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Incest रिश्तों की खूबसूरत डोर

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netsunil

मैं काग़ज़ बेरंग.. तू रंगरेज़ मेरे अल्फ़ाज़ों का
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Update 02

सबने जब खाना खत्म किया, तब तक रात के करीब दस बज चुके थे। राजू ने रसोई समेटी, बर्तनों को सही जगह रखा और हवेली के पिछले दरवाजे से अपने घर जाने के लिए निकल गया। बाहर रात का सन्नाटा पसर चुका था। वह अंधेरी गलियों से गुजरता हुआ अपने छोटे से, दो कमरों के साधारण मकान में दाखिल हुआ। घर के बाकी सब लोग, यानी उसके बच्चे, पहले ही खाना खाकर सो चुके थे। अंदर कदम रखते ही उसकी पत्नी सुनीता ने उसे देखा। वह जाग रही थी और उसी का इंतजार कर रही थी।

सुनीता ने बिना कुछ बोले रसोई से खाना निकाला और राजू के सामने परोस दिया, "आज बहुत देर हो गई जी। मालकिन ने कुछ ज्यादा काम दे दिया था क्या?"

राजू ने रूखे स्वर में जवाब दिया, "हाँ, काम तो था ही। बड़े घरों में काम कहाँ खत्म होता है।"

जब तक राजू ने खाना खत्म किया, तब तक सुनीता ने कमरे के एक कोने में, नीचे फर्श पर बिस्तर लगा दिया था। उनका घर छोटा था, इसलिए फर्श पर ही गद्दे बिछाकर सोने का इंतजाम होता था। राजू खाना खाकर हाथ-मुंह धोकर आया और चुपचाप बिस्तर पर लेट गया।

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सुनीता का जिस्म ज्यादा भरा-पूरा नहीं था। न तो वह बहुत ज्यादा खूबसूरत थी और न ही उतनी आकर्षक। उसका रंग सांवला था और बदन से वह काफी दुबली-पतली थी। हालांकि, साधारण नजरों से देखा जाए तो वह ठीक-ठाक ही दिखती थी, लेकिन राजू का नजरिया बदल चुका था। वह दिन भर हवेली में मालकिन लीलावती को देखता था, जिनकी गोरी रंगत, भरे-पूरे बदन और मखमली हुस्न के आगे सुनीता कुछ भी नहीं लगती थी। यही वजह थी कि राजू को अपनी पत्नी को देख अब कोई आकर्षण या इच्छा महसूस नहीं होती थी। उसे तो बस अपनी मालकिन के उस आलीशान बदन और उनकी बेमिसाल छुअन की यादें तड़पाती रहती थीं।

लेकिन राजू अच्छी तरह जानता था कि वह हर रोज अपनी मालकिन के जिस्म का मजा नहीं लूट सकता। लीलावती वैसी औरत नहीं थीं जो उसे अपने ज्यादा करीब आने दें। उन्हें तो बस अपनी शारीरिक जरूरत के वक्त उसका साथ पसंद था, इसके अलावा उनके नखरे और रुतबा कुछ ज्यादा ही था। वह न तो राजू को अपने होंठ चूमने देती थीं और न ही अपने जिस्म को अपनी मर्जी से छूने की आजादी देती थीं। उनके सामने राजू हमेशा एक गुलाम की तरह ही रहता था।

इस अधूरी हसरत और लाचारी के कारण, राजू अक्सर रात को अंधेरे का फायदा उठाता था। वह बिस्तर पर अपनी पत्नी सुनीता को बाहों में लेता, लेकिन अपने दिमाग में मालकिन लीलावती की तस्वीर बना लेता और उसी कल्पना में डूबकर जमके संबंध बनाता था।

जब कमरे में पूरी तरह सन्नाटा छा गया और बच्चे गहरी नींद में सो गए, तब सुनीता बिस्तर से उठी। वह धीरे से अपने पति के पास आई और फर्श पर लगे गद्दे पर लेट गई। उसने बिना कुछ बोले ही अपने ब्लाउज के बटन खोलने शुरू कर दिए। वह धीरे से राजू के चौड़े और मजबूत सीने से लिपट गई।

सुनीता ने राजू के कान के पास जाकर बहुत ही मद्धम और दबी आवाज में कहा, "आज दूध बच गया है जी... और मुझे नींद भी नहीं आ रही है। आप कुछ कीजिए ना।"

राजू ने करवट बदली और सुनीता की तरफ घूमा। अंधेरे में उसे सुनीता का सांवला बदन दिख रहा था, लेकिन उसके दिमाग में तुरंत लीलावती के वे गोरे और भारी स्तन कौंध गए। उसने बिना वक्त गंवाए अपने होंठों के बीच सुनीता के छोटे, अंगूर जैसे निप्पल को रख लिया। सुनीता इस वक्त बच्चे को दूध पिलाने के दौर में थी, इसलिए जैसे ही राजू ने दबाव बनाया, दूध की एक गर्म धार सीधे उसके मुंह में आ गई। राजू बड़ी बेरहमी और भूख के साथ उसे चूसने लगा। जब वह दूध चूस रहा था, तब उसकी आँखें बंद थीं और वह मन ही मन लीलावती के उन विशाल, मखमली और भारी स्तनों को याद कर रहा था जो उसने कुछ घंटों पहले हवेली में देखे थे। वह उसी कल्पना के नशे में डूबता चला गया।

जब दूध पूरी तरह खत्म हो गया, तो राजू के भीतर का मर्दाना गुस्सा और वासना का उबाल चरम पर पहुंच गया। दिन भर की अधूरी चोदक इच्छा और मालकिन के सामने की लाचारी अब एक सैलाब बन चुकी थी। वह तुरंत सुनीता के ऊपर आ गया। उसने बिना किसी नखरे या भूमिका के, झटके से सुनीता के पेटीकोट को ऊपर की तरफ खिसकाया। सुनीता अभी संभल भी नहीं पाई थी कि राजू ने एक ही जोरदार और गहरे झटके में अपनी पूरी मर्दानगी को सुनीता की योनि के भीतर धकेल दिया।

सुनीता इस अचानक हुए तीखे प्रहार से दर्द के मारे तड़प उठी। उसकी रीढ़ की हड्डी में एक सिहरन दौड़ गई। लेकिन बच्चे पास ही सो रहे थे, इसलिए उसने अपनी चीख को बाहर नहीं आने दिया। उसने अपने दोनों हाथों से राजू के कंधों को कसकर पकड़ लिया।

उसने कांपती और तड़पती हुई आवाज में फुसफुसाकर कहा, "जी... थोड़ा धीरे कीजिए ना... आह्ह्ह... मैं कहीं भागी नहीं जा रही हूँ... आह, मर गई मैं तो।"

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लेकिन राजू पर इस वक्त जैसे कोई भूत सवार था। धक्कों की रफ्तार कम होने के बजाय लगातार बढ़ती ही जा रही थी। राजू आज दिन भर की उस अधूरी रह गई कामुकता और मालकिन के बेटे के आ जाने से पैदा हुए सारे गुस्से को अपनी पत्नी के इस कमजोर बदन पर निकाल रहा था। बिस्तर के चरमराने की हल्की-हल्की आवाजें उस छोटे से कमरे में गूंजने लगीं।

सुनीता को अब एक अलग ही डर सताने लगा था। उसने राजू के चेहरे को पकड़ने की कोशिश करते हुए हांफते हुए कहा, "सुनिए... बाहर निकाल दीजिएगा... आह्ह्ह... नहीं तो अनर्थ हो जाएगा। मुझे फिर से माँ नहीं बनना है जी... अभी छोटा बच्चा बहुत छोटा है... आह्ह्ह, प्लीज मत कीजिएगा ऐसा..."

लेकिन राजू इस वक्त सोचने-समझने की स्थिति से बहुत दूर निकल चुका था। उसे सुनीता की मिन्नतें सुनाई ही नहीं दे रही थीं। उसने अपने धक्कों की रफ्तार को और तेज किया और अंत में, एक गहरे और अंतिम झटके के साथ अपना सारा गर्म वीर्य अपनी पत्नी की योनि की गहराइयों में पूरी तरह छोड़ दिया।

काम खत्म होते ही राजू के बदन का तनाव ढीला पड़ गया। उसने एक लंबी सांस ली, सुनीता के ऊपर से हटा और बिना एक शब्द बोले, दूसरी तरफ करवट लेकर चादर ओढ़कर सो गया। कुछ ही पलों में उसकी गहरी सांसों और खर्राटों की आवाज आने लगी।

सुनीता अंधेरे में कुछ देर वैसे ही लेटी रही। उसका बदन दर्द से टूट रहा था और मन में आने वाले समय का डर था। उसने गहरी सांस ली, उठकर बैठी और अपने ब्लाउज के खुले हुए बटन दोबारा लगाने लगी। पेटीकोट को ठीक से नीचे करके वह भी चुपचाप बिस्तर के कोने में करवट लेकर सो गई, और कमरे में एक बार फिर वही भारी सन्नाटा पसर गया।

रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। पूरी हवेली में सन्नाटा पसर चुका था, लेकिन लीलावती के बेडरूम में माहौल बिल्कुल अलग था। दोपहर में राजू के साथ अधूरा छूटा सुख और शाम को सोफे पर आदि की छुअन ने उनके भीतर काम की ऐसी आग सुलगा दी थी कि अब उनका पल-पल तड़प में बीत रहा था। बदन की बेचैनी इस कदर बढ़ चुकी थी कि बिस्तर पर लेटना भी दूभर हो रहा था।

उनके पति विक्रम बेड के सिरहाने से पीठ टिकाए बैठे थे और सोने की तैयारी कर रहे थे। लीलावती ने एक गहरी सांस ली, अपने रेशमी बदन को समेटा और विक्रम के करीब जाकर बेड पर बैठ गईं।

उन्होंने अपनी आवाज में थोड़ी सी मचलती हुई टोन लाते हुए कहा, "काफी गर्मी है ना आज जी? अजीब सी उमस महसूस हो रही है।"

विक्रम ने अपने हाथ में पकड़े मोबाइल से नजरें हटाए बिना ही सहजता से जवाब दिया, "नहीं तो लीला, एसी तो बिल्कुल ठीक चल रहा है। कमरे का तापमान तो काफी ठंडा है। क्या हुआ तुम्हें? तबीयत तो ठीक है ना?"

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लीलावती को पति का यह बेरुखा अंदाज़ पसंद नहीं आया। अपनी बात का असर न होते देख, उन्होंने बिना कोई वक्त गंवाए अपनी उंगलियों को ब्लाउज के हुक पर टिका दिया। एक-एक करके आगे के सारे हुक खुलते चले गए। ब्लाउज के ढीले होते ही उनके दोनों भारी, सुडौल और दूधिया स्तनों का विशाल उभार हवा में पूरी तरह आजाद हो गया। भीतर की भड़की हुई आग और एसी की ठंडी हवा के सीधे स्पर्श की वजह से उनके दोनों नुकीले निप्पल इस कदर सख्त हो चुके थे मानो अंगूर के पके हुए दाने हों।

विक्रम को पूरी तरह अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए लीलावती ने अपने जूड़े को भी खोल दिया। उनके घने, काले और रेशमी बाल बिखरकर उनकी गोरी पीठ और कंधों पर तैरने लगे। लेकिन विक्रम का ध्यान अब भी पूरी तरह अपने मोबाइल स्क्रीन पर ही लगा हुआ था।

लीलावती ने इतनी आसानी से हार नहीं मानी। वह अपने खुले ब्लाउज और तने हुए स्तनों के जादू से अपने पति को पूरी तरह अपना गुलाम बना लेना चाहती थीं। वह घुटनों के बल थोड़ी उठीं और सरकते हुए सीधे लेटे हुए विक्रम के बिल्कुल ऊपर आ गईं। विक्रम चूंकि पीठ के बल लेटे थे, इसलिए लीलावती के झुके होने के कारण उनके दोनों विशाल और रसीले स्तन सीधे विक्रम के चेहरे और मुंह के ठीक ऊपर हवा में झूलने लगे।

चेहरे पर उस भारी मखमली बदन की परछाई पड़ते ही विक्रम ने आखिरकार अपना फोन साइड में रख दिया। अपनी पत्नी के इस कातिलाना और कामुक रूप को देखकर उनकी आँखों में भी चमक आ गई। उन्होंने अपने हाथ ऊपर उठाए और अपनी उंगलियों से लीलावती के उन सख्त निप्पल्स को धीरे-धीरे सहलाते हुए भारी आवाज में बोले, "क्या बात है मेरी जान... ये तो हर बीतते दिन के साथ और भी ज्यादा हसीन और जवान होते जा रहे हैं। काश... काश इनमें इस उम्र में भी दूध आता, तो मज़ा ही आ जाता।"

लीलावती ने मदहोशी से मुस्कुराते हुए अपने बदन को थोड़ा और नीचे झुकाया। उनके स्तनों की मखमली त्वचा विक्रम के गालों से छुई। उन्होंने कांपते होंठों से कहा, "क्या पता... शायद आ भी जाए। इन्हें बस आपके भरपूर प्यार की जरूरत है जी।" यह कहते हुए उन्होंने अपने एक भारी स्तन को और नीचे झुकाकर सीधे अपने पति के होंठों पर रख दिया।

विक्रम का संयम अब पूरी तरह जवाब दे चुका था। उन्होंने दूसरे ही पल लीलावती को कमर से पकड़ा, झटके से करवट ली और उन्हें अपने नीचे लिटा लिया। विक्रम ने बिना कोई वक्त गंवाए लीलावती के लाल और रसीले होंठों को अपने मुंह में भर लिया और उन्हें बेरहमी से चूमने लगे। लीलावती इस सुख की शुरुआत से बेहद खुश थीं, उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और मुस्कुराते हुए अपने पति के चुंबन का पूरा साथ देने लगीं।

विक्रम ने चूमते हुए ही अपना हाथ नीचे बढ़ाया और अपने पजामे को नीचे खिसका दिया। इसके साथ ही उन्होंने लीलावती के पेटीकोट के घेरे को पकड़कर उसे धीरे-धीरे उनकी गोरी जांघों से ऊपर सरकाते हुए कमर तक ला टिकाया। विक्रम की सख्त मर्दानगी अब लीलावती की बेहद गर्म और गीली हो चुकी योनि के मुहाने पर आकर रगड़ खाने लगी। इस सीधे स्पर्श से लीलावती के मुंह से एक सिसकारी निकली। विक्रम ने नीचे रगड़ बनाए रखी और ऊपर झुककर लीलावती के उन भारी स्तनों को अपने मुंह में लेकर ज़ोर-ज़ोर से चूसना शुरू कर दिया। वह चूसते हुए बीच-बीच में बुदबुदा रहे थे, "तुम बहुत लाजवाब हो लीला... बहुत ही रसीली हो।"

लीलावती इस वक्त अपने पति की उस मर्दानगी को पूरी तरह अपने भीतर महसूस करने के लिए बुरी तरह तड़प रही थीं। लेकिन जब विक्रम सिर्फ ऊपर चूसने और नीचे रगड़ने में ही लगे रहे और खुद अंदर नहीं डाला, तो लीलावती की बर्दाश्त खत्म हो गई। उन्होंने विक्रम के कंधों पर हाथ रखकर उन्हें थोड़ा सा पीछे धकेला।

एक झटके में पासा पलट गया। लीलावती फुर्ती से घूमकर खुद विक्रम के ऊपर आ गईं। उन्होंने अपने दोनों हाथों से विक्रम के मजबूत सीने को थामा, नीचे अपनी योनि के रास्ते को सही जगह पर सेट किया और विक्रम की उस कड़क मर्दानगी पर सीधे ऊपर बैठ गईं।

जैसे ही वह पूरी ताकत से नीचे बैठीं, विक्रम की पूरी मर्दानगी एक ही बार में उनकी योनि की गहराइयों को चीरती हुई अंदर समा गई।

"ओउउउफ्फ... आह्ह्ह..."

कमरे के सन्नाटे में लीलावती की एक बेहद मीठी, तीखी और सुख से भरी लंबी सिसकारी गूंज उठी। मदहोशी के इस चरम पर पहुंचकर लीलावती ने हवा में मस्ती से अपने दोनों हाथों को उठाया और अपने चेहरे पर आ रहे खुले बालों को झटके से नीचे से ऊपर की तरफ फेंक दिया। उनका पूरा बदन मजे से कांप रहा था। वह आगे झुकीं और पूरी तरह से विक्रम के सीने के ऊपर लेट गईं, ताकि वह अपनी कमर से झटके लगा सकें।

दोनों इस सुख के समंदर में डूबने ही वाले थे कि तभी अचानक कमरे के भारी लकड़ी के दरवाजे पर बाहर से हल्की सी दस्तक हुई।

खट-खट... खट-खट...

दरवाजे की उस आवाज के साथ ही बाहर से एक बेहद धीमी, डरी हुई और मीठी आवाज आई, "पापा... मम्मी... आप लोग जाग रहे हो क्या?"

वह आवाज उनकी अठारह साल की जवान बेटी पीहू की थी। उस आवाज का आना था कि बेडरूम के भीतर चल रहा कामुकता का वह पूरा तूफान एक सेकंड में थम गया।

पीहू की आवाज़ कानों में पड़ते ही दोनों के बदन का पूरा नशा एक झटके में हवा हो गया। लीलावती का दिल सीने में इतनी ज़ोर से धड़क रहा था, मानो अभी बाहर निकल आएगा। उन्होंने तुरंत खुद को विक्रम के ऊपर से अलग किया और पलंग से नीचे उतरीं। घबराहट और हड़बड़ाहट के मारे उनके हाथ कांप रहे थे।

उन्होंने बिस्तर पर पड़े कंबल को खींचकर विक्रम के ऊपर डाला और दबी, हांफती हुई आवाज़ में फुसफुसाकर कहा, "विक्रम, तुम कंबल के अंदर ही रहना। बाहर मत निकलना, तुम अभी पूरी तरह नंगे हो।"

विक्रम ने बिना कोई सवाल किए फौरन कंबल को अपने गले तक ओढ़ लिया और चुपचाप सीधे लेट गए, हालांकि उनका बदन अभी भी अधूरी छूटी उत्तेजना की वजह से गर्म था।

लीलावती ने खिड़की के शीशे में अपनी परछाई को देखते हुए फुर्ती से अपने ब्लाउज के आगे के हुक लगाए। उन्होंने बिखरे हुए बालों को समेटकर पल्लू को कंधे पर कसकर ओढ़ लिया ताकि बदन का कोई भी हिस्सा बाहर न दिखे। उनका मकसद सिर्फ एक था—दरवाजा खोलकर पीहू को किसी भी तरह समझा-बुझाकर फौरन उसके कमरे में वापस भगा देना, ताकि वे अपना अधूरा छूटा काम पूरा कर सकें।

चेहरे पर एक बनावटी सहजता और ममतामई मुस्कान लाते हुए, लीलावती ने कदम बढ़ाए और दरवाज़े की भारी कुंडी को खामोशी से खोल दिया।

जैसे ही किवाड़ खुला, सामने अठारह साल की पीहू खड़ी थी। वह अपने ढीले-ढाले नाइटवियर में थी, उसकी आँखें नींद से भारी थीं और चेहरे पर एक अजीब सा डर साफ झलक रहा था।

लीलावती ने दरवाज़े की ओट में ही खुद को बनाए रखा, ताकि पीहू अंदर की हालत न देख सके। उन्होंने बड़े प्यार से लेकिन थोड़ी जल्दबाजी में पूछा, "क्या हुआ पीहू बेटा? इतनी रात को क्यों जाग रही हो? सोई नहीं अभी तक?"

पीहू ने अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया, उसकी आवाज़ में एक मासूम सा डर था, "मम्मी, मुझे अपने कमरे में बहुत अजीब लग रहा है। बाहर हवा बहुत तेज़ चल रही है और खिड़की से डरावनी आवाज़ें आ रही हैं। मुझे अकेले सोने में बहुत डर लग रहा है। क्या मैं आज रात आप और पापा के बीच में सो सकती हूँ?"

यह सुनते ही लीलावती के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। एक तरफ अंदर पलंग पर उनके पति विक्रम बिना कपड़ों के कंबल में लिपटे उनका इंतज़ार कर रहे थे, और दूसरी तरफ बेटी उनके ही बीच सोने की ज़िद पर अड़ी थी। लीलावती का दिमाग तेज़ी से दौड़ने लगा कि वह पीहू को यहाँ से कैसे टालें।

लीलावती अभी कोई बहाना बनाने के लिए अपने होंठ खोल ही रही थीं कि पीहू ने उनकी एक न सुनी। डर और लाड़ के मारे उसने अपनी माँ को थोड़ा सा परे धकेला और ज़बरदस्ती कमरे के भीतर घुस आई।

"प्लीज मम्मी, ना मत कहना। मुझे सच में बहुत डर लग रहा है," कहती हुई पीहू ने एक पल भी नहीं गंवाया और सीधे उस विशाल पलंग पर चढ़ गई। लीलावती के कुछ बोलने से पहले ही उसने झटके से भारी कंबल का एक हिस्सा उठाया और विक्रम के साथ बिस्तर के बिल्कुल बीच में घुस गई।

पीहू को इस तरह अचानक कंबल के अंदर जाते देख लीलावती के हलक में जैसे जान अटक गई। उनकी आँखें डर और घबराहट के मारे पूरी फैल गईं। पलंग पर कंबल के भीतर लेटे विक्रम का दिल भी इस वक्त किसी नगाड़े की तरह धड़क रहा था। वह पूरी तरह नंगे थे और पीहू के बिस्तर पर आते ही उन्होंने अपनी दोनों टांगों को सिकोड़ लिया और कंबल को अपने बदन के निचले हिस्से पर इतनी मजबूती से भींच लिया कि बदन का कोई भी अंग पीहू से छू न जाए। वह अपनी सांसें रोककर बुत बन गए।

लीलावती के पास अब कोई रास्ता नहीं बचा था। मजबूरी में उन्हें भी बिस्तर पर आना पड़ा। वह पलंग के दूसरी तरफ चढ़ीं और कंबल के भीतर दाखिल हो गईं। अब पीहू उन दोनों के बिल्कुल बीच में लेटी हुई थी।

लीलावती ने कांपते हाथों से साइड टेबल की तरफ हाथ बढ़ाया और कमरे की मेन लाइट को बंद कर दिया। कमरे में अब सिर्फ खिड़की से छनकर आ रही मद्धम सी रोशनी बची थी। लीलावती का दिल सीने में इतनी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था कि उसकी आवाज़ उन्हें खुद अपने कानों में सुनाई दे रही थी। उनके दिमाग में सिर्फ एक ही खौफनाक डर बार-बार कौंध रहा था कि कहीं नींद के झोंके में या लाड़ में आकर पीहू करवट न बदल ले और अपने पापा की गोद में न चली जाए, क्योंकि विक्रम कंबल के भीतर इस वक्त पूरी तरह नग्न अवस्था में लेटे हुए थे।

अंधेरे कमरे में तीन सांसों की आवाजें गूंज रही थीं—एक पीहू की जो धीरे-धीरे शांत हो रही थी, और दो लीलावती और विक्रम की, जो डर और अधूरी छूटी काम की आग के बीच बेहद भारी और तेज चल रही थीं।

रात के करीब तीन बज रहे थे। चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था और हवेली के उस मुख्य शयनकक्ष में मद्धम अंधेरा छाया था। विक्रम ने सोचा था कि जैसे ही पीहू गहरी नींद में सो जाएगी, वह चुपके से भारी मखमली कंबल से बाहर निकलकर अलमारी से अपने कपड़े पहन लेगा। लेकिन दिन भर की थकान और वातानुकूलित कमरे की मखमली गर्माहट का असर ऐसा हुआ कि उसे पता ही नहीं चला और वे तीनों ही गहरी नींद के आगोश में समा गए।

तभी अचानक रात के उस सन्नाटे में पीहू को कोई बेहद डरावना, भयानक सपना आया। सपने के खौफ से उसका पूरा नाजुक बदन कांप उठा और वह हड़बड़ाकर नींद से जाग गई। डर के मारे उसकी सूझबूझ पूरी तरह गायब हो चुकी थी। उसने बिना सोचे-समझे बाईं तरफ करवट बदली और अंधेरे में सीधे अपने पापा के सीने से जाकर लिपट गई।

पीहू के इस तरह अचानक सीने से चिपकने और उसकी कांपती हुई छुअन से विक्रम की नींद झटके से खुल गई। नींद खुलते ही उसे महसूस हुआ कि उसकी अठारह साल की जवान, सुडौल और बेहद खूबसूरत बेटी उसके सीने से पूरी तरह लिपटी हुई है और रोने जैसी कांपती आवाज़ में बार-बार कह रही है, "पापा... पापा... मुझे बहुत डर लग रहा है..."

अपनी बेटी को इस कदर डरा हुआ देखकर विक्रम एक पिता के तौर पर अपनी सारी मर्यादा और झिझक भूल गया। उसके मन से वह सारा डर गायब हो गया कि उसने बदन पर एक भी कपड़ा नहीं पहना है और वह इस वक्त पूरी तरह नग्न अवस्था में है। उसने अपनी सुरक्षा की भावना में बहकर पीहू को अपनी मजबूत, चौड़ी बाहों में कसकर भींच लिया और उसकी मखमली पीठ को धीरे-धीरे सहलाने लगा ताकि उसका डर कम हो सके।

लेकिन जब तक विक्रम को इस बात का पूरा होश आया कि वह इस वक्त बिना कपड़ों के है, तब तक काफी देर हो चुकी थी। पीहू कंबल के भीतर अपने पापा के उस चौड़े, गठीले और पूरी तरह नग्न बदन से पूरी तरह चिपक चुकी थी। ताज्जुब की बात यह थी कि पीहू को अपने पापा के बदन की वह सीधी, मर्दाना गर्माहट इस वक्त किसी डरावने अहसास के बजाय बेहद महफूज़, आरामदायक और सुकून भरी लग रही थी। उस गर्माहट ने उसके भीतर के सारे खौफ को पल भर में सोख लिया।

पीहू ने राहत की एक लंबी सांस ली और अपने पापा के नंगे बदन को और भी ज्यादा मजबूती से अपनी बाहों में जकड़ लिया। उसकी छोटी स्कर्ट पहले ही ऊपर सरक चुकी थी, जिससे उसकी पूरी नग्न, चिकनी और मक्खन जैसी गोरी जांघें विक्रम के नग्न पैरों से सीधे रगड़ खा रही थीं। त्वचा से त्वचा का यह सीधा, मखमली स्पर्श कंबल के भीतर के तापमान को धीरे-धीरे बढ़ाने लगा।

कुछ मिनटों तक कमरे में सिर्फ उनकी भारी होती सांसों की आवाजें गूंजती रहीं। धीरे-धीरे, उस शांत अंधेरे में विक्रम को भी अपनी जवान बेटी के सुडौल, गदराए और उभरते हुए बदन की छुअन अपने नंगे जिस्म पर गहराई से महसूस होने लगी। पीहू की मखमली, रेशमी त्वचा की वह गर्माहट विक्रम के रोम-रोम में एक अजीब सा कामुक सुकून घोलने लगी। वह अहसास इतना सुखद और मदहोश कर देने वाला था कि विक्रम ने भी अपनी बाहों की पकड़ को और मजबूत कर लिया। उसने पीहू को पूरी तरह अपनी गोद में समेट लिया, जिससे पीहू के गोल नितंब और उसकी छाती का हल्का उभार विक्रम के मर्दाना बदन से पूरी तरह भींच गया।

तभी, नींद के झोंके में पीहू का चेहरा थोड़ा सा घूमा और उसके मखमली, रसीले गुलाबी होंठ सीधे विक्रम के नंगे सीने की गरम त्वचा से जा छुए। होंठों की उस गीली, कोमल और गर्म छुअन के होते ही विक्रम के पूरे बदन में जैसे बिजली का एक जोरदार करंट सा दौड़ गया। उस तीव्र और कामुक अहसास ने सीधे उसके निचले हिस्से पर प्रहार किया, और उसका सुप्त पड़ा सांवला अंग एक ही झटके में पूरी तरह से तनकर लोहे की रॉड की तरह कड़ा हो गया। वह कड़ा अंग कंबल के भीतर दोनों के बीच में पीहू की चिकनी जांघों से जाकर छू गया।

कंबल के भीतर का माहौल अब पूरी तरह वासना और असीम सुख के रंग में बदल चुका था। पीहू ने विक्रम के सीने पर अपना सिर पूरी तरह टिकाए हुए, अपनी उंगलियों को उनके सीने के बालों में हल्के से फिराते हुए बेहद मद्धम, लाडली और कामुक आवाज में कहा, "पापा, आई लव यू सो मच।"

विक्रम ने उस आवाज की गहराई और अपने बदन में उठते तूफान को महसूस किया। उसने पीहू की नग्न जांघों और कमर को अपने बड़े हाथों से सहलाते हुए भारी, मदहोश आवाज में जवाब दिया, "आई लव यू टू, मेरी गुड़िया..."

अब दोनों उस कंबल के भीतर मर्यादा की हर सीमा को भूलकर एक-दूसरे के बेहद करीब और पूरी तरह सहज हो चुके थे। जज्बातों और उस मखमली, कामुक अहसास के प्रवाह में बहते हुए, वे एक-दूसरे के जिस्म को बड़े ही प्यार, शिद्दत और सुकून से सहलाने लगे। विक्रम के हाथ पीहू की पीठ से होते हुए उसकी कमर के निचले हिस्से को छू रहे थे, और पीहू भी अपने पापा के मर्दाना बदन की आगोश में पूरी तरह पिघल रही थी। कुछ ही देर में, उस अनोखे, गहरे और सुखद नशे के साए में दोनों की आँखें फिर से मुंद गईं और वे एक बार फिर गहरी, बेफिक्र नींद में सो गए।
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