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गाँव के उस पुराने आँगन में,
जहाँ आम की डाली झुकी हुई थी,
और चबूतरे पर माँ के हाथों की मेहँदी लगी थी —
आज बड़ा दिन था।
आज अभिषेक आ रहा था,
IIT से पढ़कर, सेहर की नौकरी छोड़कर,
अपने गाँव लौट रहा था।
बहना — सुमन
बार-बार आँगन की ओर देख रही थी।
गोरी-चिट्टी, थोड़ी चुबली, थोड़ी शैतान,
और बोलती थी —
"भैया आते ही क्या डकारियाँ मारेंगे,
या पहले मुझे उठा-उठाकर घुमाएँगे?"
माँ कहतीं —
"चुप रह, बिटिया। बड़ा आदमी बनके आया है,
संभलकर बात करियो।"
और बाबूजी —
मूँछों के नीचे गरिमा लिए,
हाथ में जनेऊ,
खिड़की से झाँक रहे थे,
मानो अभी-अभी अपना ही कोई अतीत लौट रहा हो।
---
जब अभिषेक आया —
गाड़ी से उतरा,
लंबा, काँधे चौड़े, देहाती धूप में निखरा हुआ,
और झोले में लिए था —
बहना के लिए एक सूट, माँ के लिए ओढ़नी, और बाबूजी के लिए गंगाजल।
पर जो नज़रें मिलीं —
अभिषेक और सुमन की,
उसमें कुछ और था।
बहन का हाथ गिलास में पानी डालते-डालते रुक गया,
भाई की नज़र उसकी चुबली कमर पर टिक गई,
जो पहले कभी वहाँ नहीं ठहरी थी।
सुमन ने शरारत से कहा —
"भैया, सेहर में इतना पढ़ लिहले,
तो गाँव की छोरी कम न पड़ी न, हँ?"
अभिषेक मुस्कुराया —
"पड़ी तो नाहीं, बहना।
पर आज कुछ और पढ़ना है तो…
किताब बड़ी है, बहना।"
सुमन का गाल लाल हो गया,
और माँ ने बीच में हँस कर कहा —
"सावन के झूला झूलिहे पहिले,
बाद में पढ़ाई होइत रहे।"
---
रात हुई —
खाने में माँ ने सूखी सब्जी, पूड़ी और मिठाई बनाई।
पर सुमन के मन में कुछ और भूख थी।
जो अभी तक बुझी नहीं थी।
जब सब सो गए —
सुमन चुपके से भैया के कमरे की तरफ बढ़ी,
हाथ में लिए एक कप कॉफी और एक गीला सपना।
"भैया, सो नई गइले न?"
उसने आवाज़ लगाई।
अभिषेक ने करवट बदली —
"ना... तू आ जा, बहना।
आज कुछ और सिखाऊँगा तोहे,
जो किताब में नाहीं लिखा है..."
हां भाई हमका भी सहर के बारे में मैं बतावा...
---
जहाँ आम की डाली झुकी हुई थी,
और चबूतरे पर माँ के हाथों की मेहँदी लगी थी —
आज बड़ा दिन था।
आज अभिषेक आ रहा था,
IIT से पढ़कर, सेहर की नौकरी छोड़कर,
अपने गाँव लौट रहा था।
बहना — सुमन
बार-बार आँगन की ओर देख रही थी।
गोरी-चिट्टी, थोड़ी चुबली, थोड़ी शैतान,
और बोलती थी —
"भैया आते ही क्या डकारियाँ मारेंगे,
या पहले मुझे उठा-उठाकर घुमाएँगे?"
माँ कहतीं —
"चुप रह, बिटिया। बड़ा आदमी बनके आया है,
संभलकर बात करियो।"
और बाबूजी —
मूँछों के नीचे गरिमा लिए,
हाथ में जनेऊ,
खिड़की से झाँक रहे थे,
मानो अभी-अभी अपना ही कोई अतीत लौट रहा हो।
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जब अभिषेक आया —
गाड़ी से उतरा,
लंबा, काँधे चौड़े, देहाती धूप में निखरा हुआ,
और झोले में लिए था —
बहना के लिए एक सूट, माँ के लिए ओढ़नी, और बाबूजी के लिए गंगाजल।
पर जो नज़रें मिलीं —
अभिषेक और सुमन की,
उसमें कुछ और था।
बहन का हाथ गिलास में पानी डालते-डालते रुक गया,
भाई की नज़र उसकी चुबली कमर पर टिक गई,
जो पहले कभी वहाँ नहीं ठहरी थी।
सुमन ने शरारत से कहा —
"भैया, सेहर में इतना पढ़ लिहले,
तो गाँव की छोरी कम न पड़ी न, हँ?"
अभिषेक मुस्कुराया —
"पड़ी तो नाहीं, बहना।
पर आज कुछ और पढ़ना है तो…
किताब बड़ी है, बहना।"
सुमन का गाल लाल हो गया,
और माँ ने बीच में हँस कर कहा —
"सावन के झूला झूलिहे पहिले,
बाद में पढ़ाई होइत रहे।"
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रात हुई —
खाने में माँ ने सूखी सब्जी, पूड़ी और मिठाई बनाई।
पर सुमन के मन में कुछ और भूख थी।
जो अभी तक बुझी नहीं थी।
जब सब सो गए —
सुमन चुपके से भैया के कमरे की तरफ बढ़ी,
हाथ में लिए एक कप कॉफी और एक गीला सपना।
"भैया, सो नई गइले न?"
उसने आवाज़ लगाई।
अभिषेक ने करवट बदली —
"ना... तू आ जा, बहना।
आज कुछ और सिखाऊँगा तोहे,
जो किताब में नाहीं लिखा है..."
हां भाई हमका भी सहर के बारे में मैं बतावा...
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