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Incest घर-पड़ोस की चूत और गांड़, घर के घोड़े देंगे फाड़

ajey11

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पूर्णतः कौटुंभिक व्यभिचार (Incest) पर आधारित कहानी है, इसे न पसंद करने वाले इससे दूर रहें अन्यथा वह स्वयं जिम्मेदार होंगे। कहानी के सभी पात्र व सभी स्थान काल्पनिक हैं। यदि किसी के साथ यह कहानी सटीक बैठती है तो यह मात्र एक संयोग होगा।
पात्र: परिवार का मुखिया चंद्रभान 44 वर्ष, पत्नी प्रेमलता 'प्रेमा ' 38 वर्ष, बेटा राजू , बेटी अंजलि
चंद्रभान का भाई जमुना प्रसाद 42वर्ष, पत्नी सविता बेटा अंबर, बेटी किरन और कंचन। सारे पात्र मतदान योग्य हैं।
अन्य पात्रों का कहानी के साथ ही उल्लेख होगा।​
मूल परिवेश - ग्रामीण


अनुरोध: कहानी पूरी तरह हिंदी में है किंतु इस कहानी की पृष्ठ भूमि में अवधी भाषी पात्र हैं अतः आप लोग यहां की गालियों को समझने में असमर्थ न हों इसलिए आपका ध्यान निम्न की ओर आकर्षित है:
गांड़चोदी: जिसकी गांड़ मारी जाती हो।
गांड़चोदव: जो गांड़ मरवाती हो।
बुरचोदी/ चूतचोदी: जिसकी बुर चोदी जाती हो
बुरचोदव: जो बुर चुदवाती हो।
घोड़ाचोदी/ गदहाचोदी: गुस्से में या बहुत ही कामुक माहौल में दी जाने वाली सांकेतिक गाली मतलब आप समझ गए होंगे।
बुजरी/ बुजरौ: जिसकी बुर जली हो।
एक आधी जगह बुलाने के लिए प्रयुक्त नाम के आगे वा, इया लगा मिल जायेगा जैसे अंबर का अंबरवा, अंजली का अंजलिया आदि।

सख्त चेतावनी: इसमें आगे व्यभिचार के भिन्न और समाज में अस्वीकृत जंगली एवं काल्पनिक तरीकों का भी उल्लेख हो सकता है इसे भी नापसंद करने वाले और कमजोर दिल के इंसान इस कहानी से दूरी बनाए रखें।


 
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ajey11

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राजू और अंजलि, अंबर, किरन और कंचन पांचों साथ ही बड़े हुए । बचपन में इनके मां बाप इन्हे शौच कराने खेत में ले जाते थे लेकिन जब ये धीरे बड़े हुए ये साथ ही शौच के लिए जाते थे। जब ने गौण लैंगिक लक्षण आने शुरू हुए तो अंजलि किरण और कंचन एक साथ जाने लगीं तथा राजू और अंबर एक साथ जाने लगे। प्रारंभ में ये खुले खेत में शौच करने जाते थे लेकिन अब ये पांचों ही अरहर के खेत में जाने लगे क्योंकि इसमें दूर दूर तक दिखता नहीं।​
एक दिन राजू और अंबर शौच करने गए थे नित्य क्रिया करने के बाद अंबर को शरारत सूझी और उसने अपने लंड की चमड़ी को पीछे खींचने लगा उसमें सफेद सफेद कचरा लगा हुआ था एक प्रकार की मादक बदबू आ रही थी बचे हुए पानी से उसे धोने लगा इसी तरह राजू ने भी किया उसे भी मजा आया। इसी तरह दोनो साथ शौच जाते और बाद में लंड कर चमड़ी को पीछे खींचते । एक दिन राजू ने लंड को मुठ्ठी में भर लिया और चमड़ी पीछे खींची मजा आया तो आगे पीछे करने लगा। यही क्रिया अंबर ने भी दोहराई इसी तरह कुछ दिन बाद अम्बर ने राजू का लंड पकड़कर चमड़ी आज पीछे करने लगा राजू तो सिहर उठा उसे बहुत जादा मजा आया । फिर दोनो प्रतिदिन एक दूसरे का लंड रगड़ने लगे लेकिन लंड की चमड़ी फिर भी अलग न हुई राजू ने कहा मैं तो इसे एक दिन अलग कर दूंगा अंबर: मैं भी। इसी तरह दोनो एक दूसरे की मुट्ठ मारते धीरे धीरे चमड़ी अलग होती गई और एक दिन जोर से मुट्ठ मारने में दर्द के साथ राजू की अलग हो गई इसी तरह तीन चार दिन बाद अंबर की भी सील टूट गई। रोज रोज एक ही क्रिया करने से दोनो ही ऊब गए थे सो उन्होंने अपने लंड को एक दूसरे लड़ाना शुरू किया फिर चोदने की मुद्रा में दोनो एक दूसरे को पकड़कर आपस लंड को ही रगड़ते । एक दिन दोनो नित्यकर्म के बाद बिना मुट्ठ मारे ही उठने लगने अंबर आधा ही उठा था कि इतने राजू उसकी गांड़ पकड़कर उसम लंड घुसेडने लगा। छेद छोटा था लंड तो गया नही लेकिन राजू को मजा आया । अंबर गुस्सा हो गया ।​
इधर अंजली, किरन और कंचन में अंजली सबसे बड़ी थी । चूचियां तो तीनों का आकार ले रही थीं लेकिन झांट के बाल सबसे पहले अंजली के ही आने शुरू हुए। तब किरन और कंचन ने शौच करते समय पूछा दीदी ये आपके तो नीचे भी बाल अब आये हमारे भी आयेंगे क्या। तो किरन कहती हां हां तुम्हारे भी आयेंगे । कंचन - कब आयेंगे। अंजलि आ जायेंगे। धीरे धीरे किरन और कंचन की भी चूत के पास रोंए उगने शुरू हुए जो धीरे धीरे बड़े होने लगे लेकिन तब तक अंजलि की झांटे बड़ी बड़ी हो गईं थीं। जिससे मूतते समय कभी कोई बाल सामने उलझ जाता तो चढ्ढी में छींटे पड़ते तो उसकी सहेली ने उसे झांट के बाल बनाने जा उपाय सुझाया और उसने चुपके से अपनी झांट के बाल साफ़ कर लिए। जब दूसरे दिन खेत गई तो किरन और कंचन हैरान हो गई । दीदी आपके नीचे वाले बाल कहां गए आपके सिर के बाल तो हमेशा वैसे ही रहते हैं आप नाई की दुकान पर गई थी? अब किरन के पास कोई जवाब नही था सो उसने मूत के छींटे वाला स्पष्ट कारण बता दिया लेकिन फिर दोनों जिद करने लगीं की मुझे भी बनाना है। अंजली ने खूब समझाया की जब बड़े हो जाएं तह हटाना लेकिन हो दोनो नही मानी। अतः तय हुआ कि कल दोनो की झांट बनाई जायेगी। दूसरे दिन अंजली शेविंग मशीन ले आई और दे दिया लो बनाओं लेकिन उन दोनो ने से किसी को भी चलाना नही आता था वो भी नाजुक जगह पर चलाना था। सो उन्होंने अरहर के खेत में ही तय किया की हम लोग जिस ओर शौच करने आते हैं उससे दूर वाले छोर पर थोड़ी दूर की अरहर के पेड़ दबाकर लेटने लायक बनाकर वहीं आराम से बनाएंगे। सो तीनों ने अरहर के कई पेड़ गिराकर लेटने की जगह बना दी और सबसे पहले कंचन को सलवार और चढ्ढी उतारकर लिटवाया जैसे ही शेविंग मशीन चलाई कंचन सी सी आह आह सी दी ईई दी आह करने लगी। धीरे धीरे कंचन की झांट बन गई उसके बाद किरन को लिटाया वो इससे भी ज्यादा सिहरने लगी सी सी आह आह सी दी ईई दी आह सी सी आह।अब तो तीनों की झांट बम गई थी दूसरे दिन कंचन फिर कहने लगी दीदी आज फिर बनाओ प्लीज कल बहुत मजा आया था । अंजली - अब तो बाल ही नही हैं। तो क्या हुआ दीदी। तीनों फिर उसी जगह पर गईं और कंचन को नंगी लिटाकर दोनो उसकी चूत पर हाथ फेरने लगी उसे आज और ज्यादा मजा आ रहा था। कल तो शेविंग मशीन थी आज हाथ था आज उसने दोनों का पकड़कर चूत पर कसकर दबाना रगड़ना शुरू कर दिया अंत में उसकी चूत से थोड़ा सा सफेद लसलसा पदार्थ रिसा और वो शांत हो गई, यही प्रक्रिया किरन के साथ भी दोहराई गई उसकी चूत से ज्यादा रस निकला। और अंजलि ने तो काफी देर चूत रगड़वाई और उंगली भी डलवाई तब जाकर उसके चूत से कामरस का लावा फूट गया । कंचन जिद करने लगी की मेरे वाले से इतना नही निकला। धीरे धीरे यही आए दिन होता रहा और तीनों की चूत से कामरस का लावा फूटने लगा। तीनों ने इसी बीच चूंचियां भी मसलना सीख लिया एक दिन अंजली ने अपनी चूत पर थूकने को कहा किरन बिल्कुल नजदीक से थूका अंजली को इतना अच्छा लगा की उसने उसका मुंह अपनी चूत में भिगो दिया । इस तरह उन्होंने एक दूसरे की चूत भी चाटनी स्टार्ट कर दी। धीरे धीरे उन्हें महसूस होने लगा चूत में घुसेड़ना चाहिए। इसी तरह राजू और अंबर ने भी एक दूसरे चूसकर मुट्ठ मारने का भी तरीका ईजाद कर लिया। इन दोनो को भी महसूस होने लगा की कोई छेद हो जिसमें हम अपने लंड को घुसेड़ सकें तो मजा आ जाए।​
 
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ajey11

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अरहर के खेत में अरहर के खूब पत्ते गिरे होते हैं जिससे खेत में बैठकर मूतने पर आवाज नही आती। एक दिन राजू और अंबर मुट्ठ मारने गए थे उसी में कंचन और अंजली भी गईं हुई थी अंजली ने तेजधार से मूतना शुरू किया वहां पर पत्ते के बजाय मिट्टी थी और से तेज आवाज बनी और राजू और अंबर के कानों तक पहुंच गई। दोनों ने देखा दोनो की नंगी चिकनी गोरी गांड़ साफ दिख रही थी अंबर ने कहा जैसे मैं तेरी गांड़ मारता हूं वैसे चल अंजलि की भी मारूं । राजू: चुप साले। अंबर: तो तू जैसे मेरी गांड़ मारता है वैसे कंचन की मारना दोनो हो सकता है हम दोनो का लंड भी चूस लें और दोनो तब तक उनकी गांड़ देखते रहे जब तक चली नही गई । राजू और अम्बर दोनो ने कहा हां यार बहुत मजा आएगा और दोनो ने खूब रगड़ रगड़ के मुट्ठ मारी और खूब पानी निकला।​
एक दिन राजू अकेला गया था खेत और कंचन अकेले जा रही थी वह उसी रास्ते पर पहुंच गई जहां राजू बैठा हुआ था । राजू आ जा कंचन यहीं कर ले कहां दूर जायेगी शाम हो गई है जंगली सुअर घूमते रहते हैं। कंचन राजू के बहकावे में आ तो गई लेकिन अपनी सलवार नही खोल रही थी कह रही थी मुझे शर्म आ रही है। राजू ने कहा मुझसे कैसी शर्म पहले भी तो हम दोनो साथ जाते थे। आखिरकार उसने अपनी सलवार और चढ्ढी खोलकर बैठ गई बिल्कुल नरम चूत देखकर राजू का लंड झटके देने लग गया। तो कंचन ने कहा ये क्या हुआ तुम्हे पहले तो इससे सिर्फ पेशाब निकलता था और अब इतने ज्यादा बाल कैसे आ गए अब ये इस तरह कैसे झटका दे रहा है। राजू हां कंचन जैसे पहले ये तुम्हारे दोनो गुब्बारे जैसे नही थे अब आ गए। कंचन: ,राजू तुम्हे पता है मैं अंजली और किरण ने एक जगह इसी में बनाई है जहां हम लोग बाल बनाते हैं कहो तो मैं तुम्हारा भी बना दूंगी। ठीक है कल शाम साढ़े तीन बजे ।दोनो अलग अलग समय और निकलकर अरहर में खेत में मिल गए। कंचन राजू को वहां ले गई जहां उन्होंने जगह बना रखी थी। वहीं पर राजू को नंगा लिटाया और उसकी झांटे बनाने लगी झांटे तो बन गई लेकिन उसका लंड झटके मारने लगा। मै तो इसपर थूक भी लगाती हूं तुम भी लगवावोगे हां लगा दो उसने जैसे ही थूका राजू के लंड ने उसके ही मुंह पर थूक दिया। लंड के पानी निकलते समय राजू होश खो बैठा और उसने कंचन के मुंह को अपने लंड पर दबा दिया। मुंह की गर्माहट पाते ही लंड भी फिर खड़ा हो गया ।राजू ने आंखें बंद की और कंचन के मुंह में ही लंड को चोदने लगा और कुछ ही देर में कसकर दबाते हुए उसके आहार नाल के पास झड़ गया जिससे पूरा वीर्य उसके पेट में चला गया। कंचन कुछ समझ नहीं पाई लेकिन उसकी चूत में खुजली होने लगी किरण और अंजलि तो थी नहीं इसलिए उसने राजू से चाटने के लिए कहा। राजू को तो मजा आ गया उसने जैसे ही चूत पर मुंह रक्खा पहले से गरम चूत ने मर्द का स्पर्श पाते ही लावा उड़ेल दिया। इस प्रकार कंचन आज दो बार झड़कर खुश होकर घर चली गई।​
 

Avi12

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बहुत ही कामुक कहानी लग रही है दोस्त। किशोरावस्था में ग्रामीण बच्चे ऐसा ही करते हैं, उनकी चढ़ती जवानी का सबसे पहला निशाना वही होता है जो उनके आसपास होता है। ऐसे में परिवार और रिश्तेदारी में ही कुछ बच्चे नासमझी में ये खेल शुरू कर देते हैं।
अरहरिया में ही तो सब होत है भैया
👍✌️
 

ajey11

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अपडेट 3:​
ये पांचों तो नित अलग अलग अनुभव कर ही रहे थे। राजू और अंबर को एक और काम सौंपा गया था गोरू {गाय, बछरू (बछड़े) या भैंस} चराने का जिन्हे घर से डेढ़ किलोमीटर दूर तालाब के इर्द गिर्द चराना होता था हालांकि बरसात के दिनों में इतनी दूर नहीं जाना पड़ता था क्योंकि उस समय घर के आस पास और खाली खेतों में घनी घास उग आती थी। तालाब बड़ा था इसी तरह तालाब के उस तरफ से भी एक डेढ़ किलोमीटर दूर गांवों से लोग जानवर चराने ले आते थे। फिर जब शाम के पांच बजते तो मिट्टी के रास्ते जानवर वापिस आते और धूल उड़ने लगती इसलिए आज भी शाम का समय जब अंधेरा हो रहा होता है को अवधी लोग गौधिरिया (हिंदी -गोधूलि) कहते हैं। इसका अपना अलग ही आनंद होता था । कभी कभार जब खेत में बहुत जरूरी काम होता और मांओं को भी फुरसत न रहती तो अंजली और किरन जानवर चराने ले जाती हठ करके कंचन भी साथ हो लेती। हालांकि गांवों में उस समय इतना ईमान होता था कि अकेली लड़की भी सुनसान जगह पर मिल जाए तो कोई जबरदस्ती नहीं करता लेकिन फिर भी प्रेमा और सविता उन्हें समझा बुझा के समय से घर आने की हिदायत दे देतीं। एक बात और थी घर से एक -डेढ़ किलोमीटर दूर तालाब से जब राजू और अंबर वापिस जानवरों के ले आते तो जब घर छः सात सौ मीटर दूर रह जाता उस समय तक सब अपनी अपनी ओर निकल चुके होते अब 700 मीटर की दूरी सिर्फ राजू और अंबर के जानवर तय करते थे। वहीं पर एक बाबा तपस्या करते थे, मिट्टी की छोटी दीवार और सरपत से छाई हुई कुटिया में रहते थे बाहर एक नीम का पेड़ था। एक बार एक ब्लॉक प्रमुख ने सरकारी नल भी लगवा दिया था। बाबा ज्यादातर चैत (चैत्र या अप्रैल) और कातिक (कार्तिक या नवंबर) में क्रमशः गेहूं और धान के संचय हेतु मांगने निकलते थे। सुबह जल्दी उठना, कसरत और योग करना, प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन और तपस्या ही उनकी दिनचर्या थी। कुछ लोग उन्हें माठा (लस्सी) या खेत उगी सब्जी दे जाया करते थे। लौटते समय राजू और अंबर भी प्यास लगने पर पानी पी लिया करते थे। बाबा शाम पांच बजे तक भोजन बनाकर रख देते थे और उसके बाद विश्राम करते थे । कुटिया में दिन भर तो सूर्य का प्रकाश रहता था लेकिन साढ़े चार बजे के बाद जब सूरज पश्चिम की ओर ढलता तो प्रकाश में तीव्रता नही रह जाती थी और बाहर लगे नीम की घनेरी शाखाएं प्रकाश के रास्ते को और अवरुद्ध कर देती। एक दिन अंजली, किरन और कंचन जानवरों को लेकर वापस आ रही थी तभी कंचन ने प्यास लगने की बात कही और बाबा जी की कुटिया के पास लगे नल से पानी पीने लगी। कुटिया में कोई हलचल नहीं थी क्योंकि बाबा जी विश्राम कर रहे थे। वहीं किरन ने अपनी सलवार और चढ्ढी निकाली और नल की नाली के पास मूतने लगी नाली की मिट्टी बिल्कुल कीचड़ जैसी थी इसलिए पेशाब कीचड़ में रास्ता बनाने लगा और एक मधुर ध्वनि कंपन के साथ निकल पड़ी सुर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्र सुर्रर्रर्र ऽऽऽ. बाबा जी ने पहले सोचा था कि अंबर और राजू पानी पीने आए होंगे लेकिन अब उन्होंने सोचा कि नीलबैल (नीलगाय का नर रूप) गोबर करने आया है और आज उसको नही छोडूंगा। अक्सर नीलबैल बाबाजी की कुटिया के पास ही शाम को आकर नल के गड्ढे में पानी पीता थोड़ा इधर उधर अंगड़ाई लेता फिर गोबर करता और कभी कभी मूत कर चला जाता फिर बाबा जी को साफ करके फेंकना पड़ता नही तो उसमे गुबरैले उसमे गोली बनाते और बाबा जी कुटिया में ढकेल कर ले जाते। लेकिन जब बाबाजी ने आंख खोलकर करवट ली और बाहर झांक कर देखा तो कोई नीलबैल नही था जबकि एक सुंदर कन्या बीस तीस मीटर दूर लगे नल की नाली के पास मूत रही थी जिसकी एक दम गोरी सुडौल नरम गांड़ बाबा जी को बिल्कुल साफ दिख रही थी । किंतु कंचन अभी कच्ची थी सो बाबाजी ने ओह! अपने मन बच्ची लघुशंका कर रही है । कह कर अपना ध्यान पूरी तरह हटा लिया। किंतु इसी तरह जब एक दिन अंजली ने सलवार और चढ्ढी उतारकर गांड़ खोली और मूतने लगी तब बाबाजी की दोबारा ध्यान गया किंतु आज बाबा जी का ध्यान हटाए नही हट रहा था गोल गोल दो चबूतरे गोरी गांड़ के बीच एक सांवला छिद्र और उसके पास उगे छोटे छोटे बाल और मूतने की मधुर ध्वनि ने बाबाजी को मोह लिया आज पहली बार बाबाजी ने अपने जीवन में इस प्रकार कुंवारी कन्या की स्पष्ट गांड़ देखी थी जिसे मनभर कर देखा जा सकता था। वरना तो बाबाजी को महिलाएं रस्ता विरस्ता आते जाते मूतते हुए दिख ही जाती थी किंतु वहां ध्यान नहीं केंद्रित किया जा सकता था। खैर बाबाजी ने अपने लंड को कंट्रोल किया लेकिन थोड़ी ही देर में जैसे कछुआ अपना मुंह खोल से निकालता है लंड भी बाबा जी के ढीले लंगोट से बाहर निकल आया। बाबा जी को पता चल गया की इसमें इतने वर्षों से वीर्य संचित है अब यह बैठेगा नही और अंजली को पकड़कर या बहलाकर या मनाकर चोद भी दिया तो बेहोश हो जायेगी क्योंकि बाबा जी का बिना खड़ा हुआ एकदम काला लंड आठ इंच लंबा और साढ़े तीन इंच मोटा लटका रहता था। खड़े होने पर कितना बड़ा होगा ये बाबाजी को ही नही पता था सो बाबाजी ने लंड को लंगोट में बांधा और चुपके से निकलकर कुटिया के पीछे से जाकर उन तीनों से मिले ताकि उन्हें शक न हो बाबाजी ने देख लिया है और किरन को एक किनारे ले जाकर कहा कि अपनी मम्मी से कह देना बाबाजी ने किसी जरूरी काम के लिए बुलाया है। उसने कहा ठीक है बाबाजी।​
किरण ने यह बात अपनी मम्मी को बताई सविता ने सोचा बाबाजी ने बुलाया है तो जरूर कोई गंभीर बात होगी। दूसरे दिन सुबह शौच के उपरांत वहीं से ही सविता बाबाजी जी कुटिया के लिए निकल गई । सविता: बाबाजी आपने बुलाया था ?किरन कह रही थी। क्या हुआ? दाल वगैरह चाहिए क्या?​
बाबा: नही सविता।अब कैसे बताऊं तुम्हारे बच्चियों ने मेरी इंद्रियों का वश तुड़वा दिया।​
सविता: क्या हुआ मैं कुछ समझी नही।​
बाबा: तुम्हारी दोनो लड़कियां और प्रेमा की लड़की कल इस नल के पास,,,​
सविता: नल के पास क्या बाबाजी नल खराब कर दिया क्या बताओ मैं अभी इन हरामजादियों को दुरुस्त करके आती हूं।​
बाबाजी: वो नल के पास सलवार खोल के मूत रही थीं।​
सविता: कोई बात नही मैं उन दोनो को मना कर दूंगी।​
बाबा: लेकिन उससे मेरा मेरी इंद्रिय पर से वश छूट गया। मेरा लिंग आज चालीस साल की उम्र तक मेरे वश में था लेकिन कल शाम से आज तक बैठ नही रहा इसका क्या करूं दर्द ऊपर से हो रहा है। बीच बीच में थोड़ा सा वीर्य रिस जाता है ।​
सविता: तो मैं इसमें क्या करूं?​
बाबा: उस प्रेमा की बेटी ने मेरा इंद्रियवश भंग किया है तो मैं सोच रहा हूं की सजा भी उसे ही दूं। मै उसे ही बुला लेता लेकिन मेरा खूंटे जैसा लिंग वो संभाल नहीं पाएगी इसलिए उसे पकड़ने के लिए एक महिला जरूर चाहिए। इसलिए आपको बुलाया है। उसे लिंग के बारे में छोड़कर पूरी बात बताकर उसे सहमत करके आज दोपहर में ले आना खेत में काम के बहाने।​
सविता: अजीब आफत है । मै कोशिश करूंगी।​
और सविता जल्दी जल्दी घर आ गई​
खाना पीना करने के बाद जब फुर्सत मिली तो प्रेमा के घर गई।​
सविता : प्रेमा! क्या कर रही है।​
प्रेमा: आजा बहिनी सीधा (गेहूं पीसने के लिए पछोरकर तैयार करना) बना रही हूं आटा सिर्फ कल सुबह तक का बचा है।​
सविता : वो सब तो ठीक है पता है तुम्हरी बेटी ने बाबा जी का इंद्रियवश भंग कर दिया।​
प्रेमा: क्या बक रही है तू मेरे कुछ समझ में नहीं आ रहा है।​
सविता: तेरी बेटी बाबाजी की कुटी के सामने गांड़ खोलकर मूत रही थी अब उनका लंड काबू से बाहर हो गया बिना किसी योनि में गए अब शांत नही होगा।​
प्रेमा: तो मै क्या करूं?​
सविता: तेरी बेटी ने ये सब किया है तो तुम्हे ही कोई समाधान करना पड़ेगा आसमान से परी तो आयेगी नही।​
सविता ने प्रेमा को किसी तरह तैयार कर लिया।​
प्रेमा: चल एक ही बार की तो बात है।​
सविता: हां अंजली के पापा के साथ साथ एक और सही का कुछू घट जाएगा।​
प्रेमा: धत !​
 
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ajey11

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दोपहर हुई दोनो निकल पड़ी बाबा की कुटिया की ओर। सविता तो मन ही मन मुस्कुरा रही थी यह सोचकर की बाबाजी आज प्रेमा की कसके बजाएंगे और मै जैसे गाय के ऊपर सांड चढ़वाते हैं वैसे ही प्रेमा के ऊपर बाबाजी चढ़ेंगे। लेकिन प्रेमा ऊहापोह की स्थिति में थी उसे शर्म आ रही थी बदन में झुरझरी। भी छूट रही थी क्योंकि बाबाजी का ऊपर बदन तो लगभग नंगा ही रहता था जिसे प्रेमा ने आते जाते देखा था। बाबाजी का बदन कसरत करने की वजह से बिलकुल ठोस और चिकना था लेकिन सीने पर घने बाल थे झांट में तो एक दम जंगल लगा हुआ था।​
प्रेमा और सविता बाबाजी की सुनसान कुटिया पर पहुंच गई, बाबाजी वहीं अपना लंगोट ढीला करके विश्राम कर रहे थे।​
सविता: बाबाजी! मै प्रेमा को लेकर आ गई।​
बाबाजी ने चालाकी से लंड को पीछे खींच लिया, लंगोट सही किया और बोले आ जाओ सविता आई प्रेमा।​
सविता: चल प्रेमा अंदर​
प्रेमा: मुझे असहज लग रहा है।​
सविता: चल मै भी तो चाल रही हूं।​
दोनो अंदर गईं, बाबाजी ने एक बार फिर से पूरा वाकया प्रेमा को सुनाया तो उसे भी अब ये काम उसकी जिम्मेदारी लगने लगी । उसने कहा ठीक है बाबाजी । हालांकि इतनी दोपहर में कोई वहां नही जाता था लेकिन फिर भी बाबाजी ने कुटिया के गेट पर बांस की फट्टी से बनाया हुआ गेट रख दिया।बाबाजी ने पेट अंदर खींचकर लंड को पीछे खींच रखा था लेकिन लंड से वीर्यरस लगातार इस रहा था । बाबाजी ने सविता को इशारा किया उसने प्रेमा को घोड़ी बनने के लिए कहा। प्रेमा सविता से कहने लगी मुझे डर लग रहा है पहले मै देखूंगी कितना बड़ा है तो बाबाजी ने वही मुरझाया हुआ लंड दिखा दिया बाबाजी का बिना खड़ा हुआ आठ इंच लंबा और साढ़े तीन इंच मोटे लंड को प्रेमा झांटों के जंगल के कारण साढ़े छः इंच का समझ बैठी और घोड़ी बन गई । सविता ने प्रेमा की साड़ी और पेटीकोट एक साथ पकड़कर ऊपर खींच दिया । बाबाजी को चुदाई का कोई खास ज्ञान नहीं था लेकिन हथियार तगड़ा था और उन्हें तो सिर्फ लंड की आग बुझाने थी । बाबाजी प्रेमा के पीछे आकर खड़े हुए । बाबा ने प्रेमा की चूत हाथ से ढूंढना चाही लेकिन उन्हें गांड़ का छेद हाथ लगा क्योंकि प्रेमा ठीक से झुकी नही थी प्रेमा की गांड़ गरम गरम महसूस हुई । बाबाजी ने छेद ढूंढने के चक्कर में गांड़ में ही उंगली डाल दी। प्रेमा कसमसाने लगी। बाबाजी ने प्रेमा की रीढ़ पकड़ कर दबाई जिससे उसकी चूत थोड़ा और ऊपर आई और सविता से कहकर प्रेमा के बिलाउज का बटन खुलवा दिया क्यूंकि बाबाजी को पकड़ने के लिए कुछ नही मिल रहा था। आखिरकार बाबाजी के हाथ ने चूत का छेद ढूंढ ही लिया लेकिन बाबाजी के हाथ की दो उंगलियां प्रेमा की चूत में फिसल कर घुस गईं प्रेमा छटपटाकर मूतने लगी। बाबाजी ने उसके मूतने का इंतजार किया और सोचने लगे ये मां बेटियां दोनो मूतने में बड़ी तेज हैं और ध्वनि गजब निकलती है। प्रेमा से अब बर्दाशप्रे से बाहर हो रहा था और उसने सविता से कहा अब खड़ी क्या है जल्दी डलवा दे रे । प्रेमा की चूत का आकार बड़ा था क्यूंकि वो दो बच्चों की मां थी लेकिन बाबाजी जी को पता था कि उनका खड़ा लंड प्रेमा की चूत में नही जाएगा। तो उन्होंने एक बार फिर अपने पेट को अंदर खींचा और आधे लंड को हाथ से धकेलकर अंदर कर दिया प्रेमा बोली आह! बाबाजी ऐसे ही। प्रेमा की चूत में जाते ही बाबाजी का लंड कंट्रोल से बाहर हो गया बाबाजी जी का पेट बाहर आया और लंड फूलने लगा बाबाजी ने तुरंत पूरे लंड को अंदर कर दिया अब लंड फूलकर चार इंच का हो गया । अब प्रेमा की चूत की दीवारें चरचराने लगी जब लंड ने पूरा 12 x 4.5 इंच का आकार लिया तो प्रेमा के मुंह से तेज आवाज निकली अरे माई रे जिससे बाहर नीम के पेड़ पर बैठे पंछी भी उड़ गए । बाबा जी ने लंड को बाहर निकालना चाहा लेकिन उनका लंड प्रेमा की बुर में फंस गया था और बुर के आस पास खून रिस रहा था। प्रेमा को चक्कर आ गया। सविता और बाबा दोनो डर गए। फिर सविता ने प्रेमा की ब्लाउज और साड़ी उतार फेंकी पेटीकोट को भी सिर के रास्ते निकाल लिया। उसके बाद किसी गाय की तरह उसके सिर को सहलाने लगी और बाबाजी को उसकी दोनो चूंचियां पकड़ाई और मसलने के लिए कहा। बाबाजी ने दोनो चुचियों को पकड़कर मसला और सविता ने प्रेमा की चूत के पास सहलाना शुरू कर दिया। अब जाकर प्रेमा को थोड़ा होश आया ।( प्रेमा: बहुत धीमी आवाज में) सविता तूने आज मुझे मरवा दिया आज मै पता नही घर जा पाऊंगी या नहीं। सविता के सहलाने की वजह से प्रेमा की चूत थोड़ी ढीली हुई और प्रेमा ने इतना भावुक हो कर चार शब्द बोले थे तो उसने प्रेमा की पीठ पकड़कर उसे आगे खींच लिया बाबाजी का लंड टप्प की आवाज के साथ निकल गया । प्रेमा वहीं गिर गई। कुछ देर में उसे फिर होश आया और उसने बाबाजी का लंड देख लिया । प्रेमा डर के मारे सविता के पीछे छुप गई। बाबाजी का लंड फूलकर दर्द कर रहा था। बाबाजी ने अपने संदूक से एक लेप निकाला और सविता को दे दिया उसने प्रेमा की चूत कर लगाया प्रेमा की चूत का दर्द गायब हो गया । दोनो ने पकड़कर प्रेमा को फिर से खड़ा किया रीढ़ दबाई और लंड अंदर तक डाल दिया प्रेमा फिर बेहोश हो गई लेप ने दर्द तो गायब कर दिया लेकिन घाव को तुरंत नही ठीक कर सकता था। सविता के पास दो जिम्मेदारी थी गाय को भी घर भी ले जाना था और सांड को भी चढ़वाना था। सविता ने रिस्क लिया और प्रेमा की बेहोशी में ही बाबाजी को लंड चलाने के लिए कहा ताकि रास्ता बन जाए। बाबाजी ने लंड चलाना शुरू किया तो बिलकुल जाम था।​
सविता: बाबाजी लंड को एक बार बाहर निकालो इस पर ढेर सारा थूक लगाकर प्रेमा के उठने से पहले पेल दो।​
बाबाजी ने लंड निकाला देर सारा थूक लगाया और दोबारा लंड प्रेमा की चूत में पेल दिया।​
सविता: धक्के लगाओ बाबाजी नही तो गड़बड़ हो जाएगी।​
बाबाजी ने धक्के लगाने शुरू किए धीरे धीरे रास्ता बनना शुरू हुआ, दर्द खत्म करने वाला लेप तो लगा ही हुआ था। सविता ने बाबाजी को लंड चूत में ही डालकर चुपचाप खड़ा रहने की सलाह दी और दोनो प्रेमा के होश आने का इंतजार करती रहे। इस बीच बाबा प्रेमा की दोनो चूंचियों को मसलते रहे और सविता प्रेमा की चूत और गांड़ के इलाके को सहलाकर नरम करती रही । आखिरकार प्रेमा को होश आया उसकी चूत कई जगह छिल गई थी लेकिन दर्द गायब था। लंड अंदर बाहर होने से प्रेमा की चूत से भी काम रस बह रहा था अब उसे भी लंड का अंदर होना अच्छा लग रहा था लेकिन घोड़ी बनने के कारण वो कुछ कर नही सकती थी। उसने खुद को आगे बढ़ाया और बाबा का लंड टप्प से कर के फिर बाहर आ गया। इस बार प्रेमा ने आगे से लंड लेने के लिए मुड़ी तो सविता ने उसकी आंखे ढंक दी। बाबाजी ने दोनो हाथों से प्रेम को पकड़ा और लंड को नीचे से घुसेड़ते हुए ताबड़तोड़ धक्कों की बौछार कर दी इस बार प्रेमा को चक्कर नही आया इसलिए वो छटपटाने चिल्लाने लगी।​
प्रेमा: अअ अ रे मा आ आ आ ईईई रे कंचअ अ नवा के माई आज मरवावे ले आई है।​
आह आ ईई ईई ऊऊह आ आ आ सी ईई आह​
जब उसकी चूत चर्राने लगी तो उसने बाबाजी को नोचना शुरू कर दिया तो सविता ने उसका दोनो हाथ पकड़ रस्सी से बांध दिया । सविता ने बाबाजी को बताया और वो चोदते चोदते प्रेमा का दूध पीने लगे अब प्रेमा भी धक्के में साथ देने लगी और अब विरोध करना बंद कर दिया।​
बाबा का पूरे जीवन का वीर्य इकट्ठा था । आधे घंटे चली चुदाई में दो बार झड़ने के बावजूद बैठा नही इतने में प्रेमा पांच बार झड़ चुकी थी और वहीं गिर के सोने लगी चूत पूरी जलते वीर्य से भर गई थी। अब क्या किया जा सकता था । एक ही विकल्प था सविता की चूत मारी जाए लेकिन समस्या ये थी उसे कौन पकड़ता । फिर दोनो वापिस कैसे जाएंगी।​
सविता ने कहा प्रेमा की गांऽऽऽऽऽऽड और चुप हो गई। जब दो बच्चे निकालने वाली चूत न सह पाई बाबाजी के खूंटे तो गांड़ कैसे सह सकती थी तो यह विकल्प भी नहीं था।​
फिर सविता ने बाबाजी को प्रेमा को फिर से तैयार करने की सलाह दी । बाबाजी ने प्रेमा की दोनो चूंचियों से जबरदस्ती 200-200 ml दूध खींचा, उसके बाद सविता की सलाह पर चूत को चाटना शुरू किया। बाबाजी ने चूत को चाटने की बजाय चूसना शुरू कर दिया जिससे अंदर की कोशिकाएं बाहर की ओर खिंचने लगीं और प्रेमा को तेज गुदगुदी लगी वह आह आह आह बाबाजी अपना मूसल डाल दो आह बाबाजी इस बार अपने आसन पर बैठकर प्रेमा को अपनी गोद में बिठा लिया और उसके होंठों को चूसने लगे ।बाबाजी का लंड प्रेमा की गांड़ की दरार में घुस रहा था। प्रेमा ने मदहोशी में बाबाजी जी का लंड चूत पर लगाकर धीरे बैठ गई। इस बार बाबाजी होंठ और चूंची चाटते रहे प्रेमा ने खुद ही उछल उछलकर चुदाई की और झड़ गई । बाबाजी प्रेमा की चूत में लंड डाले हुए ही उठे साथ में ही प्रेमा को भी दोनों हाथों से उठाया और सविता को प्रेमा के दोनो हाथ पकड़ने को कहा जो इन दोनो की चुदाई देखकर अपनी चूत में उंगली कर रही थी। बाबाजी ने रफ्तार पकड़ी और सटा सट सटा सट चोदना शुरू कर दिया प्रेमा आह आह करती रही उसके आंख से आंसू भी ढुलकते रहे। करीब 35 मिनट चोदने के बाद बाबाजी का लंड झुक गया। उन्होंने तुरंत ही अपना लंगोट बांध लिया। प्रेमा निढाल हो गई । बाबाजी ने एक कपड़े से प्रेमा की बुर पोंछी और लेप लगाया, चुंचियो पर भी लेप लगाया। उसे सविता से कपड़ा पहनवाया और अपने बिस्तर पर लिटा दिया माथे पर थोड़ा पानी छिड़क दिया।​
सविता की चूत बेचारी तड़पती रही।​
सविता ने बीस मिनट बाद प्रेमा को उठाया वह उठ गई बाबा जी ने दोनो को हल्का भोजन करवाया, शरबत पिलाया तब जाकर प्रेमा का चित सही हुआ।​
बाबाजी: ठीक है फिर तुम लोग जाओ अब फिर मिलेंगे।​
प्रेमा: नही ऐसे कैसे चली जाऊंगी।​
सविता की चूत में तो आग लगी ही थी वह बोल पड़ी।​
सविता: तो क्या अपनी गांड़ फी फड़वाएगी।​
प्रेमा: नही सविता बुरचोदी... तुमने मुझे लाकर फंसा दिया ... जान तेरी चूत बाबाजी नही फाड़ेंगे तब तक नहीं जाऊंगी। प्रेमा हाथ धोने के लिए बाहर जाने को उठी लेकिन लठखड़ाकर गिर पड़ी।​
सविता: प्रेमा गांड़चोदव तुम्हे घर तक कौन छोड़ेगा।​
बाबाजी: प्रेमा! सविता सही कह रही है।​
प्रेमा: ठीक है लेकिन बाबाजी वादा करो कि एकदिन इसकी भी चूत के साथ ही गांड़ भी फाड़ोगे।​
बाबाजी: इसके बारे में सविता से पूछो।​
प्रेमा: क्यों रे सविता रण्डी मुझे क्यों बहलाकर ले आई ।​
सविता: ठीक है मै तैयार हूं जब तू कहे प्रेमा बुरचोदी ।​
प्रेमा: अब बताओ बाबाजी! जब इसे लाऊंगी तो इसकी चूत फाड़ोगे की नही?​
बाबाजी: (मन में सोचते हुए सविता ने आज मेरी बहुत मदद की है) ठीक है सविता तैयार हो तभी लाना।​
सविता सहारा देते हुए प्रेमा को घर लाई। और चंद्रभान को कमर में मोच का बहाना बता दिया ।​
 
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