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Erotica फागुन के दिन चार

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komaalrani

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फागुन के दिन चार

भाग -५३ गुड्डी और रंजी --मस्ती ही मस्ती पृष्ठ ५०१

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komaalrani

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फागुन के दिन चार

भाग -५३ गुड्डी और रंजी --मस्ती ही मस्ती

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रंजी हँसकर बोली और गुड्डी से कहा, “चल अब तो टॉप दे मेरी।”

“बस एक बात… वो फिर स्साला लव्व लेटर वाला लौंडा मिला कि नहीं?” गुड्डी इतनी आसानी से छोड़ने वाली नहीं थी।

“18 SMS… एक से एक सेक्सी शेर। मैं गुस्सा भी नहीं थी। उस बेचारे की क्या गलती? मकान मालिक को तो उसने बुलाया नहीं था। घाटा तो उसी का हुआ ना। लेकिन थोड़ा भाव खा रही थी। अगले दिन गली के बाहर मिला, कान पकड़े खड़ा था। मैं मुस्कुरा दी। बस। उसने बहुत हाथ-पैर जोड़े, फिर पिक्चर और आइसक्रीम का प्रॉमिस किया। तो मैं बोली — ‘हाँ, मैं गुस्सा नहीं हूँ। दो दिन बाद एक्स्ट्रा क्लास का बहाना करके मैं गई। लेकिन पिक्चर में क्या-क्या हुआ, मत पूछो…’”रंजी मुस्करा रही थी।
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“मैं तो पूछूँगी। वरना आज टॉपलेस ही पिक्चर चलो…” गुड्डी खिलखिलाकर बोली।

“अरे वही जो ठरकी सब करते हैं लड़कियों के साथ। पहले तो पटाएंगे। फिर… उसने रोज़ दिए, फिर कोल्ड ड्रिंक। और सबसे बेस्ट सीट — लास्ट रो, कॉर्नर सीट। हाल वैसे भी लगभग खाली था।

जानती हो, जब मैं बैठी तो उसका रूम पार्टनर भी आ गया। पहले तो मैंने मुँह बनाया, लेकिन वो बोला कि ये भी सारी बात जानना चाहता है। लेकिन मैं भी कम चालाक नहीं थी, मुझे मालूम था उसका दोस्त भी आएगा तो अक्सर मैं स्कूल यूनिफार्म पहुँच कर उस लव लेटर वाले के पास जाती थी, वो भी एक साल पुरानी बस बेचारे को स्कर्ट उठा के मेरे भरतपुर की हाल चाल जानने का मौका मिल जाता था।


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लेकिन उसका दोस्त भी था तो मैं एक टाइट शलवार सूट पहन के गयी थी और शलवार में सात गाँठ लगाई। और दुपट्टा एकदम एकदम गर्दन से चिपका के , दोनों कबूतर उड़ने को बेचैन। देख के दोनों स्सालों का पेंट टाइट हो गया।

गुड्डी ने मुस्कराकर अपनी सहेली और आनंद की ममेरी बहन रंजी से पूछा , " और आगे, उसके बाद ? "



रंजी किस्सा आगे बढ़ाते बोली - " वही बात जो लड़के करते हैं, पिक्चर हाल में लड़की के साथ। और उसके बाद तो… दोनों तरफ से पहले हाथ, फिर गाल, और सीधे जोबन पर। मेरा वाला तो गन्ने के खेत में भी सीधे टॉप में हाथ डाल देता था, वहाँ भी वही। कुछ देर में उसके रूम पार्टनर ने भी शुरू कर दिया। वो भी बुरा नहीं था।बस दोनों ने मिल के जोबन बाँट लिए, दाएं वाला मेरे पुराने यार का और बाएं वाला उसके दोस्त का, कुछ देर तो कुर्ते के ऊपर से रगड़ते रहे, फिर बटन खोल के हाथ अंदर और मैं भी जान बूझ के फ्रंट ओपन ब्रा पहन के गयी थी, तो ढक्कन भी खुल गया और क्या दोनों सालों ने कबूतर मसले मेरे, एकदम रगड़ रगड़ के
कुछ रुक कर रंजी ने आगे का भी किस्सा बताया

मेरा हाथ पकड़कर उसने अपने जीन्स पर रख लिया — एकदमफनफनाया हुआ था। ये लड़के ना… मेरे दोनों हाथ दोनों के बल्ज पर।



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फिर तो उन दोनों की चाँदी हो गई। खुलकर मेरेजोबन का का दोनों मज़ा ले रहे थे।

मेरे वाले ने तो एक बार झुककर किस भी कर लिया। मैं भी सोच रही थी — चल यार, इन दोनों बेचारों की इतनी जबरदस्त प्लानिंग फेल हो गई, तो कुछ तो…और इंटरवल में मैंने भी खूब लूटा — दोनों को आइसक्रीम सबसे महंगी वाली, कोल्ड ड्रिंक, क्रोम रोल…”
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“और इंटरवल के बाद…” गुड्डी बेचैन थी।

“उन दोनों ने…” रंजी खिलखिलाई, “पहले मेरे वाले ने, फिर उसके पार्टनर ने जिप खोलकर बाहर निकाला — एकदम कड़क, पूरा खड़ा। मैंने बहुत मना किया, लेकिन दोनों ने पकड़ दिया। फिर मैंने भी थोड़ा आगे-पीछे किया…


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इसी में खुश हो गए बेचारे।”

“लालीपॉप नचुसा?” गुड्डी हँसकर बोली।

“अरे पीछे तो दोनों बहुत पड़े थे। मेरे वाले ने तो थोड़ी जबरदस्ती भी की, लेकिन मैंने मना कर दिया। बस बोला — ‘अगली बार’। यार, दिया ने सिखाया था — पहली बार सब मत दे देना, लेकिन मना भी मत करना। वरना अगर लड़कों को सब कुछ एक बार में मिल गया ना, तो कोई घास नहीं डालने वाला।अच्छा चल, अब तो टॉप दे ना। सब बता दिया, इससे ज्यादा कुछ नहीं हुआ। मेरी बुलबुल अभी भी कोरी है…” रंजी हँसकर बोली।
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गुड्डी रंजी को लेकर उसके वार्डरोब की ओर मुड़ी और मेरे दिमाग में चंदा भाभी की वार्निंग गूँजने लगी —

“लाला, निबान कर लो उसका, वरना कोई ना कोई…”

तब तक मेरे सिक्योर फोन पे दो मेसेज आये। पहला डी॰बी॰ का था। रिपोर्ट मीटिंग में रीत ने पढ़ी। एकदम हिट। दोनों ने ये माना की थ्रेट बहुत सीरियस है। सेंटर से भी बात हो गई है। शाम से पहले ही रेड एलर्ट हो जाएगा। आई॰बी॰ के कुछ आपरेटिव स्पेशल प्लेन से देर शाम तक आ जायेंगे। सभी चेकपोस्ट पे आई॰बी॰ के लोग लगाए जा रहे हैं।



रीत का मेसेज रीत टाइप था- “डी॰बी॰ को बहुत डांट पड़ी की रीत को हायर रैंक क्यों नहीं दी। रीत के ठरकी सेना का प्रोग्राम उन लोगों ने आप्रूव कर दिया है। एक हफ्ते के लिए उन्हें टेम्पोरेरी लीगल स्टेटस और सपोर्ट मिलेगा। रीत ने 4 का नाम फाइनल कर लिया है।



तब तक अन्दर से झगड़े की आवाजें आ रही थी।

रंजी मना कर रही थी और गुड्डी उसे हड़का रही थी।

ये बनारस की लड़कियां ना मैंने छेद में आँख लगाकर देखा। गुड्डी के हाथ में एक हाल्टर टाप था, बहुत ही हाट, स्ट्रिंग टाप, ऐसा हाल्टर जो लोगों की हाल खराब कर दे।

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रंजी ने लड़कियों वाला ब्रह्मास्त्र निकाला,
" यार मम्मी ने देख लिया ना तो घर से बाहर निकलने से मना कर देगी। फिर सारी मस्ती खतम…”

लेकिन इन बनारस वालियों के पास हर सवाल का जवाब होता है, चाहे वो गुड्डी हो या रीत।

“अरे तेरी मम्मी देखेंगी कैसे वो पड़ोस में गई हैं और चाभी में उनको दे आऊँगी उन्हें क्या पता की आज उनकी रामप्यारी शहर लूटने जा रही है और जब लौटेगी तो तेरे भैया कम सैयां किस मर्ज की दवा हैं, वो एक नया टाप खरीदवा देंगे। तेरे चक्कर में मुझे भी मिल जायेगी और वो अगर कुछ हाट शाट भी खरीदंगे तो बस उनका नाम लगा देना की मैं तो बहुत मना कर रही थी लेकिन वो नहीं माने बोले की बड़े शहरों में लड़कियां यहीं पहनती हैं। बस…”


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गुड्डी ने रास्ता निकाल लिया।

“बात तो तेरी ठीक है लेकिन इसके साथ ब्रा कैसे। मेरे पास सब स्ट्रेप वाली है…” रंजी ने एक नई जहमत खड़ी की।

“अरे तो मत पहन मेरी नानी। और उससे खरीदवा लेंगे वहां बिना स्ट्रैप वाली ब्रा भी। तेरे इन मस्त जोबन के लिए तो। देख कैसे नदीदे की तरह ललचा रहा था…” गुड्डी बोली।
रंजी हँसी और बोली- “मैंने भी देखा था। एकदम पानी आ रहा था मुँह में। चल आज तेरी बात…”

गुड्डी ने उसे हाल्टर पकड़ा दिया और बोला की- “तू इसे पहन मैं एक ढंग की बाटम भी निकालती हूँ…”

अब मैं मल्टी टास्किंग कर रहा था।

आँखें सिक्योर फोन पे मेसेज पे लगी थी। और कान कमरे में। कुछ और मेसेज थे। बड़ौदा और मुम्बई के कुछ और डिटेल पता चले थे। लोकेशन थोड़ी और स्पेसिफिक थी। जेड की जो रीत ने सोनल की मदद से फोटो बनवाई थी, वो सर्कुलेट की जा रही थी। सबसे इम्पोर्टेंट मेसेज दो थे, एक तो हुजी के जो लोग बनारस आ रहे थे वो दो ग्रुप में थे, एक ट्रेन से और दूसरा रोड से और उनके ट्रवेल प्लान के स्पेसिफिक डिटेल मिल गए थे।




दूसरा मेरे बारे में ही था की जेड के कंट्रोलर ने रात में मेरी, गुड्डी और रीत, और आज मेरी और रंजी की बात का ट्रांस्क्रिप्शन सुना था लेकिन उसे अभी भी शक था और उसने क्लोजर फिजिकल सर्वायालेंस का आदेश दिया था। चूँकि मेरे हैकर मित्रों ने आज सुबह मेरे उनके सर्वर में घुसने में सफलता हासिल कर ली थी इसका ये फायदा हुआ।



अन्दर आवाजें कुछ तेज हो गई थी। रंजी तैयार होकर ड्रेसिंग टेबल के सामने थी, गुड्डी भी साथ में। ये लड़कियां भी ना।

गुड्डी ने पूछा- “तो यही दोनों थे जो तू बता रही थी ना। प्रेम पत्र वाला और उसका पार्टनर…”
“नहीं यार। वो दोनों तो ठन्डे बस्ते में है अभी और दो हैं मेरे पीछे पड़े हैं…” रंजी ने ड्रेसिंग टेबल से उठते हुए कहा।
“मतलब…” गुड्डी बोली।



“अरे यार वो दोनों होली की छुट्टी में गाँव चले गए हैं और अभी 10 दिन बाद आयेंगे, तो इसलिए मैंने कहा ठन्डे बस्ते में। लेकिन एक गुड न्यूज उन दोनों ने पिक्चर हाल में बताई थी। उनका मकान मालिक उनके आने के दो-चार दिनों बाद। शायद 12 अप्रैल से 15 दिन के लिए कहीं ट्रिप पे जा रहा है। तो नो डर वर एकदम खुला खेल फरुर्खाबादी। लेकिन तब तक तो वो दोनों ठन्डे बस्ते में है। ये दो और लड़के हैं मैं दिया का बताया उसने अपने भाई से ही ताला खुलवा लिया तो वही। वो उसकी सहेली सानिया है। मेरी भी मुलाकात है उसका एक भाई है तनवीर डी यु में पढ़ता है आज कल आया हुआ है उसके साथ एक्स्चेंज प्रोग्राम चलाने के चक्कर में थी…”
 
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दिया- सानिया -तनवीर-दिया का भाई

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ये दो और लड़के हैं

मैंने अपनी पक्की सहेली दिया का बताया तो था, मिली तो हो तुम उससे
.

उसने अपने एकलौते सगे भाई से ही ताला खुलवा लिया, और दो साल पहले, जिस साल हम लोगों ने हाईस्कूल पास किया था, उसी साल। तो वही।

वो उसकी सहेली सानिया है। मेरी भी मुलाकात है उसका एक भाई है तनवीर डी यु में पढ़ता है आज कल आया हुआ है उसके साथ एक्स्चेंज प्रोग्राम चलाने के चक्कर में थी…”

गुड्डी ने जाहिर किया की वो भी जानकार है,.... खुद बोली,

"समझ गयी दिया तनवीर के साथ और सानिया दिया के भाई के साथ।आजकल खूब चलता है, सहेली को अपने भाई से फंसवा दो और खुद उसके भाई से मस्ती करो, कोई कुछ नहीं बोल पायेगा। "
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“हाँ वही। रंजी बोली- “लेकिन मामला अटक गया जब एक दिन दिया के यहाँ उन दोनों ने मुझे देख लिया और फिर दोनों ने दिया और सानिया को बोला की एक्सचेंज प्रोग्राम तभी होगा जब बोनस में, मैं भी पैकेट में इनक्लूड हूँ। दिया ने मुझसे बोल दिया साफ-साफ लेकिन मैंने थोड़ा भाव दिखाया। तो एक दिन दिया ने एक्जाम खतम होने के बाद क्लास की पिकनिक प्लान की।



मैं तनवीर की बैक पे ट्रिपलिंग करके, सबसे पीछे दिया बीच में मैं .

मैं भी तनवीर को तंग कर रही थी, मैं जानती थी बेचारा छुप छुप के मेरे कबूतर देखता है, तो कस कस के मैं अपने उरोज उसकी पीठ में रगण्ड रही थी, और वो कुछ कर भी नहीं सकता था, फिर एक हाथ मैंने तनवीर की जांघ पे रखा और सहलाते हुए एकदम वहां तक, और दिया कमीनी मेरे टॉप को ऊपर से दबा रही थी।

सानिया भी दिया के भाई के साथ मस्ती कर रही थी और मैं और सानिया जोर जोर से हल्ला कर रहे थे , ड्राइव का मजा ले रहे थे, मैं और दिया आगे थे, तनवीर ड्राइव भी जबरदस्त करता है उसकी बाइक भी इम्पोर्टेड है, तो हम दोनों आगे और सानिया और दिया का भाई थोड़ा पीछे


और सानिया दिया के भाई के साथ,.... बड़ा मजा आया।



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लेकिन वहां पहुँच कर मुझे पता चला की ये सब उन चारों का प्लान था। कोई पिकनिक विक्निक नहीं थी। क्लास का कोई भी नहीं आया था हम सब नदी के किनारे एक आम के पुराने बाग में थे,... एकदम सूनसान जगह थी। और वो दोनों वहां मेरी सीन अपने भाइयों के साथ सेट कराने के लिए आई थी…”

“तो हुआ क्या?” गुड्डी बेचैन हो रही थी और बाहर मैं भी।



“अरे सब दिया के भाई की उस बाग के चौकीदार से सेटिंग थी। वो उसको चाभी दे देता था, उसका दो रूम का छोटा सा रहने का था, तो वहीं पर उन दोनों का प्लान था। लेकिन अचानक उस दिन उस चौकीदार को कहीं जाना पड़ गया और उन लोगों का प्रोग्राम अटक गया। हाँ बाग़ की चाभी तो दिया के भाई के पास हमेशा रहती थी और बाग़ चारो ओर से दीवार से घिरा था,.... पर कमरे का प्लान फेल हो गया।

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सानिया बोली, अरे रंजी नीले गगन के नीचे क्या गड़बड़ है।


तो मैंने हँसकर कहा चलो पहले तू दोनों शुरू कर,.... और

तानिया दिया के भाई के साथ और दिया तनवीर के साथ लालीपाप चूसने में जुट गए…”


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“तेरा मन नहीं कर रहा था लालीपाप लेने का…” गुड्डी ने चिढ़ाया।


“अरे यार मन तो बहुत कर रहा था। सैंडल पहनते हुए रंजी बोली- “लेकिन…”

“ये वाली नहीं ये पहन हाई हील वाली…” गुड्डी ने दूसरी सैंडल आगे बढ़ाई।


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“अरे ये तो बहुत हाई है…” रंजी ने नखड़ा किया।
“ये कुछ नहीं है मैडम जी आपका भाई कम आशिक से, कम से कम साढे तीन-चार इंच की हाई हील खरिदवाऊँगी। तब जब चूतड़ मटका मटका के चलेगी ना। तो तेरे यारों की जान पे बन आएगी लेकिन आगे बता लालीपाप का…” गुड्डी बोली।



रंजी ने हाई हील पहनते हुए कहा-

“अरे लालीपाप का मजा उन दोनों ने लिया मुसीबत मेरी हो गई। जब दोनों के तनतना गए, तो सानिया और दिया ने दोनों को मेरे हवाले कर दिया और वहीं पेड़ों के एक झुरमुट के बीच।


वो दोनों स्साले लौंडे तो थोड़ी दूर एक पेड़ के पास खड़े हो गए और दोनों ने अपनी बहनो को लगा दिया मुझे पटाने पे। असल में यार वो दोनों लम्बे मोटे खूंटे देखकर मन तो मेरा भी गीला हो रहा था, लेकिन इस तरह खुले आम, आम के बगीचे में, मुझे बड़ा अटपटा लग रहा था।

मैंने एक पेड़ के तने के सहारे लेट गयी, जमीन पर ताजा हरी घास और पतझड़ में गिरी पत्तियां, पेड़ों के पत्तों से छन छन के आती धूप, पेड़ भी इत्ते घने के दस हाथ दूर का भी न दिखे, और सानिया मुझे समझाने लगी,

" सुन यार, तेरी यही हाल रही न तो तू भी जिया की तरह पक्की बहन जी बन जायेगी, और जब हम सब अगले साल कालेज में जाएंगी न तो सब तुझे किसी भजन मंडली में शामिल करा देंगे। जी जी आई सी ( गवर्नमेंट गर्ल्स इंटर कालेज ) की नाक कटवा देगी तू। पिछले पंद्रह साल से आज तक ऐसा नहीं हुआ की कोई लड़की बिना इंटरकोर्स कराये, इंटर का कोर्स पूरा कर पायी हो, पर इस बार तू और जिया,,"
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" और सानिया का मुझे जिया से जोड़ के देखना लग गया, तू तो जानती है जिया का किस्सा,

पूरे स्कुल में किसी लड़की को माँ बहन की गाली दे दो, भाई और बाप से उसका रिश्ता जोड़ दो, वो बुरा नहीं मानेगी लेकिन जिया की तरह बोल दो तो जिंदगी भर के लिए कुट्टी,
रंजी आम के बाग़ का किस्सा सुनाते बोली ,

गुड्डी को रंजी की सब सहेलियों के बारे में मालूम था, दिया से तो उसकी पक्की दोस्ती थी और जिया के बारे में भी सुन रखा था पर रंजी ने अपने मन की भंडास निकाली,
" जिया तो जैसे खादी भण्डार में पैदा हुयी थी, और सेक्स तो छोडो मजाक भी नहीं कर सकते, लेकिन देखने में हैं स्साली सुन्दर, नमक भी जबरदस्त, बस एक दिन दिया के भाई ने हाथ डाल दिया, ज्यादा नहीं बस गाल सहला दिया और उभार छू दिए और वो पागल हो गयी, वो तो मैंने बहुत समझाया की तू और मैं एक जैसे कपडे पहने थे इसलिए वो कन्फूयज हो गए, अब मैं समझा दूंगी, तो बस मैंने तय कर लिया की जिया की जोड़ीदार बनने से अच्छा है टाँगे आज फैला ही ली जाए। उस दिन भी वो लव लेटर वाला बिना पेले छोड़ता नहीं, तो आज बाग़ में ही सही, फिर चारदीवारी है बाहर का दरवाजा बंद है

फिर क्या हुआ,... गुड्डी ने एक्सिलरेटर पर पैर दबाया

"जमीन पर पत्ते गिरे हुए थे,.... मुझे लिटा दिया। दिया ने हाथ पकड़ा और सानिया ने मेरी पाजामी पकड़कर खींच दी।
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दोनों स्साली बहुत कमीनी थीं, मैं लाख टाँगे सिकोड़ रही थी पर तानिया मेरी लेगिंग उतार कर के ही मानी। मैं जाल में चिड़िया की तरह फड़फड़ा रही थी, दोनों को गालियां दे रही थी पर दोनों छिनार हंस रही थी मजा ले रही थीं। मै बोली,

" तुम दोनों के भाई है,... तुम दोनों पहले घोंटो "

तो दिया झुक के मेरे होठों पे चुम्मा चिपकाते बोली,

" अरे मैं तो दो साल से घोंट रही हूँ , हाईस्कूल का जिस दिन रिजल्ट निकला उसी रात से, "


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" अरे तो मैं थोड़ा ही लेट हुयी, ११वे के छमाही इक्जाम के पहले ही इस स्साले तनवीर ने अपनी ममेरी बहन की झिल्ली फाड़ दी "


हँसते हुए सानिया ने लेगिंग मेरी खींच के दूर एक आम के पेड़ की ऊपर वाली डाल पे फेंक दी और दोनों टाँगे कस के पकड़ ली,

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दिया मेरा टॉप का चीरहरण करने में लगी थी। दोनों लौंडे टुकुर देख रहे थे तो मैंने पैतरा बदला और बहाना बनाया , ( रंजी ने गुड्डी को हँसते हुए पिछले हफ्ते की बात बताई )

" यार लड़के दो और लड़कियां तीन,.... बड़ी ना इंसाफ़ी है। पहले तुम दोनों स्सालियाँ आपस में अदला बदली कर लो फिर मैं नंबर लगवा लूंगी "


" अबे नाइंसाफी ये नहीं है , नाइंसाफी ये है की लड़की एक और लड़के दो, आज पहले तेरी कुटाई होगी और हम लोग देखेंगे "

दिया ने गुदगुदी लगा कर एक झटके में टॉप ऊपर खींच लिया दोनों चूजे बाहर।



" अरे नाइंसाफी ये नहीं है , .....नाइंसाफी ये है कि हमारी रंजी रानी के छेद हैं तीन और लड़के सिर्फ दो,... एक छेद तब भी बचा रहेगा "

सानिया बड़ी सीरियसली बोली और दिया के भाई का लोवर खींच दिया, तो दिया ने भी तनवीर का शार्ट उतार दिया।


दोनों के खूंटे एकदम तैयार, आधे लोवर और शार्ट पहले से उतरे थे जब मेरी सहेलियां चूस रही थी , " रंजी सब हाल खुलासा बता रही थी और गुड्डी सुन भी रही और ये भी समझ रही थी की उसका यार दरवाजे से कान चिपकाये इन दोनों टीनेजर की बातें सुन रहा होगा। उसी को सुनाते गुड्डी ने रंजी से पूछा,



" तो तनवीर का सानिया से वही रिश्ता है न जो तेरा उस लड़के से है जो बाहर खड़ा है "


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रंजी की हंसी जब शुरू होती थी तो रुकती नहीं थी, और फिर वही हंसी का दौरा पड़ गया, किसी तरह रुका तो बोली,

" यार एकदम वही, सानिया उसकी ममेरी बहन है और मैं तेरे वाली की, लेकिन एक नहीं बल्कि दो फरक है, एक तो मेरा भाई बहुत मीठा और प्यारा है , खूब अच्छा वाला भाई है लेकिन दूसरा फरक और भी है। वह थोड़ा सा बल्कि बहुत ज्यादा बुद्धू है, सानिया के भाई तनवीर से तो बहुत ज्यादा, "



और अबकी दोनों लड़कियां हंसने लगी लेकिन फिर रंजी एक राजदार की तरह अपनी सहेली से बोलने लगी



" यार स्साला उस तनवीर का तो,.... एकदम अलग ही था, "

" कैसे " गुड्डी भी बड़े ध्यान से सुन रही थी, उसने चाव से पुछा।

" यार मैंने इसके पहले भी,.... वो चिट्ठी वाला तो घुसा ही देता, मकान मालिक आ गया और उसने तो कई बार खेत में भी पकड़ाया था अपना खोल के , और फिर सिनेमा हाल में उसके और उसके दोस्त दोनों का लॉलीपॉप मैंने पकड़ा भी सहलाया भी था, मुठियाया भी लेकिन तनवीर का अलग ही "


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" अरे कमीनी बोलेगी भी या ऐसे किस्से सुनाएगी, क्या अलग था "

" उसका सुपाड़ा, वो जो आगे का होता है लड़को का, उसपर चमड़ी नहीं थी। एकदम खुला रगड़ खा के जैसे धूसर हो गया हो, मोटा तो खूब था ही, तनवीर खूब गोरा है तो उसका डंडा भी गोरा ही था, बाल वाल दोनों साफ़ करके आये थे, पर वही सुपाड़ा एकदम मस्त और जबरदस्त, पूरा खुला,

और मुझे देखते देख सानिया ने खूब चिढ़ाया, मुझको भी तनवीर को भी।

तनवीर से वो बोली, " यार तेरा मूसल मेरी सहेली को पसंद आ गया है अब से ऐसे ही चाहिए पठानों के "

और मुझे छेड़ती बोली


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" आज यार तू तनवीर भाई का ले ले, फिर देख, अगले महीने मेरी खालू की बेटी की शादी है यही पे, खूब जमावड़ा होगा, मेरी फूफी का लड़का जावेद है और भी आठ दस कमीने भूखे इकठ्ठा होंगे सबको चढ़ाउंगी तेरे ऊपर, अब हम दोनों की सहेली इंटर का कोर्स बिना इंटरकोर्स के कर ले तो नाक तो हम दोनों की करेगी न , क्यों दिया। "

दिया मेरी चुनमुनिया कप फैला के सरसो के तेल की एक शीशी लायी थी उसे चुआ रही थी, वो भी स्साली सानिया का साथ देते बोली

" अरे आज अभी एक बार फटने दे न इसकी फिर खुद ही टांग फैलाएगी "

तो पहले नंबर किसने लगाया, तनवीर ने या दिया के भाई ने।



किसी ने नहीं हसंते हुए रंजी बोली,


फिर बताया असल में तनवीर ने, सबसे पहले तनवीर आया। उसने दबोच लिया था मेरी दोनों टाँगे उसके कंधे पे थी और वो मुझे तड़पा रहा था अपना व्ही सुपाड़ा मेरी फांको पे बार बार रगड़ के , मेरी फांके खुद फुदफुदा रही थीं, खुल बंद हो रही थीं , बस मन कर रहा था पेल दे स्साला।

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और दिया के भाई ने मेरे हाथ में पकड़ा दिया था और दिया ने उसको काम सौंपा था मेरे मुंह में डॉट लगाने का। वैसे तो उस बाग़ में कोई आता नहीं था, चारो और दीवार थी, एकदम सन्नाटा , लेकिन फिर भी, तनवीर ने फांके फैलाई, अपना मोटा सूपड़ा लगाने की कोशिश की तभी गड़बड़ हो गयी।

मन तो मेरा भी बहुत कर रहा था..... लेकिन इस तरह एकदम खुल्ले में, वो भी पहली बार।


लेकिन वो ज्यादा कुछ कर पाता, उसके पहले पानी शुरू हो गया।



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दिया बोली यार रंजी तेरी तो किश्मत है। पहली बार आम के बाग में बूंदों के नीचे,


लेकिन पानी के साथ आँधी भी आ गई। हमारे पास के पेड़ की एक डाल गिर पड़ी।

तेजी से बिजली चमक रही थी,

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बादल गरज रहे थे, लग रहा था सब बादल आज अपनी अपनी गगरियाँ यहीं खाली कर देंगे, और हवा भी बहुत तेज जोर का अंधड़
फिर तो हम लोग भागे…”



अब वो दोनों तैयार हो गई थी।

गुड्डी ने पूछा- “तो तेरी फिर बच गई ना…”

“अरे क्या बची यार। वो दोनों तो ऐसे पीछे पड़े। वो तो तनवीर को दिल्ली वापस जाना पड़ गया। अगले हफ्ते वो आएगा फिर तो सानिया ने बोला है की वो मेरा हाथ पैर बाँधकर। अगर मैंने सीधे नहीं दिया तो…”

फिर दोनों खिलखिलाने लगी।



उसके चूचियों कसकर दबाते हुए गुड्डी बोली-

“इत्ते दिन नहीं बचेगी तेरी,.... चार-पाँच दिन के अन्दर ही इस तेरी सोनचिरैया को दाना घोंटवा दूँगी…गुड्डी का एक हाथ रंजी की सोन चिरैया पर था और दूसरा चूजों पर और दोनों रगड़े जा रहे थे। ”


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रंजी बोली- “तेरे मुँह में घी शक्कर मेरा मतलब मोटे मोटे लालीपाप…” और दरवाजा खोल दिया।

गनीमत था की जस्ट मैं दरवाजे के पास से हट गया था।



रंजी को तो देखकर मेरी लग गई।



मैं खड़ा रह गया। मेरा खड़ा हो गया। पूरा।
 
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रंजी -ममेरी बहन गिफ्ट और रसीले होंठ
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रंजी कोरा माल है, चुदी नहीं अब तक,

हत्थे गुड्डी के पड़ी, बचेगी वो कब तक,


बचेगी वो कब तक, चुदक्कड़ बनवा देगी,

घटा नहीं अब तक वो, घटना घटवा देगी,

कह “…”, फिलिम से कहानी शुरू होयेगी,

एक अपड़ेट के बाद, रंजी की सील तुड़ेगी।*




सिर्फ उसकी ड्रेस ही नहीं, मेकप, एटीटयुड, शोख अदा और जिस ढंग से वो मुझे देख रही थी।

और ड्रेस भी क्या?

रंजी का हाल्टर टाप, लाईट पिंक, शोल्डर लेश ही नहीं, बल्की और नीचे, दोनों गोलाइयों का ऊपरी भाग, गोरी-गोरी गुदाज, लेकिन सबसे खतरनाक था क्लीवेज, एकदम डीप, अन्दर ब्रा तो गुड्डी ने पहनने नहीं दी थी। और बाद में उसने कसकर निपलों पिंच भी कर दिए थे तो दोनों सिर उठाये साफ-साफ। और टाप उसके नेवल के ठीक ऊपर आकर खतम हो जा रहा था।

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पहली बार मैंने रंजी की पतली कमर देखी और पान के पत्ते से भी चिकना गोरा पेट और खूब गहरी नेवल, जिसपे उसने एक टेम्प्रोरेरी टैटू बटरफ्लाई का बना रखा था। गोल्डेन कलर का और उसके नीचे एक बहुत ही टाईट कैपरी वो भी बस कूल्हों पे टिकी। और खूब लम्बी गोरी टांगें। हाई हील,... कलर्ड टो नेल्स


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मैं देखता रह गया।

गुड्डी उसके पीछे खड़ी थी उसके कमर में एक ब्वाय फ्रेंड की तरह हाथ डाले। जबरदस्त आँख उसने मुझे मारी और बोली-


“हे गिफ्ट भूल गए क्या मिस्टर इसे देखने की फीस लगती है। ये कुछ भी फ्री में नहीं देती…”



सच में मैं भूल गया था। लेटेस्ट गैलेक्सी टैबलेट और आई पैड जो मैं उसके लिए लाया था। मैंने एक-दो बार आँख मिच मिचाई और बोला- “असल में मैं बस भूल गया और रंजी को दोनों दे दिए।



“होताहै, होता है। मेरी सहेली को जो देखता है, हो जाता है उसके साथ…” बोली गुड्डी और दोनों खिलखिला के हँस




“होताहै, होता है। मेरी सहेली को जो देखता है, हो जाता है उसके साथ…” बोली गुड्डी और दोनों खिलखिला के हँस पड़ी।
रंजी ने दोनों गुड्डी को पकड़ाया और मेरे गले लग के, एकदम कसकर। उसके हाल्टर फाड़ू उभार मेरे सीने में दब रहे थे और रंजी ने अपने हाट-हाट दहकते, फ्रेश इंतेजार लिपस्टिक लगे गीले होंठ मेरे होंठ पे रख दिए और एक पल के लिए हटाकर मेरी आँखों में देखकर बोली-


“थैंक्स सो मच…”

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और फिर दुबारा उसके होंठों मेंरे होंठों पे और वो इत्ते जोर से किस ले रही थी की। मेरा एक हाथ उसके नितम्ब पे था। क्या भरी मस्त नितम्ब थे खूब गदराये और खूब कड़े।

और दूसरा उसके सिर पे।

मेरा हाथ कसकर उसके सिर को अपनी ओर खींचे हुए था एकदम जोर से और मेरे और उसके होंठ आपस में उलझे, चिपके, कस-कसकर चूमते चूसते। अचानक उसके किशोर होंठ थोड़े से खुले।

और मैंने पहले तो उसके भारी निचले होंठों को अपने दोनों होंठों के बीच दबाकर रस ले लेकर खूब चूसा फिर जीभ उसके मुँह में घुसेड़ दी। वो भी कम शैतान नहीं थी, बिना रुके उसकी जीभ ने मेरी जीभ के साथ कुछ देर चल कबड्डी खेली और फिर क्या मस्ती से मेरी जीभ चूसी उसने।



अगर जीभ वो ऐसी चूस रही थी तो। बिचारे जंगबहादुर की हालत खराब थी। नीचे भी मेरा हाथ जो उसके नितम्बों को सहला रहा था, हल्के-हल्के दबा रहा था, उससे रंजी और मुझसे चिपक गई थी और मेरा ‘वो’ सीधे उसकी दोनों जाँघों के बीच धंसा, घुसा अपनी साइज का अहसास उसे करा रहा था। मैंने कनखियों से देखा, गुड्डी मुझे घुड़कती हुई मुद्रा में घूर रही थी।


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मैं तुरंत समझ गया और मेरा हाथ सिर छोड़कर सीधे उसकी खुली हुई कमर पे पहुँच गया। वहां कुछ देर सहलाने, पकड़ने के बाद, सीधे हाल्टर टाप के निचले हिस्से पे पहले तो ऊपर से ही मेरी उंगली उसके रसीले किशोर उरोज को छेड़ती रही और फिर एक मेरी लालची बेसबरी उंगली, टाप के अन्दर घुस गई।

अभी तो ब्रा का कवच भी नहीं था। वो सरकती रेंगती ऊपर की ओर बढ़ी। और फिर एक की देखा-देखी दूसरी भी। थोड़ी ही देर में वो आलमोस्ट निपल तक पहुँच गई थी।


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और उसका असर रंजी पे जबर्दस्त हुआ। वो जैसे पिघल रही थी।

मैंने हल्के से अपनी किशोर दर्जा ११ वाली ममेरी बहन की चूचियों को दबाया। एक दबी दबी सी सिसकारी उसके होंठों से निकल गई। उरोजों पे मेरा दबाव थोड़ा बढ़ा और वो लता की तरह मेरे शरीर से चिपक गयी। उसका बस चलता तो हम दोनों वही चालू हो जाते।

मेरी तरजनी ने उसके निपल को टाप के अन्दर से फ्लिक कर दिया।


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अब उसके लिए कंट्रोल करना मुश्किल हो रहा था।

उसने मुझे धक्का देकर दूर कर दिया और इस तरह रस भीनी निगाहों से मुझे देख रही थी, मानो बोल रही हो- “बेसबरे। नदीदे। लालची…”



उसके होंठ मुश्कुरा रहे थे, ललचा रहे थे और उसने, शर्म फिर उसके हाथ थामे, उसके पहले ही, जैसे कोई बाज झपटे मुझे एक बार फिर अपनी बाहों में भर लिया अपनी दोनों बाहों से मेरे हाथ कसकर पकड़ लिए और एक खूब बड़ी सी किस्सी, लिप्पी अपने होंठों से मेरे होंठों पर और फिर जब तक मैं रियेक्ट करूँ। दूर खड़ी हो गई, मुश्कुराती।

“हे थैंक्स वैन्क्स हो गया हो ना तो जरा ये चेक कर लो कहीं ये तुम्हें अभी भी छोटी बच्ची समझते हों और खिलौना देकर बहला दिया हो और मुफ्त में…” गुड्डी ने छेड़ा।

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और मेरे आगे आकर उसके हाथ से टैबलेट ले लिया।
“तुम सही कहती हो। ऐसे कंजूस का क्या भरोसा…” मेरी और देखते हुए आँख नचाकर रंजी ने जिस शोख अदा से कहा की मेरी तो।

“चलो मैं चला के दिखाता हूँ…” मैं आगे बढ़ा।

लेकिन गुड्डी ने मुझे पीछे धकेल दिया। मैं अब रंजी के पीछे और गुड्डी रंजी के बगल में, दोनों साथ-साथ टैबलेट पकड़े हुए। मेरा एक हाथ रंजी के कंधे पे था और दूसरा उसके कुल्हे पे जो सरक कर आहिस्ता आहिस्ता उसकी पतली कमर में पहुँच कर लिपट गया। जंगबहादुर अब उसके बड़े नितम्बों को हल्के-हल्के टच कर रहा था उसकी टाईट कैपरी के ऊपर से।



गुड्डी ने उसके दो-चार फंक्शन चला के दिखाए।

तो रंजी ने बड़ी अदा से मेरी ओर मुड़कर, शोख मुश्कुराहट से कहा- “अभी तक तो असली लग रहा है…” और उसके गोरे गालों रसीले होंठों के साथ किशोर उभार और बिन ब्रा की हाल्टर से झलकते उभार और हल्के-हल्के निपलों की आभा भी दिख गई।

देखा आँखों ने, असर जंगबहादुर पे हुआ। पूरे 90 डिग्री और आगे बढ़ने की जगह तो थी नहीं तो सीधे रंजी की पिछवाड़े की दरार में सेट होने की कोशिश करने लगे।
बाकी क्यों पीछे रहते।हाथ कंधे से सरक के उसके उभार पे हल्के-हल्के, दूसरा हाथ जो कमर पे था, उसने कसकर उसे अपनी ओर भींच लिया। जवाब में हल्के से रंजी ने अपने को मेरी ओर, पीछे की तरफ जरा सा पुश किया सिर्फ ये जताने के लिए की उसे मेरी शरारतों का अह्स्सास है।
गुड्डी रंजी की बगल में खड़ी उसे समझा रही थी- “पिक्चर विक्चर है क्या कोई। उसे भी जरा चला के टेस्ट करके दिखाओ ना…” रंजी बोली।
“हैं ना। इन्होंने ही लोड की है। बिना फिल्म्स के कया मजा। ये लो…” और उसने एक फोल्डर खोला।



मुझे नहीं याद पड़ रहा था की मैंने कोई पिक्चर लोड की हो और जैसे ही पिक्चर खुली मेरा जी सन्न से रह गया। वो एक ब्लो जाब की फिल्म थी।

मेरे लैपटाप की जरूर थी लेकिन वहां से इस टैबलेट में कैसे आई, मुझे अंदाज नहीं था। मुझे लगा अब रंजी जोर से गुस्सा होगी।

वो थोड़ी टेंस जरूर हो गई लेकिन कुछ बोली नहीं।


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हाँ थोड़ा पीछे सरकी अब हम लोगों की देह एकदम चिपक गई थी। उसकी सांसे लम्बी-लम्बी होने लगी थी। एक बार उसने थूक घोंटा। उसके उभार हाल्टर में और कड़े हो गए थे। वो मेरे लैपटाप की सबसे हाट औरल सेक्स की पिक्चर थी।

जेना जेम्सन की।

और वो अपने गाढ़े लिपस्टिक लगे होंठों से पहले लिंग को चाट रही थी, फिर जीभ निकालकर उसने चारों ओर लिंग बड़े प्रेम से लिक किया और होंठ के दबाव से सुपाड़ा खूब धीरे-धीरे खोल दिया।


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खूब बड़ा सा गुस्साया सुपाड़ा बाहर निकला। जुबान की टिप से उसने पहले पी-होल को छेड़ा फिर खुले सुपाड़े को कस-कसकर चाटने लगी। थोड़ी देर में आधा लिंग उसके गुलाबी होंठों के बीच था और वो खूब जोर-जोर से चूस रही थी।

असर गुड्डी और रंजी दोनों पर था लेकिन रंजी पे शायद ज्यादा था।

चुप्पी गुड्डी ने तोड़ी- “क्या मस्त लालीपाप है…”

“हूँ…” रंजी बहुत धीरे से बोली।

था तो मस्त वो। एकदम मेरे ही तरह। लम्बा कड़ा मोटा।

और उधर अब उसने कस-कसकर चूसना शुरू कर दिया था। लग रहा था की वो हाउ टू डू ब्लो जाब जैसी कोई मूवी हो। बीच-बीच में वो जब कैमरे की ओर देखती तो लगता गुड्डी और रंजी की ओर देख रही हो, और पूछ रही हो की क्यों समझ में आया ना। है ना मजेदार मस्त और रंजी की निगाह तो हट नहीं रह थी।

फिल्म में, अब उसने अपने होंठ हटा लिए थे और दोनों हाथों से लिंग बारी-बारी से पम्प कर रही थी। कभी स्लो तो कभी फास्ट। फिर जैसे छेड़ते, चिढ़ाते ललचाते सिर्फ लिक कर रही थी वो, जीभ से कभी सुपाड़े की एकलौती आँख छू भर देती,

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कभी सुपाड़े को लपड़ लपड़ चाटती, तो कभी चमड़े के मोटे डंडे को ऊपर से नीचे तक और उसकी नाचती गाती मुस्कराती आँखे उस मर्द की आँखों में जैसे सख रही हो बड़ा मजा आता है चूसने चाटने में

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रंजी के मस्त चूतड़ अब और पीछे होकर मेरे लिंग से रगड़ खा रहे थे। मैंने भी उसकी पतली कमर में लिपटे अपने हाथ को कसकर दबा लिया था और उसे अपनी ओर खींच रखा था, पूरी तरह अपने से चिपका के। मेरा लिंग अब पूरी तरह तन्ना चुका था और उसकी गाण्ड की दरार में, एकदम टाईट कैपरी के ऊपर से घुसा हुआ था।

हम दोनों ही जान रहे थे की ये अनजाने में नहीं हो रहा है। तब तक नीचे से गुड्डी ने अपने पैर से मेरे पैर पे एक जोरदार ठोकर मारी। उसका इशारा मैंने समझ लिया। हाल्टर से खुले हुए उसके उभारों के ऊपरी हिस्से को मेरी उंगलियां बस टच कर रही थी। वो थोड़ा और नीचे उतरीं और रंजी के उभार को, मेरी दो उंगलियां सहलाने, दबाने लगी, पहले हल्के-हल्के फिर कसकर खुलकर। उधर फिल्म में वो अपने दोनों उभारों के बीच लण्ड को लेकर दबा रही थी, रगड़ रही थी, कभी अपने एक इंच के खड़े निपलों से सुपाड़े पे रगड़ देती। न रंजी न गुड्डी फिल्म बंद कर रही थी।

अब वो डीप थ्रोट कर रही थी, पूरा लिंग उसके मुँह के अन्दर जोर से चूसते हुए गाल की मसल्स एकदम साफ दिख रही थी।


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वो भी उसका सिर पकड़कर कस-कसकर धक्के मार रहा था। बीच-बीच में वो खुद लण्ड बाहर निकालकर उसके गालों पे रगड़ देता लेकिं अगले पल फिर मुँह में और कुछ देर में धक्कों की स्पीड बढ़ गई।

मैं समझ गया की वो झड़ रहा है। समझ वो दोनों भी रही थी। बिना मुँह से बाहर निकाले वो अन्दर ही झड़ा और जोर से उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़े रहा।



और जब लिंग बाहर हुआ। तो पिक्चर की हिरोइन ने अपनी जीभ बाहर निकालकर उसपे पड़ी ढेर सारी गाढ़ी थक्केदार मलाई दिखाई और फिर गप्प कर ली।


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जब उसने दुबारा मुँह खोला तो वो खाली था। लेकिन लिंग के पी-होल पे एक ड्राप कम लटक रहा था। जीभ निकालकर उसने उसे भी चाट लिया।



गुड्डी ने अगली पिक्चर लगा दी।ये सब बदमाशी गुड्डी की थी, वो बनारस वाली पक्की उस्ताद और उसी को मेरे लैपी का पासवर्ड मालूम था ३२ सी और फिर उसकी बर्थडेट न और उस ऑय भी मालूम था की हिडेन फ़ोल्डर्स में ओल्ड सांग्स के नाम से कहाँ मैंने पोर्न का जखीरा छुपा रखा है, काम से ४० -४५ तो सिर्फ ब्लो जॉब्स वाली मूवी थीं और १००- १५० ब्लो जॉब की पिक्स, यहाँ तक की स्कैट और एनिमल्स का भी फोल्डर था, तो बस वहीँ उसने सेंध लगाई और जो गिफ्ट देने वाला टैबलेट था उसमे कुछ चुनकर डाल दी, माई सिस्टर के नाम से फोल्डर बना के। और वही उसने अभी चला दी थी,



ये और हाट थी। पहले औरल फिर डागी।



जब आगे फिल्म में एक्शन थोड़ा ज्यादा हाट हुआ। डागी पोज में अन्दर-बाहर सटासट जा रहा था।


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रंजी ने जाने अनजाने अपने चूतड़ हल्के-हल्के हिलाने शुरू कर दिए और मैं भी उसी के साथ। थोड़ी देर में हम लोगों ने सामने चल रही फिल्म की रिदम पकड़ ली। मेरा एक हाथ अब उसके उभार पे पूरी तरह था, कस-कसकर खुलकर मसलता।



गुड्डी ने एक पल के लिए हम लोगों की ओर देखा और मुश्कुरायी। दो-चार मिनट पिक्चर और चली होगी की गुड्डी ने टैब बंद कर दिया और बोली-

“सब पिक्चर यहीं हो जायेगी तो हाल में क्या होगा। चलो जल्दी…”



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रंजी ने उसकी और ऐसे देखा जैसे किसी बच्चे के मुँह से लालीपाप छीन लिया हो।



रंजी ने गुड्डी को चाभी पकड़ा दी वर्मा जी के यहाँ जाकर देने के लिए।

अब मैं और रंजी गली में अकेले खड़े थे। रंजी ने मेरे कंधे पे हाथ रखा था और बड़ी शोख अदा में बोली- “इत्ता इंतजार किया मैंने…”



“आ तो गया ना…” मुश्कुराकर मैंने भी उसी अंदाज में बोला।



“और इसकी क्या जरूरत थी, गलेक्सी और आई पैड की। लेकिन जानते हो मेरा मन कर रहा था। दिया के पास था। बहुत भाव दिखाती थी की मेरे कजिन ने दिया है, लेकिन उसका पुराना माडल है। अब मैं दिखाऊँगी उसको। सबसे अच्छा वाला है ये तो लेटेस्ट…” वो बोली।

“तुम भी तो सबसे अच्छी वाली हो ना…” मैंने उसके गाल को एक उंगली से सहलाते हुए कहा।



“धत्…” कुछ शर्म कुछ शोखी से वो बोली, फिर मुझे चिढ़ाते हुए बोली- “ये रीत कौन मिल गई आपको बनारस में…”



मैं कुछ किस्से कहानी बनाता। उसके पहले वो बोली-

“अरे घबड़ाओ मत। मेरी भी उससे बहुत अच्छी दोस्ती हो गई है। पक्की वाली। एकदम मस्त बिंदास। उसका मेसेज आया था थोड़ी देर पहले…”


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जब तक मैं कुछ बोलता, गुड्डी वापस आ गई थी चाभी देकर। बोली-

“अरे मैंने ही इन दोनों की दोस्ती करा दी थी फेस बुक पे…” और गुड्डी के हाथ से उसका मोबाईल लेकर रीत का मेसेज देखने लगी। फिर तो दोनों पे हँसी का दौरा पड़ गया। रुकती फिर चालू हो जाती।



“हे मुझे भी दिखाओ ना…” मैंने बोला।



लेकिन दोनों एक हो गईं। एक साथ बोली- “गर्ली टाक। तुम्हारे लिए नहीं…




गुड्डी ने आँख हल्की सी मुझे मारी और रंजी की मोबाइल के एक-दो बटन दबा दिए। मैं समझ गया। उसने वो मेसेज मुझे फारवर्ड कर दिया था।
 
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- रंजी--मस्त नितम्ब

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लेकिन दोनों एक हो गईं। एक साथ बोली-

“गर्ली टाक। तुम्हारे लिए नहीं…”



गुड्डी ने आँख हल्की सी मुझे मारी और रंजी की मोबाइल के एक-दो बटन दबा दिए। मैं समझ गया। उसने वो मेसेज मुझे फारवर्ड कर दिया था।



वो दोनों आगे आगे चल रही थी और मैं थोड़ा पीछे।

और मैंने रंजी की ओर देखा। क्या मस्त नितम्ब थे, लेफ्ट राईट, लेफ्ट राईट, दोनों कसर मसर करते हुए और ऊपर से जो गुड्डी ने उसको हाई हील पहना दी थी।
रंजी की कमर बहुत पतली थी और इस टाईट कैपरी में और संकरी लग रही थी।

और चूतड़ की साइज थोड़ी ज्यादा ही, गुड्डी से कम से कम दो साइज ज्यादा।


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मुझे चंदा भाभी की बात याद आ गई-

“ऐसी लड़कियां निहुरा के चोदने (डागी स्टाइल) और गाण्ड मारने दोनों में बहुत मस्त मजा देती हैं…”


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जैसे ही हम लोग गली के मोड़ पे पहुँचे वहां एक कन्फेक्शनरी की दुकान थी-

“हे लालीपाप…” रंजी मेरा हाथ पकड़कर जिद करके बोली।



“धत्त। अभी तो…” गुड्डी बोली।

लेकिन रंजी कम नहीं थी उसने झट जवाब दिया-

“अरे वो तो सिर्फ देखा था। ना देखने से तो भूख और बढ़ जाती है…”


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दोनों की चायं चायं में कौन पड़े। इसलिए मैं दुकान की ओर बढ़ लिया और। मेरे होश उड़ गए।



वो कत्थई सूट वाला, जिसने कल रात में बनारस से निकलते समय, पांडेपुर से मेरा पीछा किया था। पहले तो मेरे मन में आया की क्या तुम लोगों के यहाँ इतनी फैएन्सियल क्राइसिस चल रही ड़ै जो दूसरा ड्रेस नहीं बनवा पा रहे हो, इसे ही रगड़ रहे हो। फिर जब मैंने थोड़ा सीरियस होकर सोचा तो मैं घबड़ा गया। इसका एक अच्छा पार्ट था और एक बुरा।



अच्छा ये की। इसका मतलब की अभी रीत के लोगों पे उनका शक नहीं गया था और वो आराम से बनारस में आपरेसन कर सकते थे।



और बुरा पार्ट था की उन्हें मेरे सारे ठरकीपने की एक्टिंग के बावजूद अभी भी मेरे ऊपर शक था, और सारे डाटा मेरे पास थे। और कहीं जानबूझ के तो उसने आज भी वही कपड़े, वही बाइक इसलिए इश्तेमाल की हो। क्योंकि वो मुझे दिखाना चाहता हो। और मुझे डराना चाहता है।



जो होगा देखा जाएगा मैंने सोचा और दुकान में धंस लिया, थोड़ी भीड थी, मैंने दो लालीपाप लिया और आगे बढ़ा।



“मुख-मसाज…” की रानी भईया, है जेना जेमसन,

मस्त नजारा देखकर रंजी, रह जाती है सन्न,

रह जाती है सन्न, उबाला चूत में आया,

हीरो मसले बदन, नशा उसपे भी छाया,

कहें “....”, लण्ड उसका थामे जाकी है,

दिल थामो, अभी हाल की पिक्चर बाकी है।
 
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komaalrani

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ठरकी

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थोड़ी भीड थी, मैंने दो लालीपाप लिया और आगे बढ़ा।

अब मुझे आइडिया आया की रंजी को इतना लालीपाप की जिद्द क्यों सवार थी। वो और गुड्डी सड़क पे जहाँ खड़ी थी वहीं दो-तीन ठरकी टाइप के खड़े थे। वो नहीं चाहती होगी की मैं उन्हें देखूं और वो रेगुलर छेड़खानी करने वाले होंगे।रंजी और गुड्डी ने एक साईकिल रिक्शा पकड़ लिया था और वो दोनों उसपर बैठकर मेरा वेट कर रही थीं और आस पास पांच छह भौंरे चक्कर काट रहे थे, कुछ लहकट टाइप कुछ स्मार्ट भी, ये साफ़ था की रंजी, मेरी ममेरी बहन, अपने मोहल्ले में बहुत पॉपुलर थी, और थी भी तो मस्त हॉट हॉट, ये बंदा तो साइकल पे बैठ के, जिस रिक्शे पे ये दोनों कन्याये बैठी थीं, उसके ठीक बगल में करीब करीब रंजी से सटा, कुछ बोल रहा था, उसे अंदाज नहीं था दोनों माल के साथ एक माली भी है ,



वही मामला था, एक लाल टी-शर्ट वाला बोल रहा था- “अरे रेशमा जवान हो गई तीर कमान हो गई…”


गुड्डी ने उसे देखकर हल्के से मुश्कुराया, और आग में और घी पड़ गया।


“अरे रंजी क्या बात है तेरे मोहल्ले के लड़कों को तेरा नाम भी ठीक से नहीं मालूम…”


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वो लाल शर्ट वाला तो चुप रहा लेकिन एक जेल वेळ लगाये हीरो जो उन सबों का बॉस लगता था बोला-

“अरे नाम भी मालूम है, साइज भी मालूम है, 32 सी,.... क्यों जानू है ना…”

गुड्डी ने रंजी को चिढ़ाया- “अरे क्यों बड़ी नाप जोख करनेवाला है ये तो…”

“अरे ब्रा की दुकान में सेल्स मैन है। जहाँ से मैं खरीदती हूँ। इसलिए…” रंजी मुश्कुराकर कर बोली।


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जिस तरह से रंजी उस लड़के को देखकर मुश्कुराई थी, अपने होंठ पे जीभ फिरा रही थी। ये तो साफ था की ये छेड़छाड़ नई नहीं थी। और रंजी भी मजे लेकर उन सबों को छेड़ रही थी।



अरे नया नया साल है, नया नया माल है।

अरे क्या रंग रूप है, क्या चाल ढाल है।




लाल शर्ट वाला बोला। हीरो ने अबकी गुड्डी को देखकर इशारा किया-

“अरे देख होली आफर। एक के साथ एक फ्री…”


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गुड्डी क्यों चुप रहती, उसने भी आँख नचाकर रंजी से बोला-

“यार बड़े मुफ्तखोर हैं तेरे यहाँ के। रसमलाई भी चाहिए और वो भी फोकट में…”

लाल शर्ट वाला बोला- “बास अपने माल को आप रखो मुझे तो अब रसमलाई ही चाहिए। चवन्नी अठन्नी जो लगेगा दे देंगे…”

हीरो ने फिर रंजी को ही बोला- “अरे अपनी इस सहेली को बता दे। पकड़ा भी तो तूने फ्री में था। पसंद आया था ना मेरा छोटा दोस्त…”



गुड्डी रंजी से फुसफसाई- “ये क्या बोलता है। तूने पकड़ा था इसका अगर झूठ बोल रहा हो तो बोल…”



रंजी भी हल्के से बोली- “नहीं यार बोल तो सच रहा है लेकिन जानबूझ के नहीं। बस में मेरे पीछे था धकामुक्की कर रहा था, लेट हो गया था बस में लाईट भी नहीं थी। मैंने उसे पीछे करने के लिए हाथ किया तो ये जिप खोलकर उसे निकालकर खड़ा था। मेरे हाथ में आ गया…”


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तब तक मैं पीछे से पहुँच गया। मुझे आते देख गुड्डी उन सबसे बोली-

“हट हट। यार ये छोटे-छोटे दोस्तों से अपुन का काम नहीं चलता अपुन को तो बड़ा मांगता है। वो देखो मेरा बड़ा वाला आ रहा है…”



मुझे देखकर वो सब चुप हो गए लेकिन हटे नहीं।



रंजी ने मेरे हाथ से लालीपाप लगभग छीनते हुए मुश्कुराकर होंठ से लगा लिया, और बोली-

“क्या जबर्दस्त मजेदार है।"



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आँख उसकी उस हीरो को ही चिढ़ा रही थी…”



लेकिन मेरा ध्यान पीछे से आ रही मोटर साइकिल की आवाज की ओर था। कत्थई सूट वाले ने बाइक स्टार्ट कर दी थी। मैं चेक करना चाहता था की उसके इरादे क्या हैं। मैंने उन दोनों ने तुरंत एक झूठ बोला- “यार उसको 500 का नोट दिया था चेंज लेना भूल गया अभी लेकर आता हूँ…”

गुड्डी बोली- “तुमसे यही उम्मीद थी। बिना कुछ गड़बड़ किये कुछ होता है क्या? जल्दी जाओ…”





जैसे ही मैं वापस मुड़ा तो कत्थई सूट वाले ने बाइक रोक दी। जो स्ट्रीट रोमियो खड़े थे उसमें से एक बोला- “अरे छोड़ ना।रिक्शा आ मेरी बाइक पे बैठ जा…”



दुकान में मैं घुस तो गया लेकिन वो तो सिर्फ एक बहाना था।

मुझे याद आया जो मेसेज गुड्डी ने रंजी के मोबाइल से फारवर्ड किया था, रीत का। मुझे भी देखते ही हँसी आ गई और रीत की बात याद आ गई की वो एक ठरकी सेना बना रही है जो चार उसने चुने हैं उनकी फोटो गुड्डी को भेज रही है। गुड्डी से उसका मतलब एलवल वाली गुड्डी यानि रंजी से था। और फोटो चेहरे की नहीं “अंग विशेष…” की थी। क्योंकि वही उसका मापदंड था। साइज। वास्तव में मुझसे 20 नहीं तो 19 भी नहीं थे और एक तो शायद कम से कम मोटाई में 22 रहा होगा।



“लम्बा चाहिए की मोटा चाहिए। बोल रंजी बोल। तुझे कैसा चाहिए?”


आगे चाहिए की पीछे चाहिए, बोल रंजी बोल तुझे किधर चाहिए?”



रीत ने उन फोटो के साथ पूछा था। लेकिन रंजी का जवाब कम जोरदार नहीं था।“हाँ रीत दी। एकदम लेकिन मैं इनमें से कोई सेलेक्ट नहीं कर रही। क्योंकि मैं किसी बिचारे का जरा सी चीज के लिए। दिल तोड़ने में यकीन नहीं करते। मेरे लिए तो। चारों। और दो-चार और मिल जायं तो वो भी चलेगा…”

रंजी पर भी रीत की दोस्ती का असर चढ़ रहा था।



मैं बाहर निकला,और उन दोनों के साथ रिश्ते पर बैठ गया, में बीच में और वो दोनों छोरियां दोनों और ।


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लेकिन चलते चलते भी रंजी ने उन छोरों को ललचाते हुए दिखाकर पहले तो लालीपाप बाहर निकाला फिर साइड से चाट लिया और फिर एक झटके में पूरा का पूरा गप्प कर लिया। जैसे लालीपाप ना हो। ‘वो’ हो।

उन लड़कों की बेंतबाजी अभी भी चल रही थी और अब फिल्मी गानों से भोजपुरी होली के गाने पे आ गई थी।



वो लाल शर्ट वाला कह रहा था-

“अरे साढ़े तीन बजे गुड्डी जरूर मिलना साढ़े तीन बजे,

अरे इ जोबना का मज्जा जरूर देना साढ़े तीन बजे।



और उस हीरो ने भी जवाइन कर लिया-

अरे पांच के बदले पचास दै देब

बिना चोदे न छोड़ब चाहे जेहल हो जाय साढ़े तीन बजे।




और रिक्शे पे भी। गुड्डी भी कम नहीं थी। उसने मेरा हाथ जो बीच में बैठी रंजी के कंधे पे था खींचकर। सीधे उसके उभार पे। और बोली-

“अरे ठीक से पकड़ो। कित्ते दिन बाद ट्रिपलिंग कर रहे होंगे। कहीं गिर गिरा गए तो।

रंजी भी। उसने भी अपने उभार पे रखे मेरे हाथ को और अपनी ओर खींचकर अपने हाथ में लेकर अपने किशोर मस्त गुदाज उभारों पर जोर से दबाते हुए कहा।

“असल में गिरने विरने की चिंता नहीं हैं। असल बात ये है की कहीं आप गिर विर गए और मैं और गुड्डी पिक्चर हाल पहुँच गए तो पिक्चर का पैसा कौन देगा और शापिंग कौन कराएगा…”


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दोनों एक साथ बहुत जोर से खिलखिलायीं।

लेकिन फिर रंजी ने पाला बदला- “हे मेरे भैया। इत्ती जल्दी नहीं गिरते…”

गुड्डी बड़ी जोर से खिलखिलाई- “अच्छा जी भैया की बहना। तो तुम्हें मालूम है की तुम्हारे भैय्या कितने देर में गिरते हैं। तो जरा हमें भी बताओ ना। 10 मिनट, 15 मिनट, आधे घंटे में। कित्ते देर में।


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रंजी ने जिस हाथ से मुझे पकड़ रखा था उसी हाथ से गुड्डी को मारने के लिए हाथ बढ़ाया।

और मैं गिरते-गिरते बचा। मैंने सम्हल कर रंजी को कसकर पकड़ा, अबकी मेरे हाथ उसके उभार पे न सिर्फ थे, बल्की उसे कसकर दबोच रखा था।



रंजी ने और कसकर मेरा हाथ अपने सीने पे रखकर दबा दिया।

हाल्टर टाप से छलकते हुए उसके मटर के दाने के बराबर निप्स साफ-साफ झलक रहे थे। पहले मैंने उंगली के पोरों से उन्हें हल्के-हल्के दबाया और फिर तरजनी और अंगूठे के बीच में लेकर हल्के-हल्के रोल करने लगा। निप्स एकदम कड़े हो गए थे। रंजी के मुख से रोकते-रोकते जैसे सिसकी निकल गई।



उसने कुछ अदा से कुछ शिकायत से मेरी ओर देखा और जवाब में मैंने कसकर उसके टाप फाड़ते किशोर उभारों को अबकी जोर से दबा दिया।

आँख नचाकर मेरे कानों से अपने दहकते होंठ हल्के से सटाकर वो बोली- “बदमाश…” और मुझसे और सट गई। और उसी समय कत्थई सूट वाला अपनी बाइक पे हम लोगों के एकदम बगल से गुजरा। उसकी निगाह हमलोगों पे ही टिकी थी।

शायद वो यही देखना चाह रहा था। जो बातें हमारे फोन से उसने टैप की थी। कहीं वो एक्टिंग तो नहीं। कहीं हम लोगों को ये मालूम तो नहीं की हम लोगों का फोन टैप हो रहा है। इसलिए वो खुद देखना चाह रहा हो। और उसने वही देखा जो हम उसे दिखाना चाहते थे। रास्ते में दो-तीन बार वो हमारे रास्ते में आया।

रंजी ने एक मजेदार बात बताई। उसे गुड्डी और रीत के सौजन्य से, उन दोनों ने जो मेरी बनारस में दुरगत की थी, उसका रत्ती रत्ती भर हाल मालूम हो गया था। यहाँ तक की रीत ने जो मेरी शर्ट पे रंजी की पूरी रेट लिस्ट छाप दी थी।

मेरे और रंजी के मोबाइल नम्बर के साथ-साथ। और उसके साथ-साथ गुड्डी ने जो मुझे पूरे बनारस में घुमाया था, और जो “डिमांड…” आई थी उन्हें कैसे रीत को फारवर्ड कर दिया था, सब कुछ, कैसे मैंने वादा किया था की मैं यहाँ से लौटते हुए उसे बनारस ले जाऊँगा और रंग पंचमी में वो वही रहेगी, सब कुछ और उसने पूरी सहमती दी। उसने खुद बताया की कई लोगों का जब एम॰एम॰एस॰ आया तो पहले तो उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन बाद में उसने मजे लेते हुए उसी तरह चार-पाँच के जवाब भी दे दिए।
 
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पिक्चर

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जब हम लोग हाल में पहुँचे तो बस पिक्चर शुरू ही होने वाली थी।



बुकिंग पे काउंटर वाले ने बोला की क्या हम बाक्स का टिकट लेंगे, पिक्चर बस शुरू होने वाली है। मेरा ध्यान पीछे था। वो कत्थई सूट वाल भी टिकट विंडो की ओर बढ़ रहा था मैं नहीं चाहता थी की वो हाल में भी हमारे पीछे रहे।



बाक्स में घुसते ही गुड्डी और रंजी की चांदी हो गई और मेरा सोना। रंजी ने घुसते ही सोफे का एक कोना पकड़ा, मैं बीच में और गुड्डी दूसरे कोने पे, और मेरी सैंडविच बन गई।



फरमाइशें, ताने, शिकायतें, कोल्ड-ड्रिंक नहीं पिलाया, बिना पाप कार्न खिलाये पिक्चर का मजा क्या? ऐसी कंजूसी। कम से कम मूंगफली ही खरीद दी होती। और दोनों नदिदियां, लालीपाप चूसे जा रही थी।


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मैंने भी पलट वार किया- “अकेले अकेक्ले लालीपाप खाए जा रही हो मुझे आफर भी नहीं किया…” मैं बोला।

“च च। सारी भैय्या गलती हो गई। लो ना…” और रंजी ने एक बार मुझे दिखाकर लालीपाप सक किया, फिर निकालकर अपने होंठों पे उसे एक ओर से दूसरे ओर तक लगाया। और सीधे मेरे मुँह में। उसके थूक, मुख रस से लिथड़ा, लिपटा लालीपाप अलग ही रस था।

गुड्डी ने दूसरी ओर से मुझे कोंचा- “हे क्या रंजी का ही लोगे?”
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उसकी अदा और शिकायत के अंदाज से साफ था की वो “क्या लेने…” का जिक्र कर रही है। और उसने अपने मुँह से निकालकर लालीपाप मुझे आफर किया।

रंजी कौन सीधी थी, कल रात का किस्सा उसे पूरे डिटेल के साथ गुड्डी ने बता दिया था तो वो भी तेल पानी ले के पिल पड़ी," कमीनी तेरी तो ले ली न मेरे भैया ने रगड़ रगड़ के, अब मेरी ले रहे हैं तो तेरी क्यों सुलग रही है,"

बड़ी अदा से लॉलीपॉप चूसती गुड्डी शाहाना अंदाज में बोली " बिन्नो, सुलगने वाली चीज तो मैंने बहुत पहले पांच रूपये की वीट से साफ़ कर दी है, एकदम मक्खन मलाई है, और न बिस्वास हो अपने इस भैया कम भतार ज्यादा से पूछ लो, "

“अरे यार एक साथ दोनों का कैसे लूँगा?” मेरे मुँह से निकल गया और आफत हो गई।

“क्यों दोनों का एक साथ नहीं ले सकते क्या?” बड़े भोलेपन से रंजी ने पूछा।
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“क्यों नहीं ले सकते। बल्की लेंगे ही अभी देखना तुम। और वो नहीं लेंगे तो हम दोनों तो सहेलियां हैं जरूर साथ-साथ लेंगे…”

गुड्डी बोली और अपना इरादा उसने अगले पल साफ कर दिया।जंगबहादुर पर तो रिक्शे पर से ही बौराये थे, दो टीनेजर दर्जा ११ वाली, दोनों सेक्सी हॉट, तो किसका नहीं फनफनायेगा, और ऊपर से बनारस वाली गुड्डी पहले तो हलके हलके फिर खुल के सोफे पे बैठते ही, जींस के ऊपर से जंगबहादुर की चम्पी तेल मालिश कर रही थी और वो सुनते भी उसी की थे। चड्डी गुड्डी ने पहनने नहीं दी थी तो तम्बू तो तनना ही था।
बैठते ही गुड्डी के एक हाथ ने सीधे मेरे जंगबहादुर को मेरे पैंट के ऊपर से ही कब्जे में ले लिया था और अब उसने खींचकर रंजी का भी हाथ वहीं रख दिया।

पिक्चर शुरू हो गई थी लेकिन पिक्चर किसे देखनी थी।दो दो टीनेजर्स के हाथ फनफनाये नागराज पर, और मेरा हाथ मेरी ममेरी बहन की कच्ची अमिया पर, उफ़ क्या स्वाद था।
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तभी कोल्ड ड्रिंक्स वाला अन्दर आया। मेरी तो आफत हो गई।

दोनों एक साथ, कोल्ड ड्रिंक्स, पाप कार्न और ना जाने क्या-क्या? और मेरी जेब से पैसा निकालकर गुड्डी ने कोल्ड-ड्रिंक वाले को दे दिया। पर्स और कार्ड तो टिकट खरीदने के बाद उसी के कब्जे में था। लेकिन मेरी बचत भी हो गई।

और बचत भी हो गई।

वो भी दो तरह से, एक तो उन दोनों बिलियों के झगड़ों से कुछ देर के लिए निजात मिली।


दूसरी मेरी चमकी।

उस कत्थई सूट वाले को मैंने कोल्ड-ड्रिंक शाप पे इसी लड़के से बात करते देखा था। तो उसीने उसे कुछ पे करके यहाँ भेजा होगा। ये देखने के लिए की हमलोग कर क्या कर रहे हैं। मैं सिर्फ ठरकी पने की एक्टिंग कर रहा हूँ या वास्तव में। और वो एकदम सही टाइम पे आया।

गुड्डी का हाथ तो पहले ही मेरे जंगे शेरे को और जगा रहा था, अब उसने रंजी का हाथ भी खींचकर वहीं रख दिया था। मेरा एक हाथ तो रंजी के हाल्टर टाप के अन्दर था और दूसरा गुड्डी का जोबन मर्दन कर रहा था। और जैसे ही वो बाहर गया। मुझे मालूम था की वो हाल खुलासा कत्थई सूट वाले को बयान करेगा। उसके बाद तो क्या नहीं हुआ।

रंजी कोल्ड-ड्रिंक खतम करने के बाद थोड़ा सा उठी बोतल सीट के नीचे रखने के लिए और गुड्डी ने मुझे जोर से आँख मारकर उसकी जगह पुश कर दिया और अब जो वो बैठी तो सीधे मेरी गोद में।



“क्यों मजा आ रहा है सिंहासन पे बैठने में…” गुड्डी ने उसे छेड़ा।

“और क्या? तू सोचती है तू ही बैठ सकती है…” मेरे जाग गए शेर पे अपने कैपरी फाड़ते चूतड़ों को जोर-जोर से रगड़ते वो बोली- “और फिर गुड्डी को जोर से आँख मारकर बोली- “लेकिन बिचारा सिंह तो अभी पिंजड़े में कैद है।'
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“तो खोल दे ना…” गुड्डी ने उसे चिढ़ाया-

“लेकिन दहाड़ता हुआ निकलेगा तो बस। गुफा ढूँढ़ेगा…”

पहले तो मेरे दोनों हाथ हाल्टर टाप के ऊपर से ही उसके उरोजों को सहलाते रहे लेकिन बायां हाथ थोड़ा ज्यादा बोल्ड था। पहले उंगलियां फिर पूरी हथेली। पहले तो सिर्फ स्पर्श सुख। एक किशोरी के नवल यौवन कमल का स्पर्श ही मुझे और रंजी दोनों को गिनगिना गया। फिर हिम्मत करके मैंने थोड़ा सा दबाया। जब रंजी कुछ नहीं बोली तो मेरी उंगली ने उसके निपल को फ्लिक किया। एकदम कड़क और अब मुझे ग्रीन सिगनल मिल गया था की उसे भी मुझसे कम मजा नहीं मिल रहा है। फिर तो दूसरे हाथ ने। और अब टाप सरक के नीचे। ब्रा का कवच तो था भी नहीं और दोनों उरोज मेरी मुट्ठी में।

मैंने जब एक साथ दोनों निपल अंगूठे और तरजनी के बीच में लेकर रोल किया तो उसने पहली बार कसकर सिसकी भरी और अपनी दोनों जाँघों को सिकोड़ लिया। लेकिन अब मैं रुकने वाला नहीं था। मेरे होंठ भी मैदान में आ गये थे। उसके गर्दन पे, हल्के-हल्के बटरफ्लाई किसेज गाल पे और एक हाथ जोबन को अब कसकर दबा रहा था मसल रहा था और दूसरा उसके निपल को कभी फ्लिक करता, कभी पुल करता कभी, रोल करता।



“क्या करते हो…” वो बोली, कुछ शिकायत से, कुछ मजे से कुछ दावत देते। बहुत हल्की सिसकी लेते वो बोली।

भले हम लोग बाक्स में हों और कोई हम लोगों को नहीं देख सकता हो। लेकिन आवाज तो जाती ही और। और लोगों को फिल्म देखने में डिस्टर्ब होता न तो इसलिए मैंने अपने होंठ सीधे रंजी के रसीले होंठों पे। वो भीगे होंठ तेरे और श्योर होने के लिए मेरी जीभ उसके मुँह में घुस गई।

गुड्डी खाली नहीं बैठी थी। उसके होंठ मेरे इयर को किस कर रहे थे, जीभ कभी मेरे कान पे कभी गरदन पे और कभी गालों पे। मेरी आग को और हवा दे रही थी। गुड्डी के होंठ मेरे पैंट में बंद दहाड़ते सिंह को और उकसा रहे थे कभी वो उसे प्यार से सहलाती, तो कभी जोर से दबा देती। लेकिन वो कोई भेदभाव नहीं कर रही थी।



मेरी गोद में बैठी रंजी की प्यारी-प्यारी चुनमुनिया पे भी वो बीच-बीच में हाथ फिरा दे रही थी। और उसका असर मेरे और रंजी दोनों पे हो रहा था। मारे जोश के मैं अब बिना रुके उसके गदराये किशोर उभार कस-कसकर दबा रहा था और रंजी भी लम्बी-लम्बी साँसें ले रही थी, जोर-जोर से अपनी जांघें भींच रही थी और मेरे होंठ में अपने होंठ भींचे होने के बावजूद उसकी सिसकी निकल रही थी और वो और कस-कसकर अपने नितम्ब मेरे तने हुए लिंग पे रगड़ रही थी।



तभी दरवाजा खुला और वो कोल्ड-ड्रिंक वाला आया। न मैंने रंजी के टाप से अपना हाथ हटाया और ना गुड्डी ने मेरे शेर से। सिर्फ रंजी ने अपनी टांगें उठा दी और।

वो सीट के नीचे से सारी बाटल्स ले गया।

उसके जाते ही रंजी को मेरे गोद से गुड्डी ने धकेला- “हे कित्ती देर तक सिंहासन का मजा लेगी चल उतर…” गुड्डी बोली“तो क्या तू बैठेगी सिंहासन पर?” रंजी सरक के मेरी बायीं और फिर से सोफे पे बैठते हुए बोली।

“ना सिंह को आजाद करूँगी…” गुड्डी मेरी गोद में झुकते हुए बोली और मेरे सम्हलने के पहले ही गुड्डी ने जिप खोल दी।

जैसे स्प्रिंग वाले चाकू का विज्ञापन निकलता है। बटन दबावो, झटके से 8 इंच का चाकू बाहर। बस वैसा ही हुआ। वो तुरंत उछलकर बाहर, सुपाड़ा पहले से ही खुला था। चंदा भाभी की शिक्षा और आदेश के अनुसार। (उन्होंने पहले दिन ही बनारस में समझाया था। सुपाड़ा हमेशा खुला रखना। कपड़े से रगड़ खाकर वो थोड़ा नंब हो जाएगा। और डिस्चार्ज होने का टाइम देर से हो जाएगा) गुड्डी ने उसे अंगूठे और तरजनी से रगड़ा और वो जोश से पागल हो गया।
 
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