- 102
- 286
- 79
"आइए-2,सहाय साहब....बैठिए!",केसवानी ने अपनी कुर्सी से उठ के सुरेन सहाय
का स्वागत किया.
"नमस्ते केसवानी जी!क्या हाल है?",दोनो ने हाथ मिलाया & फिर सुरेन जी
उसके डेस्क के सामने रखी 1 कुर्सी पे बैठ गये.उनके साथ 1 और शख्स आया था
जोकि हाथ मे 1 लेदर बॅग पकड़े उनके पीछे ही खड़ा रहा.
"बस आपकी दुआ है."
"ये लीजिए..आपकी पेमेंट.",सहाय जी ने हाथ पीछे किया तो उस शख्स ने बॅग मे
से 1 स्चेक बुक & 1 नोटो की गद्दी निकाल के उन्हे थमा दी,"....70%स्चेक &
बाकी कॅश.",सहाय जी ने स्चेक काट के कॅश के साथ केसवानी को थमा दिया.
"अरे....सहाय साहब आपने इसके लिए इतनी तकलीफ़ क्यू की?अपने किसी आदमी को
ही भेज दिया होता...",केसवानी ने नोटो & स्चेक को अपने डेस्क की दराज़ के
हवाले किया.
"आप तो जानते ही हैं,केसवानी जी की शाम लाल जी ने जबसे हमारा मॅनेजर का
काम छ्चोड़ा है,हमे ही सब देखना पड़ रहा है."
"जी,वो तो है.अब शाम लाल जी जैसा दूसरा आदमी मिलना भी तो मुश्किल है."
"बिल्कुल सही फरमाया आपने..",1 नौकर शरबत के ग्लास रख गया तो सहाय जी ने
उसे उठा कर 1 घूँट भरा,"..लेकिन वो भी क्या करते....पता है केसवानी साहब
वो हमारे साथ तब से थे जब मैं कॉलेज मे पढ़ाई करता था.बिज़्नेस के सारे
काम..ये पेमेंट्स लेना या देना सब वही संभालते थे..मुझे तो कभी लगा ही
नही था की वो हमे छ्चोड़ के जाएँगे मगर वो भी क्या करते?बेटा वाहा
बॅंगलुर मे बस गया अब चाहता था की मा-बाप उसी के साथ रहें..ऐसे मे कौन
इंसान नौकरी के चक्कर मे पड़ा रहेगा.",उन्होने 1 और घूँट भरा,"..बड़े
किस्मत वाले हैं शाम लाल जी..जवान बेटे ने उनकी ज़िम्मेदारी अब अपने कंधे
ले ली है.",उनके चेहरे पे जैसे 1 परच्छाई सी आके गुज़र गयी.
"अच्छा..अब इजाज़त दीजिए,केस्वनी जी.",सहाय जी उठ खड़े हुए & अपने उस
आदमी के साथ वाहा से निकल गये.
"सारा काम निपट गया,शिवा.",अपनी मर्सिडीस की पिच्छली सीट पे बैठ के
उन्होने ड्राइवर को चलने का इशारा किया.
"हां,सर."
"तो तुम जाके अपने भाई & उसके परिवार से मिल आओ..",उन्होने अपनी घड़ी को
देखा,"..अभी 4 बज रहे हैं..9 बजे तक आ जाना,फिर हम घर के लिए निकल
जाएँगे.",कार पंचमहल की सड़को पे दौड़ रही थी.
"ठीक है,सर.",शिवा सहाय जी का बॉडीगार्ड था.ऐसा नही था कि सहाय जी को कोई
जान का ख़तरा था मगर वो 1 पक्के बिज़्नेसमॅन जानते थे कि 1 व्यापारी को
रुपये पैसो के मामले मे एहतियात बरतनी ही चाहिए.
शिवा कोई 10 साल पहले उनके पास काम के लिए आया था लेकिन शिवा के बारे मे
जानने से पहले हम थोड़ा सहाय जी के बारे मे जान लेते हैं.सुरेन सहाय
रायबहादुर मथुरा सहाय के पोते & कैलाश सहाय के बेटे थे.सहाय ख़ानदान का
अगर कोई सबसे बड़ा गुण था तो वो था समय के साथ चलना & वक़्त की ज़रूरतो
के मुताबिक खुद को ढाल लेना.
मथुरा सहाय को अंग्रेज़ो ने रायबहादुर के खिताब से नवाज़ा था.पंचमहल से
आवंतिपुर जाने वाले हाइवे पे पंचमहल से कोई 50 किमी की दूरी पे 1 कस्बा
पड़ता है हलदन.इस कस्बे के आते ही अगर आप हाइवे से बाई तरफ निकल रही सड़क
पे चले जाएँ तो सहाय एस्टेट मे दाखिल हो जाएँगे.
मथुरा जी के पास थोड़ी सी ज़मीन थी जिसे उन्होने अंग्रेज़ो को खुश करके
बहुत बढ़ा लिया था.उनके बाद जब कैलाश जी ने उनकी जगह ली तो उन्होने नये-2
आज़ाद हुए मुल्क की सरकार को खुश करके सहाय एस्टेट की नीव रखी.इस वक़्त
कयि एकर्स मे फैली इस संपत्ति के बस दो वारिस थे सुरेन जी & उनका छ्होटा
भाई वीरेन सहाय जिसे कभी भी खानदानी बिज़्नेस मे कोई दिलचस्पी नही रही तो
1 तरह से अभी इस पूरी मिल्कियत के अकेले मालिक सुरेन जी ही थे.
सुरेन जी ने भी अपने पूर्वाजो के नक्शे कदम पे चलते हुए बिज़्नेस को नयी
बुलंदियो तक पहुँचाया.एस्टेट की ज़मीनो पे गेहू & हरी सब्ज़ियो के
खेत,पोल्ट्री फार्म,डेरी & 1 घोड़ो का स्टड फार्म था.पूरे पंचमहल &
आवंतिपुर के बाज़ारो मे सब्ज़ी,गेहू & पोल्ट्री प्रॉडक्ट्स-अंडे & मीट के
सबसे बड़े सुप्पलायर्स थे सहाय जी.अब तो उन्होने 1 आटा मिल भी खोल ली थी
& अपने गेहू को पिसवा कर उसकी पॅकिंग कर बाज़ारो मे बेच रहे थे.
यू तो हमारे मुल्क मे जुआ 1 जुर्म है मगर 1 जुआ है जोकि लगभग हर बड़े शहर
मे खेल जाता है & उसे क़ानून की मंज़ूरी भी मिली हुई है,वो है घुड़
दौड़.इन दौड़ो मे रईसो के घोड़े दौड़ते हैं.अब कुच्छ तो खुद इन घोड़ो को
पालते हैं मगर ये घोड़े आते कहा से हैं-स्टड फार्म्स से.सहाय फार्म्स
मुल्क के नामी गिरामी लोगो को घोड़े मुहैय्या कराता था.
सुरेन जी को बिज़्नेस मे बहुत मन लगता था & उसे वो हरदम आगे बढाने के
नयी-2 तरकीबे सोचते रहते थे.इसी वजह से उनका धंधा बड़ी तेज़ी से फल-फूल
रहा था.उनके बरसो पुराने मॅनेजर शाम लाल के जाने से उन्हे इधर 1 महीने से
थोड़ी परेशानी उतनी पड़ रही थी & इसे दूर करने के लिए वो 1 नये मॅनेजर की
तलाश मे जुटे हुए थे.
अब शिवा के बारे मे भी जान लेते हैं.सुरेन जी को खुद के अलावा बस 3 और
लोगो पे भरोसा था-1 तो शाम लाल जी,दूसरी उनकी बीवी & तीसरा शिवा.कोई 10
साल पहले की बात है जब शिवा उनके पास आया.सुरेन जी की एस्टेट कोई 3-4
बड़े गाओं के बराबर थी.इतनी बड़ी प्रॉपर्टी की केवक़ल देखभाल ही नही
हिफ़ाज़त भी ज़रूरी थी.देखभाल के लिए तो दुनिया भर के लोग थे मगर
हिफ़ाज़त के लिए सुरेन जी को 1 बहुत ही भरोसेमंद & ज़िम्मेदार आदमी की
तलाश थी.
अभी तक तो वो बस कुच्छ चौकीदारो के भरोसे ही थे.पूरी एस्टेट के चारो तरफ
बाँस & लकड़ी की बल्लियो की 1 5 1/2 फिट ऊँची बाड थी मगर ये बस एस्टेट की
सीमा बताने का काम करती थी,चोरो को रोकने का नही.इधर चोरिया कुच्छ
ज़्यादा बढ़ गयी थी,कभी कोई बकरी उठा ले जाता तो कभी सब्ज़िया उखाड़
लेता.सुरेन जी जानते थे की यही छ्होटी-मोटी चोरिया आगे जाके किसी बड़े
नुकसान का भी सबब बन सकती हैं.24 घंटे एस्टेट की निगरानी करना पोलीस के
बस का भी नही था,इसके लिए तो उन्हे खुद ही कुच्छ करना था.
शिवा जब उनके पास आया वो 30 बरस का था & उसने फौज मे 5 साल बिताए थे.उसका
इंटरव्यू लेते हुए सुरेन जी ने उस से एस्टेट की सेक्यूरिटी की बाबत ही
सारे सवाल पुच्छे & उसके जवाबो ने उन्हे काफ़ी प्रभावित किया.उनकी
तजुर्बेदार आँखो ने उसपे दाँव लगाने की ठान ली & उसे एस्टेट सेक्यूरिटी
इंचार्ज बना दिया.शिवा ने भी उन्हे निराश नही किया & 2 महीनो के अंदर ही
उसने 50 गार्ड्स की टीम तैय्यार कर ली & अपने फौज के तजुर्बे का इस्तेमाल
करके एस्टेट की पूरी सेक्यूरिटी का पक्का बंदोबस्त कर दिया.
शिवा 1 6'4" का सलीके से कटे बालो & पतली मूच्छो वाला तगड़ा मर्द था.उसकी
सबसे बड़ी ख़ासियत थी की वो अपने काम से काम रखता था & बहुत कम बोलता
था.सुरेन जी तो उसकी वफ़ादारी के कायल थे & 3 साल बीतते-2 उन्होने उसे
एस्टेट के 1 घर से उठा के अपने बंगले मे रख लिया.उस बंगले मे जहा की
सिर्फ़ वो अपनी बीवी & बेटे के साथ रहते थे.जब भी वो कही जाते शिवा साए
की तरह उनके साथ होता.साल मे बस 2 बार-होली & दीवाली,पे 2 दीनो के लिए वो
पंचमहल मे रह रहे अपने बड़े भाई के पास जाता लेकिन इस बार शाम लाल जी की
वजह से उसे 1 और मौका मिल गया था उनसे मिलने का.
रास्ते मे शिवा कार से उतर गया & कार सहाय साहब के शहर के बंगले की ओर
बढ़ी चली.शिवा ने 1 टॅक्सी पकड़ी & अपने भाई के घर की ओर चला गया.ठीक उसी
वक़्त 1 मारुति स्विफ्ट उनकी कार के पीछे लग गयी.मर्सिडीस उनके बंगले मे
दाखिल हो गयी तो वो स्विफ्ट कुच्छ दूरी पे रुक गयी & उसे चलाने वाला
ड्राइवर अपनी नज़र बंगल के गेट पे गड़ाए बैठा रहा.
थोड़ी अर बाद 1 टॅक्सी गेट पे रुकी & उसमे से 1 जवान लड़की उतरी & गेट पे
खड़े गार्ड से कुच्छ कहा.उसे देखते ही उस आदमी ने स्विफ्ट आगे बधाई &
बंगल के सामने से होता हुआ बंगले के बगल की गली मे घुस गया.उसने कार
बंगले की दीवार से लगाई & फुर्ती के साथ बाहर उतरा.उसने अपने चेहरे पे 1
काला नक़ाब पहना हुआ था जिसमे से बस उसकी आँखे नज़र आ रही थी.उसने आस-पास
देखा,गली हमेशा की तरह सुनसान थी.उसने 1 महीने पहले से रोज़ यहा का
जायज़ा लिया था & पूरी प्लॅनिंग करने के बाद ही यहा आया था.
उसने पैरो मे रब्बर सोल वाले जूते पहने थे & हाथो मे दस्ताने.वो कार की
छत पे चढ़ गया & फिर वाहा से बंगले की दीवार पे & अगले ही पल वो बंगले की
लॉन की घास पे था.थोड़ी ही देर मे वो बंगले मे दाखिल हो चुका था.
"हां?",बंगले के बेडरूम मे आके सुरेन जी ने अपने कपड़े उतारना शुरू किया
ही था की तभी इंटरकम बजा,"..हां,मैने ही बुलाया था उसे उपर मेरे कमरे मे
भिजवा दो.",सहाय साहब की उम्र 50 बरस की थी & उनका कद था 5'10",उम्र के
साथ उनकी तोंद थोड़ी निकल आई थी,सामने से उड़ चुके सफेद बालो को उन्होने
खीज़ाब से ढँक लिया.आमतौर पे इस उम्र मे इंसान थोड़ा सयम से जीने की
कोशिश करता है मगर सुरेन जी के साथ ऐसा नही था.उन्हे जवानी मे जो
शराब,शबाब & कबाब का शौक लगा था वो अभी तक वैसे ही बरकरार था.इस शौक ने
उनकी सेहत को नुकसान भी पहुँचाया था,उनका दिल अब पहले जैसा मज़बूत नही
रहा था.
का स्वागत किया.
"नमस्ते केसवानी जी!क्या हाल है?",दोनो ने हाथ मिलाया & फिर सुरेन जी
उसके डेस्क के सामने रखी 1 कुर्सी पे बैठ गये.उनके साथ 1 और शख्स आया था
जोकि हाथ मे 1 लेदर बॅग पकड़े उनके पीछे ही खड़ा रहा.
"बस आपकी दुआ है."
"ये लीजिए..आपकी पेमेंट.",सहाय जी ने हाथ पीछे किया तो उस शख्स ने बॅग मे
से 1 स्चेक बुक & 1 नोटो की गद्दी निकाल के उन्हे थमा दी,"....70%स्चेक &
बाकी कॅश.",सहाय जी ने स्चेक काट के कॅश के साथ केसवानी को थमा दिया.
"अरे....सहाय साहब आपने इसके लिए इतनी तकलीफ़ क्यू की?अपने किसी आदमी को
ही भेज दिया होता...",केसवानी ने नोटो & स्चेक को अपने डेस्क की दराज़ के
हवाले किया.
"आप तो जानते ही हैं,केसवानी जी की शाम लाल जी ने जबसे हमारा मॅनेजर का
काम छ्चोड़ा है,हमे ही सब देखना पड़ रहा है."
"जी,वो तो है.अब शाम लाल जी जैसा दूसरा आदमी मिलना भी तो मुश्किल है."
"बिल्कुल सही फरमाया आपने..",1 नौकर शरबत के ग्लास रख गया तो सहाय जी ने
उसे उठा कर 1 घूँट भरा,"..लेकिन वो भी क्या करते....पता है केसवानी साहब
वो हमारे साथ तब से थे जब मैं कॉलेज मे पढ़ाई करता था.बिज़्नेस के सारे
काम..ये पेमेंट्स लेना या देना सब वही संभालते थे..मुझे तो कभी लगा ही
नही था की वो हमे छ्चोड़ के जाएँगे मगर वो भी क्या करते?बेटा वाहा
बॅंगलुर मे बस गया अब चाहता था की मा-बाप उसी के साथ रहें..ऐसे मे कौन
इंसान नौकरी के चक्कर मे पड़ा रहेगा.",उन्होने 1 और घूँट भरा,"..बड़े
किस्मत वाले हैं शाम लाल जी..जवान बेटे ने उनकी ज़िम्मेदारी अब अपने कंधे
ले ली है.",उनके चेहरे पे जैसे 1 परच्छाई सी आके गुज़र गयी.
"अच्छा..अब इजाज़त दीजिए,केस्वनी जी.",सहाय जी उठ खड़े हुए & अपने उस
आदमी के साथ वाहा से निकल गये.
"सारा काम निपट गया,शिवा.",अपनी मर्सिडीस की पिच्छली सीट पे बैठ के
उन्होने ड्राइवर को चलने का इशारा किया.
"हां,सर."
"तो तुम जाके अपने भाई & उसके परिवार से मिल आओ..",उन्होने अपनी घड़ी को
देखा,"..अभी 4 बज रहे हैं..9 बजे तक आ जाना,फिर हम घर के लिए निकल
जाएँगे.",कार पंचमहल की सड़को पे दौड़ रही थी.
"ठीक है,सर.",शिवा सहाय जी का बॉडीगार्ड था.ऐसा नही था कि सहाय जी को कोई
जान का ख़तरा था मगर वो 1 पक्के बिज़्नेसमॅन जानते थे कि 1 व्यापारी को
रुपये पैसो के मामले मे एहतियात बरतनी ही चाहिए.
शिवा कोई 10 साल पहले उनके पास काम के लिए आया था लेकिन शिवा के बारे मे
जानने से पहले हम थोड़ा सहाय जी के बारे मे जान लेते हैं.सुरेन सहाय
रायबहादुर मथुरा सहाय के पोते & कैलाश सहाय के बेटे थे.सहाय ख़ानदान का
अगर कोई सबसे बड़ा गुण था तो वो था समय के साथ चलना & वक़्त की ज़रूरतो
के मुताबिक खुद को ढाल लेना.
मथुरा सहाय को अंग्रेज़ो ने रायबहादुर के खिताब से नवाज़ा था.पंचमहल से
आवंतिपुर जाने वाले हाइवे पे पंचमहल से कोई 50 किमी की दूरी पे 1 कस्बा
पड़ता है हलदन.इस कस्बे के आते ही अगर आप हाइवे से बाई तरफ निकल रही सड़क
पे चले जाएँ तो सहाय एस्टेट मे दाखिल हो जाएँगे.
मथुरा जी के पास थोड़ी सी ज़मीन थी जिसे उन्होने अंग्रेज़ो को खुश करके
बहुत बढ़ा लिया था.उनके बाद जब कैलाश जी ने उनकी जगह ली तो उन्होने नये-2
आज़ाद हुए मुल्क की सरकार को खुश करके सहाय एस्टेट की नीव रखी.इस वक़्त
कयि एकर्स मे फैली इस संपत्ति के बस दो वारिस थे सुरेन जी & उनका छ्होटा
भाई वीरेन सहाय जिसे कभी भी खानदानी बिज़्नेस मे कोई दिलचस्पी नही रही तो
1 तरह से अभी इस पूरी मिल्कियत के अकेले मालिक सुरेन जी ही थे.
सुरेन जी ने भी अपने पूर्वाजो के नक्शे कदम पे चलते हुए बिज़्नेस को नयी
बुलंदियो तक पहुँचाया.एस्टेट की ज़मीनो पे गेहू & हरी सब्ज़ियो के
खेत,पोल्ट्री फार्म,डेरी & 1 घोड़ो का स्टड फार्म था.पूरे पंचमहल &
आवंतिपुर के बाज़ारो मे सब्ज़ी,गेहू & पोल्ट्री प्रॉडक्ट्स-अंडे & मीट के
सबसे बड़े सुप्पलायर्स थे सहाय जी.अब तो उन्होने 1 आटा मिल भी खोल ली थी
& अपने गेहू को पिसवा कर उसकी पॅकिंग कर बाज़ारो मे बेच रहे थे.
यू तो हमारे मुल्क मे जुआ 1 जुर्म है मगर 1 जुआ है जोकि लगभग हर बड़े शहर
मे खेल जाता है & उसे क़ानून की मंज़ूरी भी मिली हुई है,वो है घुड़
दौड़.इन दौड़ो मे रईसो के घोड़े दौड़ते हैं.अब कुच्छ तो खुद इन घोड़ो को
पालते हैं मगर ये घोड़े आते कहा से हैं-स्टड फार्म्स से.सहाय फार्म्स
मुल्क के नामी गिरामी लोगो को घोड़े मुहैय्या कराता था.
सुरेन जी को बिज़्नेस मे बहुत मन लगता था & उसे वो हरदम आगे बढाने के
नयी-2 तरकीबे सोचते रहते थे.इसी वजह से उनका धंधा बड़ी तेज़ी से फल-फूल
रहा था.उनके बरसो पुराने मॅनेजर शाम लाल के जाने से उन्हे इधर 1 महीने से
थोड़ी परेशानी उतनी पड़ रही थी & इसे दूर करने के लिए वो 1 नये मॅनेजर की
तलाश मे जुटे हुए थे.
अब शिवा के बारे मे भी जान लेते हैं.सुरेन जी को खुद के अलावा बस 3 और
लोगो पे भरोसा था-1 तो शाम लाल जी,दूसरी उनकी बीवी & तीसरा शिवा.कोई 10
साल पहले की बात है जब शिवा उनके पास आया.सुरेन जी की एस्टेट कोई 3-4
बड़े गाओं के बराबर थी.इतनी बड़ी प्रॉपर्टी की केवक़ल देखभाल ही नही
हिफ़ाज़त भी ज़रूरी थी.देखभाल के लिए तो दुनिया भर के लोग थे मगर
हिफ़ाज़त के लिए सुरेन जी को 1 बहुत ही भरोसेमंद & ज़िम्मेदार आदमी की
तलाश थी.
अभी तक तो वो बस कुच्छ चौकीदारो के भरोसे ही थे.पूरी एस्टेट के चारो तरफ
बाँस & लकड़ी की बल्लियो की 1 5 1/2 फिट ऊँची बाड थी मगर ये बस एस्टेट की
सीमा बताने का काम करती थी,चोरो को रोकने का नही.इधर चोरिया कुच्छ
ज़्यादा बढ़ गयी थी,कभी कोई बकरी उठा ले जाता तो कभी सब्ज़िया उखाड़
लेता.सुरेन जी जानते थे की यही छ्होटी-मोटी चोरिया आगे जाके किसी बड़े
नुकसान का भी सबब बन सकती हैं.24 घंटे एस्टेट की निगरानी करना पोलीस के
बस का भी नही था,इसके लिए तो उन्हे खुद ही कुच्छ करना था.
शिवा जब उनके पास आया वो 30 बरस का था & उसने फौज मे 5 साल बिताए थे.उसका
इंटरव्यू लेते हुए सुरेन जी ने उस से एस्टेट की सेक्यूरिटी की बाबत ही
सारे सवाल पुच्छे & उसके जवाबो ने उन्हे काफ़ी प्रभावित किया.उनकी
तजुर्बेदार आँखो ने उसपे दाँव लगाने की ठान ली & उसे एस्टेट सेक्यूरिटी
इंचार्ज बना दिया.शिवा ने भी उन्हे निराश नही किया & 2 महीनो के अंदर ही
उसने 50 गार्ड्स की टीम तैय्यार कर ली & अपने फौज के तजुर्बे का इस्तेमाल
करके एस्टेट की पूरी सेक्यूरिटी का पक्का बंदोबस्त कर दिया.
शिवा 1 6'4" का सलीके से कटे बालो & पतली मूच्छो वाला तगड़ा मर्द था.उसकी
सबसे बड़ी ख़ासियत थी की वो अपने काम से काम रखता था & बहुत कम बोलता
था.सुरेन जी तो उसकी वफ़ादारी के कायल थे & 3 साल बीतते-2 उन्होने उसे
एस्टेट के 1 घर से उठा के अपने बंगले मे रख लिया.उस बंगले मे जहा की
सिर्फ़ वो अपनी बीवी & बेटे के साथ रहते थे.जब भी वो कही जाते शिवा साए
की तरह उनके साथ होता.साल मे बस 2 बार-होली & दीवाली,पे 2 दीनो के लिए वो
पंचमहल मे रह रहे अपने बड़े भाई के पास जाता लेकिन इस बार शाम लाल जी की
वजह से उसे 1 और मौका मिल गया था उनसे मिलने का.
रास्ते मे शिवा कार से उतर गया & कार सहाय साहब के शहर के बंगले की ओर
बढ़ी चली.शिवा ने 1 टॅक्सी पकड़ी & अपने भाई के घर की ओर चला गया.ठीक उसी
वक़्त 1 मारुति स्विफ्ट उनकी कार के पीछे लग गयी.मर्सिडीस उनके बंगले मे
दाखिल हो गयी तो वो स्विफ्ट कुच्छ दूरी पे रुक गयी & उसे चलाने वाला
ड्राइवर अपनी नज़र बंगल के गेट पे गड़ाए बैठा रहा.
थोड़ी अर बाद 1 टॅक्सी गेट पे रुकी & उसमे से 1 जवान लड़की उतरी & गेट पे
खड़े गार्ड से कुच्छ कहा.उसे देखते ही उस आदमी ने स्विफ्ट आगे बधाई &
बंगल के सामने से होता हुआ बंगले के बगल की गली मे घुस गया.उसने कार
बंगले की दीवार से लगाई & फुर्ती के साथ बाहर उतरा.उसने अपने चेहरे पे 1
काला नक़ाब पहना हुआ था जिसमे से बस उसकी आँखे नज़र आ रही थी.उसने आस-पास
देखा,गली हमेशा की तरह सुनसान थी.उसने 1 महीने पहले से रोज़ यहा का
जायज़ा लिया था & पूरी प्लॅनिंग करने के बाद ही यहा आया था.
उसने पैरो मे रब्बर सोल वाले जूते पहने थे & हाथो मे दस्ताने.वो कार की
छत पे चढ़ गया & फिर वाहा से बंगले की दीवार पे & अगले ही पल वो बंगले की
लॉन की घास पे था.थोड़ी ही देर मे वो बंगले मे दाखिल हो चुका था.
"हां?",बंगले के बेडरूम मे आके सुरेन जी ने अपने कपड़े उतारना शुरू किया
ही था की तभी इंटरकम बजा,"..हां,मैने ही बुलाया था उसे उपर मेरे कमरे मे
भिजवा दो.",सहाय साहब की उम्र 50 बरस की थी & उनका कद था 5'10",उम्र के
साथ उनकी तोंद थोड़ी निकल आई थी,सामने से उड़ चुके सफेद बालो को उन्होने
खीज़ाब से ढँक लिया.आमतौर पे इस उम्र मे इंसान थोड़ा सयम से जीने की
कोशिश करता है मगर सुरेन जी के साथ ऐसा नही था.उन्हे जवानी मे जो
शराब,शबाब & कबाब का शौक लगा था वो अभी तक वैसे ही बरकरार था.इस शौक ने
उनकी सेहत को नुकसान भी पहुँचाया था,उनका दिल अब पहले जैसा मज़बूत नही
रहा था.
Last edited:
