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Erotica चुदकड ब्यानजी

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The things you own, end up owning you
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प्रीति ब्यानजी से बदला



शाम ढल री थी म्हारी ब्यानजी प्रीति, दीया री मम्मी, बड़ी चुलबुली, भारी बोबो और मोटी गाँड वाली — लाल घाघरा चोली पहन के आयी।
ओढ़नी उनके कंधे पर से ढलक गी थी, और चोली में सूं उनके मोटे बोबे ऐसे फड़क रहे थे जैसे दो पके खरबूजे। उनकी चाल में इतनी ठसक कि लोग दूर सूं ई ताकण लाग्या।
ज्यों ही हम गले मिले, उनके दोनों हाथ मेरी मोटी गाँड की फाँकों पे जा पड़े, और मैंने भी उनकी मोटी चिकनी गाँड की फाँकों को कपड़ो के ऊपर ही दबा लिया।
प्रीति ब्यानजी बोली —
“मालजादी की ब्यान, आज तो मने भी खूब दबावण दे री म्हारो मर्द तो खूब दबायो है इन्हे !”
मैं शर्मा गयी
हम दोनों एक-दूजे की गाँड मसलण लागे।
प्रीति ब्यानजी फिर बोली —
“मालजादी की, इतरो दबावे है, म्हारी रसभरी तो अभी सूं गीली हो रही है!”
इतने में मेरी ननंद भी पीछे से आ गई।
उसने हँसते हुए ब्यानजी को पकड़ लिया और नीचे से उनकी गाँड में एक जोरदार झटका मार दिया जैसे लौड़ा डाल दियो हो।
ब्यानजी चौंक के मुँह बना के बोली —
“हाय ओ ब्यानजी! म्हारी तो पूरी हिल गी।“
ननंद ने दोनों हाथ उन के बोबो पे धर दिये और जोर से मसलने लागी। उनके बोबे चोली में से ही नाच उठ्या।
प्रीति ब्यानजी ने आँख मिचके मुँह से ठंडी साँस छोड़ी —
“ओ मालजादी की, मत करो , म्हारा बोबा तो तोड़ देवो कांई!
इतने मे हमारे आसपास की भी सब औरतें आ गयी और उनको चारों ओर घेर ली।
एक रश्मि भाभी बोली —
“मालजादी की ब्यानजी ! देख थारा बोबा तो इतरा उभर राख्या है जैसे दूध से लबालब हो !”
दूसरी बोली — ब्यानजी कि गांड री फाँक तो देख, साली की घणी मोटी! म्हारे मर्द देख ले तो बौखला जावै।“
सबने हँसी-हँसी में उनके बोबो पर हाथ फेर दिया ।
ब्यानजी मुँह बिचका के बोली —
“मालजादियों! छोड़ो तो, म्हारा बोबा पिचका देवो?”
फिर एक ने गुदगुदी चालू कर दी —
उनके पेट पे, नाभी में, जाँघों पे।
ब्यानजी हँसी से लोट गई —
“हाय म्हारा रामजी ! मत करो, रसभरी री जड़ सूं हँसी फूट री!”
अब सब ब्यानजी को छेड़ते हुए गीत गावे लग पड़ी, —

“आ रे मालजादी की, थारा बोबो झूले,
गांड थारी डोले, चूत थारी बोले!
छोरो सब ताके, मन्ने लागे मोले!”

सब तालियाँ बजा-बजा के गावन लागी।
ब्यानजी बीच में ही बोली —
“मालजादी की, ओ मादर! छोडो म्हणे
अब मेरी ननंद ने पीछे सूं उनकी ओढ़नी खींच ली। उनकी चोली इतरी ढीली हो गई कि निप्पल दिखण लाग्या।
सब एक साथ हँसी —
“ब्यानजी का बोबा तो झांकी दे री या है चोली में सूं!”
अब सब औरतें ठहाके मार के हँसी।
फिर सब वापस गीत गावन लागी

“मालजादी की ब्यान री चूत,
घणी मोटी, घणी गीली,
जे मर्द देखे, घुस जावै जीली!”

ब्यानजी ने शर्म के मारे मुँह छुपा लियो, बोली —
“मालजादी की! थारा गीत सुनके तो म्हारा बोबा हिलण लाग्या
फिर मैं बोली
“ब्यानजी की! चोली भी खोलो, देखे इनके दूध कित्ता भर्या है !”
दो जनी चोली री डोरी पकड़ के खींच दी —
चोली भी सरक के नीचे गिर गई।
अब ब्यानजी के मोटे बोबे बिलकुल बाहर, निप्पल भूरे , थोड़े थरकते।
ब्यानजी ने शरमाय के हाथों सूं ढकणा चाह्या —
“हाय म्हारा रामजी ! मत करो ना, सब देखेगा!”
पर सब औरतें हँसी-गाली में बोली —
“माद की ब्यान! अब लाज क्यूँ? बोबो तो सब देखसी!”
अब रही घाघरे की बारी।
दो औरतें ओकी घाघरे का नाड़ा पकड़ के खींच दी।
घाघरा ढीला पड़ के नीचे लुढ़क गयो।
अब ब्यानजी बस एक पतली सी चड्डी में। उनकी मोटी चिकनी गाँड अब साफ झलक रहीं थीं ।
एक ने उनकी चड्डी की किनारी में उँगली डाल के बोला —
“अब देखो ब्यानजी की चूत री भी झलक!”
और धक से खींच के चड्डी भी नीचे गिरा दी।
अब ब्यानजी बिलकुल नंगी —
मोटे बोबे हिलते, भूरे निप्पल खड़े, गाँड की फाँक खुल के दिखे, और चूत तो हल्की गीली।
सब औरतें तालियाँ बजा-बजा के हँसी-गाली में नाचने लगीं।
कोई बोबे पकड़ के मसलें, कोई गाँड पे थप्पी मारें, कोई निप्पल पे चुटकी ले
गाली वाले गीत गाये

“मालजादी की री ब्यानजी, थारी बोबो मादर की जैसे लटक्या,
गांड में हाथ डालूं, बोले — ओ मादर, फूट जासी!”

ब्यानजी मना करती हुई बोली —
“छोरो ना, म्हारी में हलचल मच जावै!”
अब मेरी ननंद ने उनकी चूत के ऊपर हल्की उँगली घुमा दी ब्यानजी कराह उठी —
“हरामण ! मत कर ना, म्हारी तो भीग जावेली बस कर,
सब औरतें हँसी, गाली, गुदगुदी, गानों में नाचती —
प्रीति ब्यानजी को पूरी नंगी करके बोबो, निप्पल, गाँड, चूत तक सब मसल-मसल के ठहाके मारती रहीं।

"मादर री चूत थारी ब्यान,
थारा बोबो जैसे ढोल,
गांड थारी फड़फड़ावै,
देख मर्द को बोले — ओ मादर, घुसा दे खोल!"

“मादरचोद की प्रीति ब्यान,
थारे बोबो जैसे दो हांडी,
गांड पे थप्पड़ मारूं,
बोले — मालजादी की, फूट री म्हारी पांडी!”

सब औरतें तालियाँ बजा-बजा के गालियाँ ठेल री —
“मालजादी की! देखो तो थारी गांड इतरी चौड़ी, जैसे मादर की बिछौना बिछा दिया हो!”

फिर मैं पीछे से आई —
ब्यानजी, ले अब देख!”
और उनके गाँड पे ज़ोर का थप्पड़ मार दिया —
चटाक्क!
गाँड का गाल एकदम लाल पड़ गयो।
ब्यानजी उछल के बोली —
“अरे बाई रे ! गांड फटी जासी छोड़ी री!”
अब मेरी ननंद भी आई, उसने दूसरी फाँक पे थप्पड़ मारा —
चटाक्क!
ब्यानजी की गांड अब दोनों तरफ से लाल हो गई।
सब औरतें हँसी से लोट गई —
“अब तो ब्यानजी की गांड लाल टमाटर ज्यूँ लगै!”
फिर सब औरतें तालियाँ बजा-बजा के गाना गाने लगीं —

“मादर री गांड प्रीति री,
मालजादी की थप्पड़ में लाल,
हाय म्हारा रामजी करे,
चूत भी बोले — हाय देख हाल!”

अब रश्मि भाभी ने मस्ती में उँगली उनकी फाँक के बीच फेर दी —
ब्यानजी का मुँह खुल गयो —
“हाय म्हारा रामजी! मत कर इतरो, निचे सनसनाटी जा री!”
फिर रश्मि भाभी उनके दोनों बोबो को पकड़ के बोली —

“मादर की! बोबो मसलू और गांड थप्पड़ में रंग दूँ!”
और ज़ोर का फिर थप्पड़ गाँड पे —
चटाक्क!
अब ब्यानजी की मोटी गांड लाल-लाल पड़ गी जैसे ताजा मिर्ची।
“मालजादी की प्रीति री गांड,
मादर की लाल गुलाल,
थप्पड़ पे थप्पड़ पड़ै,
बोले — हाय म्हारा रामजी , बचा ले आज!”

सब औरतें हँसी, गाली, नाच में मस्त — प्रीति ब्यानजी की गांड पर हर कोई अपनी मस्ती उतारे, थप्पड़ मार-मार कर गाँड लाल कर दे।
ब्यानजी के बोबो हिले, निप्पल तनें, गाँड जलती, मुँह से निकले — “हाय म्हारा रामजी !”
और सब औरतें ठहाके मार के बोले —
“मादर की! अब तो थारी गांड पक गी!”
ब्यानजी बोली
“मादरकी छोरो! इतरो थप्पड़ मारोगी, म्हारी गांड तो फट जासी!”
मैं ने ब्यानजी की गांड की फाँकें दूर कर दीं।
मर्री ननंद बोली —
“ओ मादर की! देख तो सही थारी गांड कितनी चिकनी, जैसे चूत का बिछौना!”
रश्मि भाभी ने ओकी गांड के बीच में हल्की उँगली घुसा दी।
प्रीति ब्यानजी उछल के बोली —
“हाय म्हारा रामजी ! मत कर इतरो, चूत तक हिल गई मादर की!”
अब मेरी ननंद मोटी मूली ले आई।
बोली —
“ब्यानजी! देख तेरी गांड में घुसावूँ आज ई मोटी मूली!”
सब तालियाँ बजा के ठहाके मारे —
“हाँ माद की क, घुसा दे!”
ओने प्रीति की गांड की फाँकें पकड़ ली।
मूली हल्की से लगाई — ब्यानजी का मुँह बन गयो।
फिर धीरे से ठेल दी —
“अरे ब्रारे! मादर की, म्हारी गांड फटी जासी!” प्रीति ब्यानजी बोली
फिर सब वापस गीत गाने लगी

“मालजादी की प्रीति री गांड,
मादर की मूली में डूबी,
हाय म्हारा रामजी करे,
गांड थारी गीली हो सूखी!”

सब औरतें तालियाँ बजा-बजा के बोली —
“मादर की गांड! अब तो लाल भी पड़ गी, देख बोबो भी हिलण लाग्या!”
अब एक भाभी ब्यानजी के बोबो पकड़ के मसलने लगी —
“मालजादी की, थारे बोबो भी बोलें — गांड में और घुसा दे!”
फिर सब औरतें गाली गीत में गाएँ —
“मादर की गांड प्रीति री,
मालजादी की मूली में डूबी,
हाय म्हारा रामजी करे,
फट जासी मादर की चूत भी रूबी!”

अब रूम पूरा मस्त रंग में भीग गयो।
प्रीति ब्यानजी एकदम नंगी —
उनके मोटा बोबा लटक रीया, निप्पल जैसे कटोरी, मोटी गाँड तो थप्पड़ खा-खा के पहले ही गुलाबी।
बस रूम में ठहाकों, तालियों, थप्पड़ों, बोबो की मसल, और ब्यानजी की देसी गाली कराहों का मेला लग गयो।
प्रीति मुँह बनाके बोले —
“उफ़ बाई रे बोसया की! मादर की थारी सब की सब की गांड भी फड़वाऊली एक दिन म्हारा मर्द सु एक दिन!”
और
सब हँसी में लोट-पोट।
फिर कोई बोली —
“ओ ढीला बोसया की ब्यान! थारी गांड तो खुद बोल री है — और कर!”
“मादर की थारी गांड तो कत्ती फटी फुलकारी!”
“मालजादी की! देख तो सही, थारी गांड में हाथ डालूं तो पूरी खोखली लागे!”
“ओ बोसया की! म्हारी ऊँगली भी गुम हो जासी थारी गांड में!”
मेरी ननंद बोली
“ ब्यानजी ! थारे बोबो तो जैसे ढोल फूले, मसलूं तो दूध बह जासी!”
“मालजादी की ब्यानजी! बोबो थारे इतरे भारी, मादर की इने तो निचोड़ूं तो टपक जासी लार!”
रश्मि भाभी बोली “मालजादी की थारी चूत तो जैसे रस की नली, घुसा दूँ तो बोले — ओ मादर फाड़ मत!”
“मादर की! चूत री गलियां भी गूँजे जब मूली घुसावै!

अब रूम मे तालियाँ, हँसी और ठेठ देसी गालियाँ गूँज रही थीं।
बीच में खड़ी प्रीति ब्यानजी —
पूरी नंगी, उन्हें एक झिनी ओढ़नी ओढ़ाई वो बस एक झिनी ओढ़नी मे थोड़ी शर्माई हुई,
मोटे बोबे लटकते, निप्पल जैसे मिर्च की डंडी, मोटी गांड थप्पड़ों से लाल।

एक भाभी ओके बोबो को हल्के से उँगली से छुए —
"मालजादी की! थारे बोबो तो जैसे मादर की दूध की हांडी, देख थारो ब्याही घूर घूर के पियेगो!"

दूसरी बोली —
"तेरी चूत तो बोले — जल्दी घुसा दो लौड़ो! अब मत रुक!"

तीसरी ने ओकी नाभी में उँगली घुमा दी —
ब्यानजी मुँह चुरा के बोली —
"उफ़! बाई रे! मत कर इतरो मादर की, म्हारी चूत तो काँपे!"

अब एक भाभी ठिठोली में बोली —
" ब्यान रांड! अभी तक तो तू ही बोबा मसल-मसल के सबको दिखाती थी, अब लौड़ो लेबा को टाइम आयो तो शर्माई क्यूँ?"

दूसरी बोली —
"थारी माँ की चूत में पिचकारी! देख ब्यानजी, थारे बोबो खुद बोले — जल्दी भेजो म्हारे ब्याही के पास!"



तालियाँ बजा-बजा के गीत भी गाएँ


"मालजादी की ब्यानजी री चूत,
मादर की बोबो भारी,
हाय म्हारा रामजी करे,
थारी गांड में बजे बीन सारी!"


अब एक भाभी ओकी गांड के पास गई, उँगली से फाँक में हल्की चुटकी ली —
ब्यानजी उछल के बोली —
"ओ बाप रे! हाय म्हारा रामजी !"

सब हँसी में लोट-पोट।
फिर कोई बोली —
"भोसड़ी वाली ब्यान! अब मत शर्माया कर, अभी तेरी गांड में तो लौड़ो ठुकेगो!"

मैं ब्यानजी के कान मे बोली —
"मालजादी की ब्यान म्हारे तो खुद हांथा सु पकड़ कर ब्याहीजी को लौड़ो ठुकवायो , अब थारी बारी आई तो नखरा दिखा रिये !"

ब्यानजी मुँह चुरा के बोली —
"बाई रे! ओ लंडवा की माई! मत बोल एसी, म्हारी रसभरी में डर लागे मादर की!"

कमरा एकदम गूँज रह्यो था तालियों, हँसी, देसी गीतों और ठेठ गालियों से।
सब औरतें प्रीति ब्यानजी को पूरी नंगी, बस एक झिनी ओढ़नी में पकड़ कर हम सब पतिदेव के कमरे की ओर खींच रहीं थीं ताकि वहां ब्यान को मेरे पतिदेव चोद सके ।

ज्यों ही कमरे के दरवाजे पे पहुँची, प्रीति रुक गई।
ओढ़नी कस के पकड़ ली, मुँह लाल हो गया।
धीमे से बोली —
" हाय बचा लो! म्हारी तो बोले — मत भेज, लौड़ो देखके डर लागे!"

सब औरतें तालियाँ बजा के गाएँ —
"मालजादी की ब्यानजी री चूत,
मादर की बोबो भारी,
हाय म्हारा रामजी करे,
घुस जासी थारा लौड़ो सारी!"
अब एक ने फिर ओकी गांड पे थप्पड़ मारा —
चटाक्क!
ब्यानजी चिल्लाई —
"ओ साली हरामण! जान निकलगी म्हारी


बाकी बोलीं —
"बोसड़ी वाली ब्यान! अब मत नखरे कर, अंदर जा, तेरी चूत में ढोल बजेगा!"

अब हम सब औरतें ब्यानजी को हँसी, गालियों, गीतों में धकेलते हुए कमरे में पहुँचाने लगीं —
ब्यानजी खुद बोबे पकड़ के मुँह चुराके बोली —
" हाय म्हारा रामजी , मत ले जा मादर की, म्हारी रसभरी तो काँपे!"

सब हँस-हँस के बोल पड़ी —
"तेरी चूत में तम्बू तानू मादर की! अब देख थारे अंदर लौड़ो कैसा नाचे!"

ब्यानजी झिंझोड़ते हुए, बार-बार अलग-अलग गाली बक के आनाकानी करे,
और सब औरतें हँसी-गुदगुदी, थप्पड़, बोबो मसलते हुए कमरे तक खींच रहीं।
ब्यानजी बार-बार ओढ़नी सँभाले, मुँह लजाये, पर ओकी आँखों में कहीं एक हल्की सी चुप हँसी और मानो इशारे वाली शरारत भी छुपी हुई थी।
अब सब औरतें कमरे के दरवाजे पर पहुँच गईं।
रश्मि भाभी मेरे पतिदेव को छेड़ते हुए बोली —
"लालजी! देख , थारे वास्ते आज ब्यानजी को पूरी सजा के लाये है !"

दूसरी बोली —
"ब्यानजी की री रसभरी खुद थाने बुला रिये खुद कहे — घुसा दो अब डंडो

ब्यानजी लजा के बोली —
"उफ़ बाई रे ! मत बोलो एसी, म्हारा मुँह लाल हो जासी!"
लेकिन उसके होंठों की हल्की मुस्कुराहट और आँखों में झिझकी चमक बता रही थी कि वो भी मन ही मन राज़ी है।

अब मैंने ब्यानजी की ओढ़नी खींच दी।
ब्यानजी हँस के मुँह छुपाती, बोबे ढकने की कोशिश करती —
"हाय म्हारा रामजी! छोड़ो ना , सब देख रह्या है!"

सब औरतें ठहाके मार के हँसीं।
फिर धीरे से प्रीति को धकेल के कमरे के अंदर छोड़ दिया।

मेरे पति ने जैसे ही ब्यानजी का नजारा देखा था
बस एक झिनी गुलाबी ओढ़नी, इतनी पतली कि उसके नीचे से
बड़े गोल, दूध से भारी बोबो साफ झलक रहे थे,
निप्पल जैसे दो लाल मिर्च की टोंगिया,
ओढ़नी की हल्की झालर उसके नाभी पे अटक गई थी।
नीचे उसकी मोटी गांड की गोलाई, और जाँघों के बीच हल्की चूत की रेख भी कभी-कभी दिख जाए।
मेरे पति देव ने सोचा —
"ओह ब्यानजी ! ओढ़नी पहनी भी है और नंगी भी है,

मेरे पतिदेव की आँखें घूमीं, उनकी आँखें पहले तो उसके गोल बोबो पे अटकीं —
देखा कैसे ओढ़नी से दबे हुए निप्पल तन के खड़े थे,
मानो बोले — "हाय म्हारा रामजी करे, जल्दी मसल ले!"

फिर नज़रों को खींचती उसकी मोटी गांड,
जो हल्की घबराहट में हिली, तो जैसे दो मक्खन के गोले थरथराए।
उनकी आँखें वहीं से चूत की रेख तक फिसल गई —
जहाँ ओढ़नी भी हार मान गई थी, सब कुछ थोड़ी-थोड़ी झलक दे रही थी।


पतिदेव के मन में एक भारी गर्मी सी उठी —
लौंडा अंदर से ठाठें मार के तन गया,
सीने में साँस और तेज हो गई, गले में एक हल्की सी मस्ती की खरखराहट भी आई।

सोचा - ब्यानजी न आज पूरी रात ररगड रगड कर चोदुला


ज़ब मैंने ब्यानजी की ओढ़नी हटाई और ब्यान नंगी हुई
और हमने दरवाजा बंद करा तब सब औरतें बाहर तालियाँ बजा-बजा के गालियाँ देती रही,
अब देखो लालजी कैसे बोबो में हाथ डालें, थारी गांड तक पहुँचे!"


नंगी ब्यानजी ने हल्की सी नज़र उठाई,
उनसे मिली, फिर तुरंत नीचे झुका ली,
वो मुँह की मुस्कान नहीं छुपा पाई।
बहुत ही बढ़िया अपडेट लिखी हे ।। मारवाड़ी रि एकमात्र कहानी हे ।।। आसा हे आगे भी जारी रहेगी
 

Sanjay dham

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स्नेहिल भाई आपसे यही उम्मीद थी। वेलकम बैक।
कहानी जारी है...
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Sanjay dham

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