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Incest "सरहद का शेर,

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बर्फ़ीली पहाड़ियों पर तैनात एक जवान

विक्रम 21 साल का जवान था —
लंबा, काँधे चौड़े, तीखी आँखें, और चेहरे पर वो गंभीरता, जो सिर्फ़ उन्हीं को आती है, जिन्होंने मौत को आँखों देखा हो। वो भारत-पाकिस्तान सीमा पर, बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों पर तैनात था, जहाँ तापमान शून्य से 15 डिग्री नीचे चला जाता था, और हर साँस एक चुनौती बन जाती थी। पर विक्रम के लिए ये सब मामूली था — क्योंकि वो उस मिट्टी का बेटा था, जिसने उसे मर्द बनना सिखाया था।

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उसकी टीम में हर कोई उसे "शेर-ए-पहाड़" कहता था। वो अकेला ऐसा जवान था, जो बिना राइफल के दुश्मन के सामने जा सकता था, सिर्फ़ अपने हौसले और चालाकी के दम पर। उसके साथी सिपाही उसकी बहादुरी के किस्से सुनाते-सुनाते थकते नहीं थे — और विक्रम मुस्कुराता हुआ सबको टाल देता था, मानो ये सब उसके लिए कोई बड़ी बात न हो।

घटना करीब 6 महीने पहले की थी। उनकी टुकड़ी को एक मुखबिर ने खबर दी कि दुश्मन की 20 लोगों की घातक टीम उनके कैंप से महज 2 किलोमीटर दूर छिपी हुई है। कर्नल सिंह ने तुरंत ऑपरेशन शुरू करने का आदेश दिया, मगर अंधेरे और बर्फीली घाटी में दुश्मन की गोलियाँ बारिश की तरह बरस रही थीं। बस एक पल — एक RPG ग्रेनेड सीधा कर्नल सिंह की ओर आया। सब चीख पड़े, पर विक्रम ने बिना किसी झिझक के अपने शरीर को कर्नल के ऊपर झोंक दिया। ग्रेनेड ने उनकी जीप को चकनाचूर कर दिया, पर विक्रम सिर्फ़ बाहरी चोटों के साथ बच गया, और कर्नल की जान बच गई।

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उस रात विक्रम ने अकेले ही 4 दुश्मनों को मार गिराया, और बाकी को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। अगली सुबह कर्नल ने पूरी टुकड़ी के सामने विक्रम को "सौर्य चक्र" के लिए नामांकित किया और कहा — "ये जवान नहीं, शेर है… और जिस देश में ऐसे शेर हों, वो कभी हार नहीं सकता।" उस दिन पूरे कैंप में विक्रम का नाम गूँज रहा था — और वो बस चुपचाप अपनी जाँघ पर लगी पट्टी को देखता रहा, मानो ये सब कोई और कर रहा हो।

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हर सिपाही विक्रम का दीवाना था — कोई उसे अपना भाई मानता था, तो कोई अपना रोल मॉडल। एक दिन उसका साथी सिपाही रणवीर बोला, "विक्रम, चल आज रात ड्यूटी मैं संभालता हूँ…" तो दूसरा हँसते हुए बोला, "नहीं-नहीं, कल उसकी ड्यूटी है… पर भई क्या बात है, तू सच में जानवर है?" विक्रम मुस्कुराता और बोलता, "जानवर हूँ तो क्या हुआ? देश की खातिर, और अपनों के लिए।"

हर रविवार को वो अपनी टुकड़ी के लिए कहानियाँ सुनाता — गाँव की, अपनी माँ और छोटी बहन की, जो उसे पागलों की तरह मिस करती थीं। हँसते हुए वो कहता, "मेरी बहना बहुत शैतान है… माँ कहती है तेरे बिना घर सूना है… पर मैं जानता हूँ, कि मेरी वर्दी ही मेरा पहला प्यार है।"

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विक्रम की माँ एक साधारण ग्रामीण महिला थीं, जिन्होंने अपने बेटे को देश की खातिर पाला था। और उसकी छोटी बहन — 19 साल की, मासूम, शैतान, और अपने भाई की दीवानी — वो हर रात अपने भाई का पुराना फोटो देखती, और आँसू बहाती। पर वो कभी रोती नहीं थी, क्योंकि उसे पता था कि उसका भाई किसी और की मुस्कान के लिए लड़ रहा है।

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विक्रम नियमित रूप से WhatsApp कॉल करता था — पर अक्सर नेटवर्क कमज़ोर होता, और वो बस अपनी माँ और बहना की आवाज़ सुनकर संतोष कर लेता था। एक दिन उसकी बहना ने वीडियो कॉल पर पूछा, "भैया… तुम कब आओगे घर?" विक्रम की आँखें नम हो गईं, पर उसने बस कहा, "जल्दी, बहना… जल्दी ही लौटूंगा।"
 

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भारत-पाकिस्तान सीमा पर तैनात हर जवान को सख्त हिदायत दी गई थी कि वो किसी भी अनजान लड़की से बात न करें, क्योंकि ISI (पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी) अक्सर हनी ट्रैप के जरिए जवानों को अपने जाल में फँसा लेती है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप — हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कड़ी निगरानी थी। सभी जवानों को साफ-साफ बता दिया गया था कि किसी भी अनजान महिला से बात करना पूरी तरह से प्रतिबंधित है।

पर कुछ दिनों बाद, कमांडिंग ऑफिसर (सीओ) को एक शिकायत मिली कि विक्रम रोज़ाना किसी लड़की से व्हाट्सएप चैट और वीडियो कॉल कर रहा है। सीओ को ये बात बहुत गंभीर लगी, क्योंकि अगर विक्रम किसी आईएसआई एजेंट के जाल में फँस गया तो ये पूरी टुकड़ी के लिए खतरा बन सकता था। उन्होंने तुरंत विक्रम के मोबाइल पर सर्विलांस लगा दिया और पूरी चैट, कॉल्स, वीडियो रिकॉर्डिंग — सब कुछ चेक किया।

जब रिपोर्ट सीओ के सामने आई, तो उनके होश उड़ गए — पर खुशी से। क्योंकि वो लड़की कोई आईएसआई एजेंट नहीं, बल्कि विक्रम की सगी बहन थी। उन्होंने तुरंत विक्रम को अपने कैबिन में बुलाया। विक्रम डरता हुआ अंदर गया, क्योंकि उसे पता था कि सर्विलांस के बारे में उसे जानकारी दे दी गई थी।

सीओ ने गंभीरता से पूछा, "विक्रम, तुम रोज़ किसी लड़की से बात करते हो? क्या तुम जानते हो कि ये कितना खतरनाक है?" विक्रम ने सीधी नज़र से जवाब दिया, "सर, वो कोई आईएसआई एजेंट नहीं है… वो मेरी छोटी बहन है। मैं उसे बहुत मिस करता हूँ, और वो भी मुझे। हम रोज़ बात नहीं कर सकते, इसलिए जब भी नेटवर्क मिलता है, एक-दूसरे का हाल पूछते हैं।"

सीओ कुछ पल विक्रम की आँखों में देखते रहे, फिर जोर से हँसने लगे। उन्होंने विक्रम के कंधे पर हाथ रखा और बोले — "यार, बहुत प्यार है तुम भाई-बहन में… खुश रहो बेटा।" फिर उन्होंने रक्षाबंधन का जिक्र होते देखा, तो पूछा, "तो इस बार राखी कैसे बँधेगी?" विक्रम ने मौका देखकर अपनी बात रखी — "सर, इस बार अगर आप मुझे दो महीने की छुट्टी दे दें… माँ और बहना बहुत मिस कर रहे हैं।" सीओ को उस बच्चे पर दया आ गई। वो बोले, "जा, बेटा… मैं तुम्हारी छुट्टी मंजूर करता हूँ।"


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विक्रम खुशी से इतना झूमा कि वो सीओ को गले लगाने ही वाला था — फिर रुका, सलामी दी, और बाहर निकला तो सारी टुकड़ी को बताता फिर रहा था कि उसे छुट्टी मिल गई है और वो राखी अपनी बहना के साथ मनाएगा।
 

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गाँव की माटी, माँ की बाहें, और बहना का इंतज़ार
(भाई की वापसी, आँसू, हँसी, और एक अनकहा प्यार)


विक्रम जब ट्रेन से उतरा, तो उसे अपने गाँव की हवा ने ऐसे घेरा जैसे कोई पुराना दोस्त गले लगा रहा हो। धूप भी नरम थी, और खेतों में हरियाली ऐसी मानो उसी के स्वागत में खिली हो। उसने बिना किसी रुकावट के, सीधा उस पुराने रिक्शे को पकड़ा जो उसे उसके घर तक छोड़ता था — वही रिक्शा, वही रास्ता, और वही पुराना पुल, जिसके नीचे वो बचपन में पत्थर फेंका करता था।

जब वो अपने घर की गली में मुड़ा, तो दूर से ही देखा — माँ चबूतरे पर बैठी थीं, पूरब की ओर मुँह किए, जैसे उसे ही देख रही हों। और बगल में उसकी छोटी बहन कावेरी — उसके हाथ में अभी-अभी कटा हुआ फूल था, जैसे उसे माला पिरोनी थी। पर फूल उसके हाथ से छूट गया, जैसे ही उसने विक्रम को देखा।

विक्रम ने अपना बैग रखा और झटके से आँगन में कदम रखा। माँ उठीं, पर उनके पैर नहीं चले — आँसू ही बोल गए। कावेरी बिना कुछ कहे दौड़ी और भाई के गले लिपट गई, जैसे दो साल की दूरी को एक पल में मिटाना हो। विक्रम ने उसे इस तरह थामा जैसे कोई अनमोल चीज़ टूटने से बचा रहा हो। उसने उसके बालों को सहलाते हुए कहा, "कितनी बड़ी हो गई है तू, कावेरी…" और कावेरी ने आँसुओं के बीच हँसते हुए कहा, "भैया, आपको आए दो साल हो गए… अब और नहीं जाना।"


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विक्रम ने कावेरी को जोरों से अपने गले लगा लिया और उसे भींच लिया... गले लगते समय उसे एहसास हुआ कि बहना अब बड़ी हो गई है उसकी विशाल छाती उसके बलिश्त सीने से कुचल गई थी...
माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा, और बोलीं, "बेटा, भूखा तो नहीं है?" ये सवाल विक्रम के सीने में ऐसे उतरा, जैसे उसे बता रहा हो — "तू आ गया, अब घर आ गया है।"

फिर विक्रम ने अपने बैग से गिफ्ट निकालना शुरू किया — पहले माँ के लिए एक रेशमी ओढ़नी, जिसे देखकर माँ ने आँखें पोंछ लीं। फिर कावेरी के लिए — एक कश्मीरी सूट, जो उसने अमृतसर से खरीदा था, और उसके साथ एक चाँदी की चूड़ी — जिसे देखकर कावेरी चुप हो गई, मानो उसे यकीन ही नहीं हो रहा कि उसका भाई इतना बड़ा हो गया है कि वो उसके लिए चूड़ी भी चुन सके।
विक्रम ने अपनी आर्मी कैप कावेरी के सर पा लगा दी और इसके गालों को चूम लिया...मां ये देख कर बहुत खुश हुई कि भाई बहन मैं कितना स्नेह भरा प्यार है...


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विक्रम ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोला, "बहना, ये तो बस शुरुआत है। जब मेरी तनख्वाह और बढ़ेगी, तो तुझे और भी खूबसूरत चीज़ें दूँगा।" कावेरी ने सूट को सीने से लगा लिया, और धीरे से बोली, "भैया… आप आ गए, बस इतना ही काफी है।"

उस दिन घर में वही पुरानी मिट्टी की खुशबू थी, माँ के हाथों की बनी पूरी, और बहना की हँसी — जो बहुत दिनों बाद पूरी जोर से गूँजी थी। रात को विक्रम जब अपने कमरे में सोने गया, तो उसके कमरे की खिड़की पर कावेरी ने एक गिलास दूध रखा था — जैसे बचपन में रखा करती थी। उसने वो गिलास उठाकर एक घूँट पिया, और उसे लगा, जैसे घर वापस आ गया हो। भाई-बहन के इस प्यार में न कोई शर्त थी, न कोई पाप — बस एक निश्छल मिलन था, जिसने विक्रम की थकी आत्मा को ठंडक दी।


रक्षाबंधन को अभी भी कई दिन बाकी थे, पर कावेरी ने अपनी राखी खुद बनानी शुरू कर दी थी। रोज़ शाम को वो अपने कमरे में बैठती, सिल्क के धागों, मोतियों, और सोने-चाँदी की बूटियों को एक-एक करके पिरोती, मानो वो कोई अनमोल हार बना रही हो। उसने कई डिज़ाइन बनाए, कुछ खारिज किए, कुछ सहेजे — क्योंकि इस बार भैया दो साल बाद घर आए थे, और राखी का धागा उनकी कलाई पर बस एक धागा नहीं, बल्कि उसका पूरा प्यार होना चाहिए था।

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घर बहुत छोटा था —
एक बड़ा कमरा, जहाँ विक्रम अपनी माँ और कावेरी के साथ सोता था, और एक छोटा-सा दूसरा कमरा, जो माँ ने स्टोर और पूजा के लिए बना रखा था। नहाने के लिए पीछे की तरफ ईंटों की एक छोटी सी ओट (बाउंड्री) बनी थी — जहाँ कावेरी और माँ बारी-बारी से नहाती थीं। कोई पक्की दीवार नहीं, बस ऊँची-ऊँची ईंटों की दीवार, जिसके ऊपर एक पुरानी चादर तान दी जाती थी ताकि बाहर से कुछ दिखे नहीं। पर अगर कोई अंदर से गुज़रे, तो नज़र पड़ सकती थी — इसलिए विक्रम को ये बात अच्छी तरह पता थी कि वो कभी उस ओर नहीं जाता, खासकर जब घर में सिर्फ कावेरी हो।

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एक दिन की बात है —
सुबह की धूप अभी नरम थी, और विक्रम बाहर खेतों की ओर टहलने गया था। माँ पड़ोस में किसी के यहाँ चली गई थीं, और कावेरी सोच रही थी कि जल्दी से नहा लिया जाए। उसने ओट में पानी गर्म किया, अपनी बाल्टी और चादर लेकर उस जगह गई — जैसे हर रोज़ जाती थी। उसने अंदर जाकर दरवाज़े की तरफ चादर तानी, कपड़े उतारे, और ठंडे पानी को अपने सिर से बहने दिया। उसे नहीं पता था कि विक्रम की टहलना आधे रास्ते में ही खत्म हो गया क्योंकि उसे बाजार से कुछ लाना था।

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विक्रम बिना किसी आवाज़ के अंदर आया, सीधा अपने कमरे में अपना बटुआ लेने के लिए। उसे नहीं पता था कि कावेरी नहा रही थी — क्योंकि उस दिन माँ घर पर थीं, और आमतौर पर वो इसी वक्त नहाती थीं। जब वो उस चादर के पास से गुज़रा, जो ओट को ढँक रही थी, तो एक झोंका हवा का चादर को हल्का सरका गया — और विक्रम ने बिना चाहे एक नज़र पड़ते ही देख लिया। उसकी बहना कावेरी, नहा रही थी, उसकी गीली चोटी पीठ पर झूल रही थी, और उसके शरीर पर पानी की बूँदें चमक रही थीं। विक्रम का दिल एक साथ बैठ गया और तेज़ धड़क उठा। उसने एक सेकंड में नज़र घुमाई, पीठ कर ली और तेज़-तेज़ कदमों से बाहर निकल गया — जैसे उसे कोई जलती हुई आग से बचा रहा हो।
विक्रम को अचानक ऐसे देख कर कावेरी घबरा गई उसने तूरंत अपनी चूत पर हाथ रख कर उसे छुपा लिया ,उसकी बड़ी बड़ी चूचियां अनवरत थी अपने भाई के सामने


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वो बाहर आकर साँसें सामान्य करने लगा। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और खुद को डाँटा — "वो तेरी बहना है, विक्रम… तू क्या कर रहा है?" पर उसके दिमाग से वो गीले बाल, वो पानी की बूँदें, वो पीठ — नहीं उतर रही थीं। उसने जल्दी से बाजार जाने का बहाना बनाया और कुछ देर के लिए घर से दूर चला गया, ताकि कावेरी को किसी शर्मिंदगी का सामना न करना पड़े।

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जब वो वापस आया, तो कावेरी अपने कमरे में बैठी थी, राखी बना रही थी। उसने अपनी आँखें नहीं उठाईं — बल्कि उसके गाल हल्के लाल थे। विक्रम ने उसे संकोच से भरी मुस्कान दी और कहा, "बहना, मैं बाजार गया था… तुम्हारे लिए नई बालियाँ लाया हूँ…" कावेरी ने कुछ नहीं कहा — बस राखी के धागों को और ज़ोर से पिरोना शुरू कर दिया। उस दिन, उस पल, दोनों के बीच एक ऐसी चुप्पी थी, जो शब्दों से बड़ी थी — पर वो चुप्पी अपवित्र नहीं, बल्कि एक गहरी शर्म और अनकही पहचान की थी।

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बाज़ार में भिड़े दोस्त, बचपन की यादें, और लड़कियों पर अटकी बात
(दोस्ती, खुशी, और कुछ अनकही बातें)


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अपनी नौकरी से दो महीने की छुट्टी लेकर विक्रम अपने गाँव लौटा था। दो साल बाद घर आया था, इसलिए उसे हर चीज़ नई-सी लग रही थी — वही गलियाँ, वही नीम का पेड़, वही चाय की दुकान जहाँ वो अपने दोस्तों के साथ बैठा करता था। माँ और कावेरी के साथ कुछ दिन गाँव में बिताने के बाद जब वो बाज़ार कुछ ज़रूरी सामान लेने गया, तो उसकी मुलाक़ात अपने बचपन के सबसे करीबी दोस्त राजू से हुई, जिससे उसे काफी समय बाद मिलना हो रहा था।

बाज़ार की गलियों में अचानक नज़रें मिलीं तो पहले दोनों को यकीन नहीं हुआ। फिर जब पहचान पक्की हुई, तो विक्रम चीखा – "राजू! ये तू है?" राजू ने भी लपककर उसे गले लगा लिया। दोनों इतने खुश थे कि कुछ देर तक एक-दूसरे को छोड़ा ही नहीं। आसपास के लोग भी मुस्कुरा रहे थे – ऐसी दोस्ती, कितनी कम देखने को मिलती है। सालों बाद मिलने का सुख ऐसा था मानो समय ने कोई फ़र्क ही न डाला हो।

राजू ने बताया कि वो अपनी बहन सना को डॉक्टर के पास लाया था,विक्रम को देख कर राजू ने मोटरसाइकिल साइड में खड़ी की...विक्रम सना को बहुत दिनों बाद देख रहा था...पहले तो छोटी सी बच्ची थी अब तो सुंदर जवान युवति मैं कन्वर्ट हो गई थी


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क्योंकि उसे बुखार था। उसने सना को डॉक्टर की वेटिंग लाइन में बैठा दिया, और विक्रम से कहा – "जब नंबर आने वाला होगा, तो सना फ़ोन कर देगी… हम यहीं कुछ देर बात कर सकते हैं।" दोनों पास की चाय की दुकान पर बैठ गए। चाय की गर्मी, पुरानी यादों की ठंडी बयार, और बीच में बचपन की वो कहानियाँ जो कभी पुरानी नहीं पड़तीं – स्कूल में मास्टर जी की डांट, मिड-डे-मील की वो रोटी जो दोस्तों के बीच बँटती थी, और वो पूराना गुल्लक जो दोनों ने आधी-आधी रकम डालकर भरा था। वो हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए।

फिर बातें आगे बढ़ीं। दोनों अब जवान हो चुके थे – विक्रम सरहद पर जान बचाता था, राजू अपने कस्बे में ही एक छोटी-सी दुकान चलाता था। बात जब लड़कियों पर आई, तो विक्रम ने चाय का कप नीचे रखा और मुस्कुराते हुए पूछा – "सुन, तूने कहीं कोई पटाया है?" विक्रम ने शर्माते हुए सिर हिलाया – "ना यार… सरहद पे रहते हुए वक़्त ही कहाँ मिलता है ऐसा करने का… और अब तो ISI के चक्कर में लड़कियों से बात करना भी मना है…" वो ठहाका मारकर हँसा, पर उसकी आँखों में थोड़ी उदासी भी थी। फिर विक्रम ने उससे पूछा – "तू कैसा है, राजू? कोई है?"

राजू चुप हो गया।
थोड़ी देर तक उसने कप में चाय घुमाई, फिर होंठों को भींचते हुए बोला – "नहीं… यानी…" वो रुका। कुछ ऐसा था जो वो कहना तो चाहता था, पर नहीं कह पा रहा था। फिर कुछ देर बाद उसने कप नीचे रखा और बोला – "यार, कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं, जिनका नाम नहीं रख सकते… ये बातें मैं तुझे कभी और बताऊँगा।" वहाँ उस आवाज़ में एक गहरा दर्द था, एक उलझन थी जो विक्रम समझ तो नहीं पाया, पर महसूस ज़रूर कर लिया। विक्रम ने उसके कंधे पर हाथ रखा और बोला – "कोई बात नहीं, राजू… जब कहेगा, मैं सुनूँगा।"

तभी राजू का फ़ोन बजा – सना ने बताया कि उसका नंबर आ गया है। राजू ने उठते हुए कहा – "चल, दोस्त… फिर मिलते हैं।" विक्रम ने उसे गले लगाया और बोला – "राजू, याद रख – दोस्त तो वही है जो बिना पूछे सुने, और बिना कहे समझे।" राजू ने उसकी ओर देखा, और बिना कुछ कहे मुस्कुराकर वहाँ से चला गया – पर उसकी आँखों में एक गहरा सवाल था, जो शायद कभी और जवाब पाए, या न पाए।

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बाज़ार की उस दुकान, कावेरी की शर्म, और भाई की चुप्पी
(नई चोली, राखी की खरीदारी, और उस दिन की गिरी हुई नज़रें)

बाज़ार में राजू से मिलने के बाद विक्रम घर की ओर लौट रहा था। चलते-चलते उसकी नज़र एक दुकान पर पड़ी, जहाँ महिलाओं और लड़कियों की काफ़ी भीड़ थी। उसने पास खड़े एक आदमी से पूछा – "भई, ये दुकान इतनी चर्चित क्यों है?" तो उसने बताया – "यहाँ बहुत अच्छे डिज़ाइन की चोली, पेटीकोट, और ब्लाउज़ मिलते हैं… और इस समय रक्षाबंधन पर सेल भी चल रही है।"

विक्रम ने सोचा – "क्यों न कावेरी के लिए कुछ ले लूँ?" पर फिर उसे ख़याल आया – किसी लड़की की पसंद का क्या पता? बेहतर होगा कि उसे खुद ले आऊँ, ताकि वो अपनी मर्ज़ी की चीज़ चुन सके। वो घर आया, और माँ-बहन से दुकान का ज़िक्र किया। कावेरी की आँखें चमक उठीं – "भैया, मैंने भी सुना है… बहुत मशहूर है, पर बहुत महँगी भी है।" विक्रम बोला – "तू चिंता मत कर, बहना। मैं तुझे ले जाऊँगा, जो पसंद आए ले लेना।"

कावेरी ने आँखें झुका लीं – "ठीक है भैया… पर आज नहीं, मुझे अपनी सहेली सना के यहाँ जाना है।"
दोनों के बीच फिर वही ख़ामोशी छा गई — जो उस दिन की घटना के बाद से बनी हुई थी।
न कोई नज़र, न कोई बात — बस बीच की वो दूरी, जो शब्दों से नहीं, बल्कि शर्म से बनी थी।
शायद इसीलिए कावेरी उस दिन बाज़ार नहीं जाना चाहती थी — क्योंकि अकेले भाई के साथ कहीं जाने में अब वो थोड़ा और सोचती थी।


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माँ ने उस दिन खासतौर पर विक्रम के लिए पूरी सब्जी बनाई थी — उसकी पसंदीदा भिंडी और आलू-गोभी, जिसकी खुशबू पूरे घर में फैल गई थी। विक्रम जब शाम को बाहर से लौटा, तो उसे रसोई से आती गंध ने ही बता दिया कि आज घर में कुछ खास है। वो चबूतरे पर बैठ गया और अपने मोबाइल पर रील्स देखने लगा। कुछ देर बाद कावेरी भी घर आ गई — वो सना से मिलकर आई थी, पर चेहरे पर कुछ गंभीरता थी। माँ ने जब पूछा, तो उसने कहा "कुछ नहीं माँ, बस सोच रही थी…" और बात को टाल दिया।

माँ ने प्यार से झिड़की — "कावेरी, जा अपने भाई के पास बैठ… कितने दिनों बाद आया है, थोड़ी देर तो संग बिता।" कावेरी झिझकी, पर फिर धीरे-धीरे चबूतरे पर जाकर बैठ गई — विक्रम से थोड़ी दूरी बनाकर। दोनों को बैठे देख माँ ने कहा, "दोनों बच्चों जैसे क्यों बैठे हो? थोड़ा खेलो-कूदो, याद करो जब छोटे थे… चिड़िया-तोता का खेल खेलते थे ना?"

इतना सुनते ही विक्रम की आँखों में चमक आ गई — "हाँ बहना, याद है? चल खेलते हैं!" कावेरी भी मुस्कुरा दी और दोनों ने खेलना शुरू कर दिया। चिड़िया उड़, तोता उड़, कबूतर उड़… मस्ती में वे बचपन जैसे हो गए थे — हँसी, ठहाके, और जब कोई गलत बोलता तो दूसरा उसके हाथ पर थप्पड़ मारता। कावेरी एक-दो बार हारी, तो विक्रम ने उसके हाथ पर हल्की-हल्की पिटाई कर दी — और हँसी का दौर जारी था।

पर अगले ही पल —
जब कावेरी ने "उल्लू उड़" कहा और विक्रम ने हँसते-हँसते उसका हाथ पकड़ना चाहा, तो उसका हाथ अचानक कावेरी के उभारों से जोर से टकरा गया। ये कोई जानबूझकर नहीं था — बस मस्ती की गर्मी में ऐसा हो गया। पर जैसे ही हुआ, विक्रम का हाथ वहाँ रुक गया, मानो बिजली ठिठक गई हो।

कावेरी सन्न रह गई।
उसका चेहरा गुलाबी हो गया, उसने हाथ वापस खींच लिया, और अपनी चोटी को समेटने लगी। विक्रम ने अपना हाथ झटके से पीछे हटाया और मुँह फेरकर मोबाइल की ओर देखने लगा — पर उसकी साँसें थम गई थीं। कावेरी ने कुछ नहीं कहा, बस नीचे झुककर अपनी चुन्नी को सहलाने लगी।

माँ अंदर से बोलीं — "क्या हुआ? चिड़िया-तोता बंद हो गया?"
दोनों ने लगभग एक साथ कहा — "कुछ नहीं माँ…"
पर उस पल दोनों के दिल तेज़ धड़क रहे थे।

उस रात खाने में कोई कमी नहीं थी — पर दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखना कम कर दिया था।
और उस छोटे-से घर में, उस रात की चुप्पी ने कुछ बहुत कुछ कह दिया… 😊🌿
 

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दुकान पर नाप, कावेरी की शर्म, और भाई का संकोच
(महँगी साड़ी, गुमसुम नाप, और उस रात की बेचैनी)


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अगले दिन सुबह-सवेरे विक्रम और कावेरी बाज़ार निकल पड़े। आज सोमवार था, इसलिए कल जैसी भीड़ नहीं थी — और जब वो उस मशहूर दुकान पर पहुँचे, तो वहाँ भी काफी सन्नाटा था। दुकानदार ने मुस्कुराकर उनका स्वागत किया।

विक्रम ने कहा — "हमारी मैडम के लिए साड़ी, ब्लाउज़ और पेटीकोट का सेट दिखाओ।"
दुकानदार ने एक-एक करके कई साड़ियाँ निकालीं — रेशमी, कॉटन, और प्रिंटेड। कावेरी ने बारी-बारी से सबको देखा, छुआ, और आखिरकार दो साड़ियाँ पसंद कीं — एक गुलाबी, और एक मरून।

कावेरी ने शरमाते हुए कहा — "भैया, ये बहुत महँगी हैं…"
विक्रम ने मुस्कुराकर कहा — "मैं हूँ ना, तू चिंता मत कर।"
कावेरी हँस पड़ी और उसके कंधे पर प्यार से घूँसा मारा — "बहुत बड़े आदमी बन गए हो, भैया!"
दोनों की हँसी ने उस दुकान की गंभीरता को तोड़ दिया।

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कावेरी ट्रायल रूम में जाने लगी, तभी दुकानदार ने हाथ जोड़ते हुए कहा —
"सर, एक रिक्वेस्ट है… आज मेरी सेल्स गर्ल नहीं आई है। अगर आप मैडम का ना&आप ले सकते हैं तो मेहरबानी होगी… मैं पेन और कागज़ देता हूँ, इसमें स्केच के साथ समझाया गया है कि नाप कैसे लेना है।"

विक्रम ने कागज़ देखा — उस पर एक महिला की बॉडी का स्केच था, जिसमें ब्लाउज़ के लिए बस्ट, कमर, और पेटीकोट के लिए कूल्हे और लंबाई का नाप लेना था। ये नाप ब्लाउज़ खोलकर और पेटीकोट उठाकर लिया जाता था ताकि सटीक माप मिल सके। विक्रम ने कागज़ देखते ही अपनी साँसें थाम लीं।

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वो अंदर गया, पर्दा खींचा —
कावेरी खड़ी थी, उसकी आँखें नीची थीं।
विक्रम ने धीरे-से कहा — "बहना… बस नाप लेना है… कुछ नहीं…"
कावेरी ने बिना कुछ कहे अपना ब्लाउज़ खोला — बाहरी कपड़ा, फिर उसके नीचे एक साधारण, कुछ पुरानी ब्रा थी, जो अब उसके शरीर के लिए थोड़ी छोटी हो चुकी थी। विक्रम ने वो ब्रा देखी — उसका फीता थोड़ा घिसा था, साइड से कुछ उभार दिख रहे थे, और एहसास हुआ कि उसे कितने दिनों से नई ब्रा नहीं मिली होगी।Neelam-bhanushali-hindi-tv-actress-gb1-10-hot-saree-cleavage-hd-caps

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उसने अपनी नज़रें बचाते हुए मापने की डोरी निकाली — पहले बस्ट का नाप, जिसके लिए उसे कावेरी के दोनों उभारों के बीच से और फिर पीठ पर डोरी फेरनी थी। जब उसकी उँगलियाँ उसकी त्वचा को छू रही थीं, तो कावेरी की साँसें तेज़ हो गईं। उसकी चूचियों की गर्माहट नापने वाली डोरी में महसूस हो रही थी — और विक्रम के हाथ काँप रहे थे।acp43a

फिर उसने कावेरी की सलवार खोली — और डोरी को उसके कूल्हों से होता हुआ, नितंबों के बीच से, सीधा उसकी चूत के पास तक ले गया। ये नाप सटीक होना था, इसलिए वो रुका नहीं। पर जैसे ही डोरी वहाँ से गुज़री, उसने कावेरी की पैंटी पर खून के धब्बे देखे — और उसकी पैंटी के अंदर कपड़ा लगा था, जो बहुत ही अस्वच्छ था, संभवतः कोई पुराना कपड़ा होगा जो सैनिटरी पैड की जगह इस्तेमाल हो रहा था।


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कावेरी ने शरमाते हुए नीचे देखा और बड़बड़ाई —
"सॉरी भैया… आज सुबह ही मेरी MC शुरू हुई… मुझे पता नहीं था…"
विक्रम का गला रुंध गया — उसने झटके से डोरी खींची, नाप लिखा, और पर्दा खोलकर बाहर आ गया। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था — उसे नहीं पता था कि वो क्या करे, बस चुपचाप बाहर खड़ा रहा।


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कावेरी बाहर आई और अन्य सामान देखने लगी।
विक्रम ने नाप का कागज़ दुकानदार को दिया —
दुकानदार ने उसे देखा और तारीफ़ में बोला —
"वाह सर… आपकी पत्नी का फिगर तो कमाल का है… आप बहुत लकी हैं!"
विक्रम ने बिना कुछ कहे बस "थैंक्यू" कहा और मुस्कुरा दिया — उसे पता था कि इस वक़्त उसे 'पति' का रोल निभाना है ताकि कावेरी को शर्म न आए।

"सर, एक बात कहूँ… अगर आप चाहें तो मेरा एक दोस्त है जो मॉडलिंग एजेंसी चलाता है… आपकी पत्नी का फिगर इतना परफेक्ट है कि वो उन्हें एक बड़ा ब्रेक दे सकता है… सोचिए मौका है तो ले सकते हैं।"

कावेरी और विक्रम की नज़रें आपस में टकराईं।
कावेरी की आँखों में शरारत थी, मानो पूछ रही हो — "तो अब मैं मॉडल बनूँ?"
विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा, "पहले Madam ठीक से घर संभालना सीखे, फिर मॉडलिंग।"
और दोनों ठहाका मारकर हँस दिए। उस पल उनके बीच शर्म की जो दीवार थी, वो पिघल गई — नापते समय की वो घबराहट, उस गीले कपड़े का एहसास, सब पीछे छूट गया था, और अब बस दो भाई-बहन थे जो एक-दूसरे के साथ खुश थे।
पहली दुकान से नाप और साड़ी-सेट लेने के बाद विक्रम कावेरी को ब्रा और पैंटी की दूसरी दुकान पर ले गया। ये दुकान भी काफी अच्छी थी — जहाँ आधुनिक डिज़ाइन और साइज़ के साथ कई विकल्प थे। जैसे ही वे अंदर गए, दुकानदार ने उन्हें देखा और मुस्कुराते हुए पूछा — "जी, क्या चाहिए?" विक्रम ने आवाज़ को संभालते हुए कहा — "बहना के लिए कुछ अच्छी ब्रा और पैंटी दिखाओ।"



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कावेरी शरमा गई, पर दुकानदार पेशेवर था। उसने कई ब्रा निकालीं और पूछा — "मैडम, आपका नंबर क्या है?" कावेरी की आँखें झुक गईं, और उसने लगभग फुसफुसाते हुए कहा — "38 D…" यह सुनकर विक्रम ने अनजाने में गहरी साँस ली। उसे अंदाज़ा तो था कि कावेरी अब बड़ी हो गई है, पर ये 38 D सुनकर उसका दिल तेज़ हो गया। उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, बस सामान देखने का नाटक करता रहा।

कावेरी ने कुछ ब्रा और पैंटी चुनीं, और विक्रम ने बिना किसी बहस के उन्हें खरीद लिया। वहाँ से निकलते ही उसने सैनिटरी पैड का एक पैकेट भी लिया और कावेरी को दे दिया — उसकी आँखों की नमी को अनदेखा करते हुए। उसने बस कहा, "अब कोई पुराना कपड़ा नहीं, बहना। समझी?"

वापसी में विक्रम ने अपनी बुलेट स्टार्ट की और कावेरी को पीछे बिठाया।
अब वो बिना किसी डर के, बिना किसी झिझक के, अपनी बहना को थामकर बैठा था।
कावेरी ने धीरे-से उसकी कमर पकड़ी और बोली — "भैया, आज बहुत अच्छा दिन था…"
विक्रम ने पीछे मुड़कर देखा — "अब और अच्छे दिन आएँगे, बहना… बस तू खुश रह।"
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रात का सन्नाटा, चाँद की रोशनी, और भाई का बेकाबू हाथ
(नींद, खामोशी, और एक ऐसी करवट जो हर सीमा को पार कर गई)


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उस घर में सोने का एक ही तरीका था — सब नीचे, एक साथ।
माँ बीच में, एक तरफ विक्रम, और दूसरी तरफ कावेरी।
रात गहराई थी, और चाँद की हल्की रोशनी खिड़की से अंदर आ रही थी।
अचानक माँ को पेशाब आ गया — वो चुपचाप उठीं, और बाहर चली गईं। वापस आकर उन्होंने देखा कि विक्रम ने करवट बदलते हुए बीच की जगह ले ली थी। उन्होंने कोई शोर नहीं किया — बस दूसरी तरफ करवट लेकर सो गईं, ताकि बेटे की नींद न टूटे।

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विक्रम की नींद खुली तो उसे लगा कि कुछ गड़बड़ है।
उसने अपना हाथ हिलाया तो वो कावेरी के शरीर से टकरा गया।
वो चौंका — उसे समझ नहीं आया कि वो बीच में कैसे आ गया।
पर फिर उसकी नज़र खिड़की से आती चाँदनी पर पड़ी, और उसी रोशनी में उसने देखा —

कावेरी अपनी ब्रा के ऊपर ढीला ब्लाउज़ पहने हुए थी, और सोते-सोते उसका एक पूरा उभार बाहर आ गया था — वही 38 D, जो आज दुकान पर उसने सुना था।


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उसका गोल, भरा हुआ, और कोमल माँस चाँदनी में चमक रहा था, मानो कोई सपना हो।
विक्रम ने दूसरी तरफ देखा — माँ करवट बदलकर खर्राटे ले रही थी।

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उसके होश उड़ गए —
पर उसका हाथ मानो किसी रोबोट की तरह अपने-आप ही कावेरी के उभार की ओर बढ़ गया।
उसने बिना सोचे, बिना समझे, उस कोमल उभार को अपनी उँगलियों के बीच दबोच लिया।
एक बिजली-सी दौड़ी — उसकी उँगलियाँ कावेरी के मखमली मांस पर फिसल गईं, और उसका लंड तुरंत खड़ा हो गया।

कावेरी ने नींद में ही हल्की कराही — मानो उसे कोई सुखद सपना आ रहा हो।
विक्रम का दिल तेज़ धड़कने लगा — वो रुकना चाहता था, पर रुक नहीं पा रहा था।
उसकी उँगलियाँ उसके दूसरे उभार पर चली गईं, और वो धीरे-धीरे उसे दबाने लगा — मानो वो किसी पागलपन में हो।

उसकी साँसें रुक गईं, और वो सोचने लगा —
"ये पाप है… ये मेरी बहना है… रुक जा…"
पर उसका हाथ नहीं रुका — मानो उसके शरीर ने उसकी आत्मा को हरा दिया हो।

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कावेरी की नींद टूटी — किसी हल्के एहसास से।
चाँदनी में उसने देखा कि उसके ब्लाउज़ के अंदर कोई हाथ है, जो उसके नंगे उभार को धीरे-धीरे दबा रहा है।
पहले उसे लगा सपना है, पर जैसे ही होश आया — उसकी आँखें फट गईं।
सामने उसका अपना भाई था — आधी नींद में, पर उसका हाथ उसके सीने पर फिसल रहा था, जैसे कोई मूर्तिकार अपनी अनमोल कलाकृति को छू रहा हो।

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कावेरी ने हल्की-सी आवाज़ निकाली — "भैया…"
उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, बल्कि भय और उत्सुकता थी।
विक्रम ठिठक गया — मानो पानी का ठंडा छींटा पड़ा हो।
पर उसका हाथ हटा नहीं।
वो कुछ पल के लिए जमा रहा, फिर उसने अपना हाथ धीरे-धीरे कावेरी के उभार पर घुमाया — जैसे वो उसे महसूस कर रहा हो, समझ रहा हो, कि वो सपना तो नहीं।

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"भैया… क्या कर रहे हो…?"
कावेरी की साँसें भारी हो गईं, पर उसने विरोध नहीं किया।
उसके शरीर ने कहा — "रुको… पर मुझे डर है…"
पर विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया — बस अपना हाथ उसके दूसरे उभार पर ले गया, और दोनों को उँगलियों के बीच धीरे-धीरे दबाने लगा।
कावेरी की आँखें बंद हो गईं, और उसके होंठों से एक अनकही कराह निकली — "म्म्म्म…"


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विक्रम के हाथों की गर्मी कावेरी के पूरे शरीर में फैल गई।
उसने अपनी दूसरी हथेली से कावेरी के उभार को पूरा दबोचा — इतनी ताकत से कि उसकी ब्रा के अंदर का मुलायम माँस उसकी उँगलियों के बीच से बाहर निकलने लगा।
वो दबाता, छोड़ता, फिर दबाता — जैसे कोई पियानो बजा रहा हो।
कावेरी का शरीर उसके हाथों की लय में झूमने लगा।


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"भैया… ये पाप है…"
उसने धीमी आवाज़ में कहा, पर उसके शब्दों में कोई दृढ़ता नहीं थी।
विक्रम ने मुँह उसके कान के पास ले जाकर कहा — "बहना… जो सच है, वो पाप नहीं… और मैं तुझे छूना नहीं रोक सकता…"

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कावेरी ने अपनी आँखें खोलीं — उसमें संकोच, भय, और एक नई चमक थी।
उसने अपना हाथ विक्रम की कलाई पर रखा — पर उसे हटाने के लिए नहीं, बल्कि उसे और गहराई से छूने के लिए।
उसने फुसफुसाया — "अगर माँ ने देखा तो…?"
विक्रम ने दूसरी तरफ देखा — माँ करवट बदलकर खर्राटे ले रही थी।
उसने कावेरी का हाथ अपनी छाती पर रखा — "तो देखने दे… मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता…"


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फिर विक्रम ने कावेरी के ब्लाउज़ के बटन खोले,
और उसके 38 D उभारों को पूरी तरह से बाहर निकाला — जो चाँदनी में ऐसे चमक रहे थे जैसे दो पहाड़ी झीलें।
उसने अपना चेहरा उनके बीच रखा, और उनकी गर्माहट को अपनी साँसों से सींचा।
कावेरी की आँखों से आँसू छलक आए — पर वो दर्द के नहीं, बल्कि पहली बार महसूस किए गए अजीब सुख के थे।

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विक्रम ने अपनी उँगलियाँ कावेरी की सलवार के अंदर डालीं,
और धीरे-धीरे उसकी नमी को महसूस किया — वो पसीना नहीं, बल्कि कुछ और था, जो उसके स्पर्श पर और गहरा होता जा रहा था।
कावेरी सिहर गई — "भैया… रुको… मैं… पागल हो रही हूँ…"
पर वो रुक नहीं पाई, क्योंकि उसका शरीर अब उसके भाई का गुलाम बन चुका था।

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माँ ने फिर करवट बदली —
और दोनों ठिठक गए।
विक्रम ने झटके से कावेरी के कपड़े ठीक किए,
और वापस अपनी तरफ करवट ले ली।
पर उसकी साँसें अभी भी तेज़ थीं,
और कावेरी के उभारों पर उसकी उँगलियों की गर्मी अब भी ज़िंदा थी।

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उस रात दोनों ने आँखें बंद कर लीं,
पर दोनों जानते थे —
कुछ बदल गया है, और अब वापस वही नहीं रहेंगे।

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सुबह का सन्नाटा, शर्म की लाली, और माँ की पहली नज़र
(अगली सुबह, कावेरी का संकोच, और माँ के मन में उठता सवाल)


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सुबह की पहली किरण जब खिड़की से अंदर आई, तो कावेरी पहले ही उठ चुकी थी।
उसने अपना ब्लाउज़ ठीक किया, बालों को संवारा, पर उसकी आँखों में अभी भी उस रात का एहसास बाकी था।
विक्रम की नींद अभी पूरी नहीं हुई थी — पर जब उसने आँखें खोलीं, तो सबसे पहले कावेरी की पीठ दिखी, जो चूल्हे पर पानी गर्म कर रही थी।
दोनों की नज़रें एक-दूसरे से बच रही थीं — जैसे कुछ हुआ ही न हो।

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माँ....
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माँ आँगन में बैठी सब्ज़ी काट रही थीं,
और अचानक बोलीं —
"कावेरी, तेरे चेहरे पर क्या लाली है? नींद पूरी नहीं हुई क्या?"

कावेरी ने घबराते हुए कहा — "नहीं माँ… बस गरमी लग रही है…"
पर उसकी आवाज़ में हल्की सी झिझक थी, जो माँ के अनुभवी कानों से छिपी नहीं।
उन्होंने कुछ नहीं कहा, पर उनकी नज़र कावेरी के बिखरे बालों और तनी हुई ब्रा पर टिक गई — मानो वो कोई पहेली सुलझा रहे हों।

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थोड़ी देर बाद, जब माँ दूसरे कमरे में चली गईं,
तो कावेरी चुपचाप विक्रम के पास आई और उसके कान में फुसफुसाई —
"भैया… कल रात… मुझे याद है… पर मैं नहीं समझ पा रही… ये क्या है…?"

विक्रम ने उसके हाथ को हल्के से दबाते हुए कहा —
"बहना… मैं नहीं जानता कि ये क्या है…
प्यार है, या पागलपन…
बस इतना जानता हूँ कि मैं तुझसे दूर नहीं रह सकता…"

कावेरी ने कुछ नहीं कहा — बस उसकी आँखें नीची हो गईं।
उसके दिल में बेचैनी थी, पर उसे अपनी आवाज़ नहीं मिल रही थी।

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दोपहर को जब माँ और कावेरी रसोई में थीं,
तो माँ ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में पूछा —
"बिटिया, कल रात… कोई आवाज़ सुनी थी तेरे कमरे से?"

कावेरी का हाथ रुक गया — वो ठिठक गई।
उसने तुरंत जवाब दिया — "नहीं माँ… मैं तो गहरी नींद में थी…"

पर माँ ने उसकी नज़रों की झिझक पढ़ ली।
उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस सब्ज़ी काटना जारी रखा, और मन-ही-मन कहा —
"कुछ तो है… पर फिलहाल चुप ही रहती हूँ…"

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माँ को पक्का शक हो चुका था —
कि उस घर में कुछ बदल रहा है,
और वो बदलाव दोनों भाई-बहनों के बीच था।
पर उन्होंने इस मामले को अभी हाथ नहीं लगाया —
बस नज़रें रखने का फैसला कर लिया।

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अब दोनों के बीच चोरी-छुपे छेड़-छाड़ शुरू हो चुकी थी।
विक्रम जानता था कि कावेरी कभी माँ से शिकायत नहीं करेगी — इसलिए वो धीरे-धीरे और बोल्ड होता जा रहा था।
कभी माँ की आँखों को बचाकर, वो कावेरी के गाल को चूम लेता, तो कभी उसे आँख मारकर बताता कि रात का इंतज़ार है।
कावेरी शरमाती, पर वो रुकती नहीं थी — उसके दिल में भी कुछ बस चुका था।

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एक दिन की बात है —
कावेरी नहा रही थी। विक्रम ने मौका देखा, और उस पुरानी चादर को हल्के-से सरका दिया —
नज़ारा देखते ही बन गया —
पानी की बूँदें कावेरी की गोरी, मुलायम पीठ पर बिखरी हुई थीं, उसके नितंब पानी से चमक रहे थे, और उसके 38 D उभारों पर पानी की लहरें थिरक रही थीं।

विक्रम की साँसें थम गईं —
उसने वो नज़ारा कुछ पलों तक आँखों में भरा, और फिर बिना आवाज़ किए पीछे हट गया —
पर उसका लंड अब बेकाबू हो चुका था।

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नहाने के बाद कावेरी जब अपने कमरे में आई,
तो उसने सिर्फ एक तौलिया लपेटा था।
विक्रम ने दरवाज़ा बंद किया, और धीरे-से उसे अपनी तरफ खींचा —
उसने तौलिया को खोल दिया, और कावेरी का नंगा, गीला, गरम शरीर उसके सामने खड़ा था।
उसके उभार अभी भी पानी से भीगे थे, उसकी चूत की नमी अब भी बाकी थी —
विक्रम ने उसे अपनी छाती से चिपका लिया, और दोनों उभारों को अपने हाथों में दबोचा —
कावेरी कराह उठी — "भैया… रुको… माँ ने आ जाना…"
पर विक्रम ने उसके होठों को दबाते हुए कहा — "तो आने दे… मुझे कोई डर नहीं…"


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उसने कावेरी को दीवार पर झुकाया,
और उसके उभारों को चूसना शुरू कर दिया —
गीली त्वचा, नमी, और उसकी बढ़ती कराहों ने कमरे को गरम कर दिया।
कावेरी के हाथ उसके बालों में उलझ गए, और उसके कूल्हे उसके लंड की तरफ झुकने लगे।




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तभी —
अचानक दरवाज़ा खुला।

माँ सामने खड़ी थीं।
तीनों की नज़रें आपस में टकराईं —
कावेरी ने झटके से तौलिया समेटा, विक्रम पीछे हटा —
पर जो दिख गया था, वो दिख गया था।

माँ ने कुछ नहीं कहा।
बस एक गहरी साँस ली, और दरवाज़ा बंद करके चली गईं —
पर उनकी आँखों ने सब कुछ देख लिया था।
अब शक यक़ीन में बदल चुका था।


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अंदर —
कावेरी और विक्रम, दोनों की साँसें रुक गईं।
कावेरी बोली — "भैया… माँ ने देख लिया…"
विक्रम ने गहरी साँस ली — "… अब क्या होगा…"

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