यह शाम चुपके से आई, लेकर ठंडा सा सन्नाटा।
हर याद की चिंगारी फिर जल उठी, कहाँ गया वो दाता?
देखो, उस चाँद को भी मेरे जैसा रोग है,
बस अकेलापन ही रह गया, प्रेम का हर किस्सा आधा।
हर याद की चिंगारी फिर जल उठी, कहाँ गया वो दाता?
देखो, उस चाँद को भी मेरे जैसा रोग है,
बस अकेलापन ही रह गया, प्रेम का हर किस्सा आधा।



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