मैं उठ कर बैठ गया. चाची चाचाजी से बोली.
"लल्ला को अब तीन दिन छुट्टी देते हैं ताकि यह पूरा ताजा तवाना हो जाये. तुम दो दिन मुझे खूब भोगो, मुझे खुश कर दो."
मैंने तीन दिन सेक्स से वंचित रखे जाने के प्लान पर विरोध किया पर दोनों ने मेरी एक न सुनी. हाँ, मुझे एक चुदाई का आखिरी उपहार देने के स्वरूप मेरी चुदैल चाची ने यह इच्छा जाहिर की कि आज की रात में और चाचाजी एक साथ उन्हे आगे पीछे से भोग सकेंगे. जाहिर था कि चाची की कामोत्तेजना अब चरम सीमा पर थी. अपने दोनों छेदों में एक एक लंड एक साथ लेना चाहती थी.
दोपहर भर आराम करके हम फ़िर चुस्त हुए. रात को बिस्तर में एक दूसरे से चूमा चाटते करते हुए हमने यह फ़ैसला किया कि पहले चाचाजी उसकी चूत चोदेंगे और मैं गांड मारूँगा. चाचाजी ने पहले तो चाची की चूत चूसी और उसे गरम किया. एक दो बार झड़ाकर रस पिया. फिर अपनी पत्नी की बुर में अपना लोडा घुसाकर वे उसे बाँहों में भरकर पीठ के बल लेट गये जिससे चाची उनके ऊपर हो गई. चाची की गांड उन्हों ने अपने हाथों से मेरे लिये फ़ैलायी और मैंने अपना लंड चाची के कोमल गुदा में आसानी से उतार दिया.
चाची को अब हम दोनों एक साथ चोदने लगे. मैं ऊपर से उनकी गांड मारने लगा और नीचे से चाचाजी अपनी कमर उछाल उछाल कर चोदने लगे. कुछ ही समय में एक लय बंध गयी और चाची के दोनों छेदों में सटा सट लंड चलने लगे. वे तृप्त होकर सिसकारियाँ भरने लगी. हर दस मिनिट में हम पलट लेते जिससे कभी चाचाजी ऊपर होते तो कभी मैं. कभी करवट पर लेट कर आगे पीछे से चोदते. चाची तो निहाल होकर किसी रंडी जैसी गंदी गालियां देती हुई इस डबल चुदाई का आनंद ले रही थी.
चाचाजी बेतहाशा चाची को चूमते हुए उसे चोद रहे थे. चाची की चूत और गुदा के बीच की दीवार तन कर इतनी पतली हो गयी थी कि मेरे और चाचाजी के लंड आपस में रगड रहे थे मानों हम लंड लड़ा रहे हों. हमने ऐसी लय बांध ली कि जब मेरा लंड अंदर होता तो चाचाजी का बाहर और जब वे चूत में लंड पेलते तो मैं गांड में से बाहर खींच लेता. इससे हमारे लंड आपस मे ऐसे मस्त सटक रहे थे कि जैसे बीच में कुछ न हो.
झड़ने के बाद हमने एक दूसरे के वीर्य का पान चाची के छेदों में से किया. मैंने उनकी चूत चूसी और चाचाजी ने गांड. फ़िर हमने चोदने के लिये छेद बदल लिये. इस बार मेरा लंड चाची की चूत में था और चाचाजी का लंड चाची की गांड में था. यह चुदाई आधी रात के बाद तक चलती रही और तभी खतम हुई जब आखिर चाची चुद चुद कर बेहोश हो गयी. मैं और चाचाजी भी झड़ कर निढाल होकर बिस्तर पर गिर गए.
दूसरे दिन से मेरी छुट्टी हो गयी. लंड खड़ा होकर तकलीफ़ न दे और खूब नींद आये ऐसी दवा चाचाजी ने मुझे दी. बस मैं खाता था और सोता था. एक तरह से मेरे लिये यह अच्छा भी हुआ क्योंकी दो हफ्तों के निरंतर संभोग के बाद मेरे शरीर को आराम की सख्त जरूरत थी.
लगता है कि चाचाजी ने अपनी पत्नी की ओर उनकी जिम्मेदारी पूरी निभाई क्योंकी दो दिन में चाची की चुद चुद कर ऐसी हालत हो गयी जैसे एक साथ दस बारह लोगों ने चोद डाला हो. पर उनके चेहरे पर बहुत खुशी और सुकून था. वे बिलकुल तृप्त नजर आती थी.
एक बात और भी हुई, और वह यह कि चाचाजी भी अपनी पत्नी के बुर का शरबत पीने लगे. इसका पता मुझे तब चला जब एक दिन दोपहर को मैंने छुप कर उनके कमरे में देखा. बात यह थी कि मेरे बहुत कहने पर भी उन तीन दिनों में चाची ने मुझे अपना मूत नहीं पिलाया. कहती कि मुझे पूरी तरह से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये.
उसे मेरे मुंह में मूतने में कितना मजा आता था यह मैं जानता था. उधर चाचाजी भी मुझे कभी पानी पीते नहीं दिखते थे. कुतूहल से मैंने आखिर एक दिन दरवाजे की दरार में से देखा तो चाची साड़ी कमर तक ऊपर करके पैर फ़ैलाकर खड़ी थी और चाचाजी अपने पत्नी की टांगों के बीच बैठे मुंह उठाये उसका मूत पी रहे थे. चाची हंसती हुई उनका सिर पकडकर उनके मुंह में मूतती हुई उन्हें उलाहना दे रही थी.
"आखिर मैं तुम दोनों की कैसे प्यास बुझाऊँगी? दो दो दीवाने हैं अब मेरे बुर के शरबत के. लगता है हर दस मिनिट में गिलास भर पानी पीना पड़ेगा." में ईर्षा से जलते हुए वापिस अपने कमरे में आकर सो गया
चाचाजी तो सुबह फ़िर अपने दौरे पर निकल गये.
--- आगे ---
चाचाजी के जाने के बाद मैं चाची से लिपट गया. वे प्यार से मुझे चूमते हुए बोली.
"तीन दिन आराम करके कैसा महसूस हो रहा है?"
मैं बेचैन होकर बोला.
"मेरी तो हालत खराब कर दी, ना आपको चोदना नसीब हो रहा था ना ही आपकी बुर का शर्बत पीने मिल रहा था!"
चाची बोली. "मेरी रातें तो बढ़िया कटी, मुझे पूरा खलास कर दिया उन्हों ने. लगता है कि अब कही वे जाकर सही तरीके से मेरे पति बने हैं. और इसका सारा श्रेय तुझे है."
मैंने उनके मम्मे चूमते हुए कहा. "तो इनाम देगी ना चाची अपने इस भक्त को?"
"हाँ लल्ला, मैं भूली नहीं हूँ, मुन्नी आज शाम को वापस आ रही है. उसे चोद ले. वह लड़की नखरा करेगी पर कहाँ जायेगी? एक बार चुदाई का चस्का लग जाएगा फिर बार बार चुदवाएगी। उसे चोदने में मैं तेरी सहायता करूंगी. और भी जो करना है वह कर लेना, मन चाहे वैसा चोदना, वैसे चुदाते समय वह ज्यादा नहीं रोएगी. एक नम्बर की छिनाल है वह लौंडी, हाँ उसकी नाजुक गांड में लंड जायेगा तो जरूर चीखेगी."
मेरा लंड अब दो दिन के आराम से फ़िर तन्ना कर खड़ा हो गया था और चाची पर चढने को मैं मरा जा रहा था. पर उन्हों ने ही मना कर दिया. "आज रात अब तेरी है. लंड मस्त रख, मजा आयेगा. आखिर कुंवारी चूत चोदना है, बहुत कसी होगी, मेहनत करना पड़ेगी."
"और चाची गांड भी तो मारनी है मुन्नी की" मैंने मचलकर कहा.
"उसके लिये भी कडा लंड चाहिये. खैर तू जवान छोकरा है, तेरा लंड तो हमेशा कडक रहता है. गांड भी मार लेना उस लौंडी की आज ही. पूरा चोद ले उसे अलट पलट कर दोनों ओर से" वे बोली. फ़िर साड़ी ऊपर उठाकर पलंग पर लेट गई. "तुझे दिन भर सब्र करना है, मुझे नहीं. मेरा काम तो तुझे करना ही पड़ेगा. चल लग जा चूत चूसने में."
दिन भर आते जाते जैसे समय मिले, चाची ने मुझसे बुर चुसवायी, खड़े लंड को किसी तरह दिलासा देते हुए मैं दिन भर उनकी सेवा करता रहा.
शाम को मुन्नी आयी. दस दिन बिना शारीरिक संपर्क के रह कर वह ऐसी गरमा गयी थी कि आते ही अपनी मौसी से लिपट गयी. चाची ने बड़ी मुश्किल से उसे रोका और कहा कि रात तक रुके. उसे हमने चाचाजी के साथ हुई हमारी सामूहिक रति के बारे में कुछ नहीं बताया.
रात को हम छत पर न जाकर चाची के कमरे में ही सोये. चाची ने पहले ही मुझे बता दिया था. "लड़की थोड़ा सा चीखेगी, इसलिये बंद कमरे में शिकार करेंगे उसका."
कपड़े उतारकर हम एक दूसरे से लिपट गये. मेरे तनकर खड़े लंड को देखकर मुन्नी चहक उठी. "हाय, कितनी जोर से खड़ा है भैया का लंड, लगता है आज की रात आपकी गांड फ़िर मारी जाने वाली है मौसी." चाची सिर्फ़ हंसी और कुछ नहीं बोली.
पहले बहुत देर चूत चुसाई हुई. मुन्नी और चाची ने मन भर के एक दूसरे की बुर का पानी पिया और फ़िर मैने भी उन दोनों की चूत चूसी. मुन्नी की कुंवारी संकरी चूत चूसते हुए मुझे ऐसा लग रहा था कि कब इसमे लोडा डालूँ और फ़ाड दूँ. जब मैं मुन्नी की बुर चाट रहा था तो चाची ने कहा. "अनुराग, मुन्नी को बाँहों में ले और प्यार कर, देखूँ तुम दोनों की जोड़ी कैसी लगती है."
मन भर कर मुन्नी की चूत चूसने के बाद मैं मुन्नी को बाँहों में लेकर लेट गया और उसकी कड़ी जरा जरा सी चूचियाँ दबाता हुआ उसे चूमने लगा. वह शरमा रही थी पर बड़े प्यार से चुम्मा दे रही थी. चाची हमारे पास आकर बैठ गई और हमारा प्रेमालाप देखने लगी.
मुन्नी अब तक काफ़ी गरमा गयी थी और मेरे लंड को हाथ से पकड कर मुठिया रही थी. उसे मैंने पलंग पर लिटाया और उसके नितंबों के नीचे एक तकिया रखा. वह अब थोड़ा घबरा गयी. "क्या कर रहे हो अनुराग भैया?"
चाची ने जब कहा कि अब उसकी चुदाई होगी तो वह नखरा करने लगी. बच्ची चुदाना तो चाहती थी पर मेरे तन्नाये लंड को देखकर वह काफ़ी भयभीत थी. चाची के पुचकारने पर आखिर उसने जांघें फैलाई और मैं उसकी टांगों के बीच अपना लंड संभाल कर बैठ गया. मैने चाची को आँख मारी कि समय आ गया है.
चाची समझ गई और मुन्नी के सर पर हाथ फेरकर उसे ढाढ़स बांधने लगी. मुन्नी थोड़ी सी घबरा गई "यह क्या कर रहे हो अनुराग भैया, जाने दो मुझे" मैंने अब अपना सुपाड़ा मुन्नी की कुंवारी चूत पर रखा और दबाना शुरू किया. चाची बोली "थोड़ा सा ही दुखेगा बेटी, तू ज्यादा मत छटपटाना घबराना मत, बहुत मजा भी आएगा, और पहली बार चुदाने का मजा तो तभी आता है जब थोड़ा दर्द हो."
मैने अपनी उंगलियों से उसकी चूत चौड़ी की और लंड को कस कर पेला. फ़च्च से सुपाड़ा उसकी कसी बुर के अंदर हो गया और मुन्नी दर्द से बिलबिला उठी. चीखने ही वाली थी कि चाची ने अपने हाथ से उसका मुंह दबोच दिया. तड़पती मुन्नी की परवाह न करके मैने लंड फ़िर पेला और आधा अंदर कर दिया. मुन्नी छटपटाते हुए अपने बंद मुंह से गोम्गियानि लगी.
उस कुंवारी मखमली चूत ने मेरे लंड को ऐसे पकड रखा था जैसे किसी ने मुठ्ठी में पकड़ा हो. मुन्नी की आँखों में आँसू छलक आये थे. उन्हें देखकर चाची और मैं और उत्तेजित हो उठे और एक दूसरे को चूमने लगे. मुन्नी को चोदने में मुझे बड़ा मजा आ रहा था इसलिये मैं जान बूझ कर बोला. "चाची, मजा आ गया, मुन्नी की चूत तो आज फ़ट जायेगी मेरे मोटे लंड से, पर मैं नहीं छोड़ने वाला इसे, चोद चोद कर फ़ुकला कर दूंगा साली को"
वह और घबराई तो मैंने झुककर उसका एक नन्हा निप्पल मुंह में लिया और चूसने लगा. मैंने सोचा कि अभी ज्यादा डराना ठीक नहीं है क्योंकी उसकी गांड भी मारनी थी. इसलिये उसे तड़पा तड़पा कर चोदने की अपनी इच्छा मैंने उसकी गांड के लिये बचा कर रखी. दूसरे स्तन को चाची प्यार से सहलाने लगी. धीरे धीरे मुन्नी का तड़पना कम हुआ और उसने बिलबिलाना बंद कर दिया.
चाची ने जब उसके मुंह से हाथ हटाया तो लड़की बोली. "हाय मौसी, बहुत दर्द होता है, अनुराग भैया, प्लीज़ अपना लोडा निकाल लो."
चाची ने मुझसे कहा "तुम चोदो अनुराग, मेरी यह भांजी जरा ज्यादा ही नाजुक है, इसकी परवाह मत करो. बाद में देखना, चुदते हुए कैसे किलकारियाँ भरेगी"
चाची ने झुककर अपने होंठ मुन्नी के मुंह पर जमा दिये और जोर से चूस चूस कर उसका चुंबन लेने लगी. मुन्नी अब शांत हो चली थी और उसकी चूत फ़िर गीली होने लगी थी. मैने बचा हुआ लंड धीरे धीरे इंच इंच करके उसकी चूत में पेलना शुरू किया. जब मुन्नी तड़पती तो मैं लंड घुसेडना बंद कर देता था. आखिर पूरा लंड उस कसी बुर में समा गया और मैने एक सुख की सांस ली.
"देख मुन्नी, पूरा लंड तेरी चूत में है और खून भी नहीं निकला है. कैसे प्यार से दिया है तेरी चूत में, तू फ़ालतू घबराती थी"
मुन्नी ने थोड़ा सिर उठा कर अपनी जांघों के बीच देखा तो हैरान रह गई. फ़िर शरमा कर मेरी ओर देखने लगी. चाची उसे पुचकार कर बोली. "शाबास मेरी बहादुर बिटिया, बस दर्द का काम खतम, अब मजा ही मजा है. अनुराग, तू चोद, मैं मुन्नी से अपनी चूत की सेवा करवाती हूँ"
चाची उठ कर मुन्नी के मुंह पर अपनी चूत जमाकर बैठ गई और धीरे धीरे उसका मुंह चोदने लगी. मैने अब धीरे धीरे लंड अंदर बाहर करना शुरू किया. पहले तो कसी चूत में लंड बड़ी मुश्किल से खिसक रहा था. मैने मुन्नी के क्लिटोरिस को अपनी उंगली से मसलना शुरू कर दिया और वह कमसिन बुर एक ही मिनट में इतनी पसीज गई कि लंड आसानी से फ़िसलने लगा. मैं अब उसे मस्त चोदने लगा.
मुन्नी को चोदते चोदते मैने पीछे से चाची की चूचियाँ पकड लीं और दबाने लगा. चुदाई का एक समां सा बंध गया. चाची अपना सिर घुमाकर मुझे चुंबन देते हुए अपनी भांजी के मुंह पर बैठ कर उससे अपनी चूत चुसवा रही थी और मैं पीछे से चाची के मम्मे दबाता हुआ उनकी चिकनी पीठ को चूमता हुआ हचक हचक कर मुन्नी की बुर चोद रहा था.
दोनों चूते खूब झड़ीं और खुशी की किलकारियाँ कमरे में गूजने लगी. आखिर मुझसे न रहा गया और मैने चाची को हटने को कहा.
"चाची, मुझसे अब नहीं रहा जाता, मैं मुन्नी पर चढ कर जोर जोर से चोदूंगा."
चाची हट गई और हस्तमैथुन करते हुए हमारी कामक्रीडा का आखिरी भाग देखने लगी. मैंने मुन्नी पर लेट कर उसे बाहों में जकड लिया और अपनी जांघों में उसके कोमल तन को दबोचकर उसे चूमता हुआ हचक हचक कर चोदने लगा. कुछ ऐसे ही जैसे चाचाजी ने मुझे चोदा था. मुन्नी की गरम सांसें अब जोर से चल रही थी, वह उत्तेजित कन्या चुदने को बेताब थी.
"चोदो भैया, और जोर से चोदो ना, अब नहीं दुखता, मजा आ रहा है, उई ऽ मां ऽ."
उसकी जीभ मुंह में लेकर चूसता हुआ मैंने उसे पूरी शक्ति से चोद डाला. सुख से मैं पागल हुआ जा रहा था. कुंवारी बुर में लंड चलने से ’पॉक पॉक’ की मस्त आवाज आ रही थी. आखिर मैंने एक करारा धक्का लगाया और लंड को मुन्नी की बुर में जड तक गाड कर स्खलित हो गया. मुन्नी की बुर अभी भी मेरे लोडे को पकड कर जकड़े हुए थी.
पूरा झड़ने के बाद मैने मुन्नी का प्यार से एक चुंबन लिया और उठ कर लंड खींच कर बाहर निकाला. लंड उसकी चूत के पानी से गीला था. चाची तुरंत मेरे पास आई और उसे मुंह में लेकर चूस डाला. मेरा लंड साफ़ करके मुझे बाजू में हटने को कहते हुए वे खुद मुन्नी की जांघों को फ़ैलाते हुए बोली. "अब देखूँ तो, मेरी भांजी की पहली बार चुदी बुर में अपनी मौसी के लिये क्या तोहफ़ा है!" और झुक कर मुन्नी की बुर चूसने लगी. मेरा सारा वीर्य और मुन्नी का पानी वे चटखारे ले ले कर निगलने लगी.