• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
Staff member
Moderator
50,505
84,905
354
Bhut hi badhiya update Bhai
Yugaka aur kalat ne aakar vega aur vinus ko bacha liya varna inka bhi haal dhra aur mayur ke jaisa hota
Khair Yugaka ne A1 ko mar diya lekin A4 aur A7 vaha se bhag gaye
Abhi ke liye to bhaag gaye wo, lekin wapas jaroor lautenge, aur jab lauotenge to dugune taakat se aayenge. and yess yugaka aur kalaat ki entry sahi time per hui thi.
Thank you very much for your wonderful review and support bhai :hug:
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
Staff member
Moderator
50,505
84,905
354
#210.

चैपटर-13
आयुर्वेद: (तिलिस्मा 5.51)

सुयश, जेनिथ, क्रिस्टी और शैफाली तिलिस्मा के द्वार संख्या 5.5 में प्रवेश कर गये। जिसके द्वार पर त्वचा बनी हुई थी।

सभी जानते थे कि यह इन्द्रियों वाला आखिरी द्वार है। द्वार में प्रवेश करते ही सभी को एक विशाल मैदान दिखाई दिया, जो कि कई किलोमीटरों में फैला था।

सबसे आगे एक देवता की मूर्ति लगी थी, जिनके 4 हाथ थे। उनके पहले हाथ में शंख, दूसरे में चक्र, तीसरे में अमृत कलश और चौथे हाथ में कोई पत्तेनुमा औषधि थी।

उनके आगे 4 वर्गाकार पत्थर रखे थे, हर पत्थर पर एक धातु की प्लेट लगी थी, जिस पर क्रमशः प्रथम अध्याय, द्वितीय अध्याय, तृतीय अध्याय और चतुर्थ अध्याय लिखा था।

ऐसा लग रहा था कि जैसे वहां पर 4 पुस्तकें होनी चाहिये थीं? पर वह वहां थी नहीं। देवता के बगल में, हवा में एक ऊर्जा द्वार दिखाई दे रहा था।

"कैप्टेन, क्या आप बता सकते हैं कि यह कौन से देवता हैं? और क्या करते हैं?" जेनिथ ने सुयश से पूछा।

“हां, मुझे इनके बारे में पता है, यह देवता धनवंतरी हैं, जिन्हें चिकित्सा का देवता कहा जाता है।" सुयश ने कहा- “मैं तुम लोगों को इनके बारे में बताता हूं। जब देओं और दैत्यों ने समुद्र मंथन किया, तो उसमें से एक-एक कर 14 रत्न निकले थे। सबसे आखिर में अमृत कलश को अपने हाथ में लेकर धनवंतरी ही निकले थे। धनवंतरी के जन्म के उपलक्ष में ही ह…न्दू धनतेरस का त्योहार मनाते हैं। इन्होंने देओं की चिकित्सा के लिये आयुर्वेद नामक ग्रंथ का निर्माण किया। इन्होंने समुद्र मंथन से प्रकट होने के बाद, भगवान विरष्णु से, देवलोक में अपने रहने का स्थान मांगा, तो भगवान ने इनसे कहा कि आप देवता नहीं हैं। आपका जन्म देवताओं के बाद हुआ है, इसलिये आपको पृथ्वी लोक पर जन्म लेकर, सिद्धी प्राप्त करके देवताओं का पद कमाना पड़ेगा। भगवान के कथनों को सुन धनवंतरी ने आयुर्वेद का ज्ञान ब्रह..देव को दिया और स्वयं वहीं कणों में समा गये। बाद में इन्होंने पृथ्वी पर काशी राज धन्व के परिवार में दोबारा जन्म लिया।

“उधर ब्र..देव ने आयुर्वेद का ज्ञान प्रजापति को एक लाख श्लोक के साथ दिया, दक्ष ने अश्विनी कुमारों को, फिर अश्विनी कुमारों ने देवराज को और इंद्र से वह ज्ञान ऋषि भरद्वाज को प्राप्त हुआ। ऋषि भरद्वाज से यह ज्ञान पुनः धनवंतरी ने प्राप्त किया और फिर काशी में पृथ्वी का पहला चिकित्सा का विद्यालय बनाया गया, जिसके प्रधानाचार्य विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत थे। जिन्हें पृथ्वी का पहला शल्य चिकित्सा का डॉक्टर कहा जाता है।"

“भारत का इतिहास तो काफी पुराना और अद्भुत है।" क्रिस्टी ने कहा- “मैं यहां से निकलने के बाद भारत के इतिहास के बारे में पढ़ना चाहूंगी।"

"तो फिर समझ में आ गया कि हमें यहां करना क्या है?" शैफाली ने कहा- “हमें यहां देवता धनवंतरी के लिये आयुर्वेद के 4 अध्याय को लाकर इन वर्गाकार पत्थरों पर रखना है। अब यह 4 अध्याय इसी स्थान पर कहीं होने चाहिये?"

"कहीं वह 4 अध्याय इस ऊर्जा द्वार में तो नहीं?" जेनिथ ने सबका ध्यान ऊर्जा द्वार की ओर करते कहा।

जेनिथ की बात सुन सुयश चलता हुआ ऊर्जा द्वार के पास आया और उसे हाथ लगाकर देखा। सुयश को उस ऊर्जा द्वार से पहले ही कोई अदृश्य दीवार महसूस हुई, जो उसे ऊर्जा द्वार में नहीं जाने दे रही थी।

"नहीं जेनिथ, इस ऊर्जा द्वार के बाहर कोई अदृश्य दीवार है, जिसकी वजह से हम इस ऊर्जा द्वार में प्रवेश नहीं कर सकते।” सुयश ने कहा।

"तो फिर हमें कुछ और आगे चलकर देखना चाहिये। हो सकता है कि आयुर्वेद के 4 अध्याय आगे किसी स्थान पर छिपे हों?” क्रिस्टी ने कहा।

क्रिस्टी की बात सुनकर सभी उस स्थान से आगे की ओर बढ़ गये। काफी आगे जाने पर इन्हें एक पहाड़ जैसे स्थान पर 4 गुफाएं दिखाई दीं। चारो गुफाओं पर क्रमशः 1, 2, 3, 4 लिखा हुआ था।

उन गुफाओं के आगे एक 4 सिर वाले हाथी के सिर की मूर्ति लगी थी। उस हाथी की मूर्ति पर एक छोटा सा सिंहासन रखा था, जिस पर एक किताब रखी हुई थी।

सुयश ने आगे बढ़कर उस किताब को देखा। किताब पर लिखा हुआ था- “तिलिस्मा 5.5 नियमावली।"

"लो अब तो पक्का इस किताब में कैश्वर का कुछ भाषण होगा, जिसमें उसके देवता बनने के बारे में बताया गया होगा?” क्रिस्टी ने मुंह बनाते हुए कहा।

सुयश ने आगे बढ़कर उस किताब को उठा लिया।

सुयश ने किताब का पहला पृष्ठ खोलकर देखा और उसमें लिखी बातों को तेज-तेज सबके सामने पढ़ने लगा- “आप सभी का तिलिस्मा की द्वार संख्या 5.5 में स्वागत है। अगर आपको आयुर्वेद के 4 अध्याय की खोज है, तो आप सही जगह पर आये हैं। यहां मौजूद 4 गुफाएं आपको उन 4 अध्याय तक ले जायेंगी। परंतु आप उस गुफा में घुसने से पहले उन गुफाओं में मौजूद चीजों के बारे में जान लें। पहली गुफा में सूर्य की तेज अग्नि है, जिसका ताप हजारों डिग्री है। ऐसे ताप में किसी भी व्यक्ति के जाने पर उसका शरीर झुलस सकता है।

“दूसरे द्वार में बर्फ ही बर्फ भरी है, जिसके तापमान इतना कम है कि उसके अंदर प्रवेश करने वाला व्यक्ति अंदर घुसते ही जम जायेगा। तीसरे द्वार में भयानक रसायनिक गैस हैं, जो अंदर प्रवेश करने वाले व्यक्ति का शरीर जला देगी। चौथी गुफा में भयानक जहर फैला है, जो उसमें प्रवेश करने वाले व्यक्ति का शरीर पलों में पिघलाकर पानी बना देगी। तो अब अगर आप इन सभी गुफाओं में प्रवेश करके, उसके आखिर में पहुंचने में सफल हो जाते हैं, तो आप आयुर्वेद के उन अध्यायों को प्राप्त कर सकते हैं।“

आखिर में कविता की कुछ पंक्तियां लिखी थीं:-
“अग्नि जलाये वाष्प से, हिम है विष के समान, धनवंतरी के हाथ में सभी औषधि का ज्ञान।"

इतना पढ़कर सुयश ने उस किताब को वापस वहीं रख दिया, जहां से उसको उठाया था।

“दोस्तों आपने यह तो सुन ही लिया कि गुफा में किस प्रकार के खतरे हैं, परंतु अखिर में लिखी कविता की पंक्तियों से यह भी स्पष्ट हो गया कि देवता धनवंतरी के हाथ में पकड़ी औषधि को खाकर हम उन गुफाओं में प्रवेश कर सकते हैं।” सुयश ने कहा।

"तो फिर चलिये कैप्टेन, देर ना करते हुए, पहले उस औषधि को ही प्राप्त करते हैं।” जेनिथ ने कहा।

अब सभी वापस धनवंतरी की मूर्ति की ओर चल दिये। कुछ ही देर में सभी धनवंतरी के मूर्ति के सामने खड़े थे।

अब सुयश ने आगे बढ़कर धनवंतरी के हाथ में थमी औषधि को लेने की कोशिश की, पर वह औषधि को धनवंतरी के हाथ से ले नहीं पाया।

औषधि को छूते ही वह औषधि अपने स्थान से गायब हो जा रही थी। तभी धनवंतरी के सामने स्थित चारो वर्गाकार पत्थरों पर कुछ पंक्तियां लिखी दिखाई देने लगीं।

"लो अब फिर से पढ़ो कैश्वर की पहेलियां।” क्रिस्टी ने झुंझलाते हुए कहा।

किसी के पास अब और कोई चारा नहीं था, इसलिये सभी ने एक-एक पत्थर का चयन किया और अपनी-अपनी कविताएं पढ़ने लगे।

पहली पहेली थी:-
श्वेत प्रकाश से फैल रही कैसी अद्भुत माया, संग लेकर आइये किसी जीव की छाया।"

इस पत्थर का चुनाव सुयश ने किया था। सुयश ने कविता की पंक्तियों को ध्यान से पढ़ा और अपने चारो ओर देखने लगा, पर उसे इस स्थान पर कहीं भी, किसी की भी छाया बनती हुई नहीं दिखाई दी।

“क्या आपको, आपकी पहेली की पंक्तियां समझ में आयी कैप्टेन?” जेनिथ ने सुयश की ओर देखते हुए पूछा।

“यह किसी जीव की परछाई को लाने को कह रहा है।” सुयश ने कहा- “पर परेशानी यह है कि इस स्थान पर किसी भी प्रकार की छाया नहीं बन रही है। अब अगर ऐसे में मैं किसी जीव को यहां ले भी आया? तो भी मैं उसकी छाया यहां पर किस प्रकार बना पाऊंगा?"

सुयश को अपनी पहेली का मतलब तो समझ आ गया था, बस अब उसे लाने की ही बात रह गई थी, इसलिये शैफाली ने दूसरे पत्थर पर लिखी पहेली को पढ़ना शुरु कर दिया।

उस पर लिखा था:-
"हिमखंड के श्वेत कणों में नहीं एक भी दाग, हाथ लेकर आइये, हिम से निकली आग।

“ये कैसे हो सकता है?" शैफाली ने आश्चर्य से उस पहेली को देखते हुए कहा- “भला बर्फ से आग कैसे निकल सकती है?"

सभी ने काफी देर तक सोचा, पर किसी को भी शैफाली की पहेली का अर्थ समझ में नहीं आया। अतः सभी ने तीसरे पत्थर की पहेली को पढ़ना शुरु कर दिया, जिसका चयन जेनिथ ने किया था।

तीसरे पत्थर पर लिखा था। :-
“चंद्रकिरण से जन्में, एक सहस्त्र त्रिशूल, मेरी तो अभिलाषा है, नवनिर्मित एक फूल।"

"ये पहेली भी समझ में नहीं आ रही?” जेनिथ ने कहा- “भला चंद्रमा की किरणों से त्रिशूल कैसे जन्म ले सकते हैं?”

कुछ देर की माथा पच्ची के बाद सभी चौथी पहेली की ओर बढ़ गये, जो कि क्रिस्टी के लिये थी।

चौथे पत्थर पर लिखा था:-
“शाख भेष धरकर बैठा, एक वृश्चिक डंक, मुझे चाहिये आसमान में चमक रहा मयंक।"

“यह पहेली भी अन्य पहेलियों की भांति ही लग रही है, जिसे समझना अत्यंत मुश्किल लग रहा है। भला आसमान के चाँद को कोई कैसे तोड़कर ला सकता है?" क्रिस्टी ने कहा।

"मेरे ख्याल से जब तक उस स्थान पर नहीं पहुंचेंगे, जहां से यह सभी चीजें लानी हैं, तब तक हम पहेली को समझ भी नहीं पायेंगे?” सुयश ने कहा- “इसलिये अब पहले उस स्थान की ओर चलना चाहिये पर...पर वह स्थान है कहां पर?"

“कैप्टेन अंकल, उस ऊर्जा द्वार के आगे खड़ी अदृश्य दीवार अब हट चुकी है।” शैफाली ने कहा- “मुझे लगता है कि हमारी सभी चीजें इसी द्वार के अंदर ही मिलेंगी। तो हमें अपनी-अपनी पहेलियों को याद कर इस द्वार में प्रवेश करना चाहिये।"

शैफाली के शब्द सुन सभी ने एक बार फिर ध्यान से अपनी पहेलियों को पढ़ा और एक-एक कर उस ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गये।

सुयश जैसे ही उस ऊर्जा द्वार से निकला, वह ऊर्जा द्वार स्वयमेव बंद हो गया।

“अरे, यह द्वार तो बंद हो गया? लगता है कैश्वर ने सभी के लिये अलग-अलग स्थानों का चुनाव किया है।' सुयश मन ही मन बड़बड़ाया- “मुझे लगता है कि कैश्वर अब हमारी सम्मिलित शक्ति से घबरा रहा है, इसलिये वह हम सभी को अलग-अलग स्थानों पर भेजकर कार्य दे रहा है।....कोई बात नहीं हम भी कैश्वर को साबित कर देंगे कि नियति ने हमें यूं ही नहीं चुना है, इस तिलिस्मा के लिये।" यह सोच सुयश ने स्वयं का हौसला बढ़ाया और उस स्थान को देखने लगा।

वह स्थान एक रेतीला रेगिस्तान थी, जिसके सिर पर तेज सूर्य चमक रहा था, पर उस स्थान पर दूर-दूर तक कोई चीज नजर नहीं आ रही थी।

“यह क्या? यहां तो रेत के सिवा कुछ भी नहीं है, ऐसे में मैं किसी जीव को कैसे ढूंढू?" सुयश यह सोच आगे की ओर बढ़ गया।

सुयश ऐसे ही तेज धूप में आधे घंटे तक इधर-उधर भटकता रहा, पर उसे जीव तो क्या कोई काँटों वाला पेड़ तक दिखाई नहीं दिया।

सुयश ने एक नजर अब ऊपर आसमान में चमक रहे सूर्य पर मारी और फिर सूर्य के एक मंत्र का जाप करते हुए कहा- “हे सूर्यदेव, मुझे पता है कि आप तिलिस्मा में मेरी कोई मदद नहीं कर सकते... मुझे तो ये भी पता है कि यह आपका वास्तविक रुप नहीं, वरन् कैश्वर काबनाया एक माया जाल है, परंतु हे भगवान, आप मेरा इस विकट संकट में मार्गदर्शन करें।"

सुयश को पता था कि सूर्यदेव इस तिलिस्मा में उसकी कोई मदद नहीं करने वाले, फिर भी उसने सूर्यदेव की प्रार्थना की।

तभी सुयश को रेत की एक ऊंची सी चट्टान दिखाई दी, जिसकी तीन नोक किसी त्रिशूल की भांति प्रतीत हो रही थी। सुयश ने अब उस चट्टान की परछाई को देखा, जो कि जमीन पर बन रही थी।

चट्टान की परछाई बिल्कुल किसी त्रिशूल की भांति प्रतीत हो रही थी। अब कुछ सोच सुयश उस त्रिशूल की परछाई के पास पहुंच गया और उस त्रिशूल के मध्य वाली नोक के स्थान पर जमीन की रेत को हटाने लगा।

थोड़ी ही रेत हटाते ही सुयश के हाथ, रेत के नीचे दबी किसी चीज से टकराये।

सुयश ने जल्दी-जल्दी उस स्थान की रेत को पूरी तरह से साफ कर दिया। अब वहां पर सुयश को एक 2 फुट की ऊँट की मूर्ति दिखाई दी।

ऊँट की मूर्ति देख सुयश हैरान हो गया, उसे रेत के नीचे ऐसी किसी चीज की आशा नहीं थी।

सुयश ने जैसे ही उस मूर्ति को अपने हाथ में उठाया, उस स्थान की रेत जमीन में धंस गई और उसके साथ ही सुयश भी जमीन के अंदर समा गया।

सुयश नीचे जाकर किसी पत्थर से टकराया। सुयश अब धीरे से उठकर खड़ा हो गया। ऊँट की मूर्ति अब भी सुयश के हाथों में थी।

सुयश अब चारो ओर उस स्थान को देखने लगा। वह स्थान किसी रेत में दबे पिरामिड की तरह लग रहा था।

पिरामिड की सभी दीवारें बड़े पत्थरों से निर्मित थी। पता नहीं कहां से उस स्थान पर रोशनी आ रही थी, जिसकी वजह से वह स्थान प्रकाशमान था।

सुयश जिस स्थान पर गिरा था, वह एक बड़ा सा कमरा था। उस कमरे में कुछ भी नहीं था। सुयश उस कमरे से निकलकर बाहर की ओर आ गया।

बाहर एक लंबी सी गैलरी थी, जिसमें ऊपर की ओर, थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कुछ छेद दिखाई दे रहे थे। उन छेदों से रेत निकलकर नीचे गिर रही थी। सुयश उस गैलरी में आगे की ओर बढ़ गया।

सुयश चलता हुआ पूरी तरह से सावधान भी था। उस गैलरी में कुछ भी नहीं था। सुयश चलता हुआ, उस गैलरी के अंत में पहुंच गया।

अंत में एक बड़ी दरार छत में बनी थी, जिससे तेजी से रेत नीचे गिर रही थी। पर आश्चर्य की बात यह थी कि वह रेत नीचे गिरते ही पता नहीं कहां गायब हो जा रही थी?

एक तरह से वह स्थान रेत का झरना दिखाई दे रहा था। सुयश ने धीरे से अपना दाहिना हाथ उस रेत के झरने के अंदर डाला। सुयश को अंदर खाली स्थान महसूस हुआ।

अब सुयश उस खाली स्थान में प्रवेश कर गया। इस बार सुयश जिस स्थान पर निकला, वहां जमीन में एक विशाल गड्डा दिखाई दे रहा था। उस गड्ढे को देख ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे वह पाताल के अंदर जाने का रास्ता हो।

उस गड्ढे में बीच-बीच में, 4 वर्ग फुट के, कुछ पत्थर हवा में लहरा रहे थे, जो कि शायद दूसरी ओर जाने के लिये एक टूटे हुए पुल के जैसे कार्य कर रहे थे। हर लहराते पत्थर के बीच कम से कम 8 फुट का अंतर था।

पत्थर का आकार भी बड़ा ना होने के कारण, यह 8 फुट का फासला भी बड़ा दिख रहा था। तभी सुयश को उस विशाल गड्ढे के दूसरी ओर हवा में चमकती एक रोशनी दिखाई दी।

यह देख सुयश समझ गया कि अवश्य ही उस गड्ढे के पार कुछ ना कुछ है। अतः सुयश ने ऊँट की मूर्ति को अपने हाथ में ठीक से पकड़ा और पहले पत्थर की ओर छलांग लगा दी।

सुयश सकुशल पहले पत्थर पर पहुंच गया। तभी सुयश को दूसरा पत्थर 1 फुट और आगे खिसकता हुआ दिखाई दिया।

“यह क्या? अब तो दूसरे पत्थर के बीच की दूरी 9 फुट हो गई है, इस दूरी को पार करना तो मुश्किल है, पर और कोई चारा ना देख, सुयश ने अपने शरीर को थोड़ा पीछे की ओर किया और दूसरे पत्थर पर छलांग लगा दी।

दूसरे पत्थर का फासला ज्यादा होने की वजह से सुयश के एक पैर का पंजा ही दूसरे पत्थर पर पहुंचा।
पर सुयश ने अपने शरीर को नियंत्रित किया और सकुशल दूसरे पत्थर पर पहुंच गया।

तभी सुयश को तीसरा पत्थर अपने स्थान से 2 फुट आगे खिसकता हुआ दिखाई दिया।

अब तीसरे पत्थर की दूरी सुयश से 10 फुट हो गई थी और इस दूरी को पार करना सुयश के लिये बिल्कुल असंभव था।

अब सुयश ने पीछे पलटकर देखा, पर पीछे की ओर से पहले और दूसरे पत्थर अब गायब हो गये थे।

यानि कि सुयश अब पीछे भी नहीं जा सकता था। अब सुयश पूरी तरह से उस स्थान पर फंस गया था।
कुछ देर तक ऐसे ही खड़े रहने के बाद सुयश उस पत्थर पर बैठ गया।

इस समय उसे क्रिस्टी की याद आ रही थी, अगर वह यहां होती, तो इन पत्थरों को आसानी से पार कर सकती थी।
...........................................
उधर क्रिस्टी जैसे ही ऊर्जा द्वार के अंदर घुसी, उसका भी द्वार बंद हो गया। क्रिस्टी समझ गई कि उसे अकेले ही इस बाधा को पार करना होगा। अतः वह उस पूरे स्थान को ध्यान से देखने लगी।

वह एक गाँव का वातावरण था, जिसमें हर स्थान पर गाँव के लोगों की मूर्तियां लगीं थीं। कोई बैल और हल लेकर खेत की ओर जा रहा था, तो कोई खेत में पौधे बोने का कार्य कर रहा था।

क्रिस्टी उस पूरे स्थान पर घूम-घूम कर सभी मूर्तियों को देखने लगी। उसे किसी बिच्छू के डंक और चंद्रमा को ढूंढना था, पर यहां तो आसमान में सूर्य चमक रहा था, चंद्रमा का तो कहीं पर नामो निशान भी नहीं था।

क्रिस्टी चारो ओर देखती आगे बढ़ गई। कुछ आगे उसे एक कुंए के चारो ओर बैठी औरतें कपड़े धोते हुए दिखाई दीं। यह सब भी औरतों की मूर्तियां ही थीं।

काफी देर तक देखने के बाद भी क्रिस्टी को वहां भी कुछ समझ में नहीं आया। अतः वह और आगे बढ़ गई।

अब क्रिस्टी को एक स्थान पर कुछ बच्चों की मूर्तियां दिखाई दीं। कुछ बच्चे वहां जमीन पर रेखाएं बनाकर कोई खेल, खेल रहे थे, तो कुछ बच्चे एक बीन बजाते सपेरे के पास बैठे साँप का नाच देख रहे थे।

साँप और सपेरे की मूर्ति देख क्रिस्टी उस ओर आ गई, उसे लगा कि यदि इस सपेरे के पास साँप हैं, तो इसके पास बिच्छू भी हो सकता है।

सपेरे के हाथ में पकड़ी बीन बिल्कुल असली लग रही थी। क्रिस्टी ने सपेरे के बगल में रखी पिटारी को खोलकर देखा, पर उसमें भी कुछ नहीं था।

तभी क्रिस्टी की नजर बगल में खेल रहे बच्चों के द्वारा, जमीन पर बनाई गई आकृति पर गई।

उस आकृति में आसमान में एक चाँद दिखाई दे रहा था, जिसे कि बच्चे किसी रस्सी से तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। क्रिस्टी बच्चों के द्वारा बनाई गई आकृति को देख उनकी कल्पना को निहारने लगी।

"बच्चे भी ना कैसी-कैसी आकृतियां उकेरते हैं, अपनी कल्पनाओं से? अब भला चाँद भी कोई रस्सी से तोड़ सकता है।" यह सोच क्रिस्टी धीरे से मुस्कुरा दी।

तभी क्रिस्टी की निगाह फिर से सपेरे की ओर गई, उसकी पिटारी पर एक बड़ा सा रस्सी का गुच्छा रखा था।

अब क्रिस्टी ने एक बार फिर बच्चों की बनाई तस्वीर को देखा और फिर धीरे-धीरे चलती हुई सपेरे के पास पहुंच गई।

क्रिस्टी ने अब पिटारी पर रखी उस रस्सी को उठाकर जमीन पर रख दिया और सपेरे के हाथ से बीन को ले लिया।

अब क्रिस्टी को अपने बचपन की एक घटना याद आ गई। बचपन में उसने एक जादुई फिल्म में देखा था कि एक बीन बजाने से रस्सी साँप की तरह नाच रही थी। बस इसी घटना को याद कर क्रिस्टी ने बीन को अपने मुंह से लगाया और उसे बजाने की कोशिश करने लगी।

क्रिस्टी ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी बीन नहीं बजाया था, पर उसके फूंक मारते ही बीन अपने आप बजने लगी।

बीन बजते हुए तेजी से हिल भी रही थी, इसलिये क्रिस्टी ने घबराकर बीन को अपने हाथ से छोड़ दिया।

क्रिस्टी के हाथ से छोड़ने के बाद भी बीन जमीन पर नहीं गिरी, वह तो अब भी अपने आप बजती जा रही थी।

इसी के साथ अब रस्सी, बीन की आवाज पर नाचते हुए आसमान की ओर उठने लगी। यह देख क्रिस्टी थोड़ा पीछे हटकर इस पूरे दृश्य को देखने लगी।

कुछ ही देर में रस्सी आसमान में बहुत ऊपर तक चली गई।

जब रस्सी का आखिरी सिरा दिखाई देने लगा, तो बीन स्वयं बंद हो गई, पर वह रस्सी अभी भी किसी आसमान के पुल की भांति हवा में टंगी थी। कुछ सोच क्रिस्टी ने उस रस्सी पर चढ़ना शुरु कर दिया।

काफी ऊपर चढ़ने के बाद क्रिस्टी को आसमान में बादल दिखाई देना शुरु हो गये। वह रस्सी बादलों के बीच ही जा रही थी।

कुछ ही देर के बाद क्रिस्टी अब बादलों के ऊपर खड़ी थी।

क्रिस्टी के ऊपर पहुंचते-पहुंचते रात हो गई थी और अब आसमान में चाँद दिखाई देने लगा था। क्रिस्टी को आसमान में चमकने वाले चाँद और सितारे अब स्वयं से ज्यादा दूरी पर नहीं लग रहे थे।

क्रिस्टी धीरे-धीरे चाँद की ओर बढ़ने लगी। तभी क्रिस्टी को आसमान में कुछ टूटते तारे दिखाई दिये।

“अरे, यह क्या? एक साथ इतने टूटते तारों को तो मैने कभी नहीं देखा?...और.... और यह क्या? ये तारे तो आसमान से जमीन की ओर आने की जगह, जमीन से आसमान की ओर जा रहे हैं। यह कैसे संभव हो सकता है? मुझे पास चलकर देखना चाहिये।" यह सोच क्रिस्टी चाँद की ओर चल दी।

टूटते तारे चाँद के पास जाते ही गायब हो जा रहे थे। क्रिस्टी अब चाँद के बिल्कुल नीचे पहुंच गई थी।

चाँद की दूरी अब उससे ज्यादा से ज्यादा 500 फुट ही ऊपर थी। पर जैसे ही क्रिस्टी चाँद के नीचे पहुंची, उसका शरीर जमीन को छोड़कर हवा में उठ गया।

“अरे यह क्या? यहां तो गुरुत्वाकर्षण है ही नहीं। अब मैं नीचे कैसे उतरूंगी?” क्रिस्टी अब परेशान हो उठी क्यों कि अब वह ना तो नीचे जा पा रही थी और ना ही चाँद के पास पहुंच पा रही थी।

क्रिस्टी अब अपने हाथ पैर हवा में चलाकर बस एक जगह पर नाच रही थी।

इस समय वह बहुत परेशान थी क्यों कि ऐसी स्थिति में वह कुछ कर नहीं पा रही थी। अब बस उसे किसी चमत्कार का इंतजार था।


जारी रहेगा_____✍️
 
🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories

parkas

Well-Known Member
34,006
71,827
303
#210.

चैपटर-13
आयुर्वेद: (तिलिस्मा 5.51)

सुयश, जेनिथ, क्रिस्टी और शैफाली तिलिस्मा के द्वार संख्या 5.5 में प्रवेश कर गये। जिसके द्वार पर त्वचा बनी हुई थी।

सभी जानते थे कि यह इन्द्रियों वाला आखिरी द्वार है। द्वार में प्रवेश करते ही सभी को एक विशाल मैदान दिखाई दिया, जो कि कई किलोमीटरों में फैला था।

सबसे आगे एक देवता की मूर्ति लगी थी, जिनके 4 हाथ थे। उनके पहले हाथ में शंख, दूसरे में चक्र, तीसरे में अमृत कलश और चौथे हाथ में कोई पत्तेनुमा औषधि थी।

उनके आगे 4 वर्गाकार पत्थर रखे थे, हर पत्थर पर एक धातु की प्लेट लगी थी, जिस पर क्रमशः प्रथम अध्याय, द्वितीय अध्याय, तृतीय अध्याय और चतुर्थ अध्याय लिखा था।

ऐसा लग रहा था कि जैसे वहां पर 4 पुस्तकें होनी चाहिये थीं? पर वह वहां थी नहीं। देवता के बगल में, हवा में एक ऊर्जा द्वार दिखाई दे रहा था।

"कैप्टेन, क्या आप बता सकते हैं कि यह कौन से देवता हैं? और क्या करते हैं?" जेनिथ ने सुयश से पूछा।


“हां, मुझे इनके बारे में पता है, यह देवता धनवंतरी हैं, जिन्हें चिकित्सा का देवता कहा जाता है।" सुयश ने कहा- “मैं तुम लोगों को इनके बारे में बताता हूं। जब देओं और दैत्यों ने समुद्र मंथन किया, तो उसमें से एक-एक कर 14 रत्न निकले थे। सबसे आखिर में अमृत कलश को अपने हाथ में लेकर धनवंतरी ही निकले थे। धनवंतरी के जन्म के उपलक्ष में ही ह…न्दू धनतेरस का त्योहार मनाते हैं। इन्होंने देओं की चिकित्सा के लिये आयुर्वेद नामक ग्रंथ का निर्माण किया। इन्होंने समुद्र मंथन से प्रकट होने के बाद, भगवान विरष्णु से, देवलोक में अपने रहने का स्थान मांगा, तो भगवान ने इनसे कहा कि आप देवता नहीं हैं। आपका जन्म देवताओं के बाद हुआ है, इसलिये आपको पृथ्वी लोक पर जन्म लेकर, सिद्धी प्राप्त करके देवताओं का पद कमाना पड़ेगा। भगवान के कथनों को सुन धनवंतरी ने आयुर्वेद का ज्ञान ब्रह..देव को दिया और स्वयं वहीं कणों में समा गये। बाद में इन्होंने पृथ्वी पर काशी राज धन्व के परिवार में दोबारा जन्म लिया।

“उधर ब्र..देव ने आयुर्वेद का ज्ञान प्रजापति को एक लाख श्लोक के साथ दिया, दक्ष ने अश्विनी कुमारों को, फिर अश्विनी कुमारों ने देवराज को और इंद्र से वह ज्ञान ऋषि भरद्वाज को प्राप्त हुआ। ऋषि भरद्वाज से यह ज्ञान पुनः धनवंतरी ने प्राप्त किया और फिर काशी में पृथ्वी का पहला चिकित्सा का विद्यालय बनाया गया, जिसके प्रधानाचार्य विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत थे। जिन्हें पृथ्वी का पहला शल्य चिकित्सा का डॉक्टर कहा जाता है।"

“भारत का इतिहास तो काफी पुराना और अद्भुत है।" क्रिस्टी ने कहा- “मैं यहां से निकलने के बाद भारत के इतिहास के बारे में पढ़ना चाहूंगी।"

"तो फिर समझ में आ गया कि हमें यहां करना क्या है?" शैफाली ने कहा- “हमें यहां देवता धनवंतरी के लिये आयुर्वेद के 4 अध्याय को लाकर इन वर्गाकार पत्थरों पर रखना है। अब यह 4 अध्याय इसी स्थान पर कहीं होने चाहिये?"

"कहीं वह 4 अध्याय इस ऊर्जा द्वार में तो नहीं?" जेनिथ ने सबका ध्यान ऊर्जा द्वार की ओर करते कहा।

जेनिथ की बात सुन सुयश चलता हुआ ऊर्जा द्वार के पास आया और उसे हाथ लगाकर देखा। सुयश को उस ऊर्जा द्वार से पहले ही कोई अदृश्य दीवार महसूस हुई, जो उसे ऊर्जा द्वार में नहीं जाने दे रही थी।

"नहीं जेनिथ, इस ऊर्जा द्वार के बाहर कोई अदृश्य दीवार है, जिसकी वजह से हम इस ऊर्जा द्वार में प्रवेश नहीं कर सकते।” सुयश ने कहा।

"तो फिर हमें कुछ और आगे चलकर देखना चाहिये। हो सकता है कि आयुर्वेद के 4 अध्याय आगे किसी स्थान पर छिपे हों?” क्रिस्टी ने कहा।

क्रिस्टी की बात सुनकर सभी उस स्थान से आगे की ओर बढ़ गये। काफी आगे जाने पर इन्हें एक पहाड़ जैसे स्थान पर 4 गुफाएं दिखाई दीं। चारो गुफाओं पर क्रमशः 1, 2, 3, 4 लिखा हुआ था।

उन गुफाओं के आगे एक 4 सिर वाले हाथी के सिर की मूर्ति लगी थी। उस हाथी की मूर्ति पर एक छोटा सा सिंहासन रखा था, जिस पर एक किताब रखी हुई थी।

सुयश ने आगे बढ़कर उस किताब को देखा। किताब पर लिखा हुआ था- “तिलिस्मा 5.5 नियमावली।"

"लो अब तो पक्का इस किताब में कैश्वर का कुछ भाषण होगा, जिसमें उसके देवता बनने के बारे में बताया गया होगा?” क्रिस्टी ने मुंह बनाते हुए कहा।

सुयश ने आगे बढ़कर उस किताब को उठा लिया।

सुयश ने किताब का पहला पृष्ठ खोलकर देखा और उसमें लिखी बातों को तेज-तेज सबके सामने पढ़ने लगा- “आप सभी का तिलिस्मा की द्वार संख्या 5.5 में स्वागत है। अगर आपको आयुर्वेद के 4 अध्याय की खोज है, तो आप सही जगह पर आये हैं। यहां मौजूद 4 गुफाएं आपको उन 4 अध्याय तक ले जायेंगी। परंतु आप उस गुफा में घुसने से पहले उन गुफाओं में मौजूद चीजों के बारे में जान लें। पहली गुफा में सूर्य की तेज अग्नि है, जिसका ताप हजारों डिग्री है। ऐसे ताप में किसी भी व्यक्ति के जाने पर उसका शरीर झुलस सकता है।

“दूसरे द्वार में बर्फ ही बर्फ भरी है, जिसके तापमान इतना कम है कि उसके अंदर प्रवेश करने वाला व्यक्ति अंदर घुसते ही जम जायेगा। तीसरे द्वार में भयानक रसायनिक गैस हैं, जो अंदर प्रवेश करने वाले व्यक्ति का शरीर जला देगी। चौथी गुफा में भयानक जहर फैला है, जो उसमें प्रवेश करने वाले व्यक्ति का शरीर पलों में पिघलाकर पानी बना देगी। तो अब अगर आप इन सभी गुफाओं में प्रवेश करके, उसके आखिर में पहुंचने में सफल हो जाते हैं, तो आप आयुर्वेद के उन अध्यायों को प्राप्त कर सकते हैं।“

आखिर में कविता की कुछ पंक्तियां लिखी थीं:-
“अग्नि जलाये वाष्प से, हिम है विष के समान, धनवंतरी के हाथ में सभी औषधि का ज्ञान।"

इतना पढ़कर सुयश ने उस किताब को वापस वहीं रख दिया, जहां से उसको उठाया था।

“दोस्तों आपने यह तो सुन ही लिया कि गुफा में किस प्रकार के खतरे हैं, परंतु अखिर में लिखी कविता की पंक्तियों से यह भी स्पष्ट हो गया कि देवता धनवंतरी के हाथ में पकड़ी औषधि को खाकर हम उन गुफाओं में प्रवेश कर सकते हैं।” सुयश ने कहा।

"तो फिर चलिये कैप्टेन, देर ना करते हुए, पहले उस औषधि को ही प्राप्त करते हैं।” जेनिथ ने कहा।

अब सभी वापस धनवंतरी की मूर्ति की ओर चल दिये। कुछ ही देर में सभी धनवंतरी के मूर्ति के सामने खड़े थे।

अब सुयश ने आगे बढ़कर धनवंतरी के हाथ में थमी औषधि को लेने की कोशिश की, पर वह औषधि को धनवंतरी के हाथ से ले नहीं पाया।

औषधि को छूते ही वह औषधि अपने स्थान से गायब हो जा रही थी। तभी धनवंतरी के सामने स्थित चारो वर्गाकार पत्थरों पर कुछ पंक्तियां लिखी दिखाई देने लगीं।

"लो अब फिर से पढ़ो कैश्वर की पहेलियां।” क्रिस्टी ने झुंझलाते हुए कहा।

किसी के पास अब और कोई चारा नहीं था, इसलिये सभी ने एक-एक पत्थर का चयन किया और अपनी-अपनी कविताएं पढ़ने लगे।

पहली पहेली थी:-
श्वेत प्रकाश से फैल रही कैसी अद्भुत माया, संग लेकर आइये किसी जीव की छाया।"

इस पत्थर का चुनाव सुयश ने किया था। सुयश ने कविता की पंक्तियों को ध्यान से पढ़ा और अपने चारो ओर देखने लगा, पर उसे इस स्थान पर कहीं भी, किसी की भी छाया बनती हुई नहीं दिखाई दी।

“क्या आपको, आपकी पहेली की पंक्तियां समझ में आयी कैप्टेन?” जेनिथ ने सुयश की ओर देखते हुए पूछा।

“यह किसी जीव की परछाई को लाने को कह रहा है।” सुयश ने कहा- “पर परेशानी यह है कि इस स्थान पर किसी भी प्रकार की छाया नहीं बन रही है। अब अगर ऐसे में मैं किसी जीव को यहां ले भी आया? तो भी मैं उसकी छाया यहां पर किस प्रकार बना पाऊंगा?"

सुयश को अपनी पहेली का मतलब तो समझ आ गया था, बस अब उसे लाने की ही बात रह गई थी, इसलिये शैफाली ने दूसरे पत्थर पर लिखी पहेली को पढ़ना शुरु कर दिया।

उस पर लिखा था:-
"हिमखंड के श्वेत कणों में नहीं एक भी दाग, हाथ लेकर आइये, हिम से निकली आग।

“ये कैसे हो सकता है?" शैफाली ने आश्चर्य से उस पहेली को देखते हुए कहा- “भला बर्फ से आग कैसे निकल सकती है?"

सभी ने काफी देर तक सोचा, पर किसी को भी शैफाली की पहेली का अर्थ समझ में नहीं आया। अतः सभी ने तीसरे पत्थर की पहेली को पढ़ना शुरु कर दिया, जिसका चयन जेनिथ ने किया था।

तीसरे पत्थर पर लिखा था। :-
“चंद्रकिरण से जन्में, एक सहस्त्र त्रिशूल, मेरी तो अभिलाषा है, नवनिर्मित एक फूल।"

"ये पहेली भी समझ में नहीं आ रही?” जेनिथ ने कहा- “भला चंद्रमा की किरणों से त्रिशूल कैसे जन्म ले सकते हैं?”

कुछ देर की माथा पच्ची के बाद सभी चौथी पहेली की ओर बढ़ गये, जो कि क्रिस्टी के लिये थी।

चौथे पत्थर पर लिखा था:-
“शाख भेष धरकर बैठा, एक वृश्चिक डंक, मुझे चाहिये आसमान में चमक रहा मयंक।"

“यह पहेली भी अन्य पहेलियों की भांति ही लग रही है, जिसे समझना अत्यंत मुश्किल लग रहा है। भला आसमान के चाँद को कोई कैसे तोड़कर ला सकता है?" क्रिस्टी ने कहा।

"मेरे ख्याल से जब तक उस स्थान पर नहीं पहुंचेंगे, जहां से यह सभी चीजें लानी हैं, तब तक हम पहेली को समझ भी नहीं पायेंगे?” सुयश ने कहा- “इसलिये अब पहले उस स्थान की ओर चलना चाहिये पर...पर वह स्थान है कहां पर?"

“कैप्टेन अंकल, उस ऊर्जा द्वार के आगे खड़ी अदृश्य दीवार अब हट चुकी है।” शैफाली ने कहा- “मुझे लगता है कि हमारी सभी चीजें इसी द्वार के अंदर ही मिलेंगी। तो हमें अपनी-अपनी पहेलियों को याद कर इस द्वार में प्रवेश करना चाहिये।"

शैफाली के शब्द सुन सभी ने एक बार फिर ध्यान से अपनी पहेलियों को पढ़ा और एक-एक कर उस ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गये।

सुयश जैसे ही उस ऊर्जा द्वार से निकला, वह ऊर्जा द्वार स्वयमेव बंद हो गया।

“अरे, यह द्वार तो बंद हो गया? लगता है कैश्वर ने सभी के लिये अलग-अलग स्थानों का चुनाव किया है।' सुयश मन ही मन बड़बड़ाया- “मुझे लगता है कि कैश्वर अब हमारी सम्मिलित शक्ति से घबरा रहा है, इसलिये वह हम सभी को अलग-अलग स्थानों पर भेजकर कार्य दे रहा है।....कोई बात नहीं हम भी कैश्वर को साबित कर देंगे कि नियति ने हमें यूं ही नहीं चुना है, इस तिलिस्मा के लिये।" यह सोच सुयश ने स्वयं का हौसला बढ़ाया और उस स्थान को देखने लगा।

वह स्थान एक रेतीला रेगिस्तान थी, जिसके सिर पर तेज सूर्य चमक रहा था, पर उस स्थान पर दूर-दूर तक कोई चीज नजर नहीं आ रही थी।

“यह क्या? यहां तो रेत के सिवा कुछ भी नहीं है, ऐसे में मैं किसी जीव को कैसे ढूंढू?" सुयश यह सोच आगे की ओर बढ़ गया।

सुयश ऐसे ही तेज धूप में आधे घंटे तक इधर-उधर भटकता रहा, पर उसे जीव तो क्या कोई काँटों वाला पेड़ तक दिखाई नहीं दिया।

सुयश ने एक नजर अब ऊपर आसमान में चमक रहे सूर्य पर मारी और फिर सूर्य के एक मंत्र का जाप करते हुए कहा- “हे सूर्यदेव, मुझे पता है कि आप तिलिस्मा में मेरी कोई मदद नहीं कर सकते... मुझे तो ये भी पता है कि यह आपका वास्तविक रुप नहीं, वरन् कैश्वर काबनाया एक माया जाल है, परंतु हे भगवान, आप मेरा इस विकट संकट में मार्गदर्शन करें।"

सुयश को पता था कि सूर्यदेव इस तिलिस्मा में उसकी कोई मदद नहीं करने वाले, फिर भी उसने सूर्यदेव की प्रार्थना की।

तभी सुयश को रेत की एक ऊंची सी चट्टान दिखाई दी, जिसकी तीन नोक किसी त्रिशूल की भांति प्रतीत हो रही थी। सुयश ने अब उस चट्टान की परछाई को देखा, जो कि जमीन पर बन रही थी।

चट्टान की परछाई बिल्कुल किसी त्रिशूल की भांति प्रतीत हो रही थी। अब कुछ सोच सुयश उस त्रिशूल की परछाई के पास पहुंच गया और उस त्रिशूल के मध्य वाली नोक के स्थान पर जमीन की रेत को हटाने लगा।

थोड़ी ही रेत हटाते ही सुयश के हाथ, रेत के नीचे दबी किसी चीज से टकराये।

सुयश ने जल्दी-जल्दी उस स्थान की रेत को पूरी तरह से साफ कर दिया। अब वहां पर सुयश को एक 2 फुट की ऊँट की मूर्ति दिखाई दी।

ऊँट की मूर्ति देख सुयश हैरान हो गया, उसे रेत के नीचे ऐसी किसी चीज की आशा नहीं थी।

सुयश ने जैसे ही उस मूर्ति को अपने हाथ में उठाया, उस स्थान की रेत जमीन में धंस गई और उसके साथ ही सुयश भी जमीन के अंदर समा गया।

सुयश नीचे जाकर किसी पत्थर से टकराया। सुयश अब धीरे से उठकर खड़ा हो गया। ऊँट की मूर्ति अब भी सुयश के हाथों में थी।

सुयश अब चारो ओर उस स्थान को देखने लगा। वह स्थान किसी रेत में दबे पिरामिड की तरह लग रहा था।

पिरामिड की सभी दीवारें बड़े पत्थरों से निर्मित थी। पता नहीं कहां से उस स्थान पर रोशनी आ रही थी, जिसकी वजह से वह स्थान प्रकाशमान था।

सुयश जिस स्थान पर गिरा था, वह एक बड़ा सा कमरा था। उस कमरे में कुछ भी नहीं था। सुयश उस कमरे से निकलकर बाहर की ओर आ गया।

बाहर एक लंबी सी गैलरी थी, जिसमें ऊपर की ओर, थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कुछ छेद दिखाई दे रहे थे। उन छेदों से रेत निकलकर नीचे गिर रही थी। सुयश उस गैलरी में आगे की ओर बढ़ गया।

सुयश चलता हुआ पूरी तरह से सावधान भी था। उस गैलरी में कुछ भी नहीं था। सुयश चलता हुआ, उस गैलरी के अंत में पहुंच गया।

अंत में एक बड़ी दरार छत में बनी थी, जिससे तेजी से रेत नीचे गिर रही थी। पर आश्चर्य की बात यह थी कि वह रेत नीचे गिरते ही पता नहीं कहां गायब हो जा रही थी?

एक तरह से वह स्थान रेत का झरना दिखाई दे रहा था। सुयश ने धीरे से अपना दाहिना हाथ उस रेत के झरने के अंदर डाला। सुयश को अंदर खाली स्थान महसूस हुआ।

अब सुयश उस खाली स्थान में प्रवेश कर गया। इस बार सुयश जिस स्थान पर निकला, वहां जमीन में एक विशाल गड्डा दिखाई दे रहा था। उस गड्ढे को देख ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे वह पाताल के अंदर जाने का रास्ता हो।

उस गड्ढे में बीच-बीच में, 4 वर्ग फुट के, कुछ पत्थर हवा में लहरा रहे थे, जो कि शायद दूसरी ओर जाने के लिये एक टूटे हुए पुल के जैसे कार्य कर रहे थे। हर लहराते पत्थर के बीच कम से कम 8 फुट का अंतर था।

पत्थर का आकार भी बड़ा ना होने के कारण, यह 8 फुट का फासला भी बड़ा दिख रहा था। तभी सुयश को उस विशाल गड्ढे के दूसरी ओर हवा में चमकती एक रोशनी दिखाई दी।

यह देख सुयश समझ गया कि अवश्य ही उस गड्ढे के पार कुछ ना कुछ है। अतः सुयश ने ऊँट की मूर्ति को अपने हाथ में ठीक से पकड़ा और पहले पत्थर की ओर छलांग लगा दी।

सुयश सकुशल पहले पत्थर पर पहुंच गया। तभी सुयश को दूसरा पत्थर 1 फुट और आगे खिसकता हुआ दिखाई दिया।

“यह क्या? अब तो दूसरे पत्थर के बीच की दूरी 9 फुट हो गई है, इस दूरी को पार करना तो मुश्किल है, पर और कोई चारा ना देख, सुयश ने अपने शरीर को थोड़ा पीछे की ओर किया और दूसरे पत्थर पर छलांग लगा दी।

दूसरे पत्थर का फासला ज्यादा होने की वजह से सुयश के एक पैर का पंजा ही दूसरे पत्थर पर पहुंचा।
पर सुयश ने अपने शरीर को नियंत्रित किया और सकुशल दूसरे पत्थर पर पहुंच गया।

तभी सुयश को तीसरा पत्थर अपने स्थान से 2 फुट आगे खिसकता हुआ दिखाई दिया।

अब तीसरे पत्थर की दूरी सुयश से 10 फुट हो गई थी और इस दूरी को पार करना सुयश के लिये बिल्कुल असंभव था।

अब सुयश ने पीछे पलटकर देखा, पर पीछे की ओर से पहले और दूसरे पत्थर अब गायब हो गये थे।

यानि कि सुयश अब पीछे भी नहीं जा सकता था। अब सुयश पूरी तरह से उस स्थान पर फंस गया था।
कुछ देर तक ऐसे ही खड़े रहने के बाद सुयश उस पत्थर पर बैठ गया।

इस समय उसे क्रिस्टी की याद आ रही थी, अगर वह यहां होती, तो इन पत्थरों को आसानी से पार कर सकती थी।
...........................................
उधर क्रिस्टी जैसे ही ऊर्जा द्वार के अंदर घुसी, उसका भी द्वार बंद हो गया। क्रिस्टी समझ गई कि उसे अकेले ही इस बाधा को पार करना होगा। अतः वह उस पूरे स्थान को ध्यान से देखने लगी।

वह एक गाँव का वातावरण था, जिसमें हर स्थान पर गाँव के लोगों की मूर्तियां लगीं थीं। कोई बैल और हल लेकर खेत की ओर जा रहा था, तो कोई खेत में पौधे बोने का कार्य कर रहा था।

क्रिस्टी उस पूरे स्थान पर घूम-घूम कर सभी मूर्तियों को देखने लगी। उसे किसी बिच्छू के डंक और चंद्रमा को ढूंढना था, पर यहां तो आसमान में सूर्य चमक रहा था, चंद्रमा का तो कहीं पर नामो निशान भी नहीं था।

क्रिस्टी चारो ओर देखती आगे बढ़ गई। कुछ आगे उसे एक कुंए के चारो ओर बैठी औरतें कपड़े धोते हुए दिखाई दीं। यह सब भी औरतों की मूर्तियां ही थीं।

काफी देर तक देखने के बाद भी क्रिस्टी को वहां भी कुछ समझ में नहीं आया। अतः वह और आगे बढ़ गई।

अब क्रिस्टी को एक स्थान पर कुछ बच्चों की मूर्तियां दिखाई दीं। कुछ बच्चे वहां जमीन पर रेखाएं बनाकर कोई खेल, खेल रहे थे, तो कुछ बच्चे एक बीन बजाते सपेरे के पास बैठे साँप का नाच देख रहे थे।

साँप और सपेरे की मूर्ति देख क्रिस्टी उस ओर आ गई, उसे लगा कि यदि इस सपेरे के पास साँप हैं, तो इसके पास बिच्छू भी हो सकता है।

सपेरे के हाथ में पकड़ी बीन बिल्कुल असली लग रही थी। क्रिस्टी ने सपेरे के बगल में रखी पिटारी को खोलकर देखा, पर उसमें भी कुछ नहीं था।

तभी क्रिस्टी की नजर बगल में खेल रहे बच्चों के द्वारा, जमीन पर बनाई गई आकृति पर गई।

उस आकृति में आसमान में एक चाँद दिखाई दे रहा था, जिसे कि बच्चे किसी रस्सी से तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। क्रिस्टी बच्चों के द्वारा बनाई गई आकृति को देख उनकी कल्पना को निहारने लगी।

"बच्चे भी ना कैसी-कैसी आकृतियां उकेरते हैं, अपनी कल्पनाओं से? अब भला चाँद भी कोई रस्सी से तोड़ सकता है।" यह सोच क्रिस्टी धीरे से मुस्कुरा दी।

तभी क्रिस्टी की निगाह फिर से सपेरे की ओर गई, उसकी पिटारी पर एक बड़ा सा रस्सी का गुच्छा रखा था।

अब क्रिस्टी ने एक बार फिर बच्चों की बनाई तस्वीर को देखा और फिर धीरे-धीरे चलती हुई सपेरे के पास पहुंच गई।

क्रिस्टी ने अब पिटारी पर रखी उस रस्सी को उठाकर जमीन पर रख दिया और सपेरे के हाथ से बीन को ले लिया।

अब क्रिस्टी को अपने बचपन की एक घटना याद आ गई। बचपन में उसने एक जादुई फिल्म में देखा था कि एक बीन बजाने से रस्सी साँप की तरह नाच रही थी। बस इसी घटना को याद कर क्रिस्टी ने बीन को अपने मुंह से लगाया और उसे बजाने की कोशिश करने लगी।

क्रिस्टी ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी बीन नहीं बजाया था, पर उसके फूंक मारते ही बीन अपने आप बजने लगी।

बीन बजते हुए तेजी से हिल भी रही थी, इसलिये क्रिस्टी ने घबराकर बीन को अपने हाथ से छोड़ दिया।

क्रिस्टी के हाथ से छोड़ने के बाद भी बीन जमीन पर नहीं गिरी, वह तो अब भी अपने आप बजती जा रही थी।

इसी के साथ अब रस्सी, बीन की आवाज पर नाचते हुए आसमान की ओर उठने लगी। यह देख क्रिस्टी थोड़ा पीछे हटकर इस पूरे दृश्य को देखने लगी।

कुछ ही देर में रस्सी आसमान में बहुत ऊपर तक चली गई।

जब रस्सी का आखिरी सिरा दिखाई देने लगा, तो बीन स्वयं बंद हो गई, पर वह रस्सी अभी भी किसी आसमान के पुल की भांति हवा में टंगी थी। कुछ सोच क्रिस्टी ने उस रस्सी पर चढ़ना शुरु कर दिया।

काफी ऊपर चढ़ने के बाद क्रिस्टी को आसमान में बादल दिखाई देना शुरु हो गये। वह रस्सी बादलों के बीच ही जा रही थी।

कुछ ही देर के बाद क्रिस्टी अब बादलों के ऊपर खड़ी थी।

क्रिस्टी के ऊपर पहुंचते-पहुंचते रात हो गई थी और अब आसमान में चाँद दिखाई देने लगा था। क्रिस्टी को आसमान में चमकने वाले चाँद और सितारे अब स्वयं से ज्यादा दूरी पर नहीं लग रहे थे।

क्रिस्टी धीरे-धीरे चाँद की ओर बढ़ने लगी। तभी क्रिस्टी को आसमान में कुछ टूटते तारे दिखाई दिये।

“अरे, यह क्या? एक साथ इतने टूटते तारों को तो मैने कभी नहीं देखा?...और.... और यह क्या? ये तारे तो आसमान से जमीन की ओर आने की जगह, जमीन से आसमान की ओर जा रहे हैं। यह कैसे संभव हो सकता है? मुझे पास चलकर देखना चाहिये।" यह सोच क्रिस्टी चाँद की ओर चल दी।

टूटते तारे चाँद के पास जाते ही गायब हो जा रहे थे। क्रिस्टी अब चाँद के बिल्कुल नीचे पहुंच गई थी।

चाँद की दूरी अब उससे ज्यादा से ज्यादा 500 फुट ही ऊपर थी। पर जैसे ही क्रिस्टी चाँद के नीचे पहुंची, उसका शरीर जमीन को छोड़कर हवा में उठ गया।

“अरे यह क्या? यहां तो गुरुत्वाकर्षण है ही नहीं। अब मैं नीचे कैसे उतरूंगी?” क्रिस्टी अब परेशान हो उठी क्यों कि अब वह ना तो नीचे जा पा रही थी और ना ही चाँद के पास पहुंच पा रही थी।

क्रिस्टी अब अपने हाथ पैर हवा में चलाकर बस एक जगह पर नाच रही थी।

इस समय वह बहुत परेशान थी क्यों कि ऐसी स्थिति में वह कुछ कर नहीं पा रही थी। अब बस उसे किसी चमत्कार का इंतजार था।


जारी रहेगा_____✍️
Bahut hi shaandar update diya hai Raj_sharma bhai....
Nice and lovely update....
 

kas1709

Well-Known Member
13,854
14,995
228
#210.

चैपटर-13
आयुर्वेद: (तिलिस्मा 5.51)

सुयश, जेनिथ, क्रिस्टी और शैफाली तिलिस्मा के द्वार संख्या 5.5 में प्रवेश कर गये। जिसके द्वार पर त्वचा बनी हुई थी।

सभी जानते थे कि यह इन्द्रियों वाला आखिरी द्वार है। द्वार में प्रवेश करते ही सभी को एक विशाल मैदान दिखाई दिया, जो कि कई किलोमीटरों में फैला था।

सबसे आगे एक देवता की मूर्ति लगी थी, जिनके 4 हाथ थे। उनके पहले हाथ में शंख, दूसरे में चक्र, तीसरे में अमृत कलश और चौथे हाथ में कोई पत्तेनुमा औषधि थी।

उनके आगे 4 वर्गाकार पत्थर रखे थे, हर पत्थर पर एक धातु की प्लेट लगी थी, जिस पर क्रमशः प्रथम अध्याय, द्वितीय अध्याय, तृतीय अध्याय और चतुर्थ अध्याय लिखा था।

ऐसा लग रहा था कि जैसे वहां पर 4 पुस्तकें होनी चाहिये थीं? पर वह वहां थी नहीं। देवता के बगल में, हवा में एक ऊर्जा द्वार दिखाई दे रहा था।

"कैप्टेन, क्या आप बता सकते हैं कि यह कौन से देवता हैं? और क्या करते हैं?" जेनिथ ने सुयश से पूछा।


“हां, मुझे इनके बारे में पता है, यह देवता धनवंतरी हैं, जिन्हें चिकित्सा का देवता कहा जाता है।" सुयश ने कहा- “मैं तुम लोगों को इनके बारे में बताता हूं। जब देओं और दैत्यों ने समुद्र मंथन किया, तो उसमें से एक-एक कर 14 रत्न निकले थे। सबसे आखिर में अमृत कलश को अपने हाथ में लेकर धनवंतरी ही निकले थे। धनवंतरी के जन्म के उपलक्ष में ही ह…न्दू धनतेरस का त्योहार मनाते हैं। इन्होंने देओं की चिकित्सा के लिये आयुर्वेद नामक ग्रंथ का निर्माण किया। इन्होंने समुद्र मंथन से प्रकट होने के बाद, भगवान विरष्णु से, देवलोक में अपने रहने का स्थान मांगा, तो भगवान ने इनसे कहा कि आप देवता नहीं हैं। आपका जन्म देवताओं के बाद हुआ है, इसलिये आपको पृथ्वी लोक पर जन्म लेकर, सिद्धी प्राप्त करके देवताओं का पद कमाना पड़ेगा। भगवान के कथनों को सुन धनवंतरी ने आयुर्वेद का ज्ञान ब्रह..देव को दिया और स्वयं वहीं कणों में समा गये। बाद में इन्होंने पृथ्वी पर काशी राज धन्व के परिवार में दोबारा जन्म लिया।

“उधर ब्र..देव ने आयुर्वेद का ज्ञान प्रजापति को एक लाख श्लोक के साथ दिया, दक्ष ने अश्विनी कुमारों को, फिर अश्विनी कुमारों ने देवराज को और इंद्र से वह ज्ञान ऋषि भरद्वाज को प्राप्त हुआ। ऋषि भरद्वाज से यह ज्ञान पुनः धनवंतरी ने प्राप्त किया और फिर काशी में पृथ्वी का पहला चिकित्सा का विद्यालय बनाया गया, जिसके प्रधानाचार्य विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत थे। जिन्हें पृथ्वी का पहला शल्य चिकित्सा का डॉक्टर कहा जाता है।"

“भारत का इतिहास तो काफी पुराना और अद्भुत है।" क्रिस्टी ने कहा- “मैं यहां से निकलने के बाद भारत के इतिहास के बारे में पढ़ना चाहूंगी।"

"तो फिर समझ में आ गया कि हमें यहां करना क्या है?" शैफाली ने कहा- “हमें यहां देवता धनवंतरी के लिये आयुर्वेद के 4 अध्याय को लाकर इन वर्गाकार पत्थरों पर रखना है। अब यह 4 अध्याय इसी स्थान पर कहीं होने चाहिये?"

"कहीं वह 4 अध्याय इस ऊर्जा द्वार में तो नहीं?" जेनिथ ने सबका ध्यान ऊर्जा द्वार की ओर करते कहा।

जेनिथ की बात सुन सुयश चलता हुआ ऊर्जा द्वार के पास आया और उसे हाथ लगाकर देखा। सुयश को उस ऊर्जा द्वार से पहले ही कोई अदृश्य दीवार महसूस हुई, जो उसे ऊर्जा द्वार में नहीं जाने दे रही थी।

"नहीं जेनिथ, इस ऊर्जा द्वार के बाहर कोई अदृश्य दीवार है, जिसकी वजह से हम इस ऊर्जा द्वार में प्रवेश नहीं कर सकते।” सुयश ने कहा।

"तो फिर हमें कुछ और आगे चलकर देखना चाहिये। हो सकता है कि आयुर्वेद के 4 अध्याय आगे किसी स्थान पर छिपे हों?” क्रिस्टी ने कहा।

क्रिस्टी की बात सुनकर सभी उस स्थान से आगे की ओर बढ़ गये। काफी आगे जाने पर इन्हें एक पहाड़ जैसे स्थान पर 4 गुफाएं दिखाई दीं। चारो गुफाओं पर क्रमशः 1, 2, 3, 4 लिखा हुआ था।

उन गुफाओं के आगे एक 4 सिर वाले हाथी के सिर की मूर्ति लगी थी। उस हाथी की मूर्ति पर एक छोटा सा सिंहासन रखा था, जिस पर एक किताब रखी हुई थी।

सुयश ने आगे बढ़कर उस किताब को देखा। किताब पर लिखा हुआ था- “तिलिस्मा 5.5 नियमावली।"

"लो अब तो पक्का इस किताब में कैश्वर का कुछ भाषण होगा, जिसमें उसके देवता बनने के बारे में बताया गया होगा?” क्रिस्टी ने मुंह बनाते हुए कहा।

सुयश ने आगे बढ़कर उस किताब को उठा लिया।

सुयश ने किताब का पहला पृष्ठ खोलकर देखा और उसमें लिखी बातों को तेज-तेज सबके सामने पढ़ने लगा- “आप सभी का तिलिस्मा की द्वार संख्या 5.5 में स्वागत है। अगर आपको आयुर्वेद के 4 अध्याय की खोज है, तो आप सही जगह पर आये हैं। यहां मौजूद 4 गुफाएं आपको उन 4 अध्याय तक ले जायेंगी। परंतु आप उस गुफा में घुसने से पहले उन गुफाओं में मौजूद चीजों के बारे में जान लें। पहली गुफा में सूर्य की तेज अग्नि है, जिसका ताप हजारों डिग्री है। ऐसे ताप में किसी भी व्यक्ति के जाने पर उसका शरीर झुलस सकता है।

“दूसरे द्वार में बर्फ ही बर्फ भरी है, जिसके तापमान इतना कम है कि उसके अंदर प्रवेश करने वाला व्यक्ति अंदर घुसते ही जम जायेगा। तीसरे द्वार में भयानक रसायनिक गैस हैं, जो अंदर प्रवेश करने वाले व्यक्ति का शरीर जला देगी। चौथी गुफा में भयानक जहर फैला है, जो उसमें प्रवेश करने वाले व्यक्ति का शरीर पलों में पिघलाकर पानी बना देगी। तो अब अगर आप इन सभी गुफाओं में प्रवेश करके, उसके आखिर में पहुंचने में सफल हो जाते हैं, तो आप आयुर्वेद के उन अध्यायों को प्राप्त कर सकते हैं।“

आखिर में कविता की कुछ पंक्तियां लिखी थीं:-
“अग्नि जलाये वाष्प से, हिम है विष के समान, धनवंतरी के हाथ में सभी औषधि का ज्ञान।"

इतना पढ़कर सुयश ने उस किताब को वापस वहीं रख दिया, जहां से उसको उठाया था।

“दोस्तों आपने यह तो सुन ही लिया कि गुफा में किस प्रकार के खतरे हैं, परंतु अखिर में लिखी कविता की पंक्तियों से यह भी स्पष्ट हो गया कि देवता धनवंतरी के हाथ में पकड़ी औषधि को खाकर हम उन गुफाओं में प्रवेश कर सकते हैं।” सुयश ने कहा।

"तो फिर चलिये कैप्टेन, देर ना करते हुए, पहले उस औषधि को ही प्राप्त करते हैं।” जेनिथ ने कहा।

अब सभी वापस धनवंतरी की मूर्ति की ओर चल दिये। कुछ ही देर में सभी धनवंतरी के मूर्ति के सामने खड़े थे।

अब सुयश ने आगे बढ़कर धनवंतरी के हाथ में थमी औषधि को लेने की कोशिश की, पर वह औषधि को धनवंतरी के हाथ से ले नहीं पाया।

औषधि को छूते ही वह औषधि अपने स्थान से गायब हो जा रही थी। तभी धनवंतरी के सामने स्थित चारो वर्गाकार पत्थरों पर कुछ पंक्तियां लिखी दिखाई देने लगीं।

"लो अब फिर से पढ़ो कैश्वर की पहेलियां।” क्रिस्टी ने झुंझलाते हुए कहा।

किसी के पास अब और कोई चारा नहीं था, इसलिये सभी ने एक-एक पत्थर का चयन किया और अपनी-अपनी कविताएं पढ़ने लगे।

पहली पहेली थी:-
श्वेत प्रकाश से फैल रही कैसी अद्भुत माया, संग लेकर आइये किसी जीव की छाया।"

इस पत्थर का चुनाव सुयश ने किया था। सुयश ने कविता की पंक्तियों को ध्यान से पढ़ा और अपने चारो ओर देखने लगा, पर उसे इस स्थान पर कहीं भी, किसी की भी छाया बनती हुई नहीं दिखाई दी।

“क्या आपको, आपकी पहेली की पंक्तियां समझ में आयी कैप्टेन?” जेनिथ ने सुयश की ओर देखते हुए पूछा।

“यह किसी जीव की परछाई को लाने को कह रहा है।” सुयश ने कहा- “पर परेशानी यह है कि इस स्थान पर किसी भी प्रकार की छाया नहीं बन रही है। अब अगर ऐसे में मैं किसी जीव को यहां ले भी आया? तो भी मैं उसकी छाया यहां पर किस प्रकार बना पाऊंगा?"

सुयश को अपनी पहेली का मतलब तो समझ आ गया था, बस अब उसे लाने की ही बात रह गई थी, इसलिये शैफाली ने दूसरे पत्थर पर लिखी पहेली को पढ़ना शुरु कर दिया।

उस पर लिखा था:-
"हिमखंड के श्वेत कणों में नहीं एक भी दाग, हाथ लेकर आइये, हिम से निकली आग।

“ये कैसे हो सकता है?" शैफाली ने आश्चर्य से उस पहेली को देखते हुए कहा- “भला बर्फ से आग कैसे निकल सकती है?"

सभी ने काफी देर तक सोचा, पर किसी को भी शैफाली की पहेली का अर्थ समझ में नहीं आया। अतः सभी ने तीसरे पत्थर की पहेली को पढ़ना शुरु कर दिया, जिसका चयन जेनिथ ने किया था।

तीसरे पत्थर पर लिखा था। :-
“चंद्रकिरण से जन्में, एक सहस्त्र त्रिशूल, मेरी तो अभिलाषा है, नवनिर्मित एक फूल।"

"ये पहेली भी समझ में नहीं आ रही?” जेनिथ ने कहा- “भला चंद्रमा की किरणों से त्रिशूल कैसे जन्म ले सकते हैं?”

कुछ देर की माथा पच्ची के बाद सभी चौथी पहेली की ओर बढ़ गये, जो कि क्रिस्टी के लिये थी।

चौथे पत्थर पर लिखा था:-
“शाख भेष धरकर बैठा, एक वृश्चिक डंक, मुझे चाहिये आसमान में चमक रहा मयंक।"

“यह पहेली भी अन्य पहेलियों की भांति ही लग रही है, जिसे समझना अत्यंत मुश्किल लग रहा है। भला आसमान के चाँद को कोई कैसे तोड़कर ला सकता है?" क्रिस्टी ने कहा।

"मेरे ख्याल से जब तक उस स्थान पर नहीं पहुंचेंगे, जहां से यह सभी चीजें लानी हैं, तब तक हम पहेली को समझ भी नहीं पायेंगे?” सुयश ने कहा- “इसलिये अब पहले उस स्थान की ओर चलना चाहिये पर...पर वह स्थान है कहां पर?"

“कैप्टेन अंकल, उस ऊर्जा द्वार के आगे खड़ी अदृश्य दीवार अब हट चुकी है।” शैफाली ने कहा- “मुझे लगता है कि हमारी सभी चीजें इसी द्वार के अंदर ही मिलेंगी। तो हमें अपनी-अपनी पहेलियों को याद कर इस द्वार में प्रवेश करना चाहिये।"

शैफाली के शब्द सुन सभी ने एक बार फिर ध्यान से अपनी पहेलियों को पढ़ा और एक-एक कर उस ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गये।

सुयश जैसे ही उस ऊर्जा द्वार से निकला, वह ऊर्जा द्वार स्वयमेव बंद हो गया।

“अरे, यह द्वार तो बंद हो गया? लगता है कैश्वर ने सभी के लिये अलग-अलग स्थानों का चुनाव किया है।' सुयश मन ही मन बड़बड़ाया- “मुझे लगता है कि कैश्वर अब हमारी सम्मिलित शक्ति से घबरा रहा है, इसलिये वह हम सभी को अलग-अलग स्थानों पर भेजकर कार्य दे रहा है।....कोई बात नहीं हम भी कैश्वर को साबित कर देंगे कि नियति ने हमें यूं ही नहीं चुना है, इस तिलिस्मा के लिये।" यह सोच सुयश ने स्वयं का हौसला बढ़ाया और उस स्थान को देखने लगा।

वह स्थान एक रेतीला रेगिस्तान थी, जिसके सिर पर तेज सूर्य चमक रहा था, पर उस स्थान पर दूर-दूर तक कोई चीज नजर नहीं आ रही थी।

“यह क्या? यहां तो रेत के सिवा कुछ भी नहीं है, ऐसे में मैं किसी जीव को कैसे ढूंढू?" सुयश यह सोच आगे की ओर बढ़ गया।

सुयश ऐसे ही तेज धूप में आधे घंटे तक इधर-उधर भटकता रहा, पर उसे जीव तो क्या कोई काँटों वाला पेड़ तक दिखाई नहीं दिया।

सुयश ने एक नजर अब ऊपर आसमान में चमक रहे सूर्य पर मारी और फिर सूर्य के एक मंत्र का जाप करते हुए कहा- “हे सूर्यदेव, मुझे पता है कि आप तिलिस्मा में मेरी कोई मदद नहीं कर सकते... मुझे तो ये भी पता है कि यह आपका वास्तविक रुप नहीं, वरन् कैश्वर काबनाया एक माया जाल है, परंतु हे भगवान, आप मेरा इस विकट संकट में मार्गदर्शन करें।"

सुयश को पता था कि सूर्यदेव इस तिलिस्मा में उसकी कोई मदद नहीं करने वाले, फिर भी उसने सूर्यदेव की प्रार्थना की।

तभी सुयश को रेत की एक ऊंची सी चट्टान दिखाई दी, जिसकी तीन नोक किसी त्रिशूल की भांति प्रतीत हो रही थी। सुयश ने अब उस चट्टान की परछाई को देखा, जो कि जमीन पर बन रही थी।

चट्टान की परछाई बिल्कुल किसी त्रिशूल की भांति प्रतीत हो रही थी। अब कुछ सोच सुयश उस त्रिशूल की परछाई के पास पहुंच गया और उस त्रिशूल के मध्य वाली नोक के स्थान पर जमीन की रेत को हटाने लगा।

थोड़ी ही रेत हटाते ही सुयश के हाथ, रेत के नीचे दबी किसी चीज से टकराये।

सुयश ने जल्दी-जल्दी उस स्थान की रेत को पूरी तरह से साफ कर दिया। अब वहां पर सुयश को एक 2 फुट की ऊँट की मूर्ति दिखाई दी।

ऊँट की मूर्ति देख सुयश हैरान हो गया, उसे रेत के नीचे ऐसी किसी चीज की आशा नहीं थी।

सुयश ने जैसे ही उस मूर्ति को अपने हाथ में उठाया, उस स्थान की रेत जमीन में धंस गई और उसके साथ ही सुयश भी जमीन के अंदर समा गया।

सुयश नीचे जाकर किसी पत्थर से टकराया। सुयश अब धीरे से उठकर खड़ा हो गया। ऊँट की मूर्ति अब भी सुयश के हाथों में थी।

सुयश अब चारो ओर उस स्थान को देखने लगा। वह स्थान किसी रेत में दबे पिरामिड की तरह लग रहा था।

पिरामिड की सभी दीवारें बड़े पत्थरों से निर्मित थी। पता नहीं कहां से उस स्थान पर रोशनी आ रही थी, जिसकी वजह से वह स्थान प्रकाशमान था।

सुयश जिस स्थान पर गिरा था, वह एक बड़ा सा कमरा था। उस कमरे में कुछ भी नहीं था। सुयश उस कमरे से निकलकर बाहर की ओर आ गया।

बाहर एक लंबी सी गैलरी थी, जिसमें ऊपर की ओर, थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कुछ छेद दिखाई दे रहे थे। उन छेदों से रेत निकलकर नीचे गिर रही थी। सुयश उस गैलरी में आगे की ओर बढ़ गया।

सुयश चलता हुआ पूरी तरह से सावधान भी था। उस गैलरी में कुछ भी नहीं था। सुयश चलता हुआ, उस गैलरी के अंत में पहुंच गया।

अंत में एक बड़ी दरार छत में बनी थी, जिससे तेजी से रेत नीचे गिर रही थी। पर आश्चर्य की बात यह थी कि वह रेत नीचे गिरते ही पता नहीं कहां गायब हो जा रही थी?

एक तरह से वह स्थान रेत का झरना दिखाई दे रहा था। सुयश ने धीरे से अपना दाहिना हाथ उस रेत के झरने के अंदर डाला। सुयश को अंदर खाली स्थान महसूस हुआ।

अब सुयश उस खाली स्थान में प्रवेश कर गया। इस बार सुयश जिस स्थान पर निकला, वहां जमीन में एक विशाल गड्डा दिखाई दे रहा था। उस गड्ढे को देख ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे वह पाताल के अंदर जाने का रास्ता हो।

उस गड्ढे में बीच-बीच में, 4 वर्ग फुट के, कुछ पत्थर हवा में लहरा रहे थे, जो कि शायद दूसरी ओर जाने के लिये एक टूटे हुए पुल के जैसे कार्य कर रहे थे। हर लहराते पत्थर के बीच कम से कम 8 फुट का अंतर था।

पत्थर का आकार भी बड़ा ना होने के कारण, यह 8 फुट का फासला भी बड़ा दिख रहा था। तभी सुयश को उस विशाल गड्ढे के दूसरी ओर हवा में चमकती एक रोशनी दिखाई दी।

यह देख सुयश समझ गया कि अवश्य ही उस गड्ढे के पार कुछ ना कुछ है। अतः सुयश ने ऊँट की मूर्ति को अपने हाथ में ठीक से पकड़ा और पहले पत्थर की ओर छलांग लगा दी।

सुयश सकुशल पहले पत्थर पर पहुंच गया। तभी सुयश को दूसरा पत्थर 1 फुट और आगे खिसकता हुआ दिखाई दिया।

“यह क्या? अब तो दूसरे पत्थर के बीच की दूरी 9 फुट हो गई है, इस दूरी को पार करना तो मुश्किल है, पर और कोई चारा ना देख, सुयश ने अपने शरीर को थोड़ा पीछे की ओर किया और दूसरे पत्थर पर छलांग लगा दी।

दूसरे पत्थर का फासला ज्यादा होने की वजह से सुयश के एक पैर का पंजा ही दूसरे पत्थर पर पहुंचा।
पर सुयश ने अपने शरीर को नियंत्रित किया और सकुशल दूसरे पत्थर पर पहुंच गया।

तभी सुयश को तीसरा पत्थर अपने स्थान से 2 फुट आगे खिसकता हुआ दिखाई दिया।

अब तीसरे पत्थर की दूरी सुयश से 10 फुट हो गई थी और इस दूरी को पार करना सुयश के लिये बिल्कुल असंभव था।

अब सुयश ने पीछे पलटकर देखा, पर पीछे की ओर से पहले और दूसरे पत्थर अब गायब हो गये थे।

यानि कि सुयश अब पीछे भी नहीं जा सकता था। अब सुयश पूरी तरह से उस स्थान पर फंस गया था।
कुछ देर तक ऐसे ही खड़े रहने के बाद सुयश उस पत्थर पर बैठ गया।

इस समय उसे क्रिस्टी की याद आ रही थी, अगर वह यहां होती, तो इन पत्थरों को आसानी से पार कर सकती थी।
...........................................
उधर क्रिस्टी जैसे ही ऊर्जा द्वार के अंदर घुसी, उसका भी द्वार बंद हो गया। क्रिस्टी समझ गई कि उसे अकेले ही इस बाधा को पार करना होगा। अतः वह उस पूरे स्थान को ध्यान से देखने लगी।

वह एक गाँव का वातावरण था, जिसमें हर स्थान पर गाँव के लोगों की मूर्तियां लगीं थीं। कोई बैल और हल लेकर खेत की ओर जा रहा था, तो कोई खेत में पौधे बोने का कार्य कर रहा था।

क्रिस्टी उस पूरे स्थान पर घूम-घूम कर सभी मूर्तियों को देखने लगी। उसे किसी बिच्छू के डंक और चंद्रमा को ढूंढना था, पर यहां तो आसमान में सूर्य चमक रहा था, चंद्रमा का तो कहीं पर नामो निशान भी नहीं था।

क्रिस्टी चारो ओर देखती आगे बढ़ गई। कुछ आगे उसे एक कुंए के चारो ओर बैठी औरतें कपड़े धोते हुए दिखाई दीं। यह सब भी औरतों की मूर्तियां ही थीं।

काफी देर तक देखने के बाद भी क्रिस्टी को वहां भी कुछ समझ में नहीं आया। अतः वह और आगे बढ़ गई।

अब क्रिस्टी को एक स्थान पर कुछ बच्चों की मूर्तियां दिखाई दीं। कुछ बच्चे वहां जमीन पर रेखाएं बनाकर कोई खेल, खेल रहे थे, तो कुछ बच्चे एक बीन बजाते सपेरे के पास बैठे साँप का नाच देख रहे थे।

साँप और सपेरे की मूर्ति देख क्रिस्टी उस ओर आ गई, उसे लगा कि यदि इस सपेरे के पास साँप हैं, तो इसके पास बिच्छू भी हो सकता है।

सपेरे के हाथ में पकड़ी बीन बिल्कुल असली लग रही थी। क्रिस्टी ने सपेरे के बगल में रखी पिटारी को खोलकर देखा, पर उसमें भी कुछ नहीं था।

तभी क्रिस्टी की नजर बगल में खेल रहे बच्चों के द्वारा, जमीन पर बनाई गई आकृति पर गई।

उस आकृति में आसमान में एक चाँद दिखाई दे रहा था, जिसे कि बच्चे किसी रस्सी से तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। क्रिस्टी बच्चों के द्वारा बनाई गई आकृति को देख उनकी कल्पना को निहारने लगी।

"बच्चे भी ना कैसी-कैसी आकृतियां उकेरते हैं, अपनी कल्पनाओं से? अब भला चाँद भी कोई रस्सी से तोड़ सकता है।" यह सोच क्रिस्टी धीरे से मुस्कुरा दी।

तभी क्रिस्टी की निगाह फिर से सपेरे की ओर गई, उसकी पिटारी पर एक बड़ा सा रस्सी का गुच्छा रखा था।

अब क्रिस्टी ने एक बार फिर बच्चों की बनाई तस्वीर को देखा और फिर धीरे-धीरे चलती हुई सपेरे के पास पहुंच गई।

क्रिस्टी ने अब पिटारी पर रखी उस रस्सी को उठाकर जमीन पर रख दिया और सपेरे के हाथ से बीन को ले लिया।

अब क्रिस्टी को अपने बचपन की एक घटना याद आ गई। बचपन में उसने एक जादुई फिल्म में देखा था कि एक बीन बजाने से रस्सी साँप की तरह नाच रही थी। बस इसी घटना को याद कर क्रिस्टी ने बीन को अपने मुंह से लगाया और उसे बजाने की कोशिश करने लगी।

क्रिस्टी ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी बीन नहीं बजाया था, पर उसके फूंक मारते ही बीन अपने आप बजने लगी।

बीन बजते हुए तेजी से हिल भी रही थी, इसलिये क्रिस्टी ने घबराकर बीन को अपने हाथ से छोड़ दिया।

क्रिस्टी के हाथ से छोड़ने के बाद भी बीन जमीन पर नहीं गिरी, वह तो अब भी अपने आप बजती जा रही थी।

इसी के साथ अब रस्सी, बीन की आवाज पर नाचते हुए आसमान की ओर उठने लगी। यह देख क्रिस्टी थोड़ा पीछे हटकर इस पूरे दृश्य को देखने लगी।

कुछ ही देर में रस्सी आसमान में बहुत ऊपर तक चली गई।

जब रस्सी का आखिरी सिरा दिखाई देने लगा, तो बीन स्वयं बंद हो गई, पर वह रस्सी अभी भी किसी आसमान के पुल की भांति हवा में टंगी थी। कुछ सोच क्रिस्टी ने उस रस्सी पर चढ़ना शुरु कर दिया।

काफी ऊपर चढ़ने के बाद क्रिस्टी को आसमान में बादल दिखाई देना शुरु हो गये। वह रस्सी बादलों के बीच ही जा रही थी।

कुछ ही देर के बाद क्रिस्टी अब बादलों के ऊपर खड़ी थी।

क्रिस्टी के ऊपर पहुंचते-पहुंचते रात हो गई थी और अब आसमान में चाँद दिखाई देने लगा था। क्रिस्टी को आसमान में चमकने वाले चाँद और सितारे अब स्वयं से ज्यादा दूरी पर नहीं लग रहे थे।

क्रिस्टी धीरे-धीरे चाँद की ओर बढ़ने लगी। तभी क्रिस्टी को आसमान में कुछ टूटते तारे दिखाई दिये।

“अरे, यह क्या? एक साथ इतने टूटते तारों को तो मैने कभी नहीं देखा?...और.... और यह क्या? ये तारे तो आसमान से जमीन की ओर आने की जगह, जमीन से आसमान की ओर जा रहे हैं। यह कैसे संभव हो सकता है? मुझे पास चलकर देखना चाहिये।" यह सोच क्रिस्टी चाँद की ओर चल दी।

टूटते तारे चाँद के पास जाते ही गायब हो जा रहे थे। क्रिस्टी अब चाँद के बिल्कुल नीचे पहुंच गई थी।

चाँद की दूरी अब उससे ज्यादा से ज्यादा 500 फुट ही ऊपर थी। पर जैसे ही क्रिस्टी चाँद के नीचे पहुंची, उसका शरीर जमीन को छोड़कर हवा में उठ गया।

“अरे यह क्या? यहां तो गुरुत्वाकर्षण है ही नहीं। अब मैं नीचे कैसे उतरूंगी?” क्रिस्टी अब परेशान हो उठी क्यों कि अब वह ना तो नीचे जा पा रही थी और ना ही चाँद के पास पहुंच पा रही थी।

क्रिस्टी अब अपने हाथ पैर हवा में चलाकर बस एक जगह पर नाच रही थी।

इस समय वह बहुत परेशान थी क्यों कि ऐसी स्थिति में वह कुछ कर नहीं पा रही थी। अब बस उसे किसी चमत्कार का इंतजार था।


जारी रहेगा_____✍️
Nice update....
 
  • Like
Reactions: Raj_sharma

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
Staff member
Moderator
50,505
84,905
354
Bhut hi shandar update bhai
Kya shalaka us bache ko pakad payegi
Or vo bacha devom se kis prakar juda hai
Kahi vahi to devom nahi

kuch din forum se ghost hogya Thaa

Bahut hi badhiya update diya hai Raj_sharma bhai....
Nice and beautiful update....

बहुत ही शानदार और आकर्षक अपडेट दिया है ! हर मोड पे लगा अब सस्पेंस खुला जब खुला लेकिन वो अगले अपडेट के लिए बचा हुआ है !


बहुत ही अच्छा लिख रहे हो .💐💐💐💐👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻

Nice update....

बहुत ही शानदार और आकर्षक अपडेट दिया है ! हर मोड पे लगा अब सस्पेंस खुला जब खुला लेकिन वो अगले अपडेट के लिए बचा हुआ है !


बहुत ही अच्छा लिख रहे हो .💐💐💐💐👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻

Nice update....

Shaandar update

nice update

Bang! Ye rahi alien ki pahli jabardast haar, khair 2 bhaag gaye hain toh agli baar wo dono Yugaka aur Kalaat ki shakti ka tod apne sath lekar aayenge, khair tilism mein abhi aur kitna update shesh rah gaya hai???

Badhiya shuruwat
Dekhte h chachi kitna aage badh paati h
Or bhai apni pehli wali fantasy strory par bhi update dete rahiye please

Bhut hi badhiya update Bhai
Yugaka aur kalat ne aakar vega aur vinus ko bacha liya varna inka bhi haal dhra aur mayur ke jaisa hota
Khair Yugaka ne A1 ko mar diya lekin A4 aur A7 vaha se bhag gaye

Anam aur rufo Raj_sharma bhai

avsji
 
  • Like
Reactions: dhalchandarun

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
Staff member
Moderator
50,505
84,905
354
🔥 Read Next Hot Story →
Discover more exclusive stories
Top