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Horror जिन्न का मुकम्मल इश्क़

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VKG9899

Supreme
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ये कहानी एक फोरम के सबसे प्रसिद्ध id की है शायद ही आज तक कोई एक अकेला आदमी इंटरनेट पर केवल अपनी कहानियो के लिए इतना प्रसिद्द हुआ होगा जितना वो थे, कुछ गिने चुने लोग थे जिनसे उसकी साक्षात मुलाकात हुई थी जिनमे से एक मई भी था , जो लोग गुरु जी को जानते थे वो शर्मा जी को भी जानते थे क्योंकि शर्मा जी गुरु जी की परछाई थे , और गुरु जी पूरी तरह से एक धूर्त व्यक्ति थे जो काल्पनिक कहानिया लिखते थे , इन कहानिओ का वास्तिविकता से कोई लेना देना नहीं था लेकिन उनकी कहानियो का एक मुख्य पात्र शर्मा जी वास्तविक थे जो लोग शर्मा जी से मिले है वो जानते है की शर्मा जी एक विशेष बीड़ी का सेवन करते थे जो हर कही उपलब्ध नहीं थी,
और शर्मा जी गुरु जी को जी भर के गाली देते थे

राजीव गुरु की कहानियां बहुत लोगो ने कॉपी पेस्ट की है और मई भी उनकी कुछ कहानियां आपको सुनाऊंगा मेरे पास उनकी 159 कहानियो का पीडीऍफ़ है जो अपनी पोल खुलने से पहले उन्होंने हटा दी थी चलिए शरु करते है एक एक करके
 

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"क़ैद हो जाओगे! मजूरी करोगे!" मैंने कहा,

"मेरी मुहब्ब्त के खातिर? मैं तैयार हूँ" उसने कहा,

"इतनी पाक मुहब्ब्त?" मैंने कहा,

"हाँ, ये मेरी मुहब्बत है" उसने कहा,

सच कहा था उसने! इंसान कभी पाक मुहब्ब्त नहीं करता! कोई न कोई लालच निहित होता है उसमे! लेकिन जिन्न! जिनंपाक मुहब्ब्त करता है, कोई शक नहीं!

"उस से क्या फायदा?" मैंने पूछा,

"इसके बिना क्या फायदा?" उसने मेरी बात एकदम से काटी!

बात सही भी थी!

"मैं तो समझा रहा हूँ, ताकि तुम समझ जाओ" मैंने कहा,

"मैं समझा हुआ हूँ" उसने कहा,

"तुम नहीं समझे हुए शहज़ाद! और अगर मेरे दिल से पूछो तो मैं तुम्हे कोई नुक्सान नहीं पहुंचाना चाहता" मैंने कहा,

"अगर पहुंचा सके तो कोशिश ज़रूर करना. जैसे पहले दो आलिमों ने करी थी, उनका खाना खराब है अब, हाँ वायदा करता हूँ आपका नहीं करूँगा, क्योंकि आपके पास और भी जिन्नात हैं" उसने कहा,

"कौन है मेरे पास?" मैंने पूछा,

"खलील, शाही जिन्न" उसने कहा,

"हाँ! सो तो है" मैंने कहा,

"मैं तब भी नहीं मानने वाला आलिम साहब" उसने कहा,

"इतनी ज़िद न करो" मैंने कहा,

"ये ज़िद नहीं मेरी मुहब्ब्त को बचाने की गुहार है" उसने कहा,

"कैसी मुहब्ब्त? कोई कौवा कहे कि मैं इस इमारत से मुहब्बत करता हूँ तो क्या मैं मान लूँ?" मैंने पूछा,
 

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"आप न मानिये, वो कौवा इसमे खुश है न?" उसने कहा,

"और तुम अपनी ख़ुशी के लिए इसकी जान लोगे, एक मासूम आदमजात की?" मैंने पूछा,

"कैसी जान, मेरे होते हुए कौन जान लेगा इसकी, उसके टुकड़े कर दूंगा" वो गुस्से से बोला,

"इतनी मुहब्बत?" मैंने कहा,

"हां आलिम" उसने कहा,

तब मैंने तज़ज़ुर-अमल पढ़ा!

"इस से कुछ नहीं होगा, मैंने पढ़ाई की है इसकी" उसने कहा,

और सच में ही कुछ नहीं हुआ!

"कुछ और इस्तेमाल करें" उसने ऐसा कहा!

ये तो खुली चुनौती थी मुझे!

अब मैंने दुर्रफ़खरदूम अमल पढ़ा अब!

वो गायब हुआ!

डर गया!

मैंने निवि को देखा, सुप्त! नशे में सुप्त!

और तभी फिर से हाज़िर हुआ शहज़ाद!

मैंने अमल पढ़ लिया था, उसकी और कर दिया, और देखिये! अमल वापिस हो गया!

"शहज़ाद, अभी भी मान जा" मैंने कहा,

"दुर्रफ़ काम नहीं आया तो घुटने टेक दो" उसने कहा,

इतनी बेबाकी? गुमान?

"ज़ुबान सम्भाल ओ आतिश!" मैंने गुस्से से कहा,

"आपका ही उत्तर दिया मैंने!" उसने कहा,

और वो फिर गायब हुआ!
 

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वो लोप हो गया था! ये मेरा वहम था, और ये मैं जानता भी था, जिन्न बेहद कारगुज़ार होते हैं, आपके दिमाग को पढ़ते हैं और आपके कुछ करने से पहले ही उसकी काट कर डालते हैं! मेरु गुरु श्री ने इनके विषय में मुझे अच्छी पढ़ाई करवायी थी, जो आज तक काम आती है, इसी वजह से मैं इनसे टकराने का माद्दा रखता हूँ नहीं तो कोई भी आदमजात इनसे पार नहीं पा सकता! मैं इनकी नस नस से वाक़िफ़ हूँ! शहज़ाद कहीं नहीं गया था, वो किसी आलिम जिन्न को लेने गया था और वो फिर कुछ देर बाद हाज़िर हुआ!

उसके साथ एक बड़ा ही खौफनाक सा जिन्न था, इसको हथिया जिन्न बोलते हैं, खिलाड़ी जिन्न! यही मार-धाड़ करता है, मकानों की छतें उड़ा देता हैं ईंट-पत्थरों की बारिश कर देता हैं, ज़मीन पर अपना कब्ज़ा जमा लेता है, पीर का रूप धारण कर लेता है!

"कौन है तू?" उसने मुझसे पूछा,

"क्यों? शहज़ाद ने नहीं बताया?" मैंने उसको जवाब दिया!

"बहुत जुबां चलाता है?" उसने कहा,

"तुझे ऐसा लगा?" मैंने पूछा,

"बताता हु तुझे" उसने कहा,

और मुझ पर एक फंदा फेंका, मैंने तामूल-मंत्र से उसका वार खाली किया!

चौंका पड़ा वो!

"आलिम लगता है!" उसने कहा,

"पता नहीं, खुद देख ले!" मैंने कहा,

"देख लूँगा, अब तू जाएगा ही नहीं यहाँ से वापिस" उसने कहा,

और अब उसने मुझे पर कई वार किये, सभी खाली!

झुंझला उठा वो!

वो फिर गायब!

हार गया हथिया!

भाग गया शहज़ाद!

कुछ देर हुई, कोई नहीं आया,
 
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