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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

komaalrani

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छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

भाग ११२ -अगला दिन, बुच्ची और इमरतिया पृष्ठ ११४५

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komaalrani

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Update bohot hi achha tha.

Par mujhe laga ki ab buchi ki bari hai.par yahan to or bhi siksha ki jarurat thi surju ko
इस भाग के तीसरे ही पार्ट में लग गया था की सूरज को थोड़ी और ट्रेनिंग की और कॉन्फिडेंस की जरूरत है जब वो कमान खुद हाथ में ले, पहली बार तो विपरीत रति में इमरतिया ने देवर को सिर्फ स्त्री देह के सुख का परिचय कराया था

तीसरा पार्ट यानी बुच्ची और भैया संग मुख रस

लेकिन आग तो बुच्ची की चुनमुनिया में लगी थी और उसने अपने भैया को आखिर बोल दिया,....
और टाँगे खूब फैला के भैया के कंधे पे

लेकिन परेशानी वही थी, जो अभिमन्यु को थी, चक्रव्युह का आखिरी द्वार, लेकिन बेचारे सूरजु को पहला द्वार ही नहीं मालूम था, बिल कैसे ढूँढ़े, कैसे सटाये, कैसे पेलें, एक बार सुपाड़ा बस घुस जाए तो फिर उनके देह में इतनी ताकत थी की चीथड़े चीथड़े कर देते,

बुच्ची पूरा साथ दे रही थी, अपने हाथ से पकड़ के बिल पे लगा रही थी, हिम्मत भी बंधा रही थी


लेकिन अब इमरतिया ऐसी प्रौढ़ा के साथ दो दो राउंड, एक बार सूरज ऊपर, एक बार इमरतिया को निहुरा के

तो अगली बार बुच्ची के साथ ये परेशानी नहीं आएगी और इमरतिया अपने सामने

और कोशिश करुँगी अगले पोस्ट में ही बुच्ची भी इमरतिया की बिरादरी में आ जाए
 

Chalakmanus

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इस भाग के तीसरे ही पार्ट में लग गया था की सूरज को थोड़ी और ट्रेनिंग की और कॉन्फिडेंस की जरूरत है जब वो कमान खुद हाथ में ले, पहली बार तो विपरीत रति में इमरतिया ने देवर को सिर्फ स्त्री देह के सुख का परिचय कराया था

तीसरा पार्ट यानी बुच्ची और भैया संग मुख रस

लेकिन आग तो बुच्ची की चुनमुनिया में लगी थी और उसने अपने भैया को आखिर बोल दिया,....

और टाँगे खूब फैला के भैया के कंधे पे

लेकिन परेशानी वही थी, जो अभिमन्यु को थी, चक्रव्युह का आखिरी द्वार, लेकिन बेचारे सूरजु को पहला द्वार ही नहीं मालूम था, बिल कैसे ढूँढ़े, कैसे सटाये, कैसे पेलें, एक बार सुपाड़ा बस घुस जाए तो फिर उनके देह में इतनी ताकत थी की चीथड़े चीथड़े कर देते,

बुच्ची पूरा साथ दे रही थी, अपने हाथ से पकड़ के बिल पे लगा रही थी, हिम्मत भी बंधा रही थी


लेकिन अब इमरतिया ऐसी प्रौढ़ा के साथ दो दो राउंड, एक बार सूरज ऊपर, एक बार इमरतिया को निहुरा के

तो अगली बार बुच्ची के साथ ये परेशानी नहीं आएगी और इमरतिया अपने सामने

और कोशिश करुँगी अगले पोस्ट में ही बुच्ची भी इमरतिया की बिरादरी में आ जाए
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
 
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komaalrani

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komaalrani

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फागुन के दिन चार
भाग ४८ -मंजू और गुड्डी पृष्ठ 477

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Random2022

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गप्पू

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"अरे तुम सब लड़कियां खाली खी खी करती रहोगी की,.... बेचारे लड़के भूखे हैं उन्हें खाना भी परसोगी " बूआ जोर से गरजीं ,



सिस्टम यही था की घर के सब लड़के पंगत में सब काम ख़त्म होने के बाद पंगत में बैठते थे और घर की लड़कियां ही उन्हें खाना परोसती थीं और उसके बाद लड़कियां खाने बैठती थी तो लड़के पत्तल लगाने से लेकर खाना परसने तक, और इसी बीच हंसी मजाक, नैन मटक्का, इशारेबाजी सब चलता था।

बुच्ची पानी दे रही थी, एक बड़े से जग में सब लड़को के कुल्हड़ में, और चुनिया चिढ़ा रही थी,

' प्यास बुझाने का काम आज से बुच्ची के जिम्मे है, …यार मेरा भाई बहुत प्यासा है उसका जरा ख्याल रखना "
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" तू ही काहें नहीं पिला देती, इतना भाई भाई कर रही है "

बुच्ची ने हंस के चुनिया के पीछे चूतड़ में चिकोटी काटते कहा।

तब तक गप्पू चिल्लाया, " पानी , पानी, कोई प्यासे को पानी दे "

असली खेल ये थे की जब बुच्ची झुक के पानी देती थी तो उसके दोनों कड़े कड़े उभार उस छोटी सी टाइट फ्राक से साफ़ दिखते थे, बस लड़को का मन करता पकड़ के दबोच लें , और बाकी लड़कियां भी लड़को की शरारत समझ रही थीं।

समझ तो बुच्ची भी रही थी, लेकिन उसे भी मजा आ रहा था, जुबना दिखाने में,… ललचाने में।

जब दो चार बार ये बदमाशी हो गयी गप्पू की,…. तो दूर से बुकवा पिसती इमरतिया ने बुच्ची को आँख मार के इशारा किया।

और अबकी पानी देती बुच्ची ने थोड़ा सा पानी का जग तिरछा किया और सीधे गप्पू के पैंटपे, ठीक वहीँ सेंटर पे

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और अब लड़कियां हो हो हो, एक बुच्ची की सहेली बोली,

"हे चुनिया तेरे भाई को इतनी जोर से आ रही थी कर के आजाता, खाना भागा थोड़ा ही जा रहा था।“

चुनिया ने उसी का दुप्पटा खींच के अपने भाई को पकड़ा दिया, " लो भैया सुखवा लो, वैसे प्यास बुझी की नहीं "

पर चारो ओर नाइन कहाईन, शादी का घर, घचमच मची थी, काम बहुत था और नाउन, कहाईन, काम करने वाली हों तो मजाक का लेवल भी बढ़ जाता है, उसी में से किसी ने चुनिया का साथ देते बुच्ची को छेड़ा,

" अरे ये वो वाला पानी नहीं, असली वाला पानी है, बुच्ची अंदर ले लेबू तो गाभिन हो जाबू " और फिर तो चुनिया की सहेलियों की हंसी

लेकिन एक कहाईन थी वो गप्पू के पीछे पड़ गयी


" अरे इतना जल्दी पानी निकल गया, खाली हमरे बुच्ची बबुनी का जुबना देख के, जब बिलिया देखबा तो कौन हाल होई "
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उसके बाद लड़कियों की पंगत बैठी, साथ में भौजाइयां भी, पर बुआ एकदम काम की लिस्ट लिए पड़ी थी,

" जल्दी जल्दी खाय के उठो, खाली तुम सब खी खी खी करती रहती हो , सांझ होने के पहले सब काम ख़तम होना है "
Aaj 1-2 mahine baad time Mila is story pr wapis aane ka. Koshish karun aj kal me sare update padh loon
 

Random2022

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चार बूँद कडुवा तेल
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लेकिन इमरतिया, इमरतिया थी। चाशनी में डूबी, रस में पगी।

और देवर को तड़पाना जानती भी थी और चाहती भी थी, स्साला खुद अपने मुंह से मांगे, बुर बुर करे, तो बस अंगूठे और तर्जनी को तेल में चुपड़ के खूंटे के बेस पे, और सोच के मुस्कराने लगी, अभी थोड़ी देर पहले बुच्ची के हाथ में जो पकड़ाया था दोनों कैसे घबड़ा रहे थे,

यही शरम लाज झिझक तो खतम करवा के पक्का चोदू बना देना है इसे बरात जाने के पहले,

मरद की देह के एक एक नस का, एक एक बटन का पता था इमरतिया को।

कहाँ दबाने से झट्ट खड़ा होता है, कहाँ तेल लगाने से लोहे का खम्भा हो जाता है, और बस वहीँ वो तेल लगा रही थी, दबा रही थी और खूंटा एकदम कुतुबमीनार हो रहा था। लेकिन देवर था एकदम आज्ञाकारी, कल उसने सुपाड़ा खोल के जो हुकुम दिया था, 'एकदम खुला रखना उसको' तो एकदम खुला ही था, चोदने के लिए तैयार। बस गप्प से इमरतिया ने मोटे लाल सुपाड़ा को दबाया, उसने मुंह चियार दिया, और

टप्प, टप्प, टप्प, टप्प, चार बूँद कडुवा तेल की सीधे उसी खुले छेद में, और लुढ़कते पुढ़कते अंदर तक।
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लंड फड़फड़ाने लगा।

और फिर दोनों हथेलियों में तेल लगा के जैसे कोई ग्वालिन मथानी चलाये, उसी तरह और सीधे इमरतिया की मुस्कराती उकसाती आँखे सीधे सूरजु की आँखों में, उसे छेड रही थीं, चिढ़ा रही थी।

सूरजु की आँखें इमरतिया के भारी भारी ३६ साइज के जोबन से चिपकी थीं जो आधे से ज्यादा चोली से छलके पड़ रहे थे

" चाही का, अरे तोहरी महतारी का और बड़ा है, बहुते जोरदार, आज ललचा रहे थे न देख देख के, अरे मांग लो, पिलाय देंगी दूध "

इमरतिया ने सूरजु की माई का नाम लगा के चिढ़ाया लेकिन बातें दोनों सही थीं। सूरजु की माई का ३८ था, लेकिन था एकदम टनक कितनी बार इमरतिया और सूरजु की माई के बीच में दंगल होता था लेकिन जोबन की लड़ाई में सूरजु की माई हरदम बीस पड़ती थीं , अपनी बड़ी बड़ी चूँची से इमरतिया को कुचल देती थीं।

" बल्कि मांगने की बात भी नहीं, ले लेना चाहिए " इमरतिया ने और आग लगायी और सूरजु के दोनों हाथ पकड़ के अपनी चोली पे

और पहलवान के हाथ के बाद चुटपुटिया बटन कहाँ टिकती, चुटपुट चुटपुट चटक के खुल गयी।

ब्लाउज उसी खूंटी पे जहां सुरुजू का तौलिया और इमरतिया की साडी टंगी थीं, और दोनों बड़े बड़े कड़े जोबना सूरजु के हाथ में
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कुंवारे जवान मरद का हाथ पड़ते ही इमरतिया पिघलने लगी , लेकिन ये चाहती भी थी। अब सूरजु का दोनों हाथ लड्डू में फंसा था इमरतिया कोई बदमाशी करती, वो हाथ लगा के रोक नहीं पाता। लेकिन वो साथ साथ सूरजु को सिखा भी रही थीं की नयकी दुलहिनिया को कैसे कचरे।कैसे उसके चोली के अनार को पहली रात में ही मिस मिस के पिसान (आटा ) कर दे,

" अरे ऐसे हलके हलके नहीं , ये कउनो बुच्ची क टिकोरा नहीं है और उस की भी कस के रगड़ना। मेहरारू के मरद के हाथ में सख्ती पसंद है कैसे पहलवान हो ? कहीं तोहार महतारी तो कुल ताकत नहीं निचोड़ ली ?
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और अब सूरजु ने थोड़ा जोर लगा के चूँची मसलना शुरू किया और इमरतिया ने लंड को मुठियाना शुरू किया, लेकिन थोड़ी देर में ही सूरजु बाबू उचकने लगे,

" नहीं भौजी, मोर भौजी, छोड़ दा, छोड़ दा "

खूंटे पे हथेली का दबाव बढ़ाते इमरतिया ने चिढ़ाया, " क्या छोड़ दूँ ? स्साले मादरचोद, नाम लेने में तो तोहार गाँड़ फट रही है का दुलहिनिया को चोदोगे? बोल, का छोडूं, "

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अब सूरजु भी समझ गए थे और सुबह से तो गाँव की औरतें तो खुल के बोल रही थीं और सबसे बढ़ के उनकी माँ और बुआ और उन्ही का नाम ले के और माँ कभी बूआ की गारी का जवाब नहीं देती तो बूआ छेड़तीं,

" का सूरजु क माई,... मुंह में दुलहा क लंड भरा है का जो बोल नहीं निकल रहा है "

तो झिझकते हुए बोल दिया, " भौजी, लंड, हमार लंड, "

" तोहार न हो, हमार हो, तोहरी भौजी के कब्जे में है जहाँ जहाँ भौजी कहिये, वहां वहां घुसी, जेकरे जेकरे बिलिया में जैसे भौजी कहिये, बोलै मंजूर "


" एकदम भौजी " कस कस के चूँची मसलते सुरुजू बाबू बोले और अब वो भी मूड में आ रहे थे और जोड़ा, " लेकिन पहले, ...."

इमरतिया खुश नहीं महा खुस, सूरजु तैयार हैं लेकिन ऐसा इमरतिया के जोबन का जादू पहले यही मिठाई चाहिए देवर को, तो मिलेगी आज ही मिलेगी, दो इंच की चीज के लिए देवर को मना नहीं करेगी, बल्कि वो नहीं कहते खुद ऊपर चढ़ के पेल देती वो

बिन बोले इमरतिया के चेहरे की ओर देख के अपने मन की बात कह दी उन्होंने, और इमरतिया ने मुस्करा के हामी भर दी और खूंटा छोड़ भी दिया, वो डर समझ रही थीं, जो हर कुंवारे लड़के के मन में होता है, ' कहीं जल्दी न झड़ जाऊं " और वो जानती थीं की ये लम्बी रेस का घोडा है लेकिन उसे अभी खुद अपनी ताकत का अहसास नहीं है, किस स्पीड से दौड़ेगा, कितनी देर तक दौड़ेगा, दो चार पर इसे चढ़ाना जरूरी है ,


फिर भी खूंटा उसने छोड़ दिया लेकिन इमरतिया के तरकश में बहुत तीर थे।

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खूंटा छोड़ के उसने रसगुल्लों में तेल लगाना शुरू किया, मलाई का कारखाना यही तो थे, यही तो दुलहिनिया को पहली रात को गाभिन करेंगे और सबेरे चादर पर खून के साथ इसी की मलाई बहती मिलेगी, जब छोटी कुँवारी ननदें जाएंगी उठाने। और फिर हथेली से सुपाड़ी पे


असली खेल था सुपाड़े को एकदम तगड़ा, पत्थर ऐसा करना, भाला कितना लम्बा हो लेकिन अगर उसका फल भोथरा हो तो शिकार कैसे करेगा। और सूरजु देवर का सुपाड़ा तो एकदम ही मोटा, एकदम मुट्ठी ऐसा, बुच्चीया यही तो सोच के घबड़ा रही थीं, भैया क इतना मोत कैसे घुसी, और एक बार सुपाड़ा घुस जाए तो फिर लंड तो घुस ही जाता है।

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सूरजु सिसक रहे थे और इमरतिया ने बुच्ची की बात चलाई, " हे तोर बहिनिया, बुच्ची पकडे थीं तो कैसा लग रहा था ?

" अरे भौजी, आप जबरे उसकी मुट्ठी में पकड़ा दी थीं " हँसते हुए सूरजु बोले।

और एक बार फिर से हथेली में तेल चुपड़ के कस के खूंटा दबोच लिया, इमरतिया ने।

वास्तव में बहुत मोटा था, जब इमरतिया की मुट्ठी में नहीं समा रहा था तो नयकी दुलहिनिया की कोरी कच्ची बिलिया में कैसे धँसेगा ? इमरतिया मुस्करायी। चाहे जितनी रोई रोहट हो, चिल्ल पों करे, घोंटना तो पड़ेगा ही और वो भी जड़ तक। और ओकरे पहले बुच्ची ननदिया को।
Aane do padhi likhi Bahuriya ko. Suhagrat ko sab padhai likhai dhari reh jayegi
 

Random2022

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भाग १०८ - खुल गया नाड़ा
२७,३४,५१४
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इमरतिया उसको सब गुर सिखा रही थी।



" लेकिन ये मत समझो की भरतपुर इतनी आसानी से लूट लोगे। उसको भी उसकी भौजाई, घर की नाउन, माई मौसी सिखा रही होंगी। दोनों गोड़ में गोड़ फंसा के बाँध लेगी जिससे भले नाड़ा खुल जाए, लेकिन पेटीकोट उतर न पाए। फिर शहर वाली है तो पेटीकोट के नीचे भी का पता चड्ढी पहनती हो, या उस दिन जानबूझ के पहने।
दूसरी बात, पेटीकोट की गाँठ, एक गाँठ नहीं भौजाई सब सिखा के भेजेंगी, सात सात गाँठ, और न खोल पाए, तो अगले दिन जब तोहार बहिनिया सब हाल चाल पूछेंगी न तो न हंस के वही चिढ़ाएगी, ' तोहार भाई तो पूरी रात लगा दिए, मुर्गा बोलने लगा, गाँठ खोलने में तो का कर पाते बेचारे। तुम सब कुछ सिखाये पढ़ाये नहीं थीं का। '

और उससे ज्यादा तोहार सास अपनी समधन का, तोहरी माई क चिढ़ाएँगी,...' बेटवा जिन्नगी भर पहलवानी करता रहा गया और हमार बिटिया जाए के, रात भर में नाड़ा क गाँठ ढूंढे में लग गयी, "


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अब भौजी सीने पे हाथ पे बुकवा लगी रही थीं फिर ढेर सारा बुकवा लेके जो थोड़ा सोया थोड़ा जाएगा मूसल था उसके ऊपर, और बस हलके हलके लें भौजाई की उँगलियों की छुअन लेकिन इतना काफी था, वो फिर से फुफकारने लगा।

सुरजू भौजी के गदराये जोबना को निहार रहा था, लालटेन की हलकी हलकी पीली रौशनी, जमीन पर छितरायी थी।

गोरा चम्पई मुखा, छोटी सी नथ, बड़ी सी बिंदी, लाल लाल खूब भरे रसीले होंठ,

-" क्यों खोलना है नाड़ा " भौजी एकदम उसके सीने पे चढ़ी, अपने पेटीकोट का नाड़ा दिखा रही थीं,

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सुरजू ने हाथ बढ़ाया, लेकिन भौजी ने झटक दिया

" हे ऐसे थोड़ी। जिन्नगी में पहली बार नाड़ा खोल रहे हो, नेग देना पड़ेगा "


सुरजू ने बोला ही था की का चाही नेग में, बिना पीछे मुड़े बाएं हाथ से भौजी ने देवर का मुस्टंडा तन्नाया लंड पकड़ लिया और दाएं हाथ से देवर का हाथ खींच कर नाड़े पे,

" ये चाही, और जेकरे जेकरे बुरिया में कहब ओकरे ओकरे बुरिया में जाई "

" एकदम भौजी, लेकिन देवर के कुल गुन ढंग सिखाना पड़ेगा "


हँसते हुए सुरजू बोले और नाड़ा खींच दिया, सररर पेटीकोट नीचे और लालटेन की रौशनी में दोनों भरी भरी फांके, गलबाहें डाले, कसी चिपकी रस से भरी मालपूवे की तरह
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लालची मोटा नेवला लार टपकाने लगा। सुपाड़े के ऊपर प्री कम की दो बुँदे छलक गयीं

‘कुल सिखा दूंगी लेकिन पहले बुकवा तो छुड़ा दूँ, ‘ ....और बिना हाथ लगाए इमरतिया भौजी ने बुकवा छुड़ाना शुरू कर दिया, अपने जोबन से रगड़ के, देह से घिस घिस के, क्या कोई बाड़ी टू बाड़ी मसाज करेगा और जब खूंटे पे लगे बुकवा का नंबर आया, दोनों जोबना के बीच दबा के।

बेचारे सुरजू की हालत खराब थीं, पहली बार नारी देह का सुख मिल रहा था, वो भी ऐसी गदरायी,

" भौजी, भौजी हमें करे दे ना, ....करा न "


" अनाड़ी चुदवैया बुर क खराबी, अच्छा चला देवर क मन भौजी न राखी तो के राखी लेकिन तू कुछ जिन करना मैं ही करुँगी "

इमरतिया बोली और देवर के ऊपर,

अब उसकी रसमलाई लालटेन की रौशनी में साफ़ दिख रही थीं फिर भी, दोनों हाथों से दोनों फांको को फैला के सुरजू को दिखाया, ललचाया और तने सुपाड़े के ऊपर रगड़ के ऊपर उठा लिया।

सूरज को जोर से झटका लगा, वो बोल उठा, " भौजी करा न, चोदा ना "

":बोल, बुच्चिया को चोदबे ना : " इमरतिया ने तीन तिरबाचा भरवाया।

" हाँ भौजी हाँ " सुरजू तू किसी भी बात पे हाँ करने को तैयार था।

" आज से लाज शर्म झिझक खत्म, जउने लौंडिया को औरत को देखोगे बस खाली ओकर चूँची देखोगे, यही सोचोगे की चोदने में केतना मजा देगी "
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"हाँ भौजी हाँ " सुरुजू बोलै और इमरतिया ने थोड़ा सा कमर नीचे कर के अपनी रसमलाई की दोनों फांके पूरी ताकत से फैला के सुपाड़े में रगड़ दिया।

उसके मरद का भी अच्छा खासा बड़ा था, छह इंच से ज्यादा ही रहा होगा और उसके बाद भी तो इमरतिया ने एक से एक घोंटे थे, कड़ियल जवान, तगड़े मरद, पहली चीज वो यही देखती थी, औजार।

लेकिन देवर का तो पूरा बांस था, और मोटा कितना, लेकिन इमरतिया भी खूब खेली खायी थी। भले ही कितनी चुदी थी, लेकिन अभी तक लड़कोर नहीं थी तो बुर का भोसड़ा नहीं हुआ था और ऊपर से बहुत ख्याल भी रखती थी अपनी राजदुलारी का वो।


सबसे पहले वो सरसों के तेल की बोतल उठा के सीधे धीरे धीरे बोतल से ही खड़े लंड पर, चमचम चमक रहा था।


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अंजुरी भर तेल से पहले तो नहला दिया, फिर अंजुरी भर तेल सीधे खाली सुपाड़े पे, बूँद बूँद, टप टप, टप टप, जैसे अखाड़े में कोई नया नया पहलवान तेल लगा के उतरा हो,
हाथ में लगा तेल इमरतिया ने अपनी दुलारी पे लपेट लिया और दो तेल में चुपड़ी ऊँगली, देवर को दिखाते हुए बुरिया में डाल के फांके दोनों फैला दी, फिर दोनों टाँगे अपनी छितरा के सूरजु के ऊपर,

सुरजू का सीना जितना चौड़ा था, कमर उतनी ही पतली, और चूतड़ देख के लगता था बला की ताकत होगी उसमे।


दाएं हाथ से अपनी दोनों फांके फैला के, बाएं से सुरजू का खूंटा पकड़ के इमरतिया ने फंसा लिया और फिर दोनों हाथों से सुरजू की दोनों कलाई पकड़ के सांस रोक के अपनी ताकत से दुने जोर से पहला धक्का मारा। जैसे पहली रात में दूल्हा, तड़पती, छटपटाती, दुलहिनिया की दोनों कलाई पकड़ के पूरी ताकत से धक्का मारता है और दुल्हिन की चीख पहले निकलती है, फिर चुरमुराती चूड़ियां चटचटा के टूटती हैं और गप्प से सुपाड़ा अंदर, कभी पूरा, कभी आधा, लेकिन एक बार घुस गया तो फिर बिना फाड़े नहीं निकलता।



बस उसी तरह पूरी ताकत से पेला इमरतिया ने,
Esi bhojai or guru kismat walon ko milti hai.
 

Random2022

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चढ़ गयी इमरतिया भौजी ----ऊपर
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" भौजी "

सुरजू की आँखे मजे से पलट गयीं, हल्की सी चीख निकल गयी। ये मजा उसने सोचा भी नहीं था। सारी देह का खून जैसे लंड में जमा हो गया था। देह गनगना रही थी।

इमरतिया सुरजू के मजे को देखकर मजा ले रही थी। बुर उसकी फटी जा रही थी, इतना दर्द तो बुर को बच्चा निकालते नहीं होगा, जितना इस मोटे मूसल को घोंट के हो रहा था, लग रहा था किसी ने पाव भर लाल मिर्च कूट कूट के भर दिया हो, ऐसे छरछरा परपरा रही थी।

लेकिन इसी छरछराने परपराने के लिए तो औरतें मरी जाती हैं।

सुरजू ने आँखे खोली और भौजी की आँखे उस की आँखों को देख के बिन बोले मुस्करा पड़ी, जैसे पूछ रही हों, मजा आया ? और देवर की आँख लजा गयी, जैसे नयी दुल्हन हो और इमरतिया भौजी दूल्हा हो।

इमरतिया ने कलाई छोड़ दी और अबकी सुरजू के दोनों कंधो को पकड़ के क्या हुमच के धक्का मारा और एक इंच और अंदर घुस गया। सुपाड़े ने अब बुर के अंदर जगह बना ली थी और इमरतिया ने सुरजू के दोनों हाथों को पकड़ के अपने जोबन पे रख के समझाया

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" इस से भी जोर से,…. ताकत से धक्का मारना होगा, बुच्ची की बुरिया में एकदम कोरी है, कच्ची तोहरी दुलहिनिया की तरह और दुलहिनिया के साथे तो और,…। नयी दुल्हन जान बुझ के तड़पाती हैं, पेलने नहीं देती, और केतनो चिचिययाये, रोये गाये, हाथ जोड़े, पूरी ताकत से पेले बिना घुसेगा नहीं, ज़रा भी रहम नहीं करना, पूरी बेदर्दी से पेलना। आपन पूरी पहलवानी देखाय देना वरना नाक कटी तोहार महतारी की, तोहरी ससुरारी में उनकी हंसाई होगी, यही दूध पिलाई थीं की लड़का घुसेड़ भी नहीं पाया। तोहरी दुलहिनिया तो और अपनी ओर से भींच के रखेगी, जांघ सटा के, देखें कैसे घुसाते हैं, मरद हमार। उसकी महतारी भौजाई, गाँव का नाउन कुल सिखा के भेजेंगी, इस लिए पूरी ताकत और कोई रहम नहीं, चीखने चिल्लाने पे। आखिर ओकर महतारी चुदवाने के लिए ही तो भेजी हैं. समझे बबुआ, “

इमरतिया अपने देवर को समझा भी रही थी, नयी दुलहिनिया को कस कस के पेलने के लिए, पहली रात के मजे के लिए तैयार भी कर रही थी, समझा के।


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फिर इमरतिया भौजी ने देवर को उकसाया।
“अब जरा नीचे से धक्का मारो, देखी तोहार पहलवानी। "

बेचारा पहलवान, पहली बार चुदाई के अखाड़े में उतरा था, और पहली बार धक्का मार रहा था, जोर उसने पूरा लगाया लेकिन हँसते हुए इमरतिया ने रोक दिया,

" अरे अपनी माई के भतार, तोहार महतारी कुछ सिखायेस नहीं, ऐसे नहीं खाली चूतड़ के जोर से "

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खाली सिखाने की देर थी, और अबकी नीचे से सुरजू ने पूरे जोर से धक्का मारा, इमरतिया ने अपनी कमर उसके दोनों हाथो में पकड़ा दी। सच में दस हाथी का जोर था, देवर में और हाथों की पकड़ भी तगड़ी थी।

इमरतिया कांप गयी, जैसे किसी ने मुट्ठी पेल दी हो। लेकिन उससे बड़ी बात थी धक्के रुके नहीं थे, एक बाद दूसरा। सच में सुरजू के लंड में ऐसी ताकत थी की दीवाल में छेद कर दे बस थोड़ा गुन ढंग सिखाने की बात थी।

पांच दस धक्के के बाद सुरजू ने साँस ली और मुस्करा के इमरतिया ने देखा और एक बार फिर से कमान अपने हाथ में ले

" अरे अपनी महतारी के यार, खाली धक्के मारने से काम नहीं चलेगा, …कल को अपनी बहिनिया बुच्ची की चोदोगे या अपनी दुलहिनिया की,… तो पांच दस धक्के के बाद रुक जाना, एक बार में पूरा बांस नहीं घोंट पाएंगी दोनों।"

थोड़ी देर कसी बुर में लंड का मजा लेने देना और लौंडिया की देह में तो हर जगह से रस छलकता है, चूँची है, गाल है, पूरी देह है सहलाओ, दबाओ, मसलो, नोचो, काटो। अरे दांत के, नाख़ून के निशान तो बहुत जरूरी है, वही देख देख के सोच सोच के अगले दिन दुलहिनिया का फिर से मन करेगा और ननदें छेड़ेंगी, ' क्यों भौजी, मच्छर काटा है का । '


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और हाँ कोई सम्हलने की अपने को रोकने की जरूरत नहीं की, कही चोट न लग जाए, दर्द न हो, खूब चीखेगी, कहरेगी, माई बाप करेगी, मतलब और करो।

अरे सब लोग मिल के बरात ले के जाओगे, काहें के लिए उसको लाने, चोदने के लिए ही न, और ओकर महतारी तोहार दरवाजा खन दी, हमरे बिटिया से बियाह करवाय द, भाई,… महतारी कुल भेज रहे हैं, काहें,… चुदवाने के लिए ही न,…. फिर तो जब चुदवाने आ रही है तो तनी ढंग से चुदवावे, कस कस के चूँची दबाओ, कचकचा के गाल काटो, चूस चूस के होंठ सुजा दो, चौथी ले के उसके भाई कुल काहें आते हैं ? यही देखने के लिए की उनकी बहिनिया ढंग से चोदी जा रही है की नहीं, “

और ये कह के भौजी ने देवर के दोनों हाथ एक बार फिर से अपनी दोनों बड़ी बड़ी चूँची पे रख लिए। अंधे को का चाहे दो आंखे और पगलाए देवर को का चाही, भौजी क दोनों चूँची

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बस क्या ताकत से चूँची इमरतिया की मसली गयीं, रगड़ी गयीं और इमरतिया नौसिखिया देवर को उकसा के, सिखा के देवरानी के लिए तैयार कर रही थी। और अब इमरतिया ने फिर से ऊपर से धक्के लगाने शुरू कर दिए और देवर से बोली

' और देवर जी, चोदते समय, जितना देर तक और जितना रगड़ रगड़ के,… औरत हो लौंडिया हो, पेली जाए, उस स्साली को उतना ही मजा आता है, मुंह से चाहे जो बोले, जितना चीखे चिल्लाये, छोड़ दो, बहुत पीरा रहा है, नहीं ले पाउंगी, ….तो सोचो स्साली काहें नहीं ले पाएगी, महतारी बाप भेजे काहें हैं, लौंड़ा घोंटने को ही तो भेजे हैं। इसलिए कुछ देर पेलने के बाद मौज मस्ती लो, और जब वो बुर के अंदर के लंड को भूलने लगे कहे अरे चूँची मत काटो बहुत पिरा रहा है तो और हचक के धक्के मारो "

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और यह कह के भौजी ने क्या जबरदस्त धक्के मारे और देवर का पूरा बांस घोंट लिया।
Super hot update. Lagta nhi ek sitting me sare update padh paunga agar aap ese hot likhenge to
 

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गाना नाच

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इमरतिया ने इशारे से सुरुजू को अपनी ओर बुलाया, और धीरे से बोली,

" अभिन थोड़ी देर में बगल में गाना नाच शुरू होगा "

सूरजु थोड़ा मुस्करा के थोड़ा उदास हो के उसी तरह धीमे से फुसफुसाते बोला, " तो हमें कौन देखे सुने के मिली, बाहर से कुण्डी लग जाई और सबेरे खुली। "

इमरतिया खुल के हंसी।

सच में होता यही था। इसी लिए रात के गाने का प्रोग्राम छत पर, मरद लड़के सब नीचे, और सीढ़ी का दरवाजा बंद , खाली सांकल ही नहीं ताला भी।

हाँ दूल्हे से उतनी लाज शर्म नहीं होती थी, उसी का नाम ले ले के तो सब बहिन महतारी गरियाई जाती थीं/ लेकिन ये बात भी सही थी की उसके कमरे के बाहर भी कुण्डी लगा दी जाती थी, थोड़ा बहुत आवाज सुनाई दे तो दे,

लेकिन देखने का कोई सवाल नहीं था और इसलिए भी की शायद ही किसी की साडी ब्लाउज बचती, और ज्यादा जोश हो तो बात उसके आगे भी बढ़ जाती, भौजाइयां ननदों की शलवार का नाड़ा पहले खोलती थीं।

गाल पे कस के चिकोटी काटते इमरतिया बोली,

" अरे हमरे देवर, तोहार ये भौजी काहें को है, कुल दिखाई देगा, तोहार बहिन महतारी सब का भोंसड़ा, लेकिन मैं बत्ती बंद करके जाउंगी और बत्ती खोलना मत, और ये देखो "


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इमरतिया ने बत्ती बंद की, और एक पतला सा काला कागज़ जो उसने खिड़की पे चिपका रखा था, उसे उचाड़ दिया, बस कई छोटे छोटे छेद, जैसे बच्चे बचपन में आँख लगा के ध्यान से बाइस्कोप देखते हैं, सूरजु ने आँख लगा लिया और उस पार का पूरा इलाका दिख रहा था, एक एक आवाज साफ़ आ रही थी जैसे उसी के कमरे में कोई बोल रहा हो, अभी इंतजाम हो रहा था, फर्श पे दरी बिछ रही थी, एक भौजी नीचे से ढोलक ले आयी थीं।

वो जोर से मुस्कराया और इमरतिया ने फिर कागज चिपका दिया और आगे की हिदायत दे दी,


" हे अपनी बहिन महतारी क देख देख के अगर ये टनटना जाए तो मुट्ठ मत मारने लग जाना और इस मोटू को खोल के रखना, "



लेकिन सूरजु भी अब चालाक हो गए थे, भौजी से बोले, " और भौजी, अगर तोहें, हमरी रसीली भौजी को देख के टनटना जाए तो

" तो अगली बार जैसे मिलूंगी चोद लेना और अगली बार मैं ऊपर नहीं चढूँगी तुम चढ़ के पेलना, ....जैसे हमारी ननद बुच्ची को चोदोगे , "
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इमरतिया बोली, और झुक के खड़े खूंटे को कस के दबोच लिया और प्यार से मसल दिया ,और निकलते हुए बत्ती बंद कर दी।



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Bahut Gajab likha hai apne . Very good
 

komaalrani

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