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Adultery दिल्ली मेट्रो की एक मुलाक़ात...

aidenabhishek

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UPDATE 11

1 बजे के आस-पास उस का फोन आया कि आप रास्ता बता दे मैंने उसे विस्तार से घर आने का रास्ता बता दिया। कुछ देर बाद वह आ गयी। मैंने उसे ड्राईगरुम में बिठाया। पानी के लिये पुछा तो उस ने पानी पीने की इच्छा जाहिर की। मैं किचन में पानी लेने के लिये चला गया। जब पानी ले कर आया तो वह खड़ी हो कर कमरे में लगी फोटोस् को देख रही थी, मुझे देख कर बोली कि आप तो इन में पहचान में नहीं आ रहे है। काफी दुबले-पतले है।

मैंने कहा की जवानी में सब का ऐसा ही हाल होता है। वह यह सुन कर हँस दी बोली कि कभी आप को अपनी तस्वीरे दिखाऊँगी तब आप को पता चलेगा कि मैं कितनी मोटी थी। पानी पीने के बाद वह बोली की आप की पत्नी कहाँ है? मैं उसे लेकर अपने बेडरुम में आ गया। उस ने पत्नी को नमस्ते करा और कहा कि आप तो काफी कमजोर लग रही है। मैंने पुछा कि आप ने इस को पहले कब देखा है तो वह बोली कि कंपनी के एक फक्शन पर आप इन के साथ आये थे तब ही देखा था।

मैं उन के लिये कॉल्ड ड्रिक्स लेने चला गया। वापस आया तो देखा कि दोनों आराम में धुल-मिल कर बातें कर रही मेरे आते ही चुप हो गयी। मैंने ड्रिक्स ऑफर की और पुछा कि इस तरफ क्या काम पड़ गया तो वह हँस दी और बोली कि अब आप से क्या छुपाना है मैनेजमैंट को चिन्ता थी सो मैं वह चिन्ता दूर करने आयी हूँ।

मैंने हँस कर कहा कि मुझे पता था कि ऐसा ही कुछ है नही तो पत्नियाँ तो सभी की बीमार पड़ती है लेकिन एचआर तो किसी को नही देखने जाती, इस पर वह बोली कि हम सब को लग रहा था कि आप तो एक भी छुट्टी नहीं लेते तो अब ऐसा क्या हो गया है कि पुरे हफ्ते की लीव पर है? मैंने कहाँ कि चिन्ता करना सही है आज कल किसी का पता नहीं चलता है? कब कंपनी बदल लें। दोनों महिलाओं में मित्रता सी हो गयी थी। सो मैं बाहर चला गया।

थोड़ी देर में उन की आवाज आयी तो मैं कमरे में आया तो वह कहने लगी कि आप चिन्ता ना करे अगर लीव आगे बढ़ानी हो तो मुझे बता दिजियेगा। मैं सैक्शन करवा दुँगी। वह पत्नी को नमस्कार करके मेरे साथ बाहर आ गयी, फिर बोली कि आप कैसे घर कर काम कर रहे है? मैंने कहा कि जब सर पर पड़ता है तो सब कुछ अपने आप करना आ जाता है। मेरी बात सुन कर वह बोली कि मेरी कुछ सहायता चाहिये हो तो निस्कोंच याद किजियेगा। मैंने उन्हें विदा किया और माधुरी को साथ लेकर बेडरुम में आ गया।

पत्नी बोली कि तुम्हारा शक सही निकला वह यह कंफर्म करने आयी थी कि वाकयी में, मैं बीमार हूँ या नही? मैंने कहा कि कंपनियां चिन्ता करती है। साधारण बात है। माधुरी बोली कि इतने सीनियर पद पर बैठे आदमी के जाने के डर से परेशान तो होती है। पत्नी बोली कि तुम ने इन की एचआर को नहीं देखा बहुत खुबसुरत है बड़ी-बड़ी गोल आँखे है। बात बनाने में चंट है। मैंने कहा कि एचआर है यह सब तो उसे आना चाहिये। पत्नी ने मजाक में कहा कि तुम पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान दिख रही थी। मैंने कहा कि सीनियर कुलीगस् आपस में एक-दूसरें का ध्यान तो रखते ही है।

मैंने ध्यान दिया कि माधुरी मुझे आँखे तरेर कर देख रही थी। मैंने उसे आँखों से ईशारा किया तब जाकर उस ने आँखे तरेरना बंद किया। पत्नी बोली कि यह बता रही थी कि ऑफिस में सारा फीमेल स्टाफ सर की बड़ी तारीफ करता है कि सर किसी के साथ गलत नही बोलते तथा बढिया व्यवहार करते है। बड़ी फीमेल फैन है ऑफिस में तुम्हारी। यह बात सुन कर मैंने माधुरी की तरफ देखा वह मुस्करा रही थी। मैंने कहा कि इन का आना तो एक नई आफत ले आया है। दोनों हँसने लगी। मैं भी उन का साथ देने लगा।

माधुरी बोली कि आप ने अच्छा किया मुझे उस के सामने आने से मना कर दिया नही तो वह क्या सोचती? मैंने कहा कि मैडम मैंने कई साल कंपनी का एचआर विभाग संभाला है सो यह सब बातें मैं समझता हूँ। मेरी बात सुन कर माधुरी ने पत्नी की तरफ मुँह कर के पुछा कि दीदी आप के पति को कितने क्षेत्रों में महारत हासिल है? तो वह बोली कि मुझे तो कुछ पता नही है कोई ऐसा विषय नही है जिस में यह ज्ञान ना देते हो। मैं चुपचाप उन की बातों का मजा लेता रहा ।

दोपहर का खाना तीनों ने साथ बैठ कर खाया, फिर पत्नी बोली कि मुझे नींद आ रही है तो वह सोने चली गयी। मैं और माधुरी अकेले रह गये। दोनों बातें करने लगे तो माधुरी बोली कि यह एचआर तो देखनी चाहिये थी, दीदी जिस की इतनी तारीफ कर रही थी।

मैंने कहा कि जलों मत वह मात्र कुलीग है इस से ज्यादा कुछ नही है। उस ने कहा कि चिन्ता तो करनी पड़ती है अपनी चीज की। कोई और ना चुरा ले। मैंने कहा कि कोई नहीं चुराने आ रहा है पहले ही किसी ने चुरा लिया है। दूसरे के लिये कोई मौका नही है।

मेरी बात सुन कर उस के चेहरे पर मुस्कान तो आई लेकिन उस में संशय था। वह बोली कि उस से ज्यादा बातें ना करा करो। मैंने कहा कि काम की बातें ही करता हूँ वह कभी-कभी गप्प मारने आ जाती है लेकिन मैं उसे भाव नही देता हूँ वह यह सुन कर बोली कि तभी तो उसे देखना बनता है। मैंने उसे अपने फोन में उस की फोटो दिखा दी, उसे देख कर बोली कि दीदी सही कह रही है ये तो डाका डालने वाली लगती है। मैंने कहा कि हम कौन से करोड़पति है जो हमें कोई लुट लेगा? मेरी बात से माधुरी संतुष्ट नही हुई। एचआर का प्रसंग यही खत्म हो गया।

हम दोनों उस की किताब के बारे में बात करने लगे। किताब में कई अध्याय थे जिन के क्रमों को लेकर माधुरी असमंजस में थी। मैंने सलाह दी की अभी इन को इसी क्रम में रहने दो बाद में जब पुस्तक पुरी हो जाये तो इन के क्रम के बारे में फैसला करना। अभी तो इसे आगे बढ़ाने पर काम करो। मेरी बात से उसे आगे काम करने के लिये प्रोत्साहन मिला तथा उस ने कहा कि तुम्हारी बात सही है मैं इस पर आगे काम करती हूँ बाद में इन के क्रम के बारे में निर्णय लुँगी। उस ने मुझ से पुछा कि तुम्हें पढ़ कर कैसी लगी?

मैंने जबाव दिया कि भाषा सही है विषय का विवरण भी क्रमिक है विस्तार भी सही हो रहा है आगे के अध्यायों में भी यही चलना चाहिये, इस से अन्त में पुस्तक अपनी पूर्णता पा लेगी, मेरी बात सुन कर माधुरी थोड़ी देर तो चुप बैठी रही फिर बोली कि मुझे लग रहा था कि किसी हिन्दी के साहित्यकार के पास बैठ कर उस की बात सुन रही थी। क्या बात है यह गुण अब तक कहाँ छुपा रखा था? मैंने कहा कि भाषा पर अधिकार होना मेरे लिये गर्व की बात है। मेरी बात पर वह बोली कि साहित्यकार महाशय आप का कोटि-कोटि धन्यवाद। हम दोनों इस पर हँसने लगे। फिर किस ने कौन सी किताब पढ़ी है इस पर बात होने लगी और समय कैसे कट गया पता ही नही चला।

चाय का समय हुआ तो पत्नी चाय बना कर ले आयी उसे देख कर माधुरी उस से बोली कि दीदी आप को उठना नही था। मैं बना देती, पत्नी बोली कि मैं लेटे लेटे बोर हो रही थी सो बना लाई, मैंने कहा कि अब पी लेते है। चाय पीते समय फिर से एचआर की बातें होने लगी। मैंने कहा कि आईन्दा मैं अपने किसी सहयोगी को घर पर नही बुलवाऊँगा। मेरी बात सुन कर माधुरी बोली कि क्यों नही बुलवायेगे नही तो हमें कैसे पता चलेगा कि आप के सहयोगी कैसे है?

मैंने कहा मजाक एक तरफ कंपनी में खुला माहौल होता है इस लिये सब लोग थोड़े से बेतकलुफ होते है। उस से घबराने की जरुरत नही है, पत्नी बोली कि यह कहाँ जायेगे लौट कर घर को ही आयेगे। मैंने माधुरी की तरफ देखा वह मुझ से नजर चुरा रही थी। मैंने कहा कि हम तो पुराने समय के बंदे है इधर-उधर मुँह मारने में विश्वास नही करते। थोड़ा बहुत फ्लर्ट तो चलता रहता है, इस में गम्भीरता ढुढ़ना गलत है।

ऑफिस के माहौल को अनौपचारिक रखने के लिये सब से बोलना जरुरी है। पत्नी बोली कि इन के साथ काम करने वाले कुछ पुराने सहयोगी तो इन पर ऐसे अधिकार जमाते है कि जैसे इन के रिश्तेदार हो। ये भी उन को कभी डाँटते नही है। मैंने कहा कि पुराने होने के कारण कुछ ज्यादा ही बेतक्लुफ हो गये है। उन को जैसा लगता है करने देता हूँ। मेरी बात पर माधुरी बोली कि सबंधों की मर्यादा तो रखनी चाहिये।

मैंने कहा कि तुम सही कह रही हो, मैं तो सदा अपनी तरफ से इस बात का हमेशा ध्यान रखता हूँ कि सीमा का उल्लघन ना हो। सीमा तो हमें बाँधनी पड़ती है, तुम ने सुना की मैं सारे फ्लोर पर लड़कियों की हैल्प करता हूँ लेकिन मैं लड़कियों की ही नही लड़कों की भी हैल्प करता हूँ मेरी आदत है। लेकिन लड़कियाँ पसन्द करती है लड़कें नही करते। मैं क्या कर सकता हूँ?

रात को खाने के बाद सब बैठे थे तो माधुरी बोली कि मैं गर्मी की छुट्टियों में कही जाने की सोच रही हूँ दीदी को साथ ले जाऊँ, मैंने कहा तुम्हारी दीदी है ले जाओं। पत्नी बोली कि जाने का तो मन है लेकिन इन को छुट्टियाँ नही मिलती है। माधुरी बोली कि इस बार तो छुट्टियाँ लेनी पड़ेगी आप को घर से बाहर जाना चाहिये जब हम दोनों जायेगी तो यह तो अपने आप पीछे-पीछे आयेगे। मैंने कहा कि यह तो जोर जबरदस्ती है, इस पर पत्नी बोली कि कभी तो कही चला करों?

पत्नी की बात से शह पा कर माधुरी बोली कि मैं कहीं की बुकिंग कराती हूँ फिर आप को बताती हूँ। मैंने कहा कि जैसी आप की आज्ञा, मेरी बात पर पत्नी माधुरी को बोली कि जब भी कुछ कहो तो ऐसा कहते है। वह बोली कि यह तो सही बात है आप बस आज्ञा दिया किजिये, यह उस का पालन करेगे। मैंने कहा कि अब तुम ने अपने सर जिम्मेदारी ले ली है तो पुरा करो।

वह बोली कि इस बहाने फोटोग्राफी का शौक भी पुरा हो जायेगा। पत्नी बोली कि तुम दोनों के बीच में मैं क्या करुँगी? मैंने कहा कि तुम अपने मोबाइल से फोटोग्राफी करना, हम तो घुमने जा रहे है, फोटो को वैसे भी खिंचते है। एक की बजाए दो लोग ऐसा करेगे बस। सो बाहर जाने का कार्यक्रम बन गया। अब माधुरी की जिम्मेदारी थी कि वह इसे पुरा करे। रात को जब सब सोने लगे तो पत्नी बोली कि अब तो बुखार उतर गया है सोफे पर सोना बंद कर दो। मैंने कहा कि एक दिन और सो लेता हूँ फिर देखेगें।

वह कुछ नहीं बोली और सोने चली गयी। माधुरी भी उस के साथ कमरे में गयी, फिर कुछ देर बाद आयी और मुझ से बोली कि दूध पीना है? मैंने सर हिलाया और उस की तरफ देखा तो उस ने कहा कि बदमाशी नहीं यह नही मिलेगा। मैंने कुछ नही कहा, वह दूध लेने चली गयी। दूध ले कर आई तो बोली कि दूध पी लो। फिर मेरे सामने ही बैठ गयी। मैं बोला कि सोमवार से मैं ऑफिस चला जाता हूँ, नही तो आगे छुट्टियाँ मिलना मुश्किल होगा, वह बोली कि मैं तो हुँ ही तुम जा सकते हो।

मैंने उस से पुछा कि उस को कॉलिज नही जाना तो उस ने कहा कि कॉलेज गर्मी की छुट्टियों के कारण बंद है। वह तो घर ही जा रही थी। अब कही बाहर जाने का कार्यक्रम बनाती हूँ। मेरी तरफ आँख तरेर कर बोली कि ज्यादा दूध मत पिया करो। मैंने कहा कि इस में क्या बुराई है वह बोली किसी दिन दिखाऊँगी। मैं उसे आँख मारी तो वह खाली गिलास ले कर चली गयी। आज कुछ भी करना संभव नही था। सो सोने में ही खैरियत थी। सोने का प्रयास किया तो नींद आ गयी। रात में जब आँख खुली तो बाथरुम गया, वहाँ मैडम मेरा इंतजार कर रही थी, खुब चुमा चाटी हुई मैंने तो एक कश दूध पर भी मार लिया। मन तो नही भरा लेकिन ज्यादा का चांस नही था सो बाहर आ कर सो गया।

सुबह माधुरी ने ही उठाया कि उठ जाओ। मैं उठ कर पत्नी को देखने जाने लगा तो वह बोली कि दीदी सो रही है। फिर उस ने मेरे कान में कहा कि कुछ भी आराम से क्यों नही करते? कल कितनी बुरी तरह से कटा है कि दिखा भी नही सकती, बोली कि तुम्हारी सजा यही है कि तुम्हें कुछ नही मिलेगा। मैंने कहा कि अब क्या कर दिया? तो वह मेरा हाथ पकड़ कर कमरे में ले गयी और अपनी मैक्सी उठा कर दिखाया कि मैंने उस के स्तन पर इतना जोर से काटा था कि दांतों के स्पष्ट निशान बन गये थे, यह देख कर मैंने दोनों कानों को हाथ लगाया तो उस की हँसी निकल गयी और बोली कि ये शैतानियां बंद कर दो नही तो मैं भी दीदी की तरह से करने लगुँगी। मैंने कुछ नही कहा और उस के कमरे से बाहर आ गया।

सारा दिन ऐसे ही बीत गया, मैं अगले दिन ऑफिस चला गया, पुरा हफ्ता ऐसे ही चला। संडे को माधुरी ने बताया कि उस ने पहाड़ पर चार दिनों की बुंकिग कराई है अगले शनिवार को जा कर बुधवार को आना है, छुट्टियाँ अप्लाई कर दो। मैंने कहा कि पहले ही कर दी है सिर्फ बताना है कि कब से कब तक लेनी है। वह यह सुन कर बड़ी खुश हुई और बोली कि यहाँ से टैक्सी से चलेगे। 8 से 10 घंटे का सफर है। मैंने कहा कि सब तैयारी कर लेते है, कुछ गरम कपड़ें तो नही चाहिये तो वह बोली कि हल्के कपड़ें तो ले कर जाने पड़ेगे, मैं कल घर जा कर अपनी तैयारी करती हूँ सारा सामान ले कर आती हूँ यही से इकठ्ठें चलेगें।

मैंने उस से पुछा कि कितना खर्चा हो रहा है तो वह बोली कि उस की चिन्ता मत करो, इस पर मैंने कहा कि नही यह सही नही है दोनों खर्चे को आपस में बाँट लेगे तो वह बोली कि बाकि खर्चा आप करना मैं बुकिंग और आने जाने का खर्च कर रही हूँ। मैंने सहमति में सर हिलाया। पत्नी भी हमारी बातचीत में शामिल हो गयी और बोली कि मैं तो कह रही थी कि सारा खर्च हमें ही करने दे लेकिन यह तैयार नही हो रही थी तुम ने कैसे मनाया। मैंने कहा कि तुम्हारी बहन है और मेरी दोस्त है सो दोस्त का कहा मान गयी है।

पत्नी ने माधुरी की तरफ देख कर कहा कि बहन से ज्यादा दोस्त है। मैंने कहा कि पहले दोस्त ही बनी थी। माधुरी बोली कि अब आप दोनों तो मत झगड़ों। मैंने कहा कि मैंने दोस्त के नाते बीच की बात की इस लिये यह मान गयी, अगर मैं कहता कि सारा खर्चा मैं करुँगा तो यह नही मानती इस लिये मैंने वह बात ही नही की। माधुरी बोली यह सही बात कह रहे हो। पत्नी बोली कि मेरे को तो घुमना है कोई भी खर्च करे बहन या पति। हम दोनों हँस गये। मैंने दोनों से कहा कि पहाड़ पर साड़ी में परेशानी होती है तो जींस सुट वगैरहा ही ले कर चलना। मेरी बात का किसी ने विरोध नही किया। सब सोने चले गये।

रात में पत्नी बोली कि तुम से उस से खर्चा क्यों करवायाँ? मैंने कहा कि अगर नही करवाता तो वह बुरा मान जाती सारा कार्यक्रम तो उसी का है तो उसे खर्च करने दो भई कमाती है, प्रोफेसर है। मेरी बात सुन कर वह बोली की कुछ अच्छा नही लग रहा है, मैंने कहा कि वह अकेली जाती होगी अब हम दोनों के साथ है तो ज्यादा अच्छा लगेगा हमें भी अच्छा लगेगा। चल कर देखते है। खर्च को लेकर ज्यादा माथा-पच्ची मत करो। मैंने उसे अपने आगोंश में ले लिया। आजकल वह ना-नुकुर नही करती है। चुपचाप मेरे पास चली आयी फिर जो होना था वह हुआ।

पुरा हफ्ता घुमने जाने की तैयारी में ही निकल गया। माधुरी अपने घर जा कर सारे कपड़े वगैरहा ले कर आ गई, पत्नी ने भी कुछ जरुरी खरीदारी कर ली जिस में कुछ कपड़े तथा आवश्यक सामान था। मैंने भी इस दौरान ऑफिस में मेरे पीछे से होने वाले कामों की सूची बना कर अपने स्टाफ को दे दी ताकि वे मेरे पीछे से काम करते रहे। शुक्रवार की रात को ही सारा सामान पैक करके रख दिया गया तथा घर को बंद कर के जाने की तैयारी पुरी कर ली गयी।

शनिवार की सुबह टैक्सी आ गयी और सब सामान रख कर हम तीनों निकल गये। सुबह की वजह से गर्मी कम थी लेकिन जैसे जैसे दिन चढ़ा तो तापमान बढ़ गया। रास्ते में खाने के लिये रुके तो पत्नी बोली कि अपनी गाड़ी में आते है तो समय की पाबंदी नही रहती कही भी रुक जाऔ और कभी भी चल दो। शाम को अपने गन्तव्य पर पहुँच गये।

एकान्त में बना रेसोर्ट था, पहाड़ की चोटी पर बनाया हुआ था। छोटे-छोटे कॉटेज दूर दूर पर बने हुए थे। बाहर का दृश्य मनोरम था, सामान रख कर हाथ-मुँह धो कर बालकनी में खड़े हुये तो दूर तक नजर आती पर्वत श्रर्खलाओं को देख मन खुश हो गया। यात्रा में जो परेशानी हुई थी वह सब दूर हो गयी। कॉटेज में दो कमरे थे तथा एक कॉमन रुम था, बालकनी से घाटी का मनोरम दृश्य दिख रहा था सो मैं केमरा निकाल कर उसे कैद करने लगा।

मेरी देखा-देखी माधुरी भी केमरा ले कर आ गयी हम दोनों को देख कर पत्नी बोली की कुछ सुस्ता तो लो आते ही लग गये। मैंने कहा कि यहाँ कब दृश्य बदल जाये पता नही रहता इस लिये इसे तो कैद कर ही ले तुम भी अपने मोबाइल से कुछ फोटो खींच लो। वह बोली कि मुझे जब लगेगा तब करुँगी तुम दोनों ही बहुत हो करने के लिये। उस की बात सुन कर हम दोनों उस के पास आ गये और उसे कुर्सी पर बिठा कर बोले कि तुम तो बैठ का प्राकृति का मजा लो। वह बोली की यही तो कर रही हूँ मैंने कहा कि फोन करके कुछ चाय वगैरहा मंगवाते है। माधुरी बोली कि मैं फोन करती हूँ। यह कह कर वह अन्दर चली गयी।

पत्नी बोली उस को क्यों परेशान कर रहे हो? यह काम तुम नहीं कर सकते? मैंने कहा कि जब वह चली गयी है तो अब क्या करुँ? तब तक माधुरी वापस आ गयी और बोली कि आधे घंटे में चाय और पकोड़े आ रहे है। तब तक चाहे तो कपड़ें बदल सकते है। मैंने कहा कि यह सही रहेगा। मैं कमरे में आ कर सुटकेस खोल कर अपने कपड़ें ढुढ़ने लगा तो माधुरी पास आ कर बोली कि तुम्हारें कपड़ें मैंने रखे है कुछ ना मिले तो दीदी की बजाए मुझ से पुछना? मैंने उस की तरफ देख कर कहा कि ऐसा कैसे हुआ? तो वह मुस्कराती हूई बोली कि बहुत कुछ हूआ है। धीरे-धीरे पता चलेगा।

मैं हैरान सा उसे देखता रहा। फिर कपड़ें निकाल कर पहने लगा तो माधुरी कमरे से चली गयी। पत्नी बोली कि तुम्हारें कपड़ें माधुरी ने रखे है उसी से पुछना कहाँ पर क्या है? मैंने कहा कि कपड़ें मिल गये है तुम भी बदल तो तो वह बोली कि मैं तो रात को ही बदलुगी। कुछ देर बाद माधुरी भी अपने कमरे से कपड़ें बदल कर आ गयी। वह सुट पहन कर आयी थी। सुन्दर लग रही थी लेकिन मैंने कुछ नही कहा।

पत्नी बोली कि सुट भी सही लगता है माधुरी पर। मैंने देख कर कहा कि हाँ बढ़िया है। तभी चाय और पकोड़ें ले कर अटेन्डैन्ट आ गया। उस ने बताया कि रात के खाने के लिये सात बजे तक आर्डर करना होता है। मेनू के बारे में पुछा तो बोला कि रिसेप्शन पर फोन कर के पता चल जायेगा। हम लोग चाय और पकोड़ों का आनंद लेने लगे।

बाहर आकाश पर काले घने बादल छा गये और घना अंधेरा छा गया, लगा कि जोरदार बारिश होगी, और हुआ भी यही अचानक बड़े जोर से बारिश होने लगी। लगा कि तुफान भी आ रहा है। माधुरी ने मुझ से कहा की पेट में चुहें कूद रहे है आप जल्दी से फोन करके मेनू पता करो और खाना ऑडर कर दो। मैंने रिसेप्शन पर फोन करके मेनू पुछा तो पता चला कि आज राजमा चावल पीली दाल रोटी तथा मिक्स वेज है मैंने दोनों से पुछा कि क्या खाना है तो जवाब मिला की जो आप को पसंद हो वही ऑडर कर दो।

मैंने अपने लिये राजमा चावल तथा दोनों के लिये पीली दाल, मिक्स वेज तथा रोटी ऑडर कर दी। थोड़ी देर बाद जब खाना आया तो दोनों बोली कि आप ने तो आज भी अपने लिये राजमा चावल ही मँगाये है। मैंने कहा कि अपनी रुचि की चीज मिली तो मँगा ली तुम्हारे लिये जो सही लगा वह मँगा दिया है।

दोनों बोली की हम भी तो राजमा खा सकते थे मैंने कहा तुम दोनों राजमा खालों मैं चावल पीली दाल से खा लेता हूँ। मेरी बात सुन कर दोनों एक साथ बोली कि किसी भी तरह से काम चला ही लेगे। मैंने कहा कि इस में क्या गलत है? खैर यह विवाद यही थम गया और हम सब ने खाना खा लिया।

बाहर जोरदार बारिश हो रही थी उस की आवाज चारों तरफ गूंज रही थी। कुछ देर तक हम लोग बातें करते रहे फिर सोने के लिये तैयार हो गये माधुरी अपने कमरे में चली गयी और हम दोनों पति-पत्नी भी बिस्तर में घुस गये। बरसात के कारण ठंड़ बढ़ गयी थी इस लिये रजाई अच्छी लग रही थी। ठंड़ में बीवी साथ हो तो जो होता है वही होने लगा। काफी देर तक जब तक थक नही गये लगे रहे फिर थक कर सो गये।
 

aidenabhishek

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रविवार
सुबह सूर्योंदय की तस्वीरें लेने के लिये मैंने माधुरी के कमरे का दरवाजा खटखटाया तो वह खुल गया। अन्दर जा कर उस को उठाया तो उस ने अपने ऊपर खींच लिया। एक लम्बे चुम्बन के बाद हम दोनों अलग हुये मैंने उसे कहा की सूर्योदय का समय हो रहा है कुछ फोटो खींच लेते है, यह सुन कर वह झट से बिस्तर से निकल गयी और केमरे की तरफ लपक पड़ी। हम दोनों बाहर आ गये। अभी आकाश साफ था रात की कालिमा को हटा कर भोर की लालिमा छाने को थी। हम भी इस क्षण को अपने-अपने केमरे में कैद करने के लिये तैयार थे।

धीरे-धीरे रात की कालिमा को हटा कर भोर की लालिमा आकाश के पूर्वी किनारे पर दिखाई देने लगी हम दोनों उसे कैद करने लगे। जब तक सूर्य आकाश में ऊपर नही दिखने लगा तब तक हम लोग फोटो लेते रहे। फिर कुछ देर वहीं खडे़ होकर स्वच्छ हवा का आनंद लेते रहे। इस के बाद जब अन्दर घुसे तो पत्नी जी भी अगड़ाई ले कर उठ रही थी।

मुझे देख कर बोली कि मुझे क्यों नही उठाया तो मैंने कहा कि तुम सो रही थी इस लिये नहीं उठाया, वह बोली कि मैं भी सूर्योदय का मजा ले लेती, माधुरी बोली कि दीदी अभी देर नहीं हुई है आप बाहर जा कर इस दृश्य का आनंद उठायों, जल्दी से बिस्तर से निकलों लकिन मुझे पता था कि वह नही निकलेगी क्यों कि रात के कारण कपड़े अस्त-व्यस्त होगे, लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ कि वह जल्दी से बिस्तर से निकल कर बाहर चली गयी। उस ने रात में ही कपड़े बदल लिये थे। माधुरी और वह दोनों बाहर खड़ी होकर बातें करने लगी।

मैं तो नित्य-कर्म करने के लिये बाथरुम में घुस गया। वहाँ से बाहर आया तो देखा कि दोनों अभी तक बाहर ही खड़ी है। जा कर देखा तो दोनों सुबह की मदमस्त और ताजी हवा में चहल कदमी कर रही थी। मुझे भी आमंत्रण मिला की नंगे पैर गीली घास पर टहलों, मैंने ऐसा ही किया, तलवों से हो कर ठंड़क सर तक पहुँच गयी। जब सूरज थोड़ा और ऊपर हुआ तो सब लोग अंदर आ गये। मैंने कहा कि चाय मगवाऊँ या नहाने के बाद नाश्ता करने का विचार है तो उत्तर मिला कि अभी तो चाय पीते है फिर आगे की देखेगे। मैंने चाय का ऑडर कर दिया। थोड़ी देर में चाय आ गयी।

चाय पीते हूये मैंने माधुरी से पुछा कि आज का क्या प्रोग्राम है तो वह बोली कि कुछ दूर नदी के किनारे एक प्राचीन शिव मंदिर है वही चलते है। नदी भी देख लेगे। मैंने कहा कि मैं तो नहाने जा रहा हूँ यह कह कर मैं तो नहाने चला गया। नहा कर जब निकला तो देखा कि दोनों अभी भी बातें कर रही थी।

मैं तो कपड़ें देख रहा था तो मुझे अपने जुराब नही मिली तो मैंने पुछा तो माधुरी बोली की वह तथा तुम्हारे अंडर गार्मेट कैरी बैग कि साईड पॉकेट में है तथा अपने गंदे कपड़ें भी उसी बैग में रख देना। मैं ने जुराब निकाले और पहन लिये। स्पोर्टस शुज पहन कर जब उठा तो पत्नी बोली कि आप को बड़ी जल्दी है तैयार होने की? मैंने कहाँ कि तैयार तो होना ही तो देर क्या करनी। अब तुम दोनों तैयार हो जाओ।

पत्नी बोली कि अब मैं जाती हूँ। पीछे से माधुरी बोली कि स्पोर्टस शुज में तो आज पहली बार देखा है जम रहे है। मैंने कहा कि तुम भी शुज लाई हो? तो उत्तर मिला की हाँ साहब हम में भी थोड़ी अक्ल है। जींस के नीचे पहनने के लिये नये लिये है, मेरे पास नहीं थे। फिर उस ने मुझे अपने पास खींचा और एक चुम्बन दे दिया। पत्नी के पीछे उस की शरारत और अधिक बढ़ जाती थी।

मैं केमरे का बैग सही करने लगा तो वह भी बोली कि मेरे बैग को भी सही कर दो। मैंने कहा कि उसे मेरे को दो, यह सुन कर वह अपना केमरा बैग ले आयी। मैं उस के बैग में रखे सामान को देखने लगा। उस के सारे सामान को सही तरह से बैग में लगा कर मैंने उसे बंद कर दिया तथा दोनों बैगों को एक साथ रख दिया, तभी मुझे लगा कि एक केमरा स्टैड भी ले कर चलना चाहिये जरुरत पड़ सकती है माधुरी बोली कि मेरा स्टैंड़ हल्का है उसे ही ले चलते है एक से ही काम चला लेगे।

मैंने सहमति में सर हिलाया। वह स्टैड़ लेने चली गयी। तब तक पत्नी भी नहा कर आ गयी, माधुरी भी स्टैंड़ मुझे पकड़ा कर नहाने चली गयी। पत्नी बोली कि लगता है सारी तैयारी कर ली है? मैंने जबाव दिया कि हाँ अपना सारा सामान रख लिया है, वह बोली कि मैं भी जींस पहन लुँ? मैंने कहा कि पहन लो। इस पर वह बोली कि मैं क्या पहँनुगी पैरों में? मैंने कहा कि तुम्हारें जूतें भी तो लाये है उन्ही को पहन कर चलना। पहाड़ों पर चलने में आराम रहेगा।

पत्नी संतुष्ट हो कपडे़ं पहनने लगी। मैंने जब तक नाश्ता ऑडर कर दिया था। माधुरी जब नहा कर आयी तो हम पति-पत्नी तैयार हो चुके थे हमें देख कर वह बोली कि कही मुझे छोड़ ना जाना, उस की दीदी बोली कि मेजबान तो तुम हो सो तुम्हें कैसे छोड़ कर जा सकते है, वह हँसती हूई अपने कमरे में चली गयी। पत्नी हमारे उतारें हुये कपड़ों को बैग में रखने लगी।

तभी वेटर नाश्ता ले कर आ गया, वह नाश्ता रख कर चला गया और मैंने रिसेप्शन पर फोन करके नदी तक जाने के लिये गाड़ी तैयार रखने के लिये कह दिया। माधुरी भी थोड़ी देर में जींस टॉप में आ गयी। हम सब नाश्ता करने लगे। मैंने कहा कि पेट भर कर नाश्ता कर लों घुमने में सब पच जायेगा। मेरी इस बात पर दोनों ने मुझे घुर कर देखा, मानों खा जायेगी। मैंने अपनी नजर घुमा ली।

नदी पहाड़ के नीचे तलहटी में थी, वहाँ तक पहुँचने में ज्यादा समय नही लगा। बल खाती पहाड़ी नदी की कलकल की आवाज मधुर लग रही थी। शिव मंदिर को देख कर लगा कि जब यह बना होगा तब कितना शानदार रहा होगा। अन्दर जा कर शिवलिंग के दर्शन करें। इस के बाद तट पर पत्थरों पर बैठ गये, मैं केमरे से दोनों की तस्वीरें लेने लगा। माधुरी को ध्यान आया कि मेरी भी तो तस्वीरें लेनी है सो वह अपने केमरे को लेकर बोली कि आप भी दीदी के पास बैठ जायो कुछ मैं भी खींच लुँ। मैं भी पत्नी के साथ बैठ गया। हम जहाँ बैठे थे वहाँ पृष्टभूमि में नदी का घुमाव आता था जो बड़ा मनोहर था।

नदी के किनारे खड़े लम्बें चीड़ के पेड़ मनोरम दृश्य की रचना कर रहे थे। हम दोनों अब नदी के तटों और आस-पास के भूदृश्यों की फोटों लेने लगे। प्राकृति से अधिक चितेरा कोई नही है वह पल-पल नये रुप में सामने आती है, उसे केमरे में कैद करना बड़ा मुश्किल काम है। मैं तो नदी के बहते पानी की अलग-अलग कोणों से फोटो ले रहा था मेरी पत्नी बड़े ध्यान से मुझे देख रही थी उसे जब कुछ समझ नही आया तो उस ने माधुरी से इशारों में पुछा तो उस ने भी ना में सर हिला दिया। मैं जब फोटो लेकर हटा तो पत्नी बोली कि पानी की इतनी फोटोस् का क्या फायदा है मैंने कहा कि बाद में बताऊँगा। वह चुप हो गयी।

कुछ शिव मंदिर की फोटो लेने के बाद हम लोग वापिस रिसोर्ट के लिये चल दिये, रिसोर्ट के कुछ पहले जंगली फुलों को देख कर गाड़ी रुकवाई और उस की तस्वीरें भी ली फिर मैंने और माधुरी ने विचार किया की कल हम पैदल यहाँ आयेगें और फोटो लेगे। रिसोर्ट वापस आ कर खाना ऑडर किया, नाश्ता कब का पच चुका था? खाने के बाद कुछ देर आराम करने के बाद माधुरी बोली कि मैं और दीदी तो मसाज करवाने जा रहे है तुम्हारा क्या विचार है? मैंने कहा कि मैं भी करवा लेता हूँ हम तीनों ही मसाज करवाने चले गये। शाम को जब मसाज करा कर कॉटेज में लौटे तो बढ़िया महसुस कर रहे थे, मसाज से सारा तनाव शरीर से निकल गया था तथा बड़ा हल्का सा लग रहा था। बातों का दौर चलता रहा रात का खाना खा कर सोने गये तो पति-पत्नी में भरपूर प्यार हूँआ।


सोमवार
सुबह उठा तो पत्नी अभी भी सो रही थी। माधुरी के कमरे का दरवाजा खटखटाया तो आवाज आयी कि खुला है। अन्दर गया तो देखा कि वह तो उठ कर कपड़ें बदल कर तैयार खड़ी थी। दोनों ने एक-दूसरे को बाँहों में भरकर भरपूर चुमा। जब मन भर गया तब केमरें उठा कर बाहर आ गये। आज बादल छाये हुऐ थे इस कारण सूर्योदय का अपना अलग सोन्दर्य था। बादलों के पीछे से झाँकती भोर की उजास भली लग रही थी, यह सूर्योदय की सुन्दरता और बढ़ा रही थी। बादलों की ओट से झाँकते सूर्य की लालिमा नयनाभिराम दृश्य उत्पन्न कर रही थी। हम दोनों उस सौन्दर्य का पान करते रहे और उस की तस्वीरें लेते रहे।

कुछ देर बाद पत्नी भी हम दोनों के साथ आ गयी। पर्वतों के सूर्योदय के दर्शन मैदानों में रहने वाले लोगों के लिये तो दूर्लभ ही होते है सो हम उन को छोड़ना नही चाहते थे। बादल गहरा गये और हल्की बुदाबाँदी होने लगी तो हम सब अन्दर आ गये और बालकनी में खड़े हो कर ठंड़ी हवा और रिमझिम बौछारों का मजा लेते रहे। चाय ऑडर की, उस को पीया और नहाने का कार्यक्रम चला, नाश्ता किया आज कहीं जाने का प्रोग्राम नही था। इस लिये बारिश के रुक जाने पर रिसोर्ट के आस-पास घुमने के लिये निकल पड़े। मैदानी आदमियों को पहाड़ पर चलने में परेशानी होती है सो हम धीरे-धीरे घुम रहे थे।

कुछ देर बाद हम कल वाली जगह पर पहुँच गये जहाँ जगली फुल खिले हूऐ थे। हम दोनों उन के फोटो लेने लगे, पत्नी भी अपने मोबाइल से फोटो ले रही थी। काफी देर तक ऐसा चला फिर मैंने माधुरी से कहा कि थोड़ा ऊपर जंगल में पेड़ों की तस्वीरें बढ़िया आती है तो ऊपर की तरफ चलते है। जब पहाड़ी के ऊपर पहुँचे तो आस-पास का दृश्य देख कर मन प्रसन्न हो गया।

कुछ देर तक तो आराम से घास पर बैठ कर नजारे का मजा लेते रहे। फिर उस को केमरे में कैद करना शुरु किया। माधुरी बोली कि मैं आप दोनों की फोटो खींचती हूँ मैंने कहा कि कोशिश करों तो वह बोली कि ऐसा क्यों कह रहे है? मैंने कहा कि पत्नी जी को तो मेरे साथ फोटो खिंचवाना पसन्द नही है, इस पर पत्नी बोली कि किसी ने पहले खिंची है तो बतायो? माधुरी बोली कि आज तो मैं खींच रही हूँ खिंचवा लिजिये। वह हम दोनों की फोटो लेती रही। फिर मैंने उस की अकेले फोटो खींची ।

अचानक पत्नी बोली कि तुम दोनों भी एक साथ खड़े हो मैं तुम्हारी फोटो खींचती हूँ यह सुन कर मैं अचकचा गया लेकिन उस ने हम दोनों की कुछ तस्वीरें अपने मोबाइल में ली। उस के इस कदम से मैं सदमें में था लेकिन मैंने अपनी हैरानी जाहिर नही की। हम सब यो ही घुमते रहे और थकने पर वापस कॉटेज पर आ गये। खाना ऑडर कर के बातें करने लगे। माधुरी बोली कि आप दोनों की एक साथ फोटो क्यों नही है? मैंने पत्नी की तरफ देखा और कहा कि इन्हें मेरे साथ फोटो खींचाना पसन्द नहीं है शादी के बाद कई बार कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली तो इस बारें में सोचना छोड़ दिया।

आज कई सालों बाद दोनों की कोई एक साथ फोटो खींची है, तुम्हें क्या बताऊँ कुछ बातें बताने की नही होती। मेरी बात सुन कर माधुरी चुप हो गयी। पत्नी भी कुछ नही बोली उस के पास कुछ बोलने को नहीं था उसे पता था कि उस के और मेरे बीच इस बात को ले कर कई बार झगड़ा हो चुका था। अब हम दोनों इस विषय पर बात नही करते है।

मैंने विषय बदलने के लिये कहा कि जंगली फुल भी बहुत खुबसुरत होते है यह जंगल में अपने आप ही उगते है इन को आप शहरों में नही देख सकते, इस लिये हमने जो फोटो खिंची है वह मुश्किल से मिलती है। मैंने अपना केमरा निकाल कर उस के व्यूफॉउडर में फोटोस् को देखना शुरु कर दिया। फुल बड़े सुन्दर लग रहे थे। माधुरी आराम करने चली गयी और हम दोनों भी आराम करने लगे।

बाहर मौसम सुहावना हो रहा था। धीरे-धीरे शाम घिर रही थी। सूर्यास्त होने को था मैं फिर से केमरा उठा कर बाहर डूबते सूरज की तस्वीरें लेने के लिये बाहर आया तो माधुरी बाहर खड़ी थी मुझे देख कर बोली कि तुम्हें इस लिये नही कहा क्योंकि आज तुम कुछ नाराज से लग रहे हो। मैंने कहा कि मैं कहाँ नाराज हूँ जरा सा सत्य ही तो बयान कर दिया है इसी से सब को परेशानी हो रही है। मेरी बाँह पकड़ कर बोली कि कोई परेशानी नहीं है लेकिन इस बात को अब दूबारा दोहराओं नही। भुल जाओ।

मैं स्टैड पर केमरा लगा कर उस से फोटो लेने लगा। माधुरी बोली कि स्टैड की जरुरत क्यों है? मैंने उसे बताया कि रोशनी कम होने के कारण कई बार केमरा हिल जाता है जिस से फोटो शार्प नही आती है। इस लिये स्टैड पर लगा कर खींचने से कम लाईट में भी शार्प फोटो खींच सकते है। उस ने भी केमरा स्टैड पर लगा कर कुछ फोटो खींची। शाम का धुधलका छा चुका था। आकाश में तारें टिमटिमाने लगे थे। हम दोनों बाहर बैठे बातें करते रहे। पत्नी बाहर नही आयी। माधुरी बोली कि तुमने बेकार में ही दीदी को नाराज कर दिया है।

मैंने कहा कि मैंने कुछ नही किया तो वह बोली कि हर आदमी में अच्छी बुरी बातें होती है हम जब बुरी बातें याद करते है तो अच्छी बातें भुल जाते है। दीदी की सब अच्छी बात आप भुल जाते है यह गलत बात है। मैंने कहा कि मैं कब कहता हूँ कि वह गलत है मुझे तो कोई बात याद आई तो बोल दी। माधुरी बोली कि इस आदत को बदल डालों। मैं बोला कि बहुत पहले ही बदल ली थी ना जाने आज कैसे मुँह से निकल गयी है। यह कह कर मैं चुप हो गया।

हम दोनों के बीच सन्नाटा पसर गया। कोई उसे तोड़ने को तैयार नही था। बुंदे पड़ने लगी हम दोनों उसी बुंदाबांदी में भीगते रहे। तभी पत्नी की आवाज आयी कि भीग कर बीमार पड़ जाओगें दोनों अन्दर आ जाओ, तब हम दोनों की तन्द्रा टुटी और हम अन्दर भागे। लेकिन तब तक अच्छे खासे भीग चुके थे। अंदर आ कर बैठे तो ठंड़ लगने लगी, पत्नी बोली कि माधुरी जा कर कपड़ें बदल लो यह भी कपड़ें बदलते है। मैंने उठ कर सुटकेस खोला और ट्रेकसुट निकाल कर पहन लिया। माधुरी अपने कमरे से बाहर नहीं निकली। पत्नी उस के कमरे में चली गयी। वेटर शाम की चाय रख गया। मैं चाय लेकर माधुरी के कमरे में पहुँचा तो देखा कि पत्नी माधुरी के आँसु पोछ रही थी।

मैं वापस लौटने लगा तो पत्नी ने आवाज देकर कहा कि आग लगा कर अब उसे बुझाओंगे नही? मैंने कहा कि अब मैंने इसे क्या कहा है। पत्नी बोली कि तुम्हारी यही तो परेशानी है कि तुम्हें पता ही नही होता कि तुम क्या कर जाते हो। कब किसी को दूख पहुँचाते हो। यही समझ जाऔ तो सही इंसान नहीं बन जाओगे। यह सुन कर मेरा मन और खराब हो गया और मैं अपने चाय के कप को लेकर बालकनी में चला गया। वहाँ चाय पीते-पीते यह सोच रहा था कि मैं क्या करुँ? यहाँ घुमने के लिये आने पर भी लड़ाई हो गयी है। मेरी ही सारी कमी है।

चाय खत्म करते करते मैंने तय किया कि अब यहाँ रुकना बेकार है कल ही यहाँ से चलते है। लेकिन तभी ध्यान आया कि इस में माधुरी का क्या दोष है वह तो अपना पैसा खर्च करके हमें घुमाने लाई है, मैं ही पुरानी बातों को याद करके माहौल बिगाड़ रहा हूँ यह सोच कर मैं अंदर गया और माधुरी के कमरे में गया जहाँ पत्नी और वह चाय पी रही थी। मैंने जा कर कहा कि आज के अपने व्यवहार के लिये मैं माफी चाहता हूँ क्योंकि मैंने एक पुरानी बात याद करके पुरा माहौल खराब किया है।

मेरी बात सुन कर पत्नी माधुरी से बोली कि मैंने कहा था ना कि यह ऐसे ही है दिल के बड़े साफ है कोई बात जानबुझ कर नहीं करते, अब इन्हें माफ कर दें। इन की तुनकमिजाजी की भी तुझे पता चलनी चाहिये कि ये कैसे है? आज अंदाजा हो गया होगा। माधुरी बोली कि मैं इन से नाराज नहीं हूँ मुझे तो लग रहा है कि मैंने कुछ गलत कर दिया है। मैंने कहा कि तुम ने कुछ गलत नही किया है। मैंने ही बात बढ़ा दी थी। इस के लिये क्षमा माँगता हूँ। मेरी बात पर माधुरी बोली की अब इन का साहित्यकार जग गया है। कुछ गम्भीर बात होगी। मैंने कहा कि कोई गम्भीर बात नही है चल कर बाहर का आनंद लो। यहाँ अंदर बैठने के लिये थोड़ी ना आये है।

मेरी बात पर दोनों मुस्करा दी और बोली कि बाहर चलते है। हम तीनों बाहर आ कर सीढ़ीयों पर बैठ गये और तारों से भरे आकाश को निहारने लगे। शहरों में तो आकाश का यह रुप देखने को नही मिलता। ऐसा लग रहा था कि तारों से भरा कोई कटोरा किसी ने उलटा रख दिया है। सुगंधित हवा चल रही थी, जंगल से कीड़े मकोड़ों की आवाजें आ रही थी। ऐसी शांति मन को भी शांत कर देती है। ऐसा ही हमारे साथ हुआ हमारे मन भी उस शांति से अछुते नही रहे। कॉटेज में जब अंदर लौटे तो हम तीनों शांत हो चुके थे।

मैंने माधुरी से कहा कि रात के लिये खाना ऑडर कर दे। वह बोली कि कुछ पीना है मैंने कहा कि यहाँ क्या मिलेगा? उस ने कहा कि पुछ के देखने में क्या हर्ज है? मैंने कहा पुछ ले। वह फोन करने में लग गयी। उस ने कहा कि हार्ड में तो कुछ समझ नही आ रहा था इस लिये बीयर ही मंगा ली है। पत्नी बोली कि तुम दोनों ही पीना मैं तो नही पीऊँगी। हम दोनों चुप रहे।

खाने से पहले बीयर आ गयी। मैंने पत्नी से कहा कि एक बार चख कर देखे सही लगे तो पीये नही तो छोड़ दे। उस ने चख कर कहा कि ये तो कड़वी है मैंने कहा कि इस का स्वाद बाद में आता है। उस ने हमारा साथ देने के लिये एक पैग पी लिया। हम दोनों चार-चार पैग चढ़ा गये। वह हम दोनों को देखती रही।

खाना खाने के बाद सोने लगे तो माधुरी अपने कमरे में चली गयी मैं जब सोने के लिये बेड पर आया तो पत्नी ने कहा कि आज तुम माधुरी के साथ सोओं, तुम ने उसे बड़ा दूखी करा है। मैंने भौचक हो कर उस को देखा तो वह बोली कि ऐसे मत देखो जो कह रही हूँ करो। यह कह कर वह रजाई में घुस गयी। मैं कुछ देर वहाँ खड़ा रहा लेकिन जब कुछ समझ में नही आया तो माधुरी के कमरे में चला गया। दरवाजा खटखटाया तो खुला पड़ा था। अंदर घुसा तो देखा कि माधुरी अभी बैठी थी।

मेरे को देख कर वह बोली कि कुछ समझ में नही आ रहा है ना? बैठो मैं सब समझा देती हूँ। मैं बेड पर बैठ गया। वह उठी और जा कर दरवाजा बंद कर आयी। मैं हैरान सा सब देख रहा था दिमाग कह रहा था कि यह जो हो रहा है वह सब एक सपना है। सच में ऐसा थोड़ी ना होता है। माधुरी पास में बैठ कर बोली कि दिमाग पर ज्यादा जोर मत डालों हम दोनों ने आपस में मिल कर ऐसा किया है। दीदी ने एक दिन मुझ से पुछा कि मैं तुम्हें कितना प्यार करती हूँ तो मैंने कहा कि बता नही सकती, लेकिन अलग होने के नाम से डर लगता है।

वह बोली कि तुम्हारी आँखों में इन के लिये प्यार मैंने पहले दिन ही देख लिया था। इन को कोई चाहे या वह किसी को चाहे मुझे कोई आपत्ति नही है। बेशक यह प्यार सच्चा होना चाहिये। ये प्यार के भुखे है, मैं भी शायद वह प्यार इन्हें नहीं दे पायी जिसके यह हकदार थे। मैं यह मानती हूँ। मैं क्या करुँ? मेरा स्वभाव ही ऐसा है, मैं अपने आप को नही बदल पाई हूँ। हमारी शादी एक बार टूटते-टुटते बची है, इन के परिवार ने तलाक के लिये हामी भर दी थी हम दोनों में कुछ जम ही नही रहा था। लेकिन यह बोले की तलाक मैं नही दे सकता अब जो भाग्य में लिखा है वह तो भोगना पड़ेगा और यह कह कर इन्होंने उस बात को वहीं दबा दिया।

बाद में हम दोनों थोडे़ समझदार हूये तो हम दोनों ने समझौता सा कर लिया, यह मुझे कुछ नही कहते मैं इन्हें कुछ नही कहती। इसी लिये शायद ये तेरी तरफ आकर्षित हुये है, इन के पीछे कई पड़ी, लेकिन यह किसी को घास नही डालते है यह मुझे पता है। लेकिन उस दिन घर से निकल कर जब यह तेरे घर पहुँचे तब मुझे समझ आया कि तुझ पर कितना विश्वास करते है। इनके कितने सारे दोस्त है लेकिन उन किसी के यहाँ ना जा कर यह तेरे घर पहुँचे तो मुझे समझ आया कि तुम दोनों में कोई आपसी समझदारी है।

तुम जब बीमार पड़ी तो तुम्हें मेरे हवाले कर के चले गये तो यह समझा कि मेरी जगह इन के मन में कितनी ऊँची है कि अपनी दोस्त को पत्नी के हवाले कर के चले गये।

मेरे बीमार पड़ने पर जब तुम मेरी सेवा करने आयी तो मुझे पता चला कि तुम मुझ से कितना प्यार करती हो। इस कारण मैं चाहती हूँ कि हम तीनों एक साथ आराम से रहे। मैंने बताया कि मैं तुम से कितना नाराज थी जब तुम ने मुझे फोन नही किया था। तो दीदी ने समझाया कि यह ऐसे ही है किसी भी दोस्त की इज्जत का इन्हें हमेशा ध्यान रहता है, तुम पर कोई सवाल ना उठे इसी लिये इन्होंने तुम्हें फोन नहीं किया होगा, नही तो यह ऐसा नही करते, तब मैंने जाना कि दीदी तुम्हें कितना समझती है। मैंने उन से कहा कि मैं शर्मिदा हूँ तो वह बोली कि तेरी चाहत में किसी तरह का लालच दिखाई नही देता। जब दो लोगों के मन मिलते है तो तीसरा कुछ नही कर सकता।

मुझे पता है कि मेरी जगह इन के जीवन में क्या है? वह कोई छीन नही सकता। अगर तुम दोनों एक दूसरे को चाहते हो तो मुझे इस में कोई आपत्ति नहीं है। आगे तुम दोनों ने देखना है। इस के बाद ही तो मैंने यहाँ आने का प्लान किया था। मैं हैरान हो कर सब सुनता रहा। माधुरी मेरी हैरानी समझ कर बोली कि मैंने तुम से कहा था ना कि हम औरतों को भगवान ने छटी इंद्रिय दी है हम से कुछ नही छुप सकता।

मैं अवाक् हो कर उस की बात सुन रहा था। कुछ नशे में तो हम दोनों ही थे। वह बोली कि उस दिन मेरे मन से एक बड़ा बोझ उतर गया कि मैं दीदी को धोखा दे रही हूँ। हम दोनों के बीच सामंजस्य बन गया है। तुम्हें उसे बनाये रखना है। इस में गलती नही होनी चाहिये, हम दोनों के व्यवहार में कभी ऐसा नही होना चाहिये की दीदी को लगे की हम उन्हें नजर अंदाज कर रहे है।

मैंने कहा कि मेरे घर की तो वह मालकिन है। माधुरी बोली कि फिर से बातें, मैंने कहा कि बातें नही है सच है वही सब कुछ करती है मैं तो बस करता रहता हूँ । अब तुम दोनों में सब तय हो गया है तो मेरी चिन्ता भी कम हो गयी है। लोगों की बातों की आदत डालनी पड़ेगी वही सबसे ज्यादा बखेड़ा खड़ा कर सकते है। माधुरी ने कहा कि मुझे किसी की परवाह नही है तुम्हारे और दीदी के सिवा। यह सुन कर मैं चुप हो गया।

आज इतने सारे रहस्य मेरे सामने आ रहे थे कि मेरी बुद्दि ने काम करना बंद कर दिया था। मैं आँखे बंद कर के लेट गया। माधुरी भी मेरे साथ लेटी रही उस ने कुछ नही किया क्यों कि अब किसी बात की जल्दी नही थी। जब जो होना है सो होगा। मानसिक आघात के कारण और नशे के कारण मेरी आँखें मुंद रही थी सो मैं उन्हें बंद करके लेटा रहा।

माधुरी की हालत भी शायद मेरी तरह थी वह भी लेटी हूँई थी। हम दोनों एक-दूसरें से बात भी नही कर रहे थे। कुछ देर बाद मैंने करवट बदल कर चेहरा माधुरी की तरफ कर लिया। मेरे हाथ उस के चेहरे पर गये और मैंने उसे अपनी तरफ कर लिया इस से शायद उस की तृन्दा टुट गयी और वह मेरे से लिपट गयी। हम दोनों एक-दूसरें से लिपटे कब तक पड़े रहे पता नही।

माधुरी का हाथ मेरे ट्रेकसुट के पायजामें के अन्दर जा कर अपनी मनपसन्द चीज को ढ़ुढ़ रहा था जब वह उसे मिल गयी तो वह उसे सहलाने लगी। मेरे हाथ भी उस की गोलाईयों को नापने में लगें थे। माधुरी ने मेरा पायजामा उतार दिया। मैंने भी उस के साथ यहीं किया। हम दोनों अपनी मनपसद चीज को सहला रहे थे। अगला नम्बर हमारे अन्तरवस्त्रों का था वह भी पंजों से नीचे उतर गये। अब मैदान खाली था मेरी उंगलियाँ उस की गहराईयों में गोते लगा रही थी तथा वह मेरी उंचाई को नाप रही थी। इस के कारण हमारें शरीरों में उत्तेजना का स्तर बढ़ रहा था। जब बर्दास्त नही हुआ तो मैंने अपनी पोजिशन बदल ली अब दोनों को आराम था।

मैं अपनी मनपसंद चीज का स्वाद ले रहा था तथा वो अपनी पसंदीदा चीज का। मेरी जीभ उस की गहराई का स्वाद चख रही थी इसके बाद वह उस की योनि के बाहरी होंठों को चुम कर उसकी भंग को चाटने लगी। माधुरी ने इस के कारण मेरे चेहरे को अपने पाँवों से जकड़ लिया था। उस के मुँह के अन्दर मेरा लिंग था तथा वह उसे लालीपॉप की तरह से चुस रही थी। मेरी जाँघों के मध्य उत्तेजना का स्तर हद से ज्यादा हो गया था जब मुझ से बर्दास्त नही हुआ तो मैंने अपने को उसकी टांगों में बीच बिठा कर उस की योनि के मुँह पर लिंग का मुँह लगा कर धक्का दिया।

नमी की वजह से किसी प्रतिरोध के बिना वह गहराई में समाता चला गया। जब वह तली में पहुँचा तो उस के प्रहार के कारण माधुरी के मुँह से आहहहहहहह उहहहहहहहहहहहह अईईईईईईई निकलने लगा। लिंग बच्चेदानी के मुँह पर धक्का दे रहा था। नीचे से उस के कुल्हें भी उछल कर मेरे कुल्हों का साथ देने लगे। दोनों की गति एक ही रिदम् में हो रही थी। हम दोनों करना कुछ और भी चाहते थे लेकिन गति कम होना ही नही चाहती थी।
 

aidenabhishek

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UPDATE 13

मैंने रुकने की कोशिश की तो माधुरी ने अपनी गति बढ़ा दी। फच-फच की आवाज सारे में गुंजने लगी। जब भी लिंग अंदर जाता तो फच-फच की आवाज आती। मैंने हाथों से उस की जैकट की चैन खोल दी इससे उसके दोनों कपोत आजाद हो गये थे मेरे होंठ उन का स्वाद लेने लगे।

तने निप्पलों को चुसने से पानी सा निकल रहा था। दाँतों के निशान उरोजों पर बन रहे थे लेकिन किसी को कुछ फिक्र नही थी, जो तुफान चल रहा था दोनों उस के बहाव में बहे जा रहे थे। ना जाने कब तक ऐसा चलता रहा हम दोनों गुथ्मगुथ्था हो कर बेड़ पर ऊपर-नीचे होते रहे। बेड भी कराह रहा था।

नशे के कारण कोई भी स्खलित नही हो पा रहा था। गर्मी दोनों के शरीर को जला रही थी। अब यह जलन बर्दाश्त के बाहर हो रही थी। माधुरी मेरे ऊपर बैठी थी और उस के गोल भरे हुऐ कुल्हें मेरे लिंग को अपने में समाने के लिये बेताव हो कर ऊपर-नीचे हो रहे थे।

मैं भी उस के लटकते उरोजों को काट, चुम रहा था। फिर अचानक सब कुछ अंधकार में डुब गया, सब कुछ काला हो गया। ज्वालामुखी के फटने जैसा लगा और मेरे लिंग ने गर्म लावा उस की योनि में छोड़ दिया। उस का प्रतिउत्तर भी मिला। अंदर तापमान काफी बढ़ गया था। दोनों बेहोश से हो कर एक-दूसरें पर गिर गये। जब कुछ होश आया तो अलग हो कर सो गये।

मंगलवार
सुबह जब मेरी आँख खुली तो हम दोनों एक-दूसरे पर पाँव रख कर सोये हुये थे। दोनों के कमर के नीचे के हिस्से गीले पड़े थे। माधुरी से अगड़ाई ली और आँख खोल कर कहा कि मुझे क्या हूआ था? मैंने कहा क्या हूँआ है। कुछ भी तो नहीं, तुम अभी सो कर उठी हो तो वह बोली कि सारा बदन दर्द कर रहा है, जैसे किसी ने मारा हो। कमर के नीचे बहुत दर्द हो रहा है। उठा ही नही जा रहा है। मैंने उसे चुम कर कहा की रानी जी मिलन के बाद के साईड इफैक्टस है। वह मुस्करा कर बोली कि मुझे ही क्यो होते है? मैंने कहा कि जब देर से करोगी तो ऐसा ही होगा। मेरे पेट में मुक्का लगा।

मैंने उसे वापस लिटाया और उस के ऊपर चढ़ गया लिंग को उस की योनि पर लगाया तो वहाँ नमी मिली तो वह बिना किसी परेशानी के अन्दर घुस गया। मैं धीरे-धीरे धक्कें लगाता रहा माधुरी मुझे पहले तो झुठ-मुठ का ठकेलती रही फिर वह भी संभोग का मजा लेने लगी। दोनों दस मिनट बाद स्खलित हो गये। माधुरी बोली कि अब ऐसे परेशान करोगे? मैंने कहा कि तुम्हारे दर्द का यही ईलाज है कि संभोग ज्यादा करा जाये ताकि तुम इस की अभ्यस्त हो जाओं।

मेरी बात पर वह बोली कि कह तो सही रहे हो। मैंने कहा कि नौकरी के दौरान तनाव के कारण सेक्स लाईफ का कबाड़ा हो गया है जवानी तो जाने ही वाली है क्यों ना इस का उपभोग करें, जाने के बाद दूबारा तो आने वाली नही है। मेरी बात सुन कर उस के मुक्के मेरी पीठ पर पड़नें लगें। इसके बाद मैं उस के ऊपर से उठ कर अलग हो गया।

थोड़ी देर बाद मैंने कहा कि अब उठ कर बाहर चलते है दिन निकलने वाला है मेरी बात सुन कर माधुरी भी उठ गयी और हम दोनों कपड़ें पहन कर बाहर आ गये। सूर्योदय होने ही वाला था सारा आकाश लाल रंग का हो गया था, आज हम दोनों फोटों खिचने के मुड़ में नहीं थे, सिर्फ देख कर ही आनंद ले रहे थे। जब सूरज आकाश पर काफी ऊपर आ गया तो माधुरी जा कर पत्नी को भी उठा कर साथ ले आयी सुबह की ठंड़ी हवा बहुत अच्छी लग रही थी। सब इस वातावरण का मजा लेते रहे, मैंने अंदर आ कर चाय का ऑड़र किया और जब चाय आ गयी तो उसे लेकर बाहर आ गया।

दोनों महिलाएँ माहौल का आनंद उठा रही थी मेरी उपस्थिति का उन्हें कोई भान नही था। जब मैंने चाय के लिये आवाज दी तो उनकी तंद्रा टूटी। बोली कि चाय कब आ गयी? मैंने मजाक में कहा कि आयी नही है मगाँई है अब आ कर इसे पी लो नहीं तो ठंड़ी हो जायेगी। दोनों चाय पीने आ गयी।

चाय पीते पीते पत्नी बोली कि इतना मनोरम मौसम है कि यहाँ से वापस जाने का मन नही कर रहा है। माधुरी बोली कि दीदी यहीं पर घर ले कर रह जाते है। ये चले जायेगे दिल्ली, मैंने कहा कि तुम्हारा कॉलेज यहाँ नही आ सकता है इस लिये जब तक यहाँ हो यहाँ का मजा लो फिर वापस चलने की तैयारी करों।

मेरी बात का किसी ने जबाव नही दिया। सब चुपचाप चाय पीते रहे। चाय के बाद नहाने का प्रोग्राम हुआ फिर नाश्ता करने के बाद आज क्या करना है यह तय करने बैठे तो माधुरी बोली कि यहाँ के लोकल बाजार चलते है जो यहाँ से कुछ ही दूर है, आज वहाँ पर कुछ खरीदारी करते है कुछ चीजें तो सोविनियर के तौर पर भी खरीदनी चाहिये। मैंने कहा कि यह तो सही बात है यहाँ तक आ कर अगर लोकल सामान नहीं खरीदा तो गलत होगा, मैं अभी गाड़ी के लिये कह देता हूँ तो माधुरी बोली कि मैंने कल ही कह दिया था कुछ ही देर में वह आता होगा।

हम तीनों बाजार जाने के लिये तैयार होने लगें, कुछ ही देर में गाड़ी वाला आ गया। 6-7 किलोमीटर दूर लोकल कस्बें का छोटा सा बाजार था हम सब उस बाजार में घुमने लगे। पत्नी और माधुरी को हस्तशिल्प की वस्तुऐं मिल गयी वह उन्हें खरीदने के लिये मोलभाव करने लगी। मैं एक छोटी सी दूकान पर किताबें देखने लगा, दूकान छोटी थी लेकिन उस के पास हिन्दी की पुस्तकों का अच्छा सग्रंह था सो मैंने कुछ किताबें खरीद ली, तभी ये दोनों भी मेरे पास आ गयी और माधुरी बोली कि दीदी प्रोफेसर तो मैं हूँ लेकिन आप के पति मुझ से ज्यादा किताबों के शौकिन है पत्नी बोली कि सही शौक है इसी की वजह से तो इन्हें बड़ा फायदा हुआ है।

मेरे चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी। माधुरी शर्मा कर किताबें देखने लगी उसे भी जो पसन्द आयी तो उस ने भी उन्हें खरीद लिया, हमें इतनी किताबें खरीदता देख कर दूकान का मालिक बोला कि आप के कारण कई महीनों की बिक्री आज ही हो गयी है।

मैंने उस से पुछा कि यहाँ की क्या चीज प्रसिद्ग है तो उस ने जबाव दिया कि यहाँ का लकड़ी का काम बढ़िया है आप कुछ भी ले कर जाये लम्बे समय तक आप के उपयोग में आता रहेगा। उस ने एक दूकान का नाम बताया और उस का पता भी बता दिया, उस के अनुसार यहाँ का लोकल अचार भी बढ़िया है वह भी आप ले सकते है। हम उसे धन्यवाद दे कर उस की दूकान से निकल गये।

किताबों को गाड़ी वाले के हवाले कर के हम तीनों उस के बताये पते को पुछते हूऐ लकड़ी के सामान की दूकान पर पहुँच गये। वाकिई में लकड़ी का सामान बहुत मजबुत था दोनों औरतें अपने लिये सामान छाटँने लगी, दोनों को कुछ ना कुछ अपने उपयोग का सामान मिल गया। मैंने कहा कि कुछ छोटे साईज का सामान भी ले लो गिफ्ट देने के लिये सही रहेगा दोनों को मेरा यह सुझाव सही लगा और वह फिर से सामान खंगालने लगी।

मेरी वहाँ कोई जरुरत नही थी सो मैं एक गरम कपड़े की दूकान देख कर उस में चला गया। दूकानदार से सर के लिये एक गरम टोपी दिखाने को कहा तथा औढ़ने के लिये चादर भी मांगी, दूकानदार टोपियाँ दिखा ही रहा खा कि दोनों फिर प्रगट हो गयी और बोली कि हमारे साथ रहने में क्या समस्या है मैंने जबाव दिया कि मेरी वहाँ कोई जरुरत नहीं थी सो मैं यहाँ चला आया।

पत्नी बोली कि क्या खरीद रहें हो? मैंने कहा कि सरदी के लिये टोपी देख रहा था तथा ओढ़ने के लिये चादर भी देख रहा हूँ वह बोली कि आप हमें भी शाल दिखा दे। दूकानदार हम सब को सामान दिखाने लगा। मैंने टोपी खरीदी तो उस का रंग माधुरी ने पसंद किया तथा चादर पत्नी की पसंद की थी। उन दोनों से भी मेरी पसंद से शॅालें भी खरीद ली।

हम सब ने काफी खरीददारी कर ली थी अब भुख लग रही थी सो बाजार में एक होटल देख कर उस में घुस गये और वहाँ पर खाने का ऑडर कर दिया जब तक खाना आया तब तक बातें होने लगी, माधुरी बोली कि यहाँ का हाथ का अचार भी बढ़िया होता है लेकिन कही दिखा नही है हमारी बात सुन कर वेटर बोला की खाना खाने के बाद में आप को किसी के घर पर ले चलुँगा वहाँ पर आप को अचार मिल जायेगा। खाने के बाद हम उस के साथ चल दिये कस्बें के अंदर एक घर में हमें हाथ का बना अचार मिल गया। दोनों से उसे भी खरीद लिया।

अब हमारी शौपिंग हो गयी थी शाम भी हो रही थी सो हम ने वापस चलने का फैसला किया, वापस चले तो मौसम भी खराब हो गया और रिसोर्ट पहुँचते-पहुँचते आकाश काला हो गया जोर की हवा चलने लगी, सारा सामान कमरे में रखवाया ही था कि जोर से बारिश होने लगी। अंधेरा छा गया हम तीनों ने शुक्र मनाया कि जब हम बाजार में थे तब ऐसा मौसम नहीं हुआ।

पत्नी बोली कि यहाँ का बाजार तो बड़ा सस्ता था लकड़ी का सामान कोडियों के मौल पर मिल गया है। मैंने कहा कि गर्म कपड़ें भी सही मिल गये है। माधुरी बोली कि अचार भी अच्छा मिल गया है। वह बोली कि आज का दिन बढ़िया बीता है। बाहर बारिश का शोर बढ़ता जा रहा था। बाहर बैठ कर मौसम का मजा लेने लगे।

मैंने माधुरी से कहा कि यहाँ के सामान को अगर सही से मार्केट किया जाये तो इन लोगों की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है। हस्तशिल्प भी कमाई का बढ़िया साधन हो सकता है वह बोली कि तुम इस पर कुछ काम करो। यह तो तुम्हारा क्षेत्र है। मैंने कहा कि हाँ जा कर इस संबंध में कुछ अवश्य करुँगा अगर भुल जाऊँ तो तुम याद दिला देना। उस ने सहमति में सर हिलाया।

खाना खा कर सोने की तैयारी कर रहे थे तो माधुरी पत्नी से बोली कि दीदी एक बात बताओ ये तुम को भी ऐसे ही परेशान करते है जैसे मेरा दम निकाल देते है। यह सुन कर पत्नी हँस कर बोली कि इन्हें तो अपनी ताकत का ध्यान ही नहीं रहता और भुगतना मुझे पड़ता है मैं तो इन्हें हर समय याद दिलाती रहती हूँ कि जोर से मत करों। यह सुन कर माधुरी मुस्काराई और मेरी तरफ देखने लगी। मैंने अपना मुँह दूसरी तरफ कर लिया मुझे अब समझ आया कि दोनों नें अंदर ही अंदर सब बातें कर ली थी। मैं ही दोनों के बीच में बेवकुफ बन गया।

बिस्तर पर माधुरी के साथ जब संभोग की बारी आयी तो मैंने कहा कि आज आराम करते है तुम काफी थक गयी होगी तो वह मुझे नोचते हुऐ बोली कि इतनी सी बात पर नाराज हो गये? मैंने कहा कि नाराज नही हूँ यही तो कह रहा हूँ कि थक गयी हो आराम कर लो। मेरी बात सुन कर वह मुझ से लिपट गयी और मेरे कान में फुसफुसाई की बहाना करना छोड़ो समय का सदुपयोग करों नही तो महीने भर बाद मौका मिलेगा। फिर मत कहना कि बताया नही? मैंने कहा कि महीने भर बाद क्यों?

वह बोली कि मुझे घर जाना है यहाँ से लोट कर मैं घर चली जाऊँगी तो महीने भर बाद ही वापस आऊँगी, फिर कैसे मिलन होगा। मैं बोला कि मैंने कब मना किया है तुम ही तो रोती रहती हो कि दम निकल गया है, वह मुझे मुक्कें मारती हुई बोली कि तुम कुछ भी नही समझते हम औरतों की ना में ही हाँ होती है। आगे ध्यान रखना।

यह कह कर वह मेरे ऊपर आ गयी और उस के होंठ और हाथ अपना काम करने लग गये। काफी देर तक फोरप्ले चलता रहा जब आग पुरी तरह से धधक गयी तब दोनों के शरीर एक हो गये। रेस शुरु हो गयी कोई हारने को तैयार नहीं था शरीर के अंदर इतनी गर्मी हो गयी कि वह बर्दाश्त से बाहर हो रही थी। तभी अचानक माधुरी ने अपने पाँवों से मेरी कमर जकड़ ली, मेरा सारा शरीर भी अकड़ गया कुछ देर में दोनों स्खलित हो कर हाँफते हूऐ एक-दूसरें की बगल में लेट गये। कुछ देर बाद मैंने शरारत से उस से पुछा कि क्या साबुत बचा है? तो जबाव में उस ने मेरी छाती में मुक्कों की बरसात कर दी। मुझे उस के मुक्कें अच्छे लग रहे थे सो उसे कुछ नही कहा। वह कुछ देर में थक कर सो गयी और मैं भी नींद के आगोश में चला गया


बुधवार
आज हमें वापस लौटना था। इस लिये उठ का दोनों का जगाया और पुछा कि चलने का क्या प्रोग्राम है? माधुरी ने बताया कि 12 बजे से पहले निकलना है इस लिये जल्दी से नहा कर नाश्ता करते है फिर सामान पैक कर के निकल लेते है। मैं फाईनल बिल के लिये कह देती हूँ यह कह कर वह फोन करने लगी मैं नित्यक्रम करने के लिये बाथरुम में चला गया उस के बाद नहाने चला गया, मुझे पता था कि दोनों नहाने में देर करेगी तो मैं पहले ही निबट लिया। दोनों भी जल्दी से नहा कर तैयार हो गयी, जब नाश्ता आया तो हम ने अपना सामान पैक करके रख लिया था, नाश्ता कर के माधुरी बिल देने करने चली गयी तथा मैं सामान को गाड़ी में रखवाने लगा। माधुरी के आने के बाद मैंने वेटरों को टिप दे कर विदा किया तथा हम सब वापसी के सफर पर निकल पड़े।

पहाड़ से नीचे उतरते ही मैदान की गरमी अपना रंग दिखाने लगी। 10 घन्टे के सफर के बाद देर रात घर पहुँचे। गाड़ी से सारा सामान उतारा और गाड़ी वाले की पैमेंट कर के उसे विदा किया। घर आ कर एक अलग ही सुकुन मिलता है।

पत्नी कपड़ें बदलने चली गयी माधुरी मेरे पास आ कर बोली कि तुम ने जो भी खर्च किया है वह बता देना, मैंने कहा कि यही बात मैं तुम से कहना चाह रहा था, पहले ही तय हो गया था कि बाकि खर्चा मैं करुँगा तो वह बोली कि मैं कुछ नहीं हूँ? मैंने कहा कि तुम तो सब कुछ हो लेकिन मैं भी तो कुछ हूँ या नहीं? मेरी बात सुन कर वह हँस पड़ी और बोली की साँस तो लेने तो फिर सारा खर्च बताती हूँ।

वह भी कपड़ें बदलने चली गयी। पत्नी चाय बना लायी, सब लोग चाय पीने लगे तो पत्नी बोली कि कल यह घर जा रही है, मेरे पीछे पड़ी है कि मैं भी चलु, तुम क्या कहते हो? मैंने कहा कि मैं क्या कहूँ जैसा तुम सही समझों, पत्नी माधुरी से बोली कि अभी तो तुम अकेली चली जाओ, जब वापस आयोंगी तो मैं कुछ दिन पहले आ जाऊँगीं फिर हम दोनों वापस एक साथ आ जायेगें। मैंने कहा कि यह सही रहेगा। माधुरी चुप रही।

दोनों अपने कमरों की ओर चल दी। मैं खड़ा सोचता रहा कि कहाँ जाऊँ फिर ध्यान आया कि कल तो माधुरी चली जायेगी तो उस के कमरे में चला गया। वह खड़ी ही थी। मेरे को देख कर मुझ से लिपट गयी। काफी देर तक ऐसे ही लिपटी रही मैंने भी कुछ नही कहा। मैं उस की मनोस्थिति समझ सकता था, लेकिन कर कुछ नही सकता था।

फिर धीरे से उसे अलग करा और उस से पुछा कि हम दोनों के बारें में अपने माता-पिता को कैसे बताऐगी? वह बोली कि यह मुझ पर छोड़ दो। मैंने कहा कि मैं तो ऐसे ही पुछ रहा था। वह बोली कि पिछली बार कुछ इशारा तो कर दिया था। देखती हूँ बाकी बात कैसे समझा पाऊँगी। उन को मेरे ऊपर पुरा विश्वास है।

तुम अपनी बताओ?

मैं क्या बताऊँ?

मुझे लगा कि तुम परेशान हो?

नहीं तो अब क्यों परेशान होऊँगा जब पत्नी को पता चल ही गया है

नहीं कोई और बात हो?

कुछ भी नही है

मेरी तरफ से चिन्ता मत करो मैं संभाल लुँगी

बढ़िया

मैंने उसे बाँहों में ले कर चुमा और कहा कि जब तुम मेरी हो तो तुम्हारी समस्या भी मेरी हुई ना, इसी लिये पुछा था, बुरा मत मानना, वह बोली कि आज तक कोई पुछता ही नहीं था इस लिये कैसे रियेक्ट करना है यह पता ही नही था, तुम बुरा मत मानना। मैंने कहा कि बुरा तो जब मानुँगा जब तुम कुछ बताऔगी नही।

यह कह कर मैंने अपने होंठ उस के लबों पर रख दिये और उसे उठा कर बेड पर लिटा दिया और फिर दोनों में प्यार शुरु हो गया। जब खत्म हुआ तो माधुरी ने कहा कि इतनी थकाऊँ यात्रा के बाद भी तुम में इतनी ताकत बची थी कि सारे जोड़ हिला कर रख दिये है। मैंने उस के कान में कहा कि जब जोड़ों में दर्द हो तो मुझे याद कर लेना। मेरी इस बात पर मेरी पिटाई शुरु हो गयी।
 

aidenabhishek

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UPDATE 14

सुबह मैं तो ऑफिस के लिये निकल गया कुछ देर बाद माधुरी भी पहले अपने घर गयी और फिर वहाँ से कार से माता-पिता के पास जाने के लिये निकल गयी। दोपहर बाद उस का फोन आया कि वह घर पहुँच गयी है। ज्यादा बात नहीं हो पायी। घर लौटा तो पत्नी ने खाने के समय पुछा कि तुम मुझे यह सब कुछ नही बता सकते थे, मुझे माधुरी के मुँह से सुनना पड़ा। मैं चुप रहा, वह बोली कि जब बोलना चाहिये तब तो मौन व्रत धारण कर लेते हो। मैंने कहा कि तुम्हें बताने की कोशिश कर ही रहा था कि यह सब कुछ हो गया और तुम्हें खुद ही पता चल गया। शायद मेरे पास कुछ कहने को है ही नही।

पत्नी बोली कि मुझे पता है कि तुम ने इस से पहले कितने आकर्षणों को नकारा है इस बार क्या हुआ तुम ही बता सकते हो? मैंने कहा कि मुझे खुद पता नहीं चला कि कब यह सब हो गया? ऐसे आकर्षण तो मैं रोज ही नकारता हूँ शायद यह मन से मन मिलने की बात है, खाली शरीरिक आकर्षण नहीं है। इस लिये कदम बहक गये है। वह बोली कि कदम बहकें नहीं है सिर्फ किसी और के साथ चल रहे है।

तुम्हारा मानसिक अकेलापन मेरे से दूर नहीं हो पाया होगा तभी तो ऐसा हुआ है नहीं तो तुम तो अपनी हर बात मुझे बताते हो। शायद मैं मित्र नहीं बन सकी, माधुरी मित्र बन कर प्रेयसी बन गयी। मैं नाराज नहीं हूँ क्योकि मुझे पता है कि मेरा पति धोखेबाज नही है जो कुछ करता है सबके सामने करता है। इसी लिये मैंने माधुरी को अपना लिया है।

वह भी बड़ी चोट खायी हूई है कुछ बताती नही है तुम्हें कुछ बताया है? मैंने कहा मैंने कुछ पुछा ही नहीं है जब उस का मन करेगा तब बता देगी। मुझे उस के अतीत से कोई मतलब नही है। पत्नी बोली कि अब से उस का ख्याल रखना हम दोनों की जिम्मेदारी बन गयी है। वह अब इस परिवार का हिस्सा है।

मैंने सर हिलाया, वह बोली कि रोज उस से बात कर लिया करना वरना वह नाराज हो जायेगी। मैं तो ज्यादा बात तुम से करती नहीं हूँ वह तो कर लेती होगी। मैंने सर हिलाया तो वह बोली कि पत्नियाँ अपने पतियों से ज्यादा बातें क्यों नही कर पाती यह बात मुझे अब तक समझ नही आयी है। मैं चुप रहा।

रात को जब दोनों सोने लगे तो दोनों ने प्रेम के सागर में गहरे गोतें लगाये। मुझे लगा कि पत्नी भी अब बदल रही है तथा प्रेम का आनंद लेने लगी है। अपने तो मजे थे। दोनों तरफ से प्यार मिल रहा था।

तीन हफ्ते बाद मैं जब पत्नी को हापुड़ छोड़ने जा रहा था तब हम दोनों रास्ते में इस बात पर विचार करते रहे कि क्या मुझे माधुरी के घर जाना चाहिये। पत्नी की राय थी कि इस बारें में माधुरी से पुछ सकते है जैसा वह कहेगी वैसा ही कर लेगें। मैंने कहा कि तुम्हारें बारें में तो वह लोग जानते है मेरे जाने के बारें में ही दुविधा है कि ना जाने वह कैसा रियेक्ट करे? मैंने कहा कि जैसा भी रियेक्ट करेंगे देखा जायेगा जब सिर ओखली में दे ही दिया है तो मुसल से क्या डरना है।

मेरी यह बात सुन कर पत्नी बोली कि तुम तो हर बात को ऐसे ही सुलझा लेते हो। मैंने कहा कि कोई और चारा भी नही है। एक ना एक दिन तो मुझे और उन्हें एक-दूसरे का सामना करना ही पड़ेगा फिर अभी क्यों नही। मेरी बात सुन कर पत्नी चुप रही। उस के घर पहुँच कर बैठे ही थे कि माधुरी का फोन आ गया उस ने कहा कि आप दोनों शाम को मेरे घर पर रात के खाने के लिये आ रहे हो। अब तो कुछ हो नही सकता था उस ने ही कार्यक्रम तय कर दिया।

हम दोनों शाम को उस के घर पर पहुँचे, बड़ा मकान था, एक मंजिला घर था जैसे मुझे पसन्द है। गाड़ी खड़ी करके जब उस के माता-पिता से मिलने के लिये कमरे में घुसे तो मुझे पसीने आ रहे थे। मैंने झुक कर दोनों के पाँव छु लिये और सामने के सोफे पर बैठ गया। माधुरी बोली कि आप तो इस तरफ कभी नही आये होगें, मैंने कहा कि मैं तो बस एक दो जगह ही जानता हूँ ज्यादा रहने का समय नही मिलता, ससुराल वाले इस वजह से नाराज भी रहते है लेकिन नौकरी के चक्कर में रुकना हो ही नहीं पाता। इस तरफ तो कभी नहीं आया हूँ।

उस के माता-पिता से औपचारिक बातचीत करके माधुरी हमें मकान दिखाने के लिये ले गयी। सारा मकान देखने के बाद मैंने कहा कि छत दिखाई। यहाँ के मकानों की छत की रौनक अलग ही होती है यह सुन कर वह हम दोनों को छत पर ले गयी। बहुत बड़ी छत थी एक दम सपाट पीछे शायद किसी का बाग था सो भीनी सी खुशबु हवा में थी।

हम तीनों कुछ देर तक युं ही खड़े रहे, फिर मैंने कहा कि यहाँ आ कर मुझे अपनी ननसार याद आ गयी है वहाँ भी छत ऐसी ही थी सपाट तो नही थी लेकिन काफी बड़ी थी। रात को ठंड़ी हवा में उस पर सोने का मजा ही कुछ और था। पत्नी बोली कि बड़े शहरों में तो हवा ही साफ नहीं है छत पर कैसे सोये? कुछ देर तक ऐसे ही बातचीत करते रहे इसी बीच माधुरी की माँ की आवाज आ गयी कि खाना खा लो। यह सुन कर हम सब नीचे चले आये।

माधुरी की माँ ने खाने की काफी तैयारी कर रखी थी। माधुरी ने भी उन की काफी सहायता की होगी, ऐसा मुझे खाना खाते लगा। मैंने उन से पुछा कि माधुरी ने खाना आप से सीखा है। तो उन्होंने बताया कि मेरे से नहीं सीखा है, जब नौकरी करने के लिये घर से बाहर निकली है तब सीखा है। इस से पहले तो इसे पढ़ाई से ही फुरसत नही थी, खाना बनाना क्या सीखती।

मैंने कहा कि अब तो अच्छा खाना बना लेती है। माधुरी मेरी तरफ देख कर बोली कि माँ ऐसे ही प्रशंसा कर रहे है दीदी तो बहुत बढ़िया खाना बनाती है। मैंने उन्हें बताया कि इस को भी विवाह के समय कुछ बनाना नही आता था। यह भी पढ़ाई में मशगुल रहने के कारण इस तरफ ध्यान नहीं दे पायी लेकिन शादी के बाद इस ने मेरी माँ से खाना बनाना सीखा है। अब तो काफी बढ़िया बनाती है।

माधुरी के पिता जी इस बातचीत में भाग नहीं ले रहे थे। मैं उन की अवस्था समझता था। खाने के बाद मीठा खाने की बारी आयी तो माधुरी बोली कि आप को आइसक्रीम खिलाती हूँ, यह कह कर वह रसोई में चली गयी। उस के पीछे से माधुरी की माँ मुझ से बोली कि इस का ध्यान रखना, इस ने बड़ें दूख देखे है, कभी तो लगता था कि इस की जिन्दगी में भगवान सुख लिखना ही भुल गया है लेकिन अब कुछ समय से इस के होंठों पर हँसी है मन में उमंग है, इस की खुशी में ही हमारी खुशी है, हम तो इसे खुश देख कर बहुत प्रसन्न है। तुम दोनों की बड़ी प्रशंसा करती है कहती है कि मुझे तो मेरी दीदी मिल गयी है मेरी अपनी छोटी बहन की तरह से देखभाल करती है।

पत्नी बोली कि माधुरी ने भी मेरी बहुत देखभाल की है जब मैं बीमार थी। माधुरी तो हमारे घर की सदस्य ही है। आप उस की चिन्ता ना किया करें। हम दोनों उस की चिन्ता करते रहते है। पत्नी की बात सुन कर उन की आँखों में नमी देखी मैने। मैंने अपने हाथ बढ़ा कर उन के हाथों को थपथपाया और कहा कि उस की चिन्ता मत करिये हम है। मैंने कहा कि माता-पिता के लिये तो बच्चें कितने भी बड़े हो जाये बच्चे ही रहते है लेकिन कुछ चीजे उन पर ही छोड़ देनी चाहिये। वह संभाल लेते है। गल्तियाँ करते है लेकिन फिर उन्हें सुधार भी लेते है।

तभी माधुरी आइसक्रीम ले कर आ गयी और अपने पिता से बोली कि यह तो बहुत आइसक्रीम खाते है इन के साथ ही मैंने दूबारा से खानी शुरु की है। मैंने देखा कि इस बात से उन के चेहरे पर मुस्कराहट आई। मुझे यह देख कर अच्छा लगा। वातावरण हल्का हो गाया था। सब लोग आइसक्रीम का आनंद लेते रहे। रात काफी हो रही थी तो पत्नी बोली कि अब हम चलते है। यह कह कर हम दोनों उठ गये, मैंने हाथ से माता-पिता को हमें विदा करने के लिये बाहर आने से रोक दिया। माधुरी हमारे साथ बाहर तक आयी, बाहर आ कर बोली कि दीदी इन्होंने तो मेरी बहुत बड़ी समस्या हल कर दी।

मैंने माता-पिता की आँखों में इन के लिये आदर देखा है अब मैं उन की तरफ से निश्चित हुँ और शायद वह भी चिन्ता मुक्त हो गये होगे कि उन की लड़की ने कैसा आदमी पसन्द किया है? आज आप दोनों का आना बहुत जरुरी था। पत्नी ने उसे गले से लगाया और हम दोनों उस के घर से गाड़ी की तरफ चल दिये। गाड़ी में बैठ कर जब ससुराल की तरफ जा रहे थे तो पत्नी बोली कि माधुरी की तो समस्या हल हो गयी लेकिन मैं अपने घर वालों को क्या बताऊँ? मैंने कहा कि यही बताओ कि इन की दोस्त है। मेरी भी दोस्त बन गयी है। इस से ज्यादा कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। मेरी बात सुन कर उस ने सर हिला दिया।

दूसरे दिन मैं दिल्ली के लिये वापिस लौट आया। पुरा हफ्ता कब गुजर गया पता ही नही चला। शनिवार को दोनों जनी वापिस आ गयी। पत्नी ने माधुरी को जाने नही दिया और कहा कि कुछ दिन यही रहो। तुम से कुछ काम है। माधुरी रुक गयी। मैं तो पुरे हफ्ते का थका था सो उस दिन मैं पत्नी के साथ सोया लेकिन रात बिना किसी गतिविधि के बीत गयी। दिन भर दोनों ने खाना बनाया और घर की सफाई की। मैं सारे दिन टीवी देखता रहा। मेरे करने लायक कोई काम नही था।

रात को माधुरी के साथ उस के कमरे में सोने गया तो वह मुझ से लिपट कर रोने लगी। मुझे समझ नही आ रहा था कि क्या हुआ है? उस के आँसु मेरी छाती भीगों रहे थे । मैंने उसे रोने दिया जब उस का मन हल्का हो गया तो वह बोली कि मैं आप के ऋण को कैसे चुकाऊँगी, मैंने पुछा कि कौन सा ऋण तो वह बोली कि आप समझ नही सकते की उस दिन आप ने मेरे घर आ कर और मेरे माता-पिता को मान दे कर मुझ पर कितना बड़ा अहसान किया है।

मैंने कहा कि तुम्हारें माता-पिता का आदर करना मेरा कर्तव्य है। किसी के भी माता-पिता आदर के पात्र होते है, सम्मान के अधिकारी होते है मैंने कुछ नया नहीं कर दिया। वह बोली की उस दिन के बाद उन के चेहरे पर रौनक लौट आयी है। नही तो हर समय मेरी चिन्ता में घुलते रहते थे। उन की चिन्ता तुम्हारें और दीदी के शब्दों ने खत्म कर दी।

मैं उस की पीठ सहलाता रहा। जब वह चुप हो गयी तो उस की और मेरी भुख जग गयी और हम उसे बुझाने में लग गये। महीने भर मुझ से दूर रहने के कारण माधुरी कुछ ज्यादा ही प्यासी थी सो उस रात को तीन-चार बार संभोग हुआ तथा जब इस से भी मन नही भरा तो गुदा मैथुन भी कर लिया। सुबह उठने के बाद एक बार फिर से प्यास बुझाई गयी।

सुबह जब माधुरी घर में चल रही थी तो मैंने देखा कि वह लगड़ा रही थी, मुझे कुछ समझ में नहीं आया, ना ही मैं उस से कुछ पुछ पाया, लेकिन यह बात पत्नी की आँखों से नही छिप सकी। उस ने उस समय तो कुछ नही कहा लेकिन बाद में मुझ से अकेलें में पुछा कि रात को क्या हुआ था। मैंने अचरज से उसे देखा तो वह बोली कि जो पुछ रही हूँ उस का जबाव दो? मैंने बताया कि कुछ ज्यादा ही हो गया था।

वह बोली कि कितना ज्यादा तो मैंने कहा कि शायद पाँच बार और एक बार पीछे से भी। यह सुन कर उस ने कहा कि माधुरी की तो मैं समझ सकती हूँ लेकिन तुम तो समझदार हो उस की तथा अपनी तबीयत की कुछ तो चिन्ता करनी चाहिये थी। दोनों को कुछ हो जाता तो? मैंने नजरें झुका कर कहा कि पता नही कल क्या हूआ था कि अपने आप पर कंट्रोल ही नही हो पा रहा था। उस ने कहा कि उस का परिणाम यह है कि माधुरी सीधी तरह से नही चल पा रही है लगता है कि जैसे नवविवाहिता का सुहागरात के बाद जैसा हाल होता है वैसा हाल है उस का।

उस ने कुछ देर चुप रह कर कहा कि मैं कुछ बोलना नहीं चाहती थी लेकिन अब बात काबु से बाहर जा रही है आज से तुम माधुरी के साथ नही सोयोगें। वह कुछ दिन मेरे पास सोयेगीं। इस से तुम दोनों को आराम मिलेगा। कोई भी बीमार पड़ गया तो परेशानी तो मेरी ही होगी। दोनों ऐसी हरकतें कर रहे हो जैसे कोई साल दो साल बाद मिले हो।

उस की बात सही थी, संभोग की दोनों को आदत थी इस लिये ऐसा होना गलत था दोनों को शारीरिक नुकसान उठाना पड़ सकता था। मैंने सर हिला कर कहा कि अब मैं उस के साथ नही सोऊँगा। तभी माधुरी भी आ गयी हम दोनों उसे देख कर चुप हो गये लेकिन वह समझ गयी थी कि हम क्या बात कर रहे थे। वह चुपचाप आ कर पत्नी के पास बैठ गयी।

मैंने पुछा कि दर्द का क्या हाल है? तो जबाव मिला की चला नही जा रहा है। मैंने कहा कि कोई पैनकिलर ले लो शायद आराम पड़ जाये। मेरी बात खत्म होने के बाद पत्नी माधुरी से बोली कि मैं इन से कह रही थी कि ये कुछ दिन अकेले सोयेगे। तुम मेरे साथ सोना।

माधुरी सिर नीचा किये पत्नी की बात सुनती रही। पत्नी ने कहा कि चाहे तुम दोनों को मेरी बात बुरी लगे लेकिन मैं तुम दोनों को इस तरह बीमार पड़ते नही देख सकती। इसी लिये तुम दोनों के बीच मुझे आना पड़ा है। मैंने पत्नी से कहा कि हम दोनों से गल्ती हुई है अब आगे से ध्यान रखेगे कि हमारे मन चाहे कितने ही जवान हो लेकिन शरीर जवान नही रहे है उन की सहन सीमा से बाहर जा कर कुछ करेगें तो उस के फल भोगने पड़ेगे। यह कह कर मैं उन दोनों को अकेला छोड़ कर कमरे से बाहर निकल गया।

मेरी भी हालत खराब थी कल रात को इतना अधिक संभोग करने के बाद सारा बदन टुट रहा था लग रहा था कि किसी ने पुरे शरीर को बुरी तरह से पीटा है पोर-पोर दुख रहा था। अपनी परेशानी तो मैं किसी को बता नही सकता था लेकिन पत्नी तो सब कुछ बिना बताऐ ही जान जाती है। सो उसे सब कुछ पता चल गया था। ऑफिस से दो दिन की छुट्टी ले ली। सारे दिन आराम करता रहा। माधुरी शर्म के कारण पास भी नही आयी थी।

रात को खाने पर जब तीनों बैठे तो पत्नी बोली कि मेरी भी पहले पहल ऐसी ही हालत होती थी लेकिन इस बात के लिये समय नही मिलता था। सो कुछ ज्यादा कर नही पाते थे। वह हँसी और बोली कि अब दोनों मुस्करा तो दो। ऐसे चेहरे बना कर क्यों बैठे हो? सब सही हो जायेगा। अति सर्वत्र वर्जयते ऐसा संस्कृत में कहा गया है।

उस की बात पर माधुरी बोली कि दीदी आप भी साहित्य की भाषा पर उतर आयी? पत्नी बोली कि भई मैं भी कई साल कॉलेज में पढ़ा कर आई हुँ। माधुरी ने आश्चर्य से पत्नी को देखा तो वह बोली कि शादी के बाद नौकरी छोड़नी पड़ी थी। माधुरी बोली कि इन की किस्मत में पढ़ाने वाली ही हैं। मैंने कहा कि मास्टरनियाँ ही मिली है जो मुझ पर रौब चलाती है। मेरी बात पर दोनों हँसने लगी। माहौल का तनाव चला गया था।

मैंने पत्नी से पुछा कि माधुरी जब तुम्हारें घर आयी थी तो तुम्हारें माता-पिता का क्या रियेक्शन था? वह बोली कि कुछ खास नही, उन्हें बता दिया था कि तुम्हारी दोस्त है यही रहती है मुझ से मिलने आयी है। माधुरी बोली कि आप ने तो सब को बोतल में उतार रखा है, वह दोनों भी अपने दामाद की प्रशंसा ही कर रहे थे।

बोल रहे थे कि ऐसा दामाद मिला है कि जब आते है तो पता ही नहीं चलता है कि दामाद है या लड़का है। दीदी क्या बात है आपके पति में कि सब पीठ पीछे भी इन की प्रशंसा ही करते है। पत्नी बोली कि मुझे तो कुछ ऐसा लगता नही है, लेकिन यह तो है कि ये वहाँ जा कर अपने लिये किसी खास व्यवहार की अपेक्षा नही रखते है जैसा मिलता है खा लेते है कुछ कहते नही है। शायद यही बात उन्हें अच्छी लगती है।

माधुरी बोली कि मेरी माँ भी कह रही थी कि बड़ा अच्छा व्यवहार है दिल जीत लेता है। मैंने कहा कि अब यह सब सुना कर मुझे चने के झाड़ पर मत चढ़ाओ। जमीन पर ही रहने दो, हम एक में अच्छाईयाँ, बुराईयाँ होती है। दुसरों के साथ कैसा व्यवहार करना है यह परिवारिक संस्कारों की देन है। जैसा अपने बड़ो को करते देखा है वैसा ही मैं करता हूँ कुछ खास नही करता। अपने से बड़ों को आदर देना मैंने अपनी माँ से सिखा है।

दोनों चुपचाप मेरी बात सुनती रही। माधुरी फिर पत्नी को संबोधित करती हुई बोली कि हम दोनों की वजह से आप को दूख हुआ है उस के लिये मैं आप से क्षमा माँगती हूँ। आगे से ऐसा कुछ नही होगा जिस से आप के दिल को दूख पहुँचे। मुझे अपने व्यवहार को संयमित करना सीखना पड़ेगा। यह सुन कर पत्नी बोली की क्षमा मत माँग। आगे से ध्यान रखो कि तुम दोनों की सेहत पर कोई बुरा असर ना पड़े। मेरी तो यही चिन्ता है कि तुम दोनों सही रहो, तभी मैं भी सही रह सकती हूँ।

मैं उठ कर पत्नी के पास गया और उस के पाँव के पास बैठ गया और उस के हाथ पकड़ कर बोला कि इस बार के लिये माफ कर दो। मेरी तरह ही माधुरी भी उस के पाँव के पास बैठ कर उस के हाथ दबाने लगी। पत्नी ने हम दोनों को अपने से चुपका लिया। हम तीनों एक दूसरे के लिपटे बैठे रहे। फिर पत्नी बोली कि चलो रात हो रही है सोने चलते है। यह कह कर वह माधुरी का हाथ पकड़ कर उसे साथ लेकर चली गयी। मैं भी माधुरी के कमरें में चला आया। थकान हो रही थी सो लेटते ही नींद आ गयी।

सुबह उठा तो देखा कि माधुरी चाय लेकर आ रही थी। मैंने उसे ध्यान से देखा तो उसकी चाल में अभी भी लड़खड़ाहट थी, वह मुझे घुरते देख कर बोली कि चाय पीलो और अपनी हालात बताओ, मुझे पता है कि तुम भी सही नही हो। मैंने कहा कि हाँ कल तो ज्यादा ही थकान थी पोर-पोर दर्द कर रहा था, सोने के बाद अब कुछ आराम है। वह बोली कि मुझे तो यह नही पता चलता कि तुम में इतनी ताकत कहाँ से आती है।

दीदी भी यही बात कह रही थी कि पता नही इतनी ताकत कहा से आयी होगी? मैंने हँस कर कहा कि प्रेम की ताकत है और कुछ नही है। जब किसी से लगाव होता है तो शरीर सब कुछ करने को तैयार हो जाता है। मन की ताकत है वही सब करवाता है। मैं भी आचंभित हूँ कि हम दोनों ने ऐसा कभी नही किया था लेकिन उस दिन तो हद ही पार कर दी थी। सुबह भी संभोग कर मारा।

अब कमर में दर्द हो रहा है। पिड़लियाँ भी दर्द कर रही है। तुम बताओ कहाँ-कहाँ दर्द है वह बोली कि यह पुछो कि कहाँ पर दर्द नही है, कमर, जाँघें, छाती, कंधें, गरदन, होंठ, योनि, पीछे की तरफ सब तरफ दर्द ही दर्द है। दीदी ने अच्छा किया कि हमें अलग कर दिया नहीं तो हम कहाँ मानने वाले थे फिर घमा चौकड़ी मचाते। मैंने उस की बात से सहमति में सर हिलाया। माधुरी बोली की बैठने में भी दर्द हो रहा है। किस करवट लेटू समझ नही आ रहा है? गोली के कारण दर्द कम होता है फिर हो जाता है।

मैंने कहा कि मैं तो सोच रहा हूँ कि गरम पानी की बोतल से सिकाई कर लुँ जल्दी आराम मिलेगा। यह सुन कर बोली कि हल बहुत जल्दी मिल गया कल नही बता सकते थे? मैंने कहा कि कल तो दिमाग चल ही नही रहा था लेकिन अब तुम्हें देख कर चलने लगा है। वह बोली कि अभी भी आदत से बाज नही आ रहे हो। मैंने कहा कि सच्चाई बताओं तो भी मुसीबत है क्या करें? मैंने माधुरी से कहा की अपनी दीदी से पुछ कर गरम पानी की बोतल निकाल कर उस में पानी भर कर सिकाई कर लो और मुझे भी दे देना। मैं तो पानी गरम कर के नहाता हूँ शायद कुछ आराम मिले। माधुरी बोली की यह सही रहेगा कि गर्म पानी से नहा कर देखते है शायद आराम मिले।

वह चाय रख कर चली गयी। मैं चाय पीने के बाद बाथरुम में गीजर ऑन कर आया। फिर कुछ देर बाद नहाने के लिये चला गया। गर्म पानी से नहा कर शरीर की थकान कम हो गयी, शरीर में खुन का प्रवाह बढ़ गया, नहा कर अच्छा लगा। माधुरी को बताने गया कि गीजर में पानी गर्म कर दिया है नहा ले। पत्नी को कहा कि गीजर में नहाने के लिये पानी गर्म किया था वह गल्ती से ना नहाने चली जाये।

वह बोली कि यह आइडिया कल क्यों नही आया था? मैंने कहा कि जब अक्ल आ जाये तभी गनीमत समझनी चाहिये। माधुरी मेरी बात सुन कर नहाने के लिये चली गयी। पत्नी बोली की आइडिया तो बढ़िया है गर्म पानी की बोतल से सिकाई भी फायदा करेगी। आज दोनों दिन भर यही करो। यह कह कर वह हँसती हुई किचन की तरफ चली गयी।

गर्म पानी से नहाने से शरीर की थकान कम हो गयी रक्त संचार बढ़ गया तथा हॉट बॉटल से सिकाई से दर्द में राहत मिली। मुझे तो अगले दिन ऑफिस जाना था सो मैं तो दूसरे दिन ऑफिस चला गया। तबीयत सही नहीं थी इस लिये ज्यादा कुछ कर नही रहा था, तभी मेरी एचआर आई और पुछने लगी कि सर अब आप की तबीयत कैसी है? मैंने कहा कि कुछ सही है तो वह बोली कि आप ऑफिस आये क्यों छुट्टी एक्सटेंड कर लेते। मैंने कहा कि घर पर लेटे लेटे बोर हो रहा था सो चला आया।

वह कुछ देर मुझे ध्यान से देखती रही फिर चली गयी। मुझे उस का इस तरह देखना अजीब लगा लेकिन फिर मैं यह बात भुल गया और काम में डुब गया। शाम को घर पहुँचा तो लगा कि अभी भी बदन दर्द कर रहा है सब कुछ सही नही है। फिर अपने एक डॉक्टर दोस्त को फोन करके समस्या बताई तो वह बोला कि गर्मी के कारण ज्यादा थकान लग रही है कुछ ठंड़ा पियो। दो पैन किलर बताई की इन्हें दो-तीन दिन खा लो सब सही हो जायेगा। मुझे उस की बात सही लगी। गर्मी के कारण भी ऐसा हो सकता था दोनों के शरीर उस दिन बहुत गर्म हुये थे इसी वजह से यह हो रहा है।

मेडीकल स्टोर जा कर दवा ले आया और माधुरी को भी दवा दे दी और उसे बताया कि डॉक्टर की क्या राय है वह भी मेरी बात से सहमत थी, बोली कि जब बाहर गये थे तो कुछ ठंड़ा पीने को ले आते तथा आईसक्रीम भी ले आते खा कर कुछ राहत मिलती, मुझे माधुरी की बात सही लगी तो कोल्ड ड्रिक तथा आईसक्रीम लेने बाजार चला गया। दोनों चीजें ले कर लौटा तो पत्नी ने दरवाजा खोला मेरे हाथों में कोल्ड ड्रिक देख कर बोली कि यह क्या ले आये?

मैंने अंदर आ कर उसे सारी बात बताई तो वह बोली की डॉक्टर सही कह रहे है। रात के खाने के बाद ठंड़ी कोल्ड ड्रिक और आईसक्रीम की पार्टी चली, शरीर को इन सब से अंदर से राहत मिली। नींद सही आयी और सुबह ऑफिस में भी दिन अच्छा कटा। रात को घर आ कर माधुरी से उस के बारें में पुछा तो वह बोली की दर्द अब कम है आराम है। सही फिल हो रहा है। मैंने मन ही मन सोचा कि यह विरह की आग है इस में जो जल कर ही मुक्ति मिलती है।

पुरा हफ्ता कब बीत गया पता ही नहीं चला। शनिवार को माधुरी बोली कि मुझे कॉलेज जाना है सोमवार से सो मैं आज घर जाना चाहती हूँ, घर की सफाई भी करनी पड़ेगी इस लिये कफी काम करना पड़ेगा। पत्नी बोली की चली जाओ लेकिन देख लो कि तबीयत सही है या नहीं? ऐसा ना हो कि फिर बीमार पड़ जाओं, यह सुन कर माधुरी पत्नी से लिपट कर बोली कि दीदी इतनी चिन्ता मत करो। बड़ी हूँ मैं अब सही हूँ। सब कुछ संभाल लुँगी अगर ज्यादा चिन्ता है तो तुम मेरे साथ चलो। यह सुन कर पत्नी बोली कि चली चलती लेकिन फिर इन को कौन देखेगा? पत्नी बोली कि तुम आज जा कर घर साफ कर लो कल हम तुम्हारें पास आते है।

यह सुन कर माधुरी खुश हो गयी और अपना सामान लेने चली गयी मैंने उस का सामान उस की गाड़ी में रखने में सहायता की वह गाड़ी निकाल कर घर के लिये निकल गयी। घर में जब हम पति-पत्नी अकेले हुऐ तो वह मुझ से बोली कि मेरे साथ तो तुम एक बार में ही थक कर सो जाते हो लेकिन माधुरी के साथ इतनी बार करने से थके नही। मैं उस की बात सुन कर बोला कि अब तानें देना बंद करों तुम्हारे साथ भी तो एक ही रात में कई बार संभोग किया है या नहीं? वह कुछ सोच कर बोली कि लेकिन इस बात को तो काफी समय बीत गया है।

मैंने कहा कि चलों आज रात को ही ट्राई कर के देखते है मेरी बात सुन कर वह बोली कि तुम्हारी बदमाशी नहीं जाती, बेचारी माधुरी तो ऐसे ही पीस गयी है। मैंने कहा कि तुम औरतें हर समय अपनी ही सोचती हो, जब तुम्हारा मन करे तब करोगी वैसे दुत्कार दोगी। वह बोली कि ऐसा मत कहो। हमारी बहस यही खत्म हो गयी। रात को एक बार प्यार का दौर चला, फिर चल सकता था लेकिन नही चला। सुबह फिर मन करा दो दोनों फिर रेस में दौड़ पड़े। जब थक गये तो अगल-बगल लेट गये। देर से सो कर उठे नाश्ता कर के तैयार हो कर माधुरी के घर के लिये निकल गये।

माधुरी के घर पहुँचे तो वह घर को साफ कर के नाश्ता करने बैठी थी हम दोनों को देख कर उसे बहुत खुशी हुई। वह बोली की आप के लिये भी नाश्ता बनाती हूँ तो पत्नी ने मना कर दिया और कहा कि हम घर से कर के आये है, वह परेशान ना हो। नाश्ता करने के बाद पत्नी बोली कि कोई सफाई का काम बचा तो नही है, वह मिल कर उसे खत्म कर देगी। माधुरी ने ना में सर हिलाया तो पत्नी ने कहा कि तुम्हें भी लगता है इन की आदत लग गयी है सर हिला कर बताने की तो माधुरी शर्मा गयी। पत्नी ने मजाक में कहा कि घर की कोई चीज खराब हो तो इन्हें बता दे यह सही कर देगें।

मैंने यह सुन कर कहा कि यार मैं क्या प्लमबर लगता हूँ जो कही भी जा कर शुरु हो जाती हो। मेरी बात सुन कर पत्नी ने उलाहना दिया की कही थोड़ी ना हो अपने ही घर पर हो अगर कुछ सही कर दोगें तो क्या घट जायेंगा, इस बात पर माधुरी की हँसी निकल गयी मैंने कहा कि अब तुम दोनों मिल कर मुझे मत खीचों, नही तो मैं चला जाऊँगा। दोनों बोली कि जायेगें कहा्ँ? मैंने हाथ डालते हूये कहा कि हाँ दोनों तो यही पर हो अब कहाँ जा सकता हूँ, मेरी बात पर दोनों हँसती हुई चली गयी।
 

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मैं टीवी खोल कर बैठ गया तो माधुरी आ कर बोली कि बाथरुम में पानी कम आ रहा है, कुछ कर सकते हो? मैंने कहा कि तुम्हारे पास औजार तो नही होगे बिना उन के क्या कर सकता हूँ मेरी बात सुन कर वह बोली कि कुछ औजार मैंने ला कर रखे है देख लो शायद उन से काम चल जाये। यह कह कर वह चली गयी और कुछ देर बाद एक टूलबॉक्स ले कर आ गयी। मैंने उसे खोल कर देखा तो उस में सारे औजार रखे थे। मैंने उन्हें देख कर के कहा कि यह कब खरीदे तो वह बोली कि मुझे दीदी से पता चला था कि आप को औजारों का शौक है तो एक मॉल में घुमते में दिखे थे सो आप के लिये खरीद लिये थे।

मैंने टुलबॉक्स को उठाया और बाथरुम में आ गया बड़ी रिंच की सहायता से पानी के नल को खोल कर उस में फँसी गंद को साफ करके लगा दिया तो पानी की धार तेज हो गयी यह देख कर माधुरी खुश हो गयी बोली कि मुझे तो लग रहा था कि कोई बड़ी मरम्मत करानी पड़ेगी लेकिन आप ने तो दम मिनट में सही कर दिया। मैंने उस से पुछा कि किसी और नल में तो ऐसी समस्या नहीं है तो वह बोली कि किचन में भी पानी की धार कम है।

मैं किचन में चला गया और उस के पानी के नल के आगे के हिस्से को खोल कर उस में फँसी गंद साफ कर के उसे फिर से लगा दिया, इस से पानी की धार तेज हो गयी। माधुरी की तरफ देखा तो वह बोली कि अब और कुछ नही है आप ड्राइग रुम में बैठो मैं चाय बना कर ला रही हूँ, मैं उस की बात पर हँस कर रिंच टुलबॉक्स में रख कर ड्राइग रुम में चला आया, पत्नी भी वहीं पर बैठी थी मुझे देख कर बोली की आज का काम तो हो गया। मैंने कुछ नही कहा लेकिन उस के चेहरे पर मुस्कराहट थी। मैं भी टी वी देखने लगा।

कुछ देर बाद माधुरी चाय ले कर आ गयी, चाय के साथ समोसे और बेसन के पकोड़े भी थे। हम सब चाय और समोसे, पकोड़ों का मजा लेने लगे। माधुरी ने चाय के बाद हमें अपनी फोटो दिखाने के लिये पेनड्राइव टीवी में लगा दी, हम फोटों देखने लगे। ये फोटो उस ने अपनी छुट्टियों में घर पर खींची थी, माँ-बाप तथा कई रिस्तेदार भी थे। शाम को सूर्यास्त और सूर्योदय की फोटो काफी बढ़िया खींची थी, मैंने उन की प्रशंसा की तो माधुरी बोली कि प्रशंसा के लिये कुछ मिलेगा नही। यह कह कर उस ने पत्नी की तरफ देखा तो वह मुस्करा दी और बोली कि यह फोटोग्राफी का शौक इन से लगा है या पुराना है?

माधुरी ने बताया कि वह बचपन में बहुत पेंटिग किया करती थी। बाद में समय ना मिलने के कारण वह छुट गया, फिर लगा कि केमरा भी तो एक तरह से पेंटिग ही करता है सो फोटोग्राफी शुरु कर दी। हाँ यह सही है कि इन के साथ इस में काफी सुधार आया है, टेक्निक सही हुई है। यह कुछ गलत होता है तो उसे बता देते है तो अगली बार उसे सुधारने की कोशिश करती हूँ। इस से मन को बड़ी राहत मिलती है।

पत्नी ने पुछा की घर पर सब सही है तो जबाव मिला की हाँ कल ही बात हुई थी माँ बता रही थी कि अब पिता जी खुश लग रहे है। मैं उठ कर माधुरी के फ्लैट को देखने चला तो माधुरी भी मेरे पीछे चली आयी और बोली कि क्या देख रहे है? मैंने कहा कि यह देख रहा हूँ कि किसी हिस्से को सफाई की जरुरत तो नही है? मेरी बात सुन कर वह बोली कि रहने वाली को जरुरत है उसे तो आप देख नही रहे। मैंने कहा कि वह तो सही दिख रही है, उस ने कहा कि बाहर से तो सही है अंदर से नहीं। मैंने उसे चुटकी काट कर कहा कि वह भी समय मिलने पर देख लुगा।

वह बोली कि कल से कॉलेज खुल रहे है और काम बहुत हो जायेगा। पेपर भी चैक करने के लिये आये हुऐ है। मैंने कहा कि कुछ मदद कर सकता हूँ तो वह बोली कि तुम क्या मदद कर सकते हो? मैंने कहा कि पेपर चैक कर सकता हूँ वह बोली कि हर जगह नाक मत घुसेड़ा करो मैंने कहा कि मेडम बंदे ने हिन्दी में एम ए किया है। उस ने आश्चर्य से मुझे देखा कि तुम क्या-क्या हो? मैंने कहा जो हूँ वही तो बता रहा हूँ। वह बोली कि इंजिनियरिग और हिन्दी क्या मेल है। मैंने कहा कि कही लिखा तो नही है कि इंजिनियर भाषा नही पढ़ सकता, मुझे पढ़ने का शौक था सो हिन्दी में एम ए कर लिया।

वह बोली कि पहले कभी बताया नहीं मैंने कहा कि कोई ऐसा मौका पड़ा नही और तुम ने मेरा पहले बॉयोडाटा माँगा नही। इस पर उस ने कहा कि बॉयोडाटा क्यों माँगती? वह मेरा हाथ पकड़ कर कमरे में आयी और पत्नी से बोली कि दीदी इन की और क्या-क्या खासियतें है जो मुझे पता नही है? अभी-अभी पता चला है कि महाशय हिन्दी में एम ए है। पत्नी हँसी और बोली कि हाँ है तो सही। यह पुछ कि यह क्या नही है? तुझे भी कुछ खासियतें तो पता चल ही चुकी होगी। वह बोली की आप सही कह रही हो, कुछ तो पता है ही।

फिर कुछ सोच कर वह अंदर अपने कमरे में गई और एक उत्तर पुस्तिका हाथ में ले कर आई और उसे मेरे हाथ में दे कर बोली कि इसे पढ़ कर बताओ कि क्या सही है, क्या गलत है। मैंने उसे हाथ में लिया और कुछ देर उसे पढ़ कर कहा कि औसत विद्धार्थी है, 40-45 प्रतिशत अंक मिलने चाहिये, यह कह कर मैंने उत्तर पुस्तिका उस को लौटा दी।

उस ने उसे ध्यान से देखा और मुझ से बोली कि बिल्कुल सही कह रहे है इस से ज्यादा अंक नही मिल सकते। उस के चेहरे पर प्रशंसा के भाव थे। आप आज खाने के बाद मेरी सहायता करना तो काफी काम हो जायेगा। फिर वह पत्नी की तरफ देख कर बोली कि दीदी आप अकेली बोर तो नही हो जाऔगी तो वह बोली कि मेरा तो सोने का समय होता है मैं तो आराम करुँगी तुम दोनों काम करते रहना।

पत्नी की बात सुन कर माधुरी के चेहरे पर चमक आ गयी। जैसे उसे मन माँगी मुराद मिल गयी थी। दोनों किचन में खाना बनाने चली गयी और मैं अखबार पढता रहा। दोपहर का खाना खा कर पत्नी तो कमरे में आराम करने चली गयी, हम दोनों बेडरुम में आ गये। दरवाजा बंद करके माधुरी मुझ से लिपट गयी और उस के होंठ मेरे होंठों से चिपक गये। दोनों के होंठ प्यासे थे सो वह अपनी प्यास बुझाते रहे। जब प्यास बुझ गयी तो अलग हो गये। इस के बाद मैंने पुछा कि क्या करना है प्यास बुझानी है या काम करना है तो जबाव मिला की काम ही काम करना है यह सुन कर मैं मुस्करा दिया।

उसने अलग होकर कहा कि पहले काम कर लेते है यह कह कर वह उत्तर पुस्तिकायों का बंडल उठा लाई, और मेरे सामने रख दिया। फिर बैठ कर उसे खोलने लगी और बोली कि पहले इस में मेरी सहायता कर दो बड़ा दबाव है इन को चैक करने का। पहले ही देर हो चुकी है। मैं उन को देखने लगा फिर हम दोनों उन को चैक करने में लग गये। चार बजे तक चैक करते रहे, इस दौरान काफी पुस्तिकायें चैक हो गयी थी। उन्हें देख कर माधुरी बोली कि आप को इनाम के हकदार हो। बताओ क्या इनाम चाहिये तो मैंने कहा कि इनाम वाली चाहिये इस के अलावा और कुछ नही चाहिये।

मेरी बात सुन कर वह बोली की इनाम तो मिलना ही था बोलों और क्या चाहिये? मैंने उस का हाथ पकड़ कर उसे अपने पास खिंच लिया और उस की ट्रेक सुट की जैकेट की चैन खींच कर उसे खोल दिया। लाल रंग की पैडिड ब्रा में कसे उरोज ललचा रहे थे। मैंने जैकेट उतार कर रख दी और उस की पीठ पर हाथ ले जा कर ब्रा के हुक को खोल दिया अब दोनों उरोज ब्रा की कैद से आजाद थे उत्तेजना के कारण निप्पल तन का पुरी आधा इंच ही हो गयी थी गहरे भुरे रंग की निप्पलों को चुसने का मन कर रहा था सो पीठ पर हाथ ले जाकर माधुरी को करीब किया और होंठो को निप्पल पर चुपका दिया।

इतनी जोर से चुसा कि माधुरी ने मेरी पीठ पर मुक्का मारा और कहा कि अपनी चीज है थोड़ा तो रहम किया करो। मैं मुँह खोल कर पुरे उरोज को निगलने लगा। आधा ही मुँह में आ पाया था। मेरी इस हरकत से माधुरी काँप रही थी। फिर यही हरकत मैंने दूसरे निप्पल के साथ की। वह कराहने लगी। बोली कि बदमाशी कम करो आराम से करो ना।

मैंने कहा कि अपने आप को रोक ही नहीं पा रहा हूँ तो वह बोली कि अगर नहीं सुधरे तो दीदी की तरह हो जाऊँगी। देख लो फिर ना कहना। मैं उस से अलग हो गया। मेरे दिमाग से सेक्स का भुत उतर गया। शरीर में जो उमंग थी वो मर गयी। मन करा कि यह सब बंद कर दूँ लेकिन फिर मन ने कहा कि हो सकता है कि तेरे ही में कोई कमी है तभी तो दो-दो औरतें एक जैसी बात कह रही है। समझ नही आ रहा था कि क्या करुँ?

माधुरी अभी भी मेरे सामने बैठी थी। मैंने उसे लिटाया और उस की पेंट को खींच कर उतार दिया इस के बाद उस की पेंटी को भी अलग कर दिया। इस सब के दौरान मेरे मन में गुस्से ने जन्म ले लिया था। मुझे लगा कि अपने आप पर से मेरा नियंत्रण कम हो रहा है। मैं एक दम अलग भी नहीं होना चाहता था लेकिन मन उचट गया था।

मैंने उस की योनि पर हल्का सा किस किया और अपने कपड़ें उतारने लग गया जब बिल्कुल निर्वस्त्र हो गया तो उस के पैरों के बीच बैठ कर उस की जाँघों को चौड़ा करके लिंग को योनि के मुँह पर लगा कर धीरे से धक्का दिया, इस से कोई असर नहीं हुआ लिंग का सुपारा योनि के अंदर नही गया। माधुरी ने अपने हाथ से लिंग को योनि के मुँह पर लगा दिया मैंने फिर से जोर लगाया तो लिंग अंदर चला गया।

माधुरी तो पहले से ही उत्तेजित थी इस कारण नमी की कमी नही थी। मैं धीरे-धीरे लिंग को अंदर बाहर करने लगा। कुछ देर में माधुरी भी अपने कुल्हों को उठा कर मेरा साथ दे रही थी। पाँच मिनट ऐसे ही चलता रहा, फिर मैंने माधुरी के ऊपर से हट कर उस को अपने ऊपर कर लिया। अब कमान उस के हाथ में थी मैं नीचे से उस के उरोजों को सहलाता रहा। काफी देर यह चलता रहा मेरा शरीर ताप की वजह से जलने लगा था, मैं इस से किसी तरह से भी पीछा छुड़ाना चाहता था लेकिन स्खलित होने का नाम ही नही ले रहा था, माधुरी भी थक गयी थी वह भी ऊपर से हट कर बगल में लेट गयी।

अब मैंने उस के पीछे लेट कर उस की सीधी टाँग को ऊँचा उठा कर अपने लिंग को उस की योनि में डाल दिया। उस की वह टाँग मेरी टाँग के ऊपर थी और में हाथों से उस के कसे उरोजों को सिर्फ सहला रहा था। मेरे कुल्हें उस के कुल्हों पर प्रहार कर रहे थे वह कराह रही थी, कुछ देर बाद मेरे अंदर ज्वार सा उठा और मैं स्खलित हो गया। मन तो बहुत कर रहा था कि उस के उरोजों को जोर से मसल दूँ लेकिन मैंने मन को काबु में कर लिया। स्खलित होने के बाद में माधुरी से अलग हो गया और उस की बगल में लेट गया। शरीर के अंदर का ताप अभी भी मुझे जला रहा था लेकिन अब मुझे पता था कि यह उतर जायेगा।

माधुरी भी शान्त लेटी हुई थी। थोड़ी देर बाद वह उठी और मेरे सीने पर सर रख कर बोली कि नाराज़ हो? मैंने कहा नही तो। वह कुछ नही बोली और उठ कर कपड़ें पहनने लगी। मैं भी उठ कर बाथरुम चला गया और अपने आप को पानी से साफ कर के लौट आया फिर मैंने भी अपने कपड़ें पहन लिये। हम दोनों को पता था कि कुछ गड़बड़ हो गयी है लेकिन कोई कुछ बोलना नही चाहता था। मिलन की इतनी इच्छा थी लेकिन सारा मुड बदल गया था। दोनों ही चुप थे।

मैं जा कर ड्राइग रुम में बैठ गया। माधुरी शायद पत्नी को उठाने चली गयी। थोड़ी देर बाद पत्नी की आवाज आयी कि यहाँ आ जाओ वहाँ गर्मी में क्यों बैठे हो सो मैं उठ कर बेडरुम में चला गया। कुछ देर बाद माधुरी चाय ले कर आ गयी। सब चाय पीने लगे। पत्नी ने पुछा कि तुम दोनों ने कुछ काम किया या नहीं तो माधुरी बोली की काफी काम कर लिया है। कुछ रह गया है उसे मैं बाद में कर लुँगी।

ये तो हर काम को कर लेते है। मल्टीपर्पस आदमी है। पत्नी यह सुन कर हँस दी और बोली कि अभी तो तुझे इन के टैलेन्ट का पता नही है धीरे-धीरे पता चलेगा जब इन के साथ रहेगी। मैं कुछ नहीं बोला। माधुरी ने पत्नी से पुछा कि रात में क्या खाना है तो वह बोली कि इन से पुछो कि क्या खायेगें? मैंने कहा कि जो यह बना लेगी वही खा लुँगा। मेरी बात सुन कर पत्नी बोली की जो तुम्हारा मन करें वही बना लो वैसे भी रात को कम ही खाना खाते है। वह माधुरी से बातें करती रही। मैं उठ कर बाहर आ गया।

तभी ऑफिस से फोन आया कि कोई परेशानी आ गयी है सो मैं फोन पर उसे सुलझाने लगा। काफी देर तक इसी में लगा रहा जब फोन पर से हटा तो देखा कि माधुरी दूर से मुझे देख रही थी, उसे ऐसा करते देख कर मैंने कहा कि ऑफिस से फोन था कोई समस्या थी उसे सुलझा रहा था। वह दूर से पास नहीं आयी। शाम हो रही थी इस लिये मैंने पत्नी को आवाज दी और उसे लेकर छत पर चला गया, माधुरी भी साथ ही थी चारों तरफ की हरियाली देख कर पत्नी बोली कि यहाँ तो गर्मी नही लगती होगी? माधुरी ने जबाव दिया कि नहीं ज्यादा नहीं लगती है फिर हम सब सूर्यास्त का आनंद लेने लगे।

जब अंधेरा छा गया तो नीचे आ गये। दोनों औरतें किचन में चली गयी और मैं कमरे में बैठ कर आज के घटनाक्रम को सोचता रहा वैसा नहीं हुआ था जैसा मैं सोच कर आया था। अब बात को ज्यादा बिगड़ने से बचाने की जरुरत थी, नहीं तो माधुरी के दिल को बहुत धक्का लगता जो मैं उसे पहुँचाना नही चाहता था उस के मेरे बीच अगर सेक्स ना भी हो तो मित्रता तो थी ही।

मैं तो उसी का भुखा था। माधुरी की मित्रता में खोना नही चाहता था। आज जो कुछ हो गया था वह रोके से नही रुका था। यहीं सोचते-सोचतें कब मेरी आँख लग गयी पता नही चला। पत्नी ने जब खाना खाने के लिये मुझे झकझौरा तब जा कर मेरी आँख खुली। मुझे सोया देख कर वह बोली कि आराम से अंदर सो जाते। मैंने कहा कि ऐसे ही आँख लग गयी थी।

मैं उठ कर खाने की मेज पर चला गया, माधुरी पहले ही खाना लगा कर बैठी थी तीनों खाना खाने लगे तो पत्नी बोली कि आज लगता है यह आराम नहीं कर पाये है। काफी थके से लग रहे है इस लिये हम लोग खाना खा कर घर के लिये निकलते है। माधुरी कुछ नही बोली सर झुका कर खाना खाती रही। खाने के बाद हम दोनों माधुरी से विदा ले कर घर के लिये निकल गये। घर पहुँच कर जब मैं कपड़े बदल रहा था तो पत्नी बोली कि क्या हुआ था तुम दोनों के बीच? मैंने कहा कुछ भी नही? तो वह बोली कि सब कुछ सही तो नही लग रहा है लेकिन तुम नही बताना चाहते तो मत बताओ।

यह कह कर वह दूध लेने चली गयी। मेरे को दूघ का गिलास देती हुई बोली कि अब दिमाग पर जोर मत दो आराम से सो जाओ सुबह तक सब सही हो जायेगा। मैंने दूध पिया और सो गया। नींद एकदम आ गयी। सुबह अलार्म की आवाज पर उठा, ऑफिस जाने की तैयारियों में लग गया। नाश्ता कर के ऑफिस के लिये निकल गया। रास्ते में माधुरी को फोन किया तो वह बिजी थी। ऑफिस जा कर मैं भी बिजी हो गया। ऑफिस में ही पता चला कि मुझे कुछ दिनों के लिये बगलुरु जाना है वहाँ कुछ सैटअप हो रहा है उस को देखना है।
 

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घर आ कर मैंने पत्नी से कहा कि मैं कुछ दिनों के लिये बगलुरु जा रहा हुँ सो मेरे कपड़ें पैक कर दे। वह बोली की माधुरी को बता दिया है तो मैंने कहा नही। उसे सुबह फोन किया था तो वह बिजी थी, उस का भी कोई फोन नहीं आया था। यह कह कर मैं जाने की तैयारी में लग गया। बहुत काम था सुबह जल्दी निकलना था। माधुरी ने कोई फोन नही किया। मैंने भी नही किया। अगले दिन सुबह जल्दी निकल गया सात बजे की फ्लाइट थी। ग्यारह बजे बगलुरु पहुँचा, पहले होटल गया, वहाँ सामान रख कर साईट पर चला गया।

शाम को देर से लौटा तो पत्नी का फोन आया कि क्या कर रहे हो? मैंने उसे बताया कि दोपहर को खाना नही खाया है अभी लौटा हूँ नहा कर खाना ऑडर करुँगा फिर खा कर सो जाऊँगा। वह कुछ पुछना चाहती थी लेकिन उस ने पुछा नही। मैंने कुछ बताया नहीं। थके होने की वजह से बिस्तर पर पड़ते ही सो गया। आधी रात को नींद फोन की घंटी से खुली, देखा तो माधुरी का फोन था, उस की आवाज बैठी हुई थी। मैंने पुछा कि इतनी रात को क्यों फोन करा? कुछ देर तक कोई आवाज नही आयी। मुझे डर लगा कि कहीं कुछ कर ना ले।

अगर कुछ बोलना नही है तो फोन क्यों करा है?

क्या बोलुँ

जो तुम्हारे मन में हो कहो

फोन क्यों नही किया?

तुम ने क्यों नही किया?

मैं बिजी थी

मैं भी बिजी था लेकिन परसों सुबह फोन किया था तुम से उठाया नही था, कही बिजी थी।

बाद में भी तो कर सकते थे

कर सकता था लेकिन बहुत बिजी था, बगलुरु आने की तैयारी कर रहा था। आज भी यहाँ पर दम मारने की फुरसत नही मिली है दिन का और रात खाना एक साथ खाया है। मेरी छोड़ो अपनी बताओ

क्या बताऊँ

कुछ भी कॉलिज में क्या हाल है?

मेरा हाल नही पुछोगे?

तुम्हारी आवाज से तुम्हारा हाल मुझे पता चल गया है

हम दोनों लड़ते क्यों है?

मुझे क्या पता मैं तो नही लड़ा लेकिन अपनी गल्तियाँ ढुढ रहा हुँ कि कहाँ पर गलत हूँ

माफ नही करोंगे

माफी किस बात की, तुम तो दोस्त हो

उस दिन कुछ कहा क्यों नहीं

कुछ नही कहना था

इतना बुरा लग गया था

हाँ बुरा तो लगा था लेकिन फिर लगा कि दोनों औरतें गलत तो नही हो सकती है, मेरे ही में कुछ गलत है।

मुझे मार सकते थे

क्यों मारुँ

माधुरी एक बात हमेशा ध्यान रखना तुम सबसे पहले मेरी दोस्त हो उस के बाद कुछ और हो तुम से सेक्स की कोई आशा नही थी, सिर्फ दोस्ती की चाहत थी, उसी चाहत में शायद कुछ गलत हो गया है।

माधुरी रोने लगी। मुझे समझ नही आ रहा था कि उसे क्या कहुँ, मैंने उस से कहा कि अपना फोन विडियों कॉल पर कर के मुझे अपने को दिखाये तो उस ने विडियों कॉल कर ली उस की शक्ल देख कर मुझे चैन आया उस ने कहा कि अपना कमरा दिखाओ, कैमरा घुमा कर, मुझे हँसी आ गयी और मैंने कैमरा चारों तरफ घुमा कर दिखा दिया, फिर पुछा चैन आया कि साथ में तो कोई नही है? वह बोली कि नहीं विश्वास है तुम पर। लेकिन तुम्हारा कमरा देखने का मन था। सो देख लिया। मैंने कहा की मैडम अब सो जाओ बंदें को सुबह जल्दी जग कर साइट पर जाना है तुम्हें भी कॉलेज जाना है। यह कह कर मैंने उसे एक फ्लाइग किस किया और फोन बंद कर दिया। इस के बाद मैं नींद में डुब गया।

सुबह उठा तो देखा कि फोन पर माधुरी का सॉरी का मैसेज था, उसे फोन किया और कहा कि सॉरी किस बात का उसे जो गलत लगा उसने कहा इस में सॉरी कहने की जरुरत नही है। वह बोली की तुम ऐसे ही नाराज रहोगे तो मैं हँस का बोला कि भई नाराज होने का हक है मुझे लेकिन मैं नाराज नहीं हूँ।

वह बोली की तो मेरे से बात क्यों नही कर रहे हो? मैंने उसे समझाया कि कल रात को बहुत थका हुआ था इस लिये ऐसा हो गया है अभी भी तैयार हो कर साइट पर जाना है, इस लिये ज्यादा बात नहीं कर पाऊँगा। लेकिन वापस आ कर बहुत सी बातें करुँगा। मेरी बात पर वह बोली कि दो मिनट तो बात कर ही सकते हो। मैंने कहा कि जरुर कर सकता हूँ लेकिन शाम को बात करुँगा।

तुम्हें भी तो कॉलेज जाना है या नहीं तो वह बोली कि हाँ जाना तो है, तो पहले काम जरुरी है बातें बाद में करेंगे। यह कह कर मैंने फोन काट दिया। मैं तैयार होने लग गया जब कमरे से निकल रहा था तभी पत्नी का फोन आया कि माधुरी को फोन क्यों नही कर रहे हो। मैंने उसे बताया कि अभी तो मेरी उस से बात हुई है तो वह बोली कि सुबह उस का फोन आया था कि तुम ने रात को उस का फोन काट दिया था।

मैंने उसे बताया कि आधी रात थी और मैं बहुत थका हुआ था फिर भी मैंने उस से बात की थी विडियों पर उस की शक्ल भी देखी थी और उसे अपना कमरा भी दिखाया था इस के बाद फोन बंद कर दिया था। यहाँ बहुत ज्यादा काम है इस कारण से मैं किसी से भी ज्यादा बात नहीं कर पाऊँगा। यह उस को बताया था तुम को भी बता रहा हुँ उसे भी समझा देना तथा मेरी उस से कोई लड़ाई नहीं हुई है इस लिये परेशान मत होओ। आ कर सारी बात बताऊँगा।

यह कह कर मैंने उस का फोन भी काट दिया। सारे दिन काम के सिवाय और कुछ सोचने का वक्त ही नहीं मिला। शाम को होटल आ कर माधुरी को फोन किया तो वह खुश लगी बोली कि मैं भी सारे दिन कॉलेज में वयस्त थी, हम दोनों ने इधर-उधर की बातें की और फोन रख दिया।

उस के बाद पत्नी को फोन किया तो वह बोली कि खाना खा लिया तो मैंने उसे बताया कि अभी आया हूँ नहा कर खाना ऑडर करुँगा। वह कुछ बोलती इस से पहले ही मैंने उसे बता दिया की माधुरी को फोन कर लिया था, वह सही है। उस ने चैन की साँस ली। वह बोली कि तुम दोनों तो बच्चों की तरह रुठतें रहते हो, यह क्या है? मैंने कहा कि सही कह रही हो लेकिन हो ही जाता है इस का भी कोई हल ढुढ़ना पड़ेगा। वह बोली की हाँ तुम्हारें पास तो हर समस्या का हल है, मैं बोला कि ताना तो मत मारो।

वह हँस कर बोली कि कभी तुम और मैं कितना लड़ते थे? मैंने कहा हाँ लेकिन समय के साथ सुधर गये है। शायद यह भी समय के साथ सुधर जाये। उस ने पुछा कि कब आयोंगे तो मैं बोला कि अभी पता नही है बहुत काम है अगर ज्यादा दिन चला तो तुम्हें यहाँ बुला लुगा। वह बोली कि मेरी बजाए माधुरी को बुला लेना मैंने कहा कि वह कॉलेज की वजह से नहीं आ पायेगी। इस के बाद फोन कट गया। मैं भी नहाने चला गया, आ कर खाना खाया और सोने चला गया।

पुरा हफ्ता ऐसे ही निकल गया रविवार को छुट्टी थी सो देर तक सोता रहा, उठ कर नहाया, नाश्ता किया फिर पहनने के कपड़ें देखे कि सभी गंदे हो गये थे, होटल में कपड़ें धुलवाना बहुत महँगा था सो वह विचार छोड़ दिया, सोचा कि दो-तीन नये पेंट शर्ट ले लेता हूँ हफ्ता निकल जायेगा। दोपहर में शापिंग करने निकाल और कुछ अपने लिये तथा कुछ पत्नी और माधुरी के लिये कपड़ें खरीद लिये। शाम का बाहर ही खाना भी खा लिया। जल्दी सोने जा रहा था कि माधुरी का फोन आया और बोली कि आज क्या किया है? तो मैंने उसे बताया कि सारे कपड़ें गंदे हो गये थे सो कुछ नये कपड़ें खरीद लिये है। वह बोली कि अंडर ग्रामेंट तो नही लिये होगे तो मैंने मना किया वह बोली कि जो सबसे जरुरी थे वही नही खरीदे। मैंने कहा कि अभी धो कर डाल देता हूँ सुबह तक सुख जायेगे, अगर समय मिला तो कल ले लुँगा।

वह बोली की कुछ मत खरीदना मैं अपने साथ ले कर आऊँगी तो मैंने पुछा कि तुम्हारे पास आने का समय है? वह बोली की समय तो निकालना पड़ेगा। तुम अभी आओगें नहीं इस लिये किसी को तो आना ही होगा। दीदी ने मुझे जाने को कहा है सो मैं शनिवार की सुबह आऊँगी, मेरे रहने का इंतजाम कर के रखना। मैंने कहा जो हूकुम सरकार। मेरा जबाव सुन कह वह हँस दी और बोली कि हम दोनों को अपनी चीज की चिन्ता हो रही है इस लिये आना पड़ रहा है।

कपड़ें वगैरहा में साथ लाऊँगी। तुम कुछ और नही खरीदना। दूसरे दिन मैंने ऑफिस को कहा कि यहाँ की बजाए मुझे कोई अपार्टमेंट दिलवा दे सस्ता भी पड़ेगा तथा मैं पत्नी को भी बुला सकुँगा, मेरा विचार सब को पसंद आया और दुसरे दिन ही उन्होंने एक ऑफिस अपार्टमेंट मेरे लिये बुक कर दिया।

दो कमरें, किचन, बाथरुम, फुल फर्नीशड, सिर्फ खाने की परेशानी थी सो वह भी हल हो गयी वहाँ पैक्ड खाना आ जाता था। मैं बुधवार को ही उस में शिफ्ट हो गया, होटल से ज्यादा खुला था, दसवीं मंजिल पर शहर का बढ़िया नजारा दिखायी देता था। आजादी थी कोई भी आ जा सकता था। शनिवार को माधुरी सुबह की फ्लाईट से आ गयी, वह साथ में मेरे काफी कपड़ें लायी थी।

उस दिन तो वह सारे दिन अकेली रही. जब मैं शाम तो आया तो वह टीवी देख रही थी। मुझे देख कर बोली कि खाने का क्या करना है? मैंने उसे बताया कि खाना आने वाला है मैंने ऑडर कर दिया है, थोड़ी देर में खाना आ गया हम दोनों खाना खाने लगे तब मुझे ध्यान आया कि माधुरी ने तो दोपहर में खाना नहीं खाया होगा मैं काम में उस का खाना ऑडर करना भुल गया। मैंने इस के लिये माधुरी से माफी माँगी तो वह बोली कि मैं दिल्ली से अपना और तुम्हारा खाना बना कर लाई थी, सो उसी को खा लिया।

लेकिन मुझे बहुत बुरा लग रहा था कि मैं उस के बारें में बिल्कुल भुल गया मैं ऐसा कैसे कर सकता था? वह मेरे लिये दिल्ली से आयी है और मैं उस के बारे में भुल गया। मुझे शर्मिंदा देख कर उस ने कहा कि मुझे दीदी ने पहले ही बता दिया था कि यह काम के दौरान सब कुछ भुल जाते है सो तुम अपना ध्यान खुद ही रखना। इन से किसी चीज की आशा मत करना।

उन की बात सही थी। फिर उस ने कहा कि इस बात को लेकर चिन्ता करने की जरुरत नही है अगर मुझे भुख लगती तो मैं तुम्हें फोन कर के याद दिला देती, इतना तो हक है तुम पर। मैं यह सुन कर मुस्करा दिया मेरी मुस्कराहट पर वह बोली कि इस मुस्कराहट पर तो सब कुछ कुरबान है फिर एक वक्त का खाना क्या चीज है? मैंने उस का हाथ दबाया तो वह बोली कि पहले खाना खा लो। मैं और वह खाना खाने लगे।

खाना खाने के बाद हम दोनों कुछ देर तक बालकॉनी में खड़े हो कर रात में रोशनी में नहाये शहर को देखते रहे, मैंने पुछा कि पहले बगलुरु आयी है तो वह बोली कि नहीं पहली बार आयी हूँ। तुम तो आते रहते हो। मैंने जबाव दिया कि हाँ काम के सिलसिले में आता हूँ लेकिन कभी कुछ देखने का मौका नहीं मिला है। काम से फुरसत ही नही मिलती है। वह बोली कि अब मैं आयी हूँ तो फुरसत भी मिल जायेगी तभी कुछ देखेगे। हम दोनों एक दूसरें का हाथ थामें कमरे में आ गये। फिर हाथ थामें ही बेडरुम में चले गये। मैं सोने के लिये बेड पर गया तो वह कपड़ें बदलने चली गयी।

जब कपड़ें बदल कर आयी तो उस का रुप ही बदल गया था उस ने बैबी डॉल ड्रेस डाल रखी थी उस पारदर्शी पोशाक में वह और मादक लग रही थी, माधुरी को मैंने इस रुप में नहीं देखा था। मेरी नजर को देख कर वह बोली कि कैसी लग रही हूँ तो मैंने दोनों बाँहें फैला कर कहा कि आयों बताता हूँ तो वह वही खड़ी रही और बोली कि क्या बात है? मैंने कहा कि अब देर मत करो बाँहों में आ जाओ ना। वह बोली कि सुधर गये हो नही तो अब तक तो गोद में ले कर पटक देते।

मैं बोला कि हाँ मुझे भी बदलना है मेरे प्यार दर्शाने के तरीके को बदलना है। मेरी इस बात पर वह झट से मेरी बाँहों में समा गयी। मैंने कस कर उसे सीने से चिपका लिया। कुछ देर तक हम दोनों ऐसे ही रहे। कमरे में सिर्फ हमारी साँसों की आवाज ही आ रही थी। मैं माधुरी के शरीर की गरमाहट अपने शरीर में समा लेना चाहता था। वह भी कुछ ऐसा ही चाहती थी। उस की बाँहे मेरी पीठ पर से हो कर गरदन पर कसी थी। उस के उरोज मेरी छाती में चुभ रहे थे लेकिन यह चुभन अच्छी लग रही थी।

फिर उस ने मुँह उठा कर अपने होंठ मेरे होंठों से मिला दिये। उस के होंठों का मीठा स्वाद आज कुछ नया सा लग रहा था। ऐसा लग रहा था कि दो किशोर प्रेमी पहली बार आपस में किस कर रहे थे। विरहाकूल तो हम दोनों थे ही। उस के बाद उस की जीभ मेरे मुँह में घुस कर मेरी जीभ के साथ अढ़खेलियाँ करने लगी, मेरी जीभ भी उस के साथ खेल रही थी।

दोनों प्रेमी अपनी प्यास बुझाते रहे। जब वह अलग हुई तो मैंने उस के होंठों को अपने होंठों से जकड़ लिया। मैं उस के होंठों का रस मिला चाहता था काफी देर तक उस के होंठों को चुसता रहा, उस ने अपनी उँगलीं से मेरी बगल में कोचाँ तो मैंने उस के होंठ छोड़े।

हम दोनों की साँसें उखड़ गयी थी सो उन को संभालने के लिये दोनों बेड पर बैठ गये। साँस में साँस आने के बाद उस ने मेरे चेहरे का चुमना शुरु कर दिया। माथा, आँखें, नाक और गाल सब पर उस के होंठों की मोहर लग गयी अब कानों का नंबर था उन की लौ को जीभ से छु कर गरदन पर गरम साँसे छोड़ने लगी।

गरदन पर उस के होंठ ऐसे जमें थे की मुझे लगा कि लव वाईट के निशान ना बन जाये लेकिन मैंने उसे रोका नही। आज मैं उसे रोकने के मुड में नही था ना वह ही रुकने के मुड में थी। उस की गर्म साँसे अब मेरी छाती पर लग रही थी।

कमीज के बटन खोल कर वह छाती को चुम रही थी फिर उस के होंठों के बीच मेरा निप्पल आ गया कुछ देर तक तो वह उस को जीभ से चाटती रही फिर उस ने उसे दाँतों के बीच ले कर जोर से काट लिया। मेरे शरीर में करंट सा दौड़ गया। दर्द तो हुआ लेकिन उत्तेजना बढ़ गयी। नाभी को चुमने हुये वह पजामें तक पहुँच चुकी थी मैंने थोड़ा उचक कर उसे पजामा खीसकाने दिया। उस ने पजामें के साथ ही ब्रीफ भी पेरों में डाल दी।

अब मैदान खाली था वह झुक कर मेरे लिंग को चुम रही थी जो अब अपने पुरे शबाव पर आ गया था। उस ने उसे पुरा निगल लिया। मैं भी उत्तेजित हो कर उस की पीठ सहला रहा था। मैंने झुक कर उस की पीठ को चुमा ब्रा का हुक ही नाम मात्र का कपड़ा उस की पीठ पर था। पीठ से उस की झुकी हुई गरदन पर किस किया। उस का ध्यान कहीं और था वह अपने मुँह में लिये लिंग को होंठों से मथ रही थी। मेरे से सीधा रहना मुश्किल हो रहा था। लेकिन यह स्थिति मैं बदलना नहीं चाहता था। मैंने ब्रा का हुक खोल दिया तथा उसे कंधों से नीचे खिसका दिया अब मेरे हाथ उस को उरोजों तक पहुँच गये।

मैंने उन्हे धीरे-धीरे हाथों से सहलाना शुरु कर दिया कभी कभी उन्हें हथेलियों में कस लेता था। मेरे ऐसा करने से माधुरी की उत्तेजना भी बढ़ रही थी वह लिंग को अंदर बाहर कर रही थी मुझे लगा कि आज तो मैं इस के मुँह में ही स्खलित हो जाऊँगा और कुछ देर बाद हुआ भी यहीं मेरे मुँह से कराह सी निकली जो बताती थी कि मैं चरम पर पहुँच कर स्खलित हो गया था माधुरी नें सारा वीर्य मुँह में ही रहने दिया और उसे पी गयी। मैं तो एक तरह से निचुड़ ही गया था। वह लिंग को अभी भी चुस रही थी, कुछ देर बाद उस ने अपना मुँह लिंग से हटाया तो लिंग सुकुड़ कर छोटा सा हो गया था।

मैंने हाथ बढ़ा कर उस की पेंटी को नीचे सरकाया और उसे पाँवों पर कर दिया उस के माँसल कुल्हों की मध्य रेखा में उँगली फिराता हुआ मैं उस की योनि पर पहुँच गया। योनि से पानी टपक रहा था उँगली जब योनि में डाली तो वहाँ पर भरपुर नमी थी। मैंने भी अपनी उँगली को अंदर बाहर करना शुरु कर दिया। माधुरी ने गरदन ऊपर की तो उस के मुँह पर मेरा वीर्य लगा था मैंने उस के होंठ चुम लिये अपने वीर्य का कड़वा और नमकीन सा स्वाद मुझे भी चखने को मिला। मेरा हाथ अब आगे से माधुरी की योनि का अंवेषण कर रहा था।

अब मैंने माधुरी को बेड पर लिटा दिया और उस की जाँघों के मध्य बैठ गया। उन्हें चौड़ा कर के मैंने योनि को चुमने की जगह बनायी और योनि के होंठों को अलग करके जीभ को अंदर डाल दिया। उस की योनि का नमकीन स्वाद मेरी जीभ को हुआ। मेरे दोनों हाथ उस के दोनों उरोजों को मसल रहे थे निप्पलों को भी मसल रहे थे। माधुरी का बदन कस कर ऐढ़ सा रहा था वह सर को इधर उधर कर रही थी। अभी तक उस ने अपनी मर्जी करी थी अब मेरी बारी थी। कुछ देर बाद मैंने अपनी उँगली उस की योनि में डाल कर उस के जी-स्पाट को रगड़ना शुरु कर दिया।

माधुरी मुँह से आहहहहहह उहहह अईईईईई निकालने लगी। मुझे पता था कि वह किसी सी समय चरम पर पहुँच सकती थी। अचानक उस के मुँह से चीख सी निकली और उस की योनि ने जोर से पानी की फुहार सी निकाली। मेरा मुँह उस फुहार से पुरा भीग गया। माधुरी का शरीर रह रह कर अकड़ रहा था। मेरी उँगली अपना काम कर रही थी। उस की कराह मुझे और उत्तेजित करने लगी। उस ने अपनी दोनों टाँगें उठा कर कर मेरी गरदन के पीछे लॉक कर दी। वह पुरी तरह से स्खलित हो चुकी थी।

कुछ पलों तक हम दोनों ऐसे ही रहे। फिर उस की टाँगें हट गयी और मैंने अपना मुँह उस की योनि से हटा लिया। मैं भी उठ कर उस की बगल में लेट गया। मैंने अपना हाथ उस की योनि पर रखा तो पता चला कि अभी भी पानी बाहर निकल रहा था। पास पड़ी तोलिया को उठा कर मैंने उस की योनि पर लगा दिया। उस ने जाँघों से उसे कस लिया। मैंने उस के उपर झुक कर उस को किस किया तो वह बोली कि मुझे क्या हो रहा है? मैंने कहा कुछ नही तुम से शायद पहली बार ऑरगाज्म का आनंद लिया है। वह बोली कि यह रु्क क्यों नही रहा है मैंने कहा कि रुक जायेगा।

उस ने अपनी बांहें उठा कर मुझे अपने पर गिरा कर जोर से जकड़ लिया। मैं उस के इस अनुभव को भंग नही करना चाहता था सो उस के ऊपर लेटा रहा। जब उसे कुछ आराम पड़ा तो वह बोली कि मेरे साथ पहली बार ऐसा हुआ है। मेरा सर घुम रहा है चक्कर से आ रहे थे। मैंने पुछा अब क्या हाल हो तो बोली कि अब सही हूँ। मैं उस के उपर से उठ कर उस की बगल में लेट गया और उसे टेड़ा करके अपने से लिपटा लिया। हम दोनों प्रेमी एक दूसरे से लिपट कर पड़े रहें। दोनों विरह के बाद ऐसे अनुभव से गुजर रहे थे कि कुछ कह नहीं पा रहे थे।

प्यार की चरम अवस्था का स्वाद हम दोनों ने बिना संभोग करे ही कर लिया था। दोनों के मन और शरीर इस आनंद का मजा उठा रहे थे कुछ कुछ गुगें के गुड़ जैसी हालत थी कि कोई भी उसे शब्दों में व्यक्त नही कर सकता था केवल उस का आनंद उठा सकते थे सो कर रहे थे। शायद इसी बीच हम दोनों की आँख लग गयी। कब तक सोते रहे पता नही चला।

फोन की घंटी से मेरी आँख खुली पत्नी का फोन था, उस ने पुछा कि माधुरी सही से पहुँच गयी थी मैंने बताया कि वह सुबह आ गयी थी मैं उसे छोड़ कर काम पर चला गया था और काम के चक्कर में उस के खाने के बारे में भी भुल गया था मेरी बात सुन कर वह बोली कि मुझे पता था कि ऐसा ही कुछ होगा इस लिये मैंने माधुरी को खाना दे कर भेजा था कि वह भुखी ना रहे। कुछ और बातें कर के उस ने फोन बंद कर दिया। तब तक माधुरी भी उठ कर बैठ गयी थी। मैंने उसे बताया कि पत्नी का फोन था तुम्हारें बारे में पुछ रही थी तो वह बोली कि मैं भी तुम्हारें पीछे सोती रही फोन करना ही भुल गयी।

उस ने उठ कर मुझे देखा और अपने जाँघों के बीच फँसी तोलिये को देख कर पुछा कि क्या हुआ था? मैंने कहा कुछ तो नहीं वह बोली कि तुम्हारें मुँह पर और मेरे पैरों के बीच तोलिया क्यों है? मैंने तोलिया निकाल कर देखा वह गिला हो गया था। उस के एक सुखे कोने से मुँह पौछ कर कहा कि ज्यादा डिस्चार्ज हो रहा था इस लिये इसे लगा दिया था कि गद्दा खराब ना हो।

यह कह कर मैं बेड से उठ कर बाथरुम चला गया वहाँ जा कर मैंने चेहरा धोया और अपने लिंग को पानी से साफ किया, उस के बाद तोलिये को पानी से धो कर उसे निचोड़ कर वापस आया और माधुरी के नीचे के अंगों को अच्छी तरह से पौछ दिया।

उस की जाँघों को भी तथा योनि को भी साफ कर दिया। कुछ देर माधुरी लेटी रही फिर बोली कि पेशाब आ रहा है और बाथरुम चली गयी। कुछ देर बाद जब वह वापस आयी तो उस का मुँह भी धुला हुआ था। मुझ से बोली की बड़ा प्रेशर था अंदर काफी पेशाब आया है, अब कुछ आराम मिला है। चेहरा धो कर अच्छा लग रहा है।

वह भी मेरे पास आ कर लेट गयी। मैंने उस के हाथ को थपथपाया तो वह मेरे हाथ को पकड़ कर मुझ से चिपक गयी। कुछ देर हम दोनों चुपचाप बैठे रहे। फिर मैंने मौन तोड़ा और उस से पुछा कि अब कैसा लग रहा है तो वह बोली की ऐसा लग रहा है जैसे भरपुर संतुष्टी मिली है। मन भर सा गया है। आज से पहले ऐसी अनुभुति नहीं हुई थी। यह क्या है?

मैंने कहा जहाँ तक मैं समझ पा रहा हुँ आज हम दोनों के मन किसी भी बंधन या संकोच के एक-दूसरें के साथ का आनंद उठा रहे है। हमारे मन के कोई दुविधा नहीं है मिलन की इच्छा थी और मन पर कोई बोझ ना होने के कारण तन और मन ने भरपुर मजा लिया है शरीर ने भी पुरा सहयोग दिया है इस कारण से तुम ने आज बिना संभोग के ही ऑरगाज्म पा लिया है। मैंने भी चरम सुख भोगा है इस लिये दोनों के मन और तन आनंदित प्रफुल्लित है।

तुम्हारें साथ आज से पहले ऐसा सुख पहले नही मिला था। इस से ज्यादा मैं कुछ नहीं समझा सकता। तुम बताओ कैसा लग रहा है। इस पर वह बोली कि आज तो मैंने ही शुरुआत करी थी जो मेरे मन में था सो मैंने किया और तुम्हें स्खलित कर दिया यही मैं चाहती थी तुम्हें पुरा निगलना चाहती थी सो किया और मुख मैथुन कर के तुम्हें चरम पर पहुँचा दिया और मेरे को भी चरमसुख मिला फिर जब तुमने मुझे नीचे से किया तो मेरा चरमसुख एक दम ज्वालामुखी की तरह फट गया।

मुझे पता ही नही चला कि मेरे साथ क्या हो रहा है। शरीर में तरंग सी उठ रही थी। दर्द हो रहा था गर्मी लग रही थी और उत्तेजना की मानों बाढ़ सी आ गयी। शरीर कांपने लगा, अंट शंट भी बका होगा मुझे ध्यान नही है। लेकिन जब वह फटा तो ऐसा लगा कि मैं आकाश में उड़ रही हुँ बहुत हल्की सी हो गयी थी। रुक रुक कर शरीर में आनंद की लहर उठ रही थी पता नहीं कितना डिस्चार्ज हुआ है लेकिन जब हो गया तो चैन पड़ा लेकिन उस के पहले तो लग रहा था कि मैं मर तो नहीं जाऊगीं। जो कुछ भी था वो बर्दाश्त नहीं हो रहा था। इसी लिये उस के बाद बेहोश सी हो गयी थी।

आगे तुम्हें पता है मैं तो फोन की आवाज से ही उठी हुँ इस से पहले का कुछ भी याद नही है। लेकिन बहुत आनंद दायक अनुभव है, तुम्हारें पास होने के बाद मेरे से मेरा शरीर नहीं सभंलता है यह क्या है? मैंने कहा कि यह प्यार है। हम दोनों के बीच जो प्यार है वह मन के बाद शरीर को भी नियंत्रित करने लगा है। इसी लिये हम दोनों जब प्यार करते है तो वह कुछ अलग, खास होता है।

उस से डरना नहीं चाहिये उसे भोगना चाहिये। दोनों शरीर जब मिलते है तो उन के बीच जो संवाद होता है वह अलग तरह का होता है उस में एक स्वाभाविक उत्तेजना होती है उसे किसी तरह से रोका नही जा सकता है वह नकली नहीं है दोनों के बीच जो लगाव है वह उस की तार्किक परिणिती है।

हम दोनों को इस से डरना बंद करना पड़ेगा हम तो भाग्य शाली है कि उम्र के इस पड़ाव पर भी हमारे अंदर इतनी उर्जा है कि हम इतना शारीरिक मिलन कर सकते है उसे संभाल सकते है। एक दूसरे को लेकर इतना लगाव है कि उसे दिखाने से रोकना नहीं चाहिये। कुछ तो हम दोनों के बीच खास है हम उसे नाम नहीं दे सकते लेकिन उस का उपभोग तो कर सकते है जब तक शरीर साथ दे रहे है। यह कह कर मैं चुप हो गया।

माधुरी हँसी और बोली कि मेरे प्रियतम ने सारी व्याख्या कर दी अब मैं क्या कहुँ?

शायद हमारे बीच जो भी है वह कुछ अलग है हमें उसे दबाना नहीं है उस पर शर्मिंदा भी नही होना है बल्कि उस का आनंद लेना है यह मैं आज समझ चुकी हुँ, तुम भी मेरी ही बात को सही साबित कर रहे हो, हो सकता है शायद मेरे अंतकरण में कुछ ऐसा बैठा है जो इस को लेकर शर्मिंदा होता हो लेकिन आगे से ऐसा नही होगा। यह आज मुझे समझ आ गया है कि तुम्हारें साथ मैं कुछ और हो जाती हूँ तुम्हारें को भोगने के लिये मुझे पहले अपने आप को भोगना पड़ेगा तब तुम तक पहुँच पाऊँगी।

मैंने उस की बात सुन कर कहा कि यह तो कबीर की उलट-बासी हो गयी। माधुरी बोली कि तुमने कबीर पढ़ा है तो मैंने कहा कि मैडम याद रखा करो की तुम्हारा सनम हिंदी साहित्य का प्रेमी है। मेरी बात सुन कर वह हँसी और बोली कि यही एक बात में हर बार भुल जाती हूँ।

काम भी तो एक तरह ही पूजा ही है। हम दोनों उस के पुजारी है। हमें एकान्त सही अर्थों में शायद आज ही मिला है। जब हमारे मन में किसी का डर नहीं है। तभी हम एक दूसरे को इतनी अच्छी तरह से भोग पाये है। हमें बातें करते हुये काफी समय बीत गया था मैंने कहा कि आओ इस धारा में फिर से गोता लगाते है पहले कुछ रह गया था सो उसे अब पुरा कर लेते है मेरी बात सुन कर माधुरी मेरे ऊपर आ गयी और बोली कि आज तो मैं ही मन का करुँगी। मैंने कहा कि मैंने कब मना किया है।
 

aidenabhishek

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UPDATE 17

उस ने नीचे हाथ लगा कर देखा तो बोली की शरीर तो पुरी तरह से तैयार है कुछ करने की जरुरत है मैंने कहा कि इतनी देर से जो कर रहे थे वह भी तो इसी का हिस्सा है यह कह कर मैंने उस के उरोजों को जोर से दबा दिया वह बोली कि अब तुम्हें पुरी छुट है मुझे पता है कि तुम मेरा कुछ बुरा नही करोगें। यह कह कर मैंने अपनी उँगली उस की गहराई में डाली तो वहाँ भी पुरी तैयारी थी। माधुरी ने हाथ से लिंग को पकड़ कर योनि पर लगाया और कुल्हों को धक्का दिया पहली ही बार में लिंग पुरा समा गया, माधुरी धीमी गति से कुल्हों को ऊपर-नीचे करने लगी।

धीरे-धीरे उस की गति मंथर से तीव्र हो गयी अब मेरे कुल्हें भी उस के कुल्हों के प्रहार से दबे जा रहे थे उन्होंने भी उन को प्रतिउत्तर देना शुरु कर दिया। मैं भी अपने होंठों से उरोजों के निप्पलों को चुसने लग गया। माधुरी के मुँह से कराह निकलती रही। उसे सुन कर मेरी उत्तेजना और बढ़ गयी थी। वह पुरे जोर से धक्के लगा रही थी उस का सारा शरीर पसीने से नहा गया था लेकिन उस की गति धीमी नही हो रही थी उस ने मुँह झुका कर अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल दी और उस की सारी उत्तेजना मेरे शरीर में ऊपर से प्रवेश कर गयी ऐसा मुझे लगा।

काफी देर तक ऐसा ही होता रहा जब वह थक गयी तो ऊपर से हट कर बगल में लेट गयी लेकिन अभी तो कोई भी संतुष्ट नही हुआ था सो मैंने उसे पेट के बल लिटा दिया फिर उस के कुल्हों के पीछे आ कर लिंग को योनि में डाल दिया माधुरी इस से चिहुक सी उठी लेकिन उस ने कुछ नहीं कहा मैं पीछे से धक्का देने लगा शायद लिंग योनि के अंदर कही ज्यादा रगड़ रहा था माधुरी की कराह निकलने लगी आहहहहह उईईईई अईईईईई आहहहहह उस की इस कराह से मेरी उत्तेजना और बढ़ गयी और मेरी गति तेज हो गयी उस की कराह भी तेज हो गयी वह उस पर काबु कर पायी लेकिन कराह तो अब भी रही थी।

कुछ देर बार उस का सारा शरीर तरंगित सा होने लगा मुझे समझ आ गया कि वह ऑगाज्म का आनंद ले रही है लेकिन मैं अभी दूर था मेरी भी गति बढ़ गयी और माधुरी के कुल्हों पर प्रहार जो से होने लगा। फिर अचानक मेरी आँखों के आगे तारें झिलमिला उठें और मैं भी स्खलित हो कर उस की बगल में लेट गया। कुछ क्षण बाद माधुरी ने करवट बदली और मेरी तरफ मुँह करके कहा कि यह कौन सा आसन था?

मैंने कहा कि आसन तो है तभी तो हो पाया नहीं तो क्या यह संभव था? उस ने कहा कि मुझे लगा कि तुम गुदा मैथुन करोगें। उस के दर्द को याद करके बड़ा डर लगा लेकिन जब वह नही हुआ तो लगा कि कोई बात नही लेकिन जब लिंग ने योनि में जा कर एक जगह को रगड़ना शुरु किया तो मेरी कराह निकलने लगी मैं तो चीख पड़ती लेकिन मैंने होंठ को दाँतों से दबा कर उसे रोका।

लेकिन इस आसन की वजह से दूबारा ऑगाज्म हुआ तो मजा आ गया मुझे नहीं पता कि तुम कब स्खलित हुये, मैं तो उसी की तरंग में थी। बाद में जब गर्म वीर्य की बौछार योनि में पड़ी तो पता चला कि तुम भी चरम पर पहुँच गये थे। मैं तो चरम से भी ऊपर थी। उस को बताने के लिये शब्द नही है। मैंने कहा कि कुछ बोलने की आवश्यकता नहीं है हमारी चीज है हम ही भोग रहे है और क्या चाहिये। यह कर कर मैंने उसे अपने से लिपटा लिया। संभोग के बाद दोनों थक गये थे इस लिये शीघ्र ही गहरी नींद में चले गये।

सुबह उठ का नाश्ता करके बगलुरु घुमने के लिये निकल गये मॉल देखे, शॉपिग की, दर्शनीय स्थल देखें, हाथों में हाथ डाले घुमते रहे। शाम को खाना खा कर वापस लौटे। बहुत थके हुये थे। रात को जब सोने लगे तो मैंने माधुरी से पुछा कि कल तुम सारे दिन क्या करोंगी? तो उस ने जबाव दिया की लेपटॉप साथ लायी हुँ अपनी किताब पर काम करुँगी। तुम खाना भिजवा देना। मैंने पुछा कि कब दिल्ली जाना है तो वह बोली कि शनिवार को सोच रही हुँ तुम्हारा काम कब खत्म हो रहा है? मैंने कहा कि कुछ पता नही है लेकिन अगर नहीं भी खत्म हुआ तो मैं भी तुम्हारे साथ चलुँगा।

वह यह सुन कर खुश हो गयी और मेरे कंघे पर सर रख कर बोली कि आज कल तुम बदल गये हो। मैंने कहा कि ऐसा क्या कर दिया की तुम्हें ऐसा लगा। वह बोली कि तुम अब हम दोनों को ज्यादा तवज्जो देने लगे हो। मैंने कहा कि गलत बात बोल रही हो तुम दोनों की प्राथमिकता तो पहली ही है लेकिन जो काम करते है उसे भी पुरे समर्पण से करना चाहिये ऐसा मेरा मानना है। काम ही पूजा है यह मेरी मान्यता है।

मेरी बात सुन कर वह हँस कर बोली कि हमें पता है कि हम दोनों ही पहली प्राथमिकता है लेकिन अब तुम इसे प्रदर्शित करने लगे हो जैसे अभी तुम ने कहा कि मेरे साथ ही चलोगें यह दर्शाता है कि काम के सिवा भी किसी और की चिन्ता है तुम्हें। उस की आँखों में शरारत की चमक देख कर मैंने कहा की माधुरी की बच्ची तुझे तो किसी दिन अच्छी तरह से पीटुँगा। मेरी बात सुन कर वह बोली कि मुझे उस दिन का इंतजार है। वह मेरे से सट कर बोली कि कभी तो अपने इस खोल से बाहर निकला करो। मैंने कहा की मेरा खोल तो तुम ने देख लिया कभी अपना भी खोल उतारना।

मेरी बात सुन कर उस ने कहा कि तुम चाहते ही नही की मैं इसे उतारुँ। मैंने कहा कि जब तक तुम नही बताओंगी मैं नहीं पुछुँगा। उस ने कहा कि तुम्हारी यही बात तो दिल जीत लेती है कि तुम अंदर बाहर से एक जैसे हो, बस यह गम्भीरता कुछ कम कर दो। मैं हँस गया और बोला कि आज क्या था? वह बोली कि यही वाला तो हर रोज चाहिये। मैंने कहा मिलेगा धीरे-धीरे। हम दोनों एक-दूसरे के हाथों को लेकर बैठे रहे। मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया और उस का माथा चुम लिया और कहा कि चलो सोते है। वह बोली की हाँ नींद आ रही है और हम दोनों नींद के आगोश में चले गये।

सोमवार को मेरा कार्य पहले की तरह ही चला, सारा दिन में व्यस्त रहा, रात को माधुरी से मिला तो उस नें बताया कि वह सारा दिन आराम करती रही और अपनी किताब को पढ़ती रही। कुछ बदलाव भी करें। इसी में सारा दिन बीत गया। तुम्हारा दिन कैसा बीता? मैंने उसे बताया कि मेरे लिये तो काम की कमी नहीं है, सारा दिन उसी में बीत गया, कोशिश कर रहा हूँ कि काम समय पर खत्म हो जाये। देखते है क्या होता है? खाना खा कर हम दोनों सोनें लगे। सोते समय प्यार तो होना ही था सो वह हुआ, थका होने के कारण ज्यादा कुछ हो नहीं सका। एक ही दौर चला और फिर दोनों सो गये। इसी तरह से पुरा हफ्ता बीत गया। शनिवार को हम दोनों सुबह की फ्लाइट पकड़ कर वापस लौट आये।

हमें देख कर पत्नी खुश हो गयी। मैंने उस से कहा कि अब वह मेरे साथ चलेगी। माधुरी नें भी मेरी बात से सहमति जतायी। पत्नी बोली कि चलों मैं तैयारी करती हूँ। माधुरी बोली कि मैं घर जा रही हूँ। यह कह कर वह अपना सुटकेस ले कर चलने लगी तो पत्नी बोली कि इतनी जल्दी क्या है आराम से चली जाना। माधुरी उस की बात सुन कर रुक गयी, मैं नहाने चला गया।

नहा कर आया तो माधुरी बोली कि अभी तो मैं घर जा रही हूँ कल फिर आती हूँ। मैं उसे बाहर छोड़ने चल दिया। रास्ते में वह बोली कि दीदी को ज्यादा परेशान नहीं करना। मैंने कहा कि भई मेरी भी पत्नी है, वह बोली कि तुम्हें सब पता है मैं क्या बात कर रही हूँ? मैंने कहा कि मैडम की बात का ध्यान रखा जायेगा। वह कैब पकड़ कर चली गयी।

पत्नी अपने कपड़ें रख रही थी, मुझे देख कर बोली कि तुम्हारें कपड़ें कौन से रखने है? मैंने उसे बताया कि कम से कम सात दिन के कपड़ें रख लो, अंडरगारमेन्ट भी रख लेना, यह सुन कर वह बोली कि माधुरी कुछ नये गारमेन्ट ले कर गयी थी, कुछ यही छोड़ गयी थी उन्हें ही रख लेती हूँ। वह उन्हें लेने चली गयी। जब ले कर आयी तो मैंने देखा कि कई जोड़ें थे। उस नें उन्हें पैक कर लिया। मैंनें कहा कि अपने कपड़ें भी सही मात्रा में रख लेना वहाँ कपड़ें धोने की सुविधा नहीं है, वह बोली कि तुम मेरी चिन्ता मत करो।

मैं आराम करने चला गया। रात को पत्नी मेरे से बोली कि तुम्हें मेरी याद नहीं आयी तो मैंने कहा कि तुम से तो कहा था कि तुम आ जाओं तो तुम क्यों नही आयी? वह बोली कि मुझे अकेले रहने में डर लगता है। इस लिये नहीं आयी थी, माधुरी से पता चलने के बाद अब नहीं डर लगेगा। मैंने उसे अपने आगोश में ले लिया। वह भी प्यासी थी मैं भी प्यासा था सो दोनों अपनी अपनी प्यास बुझाने में लग गये। जब प्यास बुझ गयी तो दोनों सो गये।

सुबह उठे तो पत्नी बोली कि तुम नें तो रात में जान ही निकाल दी, इतनी ताकत कैसे आती है, लगता है माधुरी के साथ कुछ करा नहीं है। मैंने कहा कि यार कुछ ना करो तो आफत कुछ करों तो आफत क्या करुँ। माधुरी से पुछना कि कुछ करा था या नहीं मैं तो दोनों के साथ एक जैसा ही रहता हूँ। वह बोली कि नाराज क्यों होते हो, मैं तो मजाक कर रही थी, मेरे बारें में तुम्हें पता तो है। मैंने उसे समझाया कि हफ्तें बाद करेगें तो ऐसा लगेगा ही।

वह मुस्करा कर बोली कि माधुरी से पुँछु तो बुरा तो नहीं मानोंगें? मैंने कहा कि बुरा क्यों मानुँगा, तुम्हारी बहन है जरुर पुछों। तुम सेक्स का मजा नहीं लेती इस लिये ऐसा होता है तो वह बोली कि मजा तो ले रही हूँ तुम से शिकायत भी नहीं कर सकती। मैंने कहा मैं बुरा कब मान रहा हूँ कारण बता रहा हूँ। हम सब उम्रदराज हो रहे है सो कुछ तो उम्र का असर तो दिखायी देगा ही। वह हँसी और बोली कि जब दोनों को संतुष्ट कर पाते हो उम्रदराज कहाँ से हुये?

मैं कुछ नहीं बोला। उस नें पुछा कि मैं इस विषय में माधुरी से बात नहीं करती हूँ ताकि तुम को बुरा ना लगे, मैंने कहा कि मुझे बुरा क्यों लगेगा। तुम दोनों ही बता सकती हो कि क्या इस में कुछ सुधार हो सकता है? वह बोली कि हाँ यह तो हो सकता है मैं उस से बात करके देखुँगी। मैंने मन में सोचा कि अब क्या होगा यह तो कहा नहीं जा सकता? मैं भी थका हुआ था सो नहा कर नाश्ता कर के सो गया।

शाम को माधुरी नें ही मुझे झकझौर कर जगाया कि सारे दिन सोते ही रहोगें? मैं उठ कर बैठ गया और बोला कि यार आज कितने दिनों बाद सोने का मिला था। वह बोली कि शाम हो गयी है चलो चाय पीते है। मैं उठ कर उस के साथ बेडरुम से बाहर आ गया। ड्राइंगरुम में पत्नी जी चाय के साथ इंतजार कर रही थी। लगता था माधुरी काफी देर से आयी हूँई थी।

चाय पीते समय माधुरी बोली कि मैं तो काम में सारा दिन काट देती थी, दीदी का समय कैसे कटेगा। मैंने कहा कि टीवी देख लेगी, फिल्म वगैरहा देख कर कुछ समय कट जायेगा। देखते है कितने दिन इस का मन लगता है। अगर नहीं लगा तो वापस आ जायेगी। मैं तो काम पुरा होने से पहले आ नहीं सकता। पत्नी बोली कि मेरे बाद माधुरी आ जायेगी। मैंने कहा कि उसे छुट्टियाँ लेनी पड़ेगी जो सही नहीं रहेगा। मैं अकेला रह लुँगा तुम मेरी चिन्ता मत करो।

मेरी बात पर दोनों बोली कि यह तुम्हारें सोचने की बात नहीं है। उन की बात सुन कर मैं बोला कि तुम दोनों को जो अच्छा लगें सो करों। रात को खाना खाने के बाद जब सोने की बारी आयी तो पत्नी बोली कि आज तो माधुरी के साथ ही सो जाओं, हफ्ते भर तुम से दुर रहेगी। माधुरी उस की बात सुन कर शर्मा गयी। मैं उस के साथ सोने चला गया, सुबह जल्दी जगना था सो जल्दी सोना जरुरी था। माधुरी बोली कि आज कुछ मत करों, सोते है लेकिन यह होना संभव नहीं था सो एक दौर तो चला, उस के बाद सो गये।

अलार्म नें उठा दिया तो तैयार हो कर कैब बुला ली, माधुरी बोली कि मैं यही से कालेज चली जाऊँगी, हम दोनों कैब से एअरपोर्ट के लिये चल दिये। फ्लाईट टाइम पर पहुँच गयी। मैं पत्नी को छोड़ कर साइट पर चला गया। कुछ देर बाद माधुरी नें फोन करके कहा कि दीदी के लिये खाना ऑडर कर दो, मैंने उसे बताया कि कंपनी नें इस का इंतजाम कर दिया है।

वह बोली कि यह तो अच्छा है। मैंने उस से पुछा कि उस नें नाश्ता कर लिया तो वह बोली कि मन नहीं कर रहा है। मैंने कहा कि अगर ऐसा करना है तो वह भी छुट्टी ले कर मेरे पास आ जाये, तो वह बोली कि चिढ़ाओं मत आ भी जाऊँगी, मैंने कहा कि स्वागत है।

वह बोली कि तुम्हारें साथ पुरा हफ्ता अकेले बिताने के बाद अकेलापन काटने को दौड़ रहा है, क्या करुँ? मैंने उसे समझाया कि काम में लगी रहो, लेकिन खाना तो खाओं। वह बोली कि नाश्ता मगाँती हूँ। इस के बाद फोन काट दिया। पत्नी से पुछा तो उस ने बताया कि खाना आ गया है। कुछ देर बाद खा लुँगी। उसे मैंने बताया कि माधुरी का फोन आया था तुम्हारें खाने की चिन्ता कर रही थी, उसे बता दिया है लेकिन उस ने नाश्ता नहीं किया है। पत्नी बोली कि अकेली है इस लिये ऐसा कर रही है मैं समझा दूँगी। मैंने फोन काट दिया।

शाम को जब वापस आया तो पत्नी नें बताया कि नाश्ता तो माधुरी नें कर लिया लेकिन खाना नहीं खाया है कह रही है कि मन ही नहीं लग रहा है। क्या करें? मैंने कहा कि मैंने उस से कहा है कि अगर मन नहीं लगे तो यहाँ आ जाये। पत्नी बोली कि मैंने भी यही कहा है। हम दोनों उस की चिन्ता में लगे रहते है। ये लड़की तो बचपना करती है। मैं चुप रहा, क्या कहता, कुछ समझ नहीं आ रहा था। माधुरी को फोन किया तो वह बोली कि खाना बना रही हूँ, बना कर खा लुँगी। मुझे यह सुन कर चैन मिला।

हफ्तें में कई दिन छुट्टियाँ थी। मैंने उस से कहा कि वह शुक्रवार को आ जाये, वह बोली कि ऐसा ही करती हूँ। पत्नी बोली कि मैंने उस से कहा था कि मेरे साथ चले तो बोली कि आप चली जाओ, मैं तो रह कर आयी हूँ, मैं बोला कि उस का कॉलेज जाना भी जरुरी था, अब छुट्टियाँ है तो आ सकती है। मेरी बात सुन कर पत्नी के चेहरे पर संतोष नजर आया।

खाने के बाद पत्नी बोली कि थके तो नहीं हो मैंने कहा कि प्यार करने के लिये कभी नहीं थकता, यह कह कर मैंने उसे अपने पास घसीट लिया। पत्नी बोली कि कुछ तो चैन करो। मैंने कहा कि यार चैन की बात मत किया करो। एंकात मिला है तो उस का मजा लो।

वह बोली कि माधुरी से कैसी शर्म है, मैंने कहा कि जैसी तुम्हारी मर्जी। वह मुझ से लिपट कर बोली कि चुप रहो और यह कह कर उस के होंठ मेरे होंठों से मिल गये। लम्बें चुम्बन के बाद मैंने उस के शरीर को सहलाना शुरु कर दिया। इस से उस के शरीर में करंट लग गया।

वह इस का आनंद उठाती रही। फिर मैंने उस के कपड़ें उतार दिये, वह मेरे कपड़ें उतारने में लग गयी। जब दोनों निर्वस्त्र हो गये तो एक दूसरे के शरीर को सहलाने लगे। फिर मैंने उस के उरोजों को सहला कर उन की निप्पलों को चुसना शुरु कर दिया। अब तो यह खेल लम्बा चलना था। अभी तो यह शुरुआत थी।
 
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