मिनट घंटों की तरह खिंच गए, उनके बीच का सन्नाटा भारी,
अनकहे शब्दों से भरा हुआ। रामू का फ़ोन बजा, और उसने
जल्दी से जवाब दिया, उसकी आवाज़ कटी हुई थी। "अरुण, क्या देख रहे हो?"
उसने सुना, उसका भाव समझ में नहीं आ रहा था, फिर उसने सिर हिलाया। "अच्छा।
धन्यवाद। कुछ मत कहो।" उसने फ़ोन रख दिया, साक्षी की...