उसकी आवाज में घबराहट थी' पास खड़ी स्वेता भी पछताने के अलावा और कुछ नही कर सकती थी!!
शीतल - अरे तुम लोग घबराओ मत , मै जाकर गांव में देखती हूँ वो उधर ही कही होगा!!
......शीतल जब जाने लगी तो सुलेखा ने शीतल को टोकते हुए कहा-
सुलेखा - रुक शीतल मैं भी चलती हू.!!
शीतल अपने कदमों को रोकते हुए , सुलेखा की तरफ पलटी और बोली-
शीतल - न.....नही दीदी! रीतेश आप के उपर पहले से गुस्सा है, और आज जो कुछ हुआ उसके बाद तो वो ना जाने कीस मूड में होगा ! तो बेहतर होगा की आप मत चलीये......मै उसे लाती हूं!
ये कहकर शीतल घर से बाहर रीतेश को ढ़ुढ़ने नीकल पड़ती है!!
............अरे रीतेश भाई अब बस करो.......कीतना पीयोगे!! अपनी हालत तो देखो बस पीये जा रहे हो!!
रीतेश दारु के नशे में एकदम धुत्त था.....उसकी आंखे आधी बंद तो आधी खुली थी.......शरीर के हाथ पांव ढीले पड़ चुके थे, मानो उसमे दारु से भरी प्लास्टीक का ग्लास उठाने का भी दम ना हो.....!
गांव से बाहर एक बड़े से पेड़ के नीचे रीतेश अपने तीन दोस्तो के साथ बैठकर दारु पी रहा था!!
वो तीनो दारु तो पी रहे थे , लेकीन कनफ्यूज भी थे की आज रीतेश इतनी दारु क्यूं पी रहा है?
रीतेश के उपर दारु का मजबूत असर था, वो अपने लड़खड़ाते हाथो से दारु का ग्लास उठाता है....और उसे अपने होठो से लगाकर एक ही सांस मे पी जाता है और ग्लास को फेंक कर अपनी लड़खड़ाती जुबां से बोला-
रीतेश - अ.....रे भोसड़ी के तू......तू कौन होता है मुझे रो...रोकने वाला.....हां ?
ये कहकर रीतेश ज़मीन पर पड़ी सीगरेट के पैकेट में से एक सीगरेट नीकाली और लाइट करके पीने लगा!!
.....रीतेश धुंवे को लगातार हवे में फूकतां ये देखकर अनील ने बोला-
अनील - अरे भाई , मेरे कहने का वो मतलब नही था......मै तो इस लीये कह रहा था की, तूम घर इस हालत में कैसे जाओगे!!
......अनील की बात सुनकर , रीतेश हंसने लगा ,
रीतेश को इस तरह हंसता देख....अनील के साथ बैठे दो और लोग अचंभे में पड़ गये.....वो लोग ने जो भी पीया था, वो रीतेश की हरकतो और बातो की वज़ह से सब उतर जाता!!
'उन लोग ने सोचा शायद दारु चढ़ने की वज़ह से रीतेश हंस रहा है.....लेकीन तभी जो हुआ उनकी तो गांड ही फट गयी!!
अचानक रीतेश हंसते - हसतें दारु की बाटल को पकड़ जोर से ज़मीन पर पटका , जीससे बाटल टुट जाती है......और टुटा हुआ कांच का टुकड़ा अपने हाथ में लेकर सीधा अनील की तरफ करते हुए गुस्से से बोला-
रीतेश - भोसड़ी के घर की बात क्यूं की तूने.....आं, मेरा घर है कहा? मैं सब से नफ़रत करता हूं सीर्फ नफ़रत......और तू घर की बात करता है.......
रीतेश का गुस्सा दैखकर तो अनील को लकवा मार गया.....वो डर के मारे कांपने लगा, पास में बैठे दोनो लोग तो रीतेश का ऐसा रुप देखकर भाग गये.......अनील डरते -डरते बोला-
अनील - भ........भाई म......मै तो, दा.....दादी की बात कर र.....रहा था!!
**अपने दादी का नाम सुनते ही.....रीतेश के हाथ हे टुटी हुई बाटल छुट जाती है!!
हाथ से बाटल छुटते ही....अनील के जान में जान आती है, वो अपने माथे का पसीना पोछते हुए एक ठंढ़ी सास लेता है!! तभी उसने देखा की रीतेश की आंखो में आसूं था.....
अनील - क्या हुआ भाई? तुम्हारी आंखो में आंसू!!
रीतेश अपनी आंखो से आंसू पोछते हुए बोला-
रीतेश - कुछ नही यार.......सॉरी मैने गुस्से में तुझे!!
अनील - अरे नही भाई......मैं समझ सकता हू तुम्हारे उपर क्या बीत रही है? दादी को खोने के डर से रो रहे हो ना!!
रीतेश की आंखे एक बार फीर अपनी दादी के नाम पर भर आती है! उसने अपनी करीब-करीब रोने वाली आवाज़ मे कहा-
रीतेश - अगर ऐसा हो की मेरे रोने से मेरी दादी....मुझे छोड़ कर ना जाये तो, मै जींदगी भर रोने के लीये तैयार हूं!!
एक वही तो है, मेरी ज़ीदगीं, उसके जाने के बाद कौन होगा मेरा, कोई नही......चाचा - चाची को अपना मानता था, लेकीन अब तो उन लोग को भी मेरे मां-बाप ने मेरे रीश्तो से अलग कर दीया.......!!
रीतेश की बाते सुनकर , अनील की आंखे भी भर आती है......
लेकीन कोई और भी था जो रीतेश की बाते सुन रहा था.....
.पेड़ के उस पार खड़ी शीतल अपने मुह में साड़ी का पल्लू दबा कर रो रही थी......रीतेश की बाते सीधा शीतल के दील को पीघला दी!! वो बीना कुछ बोले वापस रोते हुए वंहा से चली गयी!!
रीतेश - लेकीन अब से मैं सब से नफ़रत करता हूं.....कभी भी उनसे बात नही करुगां!! कोई नही है मेरा!
अनील एक सीगरेट जला कर कश भरते हुए बोला -
अनील - हां तो उन लोग को क्या फर्क पड़ेगा, तूम पहले भी बात नही करते थे, और अब भी नही करोगे लेकीन तुम्हे तो सुकुन नही मीलेगा ना भाई!!
रीतेश - तो मैं क्या करु ऐसा जो करने पर मुझे सुकुन मीले.....उन लोग को मार के भी तो सुकुन नही मीलेगा!!
अनील - तो तुम्हारा दील क्या करता है, उन लोग को देखते ही......बस वही करो भाई सुकुन मीलेगा!!
.......और चलो अब चलते है देर हो रही है.....शाम के 7 बजे है, और अंधेरा भी होने लगा है!!
फीर अनील रीतेश को सहारा देता है और रीतेश अपने लड़खड़ाते हुए कदम अपने घर की तरफ़ बढ़ा देता है!!
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वेलकम रमेश, वेलकम........
सफेद सोफे पर बैठा , एक लम्बा चौड़ा आदमी जीसका कद करीब 6 फीट का होगा, उमर करीब 53 के आस पास थी। कीसी डान की तरह ही लग रहा था........!
तभी उसके सामते एक आदमी आकर बैठा.....
गुड ईवनींग सागा सर.......
सागा - गुड इवनींग रमेश........मैं तुम्हारे काम से बहुत खुश हुआ!! तुमने हमारा सोना हैदराबाद पहुचाने में जो मदद की है, उसके लीये तुम जो चाहे वो मांग लो!!
सोफे पर बैठा रमेश , अपना रुमाल नीकाल कर अपने माथे के पसीने को पोछते हुए बोला-
रमेश - देखो सागा सर......आपने जैसा कहा था मैने वैसा कर दीया है। अब तो आप मेरी वाइफ को छोड़ दो!!
सोफे पर बैठा सागा , रमेश की बात सुनकर बोला-
सागा - डोटं वरी मीस्टर रमेश, मै आपकी बीवी को छोड़ दूगा। लेकीन आप को हमारा एक छोटा सा ......बील्कुल छोटा सा काम करना है!!
रमेश ये सुनकर गुस्से में बोला-
रमेश - देखो मीस्टर सागा. तुमने जो बोला वो मैने कीया। लेकीन तुम मेरी बीवी को ढ़ाल बनाकर मुझसे गैर कानुनी धंधा करने पर अब और मजबूर नही कर सकते!!
सागा - आ........हा, रीलैक्स मी॰ रमेश, अब क्या करु जैसे तुम मजबुर हो, वैसे मै भी मजबुर हूं.......ये काम मै तुमसे नही करवात अगर......
फीर सागा ने अपने आखं से एक इशारा कीया......और फीर एक गोली चली......धांय. की आवाज के साथ एक आदमी रमेश के सामने जमीन पर गीर पड़ा, वो गोली उसके सीर के आर - पार हो चुकी थी,
सागा उस लाश के करीब आकर बोला-
सागा - अगर इसने ये काम कर दीया होता तो!! तुम्से पता है ये भी एक ट्रासंपोर्ट कंपनी का मैनेज़र था......कौन सा ट्रांसपोर्ट कपंनी था, हा.......रमन ट्रासंपोर्ट !! बेचारा वफादार था नही माना , शांती मील गयी......!
ये सब देखकर रमेश की हालत पतली हो गयी और वो झठ से मान गया!!
सागा - गुड मिस्टर रमेश, यू कैन गो नाव.....क्या करना है उसकी डीटेल आप को बहुत जल्द मील जायेगी!!
इतना सुनकर रमेश वहां से चला जाता है.....!
सागा सोफे पर बैठ कर जैसे ही व्हीस्की की बाटल हाथ में उठाता है,
सागा सर.....सागा सर, ये आपने क्या कीया?
सागा - व्हीस्की को ग्लास में डालते हुए बोला, वही जो करना चाहीए था, नही माना ठोक दीया!! रॉनी
रॉनी - अरे सागा सर मान गया था, और मैने इसे ड्रग्स सप्लाई भी कर दीया था। कल रात ही ये ट्रासंपोर्ट कंपनी के ट्रक मे माल ले कर गया.....
ये सुनते ही सागा के पैरो तले जमीन खीसक गयी.....और वो घबराते हुए बोला!
सागा - लेकीन ये सब तो बोल रहे थे की नही मान रहा है!
रॉनी - ओ.....हो, सागा सर इसे मैने ही मना कीया था। जैसा आपने कहा था की अपने आदमीयो को भी खबर ना लगे की माल डीलीवर्ड कौन करेगा?
सागा - ओ.......शीट, तो फीर माल!!!
रॉनी - ड्रग्स कहां है ये तो इसे ही पता था!! और आपने इसे....
सागा - ओके......ड्रग्स जीस ट्रक मे थी वो ट्रक कल जाने वाला था, लेकीन इतनी सारी ट्रको में, ओके रॉनी तुम पता करो की रमन ट्रासंपोर्ट कपंनी की कौन सी ट्रक बैगंलौर के लीये नीकलेगी॥
रॉनी - ओके सर...
सागा - लेकीन बी केयर फुल , करोड़ो का माल है....कुछ गड़बड़ ना हो!!
रॉनी - श्योर सर!!
रीतेश को घर से बाहर गये करीब 8 घंटे हो गये थे......रुपा , शीतल और सुलेखा परेशान हो रहे थे!!
रुपा - ना जाने कहां गया होगा......कुछ खाया पीया भी नही है!!
रुपा का मन एक दम लटक गया था......उसकी आवाज में घबराहट थी' पास खड़ी स्वेता भी पछताने के अलावा और कुछ नही कर सकती थी!!
शीतल - अरे तुम लोग घबराओ मत , मै जाकर गांव में देखती हूँ वो उधर ही कही होगा!!
......शीतल जब जाने लगी तो सुलेखा ने शीतल को टोकते हुए कहा-
सुलेखा - रुक शीतल मैं भी चलती हू.!!
शीतल अपने कदमों को रोकते हुए , सुलेखा की तरफ पलटी और बोली-
शीतल - न.....नही दीदी! रीतेश आप के उपर पहले से गुस्सा है, और आज जो कुछ हुआ उसके बाद तो वो ना जाने कीस मूड में होगा ! तो बेहतर होगा की आप मत चलीये......मै उसे लाती हूं!
ये कहकर शीतल घर से बाहर रीतेश को ढ़ुढ़ने नीकल पड़ती है!!
............अरे रीतेश भाई अब बस करो.......कीतना पीयोगे!! अपनी हालत तो देखो बस पीये जा रहे हो!!
रीतेश दारु के नशे में एकदम धुत्त था.....उसकी आंखे आधी बंद तो आधी खुली थी.......शरीर के हाथ पांव ढीले पड़ चुके थे, मानो उसमे दारु से भरी प्लास्टीक का ग्लास उठाने का भी दम ना हो.....!
गांव से बाहर एक बड़े से पेड़ के नीचे रीतेश अपने तीन दोस्तो के साथ बैठकर दारु पी रहा था!!
वो तीनो दारु तो पी रहे थे , लेकीन कनफ्यूज भी थे की आज रीतेश इतनी दारु क्यूं पी रहा है?
रीतेश के उपर दारु का मजबूत असर था, वो अपने लड़खड़ाते हाथो से दारु का ग्लास उठाता है....और उसे अपने होठो से लगाकर एक ही सांस मे पी जाता है और ग्लास को फेंक कर अपनी लड़खड़ाती जुबां से बोला-
रीतेश - अ.....रे भोसड़ी के तू......तू कौन होता है मुझे रो...रोकने वाला.....हां ?
ये कहकर रीतेश ज़मीन पर पड़ी सीगरेट के पैकेट में से एक सीगरेट नीकाली और लाइट करके पीने लगा!!
.....रीतेश धुंवे को लगातार हवे में फूकतां ये देखकर अनील ने बोला-
अनील - अरे भाई , मेरे कहने का वो मतलब नही था......मै तो इस लीये कह रहा था की, तूम घर इस हालत में कैसे जाओगे!!
......अनील की बात सुनकर , रीतेश हंसने लगा ,
रीतेश को इस तरह हंसता देख....अनील के साथ बैठे दो और लोग अचंभे में पड़ गये.....वो लोग ने जो भी पीया था, वो रीतेश की हरकतो और बातो की वज़ह से सब उतर जाता!!
'उन लोग ने सोचा शायद दारु चढ़ने की वज़ह से रीतेश हंस रहा है.....लेकीन तभी जो हुआ उनकी तो गांड ही फट गयी!!
अचानक रीतेश हंसते - हसतें दारु की बाटल को पकड़ जोर से ज़मीन पर पटका , जीससे बाटल टुट जाती है......और टुटा हुआ कांच का टुकड़ा अपने हाथ में लेकर सीधा अनील की तरफ करते हुए गुस्से से बोला-
रीतेश - भोसड़ी के घर की बात क्यूं की तूने.....आं, मेरा घर है कहा? मैं सब से नफ़रत करता हूं सीर्फ नफ़रत......और तू घर की बात करता है.......
रीतेश का गुस्सा दैखकर तो अनील को लकवा मार गया.....वो डर के मारे कांपने लगा, पास में बैठे दोनो लोग तो रीतेश का ऐसा रुप देखकर भाग गये.......अनील डरते -डरते बोला-
अनील - भ........भाई म......मै तो, दा.....दादी की बात कर र.....रहा था!!
**अपने दादी का नाम सुनते ही.....रीतेश के हाथ हे टुटी हुई बाटल छुट जाती है!!
हाथ से बाटल छुटते ही....अनील के जान में जान आती है, वो अपने माथे का पसीना पोछते हुए एक ठंढ़ी सास लेता है!! तभी उसने देखा की रीतेश की आंखो में आसूं था.....
अनील - क्या हुआ भाई? तुम्हारी आंखो में आंसू!!
रीतेश अपनी आंखो से आंसू पोछते हुए बोला-
रीतेश - कुछ नही यार.......सॉरी मैने गुस्से में तुझे!!
अनील - अरे नही भाई......मैं समझ सकता हू तुम्हारे उपर क्या बीत रही है? दादी को खोने के डर से रो रहे हो ना!!
रीतेश की आंखे एक बार फीर अपनी दादी के नाम पर भर आती है! उसने अपनी करीब-करीब रोने वाली आवाज़ मे कहा-
रीतेश - अगर ऐसा हो की मेरे रोने से मेरी दादी....मुझे छोड़ कर ना जाये तो, मै जींदगी भर रोने के लीये तैयार हूं!!
एक वही तो है, मेरी ज़ीदगीं, उसके जाने के बाद कौन होगा मेरा, कोई नही......चाचा - चाची को अपना मानता था, लेकीन अब तो उन लोग को भी मेरे मां-बाप ने मेरे रीश्तो से अलग कर दीया.......!!
रीतेश की बाते सुनकर , अनील की आंखे भी भर आती है......
लेकीन कोई और भी था जो रीतेश की बाते सुन रहा था.....
.पेड़ के उस पार खड़ी शीतल अपने मुह में साड़ी का पल्लू दबा कर रो रही थी......रीतेश की बाते सीधा शीतल के दील को पीघला दी!! वो बीना कुछ बोले वापस रोते हुए वंहा से चली गयी!!
रीतेश - लेकीन अब से मैं सब से नफ़रत करता हूं.....कभी भी उनसे बात नही करुगां!! कोई नही है मेरा!
अनील एक सीगरेट जला कर कश भरते हुए बोला -
अनील - हां तो उन लोग को क्या फर्क पड़ेगा, तूम पहले भी बात नही करते थे, और अब भी नही करोगे लेकीन तुम्हे तो सुकुन नही मीलेगा ना भाई!!
रीतेश - तो मैं क्या करु ऐसा जो करने पर मुझे सुकुन मीले.....उन लोग को मार के भी तो सुकुन नही मीलेगा!!
अनील - तो तुम्हारा दील क्या करता है, उन लोग को देखते ही......बस वही करो भाई सुकुन मीलेगा!!
.......और चलो अब चलते है देर हो रही है.....शाम के 7 बजे है, और अंधेरा भी होने लगा है!!
फीर अनील रीतेश को सहारा देता है और रीतेश अपने लड़खड़ाते हुए कदम अपने घर की तरफ़ बढ़ा देता है!!
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वेलकम रमेश, वेलकम........
सफेद सोफे पर बैठा , एक लम्बा चौड़ा आदमी जीसका कद करीब 6 फीट का होगा, उमर करीब 53 के आस पास थी। कीसी डान की तरह ही लग रहा था........!
तभी उसके सामते एक आदमी आकर बैठा.....
गुड ईवनींग सागा सर.......
सागा - गुड इवनींग रमेश........मैं तुम्हारे काम से बहुत खुश हुआ!! तुमने हमारा सोना हैदराबाद पहुचाने में जो मदद की है, उसके लीये तुम जो चाहे वो मांग लो!!
सोफे पर बैठा रमेश , अपना रुमाल नीकाल कर अपने माथे के पसीने को पोछते हुए बोला-
रमेश - देखो सागा सर......आपने जैसा कहा था मैने वैसा कर दीया है। अब तो आप मेरी वाइफ को छोड़ दो!!
सोफे पर बैठा सागा , रमेश की बात सुनकर बोला-
सागा - डोटं वरी मीस्टर रमेश, मै आपकी बीवी को छोड़ दूगा। लेकीन आप को हमारा एक छोटा सा ......बील्कुल छोटा सा काम करना है!!
रमेश ये सुनकर गुस्से में बोला-
रमेश - देखो मीस्टर सागा. तुमने जो बोला वो मैने कीया। लेकीन तुम मेरी बीवी को ढ़ाल बनाकर मुझसे गैर कानुनी धंधा करने पर अब और मजबूर नही कर सकते!!
सागा - आ........हा, रीलैक्स मी॰ रमेश, अब क्या करु जैसे तुम मजबुर हो, वैसे मै भी मजबुर हूं.......ये काम मै तुमसे नही करवात अगर......
फीर सागा ने अपने आखं से एक इशारा कीया......और फीर एक गोली चली......धांय. की आवाज के साथ एक आदमी रमेश के सामने जमीन पर गीर पड़ा, वो गोली उसके सीर के आर - पार हो चुकी थी,
सागा उस लाश के करीब आकर बोला-
सागा - अगर इसने ये काम कर दीया होता तो!! तुम्से पता है ये भी एक ट्रासंपोर्ट कंपनी का मैनेज़र था......कौन सा ट्रांसपोर्ट कपंनी था, हा.......रमन ट्रासंपोर्ट !! बेचारा वफादार था नही माना , शांती मील गयी......!
ये सब देखकर रमेश की हालत पतली हो गयी और वो झठ से मान गया!!
सागा - गुड मिस्टर रमेश, यू कैन गो नाव.....क्या करना है उसकी डीटेल आप को बहुत जल्द मील जायेगी!!
इतना सुनकर रमेश वहां से चला जाता है.....!
सागा सोफे पर बैठ कर जैसे ही व्हीस्की की बाटल हाथ में उठाता है,
सागा सर.....सागा सर, ये आपने क्या कीया?
सागा - व्हीस्की को ग्लास में डालते हुए बोला, वही जो करना चाहीए था, नही माना ठोक दीया!! रॉनी
रॉनी - अरे सागा सर मान गया था, और मैने इसे ड्रग्स सप्लाई भी कर दीया था। कल रात ही ये ट्रासंपोर्ट कंपनी के ट्रक मे माल ले कर गया.....
ये सुनते ही सागा के पैरो तले जमीन खीसक गयी.....और वो घबराते हुए बोला!
सागा - लेकीन ये सब तो बोल रहे थे की नही मान रहा है!
रॉनी - ओ.....हो, सागा सर इसे मैने ही मना कीया था। जैसा आपने कहा था की अपने आदमीयो को भी खबर ना लगे की माल डीलीवर्ड कौन करेगा?
सागा - ओ.......शीट, तो फीर माल!!!
रॉनी - ड्रग्स कहां है ये तो इसे ही पता था!! और आपने इसे....
सागा - ओके......ड्रग्स जीस ट्रक मे थी वो ट्रक कल जाने वाला था, लेकीन इतनी सारी ट्रको में, ओके रॉनी तुम पता करो की रमन ट्रासंपोर्ट कपंनी की कौन सी ट्रक बैगंलौर के लीये नीकलेगी॥
रॉनी - ओके सर...
सागा - लेकीन बी केयर फुल , करोड़ो का माल है....कुछ गड़बड़ ना हो!!
रॉनी - श्योर सर!!