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Incest "गाँव की माटी,

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Rebel.desi

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गाँव के उस पुराने आँगन में,
जहाँ आम की डाली झुकी हुई थी,
और चबूतरे पर माँ के हाथों की मेहँदी लगी थी —
आज बड़ा दिन था।
आज अभिषेक आ रहा था,
IIT से पढ़कर, सेहर की नौकरी छोड़कर,
अपने गाँव लौट रहा था।


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बहना — सुमन
बार-बार आँगन की ओर देख रही थी।
गोरी-चिट्टी, थोड़ी चुबली, थोड़ी शैतान,
और बोलती थी —
"भैया आते ही क्या डकारियाँ मारेंगे,
या पहले मुझे उठा-उठाकर घुमाएँगे?"

माँ कहतीं —
"चुप रह, बिटिया। बड़ा आदमी बनके आया है,
संभलकर बात करियो।"

और बाबूजी —
मूँछों के नीचे गरिमा लिए,
हाथ में जनेऊ,
खिड़की से झाँक रहे थे,
मानो अभी-अभी अपना ही कोई अतीत लौट रहा हो।

---

जब अभिषेक आया —
गाड़ी से उतरा,
लंबा, काँधे चौड़े, देहाती धूप में निखरा हुआ,
और झोले में लिए था —
बहना के लिए एक सूट, माँ के लिए ओढ़नी, और बाबूजी के लिए गंगाजल।

पर जो नज़रें मिलीं —
अभिषेक और सुमन की,
उसमें कुछ और था।
बहन का हाथ गिलास में पानी डालते-डालते रुक गया,
भाई की नज़र उसकी चुबली कमर पर टिक गई,
जो पहले कभी वहाँ नहीं ठहरी थी।

सुमन ने शरारत से कहा —
"भैया, सेहर में इतना पढ़ लिहले,
तो गाँव की छोरी कम न पड़ी न, हँ?"

अभिषेक मुस्कुराया —
"पड़ी तो नाहीं, बहना।
पर आज कुछ और पढ़ना है तो…
किताब बड़ी है, बहना।"

सुमन का गाल लाल हो गया,
और माँ ने बीच में हँस कर कहा —
"सावन के झूला झूलिहे पहिले,
बाद में पढ़ाई होइत रहे।"

---

रात हुई —
खाने में माँ ने सूखी सब्जी, पूड़ी और मिठाई बनाई।
पर सुमन के मन में कुछ और भूख थी।
जो अभी तक बुझी नहीं थी।

जब सब सो गए —
सुमन चुपके से भैया के कमरे की तरफ बढ़ी,
हाथ में लिए एक कप कॉफी और एक गीला सपना।

"भैया, सो नई गइले न?"
उसने आवाज़ लगाई।

अभिषेक ने करवट बदली —
"ना... तू आ जा, बहना।
आज कुछ और सिखाऊँगा तोहे,
जो किताब में नाहीं लिखा है..."
हां भाई हमका भी सहर के बारे में मैं बतावा...

---
 
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Rebel.desi

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बहना — सुमन
बार-बार आँगन की ओर देख रही थी।
गोरी-चिट्टी, थोड़ी चुबली,
गोल-मटोल बदन पर तंग चोली,
और नीचे लहँगा जो उसकी गदराई गाँड पर झूल रहा था।
छोटी सी चोटी उसकी गाँड के उभार पर पीठ ठोकती थी,
और हर कदम पर उसके भारी उभार चोली के अंदर हिलोर ले रहे थे।
गहरा क्लीवेज —
जो गाँव की धूप में भी
सेहर की ठंडी हवाओं की याद दिला रहा था।
पर सुमन को इस बात का ज़रा भी अहसास नहीं था —
कि उसकी यही खूबसूरती उसके भाई की नज़रों को
बार-बार उसकी ओर खींच रही थी।

---


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अभिषेक की नज़र —
पहली नज़र में उसके चेहरे पर,
फिर धीरे से नीचे,
फिर गाँड की उभार पर,
फिर वापस आँखों में —
मानो वहाँ कुछ और पढ़ रहा हो।
पर उसने कुछ नहीं कहा।
न तो उसके क्लीवेज पर,
न उसके उभारों पर,
न उसकी गाँड पर।
वो एक भाई था,
जो अपनी बहना को देख रहा था,


---

सुमन —
न जाने कब से सेहर के बारे में जिज्ञासा थी।
वहाँ की लड़कियाँ कैसे होती हैं?
वहाँ के लोग क्या खाते हैं?
क्या सच में हर घर में मॉल होता है?
उसने बिना किसी हिचकिचाहट के पूछा —
"भैया, सेहर में क्या सच में लड़कियाँ पैंट और टी-शर्ट पहनती हैं?
और वहाँ के लोग क्या करते हैं इतनी बड़ी-बड़ी इमारतों में?
क्या वहाँ हर किसी के पास गाड़ी होती है?"

अभिषेक हँसा —
"तुझे तो जाना चाहिए बहना,
सेहर में बहुत कुछ है,
पर तू तो गाँव की माटी में ही ज़्यादा सुंदर लगती है।"
उसने कहा —
"सेहर में लड़कियाँ आज़ाद हैं,
पर गाँव की लड़कियों की बात ही कुछ और है,
जैसे तू — बिना किसी ढोंग के,
जैसी है, वैसी ही है।"

सुमन शरमा गई —
"भैया… ऐसा मत बोलो…
मैं तो बस पूछ रही थी।"
पर उसकी आँखों में एक नई चमक थी,
जो पहले कभी नहीं थी।
न जाने क्यों, उसका दिल तेज़ धड़क रहा था,
जैसे भैया की हर बात उसकी सीने में कुछ और करवट बदल रही हो।

---

माँ jo paas hee leti thii कहतीं —
"बिटिया, भैया को गांव दिखा…
और हाँ, सेहर में तो बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ मिलती हैं,
हमारी बिटिया को भी कुछ सिखाओ बेटा,
वरना ये तो बस लहँगा-चोली में ही उलझी रह जाएगी।"

बाबूजी ने मूँछों के नीचे मुस्कुराकर कहा —
"पढ़ाई काम की चीज़ है,
Ye सेहर की लड़कियों से सिखो
हमारी बेटी तो खुली किताब है।"

सुमन मुँह फुलाकर बोली —
"बाबूजी! आप भी…"
और उसकी पीठ पर झूलती चोटी,
और नीचे गदराई गाँड,
दोनों शरारत से हिल उठे।
पर इस पूरे दिन
न तो अभिषेक ने उसके शरीर पर कोई टिप्पणी की,
और न ही सुमन ने किसी और अंदाज़ में बात की।
सब कुछ शुद्ध था, सहज था —
जैसा भाई-बहन के बीच होना चाहिए।

---

रात —
जब सब सो गए,
सुमन ने एक कप कॉफी और ली —
सोचा, भैया से सेहर के बारे में और पूछे,
क्योंकि उसकी जिज्ञासा अभी बाकी थी।
पर उसने सोचा —
"अभी तो कल होगा, अभी तो भैया थके होंगे।"
वो अपने कमरे में चली गई,
अपनी सोच में खोई हुई,
और अपनी चोली के भीतर उसके उभार साँस ले रहे थे —
बिना किसी जाने-अनजाने इरादे के।
 

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भाग 2 – गाँव की धूप, भैया की बाँह
(सुबह की सैर, बातों का सिलसिला, और अनकहा लगाव)


---

अगली सुबह —
सूरज अभी आम के पेड़ की ओट में था,
और चिड़ियों की चहचहाहट आँगन में गूँज रही थी।
सुमन ने जल्दी से नहाया,
ताज़ा लहँगा-चोली पहनी,
और अपनी गीली चोटी को गाँड पर लहराती छोड़ दिया।

वो भैया के कमरे की तरफ बढ़ी —
"भैया, उठो... आज हम गाँव घुमाएँगे।"

अभिषेक ने आँखें मलीं —
"अभी तो सुबह है, बहना।"

"तभी तो मज़ा है, भैया।
सुबह की धूप, खेत, गंगा का किनारा —
सब कुछ तुम्हें दिखाना है।"

---

वो निकल पड़े —
पैदल ही,
गाँव की कच्ची सड़कों पर,
जहाँ गोबर की सोंधी खुशबू,
और खेतों से उठती ओस की नमी,
दोनों एक साथ साँसों में घुल रहे थे।

सुमन ने अभिषेक की बाँह पकड़ी —
जैसे बचपन में पकड़ती थी।
"भैया, ये देखो —
जहाँ हम पानी भरने जाते थे,
और तुम मुझे भिगोकर भाग जाते थे।"

अभिषेक मुस्कुराया —
"और तू माँ को बता देती थी,
कि मैंने जानबूझकर भिगोया..."

"क्योंकि तुम्ही करते थे न!"
सुमन ने शरारत से उँगली उठाई।

---

वो खेतों के रास्ते पहुँचे,
जहाँ हरी फसलें हवा में झूलती थीं,
और दूर कहीं बैलगाड़ी की आवाज़ थी।

अभिषेक ने कहा —
"बहना, सेहर में तो ये सब नहीं है।
वहाँ हर जगह ईंट-पत्थर,
लोग भागते-दौड़ते रहते हैं।
यहाँ जैसी शांति —
वहाँ कहीं नहीं।"

सुमन ने उसे देखा —
"तो तुम गाँव ही रहोगे, भैया?"

अभिषेक ने उसके सिर पर हाथ रखा —
"गाँव तो रहेगा नहीं, बहना,
पर तू होगी यहाँ —
तो मैं बार-बार आऊँगा।"

सुमन की आँखें चमक उठीं —
"सच?"

"सच, बहना।"

---

वो गंगा के किनारे जा बैठे,
जहाँ नावें बँधी थीं,
और पानी पर सूरज चमक रहा था।

सुमन ने पैर पानी में डाले,
और अभिषेक उसके बगल में बैठ गया।

"भैया, सेहर में लोग हमसे कैसे बात करते हैं?"

"बहना, वहाँ तो हर कोई जल्दी में होता है।
बातों में कोई मजा नहीं,
ना कोई ठहराव, ना कोई मतलब।
पर यहाँ —
तेरी आवाज़ में जो लड़खड़ाहट है,
वो सेहर के लाखों फ्लैटों में नहीं मिलती।"

सुमन ने उसकी बाँह पर सिर रख दिया —
जैसे बचपन में रखती थी।
"भैया, तुम्हें पता है —
तुम्हारे बिना मुझे कितना अकेलापन लगता था?"

अभिषेक ने उसके बाल सहलाए —
"अब मैं हूँ, बहना।
कुछ दिन और रुकूँगा।
फिर जाऊँगा, पर तेरी याद रखूँगा।"
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---

सुमन के सीने में कोई अनकहा एहसास हिला,
जो उसने कभी नाम नहीं दिया था।
उसने अपनी आँखें बंद कर लीं —
और बस महसूस किया —
भैया की बाँहों की गर्मी,
उसकी आवाज़ की मिठास,
और गाँव की उस शांत धूप —
जिसमें उसकी सारी जिज्ञासा,
एक प्यारे से सुकून में बदल गई।

---

अभिषेक ने कहा —
"चल, बहना,
अब और घूमेंगे,
पर पहले कुछ मीठा खा लें।"

सुमन ने आँखें खोलीं —
"गुड़ की खीर खाएँगे, भैया?"

"हाँ, बहना —
जैसे बचपन में खाते थे।"

---

दोनों उठे,
और वापस गाँव की ओर बढ़े —
हाथों में हाथ डाले,
बस वो अनकहा, बहना-भैया वाला प्यार,
जो शब्दों से बड़ा था,
और जो सिर्फ उन दोनों के बीच था।


---

दोपहर की धूप ढलने लगी थी,
और सुमन ने सोचा —
"भैया को गन्ना चाहिए, ताज़ा और मीठा।"

वो खेत की ओर दौड़ी,
जहाँ लंबे-लंबे गन्ने हवा में झूल रहे थे।
उसने एक मोटा सा गन्ना तोड़ा,
और वापस लौटते ही —
उसका पैर लहँगे के पल्लू में उलझ गया।

"हाय…!"
एक आवाज़, और सुमन गिरने लगी।

---

अभिषेक ने बिजली-सी फुर्ती दिखाई —
उसकी बाँह उसकी कमर पर,
और दूसरा हाथ उसकी पीठ के नीचे —
लेकिन उसी झटके में,
सुमन के भारी उभार,
पूरी ताकत से अभिषेक की छाती से टकरा गए।

एक बिजली-सी सिहरन दोनों के शरीर में दौड़ गई।
सुमन की साँसें थम गईं।
अभिषेक का दिल तेज़ धड़कने लगा।
पर दोनों ने कुछ नहीं कहा।

"संभलकर, बहना…"
अभिषेक ने उसे सहलाते हुए कहा,
पर उसके हाथ उसकी कमर पर से नहीं हटे।

---

सुमन के पैर पर खरोंच आ गई थी —
खून की बूँदें उसकी चमकती त्वचा पर उभर आईं।
उसकी आँखों से आँसू छलक आए —
"भैया… दर्द हो रहा है…"

अभिषेक ने झुककर उसके पैर को अपने हाथों में लिया,
और धीरे-धीरे उस पर फूँक मारी —
"हल्का है, बहना…
चिंता मत कर…
मैं हूँ न…"

---

सुमन ने उसे देखा —
वो उसके पैर पर फूँक मार रहा था,
जैसे बचपन में मारता था,
पर इस बार उसकी नज़रें,
अलग थीं।
शायद उसे भी नहीं पता था —
कि वो नज़रें क्या कह रही हैं।

सुमन ने अपना हाथ बढ़ाया,
और अभिषेक के सिर पर सहलाया —
"धन्यवाद, भैया…"

अभिषेक ने ऊपर देखा,
और बिना कुछ कहे,
उसने सुमन के माथे को चूम लिया —
बिल्कुल शुद्धता से,
जैसे कोई बड़ा भाई अपनी छोटी बहना को आशीर्वाद देता है।

"अब रोना नहीं, बहना…
आओ, मैं तुझे गन्ना खिलाऊँ…"

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सुमन ने आँसू पोंछे,
और दोनों एक-दूसरे की बाँहों में झूलते हुए,
उसी धूप में बैठ गए —
जहाँ कुछ शब्द नहीं थे,
बस एक अबोध प्रेम था,
जो शायद खुद को भी नहीं पहचानता था।

--- 😊🌿
 

Rebel.desi

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भाग 3 – रात की खामोशी, माँ की बातें, और नींद में खोया प्यार
(पवित्र प्रेम, मासूम जिज्ञासा, और सपनों की ओट)

रात का खाना खत्म हो चुका था।
माँ ने थाली समेटी तो बाबूजी ने कहा —
"अभिषेक, कल गाँव के प्रधान जी से मिलने चलना है,
योजना की बात करनी है।"
अभिषेक ने सिर हिलाया —
"जी बाबूजी।"

सुमन चुपचाप अपनी चोटी से खेलते हुए
चबूतरे पर बैठी रही।
भैया के आने से उसकी दुनिया बदल गई थी,
पर वो खुद नहीं जानती थी —
कैसे और क्यों।

---

जब सब अपने-अपने कमरों में जा चुके,
सुमन अभिषेक के कमरे के दरवाज़े पर खड़ी थी।
हाथ में एक गिलास दूध —
जैसे बचपन में माँ कहती थीं —
"सोने से पहले दूध पीना, बेटा।"

"भैया… सोए नहीं?"
आवाज़ बेहद मुलायम थी।

"अंदर आ जा, बहना।"
अभिषेक ने करवट बदलते हुए कहा।

---

वो अंदर गई, गिलास उसके बगल में रखा,
और फर्श पर ही ज़मीन पर बैठ गई —
जैसे कभी बचपन में बैठती थी,
जब भैया को कहानी सुनानी होती थी।

"भैया… एक बात पूछूँ?"

"पूछ, बहना।"

"सेहर में रात को कितना अकेलापन लगता है?"
उसकी आँखों में चाँद-सी चमक थी।

अभिषेक ने उसके सिर पर हाथ रखा —
"बहुत, बहना।
पर अब जब मैं तुझसे बात करता हूँ,
तो वो अकेलापन भूल जाता हूँ।"

सुमन ने उसका हाथ दोनों हाथों में ले लिया —
"तो फिर, भैया…
तुम जब भी अकेले लगो,
बस मुझे याद कर लेना।
मैं भी यहीं हूँ।"

---

अभिषेक ने उसे अपनी ओर खींचा —
पर पूरी शुद्धता से,
जैसे कोई बड़ा भाई अपनी बहना को
गले लगाकर सुकून देता है।

"तू बड़ी हो गई है, सुमन…
पर मेरे लिए तू वही बहना है,
जो कभी मेरी उँगली पकड़कर चलती थी।"

सुमन की आँखों में आँसू —
पर खुशी के, और उसकी चूचियाँ अभिषेक की छाती से दब रही थीं,
पर दोनों को इस बात का ज़रा भी अहसास नहीं था।
वो बस दो बच्चे थे —
एक बड़ा, एक छोटा,
और उनके बीच बस एक गहरी बहनापा था।

---

"सो जा, बहना…
कल तुझे कुछ और गन्ना तोड़ना है न?"
अभिषेक मुस्कुराया।

सुमन ने आँखें पोंछीं —
"हाँ, भैया…
अब मैं संभलकर तोड़ूँगी।"
और वो हल्के कदमों से बाहर चली गई,
पर उसके सीने में कुछ अनकहा था —
जो अभी सपना बनकर ही सही,
उसे रात भर सुकून देता रहा।

---

अगली सुबह…
सुमन ने भैया के दरवाज़े पर रखी
एक चिट्ठी पढ़ी —
"बहना, तू मेरी शक्ति है।
मैं सेहर जाऊँगा,
पर तेरी बातें मेरे साथ रहेंगी।
तू बस ऐसी ही रहना —
पवित्र, प्यारी, और मेरी बहना।"

सुमन उस चिट्ठी को सीने से लगाकर रोई,
पर उसके आँसू प्रेम के थे,
और उस दिन से, उसने ठान लिया —
"भैया का नाम रोशन करूँगी,
और उनके लिए , फूल, और दुआएँ ही लाऊँगी।"

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भाग 5 – खेतों की सैर, पानी की बातें, और साथ चलने का सुख
(पारिवारिक पल, मासूमियत, और गाँव की मिट्टी की सोंधी खुशबू)

---
आज सुबह-सवेरे ही अभिषेक तैयार हो चुका था।
बाबूजी ने झटके से जनेऊ संभाली और बोले —
"अभिषेक, 1 बजे मिलना है प्रधानजी से।


अभिषेक ने सिर हिलाया तो सुमन चंचल-सी हो गई।
"अरे बाबूजी! थोड़ी देर से जाइए न…
हम खेतों पर चलते हैं, भैया को नहर और तालाब दिखाएँगे…
बाबूजी ने कितना सुंदर ट्यूबवेल बनवाया है…"
उसकी आँखों में बचपन की सी चमक थी।

बाबूजी मुस्कुराए —
"जा रे… अभी टाइम है तुम दोनो घूम आओ 3 घंटा मिला है तुझे।

---

सुमन खुशी से भैया की बाँह पकड़कर खेतों की ओर चल दी।
रास्ते में हरियाली थी,
बोर-बीजों की महक,
और चिड़ियाँ झाड़ियों में फुदक रही थीं।

"भैया, वो देखो… जो गहरा-गहरा नीला पानी है,
हमारा तालाब है…
बाबूजी ने कहा — अब इसी में सिंचाई होगी।"

अभिषेक ने इधर-उधर देखा —
"वाकई… गाँव तो अब बदल रहा है, सुमन।"

"हाँ भैया… पर मुझे तो खेत ही प्यारे हैं।
जहाँ तुम्हारे संग हम बैठा करते थे…
याद है न भैया?
हम दोनों मिट्टी में हाथ डालकर बीज बोते थे।"

---

अभिषेक ने उसके सिर पर हाथ रखा —
"क्यों भूलूँ, बहना…
वो सुबह-सुबह की धूप, वो चिड़ियों की आवाज़, और तेरी हँसी…
सब कुछ जैसे मेरे साथ ही बसा है।"

सुमन शरमा गई और आगे बढ़ गई।
वो ट्यूबवेल के पास पहुँचे। पानी की ठंडी फुहारें हवा में बिखर रही थीं।

"भैया, पानी से खेलेंगे?"
उसने आँखें मूँदकर पानी में हाथ डाला —
जैसे बचपन में दोनों करते थे।

पर सुमन हँसी —
"डर गए, भैया?"
और उसने हल्के से पानी भैया पर उछाला।

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--
अभिषेक हँसा —
"चल, देखता हूँ तुझे कौन बचाता है…"
पर वो नहीं भागा।
बस खड़ा रहा।
सुमन को देखकर उसे लगा —
क्या ही सुंदर दिन है,
क्या ही सुंदर बहना है,
और क्या ही सुंदर ये पल है.



---

अभिषेक पानी में तैरते-उछलते हुए बोला —
"बहना, आ जा… बहुत मज़ा आ रहा है… पानी ठंडा है… गर्मी भाग जाएगी!"

सुमन किनारे खड़ी, अपनी चोली की डोर से खेल रही थी।
"भैया… मैं कोई कपड़ा नहीं लाई…
और कपड़ों के साथ गई तो सर्दी लग जाएगी…
फिर बाबूजी से क्या जवाब दूँगी?"

अभिषेक हँसा —
"… अपने अंडरगार्मेंट्स में आ जा…
पानी तो गले तक है… कुछ दिखेगा नहीं…
मैं तेरा भाई हूँ… तू मुझसे क्या छिपाएगी?"

सुमन का चेहरा गुलाबी हो गया।
उसे भैया पर भरोसा था,
पर अपने बढ़ते शरीर पर भी उसे एहसास था —
वो अब वो बच्ची नहीं थी,
जो बिना झिझक पानी में कूद जाती थी।

---

"चल, बहना… तू डरती है क्या?"
अभिषेक ने हाथ बढ़ाया।

सुमन ने असमंजस में भैया के हाथ को देखा…
और फिर अपनी चोली-लहँगा को देखा…
फिर एक नज़र पानी पर,
और फिर भैया की आँखों पर —
जो बिल्कुल निर्मल थीं,
बिल्कुल बचपन जैसी।

उसने गहरी साँस ली,
और धीरे-धीरे अपना लहँगा खोला,
फिर अपनी चोली —
और केवल अपने रंग-बिरंगे अंडरगार्मेंट्स में खड़ी हो गई।
उसके भारी उभार अब बिना किसी ढाँप के थे,
पर पानी की उम्मीद ने उसे साहस दिया।

---

वो धीरे-धीरे पानी में उतरी…
जैसे कोई डरती-डरती,
पर भैया के भरोसे।
पानी ठंडा था, और उसके शरीर में एक बिजली-सी दौड़ गई।

"भैया… बहुत ठंडा है…"

"मज़ा तभी है, बहना…
अब आगे आ… यहाँ गहराई कम है…"

सुमन ने धीरे-धीरे पानी में कदम बढ़ाए,
जब तक पानी उसकी छाती तक न आ गया —
और उसके उभार पानी के नीचे छिप गए।

---

तभी उसके पैर में कुछ छुआ —
वो चीखकर पीछे हटी —
"हाय! क्या है?!"

अभिषेक हँसा —
"टेंशन मत ले… ये तो छोटी-छोटी मछलियाँ हैं…
तुझे कुछ नहीं करेंगी…
बस चू-चू करके रगड़ती हैं…

सुमन ने डरती-डरती नीचे देखा —
और सच में, कुछ छोटी-सी मछलियाँ उसके पैरों के आसपास तैर रही थीं।
"अरे… हाँ… ये तो कभी तालाब में होती थीं…"

---

धीरे-धीरे उसका डर घुलने लगा।
वो पानी में झूलने लगी,
हाथ हिलाने लगी,
और भैया पर पानी उछालने लगी —
"लो भैया… अब अपना बदला…"

अभिषेक ने भी पानी उछाला,
और दोनों बचपन की तरह हँसने लगे।

---

हँसी के बीच एक पल ऐसा आया —
जब सुमन की नज़र भैया के नंगे कंधों पर पड़ी,
और अभिषेक की नज़र उसकी गीली चोटी पर,
और पानी के नीचे उसके उभरते बदन पर।

दोनों ने एक-दूसरे को देखा,
पर कुछ नहीं कहा।
बस वही चुप्पी,
जो शब्दों से ज्यादा बोलती थी।



---

सुमन अब पानी में पूरी तरह सहज हो चुकी थी।
भैया के साथ वो उछल-कूद कर रही थी,
हँस रही थी, पानी उछाल रही थी —
मानो बचपन लौट आया हो।

पर तभी, एक छोटी-सी बदमाश मछली,
जो शायद किसी नटखट ख्याल से तालाब में घूम रही थी,
सीधे सुमन की ब्रा के अंदर घुस गई।

"हाय… हाय भैया… क्या है… कुछ अंदर घुस गया…!!"
सुमन बौखला गई,
हाथ-पैर मारने लगी,
और पानी में छपाके करने लगी —
पर वो चालाक मछली बाहर निकलने को राज़ी नहीं थी।

---

अभिषेक तुरंत पास आया —
"क्या हुआ बहना? क्या हुआ?"

"भैया… कुछ… मेरी ब्रा में घुस गया… कुछ चिचौंधला-सा…!!!"
सुमन की आवाज़ घबराहट से भरी थी।

अभिषेक ने बिना समय गँवाए,
उसकी ब्रा के अंदर हाथ डाला —
बिल्कुल शुद्धता से, जैसे कोई डॉक्टर मरीज़ की मदद करता है,
या कोई भाई अपनी बहना को किसी मुसीबत से बचाता है।

उसका हाथ उसकी ब्रा में गया,
पर ध्यान सिर्फ उस मछली को बाहर निकालने पर था।

"बहना… हिल मत… मैं निकालता हूँ…"

---

पर जैसे ही अभिषेक ने उसे पकड़ने की कोशिश की,
वो नटखट मछली, मानो मज़ाक कर रही हो,
सरक कर दूसरी तरफ़ — सुमन के दूसरे उभार के पास — जा छुपी।

"हाय राम… भैया… अब यहाँ…!!!"
सुमन गिड़गिड़ा गई।

अभिषेक ने फिर हाथ डाला,
पर मछली फिसलती रही,
और उसकी उँगलियाँ सुमन के मखमली उभारों से होकर गुज़रीं —
पर इस सब में कोई गलत इरादा नहीं था।

---

"पकड़ी…! आ गई बाहर…!"
अभिषेक ने झटके से मछली को बाहर निकाला,
और पानी में छोड़ दिया —
"जा, शैतान… अब किसी की ब्रा में मत घुसना…"

सुमन ने राहत की साँस ली,
पर उसके दोनों उभारों पर भैया के हाथों का हल्का-सा एहसास था,
जो न जाने क्यों,
उसके सीने में कुछ ऐसा हिला गया,
जिसे वो नाम नहीं दे पाई।

---

सुमन ने झटके से अपनी ब्रा समेटी,
और अपने दोनों उभारों को पानी के अंदर छिपा लिया —
"भैया… आपने… बहुत जल्दी हाथ डाल दिया…"
उसकी आवाज़ थरथरा रही थी।



---

जब मछली बाहर निकल गई, सुमन राहत की साँस ले रही थी —
पर उसके हाथ अभी भी अपने दोनों उभारों पर इस तरह चिपके थे,
मानो वो उन्हें छिपा रही हो।
पर उसी हड़बड़ी में, उसकी ब्रा का हुक खुल गया था,
और वो फिसलकर पानी में गिर गई।

सुमन ने घबराकर नीचे देखा —
पर अब तक पानी उसकी छाती तक था,
और उसके दोनों उभार बिना किसी आवरण के,
पानी की ठंडी परतों में खुल गए थे।
उसने झटके से अपनी बाँहें आड़ी कर लीं,
पर उससे पहले ही —
अभिषेक ने वो सब देख लिया था।

---

उसे नहीं पता था कि उसे क्या हुआ —
एक अजीब सी उमंग, एक अनजानी बेचैनी,
एक खिंचाव जो उसके होश उड़ा रहा था।
उसने बिना सोचे,
अपनी बहना को अपनी छाती से कसकर लगा लिया।

सुमन के नंगे उभार,
अभिषेक के नंगे सीने से कुचल गए।
उसकी चूचियाँ, उसकी पूरी देह,
उसके भाई की बाँहों में बंद थी।
उसकी ब्रा कहीं तालाब में तैर रही थी,
पर उसे अब उसकी कोई फ़िक्र नहीं थी।

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"भैया… क्या कर रहे हैं…?"
सुमन की आवाज़ काँप रही थी,
पर उसके हाथ भैया की पीठ पर जा टिके थे —
मानो उन्होंने भी अपनी मरज़ी से पकड़ा हो।

अभिषेक ने कुछ नहीं कहा।
उसने अपना एक हाथ सुमन के गाल पर रखा,
और धीरे से उसे ऊपर उठाया —
फिर उसके एक गाल को चूमा,
फिर दूसरे को,
फिर माथे को,
फिर नाक की नोक को —
एक, दो, तीन, चार, पाँच बार।
हर चुंबन पर उसके हाथ और कसते गए,
हर चुंबन पर सुमन की साँसें भारी होती गईं,
पर उसने एक भी बार मना नहीं किया।

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पानी की ठंडक,
भैया के सीने की गर्मी,
और उसके नंगे उभारों का उनके सीने से रगड़ खाना —
सब कुछ ऐसा था जैसे कोई सपना हो,
जिसे वो रोकना नहीं चाहती थी।

अभिषेक ने उसके कान में धीरे से कहा —
"सुमन… मैं नहीं जानता… मुझे क्या हो गया…
पर आज तू… बहुत खास है…"

सुमन ने अपनी आँखें बंद कर लीं,
और अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया —
"भैया… मैं भी… कुछ समझ नहीं पा रही…"
बस इतना कहकर वो चुप हो गई,
पर उसके हाथ भैया की पीठ से अलग नहीं हुए।

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कुछ देर वो दोनों ऐसे ही खड़े रहे —
पानी के बीच,
नंगे शरीर,
बिना किसी शब्द के,
बिना किसी शर्त के।
फिर धीरे से,
अभिषेक ने अपनी बाँहें हटाईं,
और पानी से बाहर निकलकर
"चल… अब प्रधान जी के यहाँ चलते हैं…"

और भैया का हाथ पकड़कर,
बिना कुछ कहे,
वो किनारे चढ़ गई।
पर उसके दिल में अब कुछ और बस चुका था —
जो शायद अभी सिर्फ एक सवाल था,
पर धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था।

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भाग 6 – अबोध की सीमा पर कदम, गंध की पहली पहचान, और मोहक वापसी...

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तालाब के उस सुनहरे पल के बाद,
दोनों के बीच नितांत चुप्पी थी।
न अभिषेक कुछ बोल पा रहा था,
न सुमन।
दोनों धीरे-धीरे गाँव की ओर चल रहे थे —
आगे-आगे सुमन,
और पीछे पीछे अभिषेक।

सुमन के हर कदम पर उसकी भरी-भरी गाँड
उसके लहँगे के नीचे थिरक रही थी,
और उसकी चोटी,
रंग-बिरंगे रिबन से बँधी हुई,
उसकी गाँड के उभार पर 61-62 खेल रही थी।



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अभिषेक को उसकी मटकती गाँड,
उसका हिलता हुआ लहँगा,
और उसकी नटखट चोटी —
सब कुछ अपनी तरफ बुला रहा था।
पर वो रुका नहीं, बढ़ा भी नहीं।
सिर्फ देखता रहा।
देखता रहा उस गाँड को,
जो उसकी बहना है, और जो अब बस उसकी नज़रों की राह बन गई थी।

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गाँव की पहली गली में आकर,
सुमन ने अपनी ब्रा-पैंटी लेने के लिए हाथ बढ़ाया —
जो अभिषेक ने अपनी कमीज़ में लपेट रखी थी।

और फिर —
दोनों की आँखें आमने-सामने टकराईं।

अभिषेक ने एक लंबी साँस ली,
और फिर बिना कुछ कहे,
सुमन की ब्रा-पैंटी को अपने होंठों से चूम लिया।

उसकी चूत की तीखी गंध —
वही गंध जो पानी में भीगने के बाद भी बाकी थी,
उसके नथुनों में समा गई।
एक ऐसी गंध,
जिसने उसे उसी पल बाँध लिया।

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सुमन ने ये सब देखा —
भैया का वो पागलपन,
उसकी ब्रा-पैंटी को चूमता हुआ,
उसकी गंध को साँसों में बसाता हुआ।

वो मुस्कुरा दी —
एक ऐसी मुस्कान,
जिसमें शरारत थी, बहनापा था,
और थोड़ी सी उस दीवानगी की चुभन भी,
जिसे वो पहली बार महसूस कर रही थी।

फिर बिना कुछ बोले,
उसने अभिषेक के हाथ से अपनी ब्रा-पैंटी झटकी,
और चंचल हिरणी की तरह
उछलती-कूदती, हँसती, ओझल हो गई।

---

अभिषेक स्तब्ध रह गया —
उसकी उँगलियों पर अब भी उसकी ब्रा-पैंटी का एहसास था,
उसके नथुनों में अब भी उसकी चूत की वह तीखी गंध बाकी थी,
और उसकी आँखों के सामने
उसकी मटकती गाँड, उसकी चोटी, और वो आखिरी मुस्कान —
सब कुछ घूम रहा था।

उसने मुस्कुराते हुए
तालाब की उस मछली का शुक्रिया अदा किया,
जिसके बिना शायद वो ये सब कभी महसूस न कर पाता।

---

फिर वो प्रधान जी के घर की तरफ चल पड़ा —
उसके कदम हल्के थे,
पर उसके दिल में कुछ गहरा बस चुका था।
वो जानता था —
अब कुछ बदल गया था।
और वो बदलाव शायद वापस नहीं हो सकता था।

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भाग 7 – प्रधान जी का दरबार, चाय की किरण, और दो विपरीत ध्रुव
(राजनीति, पहली मुलाकात, और छुपी हुई ईर्ष्या)

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प्रधान जी की हवेली —
इतनी बड़ी कि आँगन में सौ लोग समा जाएँ,
और हाल इतना विशाल कि आवाज़ें गूँज जाएँ।
अभिषेक अब भी उसी कैज़ुअल अवस्था में था —
नहाया-धोया, पर बिना कोई पगड़ी, बिना कोई कुर्ता,
बस एक सादी कमीज़ और चलने-भर के कपड़े।

प्रधान जी ने खड़े होकर उसका स्वागत किया —
"आओ बेटा, आओ… हमें तो लगा तुम कुर्ता-पगड़ी में आओगे…
पर जैसे हो, वैसे ही भले लगते हो।"

बाबूजी भी वहाँ बैठे थे,
चेहरे पर मुस्कान, पर आँखों में गंभीरता।
उन्होंने इशारे में बताया —
"ये प्रधान जी की बड़ी मेहरबानी है बेटा…
संभलकर बात करना।"

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बातें शुरू हुईं —
खेती, पानी, ट्यूबवेल, सरकारी योजना,
फिर धीरे-धीरे बात मोड़ी गई।

प्रधान जी ने गिलास उठाते हुए कहा —
"अभिषेक, हमने तुम्हारे बारे में बहुत सुना है।
IIT का चमका सितारा,
और अब नौकरी भी…
बड़ी बात है, बेटा।"

फिर बिना किसी हिचकिचाहट के,
प्रधान जी ने सीधी बात कर दी —
"हम चाहते हैं कि तुम हमारी बड़ी बेटी सुभद्रा को अपना लो।
वो IIM लखनऊ में फाइनल इयर में है,
और हम तुम्हारे जैसे बेटे को ही दामाद बनाना चाहते हैं।"

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अभिषेक चौंक गया।
न तो उसे इस बात का कोई अंदाज़ा था,
और न ही वो इसके लिए तैयार था।
उसका मन तो अब भी उसी तालाब में था,
जहाँ सुमन की गीली चोटी,
उसकी मटकती गाँड,
और उसकी चूत की तीखी गंध —
सब कुछ अब भी उसकी साँसों में था।

"प्रधान जी… ये… बहुत बड़ा सम्मान है…
पर मैं… अभी इसके लिए तैयार नहीं हूँ…
मैंने अभी नौकरी शुरू नहीं की…
और…"
वो आगे कुछ कहना चाहता था,
पर बाबूजी की नज़र ने उसे रोक दिया।

बाबूजी ने हल्की-सी खाँसी दी —
"बेटा, ये कोई फौरन फैसला नहीं है…
सोच-समझकर बात करो।"

---

तभी —
एक सुनहरी परछाई आई,
हाथ में चाय की ट्रे लिए,
और धीरे-धीरे हाल में दाखिल हुई।

सुभद्रा —


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ऐसा लगा मानो जमीन पर चाँद उतर आया हो।
गोरी, लंबी, घुंघराले बाल,
आँखें मानो किसी गहरे समंदर की लहरें,
और एक मुस्कान जो मीठी भी थी, और तीखी भी।
उसके हर कदम पर उसकी साड़ी झूमती थी,
और उसके उभार कुछ इस कदर,
कि अभिषेक की नज़र बिना इरादे के वहाँ ठहर गई।

उसने मुस्कुराकर चाय रखी —
"आपके लिए, अभिषेक जी।"
और बिना कुछ और कहे,
वो पलट गई —
पर उसकी मुस्कान में एक सवाल था,
जो अभिषेक के दिल को भेद गया।

---

तभी एक दूसरा युवक हाल में आया —
तेज़-तर्रार, कंधे चौड़े,
मुस्कान में आत्मविश्वास,
पर आँखों में कुछ अलग ही चमक थी —
मानो वो किसी को पढ़ रहा हो।

"नमस्ते, मैं बलराम हूँ। प्रधान जी का बड़ा बेटा।
लंदन से इंजीनियरिंग करके आया हूँ।"

उसने हाथ मिलाया,
पर उसके हाथ में वो गर्माहट नहीं थी,
जो एक दोस्त के हाथ में होती है।
उसकी आँखों में एक चुभन थी,
मानो वो अभिषेक को नाप रहा हो,
और तौल रहा हो —
"क्या ये है, जिसे मेरे पिता ने चुना?"

अभिषेक ने उससे हाथ मिलाया —
"अभिषेक, IIT दिल्ली से।"

बलराम ने मुस्कुराकर कहा —
"हाँ… सुना है आपके बारे में…
पिताजी ने खूब तारीफ़ की।"
पर उसकी मुस्कान में कहीं ईर्ष्या की गंध थी,
जो केवल अभिषेक पकड़ पा रहा था।

---

बातचीत शुरू हुई —
लंदन, भारत, पढ़ाई, नौकरी,
फिर बलराम ने हँसकर कहा —
"भई, हमारी बहन सुभद्रा को तो आपने देखा होगा…
वो आपकी तारीफ़ कर रही थी कल रात से…
लगता है आपके आने का इंतज़ार था उसे।"

अभिषेक ने मुस्कुराकर टाला,
पर बलराम की आँखों में वो चमक अब भी थी,
जो दोस्ती की नहीं, बल्कि किसी और एहसास की थी —
शायद उसके पिता के फैसले से सहमत न होने की,
या शायद सुभद्रा पर खुद किसी हक़ की।

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प्रधान जी ने फिर कहा —
"बेटा, सोच लेना… इंकार मत करना…
हमारी बेटी और हमारा घर —
दोनों ही तुम्हारे लिए खुले हैं।"

अभिषेक ने चुप्पी से सिर हिलाया,
पर उसके दिल में एक अलग ही युद्ध चल रहा था।
बलराम की नज़र अब भी उस पर थी,
और उसमें कुछ ऐसा था,
जो कह रहा था —
"हम तो दोस्त बनेंगे, पर दिल से नहीं।"

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भाग 8 – शाम की खामोशी, माँ की नज़र, और अनकही बातें
(संकोच, चुप्पी, और एक सवाल जो अनकहा रह गया)



प्रधान जी की हवेली से लौटते हुए
अभिषेक के मन में सिर्फ एक ही बात थी —
सुमन।
वही सुमन, जो आज सुबह तालाब में उसके सीने से चिपकी थी,
जिसकी गीली चोटी ने उसकी बाँहों को छुआ,
जिसकी ब्रा-पैंटी की गंध अब भी उसके नथुनों में बसी थी।

पर जैसे ही वो घर पहुँचा —
सुमन कहीं नहीं थी।
माँ ने बताया — रूपा के यहाँ गई है।
अभिषेक का मन बैठ गया।
वो सीधे अपने कमरे में गया,
और बिस्तर पर पड़ा रहा —
आँखें छत पर, मन तालाब में, और साँसें उस गंध में,
जो अब भी उसे पागल किए हुए थी।

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शाम ढले तक सुमन नहीं आई।
जब वो आई, तो चुपचाप अंदर गई,
न भैया से नज़र मिलाई, न कोई बात की।
अभिषेक भी अपने कमरे से बाहर नहीं निकला।

खाने की मेज़ पर —
दोनों एक-दूसरे से आँखें चुरा रहे थे।
सुमन ने झुककर रोटी तोड़ी,
तो अभिषेक ने नीचे देख लिया।
अभिषेक ने पानी पीने के लिए हाथ बढ़ाया,
तो सुमन ने दूसरी तरफ़ मुँह कर लिया।


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माँ की नज़र बार-बार दोनों पर पड़ रही थी।

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"क्या बात है…? दोनों चुप-चुप क्यों हो?"
माँ ने पूछा,
एक रोटी उठाते हुए,
"क्या आपस में कुछ हुआ? लड़ाई तो नहीं हुई?"

सुमन ने झट से कहा —
"नहीं-नहीं माँ… कुछ नहीं…
बस… आज बहुत धूप थी… थक गई हूँ…"

अभिषेक ने भी मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा —
"हाँ माँ… कुछ नहीं… मैं भी प्रधान जी के यहाँ से थोड़ा थका-सा आया हूँ…"

पर माँ को सब दिख रहा था।
उनकी नज़र पहले अभिषेक की बिखरी कमीज़ पर गई,
फिर सुमन की उलझी चोटी पर,
फिर दोनों की चोरी-छुपी नज़रों पर —
जो बार-बार एक-दूसरे को ढूँढ रही थीं,
पर मिलने से डर रही थीं।

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"अगर कुछ हुआ है तो बताओ… मैं माँ हूँ…
मेरे सामने मत छुपाओ…"
माँ ने पानी का गिलास सामने रखते हुए कहा।

सुमन ने नीचे देखते हुए कहा —
"माँ, बस यूँ ही… कोई बात नहीं…"
पर उसके कान लाल हो गए थे,
और उसकी चूचियाँ अचानक भारी हो गई थीं,
मानो तालाब की वो बात अब भी उसके सीने में साँस ले रही हो।

अभिषेक ने भी कुछ नहीं कहा,
बस एक लंबी साँस ली,
और सुमन की ओर ऐसे देखा —
मानो कहना चाहता हो —
"बहना, मुझे माफ़ कर… पर आज मैं खुद को नहीं रोक पा रहा हूँ…"

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उस रात —
रोटी अधूरी रह गई,
बातें अधूरी रह गईं,
पर दोनों के दिलों में कुछ अनकहा ज़रूर बस गया।
सुमन रात भर करवटें बदलती रही,
और अभिषेक उसी खामोशी में
अपनी बहना की गंध को अपनी साँसों में समेटता रहा।

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