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Adultery Village Girl in City

Killer_king

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Chapter-1
ट्रेन से उतरते ही भारती की जान में जान आई। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया। बिहार की ट्रेन में भीड़ न हो, यह कभी संभव नहीं हो सकता। इसी भीड़ में गाँव की सीधी-सादी भारती को अपने पति प्रमोद के साथ सफर करना पड़ा। प्रमोद, जो कि एक T.T.E. है, गाँव का ही रहने वाला था, लेकिन नौकरी लगने के बाद उसे शहर में रहना पड़ता था।

शादी के छह महीने ही हुए थे। शादी के बाद प्रमोद ज्यादा दिन तक अकेला नहीं रह सका। काम के दौरान वह बहुत थक जाता था। घर आकर खाना बनाने का मन नहीं करता था, लेकिन क्या करता? होटल में अच्छा खाना मिलता नहीं था। कभी-कभी तो भूखा ही रह जाता।

ऐसा नहीं है कि वह महंगे होटल में नहीं जा सकता था, मगर उसकी भूख सिर्फ खाने तक सीमित नहीं थी। उसे तो नई नवेली पत्नी भारती की भी भूख लग गई थी। उसे भारती की याद सताती थी। आखिर क्यों न सताए? भारती थी ही इतनी सुंदर! पूरे गाँव में उससे सुंदर कोई लड़की थी ही नहीं। यही वजह थी कि उसकी शादी नौकरी वाले लड़के, प्रमोद, से हुई।

प्रमोद ने जब पहली बार भारती को देखा, तो वह देखता ही रह गया। एकदम चाँद की तरह चमकता गोरा रंग, नशीली आँखें, गुलाबी होंठ, कमर तक लंबे-लंबे बाल, नाक में चमकती हुई लौंग, कानों में छोटी-छोटी बालियाँ, और गले में पतली सी नेकलेस, जिसमें एक अँगूठी लटकी हुई थी। सफेद सलीकेदार समीज-सलवार में भारती मानो हुस्न की मल्लिका लग रही थी।

दोनों परिवार वाले पहले ही इस रिश्ते को देखकर संतुष्ट थे, लेकिन उन्होंने सोचा कि लड़का-लड़की एक बार एक-दूसरे को देख लें, तो बेहतर रहेगा। इसीलिए भारती अपने भैया-भाभी के साथ प्रमोद से मिलने गाँव से 5 किलोमीटर दूर एक मंदिर पर आई थी। गाँव में शादी से पहले लड़के-लड़की का घर पर मिलना या बात करना तो दूर, ऐसे मौके बहुत दुर्लभ होते थे। लेकिन प्रमोद के परिवार वालों की जिद के कारण यह मुलाकात संभव हो सकी।

तय समय पर प्रमोद अपने दोस्त के साथ मंदिर पहुँच गया था। वहाँ एक चबूतरे पर बैठकर वह भारती के आने का इंतजार करने लगा। हालाँकि अभी तक भारती नहीं पहुँची थी।

प्रमोद के मन में तरह-तरह के विचार उमड़ने लगे। एक अजीब सी कशमकश थी। वह सोचने लगा, "पता नहीं, गाँव की लड़की कैसी होगी? शायद रंग सांवला होगा। खैर, रंग को गोली मारो। अगर शारीरिक बनावट ठीक-ठाक मिली, तो हाँ कर दूँगा।" लेकिन फिर वह खुद को समझाने लगा, "वैसे भी मेरी राय का अब कोई फायदा नहीं। माँ-बाबूजी को रिश्ता मंजूर है, तो मेरी जिम्मेदारी है उनकी बात मान लेना। सब कह रहे हैं, लड़की अच्छी है, तो यकीनन अच्छी ही होगी।"

इसी बीच प्रमोद के दिमाग में एक और उलझन उठी, "जब वह आएगी, तो मैं उससे क्या बात करूँगा? उसके साथ उसके भैया-भाभी भी होंगे। ज्यादा बात करने का मौका शायद न मिले। अगर पसंद भी आ गई, तो भी बात किए बिना रहना पड़ेगा। शादी तक इंतजार करना होगा।"

प्रमोद को शहर के तौर-तरीकों की याद आने लगी। "शहर में होता, तो कितना आसान था। आराम से मिल सकते थे, बात कर सकते थे, डेट पर जा सकते थे। पर यहाँ तो गाँव का माहौल है। शादी होने के बावजूद भी मिलने-जुलने पर बदनामी का डर रहता है।"

इन्हीं ख्यालों में उलझा प्रमोद बैठा रहा, और तभी मंदिर के बाहर अचानक मोटरगाड़ी की तेज आवाज ने प्रमोद को हड़बड़ा दिया। उसने सामने देखा तो भारती अपने भैया-भाभी के साथ पहुँच चुकी थी। उसकी एक झलक ने प्रमोद के सारे सवालों के जवाब दे दिए। भारती को देखते ही प्रमोद के मन में मानो बिजली सी दौड़ गई। उसकी आँखें भारती की सुंदरता से हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं। वह हैरान था, "गाँव की लड़की इतनी सुंदर कैसे हो सकती है? मैं तो बेकार में ही इतना सोच रहा था।"

तभी प्रमोद को अपने साथ आए दोस्त विकाश का ख्याल आया। उसने विकाश की तरफ देखा और अगले ही पल उसे दूसरा झटका लगा। विकाश मुँह फाड़े भारती को एकटक देखे जा रहा था। प्रमोद का मन किया, "साले को अभी एक थप्पड़ जमा दूँ," पर उसने खुद को सँभाला और चोरी से उसे कोहनी मार दी। विकाश जैसे अचानक नींद से जागा हो। उसने प्रमोद की तरफ देखा और शैतानी मुस्कान के साथ बोला, "भाई, ये तो कमाल है।" प्रमोद ने उसकी बात अनसुनी की और सीधा भैया-भाभी की तरफ बढ़कर उन्हें प्रणाम किया।

भैया ने किसी बहाने से कहा, "मैं अभी गाड़ी से कुछ लेने जाता हूँ। पाँच मिनट में आता हूँ," और वहाँ से चले गए।

तभी भाभी ने विकाश की तरफ देखकर पूछा, "आपका नाम?" इस अप्रत्याशित सवाल से विकाश घबरा गया। "जी... मैं... मैं विकाश, प्रमोद का दोस्त," उसने जवाब दिया। प्रमोद को लगा जैसे विकाश अपनी पहचान ही भूलने वाला था। भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा, "विकाश जी, इन्हें (प्रमोद और भारती) कुछ देर अकेले बात करने दीजिए तो अच्छा रहेगा। तब तक हम दोनों कहीं एकांत में चलते हैं।"

विकाश ने चुपचाप भाभी की बात मान ली और उनके पीछे-पीछे चलने लगा। जाते-जाते भाभी ने पलटकर प्रमोद से कहा, "और हाँ, प्रमोद जी, अभी सिर्फ बात करना, और कुछ नहीं। मैं पास में ही रहूँगी। बातें नहीं सुन सकती, पर देख जरूर सकती हूँ। ही...ही...ही..." भाभी की हँसी ने प्रमोद को और ज्यादा असहज कर दिया। वह बस सिर झुकाकर खड़ा रह गया, जबकि भाभी विकाश को लेकर मंदिर के बाहर चली गईं।

अब प्रमोद और भारती पहली बार अकेले खड़े थे। प्रमोद के दिल की धड़कन तेज हो गई, और वह सोचने लगा, "अब क्या कहूँ? कहीं वह बुरा न मान जाए।" दूसरी तरफ भारती शर्म से सिर झुकाए खड़ी थी। दोनों के बीच एक अजीब सा सन्नाटा छा गया।

अब मैं क्या बात करता? सामने साक्षात परी जैसी लड़की खड़ी थी। भारती का सौंदर्य ऐसा था कि मुझे शब्द ही नहीं मिल रहे थे। मैं बस इतना ही पूछ सका, "आपका नाम क्या है?" भारती ने इतनी मीठी आवाज में जवाब दिया कि ऐसा लगा मानो कोयल भी शर्मा जाए।

बाकी के 10 मिनट मैंने बस उसे देखा। वह गजब की थी। ऊपर से नीचे तक देखा, मगर कहीं कोई कमी नजर नहीं आई। भारती सिर झुकाए हल्के से मुस्कुरा रही थी। कभी-कभी वह नजरें उठाकर मुझे देखती, और मैं महसूस करता कि उसकी आँखें मुझे घायल करने के लिए काफी हैं।

तभी मैंने भाभी और विकाश को आते हुए देखा। मुझे उम्मीद तो नहीं थी कि यह मुलाकात इतनी जल्दी खत्म हो जाएगी, फिर भी मैंने बेवजह विकाश से फोन माँगने का बहाना किया। विकाश ने गर्दन हिलाकर 'ना' में जवाब दिया। पर मैं फिर भी खुश था।

जैसे ही भाभी पास आईं, उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा, "क्यों प्रमोद जी, बात तो कुछ खास हुई नहीं। लगता है आपको हमारी भारती पसंद नहीं आई। चलो, घर जाकर बाबूजी को मना कर देती हूँ।"

मैं घबरा गया। हड़बड़ाते हुए बोला, "नहीं-नहीं भाभीजी, मुझे तो पसंद है, बाकी इनसे पूछ लो।" मेरे बोलने की देर थी कि सब जोर से हँस पड़े। मुझे अपनी मासूमियत का एहसास हुआ और मैं भी मुस्कुरा दिया।

भाभी ने ठिठोली करते हुए कहा, "तो फिर पक्का समझो, आप दोनों का मेल तय है। क्योंकि भारती को भी आप पसंद आ गए हैं।"

तभी विकाश ने सवाल किया, "पर भाभी, आपने भारती से पूछा भी नहीं। फिर आपको कैसे पता कि उसे प्रमोद पसंद हैं?"

भाभी ने विकाश की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "क्यों? तुम्हारे दोस्त में क्या कमी है जो पसंद नहीं आएँगे? गबरू जवान हैं, अच्छी खासी बॉडी है, देखने में भी स्मार्ट हैं, और ऊपर से सरकारी नौकरी! अगर मैं कुंवारी होती, तो शायद मैं ही इनसे शादी कर लेती।"

इस पर सबकी हँसी छूट गई। मुझे हल्का शर्मिंदगी का एहसास हुआ, पर माहौल इतना खुशनुमा था कि मैं भी मुस्कुराए बिना नहीं रह सका।

तभी मोटरगाड़ी की आवाज आई। भैया वापस आ गए थे। अब मुझे लगा कि एक अच्छे लड़के की तरह घर लौटने का समय हो गया है। मैंने भाभी, भैया और भारती से इजाजत ली और विकाश के साथ गाँव के लिए निकल पड़ा।

मन ही मन मैं बहुत खुश था। एक अजीब सी राहत महसूस हो रही थी। आखिर, गाँव की परी अब मेरी जीवन संगिनी बनने जा रही थी।
 

Iron Man

Try and fail. But never give up trying
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Chapter-1
ट्रेन से उतरते ही भारती की जान में जान आई। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया। बिहार की ट्रेन में भीड़ न हो, यह कभी संभव नहीं हो सकता। इसी भीड़ में गाँव की सीधी-सादी भारती को अपने पति प्रमोद के साथ सफर करना पड़ा। प्रमोद, जो कि एक T.T.E. है, गाँव का ही रहने वाला था, लेकिन नौकरी लगने के बाद उसे शहर में रहना पड़ता था।

शादी के छह महीने ही हुए थे। शादी के बाद प्रमोद ज्यादा दिन तक अकेला नहीं रह सका। काम के दौरान वह बहुत थक जाता था। घर आकर खाना बनाने का मन नहीं करता था, लेकिन क्या करता? होटल में अच्छा खाना मिलता नहीं था। कभी-कभी तो भूखा ही रह जाता।

ऐसा नहीं है कि वह महंगे होटल में नहीं जा सकता था, मगर उसकी भूख सिर्फ खाने तक सीमित नहीं थी। उसे तो नई नवेली पत्नी भारती की भी भूख लग गई थी। उसे भारती की याद सताती थी। आखिर क्यों न सताए? भारती थी ही इतनी सुंदर! पूरे गाँव में उससे सुंदर कोई लड़की थी ही नहीं। यही वजह थी कि उसकी शादी नौकरी वाले लड़के, प्रमोद, से हुई।

प्रमोद ने जब पहली बार भारती को देखा, तो वह देखता ही रह गया। एकदम चाँद की तरह चमकता गोरा रंग, नशीली आँखें, गुलाबी होंठ, कमर तक लंबे-लंबे बाल, नाक में चमकती हुई लौंग, कानों में छोटी-छोटी बालियाँ, और गले में पतली सी नेकलेस, जिसमें एक अँगूठी लटकी हुई थी। सफेद सलीकेदार समीज-सलवार में भारती मानो हुस्न की मल्लिका लग रही थी।

दोनों परिवार वाले पहले ही इस रिश्ते को देखकर संतुष्ट थे, लेकिन उन्होंने सोचा कि लड़का-लड़की एक बार एक-दूसरे को देख लें, तो बेहतर रहेगा। इसीलिए भारती अपने भैया-भाभी के साथ प्रमोद से मिलने गाँव से 5 किलोमीटर दूर एक मंदिर पर आई थी। गाँव में शादी से पहले लड़के-लड़की का घर पर मिलना या बात करना तो दूर, ऐसे मौके बहुत दुर्लभ होते थे। लेकिन प्रमोद के परिवार वालों की जिद के कारण यह मुलाकात संभव हो सकी।

तय समय पर प्रमोद अपने दोस्त के साथ मंदिर पहुँच गया था। वहाँ एक चबूतरे पर बैठकर वह भारती के आने का इंतजार करने लगा। हालाँकि अभी तक भारती नहीं पहुँची थी।

प्रमोद के मन में तरह-तरह के विचार उमड़ने लगे। एक अजीब सी कशमकश थी। वह सोचने लगा, "पता नहीं, गाँव की लड़की कैसी होगी? शायद रंग सांवला होगा। खैर, रंग को गोली मारो। अगर शारीरिक बनावट ठीक-ठाक मिली, तो हाँ कर दूँगा।" लेकिन फिर वह खुद को समझाने लगा, "वैसे भी मेरी राय का अब कोई फायदा नहीं। माँ-बाबूजी को रिश्ता मंजूर है, तो मेरी जिम्मेदारी है उनकी बात मान लेना। सब कह रहे हैं, लड़की अच्छी है, तो यकीनन अच्छी ही होगी।"

इसी बीच प्रमोद के दिमाग में एक और उलझन उठी, "जब वह आएगी, तो मैं उससे क्या बात करूँगा? उसके साथ उसके भैया-भाभी भी होंगे। ज्यादा बात करने का मौका शायद न मिले। अगर पसंद भी आ गई, तो भी बात किए बिना रहना पड़ेगा। शादी तक इंतजार करना होगा।"

प्रमोद को शहर के तौर-तरीकों की याद आने लगी। "शहर में होता, तो कितना आसान था। आराम से मिल सकते थे, बात कर सकते थे, डेट पर जा सकते थे। पर यहाँ तो गाँव का माहौल है। शादी होने के बावजूद भी मिलने-जुलने पर बदनामी का डर रहता है।"

इन्हीं ख्यालों में उलझा प्रमोद बैठा रहा, और तभी मंदिर के बाहर अचानक मोटरगाड़ी की तेज आवाज ने प्रमोद को हड़बड़ा दिया। उसने सामने देखा तो भारती अपने भैया-भाभी के साथ पहुँच चुकी थी। उसकी एक झलक ने प्रमोद के सारे सवालों के जवाब दे दिए। भारती को देखते ही प्रमोद के मन में मानो बिजली सी दौड़ गई। उसकी आँखें भारती की सुंदरता से हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं। वह हैरान था, "गाँव की लड़की इतनी सुंदर कैसे हो सकती है? मैं तो बेकार में ही इतना सोच रहा था।"

तभी प्रमोद को अपने साथ आए दोस्त विकाश का ख्याल आया। उसने विकाश की तरफ देखा और अगले ही पल उसे दूसरा झटका लगा। विकाश मुँह फाड़े भारती को एकटक देखे जा रहा था। प्रमोद का मन किया, "साले को अभी एक थप्पड़ जमा दूँ," पर उसने खुद को सँभाला और चोरी से उसे कोहनी मार दी। विकाश जैसे अचानक नींद से जागा हो। उसने प्रमोद की तरफ देखा और शैतानी मुस्कान के साथ बोला, "भाई, ये तो कमाल है।" प्रमोद ने उसकी बात अनसुनी की और सीधा भैया-भाभी की तरफ बढ़कर उन्हें प्रणाम किया।

भैया ने किसी बहाने से कहा, "मैं अभी गाड़ी से कुछ लेने जाता हूँ। पाँच मिनट में आता हूँ," और वहाँ से चले गए।

तभी भाभी ने विकाश की तरफ देखकर पूछा, "आपका नाम?" इस अप्रत्याशित सवाल से विकाश घबरा गया। "जी... मैं... मैं विकाश, प्रमोद का दोस्त," उसने जवाब दिया। प्रमोद को लगा जैसे विकाश अपनी पहचान ही भूलने वाला था। भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा, "विकाश जी, इन्हें (प्रमोद और भारती) कुछ देर अकेले बात करने दीजिए तो अच्छा रहेगा। तब तक हम दोनों कहीं एकांत में चलते हैं।"

विकाश ने चुपचाप भाभी की बात मान ली और उनके पीछे-पीछे चलने लगा। जाते-जाते भाभी ने पलटकर प्रमोद से कहा, "और हाँ, प्रमोद जी, अभी सिर्फ बात करना, और कुछ नहीं। मैं पास में ही रहूँगी। बातें नहीं सुन सकती, पर देख जरूर सकती हूँ। ही...ही...ही..." भाभी की हँसी ने प्रमोद को और ज्यादा असहज कर दिया। वह बस सिर झुकाकर खड़ा रह गया, जबकि भाभी विकाश को लेकर मंदिर के बाहर चली गईं।

अब प्रमोद और भारती पहली बार अकेले खड़े थे। प्रमोद के दिल की धड़कन तेज हो गई, और वह सोचने लगा, "अब क्या कहूँ? कहीं वह बुरा न मान जाए।" दूसरी तरफ भारती शर्म से सिर झुकाए खड़ी थी। दोनों के बीच एक अजीब सा सन्नाटा छा गया।

अब मैं क्या बात करता? सामने साक्षात परी जैसी लड़की खड़ी थी। भारती का सौंदर्य ऐसा था कि मुझे शब्द ही नहीं मिल रहे थे। मैं बस इतना ही पूछ सका, "आपका नाम क्या है?" भारती ने इतनी मीठी आवाज में जवाब दिया कि ऐसा लगा मानो कोयल भी शर्मा जाए।

बाकी के 10 मिनट मैंने बस उसे देखा। वह गजब की थी। ऊपर से नीचे तक देखा, मगर कहीं कोई कमी नजर नहीं आई। भारती सिर झुकाए हल्के से मुस्कुरा रही थी। कभी-कभी वह नजरें उठाकर मुझे देखती, और मैं महसूस करता कि उसकी आँखें मुझे घायल करने के लिए काफी हैं।

तभी मैंने भाभी और विकाश को आते हुए देखा। मुझे उम्मीद तो नहीं थी कि यह मुलाकात इतनी जल्दी खत्म हो जाएगी, फिर भी मैंने बेवजह विकाश से फोन माँगने का बहाना किया। विकाश ने गर्दन हिलाकर 'ना' में जवाब दिया। पर मैं फिर भी खुश था।

जैसे ही भाभी पास आईं, उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा, "क्यों प्रमोद जी, बात तो कुछ खास हुई नहीं। लगता है आपको हमारी भारती पसंद नहीं आई। चलो, घर जाकर बाबूजी को मना कर देती हूँ।"

मैं घबरा गया। हड़बड़ाते हुए बोला, "नहीं-नहीं भाभीजी, मुझे तो पसंद है, बाकी इनसे पूछ लो।" मेरे बोलने की देर थी कि सब जोर से हँस पड़े। मुझे अपनी मासूमियत का एहसास हुआ और मैं भी मुस्कुरा दिया।

भाभी ने ठिठोली करते हुए कहा, "तो फिर पक्का समझो, आप दोनों का मेल तय है। क्योंकि भारती को भी आप पसंद आ गए हैं।"

तभी विकाश ने सवाल किया, "पर भाभी, आपने भारती से पूछा भी नहीं। फिर आपको कैसे पता कि उसे प्रमोद पसंद हैं?"

भाभी ने विकाश की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "क्यों? तुम्हारे दोस्त में क्या कमी है जो पसंद नहीं आएँगे? गबरू जवान हैं, अच्छी खासी बॉडी है, देखने में भी स्मार्ट हैं, और ऊपर से सरकारी नौकरी! अगर मैं कुंवारी होती, तो शायद मैं ही इनसे शादी कर लेती।"

इस पर सबकी हँसी छूट गई। मुझे हल्का शर्मिंदगी का एहसास हुआ, पर माहौल इतना खुशनुमा था कि मैं भी मुस्कुराए बिना नहीं रह सका।

तभी मोटरगाड़ी की आवाज आई। भैया वापस आ गए थे। अब मुझे लगा कि एक अच्छे लड़के की तरह घर लौटने का समय हो गया है। मैंने भाभी, भैया और भारती से इजाजत ली और विकाश के साथ गाँव के लिए निकल पड़ा।

मन ही मन मैं बहुत खुश था। एक अजीब सी राहत महसूस हो रही थी। आखिर, गाँव की परी अब मेरी जीवन संगिनी बनने जा रही थी।
Shaandar update
 

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Chapter-2
दोनों की शादी बड़े ही धूमधाम से संपन्न हुई थी। हर कोई इस जोड़े की तारीफ कर रहा था। प्रमोद के मन में सुहागरात को लेकर अलग ही उत्साह था। आखिर क्यों न हो? उसकी जीवनसंगिनी, भारती, जो गजब की खूबसूरत थी, आज लाल जोड़े में मानो किसी देवी की तरह लग रही थी।

दूसरी तरफ, भारती के मन में कई तरह के विचार उमड़ रहे थे। वह सुहागरात के लिए कोई खास तैयारी नहीं कर पाई थी, पर उसके मन में थोड़ी घबराहट जरूर थी। उसने भाभी की कही बातें याद कीं, "पहली बार दर्द होता है।" वह सोचने लगी, "पहली बार सेक्स करूँगी तो पता नहीं कितना दर्द होगा। पता नहीं मैं सह पाऊँगी या नहीं। अगर दर्द के कारण कुछ गलत हो गया या प्रमोद नाराज हो गए, तो मैं क्या करूँगी?" इन उलझनों के साथ वह पलंग पर सिर झुकाए बैठी थी।

तभी दरवाजे की हल्की सी आहट हुई, और प्रमोद कमरे में दाखिल हुआ। भारती उसे आते ही देख खड़ी हो गई।

प्रमोद ने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे! खड़ी क्यों हो गई? आराम से बैठो।" उसकी आवाज में हल्का सा व्यंग्य था, लेकिन उसमें प्यार भी झलक रहा था।

भारती कुछ सोचकर फिर से पलंग पर बैठ गई। वह घबराई हुई थी, लेकिन उसने हल्की नजरों से प्रमोद की ओर देखा। प्रमोद ने सफेद गंजी और तौलिया पहन रखा था। वह उसकी ओर धीरे-धीरे बढ़ा और उसके पास बैठ गया।

प्रमोद के दिल में उत्साह की लहरें उमड़ रही थीं, लेकिन उसने खुद को शांत दिखाने की कोशिश की। वह नहीं चाहता था कि भारती को उसकी बेसब्री का अहसास हो।

उसने धीमे स्वर में कहा, "भारती, तुम बहुत सुंदर लग रही हो।" भारती ने शरमाते हुए सिर झुका लिया। प्रमोद ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा।

"डर रही हो?" प्रमोद ने उसकी आँखों में झाँकते हुए पूछा।

भारती ने सिर हिला दिया और हल्की आवाज में कहा, "थोड़ा सा।"

प्रमोद ने मुस्कुराते हुए उसका हाथ थपथपाया। "कोई बात नहीं। आराम से बैठो। पहले बात करते हैं।"

प्रमोद की यह बात सुनकर भारती के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। उसने महसूस किया कि प्रमोद न केवल एक अच्छे पति हैं, बल्कि उसे समझने वाले भी हैं। दोनों ने रात की शुरुआत सहज बातचीत से की, और धीरे-धीरे उनकी झिझक कम होती चली गई।

भारती ने प्रमोद की ओर देखा और तुरंत शर्माकर अपनी नजरें झुका लीं। प्रमोद उसकी झिझक को समझ गया और धीमे स्वर में पूछा, "क्या हुआ? डर लग रहा है क्या?"

भारती ने कोई जवाब नहीं दिया। प्रमोद ने मुस्कुराते हुए हल्के मजाक के लहजे में कहा, "मैडम, हम शादीशुदा हैं, कोई प्रेमी-प्रेमिका नहीं, जो आप इतनी घबरा रही हैं। आज हमारी पहली रात है, तो थोड़ी शर्म हमें भी आ रही है। अगर आपकी इजाजत हो, तो हम ये शर्म दूर कर लें?"

यह कहते हुए प्रमोद ने भारती की तरफ इशारा भी कर दिया। बेचारे भारती क्या जवाब देती? उसकी झिझक और बढ़ गई।

प्रमोद ने कोई उत्तर न पाकर, धीरे-धीरे भारती के करीब जाकर उसे गले लगा लिया। भारती का चेहरा शर्म के मारे सुर्ख लाल हो गया। यह उसके जीवन का पहला अनुभव था जब किसी मर्द ने उसे इतने करीब से छुआ था।

उसे पता नहीं था कि एक मर्द की बाँहें औरत को कितना सुकून और आनंद दे सकती हैं। वह बस प्रमोद के सीने से सटी, सहमी सी खड़ी रही। प्रमोद को उसकी चुप्पी और जड़ता थोड़ी असामान्य लगी, लेकिन उसने इसे उनकी पहली रात की झिझक समझकर नजरअंदाज कर दिया।

थोड़ी देर बाद, प्रमोद ने भारती के दोनों कंधे पकड़कर उसे हल्के से अलग किया। उसने भारती के चेहरे के करीब आकर धीमे स्वर में कहा, "भारती, I love you! पता है, पहली बार जब तुम्हें देखा था, उसी दिन से मेरा दिल तुम्हारे लिए धड़कने लगा था। उस दिन के बाद से मैं तुम्हारे साथ हर पल बिताने का इंतजार कर रहा हूँ।"

भारती ने उसकी बातों को ध्यान से सुना। प्रमोद ने आगे कहा, "मैं तुम्हें बहुत प्यार करना चाहता हूँ, तुम्हारी हर बात सुनना चाहता हूँ, तुम्हारे साथ एक-एक पल जीना चाहता हूँ। तुम मेरी जिंदगी हो।"

प्रमोद की ये बातें सुनकर भारती के मन में भी एक हलचल सी मच गई। उसकी घबराहट थोड़ी कम हुई, और उसने प्रमोद को हल्की नजरों से देखा। उसकी आँखों में अब थोड़ा भरोसा और अपनापन झलकने लगा।

प्रमोद ने महसूस किया कि उसका प्यार और धैर्य भारती का दिल जीत रहा है। उसने कोई जल्दबाजी न करते हुए भारती का हाथ अपने हाथ में लिया और उसे धीरे-धीरे प्यार और विश्वास का एहसास कराने लगा। उनकी पहली रात, जो थोड़ी झिझक और डर से भारती नजरें नीची किए मूक बनी बैठी थी।

भारती के बगल में बैठा प्रमोद, कंधों पर हाथ रखकर भारती के गालों को सहलाने लगा। स्पर्श पाकर भारती अजीब रोमांच से भर गई। प्रमोद अब अपना चेहरा भारती के कंधों पर रख दिया, जो कि भारती के गालों से सट रही थी। भारती का रोम-रोम प्रमोद के गर्म साँसों से सिहर गया। भारती के जिस्म की खुशबू प्रमोद को मदहोश कर रही थी।

प्रमोद अपना दूसरा हाथ बढ़ाकर भारती के चेहरे को अपनी तरफ किया, जिससे भारती के होंठ प्रमोद के होंठ के काफी निकट हो गए। दोनों की गर्म साँसें टकरा रही थीं। भारती आगे होने वाली स्थिति का चित्रण याद कर तेज साँसें लेने लगी और उसके होंठ कंपकंपाने लगे।

प्रमोद ज्यादा देर करना उचित नहीं समझा और होंठ भारती के तपते होंठों से चिपका दिए। भारती के अनछुए होठों का रस पा कर प्रमोद तो जैसे स्वर्ग में पहुँच गया। अपने जीवन के पहले चुंबन से भारती के अंग-अंग सिहर गए। अंदर से वह भी काफी उत्तेजित हो गई थी, मगर शर्म की वजह से बर्दाश्त कर रही थी।

मगर बकरा कब तक अपने जीवन की खैर मनाता। प्रमोद जैसे ही भारती के चुची पर अपना हाथ रखा, भारती चिहुँक के प्रमोद को दोनों हाथों से जकड़ ली। प्रमोद तो अब और कस के होठोँ को चुसने लगा और चुची को धीमे धीमे दबाने लगा। कुछ ही देर में जोरदार चुंबन से भारती की साँसे उखड़ने लगी थी।

मगर प्रमोद इन सब से अनभिज्ञ लगातार चूसे जा रहा था। अंततः भारती बर्दाश्त नहीं कर पाई और अपने होंठ पीछे खींचने लगी तब प्रमोद को महसूस हुआ। प्रमोद के होंठ अलग होते ही भारती जोर जोर से साँस लेने लगी और सामान्य होने की कोशिश करने लगी।

प्रमोद के हाथ अभी भी भारती के चुची को सहला रहा था। कुछ सामान्य होने पर प्रमोद ने भारती को प्यार से पूछा- जान, तुम इतनी मीठी हो कि हमें पता ही नहीं चला कि अब ज्यादा हो गया है और तुम्हें दिक्कत हो रही है।

अब तक शायद भारती में भी कुछ हिम्मत आ गई थी। वो शर्माती हुई बोली- “कम से कम साँस भी तो लेने देते”।

"ओह जान सॉरी! आगे से ख्याल रखूँगा”।
कहते हुए भारती को अपनी बाँहो में समेट लिया। भारती भी मुस्कुराती हुई प्रमोद के सीने से चिपक गई।

प्रमोद थोड़ा मजाकिया मूड में पूछा- जान जब होंठ इतने रसीले हैं तो और चीज कितनी रसीली होगी।

भारती शर्म से कुछ बोल नहीं पा रही थी, बस मुस्कुरा रही थी। कुछ देर चिपके रहने के बाद प्रमोद हटा और अपना गंजी खोलते हुए कहा, "जान अब इन कपड़ों का कोई काम नहीं है सो अब तुम भी अपने कपड़े हटाओ”।

प्रमोद अब सिर्फ अंडरवियर में था जिसमें उसका लण्ड अंगराई ले रहा था। भारती तिरछी नजरों से देखी तो एकबारगी डर गई मगर चेहरे पर भाव नहीं आने दी।

प्रमोद भारती के पास आ कर साड़ी के पल्लू खींच दिया। भारती की तो सिसकारी निकल गई। अगले ही पल साड़ी जमीन पर बिखरी पड़ी थी। भारती की पीठ पर एक हाथ रख अपने से चिपका लिया और ब्लाउज के हुक खोलने लगा। ब्लाउज खुलते ही मध्यम आकार की चुची बाहर आ गई जो कि सफेद रंग की ब्रॉ में कैद थी। प्रमोद ब्रॉ के ऊपर से ही चुची जोर से मसल दिया। भारती की उफ्फ निकल गई। अगले ही क्षण तेजी से प्रमोद ने पेटीकोट का नाड़ा भी खोल दिया। भारती तो शर्म से मरी जा रही थी।

प्रमोद पति है मगर पहली बार पति के साथ भी लड़की को काफी शर्म आती है। यही हाल भारती की भी थी। बेचारी शर्म से प्रमोद के सीने से चिपक गई। प्रमोद ने भी मौका मिलते ही ब्रॉ भी अलग कर दिया। अब दोनों सिर्फ अंडरवियर और पेन्टी में चिपके थे।

भारती तो साक्षात काम देवी लग रही थी। पैरों में पायल, हाथ में मेँहदी, कलाई में चूड़ी, गले में मंगलसूत्र जो चुची तक लटक रही थी, नाक में छोटी सी रिंग, कान में झुमका, माथे पे माँग टीका, कपड़ों में मात्र एक छोटी सी पेन्टी, कुल मिला कर इस वक्त भारती किसी मुर्दे का भी लण्ड खड़ा कर देती। प्रमोद तो जिन्दा था, उसे तो लण्ड के दर्द से हालत खराब थी।

अब लण्ड को अंडरवियर के अंदर रखना मुश्किल था तो उसने बाहर कर दिया और भारती के नरम हाथों में थमा दिया। भारती, लण्ड की गरमी से तो चौंक पड़ी। उसे तो लग रहा थी कि, कोई गरम रॉड पकड़ लिया हो और हाथ में छाले पड़ जाएँगे।

गालोँ को काटते हुए प्रमोद बोला!- जान, अपना हाथ आगे-पीछे करो ना।

भारती तो इन सब से अनजान थी तो भला वो क्या करती। फिर भी अनमने ढंग से करने लगी। कुछ ही क्षण में लण्ड के दर्द से प्रमोद कुलबुलाने लगा।

भारती का हाथ हटा दिया और गोद में उठा बेड पर सुला दिया। बेड के नीचे से ही प्रमोद ने पेन्टी को निकाला।

ओफ्फ!, भारती के बुर देखते ही प्रमोद को नशा लग गया। एकदम चिकनी गुलाबी रंग, हल्की हल्की बाल, कसी हुई फाकेँ, पूरी मदहोश करने वाली थी।

प्रमोद ने चूत पर एक जोरदार चुंबन जड़ दिया, भारती तड़प उठी। प्रमोद ने चुंबन के साथ ही अपना जीभ चलाने लगा। भारती अपना सर बाएँ दाएँ करके तड़पने लगी। प्रमोद के बाल पकड़ के हटाने लगी मगर प्रमोद तो चुंबक की तरह चिपका था। उसकी बुर अब पानी छोड़ने लगी थी। नमकीन पानी मिलते ही प्रमोद और जोर-जोर से चुसने लगा।

भारती ज्यादा देर तक बर्दाश्त नहीं कर सकी। चंद मिनट में ही उसकी चीख निकल गई और झड़ने लगी। प्रमोद सारा पानी जल्दी जल्दी पीने लगा। जीभ से पानी की एक एक बूँद प्रमोद ने चाट के साफ कर दिया। भारती बदहवास सी आँखे बंद कर जोर जोर से साँसे ले रही थी।

प्रमोद मुस्कुराता हुआ उसके बगल में आ के लेट गया और भारती को अपनी बाँहो में भर के उसके माथे को चूमने लगा। प्रमोद का लण्ड अभी भी पूरा तना हुआ था। उसने एक पैर भारती के पैरों पर चढ़ा दिया, जिससे लण्ड सीधा भारती की गुलाबी चूत पर दस्तक दे रही थी।

प्रमोद भारती को चूमते हुए कहा- “जानू तुम, तो इतनी जल्दी खल्लास हो गई। अभी तो असली मजा तो बाकी ही है”।

भारती बस मुस्कुरा कर रह गई। प्रमोद उठ के भारती के मुँह के पास बैठ गया। जिससे उसका तना लण्ड भारती के होंठ के काफी नजदीक ठुमके लगा रहा था, पर भारती आँखें बंद की अभी भी पड़ी थी।

प्रमोद- जान! अब मैं तुम्हें एक पूरी औरत का एहसास दिलाना चाहता हूँ, अपनी आँखें खोलो और इसे प्यार करो।

भारती सुनते ही एकबारगी तो चौंक पड़ी। फिर आँखें खोली तो सामने लण्ड देख जल्दी से अपना मुँह दूसरी तरफ कर ली।

प्रमोद- अरे! क्या हुआ? जब तुम मेरे लण्ड को प्यार नहीं करोगी तो मैं इसे तुम्हारी बुर में कैसे डालूँगा और तुम्हें पूरी औरत कैसे बनाऊंगा।

भारती शर्माती हुई बोली- गंदा मत बोलो ना और आप नीचे हो जाओ मैं हाथ से कर देती हूँ।

प्रमोद- हाथ से नहीं डॉर्लिँग मुँह से प्यार करना है और गंदा क्या है लण्ड को लण्ड ना बोलूँ तो क्या बोलूँ?

भारती के शरीर में तो मानो 1000 वोल्ट का करंट लग गया। आज तक बेचारी एक किस तक नहीं की थी उसे मुँह में लण्ड लेने को कहा जा रहा था।

भारती सकुचाते हुए बोली- छीः मुँह में गंदा नहीं लूँगी।

प्रमोद- कुछ गंदा नहीं है मेरी रानी मुँह में लोगी तो और मस्त हो जाओगी। आज मना कर रही हो अगली बार खुद ही लपक कर लोगी।

भारती बोली- “नहीं आज नहीं प्लीज और जो करना है कर लीजिए मगर ये नहीं कर सकती” ।

अब प्रमोद ज्यादा दबाव नहीं देना चाहता था क्योंकि आज दोनों की पहली रात थी।

प्रमोद – “OK… बस एक किस ही कर दो और ज्यादा कुछ नहीं प्लीज” प्रमोद अब और ज्यादा प्यार से कहा।

भारती भी प्रमोद को नाराज नहीं करना चाहती थी। हल्की मुस्कान के साथ बोली- केवल एक किस?

प्रमोद को तो जैसे मन की सारी इच्छा इतनी में ही पूरी हो गई पूरा चहकते हुए बोला- हाँ हाँ डॉर्लिँग बस एक किस।

भारती बोली- “ठीक है तो अपनी आँखें बंद कीजिए, मुझे शर्म आएगी”।

प्रमोद अब ये मौका जाने नहीं देना चाहता था तो उसने जल्दी से अपनी आँखें बंद कर ली। भारती अभी भी लण्ड को मुँह से नहीं लगाना चाहती थी मगर हाँ कर दी थी तो क्या करती? अब अगर मना करती है तो कहीं प्रमोद नाराज हो गए तो?

फिर भी काफी हिम्मत करके एक हाथ से लण्ड पकड़ी और अपने होंठ लण्ड के निकट ले जाने लगी। प्रमोद की तो सिर्फ छूने से ही सिसकारी निकल रही थी। जैसे ही भारती के होंठ लण्ड को छुआ प्रमोद की आह निकल पड़ी। भारती प्रमोद को मस्ती में देख कुछ देर तक अपना होंठ लण्ड पर चिपकाए रखी।

भारती को अच्छा नहीं लग रहा था मगर वो प्रमोद के लिए ऐसा कर रही थी। कुछ देर बाद भारती हटने की सोची तो उसने पूरा सुपाड़ा अपने होठोँ में ले किस की आवाज के साथ हटा ली और जल्दी से अपना चेहरा हाथ से ढँक ली।

प्रमोद को तो ऐसा लग रहा था कि उसका लण्ड अब पानी छोड़ देगा। किसी तरह रोक के रखा और भारती की गालोँ पर चुंबन के साथ शुक्रिया अदा किया। प्रमोद अब उठा और भारती के मेकअप बॉक्स में से क्रीम निकाला और अपने लण्ड पे मलने लगा। फिर वो भारती की चूत को चूमते हुए उसकी चूत में भी क्रीम लगाने लगा। भारती को ठंड महसूस हुई तो हल्की नजरो से देखने लगी कि क्या लगा रहे हैं।

अपनी तरफ देखती पा कर प्रमोद बोला- "डॉर्लिँग! क्रीम लगा रहा हूँ ताकि आपको दर्द कम हो”, और प्रमोद मुस्कुरा दिया। भारती शर्माती हुई एक बार फिर चेहरा ढँक ली। प्रमोद ने भारती के दोनों पैरों को मोड़कर सीने से सटा दिया। अब भारती की फाकेँ काफी हद तक खुल रही थी काफी कसी बुर के कारण पूरी नहीं खुली थी वर्ना इस मुद्रा में तो अक्सर की चूत खुल जाती है।

आगे होने वाले स्थिति को सोचकर भारती की तो साँसें अब रुक रही थी। प्रमोद ने अपनी उँगली से चूत की दरार को फैला कर अपना लण्ड टिका दिया और हल्का धक्का लगाया, मगर लण्ड फिसल गया। पुनः उसने चूत और ज्यादा से खोल कर थोड़ा जोर का धक्का लगाया।

भारती जोर से अपनी आँखें भीँचते हुए चिल्ला पड़ी- “आआआआआआहहहहह..... ओह ओह ओफ्फ ओफ्फ ई ई ईईई ईईईई मर गईईईईईई प्लीज निकालीए बाहरररर आह आह”

प्रमोद पुचकारते हुए कहा- "बस रानी थोड़ा बर्दाश्त कर लो फिर मजा आएगा"। प्रमोद का लण्ड 2 इंच तक घुस गया था। प्रमोद ने अपना लण्ड खींचते हुए एक और झटका दे दिया, इस बार 4 इंच तक घुस गया।

“ओफ्फ.... माँ आआआआईईईईईईई मरररर गईईईईईईईई अब और नहीं सह पाऊंगी। प्लीज बाहर निकालीएएएए” भारती रोनी सूरत बनाते हुए बोली।

"अच्छा अब नहीं करूँगा"
, प्रमोद कहते हुए भारती की होंठ चुसने लगे और चुची मसलने लगे। कुछ देर चुसने के बाद जब भारती थोड़ी नॉर्मल हुई तो प्रमोद ने भारती के होठोँ को कस के चुसते हुए अपना लण्ड पीछे खींचा और बिना कहे पूरी ताकत से धक्का दे मारा।

"आआआआआआ मम्मी मर गईईईईईईई आह आह ओफ्फ ओह प्लीज मैं आपके पैर पकड़ती हूँ बाहर निकाल लीजिए आआआआइसइस"।

भारती की आँखें आँसू से भर गई थी और छूटने की प्रयास कर रही थी। जिंदगी में पहली बार उसे इतना दर्द हुआ था वो भी चुदाई में, कल्पना भी नहीं की थी बेचारी। ऐसा लग रहा था मानो चाकू से किसी ने उसकी बुर चीर दिया हो। प्रमोद का पूरा लण्ड भारती की छोटी सी बुर में समा गया था और उसके बॉल भारती की गांड के पास टिकी थी।

प्रमोद भारती के होंठ चूमते हुए कहा- “बधाई हो भारती रानी, अब आप लड़की से पूरी औरत बन गई हैं”।

भारती बेचारी कुछ ना बोल सकी। प्रमोद लण्ड पेले ही भारती की चुची मसल रहा था और होंठ लगातार चूसे जा रहा था। काफी देर बाद जब दर्द थोड़ी कम हुई तो प्रमोद ने अपना पूरा लण्ड बाहर निकाला और जोर से पेल दिया। "आहहहहहह उम्म उम्मउम्म" भारती एक बार फिर कराह उठी।

प्रमोद ने कहा, "बस रानी आज पहली बार है ना इसलिए दर्द ज्यादा हो रहा है। आज सह लो फिर पूरी जिंदगी मजे लेती रहना" और कहकर भारती को पेलने लगा। लण्ड अब लगातार भारती की बुर को चीर रही थी। भारती अभी भी दर्द से बेहाल थी। वो लगातार कराह रही थी मगर प्रमोद तो अब और जोर जोर से पेलने लगा। अपना लण्ड पूरा बाहर निकालता और एक ही झटके में जड़ तक घुसेड़ देता। वो भारती की कुंवारी चूत की लगातार धज्जियाँ उड़ा रहा था।

कुछ पलोँ में प्रमोद की रफ्तार तेज हो गई। उसकी मुँह से भी आवाजें निकल रही थी अब। "आह भारती ओहहहहह मेरी जान। कितनी प्यारी हो तुम। ओफ्फ ओह कितना मजा आ रहा है तुम्हें चोदने में क्या रसीले होंठ पाई है, एकदम मीठी आह आह आह आह मैं तो तुम्हें पाकर धन्य हो गया।" प्रमोद ऐसे ही बोलते हुए भारती को अब तेज तेज धक्के लगा रहा था।

अचानक प्रमोद की चीख निकलनी शुरू हो गई। प्रमोद अपने गर्म गर्म पानी से भारती की बुर को भर रहा था। उस पानी की गर्मी को भारती बर्दाश्त नहीं कर सकी और वो भी प्रमोद को जोर से गले लगाती हुई पानी छोड़ने लगी। भारती को लग रहा था जैसे उसकी बुर में कोई पिचकारी छोड़ रहा हो। दोनों झड़ने के काफी देर बाद तक यूँ ही पड़े रहे।फिर प्रमोद उठकर बाथरूम में साफ करने चला गया।

भारती उठ के अपनी बुर की तरफ देखी तो बेहोश होते होते बची। बुर पूरी तरह सूज गई थी और उसमें से खून और लण्ड के पानी का मिश्रण टपक रही थी। बेडसीट भी खून से पूरी तरह लाल हो चुकी थी। बेचारी भारती को अपनी इस हालत को देखकर रोना आ गया और सुबकने लगी।भारती कुछ समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे?

इतने में प्रमोद बाथरूम से वापस आ गया। प्रमोद का लण्ड सिकुड़ गया था फिर भी भारती को डर लग रहा था। भारती को सुबकती देख पूछे,"जान, दर्द तेज हो रही है क्या? पहली बार चुदाई में इतना ही दर्द होता है। मेरा लण्ड भी देखो छिल गया है, चलो बाथरूम साफ करते हैं”।

प्रमोद ने भारती की बाँह पकड़ उठने में सहायता की। फिर गोद में उठा कर बाथरूम में ले जा कर एक टेबल पर बैठा दिए। फिर पानी से भारती की चूत को अच्छी तरह से साफ किया। बेचारी भारती तो सोची भी नहीं थी कि कोई उसकी बुर को इतना प्यार देगा। वो तो शर्म से मरी जा रही थी। फिर तौलिया से चूत को अच्छी तरह पोँछा। फिर सहारा देकर बेडरूम तक ले आया।

भारती की पैर जवाब दे चुकी थी। कोई भी देखता तो जरूर कहता कि इसकी तबीयत से चुदाई हुई है। अंदर आकर प्रमोद ने भारती को सुला दिया। भारती साड़ी उठा कर पहनना चाह रही थी मगर प्रमोद ने रोक दिया, "जान, तुम ऐसे ही काफी सुंदर लग रही हो तो कपड़े पहनने की क्या जरूरत?" भारती शर्मा कर रह गई और फिर दोनों नंगे ही सो गए।
 

parkas

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Chapter-1
ट्रेन से उतरते ही भारती की जान में जान आई। उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया। बिहार की ट्रेन में भीड़ न हो, यह कभी संभव नहीं हो सकता। इसी भीड़ में गाँव की सीधी-सादी भारती को अपने पति प्रमोद के साथ सफर करना पड़ा। प्रमोद, जो कि एक T.T.E. है, गाँव का ही रहने वाला था, लेकिन नौकरी लगने के बाद उसे शहर में रहना पड़ता था।

शादी के छह महीने ही हुए थे। शादी के बाद प्रमोद ज्यादा दिन तक अकेला नहीं रह सका। काम के दौरान वह बहुत थक जाता था। घर आकर खाना बनाने का मन नहीं करता था, लेकिन क्या करता? होटल में अच्छा खाना मिलता नहीं था। कभी-कभी तो भूखा ही रह जाता।

ऐसा नहीं है कि वह महंगे होटल में नहीं जा सकता था, मगर उसकी भूख सिर्फ खाने तक सीमित नहीं थी। उसे तो नई नवेली पत्नी भारती की भी भूख लग गई थी। उसे भारती की याद सताती थी। आखिर क्यों न सताए? भारती थी ही इतनी सुंदर! पूरे गाँव में उससे सुंदर कोई लड़की थी ही नहीं। यही वजह थी कि उसकी शादी नौकरी वाले लड़के, प्रमोद, से हुई।

प्रमोद ने जब पहली बार भारती को देखा, तो वह देखता ही रह गया। एकदम चाँद की तरह चमकता गोरा रंग, नशीली आँखें, गुलाबी होंठ, कमर तक लंबे-लंबे बाल, नाक में चमकती हुई लौंग, कानों में छोटी-छोटी बालियाँ, और गले में पतली सी नेकलेस, जिसमें एक अँगूठी लटकी हुई थी। सफेद सलीकेदार समीज-सलवार में भारती मानो हुस्न की मल्लिका लग रही थी।

दोनों परिवार वाले पहले ही इस रिश्ते को देखकर संतुष्ट थे, लेकिन उन्होंने सोचा कि लड़का-लड़की एक बार एक-दूसरे को देख लें, तो बेहतर रहेगा। इसीलिए भारती अपने भैया-भाभी के साथ प्रमोद से मिलने गाँव से 5 किलोमीटर दूर एक मंदिर पर आई थी। गाँव में शादी से पहले लड़के-लड़की का घर पर मिलना या बात करना तो दूर, ऐसे मौके बहुत दुर्लभ होते थे। लेकिन प्रमोद के परिवार वालों की जिद के कारण यह मुलाकात संभव हो सकी।

तय समय पर प्रमोद अपने दोस्त के साथ मंदिर पहुँच गया था। वहाँ एक चबूतरे पर बैठकर वह भारती के आने का इंतजार करने लगा। हालाँकि अभी तक भारती नहीं पहुँची थी।

प्रमोद के मन में तरह-तरह के विचार उमड़ने लगे। एक अजीब सी कशमकश थी। वह सोचने लगा, "पता नहीं, गाँव की लड़की कैसी होगी? शायद रंग सांवला होगा। खैर, रंग को गोली मारो। अगर शारीरिक बनावट ठीक-ठाक मिली, तो हाँ कर दूँगा।" लेकिन फिर वह खुद को समझाने लगा, "वैसे भी मेरी राय का अब कोई फायदा नहीं। माँ-बाबूजी को रिश्ता मंजूर है, तो मेरी जिम्मेदारी है उनकी बात मान लेना। सब कह रहे हैं, लड़की अच्छी है, तो यकीनन अच्छी ही होगी।"

इसी बीच प्रमोद के दिमाग में एक और उलझन उठी, "जब वह आएगी, तो मैं उससे क्या बात करूँगा? उसके साथ उसके भैया-भाभी भी होंगे। ज्यादा बात करने का मौका शायद न मिले। अगर पसंद भी आ गई, तो भी बात किए बिना रहना पड़ेगा। शादी तक इंतजार करना होगा।"

प्रमोद को शहर के तौर-तरीकों की याद आने लगी। "शहर में होता, तो कितना आसान था। आराम से मिल सकते थे, बात कर सकते थे, डेट पर जा सकते थे। पर यहाँ तो गाँव का माहौल है। शादी होने के बावजूद भी मिलने-जुलने पर बदनामी का डर रहता है।"

इन्हीं ख्यालों में उलझा प्रमोद बैठा रहा, और तभी मंदिर के बाहर अचानक मोटरगाड़ी की तेज आवाज ने प्रमोद को हड़बड़ा दिया। उसने सामने देखा तो भारती अपने भैया-भाभी के साथ पहुँच चुकी थी। उसकी एक झलक ने प्रमोद के सारे सवालों के जवाब दे दिए। भारती को देखते ही प्रमोद के मन में मानो बिजली सी दौड़ गई। उसकी आँखें भारती की सुंदरता से हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं। वह हैरान था, "गाँव की लड़की इतनी सुंदर कैसे हो सकती है? मैं तो बेकार में ही इतना सोच रहा था।"

तभी प्रमोद को अपने साथ आए दोस्त विकाश का ख्याल आया। उसने विकाश की तरफ देखा और अगले ही पल उसे दूसरा झटका लगा। विकाश मुँह फाड़े भारती को एकटक देखे जा रहा था। प्रमोद का मन किया, "साले को अभी एक थप्पड़ जमा दूँ," पर उसने खुद को सँभाला और चोरी से उसे कोहनी मार दी। विकाश जैसे अचानक नींद से जागा हो। उसने प्रमोद की तरफ देखा और शैतानी मुस्कान के साथ बोला, "भाई, ये तो कमाल है।" प्रमोद ने उसकी बात अनसुनी की और सीधा भैया-भाभी की तरफ बढ़कर उन्हें प्रणाम किया।

भैया ने किसी बहाने से कहा, "मैं अभी गाड़ी से कुछ लेने जाता हूँ। पाँच मिनट में आता हूँ," और वहाँ से चले गए।

तभी भाभी ने विकाश की तरफ देखकर पूछा, "आपका नाम?" इस अप्रत्याशित सवाल से विकाश घबरा गया। "जी... मैं... मैं विकाश, प्रमोद का दोस्त," उसने जवाब दिया। प्रमोद को लगा जैसे विकाश अपनी पहचान ही भूलने वाला था। भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा, "विकाश जी, इन्हें (प्रमोद और भारती) कुछ देर अकेले बात करने दीजिए तो अच्छा रहेगा। तब तक हम दोनों कहीं एकांत में चलते हैं।"

विकाश ने चुपचाप भाभी की बात मान ली और उनके पीछे-पीछे चलने लगा। जाते-जाते भाभी ने पलटकर प्रमोद से कहा, "और हाँ, प्रमोद जी, अभी सिर्फ बात करना, और कुछ नहीं। मैं पास में ही रहूँगी। बातें नहीं सुन सकती, पर देख जरूर सकती हूँ। ही...ही...ही..." भाभी की हँसी ने प्रमोद को और ज्यादा असहज कर दिया। वह बस सिर झुकाकर खड़ा रह गया, जबकि भाभी विकाश को लेकर मंदिर के बाहर चली गईं।

अब प्रमोद और भारती पहली बार अकेले खड़े थे। प्रमोद के दिल की धड़कन तेज हो गई, और वह सोचने लगा, "अब क्या कहूँ? कहीं वह बुरा न मान जाए।" दूसरी तरफ भारती शर्म से सिर झुकाए खड़ी थी। दोनों के बीच एक अजीब सा सन्नाटा छा गया।

अब मैं क्या बात करता? सामने साक्षात परी जैसी लड़की खड़ी थी। भारती का सौंदर्य ऐसा था कि मुझे शब्द ही नहीं मिल रहे थे। मैं बस इतना ही पूछ सका, "आपका नाम क्या है?" भारती ने इतनी मीठी आवाज में जवाब दिया कि ऐसा लगा मानो कोयल भी शर्मा जाए।

बाकी के 10 मिनट मैंने बस उसे देखा। वह गजब की थी। ऊपर से नीचे तक देखा, मगर कहीं कोई कमी नजर नहीं आई। भारती सिर झुकाए हल्के से मुस्कुरा रही थी। कभी-कभी वह नजरें उठाकर मुझे देखती, और मैं महसूस करता कि उसकी आँखें मुझे घायल करने के लिए काफी हैं।

तभी मैंने भाभी और विकाश को आते हुए देखा। मुझे उम्मीद तो नहीं थी कि यह मुलाकात इतनी जल्दी खत्म हो जाएगी, फिर भी मैंने बेवजह विकाश से फोन माँगने का बहाना किया। विकाश ने गर्दन हिलाकर 'ना' में जवाब दिया। पर मैं फिर भी खुश था।

जैसे ही भाभी पास आईं, उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा, "क्यों प्रमोद जी, बात तो कुछ खास हुई नहीं। लगता है आपको हमारी भारती पसंद नहीं आई। चलो, घर जाकर बाबूजी को मना कर देती हूँ।"

मैं घबरा गया। हड़बड़ाते हुए बोला, "नहीं-नहीं भाभीजी, मुझे तो पसंद है, बाकी इनसे पूछ लो।" मेरे बोलने की देर थी कि सब जोर से हँस पड़े। मुझे अपनी मासूमियत का एहसास हुआ और मैं भी मुस्कुरा दिया।

भाभी ने ठिठोली करते हुए कहा, "तो फिर पक्का समझो, आप दोनों का मेल तय है। क्योंकि भारती को भी आप पसंद आ गए हैं।"

तभी विकाश ने सवाल किया, "पर भाभी, आपने भारती से पूछा भी नहीं। फिर आपको कैसे पता कि उसे प्रमोद पसंद हैं?"

भाभी ने विकाश की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "क्यों? तुम्हारे दोस्त में क्या कमी है जो पसंद नहीं आएँगे? गबरू जवान हैं, अच्छी खासी बॉडी है, देखने में भी स्मार्ट हैं, और ऊपर से सरकारी नौकरी! अगर मैं कुंवारी होती, तो शायद मैं ही इनसे शादी कर लेती।"

इस पर सबकी हँसी छूट गई। मुझे हल्का शर्मिंदगी का एहसास हुआ, पर माहौल इतना खुशनुमा था कि मैं भी मुस्कुराए बिना नहीं रह सका।

तभी मोटरगाड़ी की आवाज आई। भैया वापस आ गए थे। अब मुझे लगा कि एक अच्छे लड़के की तरह घर लौटने का समय हो गया है। मैंने भाभी, भैया और भारती से इजाजत ली और विकाश के साथ गाँव के लिए निकल पड़ा।

मन ही मन मैं बहुत खुश था। एक अजीब सी राहत महसूस हो रही थी। आखिर, गाँव की परी अब मेरी जीवन संगिनी बनने जा रही थी।
Nice and beautiful update....
 
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GOOD START
 

parkas

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Chapter-2
दोनों की शादी बड़े ही धूमधाम से संपन्न हुई थी। हर कोई इस जोड़े की तारीफ कर रहा था। प्रमोद के मन में सुहागरात को लेकर अलग ही उत्साह था। आखिर क्यों न हो? उसकी जीवनसंगिनी, भारती, जो गजब की खूबसूरत थी, आज लाल जोड़े में मानो किसी देवी की तरह लग रही थी।

दूसरी तरफ, भारती के मन में कई तरह के विचार उमड़ रहे थे। वह सुहागरात के लिए कोई खास तैयारी नहीं कर पाई थी, पर उसके मन में थोड़ी घबराहट जरूर थी। उसने भाभी की कही बातें याद कीं, "पहली बार दर्द होता है।" वह सोचने लगी, "पहली बार सेक्स करूँगी तो पता नहीं कितना दर्द होगा। पता नहीं मैं सह पाऊँगी या नहीं। अगर दर्द के कारण कुछ गलत हो गया या प्रमोद नाराज हो गए, तो मैं क्या करूँगी?" इन उलझनों के साथ वह पलंग पर सिर झुकाए बैठी थी।

तभी दरवाजे की हल्की सी आहट हुई, और प्रमोद कमरे में दाखिल हुआ। भारती उसे आते ही देख खड़ी हो गई।

प्रमोद ने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे! खड़ी क्यों हो गई? आराम से बैठो।" उसकी आवाज में हल्का सा व्यंग्य था, लेकिन उसमें प्यार भी झलक रहा था।

भारती कुछ सोचकर फिर से पलंग पर बैठ गई। वह घबराई हुई थी, लेकिन उसने हल्की नजरों से प्रमोद की ओर देखा। प्रमोद ने सफेद गंजी और तौलिया पहन रखा था। वह उसकी ओर धीरे-धीरे बढ़ा और उसके पास बैठ गया।

प्रमोद के दिल में उत्साह की लहरें उमड़ रही थीं, लेकिन उसने खुद को शांत दिखाने की कोशिश की। वह नहीं चाहता था कि भारती को उसकी बेसब्री का अहसास हो।

उसने धीमे स्वर में कहा, "भारती, तुम बहुत सुंदर लग रही हो।" भारती ने शरमाते हुए सिर झुका लिया। प्रमोद ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा।

"डर रही हो?" प्रमोद ने उसकी आँखों में झाँकते हुए पूछा।

भारती ने सिर हिला दिया और हल्की आवाज में कहा, "थोड़ा सा।"

प्रमोद ने मुस्कुराते हुए उसका हाथ थपथपाया। "कोई बात नहीं। आराम से बैठो। पहले बात करते हैं।"

प्रमोद की यह बात सुनकर भारती के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। उसने महसूस किया कि प्रमोद न केवल एक अच्छे पति हैं, बल्कि उसे समझने वाले भी हैं। दोनों ने रात की शुरुआत सहज बातचीत से की, और धीरे-धीरे उनकी झिझक कम होती चली गई।

भारती ने प्रमोद की ओर देखा और तुरंत शर्माकर अपनी नजरें झुका लीं। प्रमोद उसकी झिझक को समझ गया और धीमे स्वर में पूछा, "क्या हुआ? डर लग रहा है क्या?"

भारती ने कोई जवाब नहीं दिया। प्रमोद ने मुस्कुराते हुए हल्के मजाक के लहजे में कहा, "मैडम, हम शादीशुदा हैं, कोई प्रेमी-प्रेमिका नहीं, जो आप इतनी घबरा रही हैं। आज हमारी पहली रात है, तो थोड़ी शर्म हमें भी आ रही है। अगर आपकी इजाजत हो, तो हम ये शर्म दूर कर लें?"

यह कहते हुए प्रमोद ने भारती की तरफ इशारा भी कर दिया। बेचारे भारती क्या जवाब देती? उसकी झिझक और बढ़ गई।

प्रमोद ने कोई उत्तर न पाकर, धीरे-धीरे भारती के करीब जाकर उसे गले लगा लिया। भारती का चेहरा शर्म के मारे सुर्ख लाल हो गया। यह उसके जीवन का पहला अनुभव था जब किसी मर्द ने उसे इतने करीब से छुआ था।

उसे पता नहीं था कि एक मर्द की बाँहें औरत को कितना सुकून और आनंद दे सकती हैं। वह बस प्रमोद के सीने से सटी, सहमी सी खड़ी रही। प्रमोद को उसकी चुप्पी और जड़ता थोड़ी असामान्य लगी, लेकिन उसने इसे उनकी पहली रात की झिझक समझकर नजरअंदाज कर दिया।

थोड़ी देर बाद, प्रमोद ने भारती के दोनों कंधे पकड़कर उसे हल्के से अलग किया। उसने भारती के चेहरे के करीब आकर धीमे स्वर में कहा, "भारती, I love you! पता है, पहली बार जब तुम्हें देखा था, उसी दिन से मेरा दिल तुम्हारे लिए धड़कने लगा था। उस दिन के बाद से मैं तुम्हारे साथ हर पल बिताने का इंतजार कर रहा हूँ।"

भारती ने उसकी बातों को ध्यान से सुना। प्रमोद ने आगे कहा, "मैं तुम्हें बहुत प्यार करना चाहता हूँ, तुम्हारी हर बात सुनना चाहता हूँ, तुम्हारे साथ एक-एक पल जीना चाहता हूँ। तुम मेरी जिंदगी हो।"

प्रमोद की ये बातें सुनकर भारती के मन में भी एक हलचल सी मच गई। उसकी घबराहट थोड़ी कम हुई, और उसने प्रमोद को हल्की नजरों से देखा। उसकी आँखों में अब थोड़ा भरोसा और अपनापन झलकने लगा।

प्रमोद ने महसूस किया कि उसका प्यार और धैर्य भारती का दिल जीत रहा है। उसने कोई जल्दबाजी न करते हुए भारती का हाथ अपने हाथ में लिया और उसे धीरे-धीरे प्यार और विश्वास का एहसास कराने लगा। उनकी पहली रात, जो थोड़ी झिझक और डर से भारती नजरें नीची किए मूक बनी बैठी थी।

भारती के बगल में बैठा प्रमोद, कंधों पर हाथ रखकर भारती के गालों को सहलाने लगा। स्पर्श पाकर भारती अजीब रोमांच से भर गई। प्रमोद अब अपना चेहरा भारती के कंधों पर रख दिया, जो कि भारती के गालों से सट रही थी। भारती का रोम-रोम प्रमोद के गर्म साँसों से सिहर गया। भारती के जिस्म की खुशबू प्रमोद को मदहोश कर रही थी।

प्रमोद अपना दूसरा हाथ बढ़ाकर भारती के चेहरे को अपनी तरफ किया, जिससे भारती के होंठ प्रमोद के होंठ के काफी निकट हो गए। दोनों की गर्म साँसें टकरा रही थीं। भारती आगे होने वाली स्थिति का चित्रण याद कर तेज साँसें लेने लगी और उसके होंठ कंपकंपाने लगे।

प्रमोद ज्यादा देर करना उचित नहीं समझा और होंठ भारती के तपते होंठों से चिपका दिए। भारती के अनछुए होठों का रस पा कर प्रमोद तो जैसे स्वर्ग में पहुँच गया। अपने जीवन के पहले चुंबन से भारती के अंग-अंग सिहर गए। अंदर से वह भी काफी उत्तेजित हो गई थी, मगर शर्म की वजह से बर्दाश्त कर रही थी।

मगर बकरा कब तक अपने जीवन की खैर मनाता। प्रमोद जैसे ही भारती के चुची पर अपना हाथ रखा, भारती चिहुँक के प्रमोद को दोनों हाथों से जकड़ ली। प्रमोद तो अब और कस के होठोँ को चुसने लगा और चुची को धीमे धीमे दबाने लगा। कुछ ही देर में जोरदार चुंबन से भारती की साँसे उखड़ने लगी थी।

मगर प्रमोद इन सब से अनभिज्ञ लगातार चूसे जा रहा था। अंततः भारती बर्दाश्त नहीं कर पाई और अपने होंठ पीछे खींचने लगी तब प्रमोद को महसूस हुआ। प्रमोद के होंठ अलग होते ही भारती जोर जोर से साँस लेने लगी और सामान्य होने की कोशिश करने लगी।

प्रमोद के हाथ अभी भी भारती के चुची को सहला रहा था। कुछ सामान्य होने पर प्रमोद ने भारती को प्यार से पूछा- जान, तुम इतनी मीठी हो कि हमें पता ही नहीं चला कि अब ज्यादा हो गया है और तुम्हें दिक्कत हो रही है।

अब तक शायद भारती में भी कुछ हिम्मत आ गई थी। वो शर्माती हुई बोली- “कम से कम साँस भी तो लेने देते”।

"ओह जान सॉरी! आगे से ख्याल रखूँगा”।
कहते हुए भारती को अपनी बाँहो में समेट लिया। भारती भी मुस्कुराती हुई प्रमोद के सीने से चिपक गई।

प्रमोद थोड़ा मजाकिया मूड में पूछा- जान जब होंठ इतने रसीले हैं तो और चीज कितनी रसीली होगी।

भारती शर्म से कुछ बोल नहीं पा रही थी, बस मुस्कुरा रही थी। कुछ देर चिपके रहने के बाद प्रमोद हटा और अपना गंजी खोलते हुए कहा, "जान अब इन कपड़ों का कोई काम नहीं है सो अब तुम भी अपने कपड़े हटाओ”।

प्रमोद अब सिर्फ अंडरवियर में था जिसमें उसका लण्ड अंगराई ले रहा था। भारती तिरछी नजरों से देखी तो एकबारगी डर गई मगर चेहरे पर भाव नहीं आने दी।

प्रमोद भारती के पास आ कर साड़ी के पल्लू खींच दिया। भारती की तो सिसकारी निकल गई। अगले ही पल साड़ी जमीन पर बिखरी पड़ी थी। भारती की पीठ पर एक हाथ रख अपने से चिपका लिया और ब्लाउज के हुक खोलने लगा। ब्लाउज खुलते ही मध्यम आकार की चुची बाहर आ गई जो कि सफेद रंग की ब्रॉ में कैद थी। प्रमोद ब्रॉ के ऊपर से ही चुची जोर से मसल दिया। भारती की उफ्फ निकल गई। अगले ही क्षण तेजी से प्रमोद ने पेटीकोट का नाड़ा भी खोल दिया। भारती तो शर्म से मरी जा रही थी।

प्रमोद पति है मगर पहली बार पति के साथ भी लड़की को काफी शर्म आती है। यही हाल भारती की भी थी। बेचारी शर्म से प्रमोद के सीने से चिपक गई। प्रमोद ने भी मौका मिलते ही ब्रॉ भी अलग कर दिया। अब दोनों सिर्फ अंडरवियर और पेन्टी में चिपके थे।

भारती तो साक्षात काम देवी लग रही थी। पैरों में पायल, हाथ में मेँहदी, कलाई में चूड़ी, गले में मंगलसूत्र जो चुची तक लटक रही थी, नाक में छोटी सी रिंग, कान में झुमका, माथे पे माँग टीका, कपड़ों में मात्र एक छोटी सी पेन्टी, कुल मिला कर इस वक्त भारती किसी मुर्दे का भी लण्ड खड़ा कर देती। प्रमोद तो जिन्दा था, उसे तो लण्ड के दर्द से हालत खराब थी।

अब लण्ड को अंडरवियर के अंदर रखना मुश्किल था तो उसने बाहर कर दिया और भारती के नरम हाथों में थमा दिया। भारती, लण्ड की गरमी से तो चौंक पड़ी। उसे तो लग रहा थी कि, कोई गरम रॉड पकड़ लिया हो और हाथ में छाले पड़ जाएँगे।

गालोँ को काटते हुए प्रमोद बोला!- जान, अपना हाथ आगे-पीछे करो ना।

भारती तो इन सब से अनजान थी तो भला वो क्या करती। फिर भी अनमने ढंग से करने लगी। कुछ ही क्षण में लण्ड के दर्द से प्रमोद कुलबुलाने लगा।

भारती का हाथ हटा दिया और गोद में उठा बेड पर सुला दिया। बेड के नीचे से ही प्रमोद ने पेन्टी को निकाला।

ओफ्फ!, भारती के बुर देखते ही प्रमोद को नशा लग गया। एकदम चिकनी गुलाबी रंग, हल्की हल्की बाल, कसी हुई फाकेँ, पूरी मदहोश करने वाली थी।

प्रमोद ने चूत पर एक जोरदार चुंबन जड़ दिया, भारती तड़प उठी। प्रमोद ने चुंबन के साथ ही अपना जीभ चलाने लगा। भारती अपना सर बाएँ दाएँ करके तड़पने लगी। प्रमोद के बाल पकड़ के हटाने लगी मगर प्रमोद तो चुंबक की तरह चिपका था। उसकी बुर अब पानी छोड़ने लगी थी। नमकीन पानी मिलते ही प्रमोद और जोर-जोर से चुसने लगा।

भारती ज्यादा देर तक बर्दाश्त नहीं कर सकी। चंद मिनट में ही उसकी चीख निकल गई और झड़ने लगी। प्रमोद सारा पानी जल्दी जल्दी पीने लगा। जीभ से पानी की एक एक बूँद प्रमोद ने चाट के साफ कर दिया। भारती बदहवास सी आँखे बंद कर जोर जोर से साँसे ले रही थी।

प्रमोद मुस्कुराता हुआ उसके बगल में आ के लेट गया और भारती को अपनी बाँहो में भर के उसके माथे को चूमने लगा। प्रमोद का लण्ड अभी भी पूरा तना हुआ था। उसने एक पैर भारती के पैरों पर चढ़ा दिया, जिससे लण्ड सीधा भारती की गुलाबी चूत पर दस्तक दे रही थी।

प्रमोद भारती को चूमते हुए कहा- “जानू तुम, तो इतनी जल्दी खल्लास हो गई। अभी तो असली मजा तो बाकी ही है”।

भारती बस मुस्कुरा कर रह गई। प्रमोद उठ के भारती के मुँह के पास बैठ गया। जिससे उसका तना लण्ड भारती के होंठ के काफी नजदीक ठुमके लगा रहा था, पर भारती आँखें बंद की अभी भी पड़ी थी।

प्रमोद- जान! अब मैं तुम्हें एक पूरी औरत का एहसास दिलाना चाहता हूँ, अपनी आँखें खोलो और इसे प्यार करो।

भारती सुनते ही एकबारगी तो चौंक पड़ी। फिर आँखें खोली तो सामने लण्ड देख जल्दी से अपना मुँह दूसरी तरफ कर ली।

प्रमोद- अरे! क्या हुआ? जब तुम मेरे लण्ड को प्यार नहीं करोगी तो मैं इसे तुम्हारी बुर में कैसे डालूँगा और तुम्हें पूरी औरत कैसे बनाऊंगा।

भारती शर्माती हुई बोली- गंदा मत बोलो ना और आप नीचे हो जाओ मैं हाथ से कर देती हूँ।

प्रमोद- हाथ से नहीं डॉर्लिँग मुँह से प्यार करना है और गंदा क्या है लण्ड को लण्ड ना बोलूँ तो क्या बोलूँ?

भारती के शरीर में तो मानो 1000 वोल्ट का करंट लग गया। आज तक बेचारी एक किस तक नहीं की थी उसे मुँह में लण्ड लेने को कहा जा रहा था।

भारती सकुचाते हुए बोली- छीः मुँह में गंदा नहीं लूँगी।

प्रमोद- कुछ गंदा नहीं है मेरी रानी मुँह में लोगी तो और मस्त हो जाओगी। आज मना कर रही हो अगली बार खुद ही लपक कर लोगी।

भारती बोली- “नहीं आज नहीं प्लीज और जो करना है कर लीजिए मगर ये नहीं कर सकती” ।

अब प्रमोद ज्यादा दबाव नहीं देना चाहता था क्योंकि आज दोनों की पहली रात थी।

प्रमोद – “OK… बस एक किस ही कर दो और ज्यादा कुछ नहीं प्लीज” प्रमोद अब और ज्यादा प्यार से कहा।

भारती भी प्रमोद को नाराज नहीं करना चाहती थी। हल्की मुस्कान के साथ बोली- केवल एक किस?

प्रमोद को तो जैसे मन की सारी इच्छा इतनी में ही पूरी हो गई पूरा चहकते हुए बोला- हाँ हाँ डॉर्लिँग बस एक किस।

भारती बोली- “ठीक है तो अपनी आँखें बंद कीजिए, मुझे शर्म आएगी”।

प्रमोद अब ये मौका जाने नहीं देना चाहता था तो उसने जल्दी से अपनी आँखें बंद कर ली। भारती अभी भी लण्ड को मुँह से नहीं लगाना चाहती थी मगर हाँ कर दी थी तो क्या करती? अब अगर मना करती है तो कहीं प्रमोद नाराज हो गए तो?

फिर भी काफी हिम्मत करके एक हाथ से लण्ड पकड़ी और अपने होंठ लण्ड के निकट ले जाने लगी। प्रमोद की तो सिर्फ छूने से ही सिसकारी निकल रही थी। जैसे ही भारती के होंठ लण्ड को छुआ प्रमोद की आह निकल पड़ी। भारती प्रमोद को मस्ती में देख कुछ देर तक अपना होंठ लण्ड पर चिपकाए रखी।

भारती को अच्छा नहीं लग रहा था मगर वो प्रमोद के लिए ऐसा कर रही थी। कुछ देर बाद भारती हटने की सोची तो उसने पूरा सुपाड़ा अपने होठोँ में ले किस की आवाज के साथ हटा ली और जल्दी से अपना चेहरा हाथ से ढँक ली।

प्रमोद को तो ऐसा लग रहा था कि उसका लण्ड अब पानी छोड़ देगा। किसी तरह रोक के रखा और भारती की गालोँ पर चुंबन के साथ शुक्रिया अदा किया। प्रमोद अब उठा और भारती के मेकअप बॉक्स में से क्रीम निकाला और अपने लण्ड पे मलने लगा। फिर वो भारती की चूत को चूमते हुए उसकी चूत में भी क्रीम लगाने लगा। भारती को ठंड महसूस हुई तो हल्की नजरो से देखने लगी कि क्या लगा रहे हैं।

अपनी तरफ देखती पा कर प्रमोद बोला- "डॉर्लिँग! क्रीम लगा रहा हूँ ताकि आपको दर्द कम हो”, और प्रमोद मुस्कुरा दिया। भारती शर्माती हुई एक बार फिर चेहरा ढँक ली। प्रमोद ने भारती के दोनों पैरों को मोड़कर सीने से सटा दिया। अब भारती की फाकेँ काफी हद तक खुल रही थी काफी कसी बुर के कारण पूरी नहीं खुली थी वर्ना इस मुद्रा में तो अक्सर की चूत खुल जाती है।

आगे होने वाले स्थिति को सोचकर भारती की तो साँसें अब रुक रही थी। प्रमोद ने अपनी उँगली से चूत की दरार को फैला कर अपना लण्ड टिका दिया और हल्का धक्का लगाया, मगर लण्ड फिसल गया। पुनः उसने चूत और ज्यादा से खोल कर थोड़ा जोर का धक्का लगाया।

भारती जोर से अपनी आँखें भीँचते हुए चिल्ला पड़ी- “आआआआआआहहहहह..... ओह ओह ओफ्फ ओफ्फ ई ई ईईई ईईईई मर गईईईईईई प्लीज निकालीए बाहरररर आह आह”

प्रमोद पुचकारते हुए कहा- "बस रानी थोड़ा बर्दाश्त कर लो फिर मजा आएगा"। प्रमोद का लण्ड 2 इंच तक घुस गया था। प्रमोद ने अपना लण्ड खींचते हुए एक और झटका दे दिया, इस बार 4 इंच तक घुस गया।

“ओफ्फ.... माँ आआआआईईईईईईई मरररर गईईईईईईईई अब और नहीं सह पाऊंगी। प्लीज बाहर निकालीएएएए” भारती रोनी सूरत बनाते हुए बोली।

"अच्छा अब नहीं करूँगा"
, प्रमोद कहते हुए भारती की होंठ चुसने लगे और चुची मसलने लगे। कुछ देर चुसने के बाद जब भारती थोड़ी नॉर्मल हुई तो प्रमोद ने भारती के होठोँ को कस के चुसते हुए अपना लण्ड पीछे खींचा और बिना कहे पूरी ताकत से धक्का दे मारा।

"आआआआआआ मम्मी मर गईईईईईईई आह आह ओफ्फ ओह प्लीज मैं आपके पैर पकड़ती हूँ बाहर निकाल लीजिए आआआआइसइस"।

भारती की आँखें आँसू से भर गई थी और छूटने की प्रयास कर रही थी। जिंदगी में पहली बार उसे इतना दर्द हुआ था वो भी चुदाई में, कल्पना भी नहीं की थी बेचारी। ऐसा लग रहा था मानो चाकू से किसी ने उसकी बुर चीर दिया हो। प्रमोद का पूरा लण्ड भारती की छोटी सी बुर में समा गया था और उसके बॉल भारती की गांड के पास टिकी थी।

प्रमोद भारती के होंठ चूमते हुए कहा- “बधाई हो भारती रानी, अब आप लड़की से पूरी औरत बन गई हैं”।

भारती बेचारी कुछ ना बोल सकी। प्रमोद लण्ड पेले ही भारती की चुची मसल रहा था और होंठ लगातार चूसे जा रहा था। काफी देर बाद जब दर्द थोड़ी कम हुई तो प्रमोद ने अपना पूरा लण्ड बाहर निकाला और जोर से पेल दिया। "आहहहहहह उम्म उम्मउम्म" भारती एक बार फिर कराह उठी।

प्रमोद ने कहा, "बस रानी आज पहली बार है ना इसलिए दर्द ज्यादा हो रहा है। आज सह लो फिर पूरी जिंदगी मजे लेती रहना" और कहकर भारती को पेलने लगा। लण्ड अब लगातार भारती की बुर को चीर रही थी। भारती अभी भी दर्द से बेहाल थी। वो लगातार कराह रही थी मगर प्रमोद तो अब और जोर जोर से पेलने लगा। अपना लण्ड पूरा बाहर निकालता और एक ही झटके में जड़ तक घुसेड़ देता। वो भारती की कुंवारी चूत की लगातार धज्जियाँ उड़ा रहा था।

कुछ पलोँ में प्रमोद की रफ्तार तेज हो गई। उसकी मुँह से भी आवाजें निकल रही थी अब। "आह भारती ओहहहहह मेरी जान। कितनी प्यारी हो तुम। ओफ्फ ओह कितना मजा आ रहा है तुम्हें चोदने में क्या रसीले होंठ पाई है, एकदम मीठी आह आह आह आह मैं तो तुम्हें पाकर धन्य हो गया।" प्रमोद ऐसे ही बोलते हुए भारती को अब तेज तेज धक्के लगा रहा था।

अचानक प्रमोद की चीख निकलनी शुरू हो गई। प्रमोद अपने गर्म गर्म पानी से भारती की बुर को भर रहा था। उस पानी की गर्मी को भारती बर्दाश्त नहीं कर सकी और वो भी प्रमोद को जोर से गले लगाती हुई पानी छोड़ने लगी। भारती को लग रहा था जैसे उसकी बुर में कोई पिचकारी छोड़ रहा हो। दोनों झड़ने के काफी देर बाद तक यूँ ही पड़े रहे।फिर प्रमोद उठकर बाथरूम में साफ करने चला गया।

भारती उठ के अपनी बुर की तरफ देखी तो बेहोश होते होते बची। बुर पूरी तरह सूज गई थी और उसमें से खून और लण्ड के पानी का मिश्रण टपक रही थी। बेडसीट भी खून से पूरी तरह लाल हो चुकी थी। बेचारी भारती को अपनी इस हालत को देखकर रोना आ गया और सुबकने लगी।भारती कुछ समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे?

इतने में प्रमोद बाथरूम से वापस आ गया। प्रमोद का लण्ड सिकुड़ गया था फिर भी भारती को डर लग रहा था। भारती को सुबकती देख पूछे,"जान, दर्द तेज हो रही है क्या? पहली बार चुदाई में इतना ही दर्द होता है। मेरा लण्ड भी देखो छिल गया है, चलो बाथरूम साफ करते हैं”।

प्रमोद ने भारती की बाँह पकड़ उठने में सहायता की। फिर गोद में उठा कर बाथरूम में ले जा कर एक टेबल पर बैठा दिए। फिर पानी से भारती की चूत को अच्छी तरह से साफ किया। बेचारी भारती तो सोची भी नहीं थी कि कोई उसकी बुर को इतना प्यार देगा। वो तो शर्म से मरी जा रही थी। फिर तौलिया से चूत को अच्छी तरह पोँछा। फिर सहारा देकर बेडरूम तक ले आया।

भारती की पैर जवाब दे चुकी थी। कोई भी देखता तो जरूर कहता कि इसकी तबीयत से चुदाई हुई है। अंदर आकर प्रमोद ने भारती को सुला दिया। भारती साड़ी उठा कर पहनना चाह रही थी मगर प्रमोद ने रोक दिया, "जान, तुम ऐसे ही काफी सुंदर लग रही हो तो कपड़े पहनने की क्या जरूरत?" भारती शर्मा कर रह गई और फिर दोनों नंगे ही सो गए।
Nice and lovely update....
 

Killer_king

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Chapter-3
सुबह 5 बजे मेरी नींद खुली तो अपनी हालत देख खुद ही शर्मा गई। मैं पूरी तरह नंगी थी और प्रमोद के नंगे जिस्म से चिपकी हुई थी। मैं उठी, तो मेरी नजर बेडशीट पर पड़ी। बेडशीट पर खून और वीर्य के गहरे दाग थे। मैंने जल्दी से अपने कपड़े पहने और प्रमोद को नींद से जगाया। प्रमोद भी यह देखकर मुस्कुरा दिए।

मैंने फौरन बेडशीट बदली और नई बेडशीट बिछा दी। तब तक प्रमोद ने भी अपने कपड़े पहन लिए और फिर से सो गए। नींद तो मुझे भी आ रही थी, लेकिन नई जगह होने के कारण देर तक सोने का मन नहीं हुआ क्योंकि पता नहीं घर के लोग क्या सोचते।

कुछ देर बाद घर के सभी सदस्य जाग गए। मैंने नहा-धोकर खुद को फ्रेश किया और नाश्ता करने के बाद अपने कमरे में आ गई। सुबह 11 बजे तक प्रमोद सोते रहे। फिर वे उठे, फ्रेश हुए और अपने दोस्तों के साथ बाहर चले गए।

उनके जाते ही मेरी ननद साक्षी अचानक आ धमकी। शायद सुबह प्रमोद घर पर थे, इसलिए वह नहीं आई थी। साक्षी हँसते हुए बोली, "भाभी, भैया को रात में सोने नहीं दिया क्या, जो इतनी देर तक सोते रहे?" उसकी बात सुनकर मुझे भी हँसी आ गई।

साक्षी हमारे घर की लाडली थी। उसने हाल ही में 12वीं की परीक्षा दी थी और दिखने में काफी सुंदर थी। हमेशा हँसती-खिलखिलाती रहती थी। उसकी शारीरिक संरचना भी काफी आकर्षक थी।

साक्षी अचानक बेड पर चढ़कर मुझे पीछे से बाँहों में भर ली और अपनी गाल मेरी गाल से सटाते हुए बोली, "भाभी, बताओ ना प्लीज, रात में क्या सब किया?"

मैंने हँसते हुए जवाब दिया, "आप अपने भैया से पूछ लीजिए कि रात में क्या हुआ।"

"क्या भाभी...? भैया से कैसे पूछ सकती हूँ? बताओ ना प्लीज,"
वह जिद्द करने लगी।

"नहीं पूछ सकती तो छोड़ दो। जब तुम्हारी शादी होगी, तब खुद जान जाओगी।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

साक्षी- "अरे, 1 मिनट भाभी। ये 'आप-आप' क्यों लगा रखी है? मैं अपनी भाभी से दोस्ती करने आई हूँ और आप हैं कि...?"

"ओके, साक्षी!"

"थैंक्यू, भाभी!"
साक्षी ने खुश होकर कहा।

फिर वह कमरे में इधर-उधर देखते हुए पूछी, "अच्छा, ये बताओ, मेरी बेडशीट कहाँ है जो कल बिछाई थी?"

"क्या? वो तुम्हारी बेडशीट थी?",
मैंने चौंकते हुए पूछा।

"हाँ, मेरी प्यारी 'भारती डार्लिंग'! जरा दिखाओ तो, क्या हालत कर दी है।" यह कहते हुए साक्षी मेरे गालों को चूम ली।

"नहीं, अभी वो देखने लायक नहीं है। मैं साफ कर दूँगी, तब देखना।" मैंने जवाब दिया।

"भाभी, अगर जल्दी साफ नहीं करोगी तो दाग और ज्यादा गहरे हो जाएँगे। मुझे दे दो, मैं साफ कर दूँगी, प्लीज निकालो।"

"ठीक है, लेकिन किसी को दिखाना मत, वरना सब हँसेंगे।"
मैंने साक्षी को चेताया।

"क्या, भाभी? दिखाएँगे नहीं तो लोग कैसे समझेंगे कि दुल्हन कितनी संस्कारी है।"

"पागल हो गई है क्या? हमें मरवाएगी! जाओ, हमें साफ नहीं करवाना।"
मैंने मना करते हुए कहा।

साक्षी ने जोर से हँसते हुए कहा- "ही ही ही... मजाक कर रही थी भाभी, वो सब दिखाने वाली चीज होती है क्या? अब दो, जल्दी से"।

मैंने सूटकेस खोलकर बेडशीट निकाली ही थी कि साक्षी ने झपटकर उसे ले लिया और फुर्ती से पलंग पर फैला दी।

बेडशीट देखकर वह चिल्ला पड़ी, "हाय! मेरी प्यारी भाभी की कितनी धुनाई हुई है पूरी रात! इस बेडशीट को देखकर तो मैं शादी के नाम से डरने लगूँगी।"

उसकी बात सुन मैं शर्म से लाल हो गई और जल्दी से बेडशीट समेटने की कोशिश करने लगी। तभी साक्षी ने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए और मुझे पलंग पर धक्का देते हुए खुद मेरे ऊपर गिर पड़ी।
उसने अपना चेहरा मेरे चेहरे के पास लाते हुए कहा- "भाभी, रात में मजे ले रही थी, तब तो शर्म नहीं आई, अब क्यों शर्मा रही हो?"

"पागल, मरवाएगी क्या? अगर भैया को पता चला तो जानती हो क्या होगा?"
मैंने उसे समझाने की कोशिश की।

"कुछ नहीं होगा क्योंकि हम दोनों में से कोई भैया को कुछ बताएगा ही नहीं। वैसे भाभी, आपके होंठ काफी मस्त हैं, मन कर रहा है चिपका दूँ..."

उसके कुछ और करने से पहले ही मैंने उसे धक्का देकर अपने से दूर कर दिया। साक्षी जोर से हँसने लगी और मैं भी मुस्कुरा दी।

फिर साक्षी ने बेडशीट समेटी और अपने बैग में डालते हुए बोली, "भाभी, अपने दोस्त के यहाँ जा रही हूँ। वहीं इसे साफ कर दूँगी। चिंता मत करो, किसी को नहीं दिखाऊँगी। शाम तक वापस आ जाऊँगी।"
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "ठीक है, जल्दी आना, अकेले बोर हो जाऊँगी।" साक्षी ने मुझे बाय कहा और चली गई।

उसके जाने के बाद दोपहर के 12 बज चुके थे। मुझे भी नींद आने लगी। मैं बेड पर पड़ी और गहरी नींद में सो गई।

रात की थकावट के कारण मैं बेसुध होकर सो रही थी। अचानक, मैंने अपने होंठों पर कुछ गीला सा महसूस किया, लेकिन नींद इतनी गहरी थी कि मैं पूरी तरह जाग नहीं पाई। तभी मेरे होंठों में तेज दर्द हुआ, और मैं हड़बड़ाकर नींद से जाग गई।

ओह, गॉड! एक लड़की मुझे अपनी बाँहों में जकड़े हुए मेरे होंठ चूस रही थी। मैं पूरी तरह चौंक गई और उसे पहचान नहीं पाई। किसी तरह उसे धक्का देकर अपने से अलग किया। जैसे ही वह अलग हुई, मैंने देखा कि वह साक्षी की दोस्त श्रेया थी। अलग होते ही साक्षी और श्रेया जोर-जोर से हँसने लगीं।

मुझे गुस्सा भी आ रहा था, लेकिन साक्षी को देखकर मैंने खुद को शांत रखा।

साक्षी ने हँसते हुए कहा- "भाभी, ये लो आपकी बेडशीट, पूरी तरह साफ हो गई है"।

"ये मेरी दोस्त श्रेया है। इसके यहाँ बेडशीट साफ करवाने गई थी। काफी मेहनत करनी पड़ी हम दोनों को, तब जाकर यह दाग साफ हुआ"
, साक्षी ने मुस्कुराते हुए कहा।


मैंने नाराज़गी भरे लहजे में पूछा- "ठीक है, बेडशीट साफ हो गई, मगर ये गंदी हरकत क्यों की तुम दोनों ने?"

साक्षी पलंग पर चढ़ते हुए शरारत से बोली, "भाभी, इतनी मेहनत से बेडशीट साफ की है, तो क्या बिना कुछ लिए छोड़ देती? श्रेया ने तो अपना हिस्सा ले लिया। अब हमें भी जल्दी से अपना हिस्सा दे दो"।

मैं कुछ बोलती, उससे पहले ही श्रेया ने कहा, "भाभीजी, आप सोते हुए इतनी प्यारी लग रही थीं कि मैं बर्दाश्त नहीं कर सकी और चिपक गई। वो तो साक्षी ने ही लेने की सोची थी, मगर मैंने रोक लिया। वर्ना साक्षी आपकी और बुरी हालत कर देती!"

दोनों की चुहलबाजी सुनकर मेरा गुस्सा भी शांत हो गया। "तुम दोनों पागल हो गई हो, कम से कम मुझे जगा तो देती!" मैंने हँसते हुए जवाब दिया।

मेरी बात सुनते ही साक्षी झट से मेरी तरफ लपकी। मैं कुछ समझ पाती या कुछ करने की सोचती, उससे पहले ही मैं पलंग पर गिर चुकी थी। साक्षी ने मेरे दोनों हाथ जकड़ लिए और मेरे ऊपर चढ़ गई।

हम तीनों हँसने लगे, खासकर साक्षी की इस हरकत पर। उसकी मस्ती और चंचलता अब मुझे भी अच्छी लगने लगी थी। इसलिए मैं भी बिना किसी विरोध के, उसकी शरारतों का हिस्सा बनकर उसके नीचे पड़ी रही।

साक्षी ने शरारत करते हुए मेरी चुचियों को दबाया और फिर मेरे गालों को चूमते हुए बोली, "भारती डार्लिंग, आप मना भी करतीं, तो मैं अपना हक ले ही लेती। मगर मान गईं, ये आपकी अच्छी बात है। वरना ऐसा हाल करती, जो भैया ने भी नहीं किया होगा!"

"चलो, बड़ी आई हालत खराब करने वाली। तुम्हारे भैया भी पहले इसी तरह बोलते थे, लेकिन थोड़ी तकलीफ के बाद सब ठीक हो गया था।"
मैंने भी ताने भरे अंदाज में जवाब दिया।

हम दोनों की बातें सुनकर श्रेया भी हँसते हुए पास आ गई और बोली, "भाभीजी, अब तो आपकी खैर नहीं। साक्षी वो सब करती है, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकतीं। आपकी ऐसी हालत करेगी कि आप तड़प-तड़पकर छोड़ने की भीख माँगेंगी।"

तभी बाहर से मम्मीजी की आवाज सुनाई दी। आवाज सुनते ही साक्षी झट से उठ गई, और मैंने भी फुर्ती से अपने कपड़े ठीक कर लिए।

मम्मीजी कमरे में आते हुए बोलीं, "साक्षी, तुम बस बातों में ही लगी रहती हो। बहू ने सुबह ही खाया था। अब कुछ नाश्ता बना दो और श्रेया को भी खिला दो, काफी दिनों बाद आई है।"

"ठीक है, मम्मी", साक्षी ने जवाब दिया।

इतना कहकर मम्मीजी चली गईं। शायद उन्हें कहीं जाना था।

"साक्षी, अब मैं चलती हूँ। मुझे लेट हो जाएगा," श्रेया हम दोनों की ओर देखते हुए बोली।

"अरे, इतनी जल्दी क्यों? नाश्ता कर लो, फिर चले जाना", मैंने श्रेया से कहा।

"नहीं, भाभीजी, अगली बार आऊँगी, तो खाना जरूर खाऊँगी। आज मम्मी को कुछ काम है, इसलिए जाना जरूरी है", श्रेया ने सफाई देते हुए जवाब दिया।

मैंने साक्षी की तरफ देखा, और उसने भी श्रेया की बात पर सहमति जताई। फिर साक्षी श्रेया को छोड़ने बाहर चली गई।

कुछ देर बाद, साक्षी के बैग से मोबाइल के कंपन की आवाज आने लगी। मैंने सोचा कि साक्षी को बुला दूँ, इसलिए गेट की ओर लपकी। लेकिन तब तक, साक्षी और श्रेया बाहर जा चुकी थीं। मैं बाहर नहीं जा सकती थी, इसलिए खिड़की से झाँककर देखा। दोनों सड़क किनारे खड़ी होकर बातें कर रही थीं। अब वहाँ से आवाज देना भी मुश्किल था।

उधर, तब तक मोबाइल की रिंग कट चुकी थी। मैंने बैग से मोबाइल निकाला और स्क्रीन पर देखा कि किसका फोन था। कोई अनजान नंबर था। तभी फोन दोबारा बजने लगा। मैंने खिड़की से देखा, तो साक्षी और श्रेया अभी भी वहीं बातें कर रही थीं।

मैंने सोचा कि फोन उठा लेती हूँ और कॉलर को बता दूँ कि साक्षी कुछ देर बाद बात कर सकती है। मैंने फोन रिसीव किया और धीरे से कान पर लगाया।

"क्यों, साली, फोन क्यों नहीं उठा रही थी?" फोन पर एक मर्द की आवाज सुनकर मैं सन्न रह गई।

आवाज सुनने तक तो ठीक था, लेकिन उसकी भाषा ने मुझे असहज कर दिया। कुछ पल के लिए मेरा गला सूख गया। मैंने हिम्मत जुटाई और जवाब दिया, "आप कौन बोल रहे हैं और किससे बात करनी है?"

उधर से आवाज आई- "तुम साक्षी ही हो, ना?" और अब तो मेरा दिमाग पूरी तरह झकझोर गया।

मैंने खिड़की से देखा, लेकिन साक्षी और श्रेया अब वहाँ नहीं थीं। शायद बातें करते हुए वे आगे निकल गई थीं। मैंने खुद को शांत करने की कोशिश की। मन में कई सवाल उठने लगे, लेकिन मैंने जल्द ही स्थिति संभालने का फैसला किया।

फोन को कान से लगाते हुए मैंने जवाब दिया, "हाँ, मैं साक्षी ही हूँ, लेकिन मैं आपको पहचान नहीं पा रही हूँ, आप कौन हैं?"

"साली नाटक मत कर वर्ना तेरे घर आकर इतना चोदूँगा कि नानी याद आ जाएगी"


मैं तो इतना सुन के पानी पानी हो गई। फिर भी हिम्मत कर बोली, "सच कह रही हूँ, आपकी आवाज चेँज है सो नहीं पहचान पा रही हूँ।" मैं उसका नाम जानने की कोशिश कर रही थी।

“हाँ रात में कुछ ज्यादा ही शराब पी लिया था तो आवाज थोड़ी भारी हो गई”।

अब मेरी तीर निशाने पर लग रही थी। मैंने थोड़ी रिक्वेस्ट करते हुए बोली, "हाँ तभी तो नहीं पहचान रही हूँ कि कौन बोल रहे हैं”।

“साली लण्ड तो अँधेरे में भी पहचान लेती है और लपक के चुसने लगती है। आवाज क्यूँ नहीं पहचान रही है” ।


मैं तो ऐसी बातें सुन के शर्म के मरी जा रही थी मगर कुछ कुछ मजे भी आने लगी थी। हल्की मुस्कान आ गई मेरे चेहरे पर।

मैं- "प्लीज बता दीजिए ना!"

"बता दूँगा मगर मेरी एक शर्त है, वो माननी पड़ेगी तुम्हें” ।


मैं-"कैसी शर्त?

"कल शाम में मैं घर आ रहा हूँ तो तुम अपने दोस्त श्रेया के साथ मेरा लण्ड लेने के लिए तैयार रहेगी।"


मेरी तो हलक सूख गई, ये साक्षी और श्रेया क्या- क्या गुल खिलाती है। मुझे तो गुस्सा भी आ रही थी और थोड़ी-थोड़ी मजे भी आ रही थी। मगर मैं नाम जानना चाहती थी ।

मैं ज्यादा रिस्क नहीं लेना चाहती थी, "मैं तो तैयार हूँ मगर श्रेया से पूछ के कहूँगी।"

"तो ठीक है उस रण्डी से जल्दी पूछ के बताना।"


"अब तो नाम बता दीजिए।"

"साली बिना पहचाने चूत मरवाने के लिए हाँ कैसे कह दी। एक नम्बर की रण्डी हो गई है।”
इस बात पर मुझे भी हँसी आ गई। क्यों नहीं आती आखिर वो सही ही तो कह रहे थे।

हँसते हुए मैंने पुनः रिक्वेस्ट की नाम बताने की। फिर उन्होंने अपना नाम राजेंद्र बताया। नाम सुनते ही मैं तो बेहोश होते होते बची… मैं तो साक्षी को मन ही मन गाली देना शुरू कर दी थी। साली पूरे गाँव में और कोई नहीं मिला अपनी चूत मरवाने के लिए। मैंने फोन काट दी, मगर फोन फिर से बजने लगी। मैं उठा नहीं रही थी। फोन लगातार आ रही थी। मैं बाहर साक्षी को देखी तो अभी भी साक्षी कहीं नहीं दिखाई दे रही थी।

कुछ देर बाद मैंने पुनः फोन रिसीव की, फोन उठाते ही राजेंद्र अंकल की तेज आवाज मेरी कानों में गूँज पड़ी- “क्यों रण्डी, फोन क्यों काट दी?”

राजेंद्र अंकल जो कि हमारे ससुर जी के चचेरे भाई हैं। उनकी उम्र करीब 42 है। वे 3 पंचवर्षीय से इस गाँव के मुखिया हैं। अब सुन रही हूँ कि वे विधायक का चुनाव लड़ेँगे। उनको मैं सिर्फ एक बार ही देखी हूँ। ऊँचा कद, गठीला बदन, लम्बी मूँछेँ, गले में सोने की मोटी चैन, हाथ की सारी उँगली में अँगूठी, जब मैं पहली बार देखी तो डर ही गई थी। उनके साथ 12वीं की साक्षी… ओफ्फ! मैं तो हैरान थी कि भला साक्षी कैसे सह पाती होगी इनको।

तभी मेरे कानों में पुनः जोर की "हैलो" गूँजी।

"हाँ अंकल सुन रही हूँ" हड़बड़ाती हुई बोली।

अंकल - "चुप क्यों हो गई?"

"वो मम्मी आ गई थी ना इसलिए"
अब मैं पूरी तरह साक्षी बन के बात करने लगी।

अंकल- "वो साली बहुत डिस्टर्ब करती है हमें। एक बार तुम हाँ कहो तो उसको भी चोद चोद के शामिल कर लें, फिर तो मजे ही मजे।"

ओह गॉड! मुझ पर तो लगातार प्रहार होती जा रही थी। मम्मी के बारे में इतनी गंदी.....। मैं संभलती हुई बोली, "प्लीज मम्मी के बारे में कुछ मत कहिए।

अंकल- "अच्छा ठीक है नहीं कहूँगा”।

"फिर उन्होंने पूछा, "अच्छा वो तेरी नई भाभी की क्या नाम है? "

मैं अपने बारे में सुन के तो सन्न रह गई। मेरे हाथ- पाँव कांप गई। फिर किसी तरह अपना नाम बताई।

"हाँ याद आया भारती, साली क्या माल लगती है। गोरी चमड़ी, रस से भरी होंठ, गोल व सख्त चुची, चूतड़ निकली हुई, काले और लम्बे बाल, ओफ्फ साली को देख के मेरा लण्ड पानी छोड़ने लगता है।"

मैं अपने बारे में ऐसी बातें सुन के पसीने छूट रहे थे। मुँह से आवाजें निकलनी बंद ही हो गई थी… बस सुनती रही।

अंकल-"साक्षी, प्लीज एक बार तुम भारती को मेरे लण्ड के नीचे ला दो। मैं तुम्हें रुपयों से तौल दूँगा। प्रमोद तो उसकी सिर्फ सील तोड़ा होगा, असली चुदाई के मजे तो उसे मेरे लण्ड से ही आएगी। जब उसकी कसी चूत में तड़ा-तड़ लण्ड पेलूँगा तो वो प्रमोद को भूल जाएगी। जन्नत की सैर करवा दूँगा। बोलो साक्षी मेरे लण्ड के इतना नहीं करोगी?"

मैं तो अब तक पसीने से भीँग गई थी। क्या बोलूँ कुछ समझ नहीं आ रही थी। कुछ देर तो मूक बनी रही, फिर जल्दी से बोली, "ठीक है, मैं कोशिश करूँगी। मम्मी आ रही है शायद मैं रखती हूँ, बाद में बात करूँगी। "सिर्फ इतनी बातें ही बोल पाई और जल्दी से फोन काट दी।

मेरी साँसे काफी तेज हो गई थी मानो दौड़ के आ रही हूँ। मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रही थी। अचानक मुझे चूत के पास कुछ गीली सी महसूस हुई। मैंने हाथ लगा कर देखी तो उफ्फ! मेरी बुर तो पूरी तरह भीँगी हुई थी।

हे भगवान! ये क्या हो गया? अंकल की बातें सुन के मैं गीली हो गई। मैं भी कितनी पागल थी जो आराम से सुन रही थी। एक बात तो थी कि अंकल की बातें अच्छी लग रही थी तभी तो सुन रही थी।

साक्षी की बातें तक तो नॉर्मल थी पर जब अपनी बातें सुनी तो पता नहीं क्या हो गया हमें। एक अलग सी नशा आ गई मुझमें। मैं मदहोश हो कर सुन रही थी और नीचे मेरी बुर फव्वारे छोड़ रही थी। इतनी मदहोश तो रात में चुदाई के वक्त भी नहीं हुई थी।

साक्षी तो जानती होगी कि अंकल मुझे चोदना चाहते हैं। जानती होगी तभी तो वो हमसे दोस्ती की वर्ना आज के जमाने में ननद-भाभी में कहीं दोस्ती होती है। अगर होती भी होगी तो इतनी जल्दी नहीं होती। अगर साक्षी इस बारे में कभी बात की तो क्या कहूँगी? ना.. ना.. मैं ये सब नहीं करूँगी। मेरी शादी हो चुकी है, अब तो प्रमोद को छोड़ किसी के बारे में सोच भी नहीं सकती।

मैं यही सब सोच रही थी कि दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई। सामने साक्षी आ रही थी। मैं तो एकटक देखती ही रह गई। कितनी मासूम लग रही है दिखने में, मगर काम तो ऐसा करती है जिसमें बड़ी बड़ी को मात दे दे। मैं साक्षी को ऊपर से नीचे गौर से देखने लगी। मैं तो कल्पना भी नहीं कर पा रही थी कि इतनी प्यारी और छोटी लड़की भला एक 45 साल के मर्द को अपने ऊपर चढ़ा सकती है।

साक्षी- "क्या हुआ भारती डॉर्लिँग, किस सोच में डूबी हुई हैं। डरिए मत, मैं अपनी मेहनताना लिए बिना छोड़ूँगी नहीं" कहते हुए खिलखिला कर हँस पड़ी।

मैं भी हल्की मुस्कान के साथ उसका साथ दी।

"नाश्ता बना कर आती हूँ, फिर लूँगी।" साक्षी अपना उठाके जाने के लिए मुड़ी।

"साक्षी, तुम्हारा फोन…” इतनी बातें सुनते ही साक्षी के चेहरे की रंग मानो उड़ सी गई हो। वो जल्दी से आई और फोन मेरे हाथ से ले ली। फिर मेरी तरफ ऐसे देखने लगी मानो पूछ रही हो कि किसका फोन आया था।

मैं मुस्कुराती हुई बोली, " तुम्हारी किसी सहेली का फोन था शायद। मैं बात करना नहीं चाहती थी, तुम्हें आवाज भी दी पर तब तक तुम बाहर निकल चुकी थी। कई बार रिंग हुई तो मैं बात कर ली।"

साक्षी मेरी बात को सुनते हुए कॉल लॉग चेक करने लगी। नम्बर देखते ही वो पसीने से लथपथ सी हो गई। फिर मेरी तरफ देखने लगी। उसकी आँखे गुस्से से लाल पीली हो रही थी, मगर बोली कुछ नहीं।

मैं सीधे टॉपिक पर आते हुए बोली, "कल शाम को श्रेया और तुमसे मिलना चाहते हैं”। इतना सुनते ही वो पैर पटकती हुई निकल गई। मुझे तो उसकी हालत देख कर हँसी भी आ रही थी। तुरंत में मेरे सर पे बैठने वाली लड़की पल भर में बिल्ली बन गई।

वैसे मेरा इरादा उसके दिल पे ठोस पहुँचाने वाली नहीं थी। मैं तो उससे एक दोस्त की तरह सारी बातें जानना चाहती थी, फिर समझाना चाहती थी।

मैं पीछे से आवाज दी, "साक्षी, मेरी बात तो सुनो”, मगर वो तो अपने रूम की तरफ चलती चली गई और अंदर जा कर लॉक कर ली। अब मैं क्या करूँ? बेचारी नाराज हो गई हमसे… बेकार ही फोन रिसीव की थी। कम से कम नाश्ता तो करवा देती। खैर; मैं बात को ज्यादा बढ़ाना ठीक नहीं समझी।

फिर रात का खाना प्रमोद के साथ खा कर सोने चली गई। साक्षी सर दर्द का बहाना बना कर खाने से मना कर दी। रात में प्रमोद ने दो बार जम के चोदा, फिर सो गए… दर्द तो ज्यादा नहीं हुई पर थक ज्यादा गई तो सोते ही नींद आ गयी।

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malikarman

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Chapter-3
सुबह 5 बजे मेरी नींद खुली तो अपनी हालत देख खुद ही शर्मा गई। मैं पूरी तरह नंगी थी और प्रमोद के नंगे जिस्म से चिपकी हुई थी। मैं उठी, तो मेरी नजर बेडशीट पर पड़ी। बेडशीट पर खून और वीर्य के गहरे दाग थे। मैंने जल्दी से अपने कपड़े पहने और प्रमोद को नींद से जगाया। प्रमोद भी यह देखकर मुस्कुरा दिए।

मैंने फौरन बेडशीट बदली और नई बेडशीट बिछा दी। तब तक प्रमोद ने भी अपने कपड़े पहन लिए और फिर से सो गए। नींद तो मुझे भी आ रही थी, लेकिन नई जगह होने के कारण देर तक सोने का मन नहीं हुआ क्योंकि पता नहीं घर के लोग क्या सोचते।

कुछ देर बाद घर के सभी सदस्य जाग गए। मैंने नहा-धोकर खुद को फ्रेश किया और नाश्ता करने के बाद अपने कमरे में आ गई। सुबह 11 बजे तक प्रमोद सोते रहे। फिर वे उठे, फ्रेश हुए और अपने दोस्तों के साथ बाहर चले गए।

उनके जाते ही मेरी ननद साक्षी अचानक आ धमकी। शायद सुबह प्रमोद घर पर थे, इसलिए वह नहीं आई थी। साक्षी हँसते हुए बोली, "भाभी, भैया को रात में सोने नहीं दिया क्या, जो इतनी देर तक सोते रहे?" उसकी बात सुनकर मुझे भी हँसी आ गई।

साक्षी हमारे घर की लाडली थी। उसने हाल ही में 12वीं की परीक्षा दी थी और दिखने में काफी सुंदर थी। हमेशा हँसती-खिलखिलाती रहती थी। उसकी शारीरिक संरचना भी काफी आकर्षक थी।

साक्षी अचानक बेड पर चढ़कर मुझे पीछे से बाँहों में भर ली और अपनी गाल मेरी गाल से सटाते हुए बोली, "भाभी, बताओ ना प्लीज, रात में क्या सब किया?"

मैंने हँसते हुए जवाब दिया, "आप अपने भैया से पूछ लीजिए कि रात में क्या हुआ।"

"क्या भाभी...? भैया से कैसे पूछ सकती हूँ? बताओ ना प्लीज,"
वह जिद्द करने लगी।

"नहीं पूछ सकती तो छोड़ दो। जब तुम्हारी शादी होगी, तब खुद जान जाओगी।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

साक्षी- "अरे, 1 मिनट भाभी। ये 'आप-आप' क्यों लगा रखी है? मैं अपनी भाभी से दोस्ती करने आई हूँ और आप हैं कि...?"

"ओके, साक्षी!"

"थैंक्यू, भाभी!"
साक्षी ने खुश होकर कहा।

फिर वह कमरे में इधर-उधर देखते हुए पूछी, "अच्छा, ये बताओ, मेरी बेडशीट कहाँ है जो कल बिछाई थी?"

"क्या? वो तुम्हारी बेडशीट थी?",
मैंने चौंकते हुए पूछा।

"हाँ, मेरी प्यारी 'भारती डार्लिंग'! जरा दिखाओ तो, क्या हालत कर दी है।" यह कहते हुए साक्षी मेरे गालों को चूम ली।

"नहीं, अभी वो देखने लायक नहीं है। मैं साफ कर दूँगी, तब देखना।" मैंने जवाब दिया।

"भाभी, अगर जल्दी साफ नहीं करोगी तो दाग और ज्यादा गहरे हो जाएँगे। मुझे दे दो, मैं साफ कर दूँगी, प्लीज निकालो।"

"ठीक है, लेकिन किसी को दिखाना मत, वरना सब हँसेंगे।"
मैंने साक्षी को चेताया।

"क्या, भाभी? दिखाएँगे नहीं तो लोग कैसे समझेंगे कि दुल्हन कितनी संस्कारी है।"

"पागल हो गई है क्या? हमें मरवाएगी! जाओ, हमें साफ नहीं करवाना।"
मैंने मना करते हुए कहा।

साक्षी ने जोर से हँसते हुए कहा- "ही ही ही... मजाक कर रही थी भाभी, वो सब दिखाने वाली चीज होती है क्या? अब दो, जल्दी से"।

मैंने सूटकेस खोलकर बेडशीट निकाली ही थी कि साक्षी ने झपटकर उसे ले लिया और फुर्ती से पलंग पर फैला दी।

बेडशीट देखकर वह चिल्ला पड़ी, "हाय! मेरी प्यारी भाभी की कितनी धुनाई हुई है पूरी रात! इस बेडशीट को देखकर तो मैं शादी के नाम से डरने लगूँगी।"

उसकी बात सुन मैं शर्म से लाल हो गई और जल्दी से बेडशीट समेटने की कोशिश करने लगी। तभी साक्षी ने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए और मुझे पलंग पर धक्का देते हुए खुद मेरे ऊपर गिर पड़ी।
उसने अपना चेहरा मेरे चेहरे के पास लाते हुए कहा- "भाभी, रात में मजे ले रही थी, तब तो शर्म नहीं आई, अब क्यों शर्मा रही हो?"

"पागल, मरवाएगी क्या? अगर भैया को पता चला तो जानती हो क्या होगा?"
मैंने उसे समझाने की कोशिश की।

"कुछ नहीं होगा क्योंकि हम दोनों में से कोई भैया को कुछ बताएगा ही नहीं। वैसे भाभी, आपके होंठ काफी मस्त हैं, मन कर रहा है चिपका दूँ..."

उसके कुछ और करने से पहले ही मैंने उसे धक्का देकर अपने से दूर कर दिया। साक्षी जोर से हँसने लगी और मैं भी मुस्कुरा दी।

फिर साक्षी ने बेडशीट समेटी और अपने बैग में डालते हुए बोली, "भाभी, अपने दोस्त के यहाँ जा रही हूँ। वहीं इसे साफ कर दूँगी। चिंता मत करो, किसी को नहीं दिखाऊँगी। शाम तक वापस आ जाऊँगी।"
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "ठीक है, जल्दी आना, अकेले बोर हो जाऊँगी।" साक्षी ने मुझे बाय कहा और चली गई।

उसके जाने के बाद दोपहर के 12 बज चुके थे। मुझे भी नींद आने लगी। मैं बेड पर पड़ी और गहरी नींद में सो गई।

रात की थकावट के कारण मैं बेसुध होकर सो रही थी। अचानक, मैंने अपने होंठों पर कुछ गीला सा महसूस किया, लेकिन नींद इतनी गहरी थी कि मैं पूरी तरह जाग नहीं पाई। तभी मेरे होंठों में तेज दर्द हुआ, और मैं हड़बड़ाकर नींद से जाग गई।

ओह, गॉड! एक लड़की मुझे अपनी बाँहों में जकड़े हुए मेरे होंठ चूस रही थी। मैं पूरी तरह चौंक गई और उसे पहचान नहीं पाई। किसी तरह उसे धक्का देकर अपने से अलग किया। जैसे ही वह अलग हुई, मैंने देखा कि वह साक्षी की दोस्त श्रेया थी। अलग होते ही साक्षी और श्रेया जोर-जोर से हँसने लगीं।

मुझे गुस्सा भी आ रहा था, लेकिन साक्षी को देखकर मैंने खुद को शांत रखा।

साक्षी ने हँसते हुए कहा- "भाभी, ये लो आपकी बेडशीट, पूरी तरह साफ हो गई है"।

"ये मेरी दोस्त श्रेया है। इसके यहाँ बेडशीट साफ करवाने गई थी। काफी मेहनत करनी पड़ी हम दोनों को, तब जाकर यह दाग साफ हुआ"
, साक्षी ने मुस्कुराते हुए कहा।


मैंने नाराज़गी भरे लहजे में पूछा- "ठीक है, बेडशीट साफ हो गई, मगर ये गंदी हरकत क्यों की तुम दोनों ने?"

साक्षी पलंग पर चढ़ते हुए शरारत से बोली, "भाभी, इतनी मेहनत से बेडशीट साफ की है, तो क्या बिना कुछ लिए छोड़ देती? श्रेया ने तो अपना हिस्सा ले लिया। अब हमें भी जल्दी से अपना हिस्सा दे दो"।

मैं कुछ बोलती, उससे पहले ही श्रेया ने कहा, "भाभीजी, आप सोते हुए इतनी प्यारी लग रही थीं कि मैं बर्दाश्त नहीं कर सकी और चिपक गई। वो तो साक्षी ने ही लेने की सोची थी, मगर मैंने रोक लिया। वर्ना साक्षी आपकी और बुरी हालत कर देती!"

दोनों की चुहलबाजी सुनकर मेरा गुस्सा भी शांत हो गया। "तुम दोनों पागल हो गई हो, कम से कम मुझे जगा तो देती!" मैंने हँसते हुए जवाब दिया।

मेरी बात सुनते ही साक्षी झट से मेरी तरफ लपकी। मैं कुछ समझ पाती या कुछ करने की सोचती, उससे पहले ही मैं पलंग पर गिर चुकी थी। साक्षी ने मेरे दोनों हाथ जकड़ लिए और मेरे ऊपर चढ़ गई।

हम तीनों हँसने लगे, खासकर साक्षी की इस हरकत पर। उसकी मस्ती और चंचलता अब मुझे भी अच्छी लगने लगी थी। इसलिए मैं भी बिना किसी विरोध के, उसकी शरारतों का हिस्सा बनकर उसके नीचे पड़ी रही।

साक्षी ने शरारत करते हुए मेरी चुचियों को दबाया और फिर मेरे गालों को चूमते हुए बोली, "भारती डार्लिंग, आप मना भी करतीं, तो मैं अपना हक ले ही लेती। मगर मान गईं, ये आपकी अच्छी बात है। वरना ऐसा हाल करती, जो भैया ने भी नहीं किया होगा!"

"चलो, बड़ी आई हालत खराब करने वाली। तुम्हारे भैया भी पहले इसी तरह बोलते थे, लेकिन थोड़ी तकलीफ के बाद सब ठीक हो गया था।"
मैंने भी ताने भरे अंदाज में जवाब दिया।

हम दोनों की बातें सुनकर श्रेया भी हँसते हुए पास आ गई और बोली, "भाभीजी, अब तो आपकी खैर नहीं। साक्षी वो सब करती है, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकतीं। आपकी ऐसी हालत करेगी कि आप तड़प-तड़पकर छोड़ने की भीख माँगेंगी।"

तभी बाहर से मम्मीजी की आवाज सुनाई दी। आवाज सुनते ही साक्षी झट से उठ गई, और मैंने भी फुर्ती से अपने कपड़े ठीक कर लिए।

मम्मीजी कमरे में आते हुए बोलीं, "साक्षी, तुम बस बातों में ही लगी रहती हो। बहू ने सुबह ही खाया था। अब कुछ नाश्ता बना दो और श्रेया को भी खिला दो, काफी दिनों बाद आई है।"

"ठीक है, मम्मी", साक्षी ने जवाब दिया।

इतना कहकर मम्मीजी चली गईं। शायद उन्हें कहीं जाना था।

"साक्षी, अब मैं चलती हूँ। मुझे लेट हो जाएगा," श्रेया हम दोनों की ओर देखते हुए बोली।

"अरे, इतनी जल्दी क्यों? नाश्ता कर लो, फिर चले जाना", मैंने श्रेया से कहा।

"नहीं, भाभीजी, अगली बार आऊँगी, तो खाना जरूर खाऊँगी। आज मम्मी को कुछ काम है, इसलिए जाना जरूरी है", श्रेया ने सफाई देते हुए जवाब दिया।

मैंने साक्षी की तरफ देखा, और उसने भी श्रेया की बात पर सहमति जताई। फिर साक्षी श्रेया को छोड़ने बाहर चली गई।

कुछ देर बाद, साक्षी के बैग से मोबाइल के कंपन की आवाज आने लगी। मैंने सोचा कि साक्षी को बुला दूँ, इसलिए गेट की ओर लपकी। लेकिन तब तक, साक्षी और श्रेया बाहर जा चुकी थीं। मैं बाहर नहीं जा सकती थी, इसलिए खिड़की से झाँककर देखा। दोनों सड़क किनारे खड़ी होकर बातें कर रही थीं। अब वहाँ से आवाज देना भी मुश्किल था।

उधर, तब तक मोबाइल की रिंग कट चुकी थी। मैंने बैग से मोबाइल निकाला और स्क्रीन पर देखा कि किसका फोन था। कोई अनजान नंबर था। तभी फोन दोबारा बजने लगा। मैंने खिड़की से देखा, तो साक्षी और श्रेया अभी भी वहीं बातें कर रही थीं।

मैंने सोचा कि फोन उठा लेती हूँ और कॉलर को बता दूँ कि साक्षी कुछ देर बाद बात कर सकती है। मैंने फोन रिसीव किया और धीरे से कान पर लगाया।

"क्यों, साली, फोन क्यों नहीं उठा रही थी?" फोन पर एक मर्द की आवाज सुनकर मैं सन्न रह गई।

आवाज सुनने तक तो ठीक था, लेकिन उसकी भाषा ने मुझे असहज कर दिया। कुछ पल के लिए मेरा गला सूख गया। मैंने हिम्मत जुटाई और जवाब दिया, "आप कौन बोल रहे हैं और किससे बात करनी है?"

उधर से आवाज आई- "तुम साक्षी ही हो, ना?" और अब तो मेरा दिमाग पूरी तरह झकझोर गया।

मैंने खिड़की से देखा, लेकिन साक्षी और श्रेया अब वहाँ नहीं थीं। शायद बातें करते हुए वे आगे निकल गई थीं। मैंने खुद को शांत करने की कोशिश की। मन में कई सवाल उठने लगे, लेकिन मैंने जल्द ही स्थिति संभालने का फैसला किया।

फोन को कान से लगाते हुए मैंने जवाब दिया, "हाँ, मैं साक्षी ही हूँ, लेकिन मैं आपको पहचान नहीं पा रही हूँ, आप कौन हैं?"

"साली नाटक मत कर वर्ना तेरे घर आकर इतना चोदूँगा कि नानी याद आ जाएगी"


मैं तो इतना सुन के पानी पानी हो गई। फिर भी हिम्मत कर बोली, "सच कह रही हूँ, आपकी आवाज चेँज है सो नहीं पहचान पा रही हूँ।" मैं उसका नाम जानने की कोशिश कर रही थी।

“हाँ रात में कुछ ज्यादा ही शराब पी लिया था तो आवाज थोड़ी भारी हो गई”।

अब मेरी तीर निशाने पर लग रही थी। मैंने थोड़ी रिक्वेस्ट करते हुए बोली, "हाँ तभी तो नहीं पहचान रही हूँ कि कौन बोल रहे हैं”।

“साली लण्ड तो अँधेरे में भी पहचान लेती है और लपक के चुसने लगती है। आवाज क्यूँ नहीं पहचान रही है” ।


मैं तो ऐसी बातें सुन के शर्म के मरी जा रही थी मगर कुछ कुछ मजे भी आने लगी थी। हल्की मुस्कान आ गई मेरे चेहरे पर।

मैं- "प्लीज बता दीजिए ना!"

"बता दूँगा मगर मेरी एक शर्त है, वो माननी पड़ेगी तुम्हें” ।


मैं-"कैसी शर्त?

"कल शाम में मैं घर आ रहा हूँ तो तुम अपने दोस्त श्रेया के साथ मेरा लण्ड लेने के लिए तैयार रहेगी।"


मेरी तो हलक सूख गई, ये साक्षी और श्रेया क्या- क्या गुल खिलाती है। मुझे तो गुस्सा भी आ रही थी और थोड़ी-थोड़ी मजे भी आ रही थी। मगर मैं नाम जानना चाहती थी ।

मैं ज्यादा रिस्क नहीं लेना चाहती थी, "मैं तो तैयार हूँ मगर श्रेया से पूछ के कहूँगी।"

"तो ठीक है उस रण्डी से जल्दी पूछ के बताना।"


"अब तो नाम बता दीजिए।"

"साली बिना पहचाने चूत मरवाने के लिए हाँ कैसे कह दी। एक नम्बर की रण्डी हो गई है।”
इस बात पर मुझे भी हँसी आ गई। क्यों नहीं आती आखिर वो सही ही तो कह रहे थे।

हँसते हुए मैंने पुनः रिक्वेस्ट की नाम बताने की। फिर उन्होंने अपना नाम राजेंद्र बताया। नाम सुनते ही मैं तो बेहोश होते होते बची… मैं तो साक्षी को मन ही मन गाली देना शुरू कर दी थी। साली पूरे गाँव में और कोई नहीं मिला अपनी चूत मरवाने के लिए। मैंने फोन काट दी, मगर फोन फिर से बजने लगी। मैं उठा नहीं रही थी। फोन लगातार आ रही थी। मैं बाहर साक्षी को देखी तो अभी भी साक्षी कहीं नहीं दिखाई दे रही थी।

कुछ देर बाद मैंने पुनः फोन रिसीव की, फोन उठाते ही राजेंद्र अंकल की तेज आवाज मेरी कानों में गूँज पड़ी- “क्यों रण्डी, फोन क्यों काट दी?”

राजेंद्र अंकल जो कि हमारे ससुर जी के चचेरे भाई हैं। उनकी उम्र करीब 42 है। वे 3 पंचवर्षीय से इस गाँव के मुखिया हैं। अब सुन रही हूँ कि वे विधायक का चुनाव लड़ेँगे। उनको मैं सिर्फ एक बार ही देखी हूँ। ऊँचा कद, गठीला बदन, लम्बी मूँछेँ, गले में सोने की मोटी चैन, हाथ की सारी उँगली में अँगूठी, जब मैं पहली बार देखी तो डर ही गई थी। उनके साथ 12वीं की साक्षी… ओफ्फ! मैं तो हैरान थी कि भला साक्षी कैसे सह पाती होगी इनको।

तभी मेरे कानों में पुनः जोर की "हैलो" गूँजी।

"हाँ अंकल सुन रही हूँ" हड़बड़ाती हुई बोली।

अंकल - "चुप क्यों हो गई?"

"वो मम्मी आ गई थी ना इसलिए"
अब मैं पूरी तरह साक्षी बन के बात करने लगी।

अंकल- "वो साली बहुत डिस्टर्ब करती है हमें। एक बार तुम हाँ कहो तो उसको भी चोद चोद के शामिल कर लें, फिर तो मजे ही मजे।"

ओह गॉड! मुझ पर तो लगातार प्रहार होती जा रही थी। मम्मी के बारे में इतनी गंदी.....। मैं संभलती हुई बोली, "प्लीज मम्मी के बारे में कुछ मत कहिए।

अंकल- "अच्छा ठीक है नहीं कहूँगा”।

"फिर उन्होंने पूछा, "अच्छा वो तेरी नई भाभी की क्या नाम है? "

मैं अपने बारे में सुन के तो सन्न रह गई। मेरे हाथ- पाँव कांप गई। फिर किसी तरह अपना नाम बताई।

"हाँ याद आया भारती, साली क्या माल लगती है। गोरी चमड़ी, रस से भरी होंठ, गोल व सख्त चुची, चूतड़ निकली हुई, काले और लम्बे बाल, ओफ्फ साली को देख के मेरा लण्ड पानी छोड़ने लगता है।"

मैं अपने बारे में ऐसी बातें सुन के पसीने छूट रहे थे। मुँह से आवाजें निकलनी बंद ही हो गई थी… बस सुनती रही।

अंकल-"साक्षी, प्लीज एक बार तुम भारती को मेरे लण्ड के नीचे ला दो। मैं तुम्हें रुपयों से तौल दूँगा। प्रमोद तो उसकी सिर्फ सील तोड़ा होगा, असली चुदाई के मजे तो उसे मेरे लण्ड से ही आएगी। जब उसकी कसी चूत में तड़ा-तड़ लण्ड पेलूँगा तो वो प्रमोद को भूल जाएगी। जन्नत की सैर करवा दूँगा। बोलो साक्षी मेरे लण्ड के इतना नहीं करोगी?"

मैं तो अब तक पसीने से भीँग गई थी। क्या बोलूँ कुछ समझ नहीं आ रही थी। कुछ देर तो मूक बनी रही, फिर जल्दी से बोली, "ठीक है, मैं कोशिश करूँगी। मम्मी आ रही है शायद मैं रखती हूँ, बाद में बात करूँगी। "सिर्फ इतनी बातें ही बोल पाई और जल्दी से फोन काट दी।

मेरी साँसे काफी तेज हो गई थी मानो दौड़ के आ रही हूँ। मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रही थी। अचानक मुझे चूत के पास कुछ गीली सी महसूस हुई। मैंने हाथ लगा कर देखी तो उफ्फ! मेरी बुर तो पूरी तरह भीँगी हुई थी।

हे भगवान! ये क्या हो गया? अंकल की बातें सुन के मैं गीली हो गई। मैं भी कितनी पागल थी जो आराम से सुन रही थी। एक बात तो थी कि अंकल की बातें अच्छी लग रही थी तभी तो सुन रही थी।

साक्षी की बातें तक तो नॉर्मल थी पर जब अपनी बातें सुनी तो पता नहीं क्या हो गया हमें। एक अलग सी नशा आ गई मुझमें। मैं मदहोश हो कर सुन रही थी और नीचे मेरी बुर फव्वारे छोड़ रही थी। इतनी मदहोश तो रात में चुदाई के वक्त भी नहीं हुई थी।

साक्षी तो जानती होगी कि अंकल मुझे चोदना चाहते हैं। जानती होगी तभी तो वो हमसे दोस्ती की वर्ना आज के जमाने में ननद-भाभी में कहीं दोस्ती होती है। अगर होती भी होगी तो इतनी जल्दी नहीं होती। अगर साक्षी इस बारे में कभी बात की तो क्या कहूँगी? ना.. ना.. मैं ये सब नहीं करूँगी। मेरी शादी हो चुकी है, अब तो प्रमोद को छोड़ किसी के बारे में सोच भी नहीं सकती।

मैं यही सब सोच रही थी कि दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई। सामने साक्षी आ रही थी। मैं तो एकटक देखती ही रह गई। कितनी मासूम लग रही है दिखने में, मगर काम तो ऐसा करती है जिसमें बड़ी बड़ी को मात दे दे। मैं साक्षी को ऊपर से नीचे गौर से देखने लगी। मैं तो कल्पना भी नहीं कर पा रही थी कि इतनी प्यारी और छोटी लड़की भला एक 45 साल के मर्द को अपने ऊपर चढ़ा सकती है।

साक्षी- "क्या हुआ भारती डॉर्लिँग, किस सोच में डूबी हुई हैं। डरिए मत, मैं अपनी मेहनताना लिए बिना छोड़ूँगी नहीं" कहते हुए खिलखिला कर हँस पड़ी।

मैं भी हल्की मुस्कान के साथ उसका साथ दी।

"नाश्ता बना कर आती हूँ, फिर लूँगी।" साक्षी अपना उठाके जाने के लिए मुड़ी।

"साक्षी, तुम्हारा फोन…” इतनी बातें सुनते ही साक्षी के चेहरे की रंग मानो उड़ सी गई हो। वो जल्दी से आई और फोन मेरे हाथ से ले ली। फिर मेरी तरफ ऐसे देखने लगी मानो पूछ रही हो कि किसका फोन आया था।

मैं मुस्कुराती हुई बोली, " तुम्हारी किसी सहेली का फोन था शायद। मैं बात करना नहीं चाहती थी, तुम्हें आवाज भी दी पर तब तक तुम बाहर निकल चुकी थी। कई बार रिंग हुई तो मैं बात कर ली।"

साक्षी मेरी बात को सुनते हुए कॉल लॉग चेक करने लगी। नम्बर देखते ही वो पसीने से लथपथ सी हो गई। फिर मेरी तरफ देखने लगी। उसकी आँखे गुस्से से लाल पीली हो रही थी, मगर बोली कुछ नहीं।

मैं सीधे टॉपिक पर आते हुए बोली, "कल शाम को श्रेया और तुमसे मिलना चाहते हैं”। इतना सुनते ही वो पैर पटकती हुई निकल गई। मुझे तो उसकी हालत देख कर हँसी भी आ रही थी। तुरंत में मेरे सर पे बैठने वाली लड़की पल भर में बिल्ली बन गई।

वैसे मेरा इरादा उसके दिल पे ठोस पहुँचाने वाली नहीं थी। मैं तो उससे एक दोस्त की तरह सारी बातें जानना चाहती थी, फिर समझाना चाहती थी।

मैं पीछे से आवाज दी, "साक्षी, मेरी बात तो सुनो”, मगर वो तो अपने रूम की तरफ चलती चली गई और अंदर जा कर लॉक कर ली। अब मैं क्या करूँ? बेचारी नाराज हो गई हमसे… बेकार ही फोन रिसीव की थी। कम से कम नाश्ता तो करवा देती। खैर; मैं बात को ज्यादा बढ़ाना ठीक नहीं समझी।

फिर रात का खाना प्रमोद के साथ खा कर सोने चली गई। साक्षी सर दर्द का बहाना बना कर खाने से मना कर दी। रात में प्रमोद ने दो बार जम के चोदा, फिर सो गए… दर्द तो ज्यादा नहीं हुई पर थक ज्यादा गई तो सोते ही नींद आ गयी।

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