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सूरज अपनी माँ मीनाक्षी को लेकर बस स्टेशन से आ गया था। उसने बस कुछ दिन पहले ही यह छोटा सा घर किराए पर लिया था, शहर के एक शांत एरिया में जहाँ ज़्यादा लोग नहीं रहते थे।
बस स्टेशन से ऑटो का सफर तय करते हुए जब वे दोनों इस सुनसान और शांत इलाके में पहुँचे, तो दोपहर की तीखी धूप ढल चुकी थी। हवा में एक अजीब सा ठहराव था, जैसा अक्सर शहर के बाहरी कोनों में होता है। सूरज ने एक हाथ में माँ का भारी सूटकेस उठा रखा था और दूसरे हाथ से उसने लोहे का छोटा सा गेट खोला।
यह घर वाकई बहुत छोटा था—एक हॉल, एक छोटी सी रसोई और ठीक सामने दिखता हुआ इकलौता बेडरूम। लेकिन घर के चारों तरफ काफी खुली जगह थी, जहाँ बड़े-बड़े पेड़ थे, जिनकी छाया सीधे आँगन पर पड़ रही थी। यहाँ आस-पास दूर-दूर तक कोई दूसरा मकान नहीं था, जिससे इस जगह की प्राइवेसी और एकांत और भी बढ़ जाता था।
सूरज ने सूटकेस को हॉल के बीचों-बीच फर्श पर टिकाया और पीछे मुड़कर लकड़ी के मुख्य दरवाजे को बंद कर दिया। कुंडे के लगने की आवाज उस शांत घर में बहुत साफ गूँजी। दरवाजे की पीठ से टिककर सूरज ने एक गहरी सांस ली और सामने खड़ी अपनी माँ को देखने लगा।
मीनाक्षी ने अपने पल्लू को उंगलियों में दबा रखा था। 45 साल की उम्र में भी उनकी सादगी में एक गजब का आकर्षण था। वह नए घर की दीवारों और खालीपन को देख रही थीं, मानो अपने आने वाले कल का अंदाजा लगा रही हों।
सूरज धीरे-धीरे कदम बढ़ाता हुआ उनके बिल्कुल करीब आकर खड़ा हो गया। उसने आगे बढ़कर मीनाक्षी के दोनों कंधों को अपने मजबूत हाथों में लिया। उसकी आँखों में एक अजीब सा जनून और सालों का इंतजार साफ चमक रहा था।
"माँ..." सूरज की आवाज में एक भारीपन था, जो बरसों की कशमकश के बाद बाहर निकला था। "आखिरकार, हम यहाँ पहुँच ही गए। आप जानती हैं कि इस एक दिन के लिए मैंने कितनी रातें जागकर काटी हैं? उस पुराने घर में, उस भीड़भाड़ और दुनिया के तानों के बीच मुझे हर पल ऐसा लगता था जैसे कोई मुझे आपसे दूर कर रहा है।"
उसने मीनाक्षी के चेहरे की तरफ झुकते हुए, उनके पल्लू को थोड़ा सा पीछे सरकाया और सीधे उनकी आँखों में झांकते हुए बड़े हक से कहा:
"लेकिन अब और नहीं। जैसा कि आपने मुझसे बस स्टेशन पर आने से पहले वादा किया था—अब हम दोनों इस छत के नीचे बिल्कुल अकेले हैं। इस नए शहर में न हमें कोई जानता है, न कोई टोकने वाला है। अब आप मेरी हो, माँ... सिर्फ मेरी। आज के बाद आपका कोई बहाना, कोई नाटक या समाज का डर हमारे बीच नहीं आएगा। मैंने अपनी जिंदगी का हर फैसला सिर्फ आपके लिए छोड़ दिया है, और अब मैं आपको खुद से दूर जाने की इजाजत कभी नहीं दूँगा।"
सूरज के मुँह से इतने लंबे, गंभीर और जज्बाती शब्दों को सुनकर मीनाक्षी का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। अपने ही जवान बेटे की आँखों में अपने लिए ऐसा अटूट हक देखकर उनका पूरा बदन सिहर उठा। उनके गोरे गालों पर शर्म और संकोच की एक गहरी सुर्खी दौड़ गई। उन्होंने अपनी पलकें झुका लीं और चाहकर भी अपनी जुबान से एक शब्द नहीं निकाल पाईं। उनकी यह खामोशी और झुकी हुई नजरें इस बात का सबूत थीं कि वह सूरज के इस हक के आगे पूरी तरह समर्पण कर चुकी थीं।
मीनाक्षी को उसी हाल में छोड़कर, सूरज ने उनके माथे को धीरे से चूमा और मुस्कुराते हुए कहा, "मैं कुछ जरूरी काम से बाहर जा रहा हूँ माँ, शाम तक लौट आऊँगा। आप तब तक आराम करिए। अब यह आपका ही घर है।" इतना कहकर वह अपने काम के लिए बाहर निकल गया।
शाम ढले जब सूरज घर लौटा, तो वह अकेला नहीं था। उसके साथ उसका एक दोस्त भी था। सूरज ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ मीनाक्षी को अपने दोस्त से मिलवाया, लेकिन जो शब्द उसके मुँह से निकले, उन्होंने मीनाक्षी के पैरों तले से ज़मीन खिसका दी।
सूरज ने बड़ी सहजता और गर्व से अपने दोस्त की तरफ देखा और कहा, "मिलो, ये मेरी पत्नी हैं, मीनाक्षी।"
मीनाक्षी का चेहरा शर्म और हैरानी से पूरी तरह लाल हो गया। वह कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन उस अजनबी के सामने अपनी जुबान नहीं खोल पाईं। इससे पहले कि वह खुद को संभालतीं, सूरज ने उन पर अपना पूरा हक जताते हुए रोबीले लहजे में कहा, "सुनो, हमारे लिए जरा गरमा-गरम चाय तो बना लाओ।"
मीनाक्षी अंदर ही अंदर छटपटा कर रह गईं, लेकिन बिना कोई तमाशा किए वह चुपचाप रसोई की तरफ बढ़ गईं। करीब आधे घंटे तक बाहर हॉल में दोनों लड़के बातें करते रहे और मीनाक्षी रसोई की ओट से सब सुनती रहीं। जब वह लड़का विदा लेकर घर से चला गया, तो सूरज ने जैसे ही मुख्य दरवाजा बंद किया, मीनाक्षी तेज कदमों से उसकी तरफ बढ़ीं।
उनका पूरा बदन गुस्से, लाज और लाड़ से कांप रहा था। उन्होंने आगे बढ़कर सूरज के मजबूत सीने पर अपने दोनों हाथों से ज़ोर से मारा, "यह क्या बदतमीजी थी सूरज? अपने दोस्त के सामने मुझे अपनी पत्नी बता दिया? तुम्हें जरा भी डर नहीं है?"
सूरज सिर्फ मुस्कुराता रहा। मीनाक्षी का यह नकली गुस्सा और उनकी यह नाराज़गी देखकर उसने एक कदम आगे बढ़ाया। मीनाक्षी ने दोबारा उसे मारने के लिए हाथ उठाया, लेकिन इस बार सूरज ने उनके दोनों हाथों को पकड़ लिया और उन्हें खींचकर सीधे अपनी बांहों के घेरे में समेट लिया।
सूरज की मजबूत छाती से लगते ही मीनाक्षी का सारा गुस्सा जैसे पानी हो गया। वह उसकी बांहों में पूरी तरह समा गईं और उनके चेहरे पर एक प्यारी सी नाराज़गी छा गई। वह अपना चेहरा उसके सीने में छुपाकर धीरे से फुसफुसाईं, "तुम बहुत बिगड़ गए हो सूरज... अब तुम मेरी एक नहीं सुनते।"
सूरज की बांहों के उस गहरे सुकून से खुद को धीरे से अलग करते हुए मीनाक्षी ने अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक किया। उनके चेहरे पर अभी भी उस बातचीत की सुर्खी और हल्की सी झिझक बाकी थी। उन्होंने दीवार घड़ी की तरफ देखा, जिसमें रात के आठ बजने वाले थे।
"बहुत बातें हो गईं तुम्हारी," मीनाक्षी ने अपनी आवाज़ में वापस वही माँ वाली संजीदगी लाते हुए कहा। "अब हटो सामने से। दोपहर से भूखे होगे, मैं रसोई में जाकर रात के खाने की तैयारी करती हूँ। नए घर में सामान भी ठीक से नहीं रखा है, पता नहीं क्या-क्या मिलेगा।"
सूरज मुस्कुराते हुए पीछे हटा और बोला, "मैंने राशन का सारा ज़रूरी सामान कल ही लाकर रख दिया था, माँ। आप बस बनाओ, मुझे आपके हाथ के खाने की बहुत याद आ रही थी।"
मीनाक्षी रसोई में चली गईं। घर छोटा था, इसलिए हॉल में बैठे सूरज को बर्तनों की खनक और मसालों की खुशबू साफ आ रही थी। कुछ ही देर में मीनाक्षी ने गरमा-गरम रोटियां और आलू-टमाटर की सिंपल सी सब्जी तैयार कर ली। उन्होंने हॉल में ही ज़मीन पर एक साफ़ चटाई बिछाई और दो थालियाँ सजाकर रख दीं।
"सूरज, चलो खाना लग गया है, आ जाओ," मीनाक्षी ने रसोई से आवाज़ दी।
सूरज आकर चटाई पर बैठ गया। मीनाक्षी उसके ठीक सामने बैठीं और अपने हाथों से उसकी थाली में पहली रोटी रखी। सूरज ने पहला निवाला मुँह में डाला और उसकी आँखें बंद हो गईं।
"सच में माँ, इस स्वाद के आगे शहर के सारे बड़े होटल फीके हैं," सूरज ने तृप्ति से कहा।
मीनाक्षी उसे खाते हुए देखकर अंदर ही अंदर बहुत सुकून महसूस कर रही थीं। उन्होंने धीरे से कहा, "धीमे खाओ, कोई भागा नहीं जा रहा है। और सुनो, कल सुबह जल्दी उठना है। घर की थोड़ी साफ-सफाई और बची हुई व्यवस्था भी देखनी है।"
सूरज ने खाते-खाते मीनाक्षी की तरफ देखा। इस छोटे से घर में, इस शांत रात के सन्नाटे में, वे दोनों एक-दूसरे के बिल्कुल करीब थे। बाहर हवा पेड़ों से टकराकर एक मद्धम सी आवाज़ कर रही थी, लेकिन घर के भीतर एक अलग ही शांति और अपनापन घुल चुका था। दोनों ने बिना किसी पुरानी कड़वाहट या समाज के डर के, बेहद सादगी और शांति से अपने नए सफर के इस पहले भोजन को पूरा किया।
रात के भोजन के बाद, मीनाक्षी ने रसोई समेटी और बर्तन साफ किए। घर में सिर्फ एक ही बेडरूम था, और रात के ग्यारह बजते-बजते पूरे इलाके में एक गहरा सन्नाटा पसर चुका था। सूरज हॉल की बत्तियां बंद करके जैसे ही बेडरूम में दाखिल हुआ, उसने देखा कि मीनाक्षी बेड पर एक तरफ चादर बिछाकर लेटने की तैयारी कर रही थीं। कमरे के नाइट बल्ब की मद्धम नीली रोशनी में उनका चेहरा बेहद शांत और सुंदर लग रहा था।
"माँ, आप बेड पर सो जाइए, मैं हॉल में चटाई बिछाकर सो जाता हूँ," सूरज ने दरवाजे के पास खड़े होकर बहुत ही धीमे से कहा।
मीनाक्षी ने सिर उठाकर उसकी तरफ देखा। उनकी आँखों में अब कोई हिचकिचाहट नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा ठहराव था। उन्होंने बेड की दूसरी तरफ खाली जगह की ओर इशारा करते हुए बहुत ही सहज और शांत आवाज़ में कहा, "हॉल में बहुत ठंड है और मच्छर भी हैं सूरज। घर में सिर्फ यही एक कमरा है, और अब जब हम दोनों को साथ ही रहना है, तो इतनी झिझक कैसी? आओ, यहीं सो जाओ।"
सूरज कुछ पल के लिए अपनी जगह पर ठिठक गया, लेकिन फिर वह धीमे कदमों से आगे बढ़ा और बेड के दूसरी तरफ आकर लेट गया। दोनों के बीच सिर्फ एक-डेढ़ फीट की दूरी थी। कमरे का सन्नाटा इतना गहरा था कि दोनों को एक-दूसरे की सांसों की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी।
मीनाक्षी ने करवट बदली और उनका चेहरा सूरज की तरफ हो गया। मद्धम रोशनी में दोनों की नजरें एक-दूसरे से मिलीं। सूरज ने देखा कि माँ की आँखों में अब समाज का कोई डर नहीं था, बल्कि एक सुकून था कि वे दोनों अपनी नई और अलग दुनिया में सुरक्षित थे। बिना कुछ बोले, सूरज ने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और मीनाक्षी की हथेलियों को अपनी उंगलियों में थाम लिया। मीनाक्षी ने भी बिना किसी विरोध के उनके हाथ की पकड़ को मजबूत होने दिया और अपनी आँखें धीरे से बंद कर लीं। उस शांत रात के आगोश में, एक-दूसरे का हाथ थामे, उन्होंने अपने नए जीवन की इस पहली रात को बेहद शांति और सुकून के साथ बिताया।
सूरज अपनी माँ मीनाक्षी को लेकर बस स्टेशन से आ गया था। उसने बस कुछ दिन पहले ही यह छोटा सा घर किराए पर लिया था, शहर के एक शांत एरिया में जहाँ ज़्यादा लोग नहीं रहते थे।
बस स्टेशन से ऑटो का सफर तय करते हुए जब वे दोनों इस सुनसान और शांत इलाके में पहुँचे, तो दोपहर की तीखी धूप ढल चुकी थी। हवा में एक अजीब सा ठहराव था, जैसा अक्सर शहर के बाहरी कोनों में होता है। सूरज ने एक हाथ में माँ का भारी सूटकेस उठा रखा था और दूसरे हाथ से उसने लोहे का छोटा सा गेट खोला।
यह घर वाकई बहुत छोटा था—एक हॉल, एक छोटी सी रसोई और ठीक सामने दिखता हुआ इकलौता बेडरूम। लेकिन घर के चारों तरफ काफी खुली जगह थी, जहाँ बड़े-बड़े पेड़ थे, जिनकी छाया सीधे आँगन पर पड़ रही थी। यहाँ आस-पास दूर-दूर तक कोई दूसरा मकान नहीं था, जिससे इस जगह की प्राइवेसी और एकांत और भी बढ़ जाता था।
सूरज ने सूटकेस को हॉल के बीचों-बीच फर्श पर टिकाया और पीछे मुड़कर लकड़ी के मुख्य दरवाजे को बंद कर दिया। कुंडे के लगने की आवाज उस शांत घर में बहुत साफ गूँजी। दरवाजे की पीठ से टिककर सूरज ने एक गहरी सांस ली और सामने खड़ी अपनी माँ को देखने लगा।
मीनाक्षी ने अपने पल्लू को उंगलियों में दबा रखा था। 45 साल की उम्र में भी उनकी सादगी में एक गजब का आकर्षण था। वह नए घर की दीवारों और खालीपन को देख रही थीं, मानो अपने आने वाले कल का अंदाजा लगा रही हों।
सूरज धीरे-धीरे कदम बढ़ाता हुआ उनके बिल्कुल करीब आकर खड़ा हो गया। उसने आगे बढ़कर मीनाक्षी के दोनों कंधों को अपने मजबूत हाथों में लिया। उसकी आँखों में एक अजीब सा जनून और सालों का इंतजार साफ चमक रहा था।
"माँ..." सूरज की आवाज में एक भारीपन था, जो बरसों की कशमकश के बाद बाहर निकला था। "आखिरकार, हम यहाँ पहुँच ही गए। आप जानती हैं कि इस एक दिन के लिए मैंने कितनी रातें जागकर काटी हैं? उस पुराने घर में, उस भीड़भाड़ और दुनिया के तानों के बीच मुझे हर पल ऐसा लगता था जैसे कोई मुझे आपसे दूर कर रहा है।"
उसने मीनाक्षी के चेहरे की तरफ झुकते हुए, उनके पल्लू को थोड़ा सा पीछे सरकाया और सीधे उनकी आँखों में झांकते हुए बड़े हक से कहा:
"लेकिन अब और नहीं। जैसा कि आपने मुझसे बस स्टेशन पर आने से पहले वादा किया था—अब हम दोनों इस छत के नीचे बिल्कुल अकेले हैं। इस नए शहर में न हमें कोई जानता है, न कोई टोकने वाला है। अब आप मेरी हो, माँ... सिर्फ मेरी। आज के बाद आपका कोई बहाना, कोई नाटक या समाज का डर हमारे बीच नहीं आएगा। मैंने अपनी जिंदगी का हर फैसला सिर्फ आपके लिए छोड़ दिया है, और अब मैं आपको खुद से दूर जाने की इजाजत कभी नहीं दूँगा।"
सूरज के मुँह से इतने लंबे, गंभीर और जज्बाती शब्दों को सुनकर मीनाक्षी का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। अपने ही जवान बेटे की आँखों में अपने लिए ऐसा अटूट हक देखकर उनका पूरा बदन सिहर उठा। उनके गोरे गालों पर शर्म और संकोच की एक गहरी सुर्खी दौड़ गई। उन्होंने अपनी पलकें झुका लीं और चाहकर भी अपनी जुबान से एक शब्द नहीं निकाल पाईं। उनकी यह खामोशी और झुकी हुई नजरें इस बात का सबूत थीं कि वह सूरज के इस हक के आगे पूरी तरह समर्पण कर चुकी थीं।
मीनाक्षी को उसी हाल में छोड़कर, सूरज ने उनके माथे को धीरे से चूमा और मुस्कुराते हुए कहा, "मैं कुछ जरूरी काम से बाहर जा रहा हूँ माँ, शाम तक लौट आऊँगा। आप तब तक आराम करिए। अब यह आपका ही घर है।" इतना कहकर वह अपने काम के लिए बाहर निकल गया।
शाम ढले जब सूरज घर लौटा, तो वह अकेला नहीं था। उसके साथ उसका एक दोस्त भी था। सूरज ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ मीनाक्षी को अपने दोस्त से मिलवाया, लेकिन जो शब्द उसके मुँह से निकले, उन्होंने मीनाक्षी के पैरों तले से ज़मीन खिसका दी।
सूरज ने बड़ी सहजता और गर्व से अपने दोस्त की तरफ देखा और कहा, "मिलो, ये मेरी पत्नी हैं, मीनाक्षी।"
मीनाक्षी का चेहरा शर्म और हैरानी से पूरी तरह लाल हो गया। वह कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन उस अजनबी के सामने अपनी जुबान नहीं खोल पाईं। इससे पहले कि वह खुद को संभालतीं, सूरज ने उन पर अपना पूरा हक जताते हुए रोबीले लहजे में कहा, "सुनो, हमारे लिए जरा गरमा-गरम चाय तो बना लाओ।"
मीनाक्षी अंदर ही अंदर छटपटा कर रह गईं, लेकिन बिना कोई तमाशा किए वह चुपचाप रसोई की तरफ बढ़ गईं। करीब आधे घंटे तक बाहर हॉल में दोनों लड़के बातें करते रहे और मीनाक्षी रसोई की ओट से सब सुनती रहीं। जब वह लड़का विदा लेकर घर से चला गया, तो सूरज ने जैसे ही मुख्य दरवाजा बंद किया, मीनाक्षी तेज कदमों से उसकी तरफ बढ़ीं।
उनका पूरा बदन गुस्से, लाज और लाड़ से कांप रहा था। उन्होंने आगे बढ़कर सूरज के मजबूत सीने पर अपने दोनों हाथों से ज़ोर से मारा, "यह क्या बदतमीजी थी सूरज? अपने दोस्त के सामने मुझे अपनी पत्नी बता दिया? तुम्हें जरा भी डर नहीं है?"
सूरज सिर्फ मुस्कुराता रहा। मीनाक्षी का यह नकली गुस्सा और उनकी यह नाराज़गी देखकर उसने एक कदम आगे बढ़ाया। मीनाक्षी ने दोबारा उसे मारने के लिए हाथ उठाया, लेकिन इस बार सूरज ने उनके दोनों हाथों को पकड़ लिया और उन्हें खींचकर सीधे अपनी बांहों के घेरे में समेट लिया।
सूरज की मजबूत छाती से लगते ही मीनाक्षी का सारा गुस्सा जैसे पानी हो गया। वह उसकी बांहों में पूरी तरह समा गईं और उनके चेहरे पर एक प्यारी सी नाराज़गी छा गई। वह अपना चेहरा उसके सीने में छुपाकर धीरे से फुसफुसाईं, "तुम बहुत बिगड़ गए हो सूरज... अब तुम मेरी एक नहीं सुनते।"
सूरज की बांहों के उस गहरे सुकून से खुद को धीरे से अलग करते हुए मीनाक्षी ने अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक किया। उनके चेहरे पर अभी भी उस बातचीत की सुर्खी और हल्की सी झिझक बाकी थी। उन्होंने दीवार घड़ी की तरफ देखा, जिसमें रात के आठ बजने वाले थे।
"बहुत बातें हो गईं तुम्हारी," मीनाक्षी ने अपनी आवाज़ में वापस वही माँ वाली संजीदगी लाते हुए कहा। "अब हटो सामने से। दोपहर से भूखे होगे, मैं रसोई में जाकर रात के खाने की तैयारी करती हूँ। नए घर में सामान भी ठीक से नहीं रखा है, पता नहीं क्या-क्या मिलेगा।"
सूरज मुस्कुराते हुए पीछे हटा और बोला, "मैंने राशन का सारा ज़रूरी सामान कल ही लाकर रख दिया था, माँ। आप बस बनाओ, मुझे आपके हाथ के खाने की बहुत याद आ रही थी।"
मीनाक्षी रसोई में चली गईं। घर छोटा था, इसलिए हॉल में बैठे सूरज को बर्तनों की खनक और मसालों की खुशबू साफ आ रही थी। कुछ ही देर में मीनाक्षी ने गरमा-गरम रोटियां और आलू-टमाटर की सिंपल सी सब्जी तैयार कर ली। उन्होंने हॉल में ही ज़मीन पर एक साफ़ चटाई बिछाई और दो थालियाँ सजाकर रख दीं।
"सूरज, चलो खाना लग गया है, आ जाओ," मीनाक्षी ने रसोई से आवाज़ दी।
सूरज आकर चटाई पर बैठ गया। मीनाक्षी उसके ठीक सामने बैठीं और अपने हाथों से उसकी थाली में पहली रोटी रखी। सूरज ने पहला निवाला मुँह में डाला और उसकी आँखें बंद हो गईं।
"सच में माँ, इस स्वाद के आगे शहर के सारे बड़े होटल फीके हैं," सूरज ने तृप्ति से कहा।
मीनाक्षी उसे खाते हुए देखकर अंदर ही अंदर बहुत सुकून महसूस कर रही थीं। उन्होंने धीरे से कहा, "धीमे खाओ, कोई भागा नहीं जा रहा है। और सुनो, कल सुबह जल्दी उठना है। घर की थोड़ी साफ-सफाई और बची हुई व्यवस्था भी देखनी है।"
सूरज ने खाते-खाते मीनाक्षी की तरफ देखा। इस छोटे से घर में, इस शांत रात के सन्नाटे में, वे दोनों एक-दूसरे के बिल्कुल करीब थे। बाहर हवा पेड़ों से टकराकर एक मद्धम सी आवाज़ कर रही थी, लेकिन घर के भीतर एक अलग ही शांति और अपनापन घुल चुका था। दोनों ने बिना किसी पुरानी कड़वाहट या समाज के डर के, बेहद सादगी और शांति से अपने नए सफर के इस पहले भोजन को पूरा किया।
रात के भोजन के बाद, मीनाक्षी ने रसोई समेटी और बर्तन साफ किए। घर में सिर्फ एक ही बेडरूम था, और रात के ग्यारह बजते-बजते पूरे इलाके में एक गहरा सन्नाटा पसर चुका था। सूरज हॉल की बत्तियां बंद करके जैसे ही बेडरूम में दाखिल हुआ, उसने देखा कि मीनाक्षी बेड पर एक तरफ चादर बिछाकर लेटने की तैयारी कर रही थीं। कमरे के नाइट बल्ब की मद्धम नीली रोशनी में उनका चेहरा बेहद शांत और सुंदर लग रहा था।
"माँ, आप बेड पर सो जाइए, मैं हॉल में चटाई बिछाकर सो जाता हूँ," सूरज ने दरवाजे के पास खड़े होकर बहुत ही धीमे से कहा।
मीनाक्षी ने सिर उठाकर उसकी तरफ देखा। उनकी आँखों में अब कोई हिचकिचाहट नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा ठहराव था। उन्होंने बेड की दूसरी तरफ खाली जगह की ओर इशारा करते हुए बहुत ही सहज और शांत आवाज़ में कहा, "हॉल में बहुत ठंड है और मच्छर भी हैं सूरज। घर में सिर्फ यही एक कमरा है, और अब जब हम दोनों को साथ ही रहना है, तो इतनी झिझक कैसी? आओ, यहीं सो जाओ।"
सूरज कुछ पल के लिए अपनी जगह पर ठिठक गया, लेकिन फिर वह धीमे कदमों से आगे बढ़ा और बेड के दूसरी तरफ आकर लेट गया। दोनों के बीच सिर्फ एक-डेढ़ फीट की दूरी थी। कमरे का सन्नाटा इतना गहरा था कि दोनों को एक-दूसरे की सांसों की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी।
मीनाक्षी ने करवट बदली और उनका चेहरा सूरज की तरफ हो गया। मद्धम रोशनी में दोनों की नजरें एक-दूसरे से मिलीं। सूरज ने देखा कि माँ की आँखों में अब समाज का कोई डर नहीं था, बल्कि एक सुकून था कि वे दोनों अपनी नई और अलग दुनिया में सुरक्षित थे। बिना कुछ बोले, सूरज ने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और मीनाक्षी की हथेलियों को अपनी उंगलियों में थाम लिया। मीनाक्षी ने भी बिना किसी विरोध के उनके हाथ की पकड़ को मजबूत होने दिया और अपनी आँखें धीरे से बंद कर लीं। उस शांत रात के आगोश में, एक-दूसरे का हाथ थामे, उन्होंने अपने नए जीवन की इस पहली रात को बेहद शांति और सुकून के साथ बिताया।
सुबह की पहली किरण जब खिड़की के पर्दों को चीरती हुई बेडरूम में दाखिल हुई, तो पूरा कमरा एक सुनहरी रोशनी से नहा उठा। सूरज की आँखें खुलीं, तो उसके चेहरे पर एक गहरी संतुष्टि की मुस्कान आ गई। रात भर एक-दूसरे का हाथ थामे सोने के बाद, मीनाक्षी का सिर इस वक्त सूरज के मजबूत कंधे पर टिका हुआ था और उनका एक हाथ उसके सीने पर बेहद मासूमियत से रखा था। सुबह की ताज़ी हवा में मीनाक्षी के बिखरे हुए बाल सूरज के चेहरे को छू रहे थे।
सूरज ने बिना कोई हलचल किए, बेहद प्यार से मीनाक्षी के चेहरे की तरफ देखा। सुबह के इस शांत माहौल में उनका गोरा चेहरा और भी ज़्यादा मासूम और खूबसूरत लग रहा था। सूरज ने धीरे से अपने हाथ बढ़ाए और उनके गालों पर आ रही बालों की लटों को बहुत ही कोमलता से पीछे सरकाया। उसके इस हल्के से स्पर्श से मीनाक्षी की नींद टूटी।
उन्होंने अपनी घनी पलकें उठाईं और जैसे ही खुद को सूरज के इतने करीब पाया, उनके गालों पर सुबह की लाली और गहरी हो गई। वह तुरंत शर्माकर थोड़ा पीछे हटने लगीं, लेकिन सूरज ने फुर्ती से उनकी पतली कमर में अपना हाथ डाला और उन्हें वापस खींचकर अपने सीने से सटा लिया।
"सूरज... छोड़ो, सुबह हो गई है," मीनाक्षी ने शर्माते हुए बहुत ही धीमी आवाज़ में कहा और अपना चेहरा उसके सीने में छुपाने की कोशिश करने लगीं। "मुझे रसोई में जाना है, चाय बनानी है तुम्हारे लिए।"
"चाय बाद में बनेगी, माँ," सूरज ने उनके चेहरे को थोड़ा ऊपर उठाते हुए सीधे उनकी आँखों में देखा। उसकी आवाज़ में सुबह का एक अलग ही रोमांस और भारीपन था। "इस खूबसूरत सुबह की शुरुआत मुझे किसी चाय से नहीं, बल्कि आपसे करनी है। मैंने कहा था ना, अब इस घर में और हमारी इस दुनिया में कोई जल्दबाजी नहीं है।"
मीनाक्षी का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। अपने जवान बेटे की बांहों के इस सुरक्षित और जादुई घेरे में वह खुद को पूरी तरह भूल चुकी थीं। उन्होंने अपनी आँखें धीरे से बंद कर लीं। सूरज ने आगे बढ़कर बहुत ही कोमलता और शिद्दत के साथ उनके माथे और फिर दोनों गुलाबी गालों को चूमा। सुबह के उस बेहद खूबसूरत, शांत और रोमांटिक पल में, दोनों के बीच का हर संकोच पूरी तरह पिघल गया और उनके नए जीवन की यह पहली सुबह हमेशा के लिए यादगार बन गई।
सूरज की बांहों के उस मखमली घेरे से खुद को बड़ी मुश्किल से छुड़ाकर मीनाक्षी बेड से उठीं। उनके बिखरे हुए बाल और गुलाबी गाल सुबह के उस रोमांटिक माहौल की गवाही दे रहे थे। उन्होंने शर्माते हुए अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और मुस्कुराती हुई सीधे रसोई की तरफ बढ़ गईं। सूरज भी मुस्कुराता हुआ बेड पर उठकर बैठ गया और कमरे की खुली खिड़की से बाहर देवदार के पेड़ों के पीछे से निकलते सूरज को देखने लगा।
कुछ ही देर में रसोई से इलायची और अदरक की सोंधी खुशबू पूरे छोटे से घर में महकने लगी। मीनाक्षी दो कांच के गिलासों में गरमा-गरम कड़क चाय लेकर बेडरूम में वापस आईं। सूरज वहीं बेड पर दीवार से टेक लगाकर बैठा हुआ था।
"लो, तुम्हारी पसंद की कड़क चाय," मीनाक्षी ने चाय का गिलास उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा।
सूरज ने चाय का गिलास थामने के बहाने मीनाक्षी की कलाई पकड़ ली और उन्हें हल्के से खींचकर अपने पास बेड पर ही बैठा लिया। मीनाक्षी अचानक हुई इस हरकत से सकपका गईं, पर उनके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था।
"सूरज, चाय गिर जाएगी, संभालो," उन्होंने लाड़ भरी डांट के साथ कहा।
"कुछ नहीं गिरता, माँ," सूरज ने अपनी चाय की एक चुस्की ली और अपनी आँखें बंद कर लीं। "सच में, आपके हाथ की चाय के बिना मेरी सुबह कभी पूरी नहीं हो सकती।"
मीनाक्षी ने भी मुस्कुराते हुए अपनी चाय की चुस्की ली। दोनों बेड पर एक-दूसरे के बिल्कुल करीब बैठे थे। सूरज ने अपना खाली हाथ आगे बढ़ाया और मीनाक्षी की जांघ पर बहुत ही कोमलता से रख दिया। उनके इस स्पर्श से मीनाक्षी के पूरे बदन में एक मीठी सी सिहरन दौड़ गई। उन्होंने चाय का गिलास साइड टेबल पर रखा और अपना सिर धीरे से सूरज के मजबूत कंधे पर टिका दिया।
"तुम हमेशा ऐसे ही ज़िद्दी रहोगे ना?" मीनाक्षी ने बेहद मद्धम और रोमांटिक आवाज़ में पूछा।
"सिर्फ आपके लिए, माँ," सूरज ने चाय का गिलास रखकर उन्हें अपनी बांहों में पूरी तरह समेट लिया और उनके गले पर एक बहुत ही कोमल और गहरा चुंबन छोड़ दिया। सुबह की उस सुनहरी धूप और कड़क चाय के साथ, उनका यह अनूठा रोमांस और गहरा होता जा रहा था।
बेडरूम के भीतर चाय के गिलासों से उठती हुई भाप हवा में धीरे-धीरे विलीन हो रही थी, लेकिन कमरे का माहौल अब और भी ज़्यादा गहरा और जज्बाती हो चला था। सूरज ने मीनाक्षी की कलाई को जिस हक से थाम रखा था, उसमें कोई परायापन नहीं बल्कि बरसों की तड़प और चाहत छिपी थी। मीनाक्षी ने अपने झुके हुए चेहरे को धीरे से उठाया और सूरज की आँखों में देखा, जहाँ प्यार का एक ऐसा समंदर लहरें मार रहा था जिसे अब और बांधकर रखना नामुमकिन था।
सूरज ने चाय का खाली गिलास एक तरफ रखा और मीनाक्षी के दोनों हाथों को अपनी हथेलियों में ले लिया। उसकी आवाज में सुबह की मद्धम नमी और एक अजीब सा भारीपन था। उसने मीनाक्षी के चेहरे के बिल्कुल करीब आते हुए कहा, "माँ, अब इस शहर में, इस सुनसान और शांत इलाके के छोटे से घर में हमारे अलावा कोई तीसरा नहीं है। यहाँ कोई समाज नहीं है, कोई पुरानी दीवारें नहीं हैं और न ही कोई ऐसा इंसान है जो हमारे बीच आ सके। हम दोनों अब इस दुनिया के बंधनों से बहुत दूर आ चुके हैं।"
मीनाक्षी ने अपनी धड़कनों की रफ्तार को बढ़ते हुए महसूस किया। सूरज की उँगलियों की छुअन उनके हाथों पर किसी जादू की तरह काम कर रही थी। वह कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन उनकी जुबान ने इस बार भी उनका साथ नहीं दिया। उनकी आँखें बस सूरज के चेहरे पर टिकी रहीं, मानो वह उसके भीतर चल रहे जज्बातों के तूफान को समझने की कोशिश कर रही हों।
सूरज ने एक गहरी सांस ली, उसकी आँखों में एक अजीब सी बेबसी और जनून साफ झलक रहा था। उसने मीनाक्षी की आँखों में सीधे झांकते हुए कहा, "आप मुझे अपना वह पूरा प्यार कब दोगी माँ? मैं आपसे आज वह प्यार मांग रहा हूँ, जिससे आप इतने सालों से लगातार दूर भाग रही हो। हर बार जब भी मैं आपके करीब आने की कोशिश करता था, आप लोक-लाज और समाज का बहाना बनाकर खुद को मुझसे दूर कर लेती थीं। लेकिन अब तो वह समाज भी यहाँ नहीं है।"
उसकी बातें मीनाक्षी के कानों में पिघले हुए सोने की तरह उतर रही थीं। सूरज की आवाज में छिपी तड़प उनके दिल के किसी कोने को बुरी तरह झकझोर रही थी। उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू को अपनी उँगलियों में और कसकर भींच लिया। उनके चेहरे पर शर्म, संकोच और एक अनकहे अहसास की सुर्खी और भी ज्यादा गहरी हो गई।
सूरज यहाँ नहीं रुका, उसने मीनाक्षी के कंधों को हौसले से थामा और बड़े भावुक लहजे में आगे कहा, "माँ, अब आप जल्दी से खुद को मेरे लिए तैयार कर लो। मैं अब और ज़्यादा नहीं रुक सकता, मेरा सब्र अब जवाब दे रहा है। इस घर में, इस एकांत में आपको हर पल अपने सामने देख-देखकर मेरे भीतर की तड़प और बेचैनी हर सेकंड बढ़ रही है। मुझे अब इस दूरी के साथ और नहीं जीना है।"
सूरज के मुँह से निकले इन लंबे और बेहद सीधे शब्दों ने मीनाक्षी के भीतर बची-खुची झिझक की आखरी दीवार को भी एक झटके में ढहा दिया। अपने ही जवान बेटे की आँखों में अपने लिए ऐसी दीवानगी और बरसों का इंतजार देखकर उनका पूरा वजूद अंदर तक कांप उठा। वह चाहकर भी अब खुद को रोक नहीं पा रही थीं।
इससे पहले कि मीनाक्षी अपनी संभलती हुई सांसों से कोई जवाब दे पातीं, सूरज ने आगे बढ़कर उन्हें कंधों से धीरे से पीछे की तरफ धकेला। मीनाक्षी का कोमल शरीर बिना किसी प्रतिरोध के उस नरम बेड पर पीछे की तरफ लेट गया। उनके बिखरे हुए बाल सफेद चादर पर पूरी तरह फैल गए, जिससे उनकी सादगी और भी ज्यादा हसीन लगने लगी।
सूरज ने बिना एक पल गंवाए खुद को उनके ऊपर झुका दिया। कमरे में खिड़की से आ रही सुबह की सुनहरी धूप सीधे उनके चेहरों पर पड़ रही थी। सूरज ने मीनाक्षी के चेहरे पर आ रही बालों की लटों को हटाया और बेहद कोमलता व शिद्दत के साथ उनके माथे को चूम लिया। होठों के इस पहले स्पर्श से मीनाक्षी के पूरे बदन में बिजली की एक मीठी सी लहर दौड़ गई।
मीनाक्षी ने इस बार कोई दूरी नहीं बनाई, न ही उन्होंने सूरज को पीछे धकेलने की कोई कोशिश की। उन्होंने अपनी घनी और लंबी पलकों को धीरे से मूँद लिया। उनकी बंद आँखें इस बात का साफ इशारा थीं कि वह अब इस रिश्ते, इस जिद और सूरज के इस अटूट हक के आगे पूरी तरह से अपनी हार मान चुकी थीं और खुद को सौंपने के लिए तैयार थीं।
सूरज ने उनके बंद चेहरे को देखा और उसका प्यार और गहरा हो गया। उसने मीनाक्षी के दोनों गुलाबी गालों पर अपने होठों का गहरा स्पर्श छोड़ा। हर एक चुंबन के साथ दोनों की सांसों की गरमाहट एक-दूसरे में घुलने लगी थी। कमरे का वह भारी सन्नाटा अब एक बेहद खूबसूरत, गहरे और रोमांटिक अहसास में तब्दील हो चुका था।
उस शांत और सुनसान घर के बेडरूम में, जहाँ दुनिया का कोई डर नहीं था, दोनों के बीच का बरसों पुराना संकोच पूरी तरह पिघल कर बह गया। सूरज ने मीनाक्षी के गले पर एक आखिरी और गहरा चुंबन छोड़ते हुए उन्हें अपनी मजबूत बांहों के घेरे में पूरी तरह समेट लिया, और इस तरह उनके नए, अनोखे और एकांत जीवन की इस पहली सुबह ने एक बेहद हसीन और अटूट मोड़ ले लिया।
बेडरूम के भीतर हवा जैसे थम सी गई थी। सूरज ने मीनाक्षी के ऊपर से खुद को थोड़ा सा संभाला और अपनी दाहिनी उंगली से उनकी कांपती हुई रेशम जैसी मुलायम होठों को आहिस्ता-आहिस्ता सहलाने लगा। मीनाक्षी ने अपनी आँखें धीरे से खोलीं, तो उनकी आँखों में शर्म का एक गहरा दरिया बह रहा था। सूरज ने सीधे उनकी आँखों की गहराई में झांकते हुए, बेहद मद्धम और डूबती हुई आवाज़ में कहा:
"माँ, आपके ये गुलाबी और नाजुक होठ... ये कितने सालों से तरस रहे हैं ना मेरे इस प्यार के लिए? सच कहिए माँ, क्या ये सिर्फ मेरे लिए ही आज इस तरह खिले हुए हैं ना? आप भी अंदर ही अंदर मेरे लिए उतनी ही तड़पती हो ना, जितना मैं आपके लिए हर पल इस आग में जलता हूँ?"
सूरज की यह सीधी और रूह को छू लेने वाली बात सुनकर मीनाक्षी का दिल इस कदर धड़का कि उनकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे होने लगी। उन्होंने अपनी नजरें शर्म के मारे दोबारा झुका लीं, लेकिन उनके चेहरे पर आई मुस्कान और चुप्पी ने सूरज के हर सवाल का जवाब दे दिया था।
सूरज ने मुस्कुराते हुए अपने कदम पीछे खींचे और बेड के किनारे बैठ गया। उसने अपनी कलाई घड़ी की तरफ देखा और फिर बड़े ही शांत लहजे में कहा, "अच्छा माँ, अब मुझे काम पर जाना होगा। आप तब तक यहीं लेटकर थोड़ा आराम कीजिए। मैं ऑफिस जाकर जल्दी लौटने की कोशिश करूँगा।"
उसने मीनाक्षी के चेहरे पर बिखरी जुल्फों को सलीके से संवारा और उनके मन के संकोच को दूर करते हुए आगे कहा, "घबराइए मत, इस घर में सब कुछ बहुत धीरे-धीरे और आपकी मर्जी से ही होगा। माँ, आप बिल्कुल मत डरना। मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ कि आपके लिए इन सारे सामाजिक बंधनों को एक झटके में तोड़ना आसान नहीं होगा। लेकिन माँ, मुझे आपका वह पूरा प्यार चाहिए। आप अपना पूरा वक्त लो, मैं कोई जल्दबाजी नहीं करूँगा।"
इतना कहकर सूरज ने एक बार फिर झुककर मीनाक्षी के माथे पर अपने होठों का एक बेहद कोमल और पवित्र चुंबन छोड़ा। मीनाक्षी बेड पर लेटी हुई बस उसे एकटक देखती रहीं, उनके दिल का सारा डर अब एक असीम सुकून में बदल चुका था। इसके बाद सूरज मुस्कुराता हुआ उठा, सीधे वॉशरूम गया और नहा-धोकर, साफ़-सुथरे कपड़े पहनकर अपने ऑफिस के लिए घर से बाहर निकल गया। घर का दरवाज़ा बाहर से बंद होने की आवाज़ के साथ ही मीनाक्षी ने एक लंबी सांस ली और तकिए को अपनी बांहों में भींचकर सूरज की यादों में खो गईं।