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Adultery शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

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वैशाली को देखकर शीला खुश हो गई.. उसके आने से ही पूरा घर भरा भरा सा लगने लगा.. २७ साल की फेशनेबल, भरे भरे जिस्म वाली, एकदम गोरी और बॉब कट हेयर स्टाइल वाली वैशाली.. एकदम बातुनी लड़की थी.. वो और शीला दोनों बातें करने लगे.. वैशाली ने अपने पापा के बारे में पूछा और शीला ने उसे उसके पति संजय और ससुराल के बारे में बातें की

बातों ही बातों में वैशाली ने शीला को बताया की वो ससुराल में बिल्कुल भी खुश नहीं थी.. उसका पति संजय अपने काम पर ध्यान ही नहीं देता था और बार बार नौकरियों से निकाल दिया जाता था.. पूरा दिन सिगरेट फूंकता रहता था.. शराब पीता था.. दोस्तों से ब्याज पर पैसे उधार लेता था और जब लौटा न पाएं तब शहर छोड़कर भाग जाता था.. पूरा दिन घर पर कोई न कोई वसूली करने आ पहुंचता था.. वैशाली उसे टोकती तो वो अनाब शनाब बोलकर उसे हड़का देता.. उसके सास-ससुर भी संजय की इस स्थिति के लिए वैशाली को जिम्मेदार ठहराते.. ससुर के पेंशन से घर आराम से चल तो रहा था पर उसकी सास बात पर उसे ताने मारती रहती थी। अपनी स्थिति के बारे में बताते हुए वैशाली फुट फुट कर रोने लगी.. शीला ने उसकी पीठ पर हाथ सहलाकर उसे शांत किया.. अपनी माँ के साथ दुख बांटकर वह काफी हल्का महसूस करने लगी।

शीला: "तू चिंता मत कर बेटा.. मेरे होते हुए.. मैं सब कुछ ठीक कर दूँगी"

शीला की बात सुनकर वैशाली के दिल को थोड़ी तसल्ली मिली.. वैशाली का मूड ठीक करने के लिए शीला ने कहा "तू आराम से टीवी देख.. मैं तेरी पसंद का कुछ अच्छा खाने के लिए बना देती हूँ"

शीला किचन में गई और वैशाली पैर पर पैर चढ़ाकर आराम से टीवी देखने लगी.. मायके में आकर बेटियों को एक अनोखी शांति का एहसास होता है.. दोपहर में माँ बेटी ने खाना खाया और फिर से बातें करने लगी.. शाम के साढ़े पाँच कब बज गए पता ही नहीं चला..

शीला ने फोन करके कविता को घर बुलाया और उसकी पहचान वैशाली से करवाई..

शीला: "कविता, तू और वैशाली एक ही हमउम्र हो.. तू इसे कंपनी देना.. वैशाली, ये कविता है.. अपने अनुमौसी के बेटे पीयूष की पत्नी.. बहोत ही अच्छा स्वभाव है इसका.. तुम दोनों की साथ में अच्छी पटेगी.. "

दोनों लड़कियों की दोस्ती होने में समय नहीं लगा.. एक दिन में तो दोनों एकदम खास सहेलियाँ बन चुकी थी.. दोनों देर रात तक साथ बैठती और बातें करती रहती.. रोज रात को खाना खाने के बाद दोनों वॉक पर जाने लगी.. इन दोनों की दोस्ती से अनुमौसी और पीयूष भी बड़े खुश थे।

रात को वॉक पर जाते वक्त, वैशाली टाइट टीशर्ट और छोटी सी शॉर्ट्स पहनकर निकलती.. टीशर्ट के अंदर ब्रा भी नहीं होती थी.. चलते चलते हर कदम के साथ उसके उछलते हुए वक्ष देखकर कविता को अपने मायके की याद आ जाती.. लड़की अपने मायके में बिना किसी बंधन के कितने आराम से रहती है !! ससुराल में तो पूरा दिन "ये करो.. ये मत करो.. ऐसे मत बैठो.. ऐसे कपड़े मत पहनो" ऐसी रोकटोक में ही जीवन निकल जाता है..

वैशाली के ठुमकते जोबन को नुक्कड़ पर खड़े लड़के घूर घूरकर ताड़ते रहते.. वैशाली को उन लड़कों की नजर से कोई फरक पड़ता नहीं दिखा.. वो तो गर्व से अपना सीना तानकर उनके बगल से निकल गई.. उन लड़कों की लफंगी नज़रों से कविता शर्म से लाल हो गई

कविता: "यार वैशाली, लोग कैसी गंदी गंदी नज़रों से देख रहे है.. "

वैशाली: "देखने दे.. मुझे घंटा फरक नहीं पड़ता.. "

कविता: "पता नहीं यार.. ये लोग हमेशा हमारे बूब्स को देखकर क्या सोचते होंगे??"

वैशाली: "यहीं की एक बार टीशर्ट के अंदर हाथ डालकर दबाने मिल जाए तो मज़ा आ जाए.. हा हा हा हा.. "

वैशाली बोलने में एकदम बिंदास लड़की थी.. और स्वभाव से कामुक भी थी.. आखिर थी तो वो शीला की ही बेटी.. कोई हेंडसम लड़का दिख जाएँ तब वो भी उसे ऊपर से नीचे तक स्कैन कर लेती.. वैशाली बार बार कविता को उसकी सेक्स लाइफ के बारे में पूछती रहती.. इतना ही नहीं.. वो पीयूष के बारे में भी अलग अलग प्रश्न पूछती रहती कविता से.. वो सिर्फ पूछती ही नहीं थी.. अपने बारे में बताती भी थी

शुरू शुरू में ऐसी बातें करने में कविता को झिझक होती थी.. जब वैशाली "लंड" "चुत" और "बबलों" जैसे शब्दों का खुलकर उपयोग करती.. धीरे धीरे कविता भी वैशाली के आगे खुलने लगी..

एक बार वैशाली ने कविता से बेधड़क पूछ लिया "तूने कभी शादी से पहले किसी के साथ सेक्स किया था?"

कविता: "नहीं रे नहीं.. मैंने तो सब से पहले पीयूष के साथ ही किया था.. वैशाली तू ने किया था क्या?"

वैशाली: "हाँ किया था.. अब ये मत पूछना की किसके साथ.. क्योंकी वो मैं बता नहीं सकती.. " वैशाली ने कविता को अगला प्रश्न पूछने से रोक लिया

कविता सोचने लगी.. सब कुछ खुलकर बता रही है तो ये बताने में भला क्या हर्ज !!

कविता की ओर देखकर वैशाली ने कहा "तुझ जैसी सुंदर छुईमुई को किसी ने शादी से पहले लाइन न मारी हो ऐसा हो तो नहीं सकता.. पक्का तू मुझसे कुछ छुपा रही है"

कविता: "ऐसा कुछ भी नहीं है.. जब तू मुझे इतना सब खुलकर सब बता रही है तो फिर मुझे बताने में क्या दिक्कत होती !!!" कविता शीला की पक्की शिष्य थी.. अपने राज को कैसे दबाकर रखना वो बखूबी सीख चुकी थी। दूसरे के राज कैसे उगलवाना उसका मंत्र भी उसने शीला से ही सीखा था।

कविता ने धीरे से वैशाली से पूछा "बड़ी होशियार है तू वैशाली.. शादी से पहले ही सेक्स किया तो तुझे तेरे माँ-बाप को पता चल जाने का डर नहीं लगा था? मेरी तो ऊपर ऊपर से करवाने में ही डर के मारे जान निकल गई थी"

वैशाली ने चुटकी बजाते हुए कहा "मतलब तू जब ब्याह कर आई तब थोड़ा बहोत कर ही चुकी थी.. ऊपर ऊपर से मतलब? लंड अंदर नहीं लिया था क्या ??"

कविता: "मेरे मायके में एक लड़का था पिंटू.. मुझे बहोत पसंद था.. अभी भी मैं उसके साथ.. पर शादी से पहले मैंने कुछ नहीं किया था"

वैशाली: "ऐसा कैसे हो सकता है !! कोई भी लड़का तेरे जैसा कोरा माल बिना चोदे कैसे छोड़ देगा भला ??"

कविता: "वही तो.. मैंने काफी बार उसे मुझे चोदने के लिए कहा.. पर उसका कहना था की जब तक शादी न हो जाए तब तक वो कुछ नहीं करेगा"

वैशाली: "बड़ा आया सत्यवादी हरीशचंद्र.. इसका मतलब ये हुआ की पीयूष को सुहागरात पर सील-पेक माल ही मिला था.. पर तुझे सील-पेक माल नहीं मिला.. तुझे क्या पता की पीयूष इससे पहले किसी के साथ कर चुका है या नहीं"

कविता चोंक उठी "सच सच बता वैशाली"

वैशाली ने ठहाका लगाते हुए कहा "अरे यार बीती बातें भूल जा.. पीयूष ने सब से पहली बार मेरे साथ ही किया था.. " कविता के पैरों तले से धरती हिल गई.. चक्कर सा आने लगा उसे.. !!!!

उदास हो गई कविता और उसका चेहरा भी लटक गया.. फिर उसने सोचा की वो भी कहाँ दूध से धुली थी !! प्रत्येक परिणित स्त्री का एक भूतकाल होता ही है.. वैसे वैशाली और पीयूष का भी था.. और पीयूष की बातों ऐसा कभी प्रतीत भी नहीं हुआ की उसे वैशाली की कभी याद भी आई थी

लेकिन स्त्री-सहज ईर्ष्या होना तो स्वाभाविक था.. कविता की असमंजस को वैशाली ने परख लिया

वैशाली: "तू उदास क्यों हो गई?? टेंशन मत ले.. मेरे और पीयूष के बीच जो कुछ भी हुआ था वो पुरानी बात है.. और वह एक भूल ही थी.. जो नादान उम्र के बच्चे अक्सर करते है.. और तेरा भी ऐसा ही भूतकाल पिंटू के साथ भी रहा ही है ना.. !! १७ से २२ की उम्र ही ऐसी होती है.. शरीर विकसित हो जाता है.. अन्तःस्त्राव शुरू हो जाते है.. दिल पंछी की तरह उड़कर अलग अलग डाल पर बैठने लगता है.. विजातीय आकर्षण होने लगता है.. मायके में दिल के अंदर बसे प्रियतम को भूलकर वह अन्य व्यक्ति के साथ अपने जीवन की शुरुआत करते ही सब कुछ भूल जाती है.. "

कविता को वैशाली की बात ठीक लगी.. "सच बॉल रही है तू वैशाली.. मैं भी जवान हुई तभी पिंटू के साथ प्रेम विकसित हुआ था.. मुझे ये बता.. शादी के बाद तुझे किसी के लिए आकर्षण हुआ है कभी??"

वैशाली बोलने में बिंदास थी.. "जिंदगी बिताने के लिए पति और प्रेमी दोनों की आवश्यकता होती है.. वरना जीने में मज़ा ही नहीं आता.. पति जब हमारा दिल दुखाएं तब सहारे के लिए एक कंधा तो चाहिए ना !! अपना दर्द बांटने के लिए कोई होना तो चाहिए.. मेरे तो पर्सनल प्रॉब्लेम इतने है की अगर मेरा प्रेमी नहीं होता तो अब तक पंखे से लटक गई होती"

इंसान जब अपने जीवन के दर्द भरे पन्ने किसी के सामने खोलता है तब दुख और दर्द उसकी इंतहाँ पर होते है.. वैशाली अपनी दास्तां सुनाती गई

"शादी के बाद मम्मी पापा का घर छोड़ा.. उसके साथ ही खुशी और सुख क्या होते है.. मैं तो जैसे भूल ही गई.. पापा के घर मुझे एक भी काम नहीं करना पड़ता था.. पापा अक्सर मुझे टोकते.. कहते की कामकाज सिख ले वरना ससुराल में बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ेगा.. आज उनकी कही सारी बातें याद आ रही है.. संजय से शादी के पहले पाँच साल तो बड़े ही शानदार तरीके से बीते.. पहला झटका तब लगा जब मुझे संजय के अफेर के बारे में पता चला.. मैं आज तक समझ नहीं पाई.. मैंने उसे हर तरह से खुश रखा था.. ऐसी कौन सी कमी थी मुझ में जो संजय को किसी और के पास जाना पड़ा !!! उसे जो चाहिए था मैंने सब कुछ दिया.. किसी बात के लिए कभी जिद नहीं की.. उसकी हर बात मानती थी मैं.. अरे शुरुआत के दिनों में उसे पूरा दिन सेक्स की चूल मची रहती.. एक रात में चार चार बार.. कभी कभी पाँच बार सेक्स करते.. मैंने कभी मना नहीं किया.. बिना सोये पूरी रात चुदवाने के बावजूद में सुबह जल्दी उठ जाती.. तुझे पता है ना.. की चुदाई के बाद कैसी नींद आती है!! संजय तो हल्का होकर देर तक सोते हुए अपनी थकान उतारता.. पर मैं घर के सारे काम में व्यस्त हो जाती.. दोपहर को जब थोड़ा सा आराम करने बिस्तर पर लेटती.. संजय फिर से तैयार हो जाता.. और कम से कम दो बार सेक्स करने के बाद ही दम लेता.. मैं ये सोचकर सब कुछ बर्दाश्त करती की आखिर पति है वो मेरा.. उसे हक है मेरे शरीर को भोगने का.. पर इतना सब करने के बाद भी जब वो किसी और के साथ मुंह मारने लगा.. " वैशाली आगे बोल नहीं पाई

"कौन थी वो? नाम क्या था उसका? तूने उसे सबक सिखाया की नहीं?" कविता ने पूछा

वैशाली ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा "यार.. जब अपना सिक्का ही खोटा हो तो गैरों को बोलकर क्या फायदा !! संजय कुछ कमाता तो था नहीं. बस दिन भर बिस्तर पर पड़ा रहता और मौका मिलते ही मेरी टांगें चौड़ी करके मेरे छेद में घुसा देता.. उसे २४ घंटे चुदाई के अलावा और कुछ सूझता ही नहीं थी.. तंग आ गई थी मैं उस ज़िंदगी से.. जब पति ही ऐसा हो तो कैसे कटेगी पूरी ज़िंदगी उसके साथ !! तभी मैंने दूसरा साथी तलाश लिया.. लाखों में एक है वो कविता.. अपने एरिया में ही रहता ही.. अब तक हम सिर्फ बातें ही करते है.. मेरा ससुराल नजदीक होता तो हम मिल भी पाते.. पर कलकत्ता में रहते हुए ये मुमकिन हो न सका.. तुझे पता है कविता.. एक तरफ मेरा पति है जिसके दिमाग में हर वक्त औरतों को भोगने का जुनून सवार रहता है.. स्त्री को हमेशा एक साधन की तरह ही इस्तेमाल करता है.. जब देखो तब मुझे कहता रहता है "अरे वो देख वो लड़की की गांड कितनी मस्त है.. आह्ह वो वाली की चूचियाँ" मुझे तो बोलने में भी शर्म आती है.. कभी कभी तो मेरी मम्मी के बारे में भी गंदी गंदी बातें करता है.. दूसरी तरह मेरा प्रेमी.. जो इतने दूर रहकर भी मुझे शब्दों से सहारा देता है.. मेरी हिम्मत बढ़ाता है.. मेरी बात सुनता है.. मेरे दर्द बांटता है.. और इसके बदले उसने कभी मुझसे कुछ भी नहीं मांगा.. हिम्मत है उसका नाम.. आई लव हिम्मत" वैशाली भावुक हो गई

कविता: "ऐसे हरामजादे मर्दों को तो गोली मार देनी चाहिए.."

वैशाली: "नसीब की बलिहारी तो देख कविता.. हिम्मत की पत्नी का चार महीने पहले ही देहांत हो गया.. सिर्फ ८ साल में ही उसका गृहस्थ जीवन समाप्त हो गया.. फिर भी इस नाजुक वक्त पर में उसे सहारा न दे पाई.. "

कविता: "इतनी छोटी उम्र में ही हिम्मत की पत्नी चल बसी?? क्या हुआ था उसे?"

वैशाली: "हिम्मत की बीवी को गर्भाशय का केन्सर था.. अकेला पड़ गया है बेचारा.. अच्छे लोगों के साथ ही ऐसा क्यों होता है? तू मानेगी नहीं.. हिम्मत अपनी बीवी की मौजूदगी में मुझसे बातें करता.. अब बता.. कोई पत्नी ऐसा बर्दाश्त कर सकती है भला?? पर संध्या ने कभी एतराज नहीं जताया.. बहोत ही अच्छी थी संध्या.. हिम्मत संध्या से कभी कुछ भी छुपाता नहीं था.. कभी कभार संध्या भी मुझसे बात करती और मेरा होसला बढ़ाती.. संजय जब घर पर नहीं होता था तब मैं घंटों हिम्मत से बात करती थी.. सिर्फ उसी की बदौलत मैं अब तक संजय के साथ टीक पाई हूँ.. आज मैं हिम्मत से भी ज्यादा संध्या को मिस कर रही हूँ" वैशाली की आँखों से आँसू टपकने लगे

वैशाली ने बात आगे बढ़ाई "शादी से पहले के इस प्यार को हम दोनों ने मेरी शादी के बाद दफना दिया था.. कभी उसने मुझे आई लव यू तक नहीं कहा.. बस दोस्ती का रिश्ता ही रखा था.. संध्या ने एक बार मुझे कहा था की उनकी शादी से पहले ही हिम्मत ने उसे मेरे बारे में बता दिया था। ऐसा ईमानदार इंसान अब कहाँ मिलेगा!! " वैशाली के शब्दों के दर्द ने कविता को भी हिला दिया

कविता: "तू चार दिन से आई है.. फोन किया की नहीं?"

वैशाली: "नहीं यार.. उसकी पत्नी को मरे कुछ ही महीने हुए है.. मैं अकेली उसके घर जाऊँगी तो लोगों को बातें बनाने का मौका मिल जाएगा.. मम्मी को लेकर तो जा नहीं सकती.. कोई साथ हो तो ठीक है.. पर अकेले जाने में लोग तरह तरह की बातें करेंगे और बेकार में हिम्मत परेशान हो जाएगा"

कविता: "तुझे एतराज न हो तो मैं तेरे साथ चलूँ?"

वैशाली: "मुझे क्यों एतराज होगा भला.. और अगर होता तो मैं ये सब बातें तुझे क्यों बताती !! पर सिर्फ हम दो लड़कियां उस अकेले मर्द के घर जाएगी तो अच्छा नहीं लगेगा.. कोई मर्द साथ होता तो फिर किसी के मन में कोई शक ही पैदा नहीं होगा. पर किसे लेकर जाएँ यही प्रॉब्लेम है.. खैर मेरे प्रॉब्लेम तो चलते ही रहेंगे.. तू अपनी बता.. पिंटू के साथ तेरे संबंध कैसे थे?"

कविता ने अथ से इति तक सब कुछ बताया पिंटू के बारे में.. बात करते करते वो शर्म के मारी लाल लाल हो गई

वैशाली: "बड़ी किस्मत वाली है तू.. कम से कम तेरा प्रेमी नजदीक तो है.. जब चाहे उसे देख सकती है तू.. पर ये बता की शादी के बाद तूने उससे संबंध कैसे बनाए रखे?? तेरे घर पर सास ससुर हमेशा रहते है.. तुम लोग कैसे मिलते हो फिर?"

कविता: "यार हम लोग कभी कभार तेरे घर पर ही मिलते है.. तेरी मम्मी को सब कुछ पता है इसके बारे में... "

वैशाली चकित हो गई "मम्मी ऐसी बातों में तुझे सपोर्ट कर रही है ये ताज्जुब की बात है.. वैसे मम्मी बड़ी स्ट्रिक्ट है.. "

कविता: "बहोत दिन हो गए है यार उसे मिले हुए.. अब रहा नहीं जाता "

वैशाली: "मतलब तुम दोनों जब भी मिलते हो तब सेक्स भी करते हो?"

कविता ने जवाब नहीं दिया बस "हाँ" कहते हुए गर्दन हिलाई फिर धीरे से बोली "अकेले में मिलना होता है तब करते है.. बहोत मज़ा आता है उसके साथ.. वैसा मज़ा तो मुझे पीयूष के साथ भी नहीं आता कभी"

वैशाली: "वैसा ही होता है.. घर की मुर्गी दाल बराबर"

कविता: "मुझे एक आइडिया आया है वैशाली"

वैशाली: "तो बता ना.. "

कविता: "तु हिम्मत को मिलने के लिए अपने घर ही बुला ले.. मैं शीला भाभी को २ घंटों के लिए कहीं बाहर ले जाऊँगी"

वैशाली सोच में पड़ गई.. "वो तो ठीक है यार.. पर मुझे डर लगता है"

कविता: "डरने वाली कौन सी बात है? तेरी मम्मी तो मेरे साथ ही होगी"

सुनते ही वैशाली की आँखें चमकने लगी.. संजय से वो इतनी नफरत करती थी की हिम्मत से अकेले में मिलने के खयाल मात्र से उसकी पेन्टी गीली होने लगी.. "यार ऐसा कुछ सेटिंग हो तो मज़ा आ जाएगा.. हिम्मत को और मुझे एकांत की सख्त जरूरत है.. मैं कुछ करती हूँ"

दोनों बातें करते करते घर पहुंचे और अपने अपने घर चले गए। वैशाली जब दरवाजा खोलकर अंदर आ रही थी तब उसने खिड़की से देखा की मम्मी किसी से फोन पर हंस हँसकर बात कर रही थी.. वैशाली को देखते ही उसने फोन काट दिया.. पर यह बात वैशाली के दिमाग मे नोट हो गई थी

"काफी दोस्ती हो गई है तेरी और कविता की.. हैं ना.. !! मैंने कहा था ना तुझे.. बहुत अच्छी लड़की है.. मेरे साथ भी उसकी अच्छी पटती है.. " अपने मोबाइल पर नजर रखे हुए शीला ने कहा


वैशाली: "हाँ मम्मी.. कविता बहोत ही अच्छी लड़की है"
बहुत ही सुंदर लाजवाब और अद्भुत रमणिय अपडेट है भाई मजा आ गया
शीला की बेटी वैशाली कविता की दोस्त बन गयी
दोनों साथ में घूमते हुए अपनी अपनी जिंदगी का सार एकमेक साथ बाटकर अपना सुख दुख बाट लिया
जो बहुत ही क्लेशदायक हैं
वैशाली के बेरंग जीवन में कुछ आनंद के पल लाने में कविता पुर्ण रुप से उसके साथ खडी हो गई है
खैर देखते हैं आगे क्या होता है
अगले रोमांचकारी धमाकेदार और चुदाईदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा
 

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वैशाली को देखकर शीला खुश हो गई.. उसके आने से ही पूरा घर भरा भरा सा लगने लगा.. २७ साल की फेशनेबल, भरे भरे जिस्म वाली, एकदम गोरी और बॉब कट हेयर स्टाइल वाली वैशाली.. एकदम बातुनी लड़की थी.. वो और शीला दोनों बातें करने लगे.. वैशाली ने अपने पापा के बारे में पूछा और शीला ने उसे उसके पति संजय और ससुराल के बारे में बातें की

बातों ही बातों में वैशाली ने शीला को बताया की वो ससुराल में बिल्कुल भी खुश नहीं थी.. उसका पति संजय अपने काम पर ध्यान ही नहीं देता था और बार बार नौकरियों से निकाल दिया जाता था.. पूरा दिन सिगरेट फूंकता रहता था.. शराब पीता था.. दोस्तों से ब्याज पर पैसे उधार लेता था और जब लौटा न पाएं तब शहर छोड़कर भाग जाता था.. पूरा दिन घर पर कोई न कोई वसूली करने आ पहुंचता था.. वैशाली उसे टोकती तो वो अनाब शनाब बोलकर उसे हड़का देता.. उसके सास-ससुर भी संजय की इस स्थिति के लिए वैशाली को जिम्मेदार ठहराते.. ससुर के पेंशन से घर आराम से चल तो रहा था पर उसकी सास बात पर उसे ताने मारती रहती थी। अपनी स्थिति के बारे में बताते हुए वैशाली फुट फुट कर रोने लगी.. शीला ने उसकी पीठ पर हाथ सहलाकर उसे शांत किया.. अपनी माँ के साथ दुख बांटकर वह काफी हल्का महसूस करने लगी।

शीला: "तू चिंता मत कर बेटा.. मेरे होते हुए.. मैं सब कुछ ठीक कर दूँगी"

शीला की बात सुनकर वैशाली के दिल को थोड़ी तसल्ली मिली.. वैशाली का मूड ठीक करने के लिए शीला ने कहा "तू आराम से टीवी देख.. मैं तेरी पसंद का कुछ अच्छा खाने के लिए बना देती हूँ"

शीला किचन में गई और वैशाली पैर पर पैर चढ़ाकर आराम से टीवी देखने लगी.. मायके में आकर बेटियों को एक अनोखी शांति का एहसास होता है.. दोपहर में माँ बेटी ने खाना खाया और फिर से बातें करने लगी.. शाम के साढ़े पाँच कब बज गए पता ही नहीं चला..

शीला ने फोन करके कविता को घर बुलाया और उसकी पहचान वैशाली से करवाई..

शीला: "कविता, तू और वैशाली एक ही हमउम्र हो.. तू इसे कंपनी देना.. वैशाली, ये कविता है.. अपने अनुमौसी के बेटे पीयूष की पत्नी.. बहोत ही अच्छा स्वभाव है इसका.. तुम दोनों की साथ में अच्छी पटेगी.. "

दोनों लड़कियों की दोस्ती होने में समय नहीं लगा.. एक दिन में तो दोनों एकदम खास सहेलियाँ बन चुकी थी.. दोनों देर रात तक साथ बैठती और बातें करती रहती.. रोज रात को खाना खाने के बाद दोनों वॉक पर जाने लगी.. इन दोनों की दोस्ती से अनुमौसी और पीयूष भी बड़े खुश थे।

रात को वॉक पर जाते वक्त, वैशाली टाइट टीशर्ट और छोटी सी शॉर्ट्स पहनकर निकलती.. टीशर्ट के अंदर ब्रा भी नहीं होती थी.. चलते चलते हर कदम के साथ उसके उछलते हुए वक्ष देखकर कविता को अपने मायके की याद आ जाती.. लड़की अपने मायके में बिना किसी बंधन के कितने आराम से रहती है !! ससुराल में तो पूरा दिन "ये करो.. ये मत करो.. ऐसे मत बैठो.. ऐसे कपड़े मत पहनो" ऐसी रोकटोक में ही जीवन निकल जाता है..

वैशाली के ठुमकते जोबन को नुक्कड़ पर खड़े लड़के घूर घूरकर ताड़ते रहते.. वैशाली को उन लड़कों की नजर से कोई फरक पड़ता नहीं दिखा.. वो तो गर्व से अपना सीना तानकर उनके बगल से निकल गई.. उन लड़कों की लफंगी नज़रों से कविता शर्म से लाल हो गई

कविता: "यार वैशाली, लोग कैसी गंदी गंदी नज़रों से देख रहे है.. "

वैशाली: "देखने दे.. मुझे घंटा फरक नहीं पड़ता.. "

कविता: "पता नहीं यार.. ये लोग हमेशा हमारे बूब्स को देखकर क्या सोचते होंगे??"

वैशाली: "यहीं की एक बार टीशर्ट के अंदर हाथ डालकर दबाने मिल जाए तो मज़ा आ जाए.. हा हा हा हा.. "

वैशाली बोलने में एकदम बिंदास लड़की थी.. और स्वभाव से कामुक भी थी.. आखिर थी तो वो शीला की ही बेटी.. कोई हेंडसम लड़का दिख जाएँ तब वो भी उसे ऊपर से नीचे तक स्कैन कर लेती.. वैशाली बार बार कविता को उसकी सेक्स लाइफ के बारे में पूछती रहती.. इतना ही नहीं.. वो पीयूष के बारे में भी अलग अलग प्रश्न पूछती रहती कविता से.. वो सिर्फ पूछती ही नहीं थी.. अपने बारे में बताती भी थी

शुरू शुरू में ऐसी बातें करने में कविता को झिझक होती थी.. जब वैशाली "लंड" "चुत" और "बबलों" जैसे शब्दों का खुलकर उपयोग करती.. धीरे धीरे कविता भी वैशाली के आगे खुलने लगी..

एक बार वैशाली ने कविता से बेधड़क पूछ लिया "तूने कभी शादी से पहले किसी के साथ सेक्स किया था?"

कविता: "नहीं रे नहीं.. मैंने तो सब से पहले पीयूष के साथ ही किया था.. वैशाली तू ने किया था क्या?"

वैशाली: "हाँ किया था.. अब ये मत पूछना की किसके साथ.. क्योंकी वो मैं बता नहीं सकती.. " वैशाली ने कविता को अगला प्रश्न पूछने से रोक लिया

कविता सोचने लगी.. सब कुछ खुलकर बता रही है तो ये बताने में भला क्या हर्ज !!

कविता की ओर देखकर वैशाली ने कहा "तुझ जैसी सुंदर छुईमुई को किसी ने शादी से पहले लाइन न मारी हो ऐसा हो तो नहीं सकता.. पक्का तू मुझसे कुछ छुपा रही है"

कविता: "ऐसा कुछ भी नहीं है.. जब तू मुझे इतना सब खुलकर सब बता रही है तो फिर मुझे बताने में क्या दिक्कत होती !!!" कविता शीला की पक्की शिष्य थी.. अपने राज को कैसे दबाकर रखना वो बखूबी सीख चुकी थी। दूसरे के राज कैसे उगलवाना उसका मंत्र भी उसने शीला से ही सीखा था।

कविता ने धीरे से वैशाली से पूछा "बड़ी होशियार है तू वैशाली.. शादी से पहले ही सेक्स किया तो तुझे तेरे माँ-बाप को पता चल जाने का डर नहीं लगा था? मेरी तो ऊपर ऊपर से करवाने में ही डर के मारे जान निकल गई थी"

वैशाली ने चुटकी बजाते हुए कहा "मतलब तू जब ब्याह कर आई तब थोड़ा बहोत कर ही चुकी थी.. ऊपर ऊपर से मतलब? लंड अंदर नहीं लिया था क्या ??"

कविता: "मेरे मायके में एक लड़का था पिंटू.. मुझे बहोत पसंद था.. अभी भी मैं उसके साथ.. पर शादी से पहले मैंने कुछ नहीं किया था"

वैशाली: "ऐसा कैसे हो सकता है !! कोई भी लड़का तेरे जैसा कोरा माल बिना चोदे कैसे छोड़ देगा भला ??"

कविता: "वही तो.. मैंने काफी बार उसे मुझे चोदने के लिए कहा.. पर उसका कहना था की जब तक शादी न हो जाए तब तक वो कुछ नहीं करेगा"

वैशाली: "बड़ा आया सत्यवादी हरीशचंद्र.. इसका मतलब ये हुआ की पीयूष को सुहागरात पर सील-पेक माल ही मिला था.. पर तुझे सील-पेक माल नहीं मिला.. तुझे क्या पता की पीयूष इससे पहले किसी के साथ कर चुका है या नहीं"

कविता चोंक उठी "सच सच बता वैशाली"

वैशाली ने ठहाका लगाते हुए कहा "अरे यार बीती बातें भूल जा.. पीयूष ने सब से पहली बार मेरे साथ ही किया था.. " कविता के पैरों तले से धरती हिल गई.. चक्कर सा आने लगा उसे.. !!!!

उदास हो गई कविता और उसका चेहरा भी लटक गया.. फिर उसने सोचा की वो भी कहाँ दूध से धुली थी !! प्रत्येक परिणित स्त्री का एक भूतकाल होता ही है.. वैसे वैशाली और पीयूष का भी था.. और पीयूष की बातों ऐसा कभी प्रतीत भी नहीं हुआ की उसे वैशाली की कभी याद भी आई थी

लेकिन स्त्री-सहज ईर्ष्या होना तो स्वाभाविक था.. कविता की असमंजस को वैशाली ने परख लिया

वैशाली: "तू उदास क्यों हो गई?? टेंशन मत ले.. मेरे और पीयूष के बीच जो कुछ भी हुआ था वो पुरानी बात है.. और वह एक भूल ही थी.. जो नादान उम्र के बच्चे अक्सर करते है.. और तेरा भी ऐसा ही भूतकाल पिंटू के साथ भी रहा ही है ना.. !! १७ से २२ की उम्र ही ऐसी होती है.. शरीर विकसित हो जाता है.. अन्तःस्त्राव शुरू हो जाते है.. दिल पंछी की तरह उड़कर अलग अलग डाल पर बैठने लगता है.. विजातीय आकर्षण होने लगता है.. मायके में दिल के अंदर बसे प्रियतम को भूलकर वह अन्य व्यक्ति के साथ अपने जीवन की शुरुआत करते ही सब कुछ भूल जाती है.. "

कविता को वैशाली की बात ठीक लगी.. "सच बॉल रही है तू वैशाली.. मैं भी जवान हुई तभी पिंटू के साथ प्रेम विकसित हुआ था.. मुझे ये बता.. शादी के बाद तुझे किसी के लिए आकर्षण हुआ है कभी??"

वैशाली बोलने में बिंदास थी.. "जिंदगी बिताने के लिए पति और प्रेमी दोनों की आवश्यकता होती है.. वरना जीने में मज़ा ही नहीं आता.. पति जब हमारा दिल दुखाएं तब सहारे के लिए एक कंधा तो चाहिए ना !! अपना दर्द बांटने के लिए कोई होना तो चाहिए.. मेरे तो पर्सनल प्रॉब्लेम इतने है की अगर मेरा प्रेमी नहीं होता तो अब तक पंखे से लटक गई होती"

इंसान जब अपने जीवन के दर्द भरे पन्ने किसी के सामने खोलता है तब दुख और दर्द उसकी इंतहाँ पर होते है.. वैशाली अपनी दास्तां सुनाती गई

"शादी के बाद मम्मी पापा का घर छोड़ा.. उसके साथ ही खुशी और सुख क्या होते है.. मैं तो जैसे भूल ही गई.. पापा के घर मुझे एक भी काम नहीं करना पड़ता था.. पापा अक्सर मुझे टोकते.. कहते की कामकाज सिख ले वरना ससुराल में बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ेगा.. आज उनकी कही सारी बातें याद आ रही है.. संजय से शादी के पहले पाँच साल तो बड़े ही शानदार तरीके से बीते.. पहला झटका तब लगा जब मुझे संजय के अफेर के बारे में पता चला.. मैं आज तक समझ नहीं पाई.. मैंने उसे हर तरह से खुश रखा था.. ऐसी कौन सी कमी थी मुझ में जो संजय को किसी और के पास जाना पड़ा !!! उसे जो चाहिए था मैंने सब कुछ दिया.. किसी बात के लिए कभी जिद नहीं की.. उसकी हर बात मानती थी मैं.. अरे शुरुआत के दिनों में उसे पूरा दिन सेक्स की चूल मची रहती.. एक रात में चार चार बार.. कभी कभी पाँच बार सेक्स करते.. मैंने कभी मना नहीं किया.. बिना सोये पूरी रात चुदवाने के बावजूद में सुबह जल्दी उठ जाती.. तुझे पता है ना.. की चुदाई के बाद कैसी नींद आती है!! संजय तो हल्का होकर देर तक सोते हुए अपनी थकान उतारता.. पर मैं घर के सारे काम में व्यस्त हो जाती.. दोपहर को जब थोड़ा सा आराम करने बिस्तर पर लेटती.. संजय फिर से तैयार हो जाता.. और कम से कम दो बार सेक्स करने के बाद ही दम लेता.. मैं ये सोचकर सब कुछ बर्दाश्त करती की आखिर पति है वो मेरा.. उसे हक है मेरे शरीर को भोगने का.. पर इतना सब करने के बाद भी जब वो किसी और के साथ मुंह मारने लगा.. " वैशाली आगे बोल नहीं पाई

"कौन थी वो? नाम क्या था उसका? तूने उसे सबक सिखाया की नहीं?" कविता ने पूछा

वैशाली ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा "यार.. जब अपना सिक्का ही खोटा हो तो गैरों को बोलकर क्या फायदा !! संजय कुछ कमाता तो था नहीं. बस दिन भर बिस्तर पर पड़ा रहता और मौका मिलते ही मेरी टांगें चौड़ी करके मेरे छेद में घुसा देता.. उसे २४ घंटे चुदाई के अलावा और कुछ सूझता ही नहीं थी.. तंग आ गई थी मैं उस ज़िंदगी से.. जब पति ही ऐसा हो तो कैसे कटेगी पूरी ज़िंदगी उसके साथ !! तभी मैंने दूसरा साथी तलाश लिया.. लाखों में एक है वो कविता.. अपने एरिया में ही रहता ही.. अब तक हम सिर्फ बातें ही करते है.. मेरा ससुराल नजदीक होता तो हम मिल भी पाते.. पर कलकत्ता में रहते हुए ये मुमकिन हो न सका.. तुझे पता है कविता.. एक तरफ मेरा पति है जिसके दिमाग में हर वक्त औरतों को भोगने का जुनून सवार रहता है.. स्त्री को हमेशा एक साधन की तरह ही इस्तेमाल करता है.. जब देखो तब मुझे कहता रहता है "अरे वो देख वो लड़की की गांड कितनी मस्त है.. आह्ह वो वाली की चूचियाँ" मुझे तो बोलने में भी शर्म आती है.. कभी कभी तो मेरी मम्मी के बारे में भी गंदी गंदी बातें करता है.. दूसरी तरह मेरा प्रेमी.. जो इतने दूर रहकर भी मुझे शब्दों से सहारा देता है.. मेरी हिम्मत बढ़ाता है.. मेरी बात सुनता है.. मेरे दर्द बांटता है.. और इसके बदले उसने कभी मुझसे कुछ भी नहीं मांगा.. हिम्मत है उसका नाम.. आई लव हिम्मत" वैशाली भावुक हो गई

कविता: "ऐसे हरामजादे मर्दों को तो गोली मार देनी चाहिए.."

वैशाली: "नसीब की बलिहारी तो देख कविता.. हिम्मत की पत्नी का चार महीने पहले ही देहांत हो गया.. सिर्फ ८ साल में ही उसका गृहस्थ जीवन समाप्त हो गया.. फिर भी इस नाजुक वक्त पर में उसे सहारा न दे पाई.. "

कविता: "इतनी छोटी उम्र में ही हिम्मत की पत्नी चल बसी?? क्या हुआ था उसे?"

वैशाली: "हिम्मत की बीवी को गर्भाशय का केन्सर था.. अकेला पड़ गया है बेचारा.. अच्छे लोगों के साथ ही ऐसा क्यों होता है? तू मानेगी नहीं.. हिम्मत अपनी बीवी की मौजूदगी में मुझसे बातें करता.. अब बता.. कोई पत्नी ऐसा बर्दाश्त कर सकती है भला?? पर संध्या ने कभी एतराज नहीं जताया.. बहोत ही अच्छी थी संध्या.. हिम्मत संध्या से कभी कुछ भी छुपाता नहीं था.. कभी कभार संध्या भी मुझसे बात करती और मेरा होसला बढ़ाती.. संजय जब घर पर नहीं होता था तब मैं घंटों हिम्मत से बात करती थी.. सिर्फ उसी की बदौलत मैं अब तक संजय के साथ टीक पाई हूँ.. आज मैं हिम्मत से भी ज्यादा संध्या को मिस कर रही हूँ" वैशाली की आँखों से आँसू टपकने लगे

वैशाली ने बात आगे बढ़ाई "शादी से पहले के इस प्यार को हम दोनों ने मेरी शादी के बाद दफना दिया था.. कभी उसने मुझे आई लव यू तक नहीं कहा.. बस दोस्ती का रिश्ता ही रखा था.. संध्या ने एक बार मुझे कहा था की उनकी शादी से पहले ही हिम्मत ने उसे मेरे बारे में बता दिया था। ऐसा ईमानदार इंसान अब कहाँ मिलेगा!! " वैशाली के शब्दों के दर्द ने कविता को भी हिला दिया

कविता: "तू चार दिन से आई है.. फोन किया की नहीं?"

वैशाली: "नहीं यार.. उसकी पत्नी को मरे कुछ ही महीने हुए है.. मैं अकेली उसके घर जाऊँगी तो लोगों को बातें बनाने का मौका मिल जाएगा.. मम्मी को लेकर तो जा नहीं सकती.. कोई साथ हो तो ठीक है.. पर अकेले जाने में लोग तरह तरह की बातें करेंगे और बेकार में हिम्मत परेशान हो जाएगा"

कविता: "तुझे एतराज न हो तो मैं तेरे साथ चलूँ?"

वैशाली: "मुझे क्यों एतराज होगा भला.. और अगर होता तो मैं ये सब बातें तुझे क्यों बताती !! पर सिर्फ हम दो लड़कियां उस अकेले मर्द के घर जाएगी तो अच्छा नहीं लगेगा.. कोई मर्द साथ होता तो फिर किसी के मन में कोई शक ही पैदा नहीं होगा. पर किसे लेकर जाएँ यही प्रॉब्लेम है.. खैर मेरे प्रॉब्लेम तो चलते ही रहेंगे.. तू अपनी बता.. पिंटू के साथ तेरे संबंध कैसे थे?"

कविता ने अथ से इति तक सब कुछ बताया पिंटू के बारे में.. बात करते करते वो शर्म के मारी लाल लाल हो गई

वैशाली: "बड़ी किस्मत वाली है तू.. कम से कम तेरा प्रेमी नजदीक तो है.. जब चाहे उसे देख सकती है तू.. पर ये बता की शादी के बाद तूने उससे संबंध कैसे बनाए रखे?? तेरे घर पर सास ससुर हमेशा रहते है.. तुम लोग कैसे मिलते हो फिर?"

कविता: "यार हम लोग कभी कभार तेरे घर पर ही मिलते है.. तेरी मम्मी को सब कुछ पता है इसके बारे में... "

वैशाली चकित हो गई "मम्मी ऐसी बातों में तुझे सपोर्ट कर रही है ये ताज्जुब की बात है.. वैसे मम्मी बड़ी स्ट्रिक्ट है.. "

कविता: "बहोत दिन हो गए है यार उसे मिले हुए.. अब रहा नहीं जाता "

वैशाली: "मतलब तुम दोनों जब भी मिलते हो तब सेक्स भी करते हो?"

कविता ने जवाब नहीं दिया बस "हाँ" कहते हुए गर्दन हिलाई फिर धीरे से बोली "अकेले में मिलना होता है तब करते है.. बहोत मज़ा आता है उसके साथ.. वैसा मज़ा तो मुझे पीयूष के साथ भी नहीं आता कभी"

वैशाली: "वैसा ही होता है.. घर की मुर्गी दाल बराबर"

कविता: "मुझे एक आइडिया आया है वैशाली"

वैशाली: "तो बता ना.. "

कविता: "तु हिम्मत को मिलने के लिए अपने घर ही बुला ले.. मैं शीला भाभी को २ घंटों के लिए कहीं बाहर ले जाऊँगी"

वैशाली सोच में पड़ गई.. "वो तो ठीक है यार.. पर मुझे डर लगता है"

कविता: "डरने वाली कौन सी बात है? तेरी मम्मी तो मेरे साथ ही होगी"

सुनते ही वैशाली की आँखें चमकने लगी.. संजय से वो इतनी नफरत करती थी की हिम्मत से अकेले में मिलने के खयाल मात्र से उसकी पेन्टी गीली होने लगी.. "यार ऐसा कुछ सेटिंग हो तो मज़ा आ जाएगा.. हिम्मत को और मुझे एकांत की सख्त जरूरत है.. मैं कुछ करती हूँ"

दोनों बातें करते करते घर पहुंचे और अपने अपने घर चले गए। वैशाली जब दरवाजा खोलकर अंदर आ रही थी तब उसने खिड़की से देखा की मम्मी किसी से फोन पर हंस हँसकर बात कर रही थी.. वैशाली को देखते ही उसने फोन काट दिया.. पर यह बात वैशाली के दिमाग मे नोट हो गई थी

"काफी दोस्ती हो गई है तेरी और कविता की.. हैं ना.. !! मैंने कहा था ना तुझे.. बहुत अच्छी लड़की है.. मेरे साथ भी उसकी अच्छी पटती है.. " अपने मोबाइल पर नजर रखे हुए शीला ने कहा


वैशाली: "हाँ मम्मी.. कविता बहोत ही अच्छी लड़की है"
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दूसरे दिन कविता शीला भाभी के घर आई.. और बातों बातों में कहा "भाभी, शहर के उस कोने पर एक बाबा आए है.. मैंने उनकी मन्नत रखी थी... तो मुझे उनके दर्शन करने जाना है.. आप चलोगी मेरे साथ??"

शीला: "हाँ हाँ.. क्यों नहीं.. पर किस बात की मन्नत रखी थी तूने?कोई गुड न्यूज़ है क्या??" आँख मारकर उसने कहा

कविता: "क्या भाभी आप भी!! ऐसा कुछ नहीं है.. मैंने तो पीयूष की नौकरी के लिए मन्नत रखी थी.. अब नौकरी मिल गई है तो मुझे दर्शन करने जाना है ताकि मन्नत पूरी हो सके। "

शीला: "बहोत बढ़िया.. वैशाली, तू भी चल हमारे साथ दर्शन के लिए"

वैशाली: "नहीं मम्मी.. मेरे पिरियड्स चल रहे है.. " वैशाली ने गोली दी

शीला: "कोई बात नहीं.. तू घर पर आराम कर.. हम दो-तीन घंटों में वापिस लौट आएंगे"

वैशाली: "हाँ.. आप दोनों दर्शन के लिए हो आइए.. और कविता.. जा रही हो तो तुम गुड न्यूज़ वाली मन्नत भी मांग ही लेना बाबा से"

कविता शरमाकर चली गई

दोपहर के तीन बजे चाय पीने के बाद शीला और कविता बाबा के धर्मस्थान पर जाने के लिए निकले..

शीला: "बाप रे.. कितनी गर्मी है!! चल ऑटो ले लेते है"

जाते हुए कविता ने वैशाली को आँखों ही आँखों में इशारा कर दिया.. चालाक शीला ने कनखियों से कविता की इस हरकत को देख ही लिया

कविता: "इतनी धूप भी नहीं है भाभी.. चल कर ही जाते है.. बेकार में ऑटो वाला १०० रुपये ले लेगा" कविता चलकर जाना इसलिए चाहती थी ताकि वैशाली को ज्यादा से ज्यादा वक्त मिले

शीला का शातिर दिमाग ये सोच रहा था की आखिर कविता ने वो इशारा क्यों किया? क्या जान बूझकर वैशाली नहीं आई? घर पर रहने के पीछे क्या कारण होगा वैशाली का?
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कविता और शीला चलते चलते जैसे ही नुक्कड़ से बाहर निकले, वैशाली ने हिम्मत को फोन किया.. और उससे कहा की दो घंटों का वक्त था मिलने के लिए और वो उससे मिलना चाहती थी..

हिम्मत तुरंत ही वैशाली के घर आने के लिए निकला.. उसके घर की गली में घुसते ही पुरानी यादें ताज़ा हो गई.. जब वो कॉलेज में था तब वैशाली की एक झलक पाने के लिए रोज इस गली से गुज़रता था.. वैशाली उसे देखकर बड़ी प्यारी सी मुस्कान देती.. पूरा दिन अच्छा जाता था हिम्मत का.. कितना खुश था वो जब वैशाली ने उसकी मित्रता का स्वीकार किया था.. हिम्मत की मोटरसाइकिल ७० की स्पीड से चल रहा था फिर भी उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वक्त थम सा गया था..

हिम्मत का दिल जोरों से धड़कने लगा था.. अपनी प्रेमीका को ८ साल में पहली बार देखने वाला था.. आठ सालों में ज़िंदगी कितने उतार चढ़ावों से गुजर गई.. वैशाली की शादी के बाद हिम्मत अकेला पड़ गया था..

सुशील और संस्कारी हिम्मत बड़े ही अच्छे स्वभाव का था.. उसके संपर्क में आने के बाद वैशाली उससे बेहद प्रभावित हुई थी.. हमेशा खुशमिजाज में रहने वाला और सकरात्मकता सोच से भरा हुआ हिम्मत वैशाली को बहोत पसंद था.. वो देखने में खास नहीं था और सीधा साधा था इसलिए उसकी कोई गर्लफ्रेंड नहीं थी.. कॉलेज के बाकी लड़कों के मुकाबले हिम्मत कभी भी लड़कियों को इम्प्रेस करने की कोशिश नहीं करता था.. सामान्य दिखावे वाले हिम्मत के साथ खूबसूरत वैशाली को देखकर कॉलेज के लड़के ठंडी आहें भरते रहते थे

घर की डोरबेल दबाते वक्त भी हिम्मत के हाथ कांप रहे थे.. आठ सालों के बाद अपनी प्रेमीका को मिलने और देखने का मौका मिल रहा था.. अपने रुमाल से उसने आँखें पोंछ ली।

हिम्मत को वो दिन याद आ गया जब वैशाली और वो आखिरी बार मिले थे.. फुट फुट कर रो रही थी वैशाली.. उसकी पीठ सहलाते हुए उसने कहा था "मत रो यार.. हमारे यहाँ कोई भी लड़की कभी प्रेमीका नहीं हो सकती.. केवल मजबूर हो सकती है.. सदियों से चलता आया है ये.. कौन सी नई बात है !!"

आखिर हिम्मत ने डोरबेल बजा ही दी.. दरवाजा खुलते ही वैशाली ने उसका स्वागत किया.. पराई पराई सी लग रही थी उसे.. वो नजर भी नहीं मिला पाया

वो यंत्रवत सोफ़े पर बैठ गया और वैशाली उसके लिए पानी का ग्लास लेकर आई.. हिम्मत को देखते ही वैशाली अपनी सुध-बुध खो चुकी थी

"कैसी हो वैशु.. आई मीन.. वैशाली.. ?" पानी का ग्लास लौटाते हुए हिम्मत ने कहा

"अगर तू मुझे औपचारिकता से मिलने आया है तो अभी चला जा यहाँ से.. सालों से कान तरस रहे है मेरे.. तेरे मुंह से "वैशु" सुनने के लिए.. " इतना बोलते बोलते वैशाली थक गई

हिम्मत का ये स्वभाव था की वो गंभीर से गंभीर वातावरण को अपनी हल्की फुलकी बातों से निखार सकता था.. उसकी मृत पत्नी संध्या को ये बात जरा भी पसंद नहीं थी.. वो हमेशा कहती की हिम्मत किसी बात को लेकर सिरियस होता ही नहीं है.. जवाब में हिम्मत ये कहता की ज़िंदगी हल्की फुलकी होनी चाहिए.. वरना जीना मुश्किल हो जाएगा

हिम्मत: "एक बात बता वैशाली"

वैशाली: "नहीं बताऊँगी और जवाब भी नहीं दूँगी जब तक तू मुझे वैशु कहकर नहीं पुकारेगा.. "

हिम्मत: "ठीक है बाबा.. वैशु.. तू कलकत्ता जाकर इतनी बदसूरत कैसे हो गई? मैंने तुझे जब विदा किया था तब गुड़िया जैसी सुंदर थी तू.. मैं तुझे वैशु कहकर इसलिए नहीं पुकार रहा था क्योंकी तू पुरानी वाली वैशु जैसी लग ही नहीं रही है"

हिम्मत की बात का बुरा मानने की बजाए वैशाली को अच्छा लगा

वैशाली: "तुझ से जुड़ा होने के बाद.. जिस्म की तो छोड़.. जिंदगी में भी किसी प्रकार की सुंदरता नहीं बची.. " ग्लास को टेबल पर रखते हुए बोली

हिम्मत वैशाली के गदराए जिस्म को देखता ही रहा.. शादी के बाद लड़की के शरीर में कितने परिवर्तन आ जाते है !!!

हिम्मत: "मोटी हो गई है तू वैशु"

वैशाली: "पराई औरत को इस तरह घूर घूर कर नहीं देखते.. कहाँ गाहे तेरे वो संस्कार??" मज़ाक करते हुए वैशाली ने कहा। हालांकि हिम्मत के वही विचारों के कारण वो उससे आकर्षित हुई थी.. इसकी बदौलत ही वो बाकी लड़कों से अलग लगता था.. कॉलेंज में कभी मस्ती मस्ती में वो हिम्मत को ऐसी तैसी जगह पर छु भी ले तो हिम्मत उसे बड़ा लेक्चर सुना देता था.. और तब वैशाली का मन करता था की वो बोलत ही रहे और वो सुनती रहे..

हिम्मत को चिढ़ाने के लिए वो कभी कभार ऐसे बैठती थी की उसके स्तन हिम्मत को छु जाएँ.. तब हिम्मत उसे कहता "तू बात करने आई है या मेरी मर्दानगी की परीक्षा लेने?" हिम्मत उसे टोक कर दूरी बना लेता

पर वो पुराना समय चला गया था.. हिम्मत और वैशाली के जीवन में काफी परिवर्तन आ चुके थे। वैशाली के जीवन को संजय नाम की सूनामी ने तहस नहस कर दिया था और हिम्मत की जीवनसंगिनी की आकस्मिक मृत्यु ने उसके जीवन में भूकंप सा ला दिया था

वैशाली ने हिम्मत को दायें हाथ की हथेली को अपने हाथ में लेकर कहा "मैं अब भी तुम से बहोत प्यार करती हूँ हिम्मत" मौका मिलते ही स्त्री अपने प्रेम का इजहार जरूर करती है.. हिम्मत ने जवाब नहीं दिया

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद हिम्मत ने कहा "वैशाली, मुझे लगता है की मुझे यहाँ ज्यादा देर रुकना नहीं चाहिए"

हिम्मत सोफ़े से खड़ा हो गया..

वैशाली: "क्यों क्या हुआ? यहाँ कोई रिस्क नहीं है.. तू आराम से बैठ"

हिम्मत: "बात दरअसल ऐसी है की.. पिछले दो सालों से मैं शरीरसुख से वंचित रहा हूँ.. संध्या का केन्सर डिटेक्ट होने के बाद से लेकर उसकी मृत्यु तक.. हमारे बीच पति पत्नी वाले जिस्मानी तालुककात नहीं थे ये जाहीर सी बात है.. आज तुझे देखने के बाद मुझे कुछ कुछ होने लगा है.. इससे पहले की मुझसे कोई भूल हो जाएँ.. मुझे चले जाना चाहिए"

वैशाली: "हमारे बीच ऐसा पर्दा कब से आने लगा हिम्मत? मेरे इजहार के बाद.. मेरी हर सांस पर तेरा अधिकार हो गया था.. तूने उसका फायदा नहीं उठाया था वो तेरी सज्जनता थी.. पर अगर कुछ किया भी होता तो गलत नहीं होता.. आज भी मेरे जिस्म पर तेरा उतना ही अधिकार है, हिम्मत.. सच्चाई तो ये है की संजय के साथ सेक्स करते वक्त भी में अपने मन मैं तुझे ही याद करती हूँ.. अगर ऐसा न करती तो मैं संजय का कभी स्वीकार ही नहीं कर पाती.. आ जा हिम्मत.. और स्वीकार कर ले मेरे जिस्म का" एक ही सांस में सारी बात बोलकर वैशाली ने अपनी छाती से दुपट्टा हटाकर फेंक दिया.. उसकी भारी छातियाँ ऊपर नीचे हो रही थी.. देखकर उत्तेजित ना हो ऐसा नामर्द भी नहीं था हिम्मत

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उसने वैशाली को बाहों में भर लिया.. और काफी देर तक जकड़ कर लिपटा ही रहा.. वैशाली के भरे भरे स्तन हिम्मत की छाती से दबकर चपटे हो गए.. अपने प्रेमी की पीठ को सहलाते हुए वो उसे उसकी पत्नी संध्या की मृत्यु का आश्वासन दे रही थी.. कंधे पर गरम गरम स्पर्श होने पर वैशाली ने हिम्मत को अपनी बाहों से अलग किया.. और देखा तो वो रो रहा था.. हिम्मत के इस रूप को उसने पहली बार देखा था

वैशाली: "शांत हो जा हिम्मत... जीवन के कठिन से कठिन प्रश्न का चुटकी में हल ढूंढ लेने वाले को रोना शोभा नहीं देता.. " धड़कते दिल के साथ अपने प्रेमी को सांत्वना देने के लिए वैशाली ने अपने होंठ हिम्मत के होंठों पर रख दिए..

दोनों की आँखों से सावन-भादों बरस रहे थे.. हिम्मत वैशाली के होंठ चूसते हुए अपनी उत्तेजना को ज्यादा देर तक छुपा नहीं पाया.. वैशाली को अपनी जांघों के बीच हिम्मत के कड़े लंड के उभार का स्पर्श महसूस होने लगा

वैशाली अपना हाथ नीचे ले गई और पेंट के ऊपर से उसके लंड को सहलाया.. वस्त्र के ऊपर से भी उसे लंड की गर्मी महसूस हो रही थी.. "ओहह वैशाली.. आज क्यों मुझे ऐसा हो रहा है? मैं अपने आप पर नियंत्रण क्यों नहीं रख पा रहा हूँ?"

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वैशाली: "नियंत्रण रखने की कोई जरूरत भी नहीं है.. कुदरत के नियमों को भला कौन नियंत्रित कर पाया है.. !! इस सुख के लिए मैं सालों से तड़प रही हूँ.. आह.. प्लीज हिम्मत.. आज मुझे संतुष्ट कर दे.. तृप्त कर दे.. बहोत तरस रही हूँ मैं.. आज प्लीज अपनी सारी मर्यादा त्याग दे.. और मुझे अपने अंदर समा ले"

तब तक तो वैशाली हिम्मत के पेंट से उसके लंड को बाहर निकाल चुकी थी.. हिम्मत के लंड का कद देखकर वैशाली की उत्तेजना दोगुनी हो गई.. अद्भुत सख्ती वाला लंड वैशाली के हाथों के स्पर्श से और कठोर हो गया.. मुठ्ठी में पकड़कर लंड हिलाते हुए वैशाली हिम्मत के होंठों को चूम रही थी.. हिम्मत भी अब कामदेव के प्रभाव में आ चुका था.. उसने वैशाली के टॉप के अंदर हाथ डालकर उसके गोल मटोल स्तनों को पकड़ लिया.. दोनों एक दूसरे को नग्न कर चोद लेने की जल्दी में थे..

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दुनिया से बेखबर ये दोनों प्रेमी.. आठ सालों के बाद एक हुए थे.. वैशाली कपड़े उतारने में थोड़ी सी झिझक रही थी.. पर हिम्मत ने उसकी पेन्टी खींच कर उतार दी और नीचे बैठकर उसकी चुत को चूमने लगा.. आखिर जब उसने चुत की लकीर के बीच अपनी जीभ फेरी तब वैशाली के मुंह से "ओह्ह हिम्मत.. मर गई.. " की आवाज निकल गई..

वैशाली के स्तन उत्तेजना के मारे फूल कर गुब्बारे जैसे बन गई.. उसकी निप्पल सख्त हो गई.. हिम्मत ने वैशाली की चुत के अंदरूनी हिस्सों को चाट चाट कर कामरस से भिगो दिया.. वैशाली हिम्मत का लंड पकड़ना चाहती थी पर हिम्मत उसकी चुत को छोड़ ही नहीं रहा था.. बेहद उत्तेजित होकर वैशाली सोफ़े पर ढल गई.. और गिरते ही वो झड़ गई.. जीवन में पहली बार वो इतनी जल्दी स्खलित हुई थी.. हिम्मत के प्रेम का ऐसा प्रभाव था..

चरमोत्कर्ष पर पहुंचते ही मदमस्त हो उठी वैशाली.. थोड़ी देर तक उसकी साँसे फुली हुई रही.. बाद में वो उठी और हिम्मत को फर्श पर लिटा दिया.. हिम्मत का लंड छत की तरफ तांक रहा था.. उसके भारी अंडकोशों को मुठ्ठी में दबाकर खेलते हुए उसने हिम्मत का लंड मुंह में ले लिया.. वैसे वैशाली को लंड चूसना बिल्कुल भी पसंद नहीं था.. अपने पति से नफरत होने की एक वजह ये भी थी की संजय उससे जबरदस्ती लंड चुसवाता था.. पर हिम्मत के लिए उसके दिल से प्रेम की जो भावना जाग उठी थी उसने उसे लंड चूसने पर मजबूर सा कर दिया.. उसे जैसा मालूम था वैसे चूसने लगी.. चूसने में परफेक्शन भले ही नहीं था पर प्यार बेशुमार था.. वैशाली की चुसाई के कारण हिम्मत पागल सा हो गया..

"ओह्ह वैशु.. प्लीज स्टॉप.. आह्ह आह्ह वैशु.. ज्यादा मत कर.. तेरा मुंह गंदा हो जाएगा.. निकाल दे बाहर.. " पर वैशाली ने अपने प्रेमी का वीर्य स्त्राव अपने मुंह के अंदर ही हो जाने दिया.. प्रेमी के इस प्रसाद को बिना किसी घिन के निगल गई.. इतना विचित्र स्वाद उसने कभी नहीं चखा था पर फिर भी अपनी नापसंद को प्रेम के आगोश में छुपा लिया..

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हिम्मत का लंड झड़ने के बाद भी सख्त था.. वैशाली ने बिना एक पल गँवाए.. हिम्मत की दोनों तरफ अपनी टांगें जमाई.. कमर को नीचे लाते हुए अपने गरम गुलाबी सुराख को लंड के टोपे पर रख दिया.. हल्के से अपने जिस्म का वज़न रखते ही.. उसकी चुत हिम्मत का लंड निगल गई

"आह्ह हिम्मत.. फक.. बहुत अच्छा लग रहा है मुझे.. उफ्फ़फफ.. !!" वैशाली ने भारी आवाज में कहा

हिम्मत ने कमर उठाकर एक मजबूत धक्का दिया

"उईई माँ.. जरा धीरे से.. बहोत दिनों से कोरी पड़ी है चुत.. इसलिए तंग हो गई है.. धीरे धीरे धक्के लगा हिम्मत" वैशाली ने कहा

हिम्मत एक पल के लिए रुक गया.. और वैशाली के लटक रहे स्तनों को अपने हाथों से मींजने लगा.. स्तनों का मर्दन होते ही वैशाली की चुत ने गीलापन छोड़ना शुरू कर दिया.. दर्द का एहसास काम हुआ.. वो सिहरने लगी.. अब उसने अपनी कमर हिलाते हुए आगे पीछे होकर हिम्मत के लंड को अपनी चुत में मथना शुरू कर दिया.. वैशाली बेहद उत्तेजित होने लगी.. अपने पति से त्रस्त वैशाली को संजय के साथ सेक्स में कभी मज़ा नहीं आता था.. आज अपने प्रेमी के लंड को चुत के अंदर प्राप्त कर वह धन्य हो गई थी

पूरे कमरे में पक् पक् की आवाज़ें आ रही थी.. साथ ही वैशाली की सिसकियाँ भी गूंज रही थी.. टाइट चुत में हिम्मत का सख्त लंड फंस चुका था.. वैशाली की चुत की दीवारों पर जबरदस्त घर्षण होने लगा.. अपनी चुत को कसकर उसने और सख्ती से लंड को अंदर दबोचे रखा था.. और कमर हिलाते हुए पूरा आनंद ले रही थी


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५-६ मिनट की भीषण चुदाई के दरमियान वैशाली की चुत तीन बार झड़ गई.. और उसके बाद हिम्मत ने भी कस कर धक्के लगाना शुरू किया.. वैशाली के बिखरे हुए बालों को हाथ से पकड़कर हिम्मत नीचे से धक्के लगाए जा रहा था.. एक जोरदार धक्का लगाकर हिम्मत ने अपना वीर्य वैशाली की बच्चेदानी के मुख पर छोड़ दिया.. उस गरम गरम प्रवाही का एहसास वैशाली की चुत को बेहद सुकून दे रहा था.. वैशाली निढाल होकर हिम्मत की छाती पर ढल गई..
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बाबा के दर्शन करने के बाद.. शीला और कविता बाहर बनी बैठक पर आराम से बैठे थे। कविता ने देखा की आते जाते सब लोग शीला ने भरे बदन का निरीक्षण करते जा रहे थे.. शीला का गदराया शरीर इतना आकर्षक लग रहा था की देखने वाले की नजर उसके दोनों स्तनों पर.. नीचे चरबीदार पेट और उसके मध्य की गहरी नाभि पर अवश्य थम जाती.. ५५ साल की उम्र में भी शीला का जिस्म इतने लोगों को आकर्षित कर सकता था ये देख कविता अचंभित हो गई

"भाभी.. आप को तो ऊपरवाले ने दोनों हाथों से भर भर कर हुस्न दिया है" कविता ने कहा

"क्यों, क्या हुआ?"

कविता: "सब लोग आप को कैसे घूर रहे है.. " शीला की गोरी कमर पर पड़ते बल को देखकर उसने कहा

शीला: "स्त्री का रूप हमेशा मर्दों के आकर्षण का केंद्र होता है.. खिले हुए सुंदर गुलाब को भला कौन देखना नहीं चाहेगा !!"

कविता: "हाँ वो तो है.. आप हो इतनी हॉट.. !! देखने वाले की क्या गलती!!"

शीला: "कविता.. मेरे दिमाग में एक प्रश्न घूम रहा है.. अगर तू उस प्रश्न का जवाब सच सच देगी तो मैं वादा करती हूँ की तुझे रसिक का मोटा लंड दिखाऊँगी.. ये मेरा प्रोमिस है " शीला ने कविता की दुखती रग पर हाथ रख दिया

कविता: "हाँ पूछिए ना भाभी.. !!"

शीला: "वैशाली का बर्ताव मुझे आज अजीब सा लगा.. मुझे पक्का मालूम है की उसके पिरियड्स नहीं चल रहे है.. फिर उसने हमारे साथ आने से मना क्यों कर दिया?"

कविता सोच में पड़ गई.. की क्या उत्तर दे

कविता: "मुझे क्या पता भाभी.. आप के घर की बात है.. आप ही जानो"

शीला: "मेरे घर की काफी बातें तू जानती है.. रसिक के बारे में भी.. मुझे पक्का यकीन है की तू इसका कारण जानती है"

कविता चुप हो गई.. वो जानती थी की शीला भाभी ने उसे अपने जाल में फंसा लिया था.. अब उसका बचना नामुमकिन था..

शीला: "तू वैशाली की खास सहेली है.. इसलिए तुझे पूछ रही हूँ.. नहीं बताएगी तो भी जानने के मेरे पास और तरीके है.. अभी फोन करके तेरी सास को पूछूँगी तो वो भी देखकर बता देगी की मेरे घर पर अभी क्या चल रहा है.. "

कविता की फट गई.. बाप रे.. अगर शीला ने मेरी सास को अपने घर भेजा तो गजब हो जाएगा.. शीला के सामने वैशाली को आगाह करने का कोई तरीका भी नहीं था.. मेरी सास जाकर देखे और शीला भाभी को बताएं उससे अच्छा मैं ही बता देती हूँ.. रसिक का देखने भी मिल जाएगा

कविता ने वैशाली का पेपर लीक कर दिया

कविता: "भाभी.. वैशाली अपने पति के साथ खुश नहीं है.. वो अपने पुराने दोस्त से अकेले मिलना चाहती थी.. इसलिए मैंने आज दर्शन का बहाना बनाया"

शीला: "कौन है उसका पुराना फ्रेंड?"

झिझकते हुए कविता ने वैशाली के जीवन के निजी पन्नों को खोल तो दिया था पर नाम बताने से घबरा रही थी.. "वो तो मुझे नहीं पता.. " जानते हुए भी अनजान बनी रही कविता

शीला गहरी सोच में पड़ गई.. कौन हो सकता है.. !! राकेश.. विपुल.. अनिकेत.. मनीष.. ??? शीला दिमाग पर जोर डाल रही थी... तभी शीला को अचानक याद आया.. हिम्मत .. !! हाँ वही होना चाहिए.. उस दिन तेज बारिश में वैशाली को नोट्स देने आया था.. पक्का वही होगा

शीला: "कविता.. वैशाली के उस दोस्त को मैं अच्छी तरह जानती हूँ.. हिम्मत नाम है उसका.. कॉलेज के समय उन दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती थी "

कविता के चेहरे के हाव भाव देखकर शीला को यकीन हो गया था की उसका निशान सही जगह लगा था

शीला: "शादी शुदा लड़की को ऐसा जोखिम नहीं उठाना चाहिए.. संजय को पता चल गया तो.. !!"

कविता: "भाभी.. आप और मैं भी तो ये जोखिम उठा ही रहे है ना.. !!"

कविता ने शीला का मुंह बंद कर दिया..

शीला: "चल अब घर चलते है.. " शीला खड़ी हो गई

कविता: "आप प्लीज वैशाली को इस बारे में कुछ मत बोलना.. उसे पता चल जाएगा की मैंने ही आपको बता दिया.. हमारी दोस्ती टूट जाएगी"

शीला: "पागल है क्या? मैं नहीं बताऊँगी.. तू चिंता मत कर"

कविता का टेंशन कम हुआ.. दोनों चलते चलते अपने घर आए.. वैशाली ने पूरा ड्रॉइंगरूम साफ कर सब ठीक ठाक कर दिया था.. उसे झाड़ू लगाते देख शीला को आश्चर्य हुआ.. वैशाली कभी भी घर के कामों में हाथ नहीं बँटाती थी.. इंसान अपने पाप छुपाने के लिए क्या क्या करता है !!


शीला ने बड़े ध्यान से वैशाली की चाल और उसका चेहरा देखा.. उसकी अनुभवी आँखों ने परख लिया.. संभोग के आनंद के बाद जैसी चमक स्त्री के चेहरे पर होती है.. वही वैशाली के चेहरे पर थी.. जिस तेजी और चपलता से वैशाली घर का काम कर रही थी वो देखकर ही प्रतीत हो रहा था की बेटी ने अपने प्रेमी के संग मजे किए थे

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