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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

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Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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dhalchandarun

[Death is the most beautiful thing.]
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#189.

भारत में इस समय दोपहर के 4 बज रहे थे। शलाका और जेम्स, आर्केडिया के गुप्त द्वार से बाहर निकले और रुद्र सागर के पानी को चीरते हुए, झील की सतह के ऊपर आ गये।

"आर्ची, मेरे और जेम्स के कपड़े, भारत की परंपरा के हिसाब से कर दो।” शलाका ने झील के बाहर निकलते ही आर्ची को आदेश दिया। शलाका के इतना कहते ही जेम्स और उसके कपडे तुरंत बदल गये।

यह देख जेम्स ने आश्चर्य से पूछा- “क्या आर्ची वहां से कपड़े भी चेंज कर सकती है?"

“आगे-आगे देखते रहो....अभी वह बहुत कुछ कर सकती है।” शलाका ने मुस्कुराकर अपने शरीर पर पहने कपड़े को देखा और फिर महा…लेश्वर मंदिर की ओर बढ़ गई।

इस समय जेम्स और शलाका ने टीशर्ट और जींस पहन रखी थी।

जेम्स के लिये ये सभी कुछ बहुत अनोखा था। उसे तो यह लग रहा था कि शलाका कहीं भी जाने के लिये अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग करेगी, पर जेम्स की सोच से बिल्कुल उल्टा हो रहा था, शलाका पूरी तरह से विज्ञान की शक्तियों का प्रयोग कर रही थी।

शलाका चलते हुए अब मंदि..र के प्रांगण में आ गई। शलाका ने जिस तरह का मं..दिर वेदांत रहस्यम् में देखा था, यह उससे बिल्कुल अलग था। बस देव का शि….वलिंग वहीं था।

इस समय मं..दिर के पट बंद थे। शलाका ने बाहर से हाथ जोड़कर देव का नमन किया और जेम्स को लेकर उस दिशा की ओर चल दी, जिधर उसने, वह लकड़ी का मकान देखा था।

इस समय उस स्थान पर सबकुछ बदला-बदला सा नजर आ रहा था। अब वहां पर बहुत से मकान बन चुके थे, पर शलाका को उस मकान की मंदिर से दूरी और उसका कोण याद था, इसलिये वह बिना कहीं रुके आगे बढ़ रही थी।

अब शलाका एक स्थान पर जाकर रुक गई। उसके सामने एक पक्का और काफी अच्छा मकान बना था।

शलाका ने एक बार फिर पलटकर मं..दिर के प्रांगण को देखा और उस मकान की दूरी और उसके कोण का फिर से अंदाजा लगाया।

अब वह पूरी तरह से संतुष्ट थी कि यह वही मकान है। शलाका जेम्स को लेकर उस मकान के बाहर पहुंच गई।

मकान के बाहर एक नेम प्लेट लगी थी, जिस पर हिंदी भाषा में लिखा था- “शारदा भवन।"

पर जेम्स, उस भाषा को पढ़ नहीं पा रहा था।

“आर्ची, हमें हिंदी भाषा का ज्ञान चाहिये।” शलाका ने आर्ची से कहा।

“भेज दिया, आप चेक कर सकती हैं।” आर्ची ने बिना देर लगाये शलाका और जेम्स के दिमाग में हिंदी भाषा का ज्ञान डाल दिया।

आर्ची के हर एक कार्य पर जेम्स हैरान हो रहा था। अब जेम्स की नजर दोबारा से नेम प्लेट पर गई, पर अब वह साफ-साफ हिंदी भाषा को पढ़ ले रहा था।

अब शलाका ने उस घर पर लगी घंटी पर अपनी उंगली रख दी। अंदर कहीं एक मधुर स्वरलहरी गूंजी।

कुछ देर के बाद एक लगभग 35 वर्षीय महिला ने दरवाजा खोला।
अपने सामने कुछ अजनबियों को देख, उसने पूछ लिया- "कौन हैं आप लोग और आपको किससे मिलना है?"

“जी, हमें इस घर के बारे में कुछ पूछना है? क्या हम अंदर आ सकते हैं?” शलाका ने बिल्कुल साफ हिंदी बोलते हुए कहा।

वह महिला एक विदेशी को इतनी साफ हिंदी बोलते देख खुश हो गई और उन्हें अंदर आने का इशारा किया।

शलाका और जेम्स घर के अंदर आ गये। घर अंदर से काफी सजा हुआ था। उस महिला ने दोनों को सोफे पर बैठने का इशारा किया और स्वयं सामने वाले सोफे पर बैठ गई।

“जी अब बताइये कि आप क्या कह रहीं थीं?” उस महिला ने शलाका से पूछा।

“जी क्षमा चाहती हूं, पर मैं कुछ भी बोलने से पहले आपका परिचय जानना चाहती हूं।” शलाका ने विनम्र शब्दों में निवेदन करते हुए पूछा।

"मेरा नाम शारदा है, मैं ही इस घर की मालकिन हूं।" शारदा ने कहा।

"शारदा जी आज से 30 वर्ष पहले इस मकान में हमारे पिताजी रहते थे। उन्हों ने अपना कुछ सामान, इस घर के तहखाने में रखा था, जिसका पता हमें कुछ दिनों पहले चला है, इसलिये हम यहां आये हैं।” शलाका ने साफ झूठ बोलते हुए कहा।

“जी, पर हमने तो यह मकान, सिर्फ 9 वर्ष पहले ही खरीदा है और इसमें कोई भी तहखाना नहीं है। इसके पहले तो इस मकान में शर्मा जी रहते थे, जो कि अपना सब कुछ बेचकर यहां से हमेशा-हमेशा के लिये अमेरिका चले गये।” शारदा ने कहा- “पर क्या मैं पूछ सकती हूं कि ऐसा क्या था यहां? जिसे आप 30 वर्ष बाद ढूंढने यहां आये हैं?”

“जी, वह काँच का एक अष्टकोण था, जो कि हमारे पिता की आखिरी निशानी था।” शलाका ने अभिनय करते हुए कहा- “पर अब तो उसका मिलना बिल्कुल असंभव ही है।"

शलाका का चेहरा रोने वाले अंदाज में बन गया, जिसे देख शारदा बोल उठी- “आप परेशान मत होइये, मैं आपको शर्मा जी का पता और फोन नंबर दे देती हूं। आप एक बार उनसे पूछ कर देख लीजिये, हो सकता है कि उन्हें कुछ पता हो उस अष्टकोण के बारे में?"

“ठीक है, आप उनका ही पता दे दीजिये, मैं उनसे मिलकर पूछ लूंगी।” शलाका ने खड़े होते हुए कहा" वैसे क्या मैं आपका अंदर वाला कमरा, एक बार देख सकती हूं?"

"हां पर इतने वर्षों के बाद अब उस कमरे में क्या मिलेगा आपको?" शारदा ने आश्चर्य से शलाका को देखते हुए कहा।

"मेरी माँ की यादें...वह उसी कमरे में रहती थीं।" अब तो शलाका ने झूठ बोलने की हद ही कर दी।

जेम्स, शलाका के अद्वितीय अभिनय को देख मन ही मन मुस्कुरा रहा था, पर वह अब भी सबके सामने अपने भावों को सामान्य किये शांति से बैठा था।

“जी हां आप अंदर वाला कमरा देख सकती हैं।” शारदा ने शलाका को अंदर जाने की इजाजत दे दी और उठकर स्वयं भी शलाका के साथ चलने लगीं।

एक सेकेण्ड से भी कम समय में, शलाका ने जेम्स को गहरे अंदाज में देखा।

जेम्स समझ गया कि शलाका नहीं चाहती कि शारदा उसके पीछे-पीछे उस कमरे में जाये, इसलिये वह तुरंत बोल उठा- “आप घर में अकेली ही रहती हैं क्या? मेरा मतलब है कि भाई साहब कहां काम करते हैं?" जेम्स को बोलता देख शारदा वापस से सोफे पर बैठ गई।

“मेरे पति का कपड़ों का व्यापार है, वह इस सिलसिले में अक्सर बाहर ही रहते हैं, इसलिये पूरा घर मुझे ही संभालना पड़ता है।"

शलाका, शारदा को बातों में फंसा देखकर तुरंत अंदर के कमरे में पहुंच गई। शलाका ने उस कमरे के कोण को देख महसूस कर लिया कि यह वही कमरा था, जिसमें उसने आर्यन को उस दिव्य बालक को छिपाते हुए देखा था।

“आर्ची, तुरंत मेरी आँखों में पृथ्वी से धातु ढूंढने वाला स्कैनर डालो।” शलाका ने आर्ची से कहा।

आर्ची ने तुरंत शलाका की आँख में स्कैनर डाल दिया। अब शलाका तेजी से पूरे कमरे की जमीन को स्कैन करके, उसके नीचे देखने लगी।

पर पूरे कमरे को स्कैन करने के बाद भी उसे जमीन में किसी प्रकार का धातु का कोई टुकड़ा नहीं दिखाई दिया।

“यहां पर अमरत्व की धातु वाली शीशी नहीं है, इसका साफ मतलब है कि किसी ने उस अष्टकोण से उस दिव्य बालक को निकाल लिया है?...अब...अब तो...शारदा से नंबर लेकर, एक बार शर्मा से भी बात करनी होगी, हो सकता है कि उसे अष्टकोण का पता हो?" यह सोच शलाका ने अपने चेहरे पर फिर से रोने वाले भाव लाये और वापस जेम्स के पास आ गई।

"अच्छा शारदा जी, आप वो शर्मा जी का पता और नंबर दे दीजिये....मैं एक बार उनसे बात करके भी देख लेती हूं।” शलाका ने शारदा की ओर देखते हुए कहा "वैसे शर्मा जी के घर में कौन-कौन है?"

"कौन...कौन....क्या? बस 3 ही लोग हैं उनके परिवार में शर्मा जी, उनकी पत्नि गायत्री और उनका बेटा देवोम।" शारदा ने पास की टेबल पर रखी अपनी डायरी उठाई और उसके पन्ने पलटकर शर्मा जी का नंबर ढूंढने लगी।

"उनके और बच्चे नहीं हैं क्या?" जेम्स ने शारदा को देखते हुए पूछा।

"और बच्चे?....अरे 50 वर्ष की उम्र में तो उन्हें बेटा हुआ था...अब उसके बाद और बच्चे कहां से आते?" शारदा ने एक पन्ने पर शर्मा जी का पता लिखते हुए कहा।

शारदा की बात सुन, इस बार शलाका का माथा ठनका।

"इस उम्र में बेटा?” शलाका ने आश्चर्यचकित होने का अभिनय किया।

"हां...कुछ लोग तो कहते हैं कि उनके बुढ़ापे को देख ईश्वर ने ही उनकी सुन ली...पर जो भी कहो....देवोम है बहुत कमाल का? बिल्कुल देवताओं सा तेज है उसके चेहरे पर इसीलिये तो शर्मा जी ने उसका नाम देवोम रखा था।...किसी ने सही कहा है, ईश्वर की माया अपरम्पार है।"

यह कहकर शारदा ने एक कागज शलाका की ओर बढ़ दिया, इस कागज में लिखा था “महेन्द्र शर्मा, 127B, 6 स्ट्रीट, मैनहट्टन, न्यूयार्क, अमेरिका” इसके बाद एक फोन नंबर दिया हुआ था।

"जी आपके सहयोग के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद।” यह कहकर, शलाका ने वह कागज का टुकड़ा शारदा से ले लिया और जेम्स के साथ बाहर की ओर निकल गई।

जाने क्यों शलाका को विश्वास हो चला था कि देवोम ही वह दिव्य बालक है? अब वह तेजी से वापस रुद्र सागर की ओर चल दी।

“क्या अब हम न्यूयार्क जायेंगे?" जेम्स ने शलाका से पूछा।

“हां ! हम न्यूयार्क जायेंगे, पर अभी नहीं। अभी मुझे कुछ और काम निपटाने हैं। इसलिये पहले हमें वापस अंटार्कटिका चलना होगा।” शलाका ने अपना सिर हिलाते हुए कहा- “वैसे जब तक मैं उस दिव्य बालक को ढूंढ नहीं लेती, तब तक मुझे शांति नहीं मिलेगी?"

“शलाका !" जेम्स ने एक जगह रुकते हुए कहा “आप तो देवी हो। हो सकता है कि आपको भूख ना लगती हो?"

जेम्स की बात सुन शलाका एक झटके से रुकी और पलटकर जेम्स को देखने लगी। फिर मुस्कुराकर, एक पास वाले रेस्टोरेंट की ओर बढ़ गई।

जेम्स भी मुस्कुराकर शलाका के पीछे चल दिया।

जारी रहेगा_____✍️
Mujhe 98% aisa lag raha hai jaise Devom aur Vyom dono same hain, aapne hint toh yahi diya hai, khair let's see aage kya hota hai, update majedaar raha.
 

Raj_sharma

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Mujhe 98% aisa lag raha hai jaise Devom aur Vyom dono same hain, aapne hint toh yahi diya hai, khair let's see aage kya hota hai, update majedaar raha.
Are nahi bhai nahi, wo dono alag hain :D
Thank you very much for your valuable review and support bhai :thanks:
 

Raj_sharma

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#189.

भारत में इस समय दोपहर के 4 बज रहे थे। शलाका और जेम्स, आर्केडिया के गुप्त द्वार से बाहर निकले और रुद्र सागर के पानी को चीरते हुए, झील की सतह के ऊपर आ गये।

"आर्ची, मेरे और जेम्स के कपड़े, भारत की परंपरा के हिसाब से कर दो।” शलाका ने झील के बाहर निकलते ही आर्ची को आदेश दिया। शलाका के इतना कहते ही जेम्स और उसके कपडे तुरंत बदल गये।

यह देख जेम्स ने आश्चर्य से पूछा- “क्या आर्ची वहां से कपड़े भी चेंज कर सकती है?"

“आगे-आगे देखते रहो....अभी वह बहुत कुछ कर सकती है।” शलाका ने मुस्कुराकर अपने शरीर पर पहने कपड़े को देखा और फिर महा…लेश्वर मंदिर की ओर बढ़ गई।

इस समय जेम्स और शलाका ने टीशर्ट और जींस पहन रखी थी।

जेम्स के लिये ये सभी कुछ बहुत अनोखा था। उसे तो यह लग रहा था कि शलाका कहीं भी जाने के लिये अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग करेगी, पर जेम्स की सोच से बिल्कुल उल्टा हो रहा था, शलाका पूरी तरह से विज्ञान की शक्तियों का प्रयोग कर रही थी।

शलाका चलते हुए अब मंदि..र के प्रांगण में आ गई। शलाका ने जिस तरह का मं..दिर वेदांत रहस्यम् में देखा था, यह उससे बिल्कुल अलग था। बस देव का शि….वलिंग वहीं था।

इस समय मं..दिर के पट बंद थे। शलाका ने बाहर से हाथ जोड़कर देव का नमन किया और जेम्स को लेकर उस दिशा की ओर चल दी, जिधर उसने, वह लकड़ी का मकान देखा था।

इस समय उस स्थान पर सबकुछ बदला-बदला सा नजर आ रहा था। अब वहां पर बहुत से मकान बन चुके थे, पर शलाका को उस मकान की मंदिर से दूरी और उसका कोण याद था, इसलिये वह बिना कहीं रुके आगे बढ़ रही थी।

अब शलाका एक स्थान पर जाकर रुक गई। उसके सामने एक पक्का और काफी अच्छा मकान बना था।

शलाका ने एक बार फिर पलटकर मं..दिर के प्रांगण को देखा और उस मकान की दूरी और उसके कोण का फिर से अंदाजा लगाया।

अब वह पूरी तरह से संतुष्ट थी कि यह वही मकान है। शलाका जेम्स को लेकर उस मकान के बाहर पहुंच गई।

मकान के बाहर एक नेम प्लेट लगी थी, जिस पर हिंदी भाषा में लिखा था- “शारदा भवन।"

पर जेम्स, उस भाषा को पढ़ नहीं पा रहा था।

“आर्ची, हमें हिंदी भाषा का ज्ञान चाहिये।” शलाका ने आर्ची से कहा।

“भेज दिया, आप चेक कर सकती हैं।” आर्ची ने बिना देर लगाये शलाका और जेम्स के दिमाग में हिंदी भाषा का ज्ञान डाल दिया।

आर्ची के हर एक कार्य पर जेम्स हैरान हो रहा था। अब जेम्स की नजर दोबारा से नेम प्लेट पर गई, पर अब वह साफ-साफ हिंदी भाषा को पढ़ ले रहा था।

अब शलाका ने उस घर पर लगी घंटी पर अपनी उंगली रख दी। अंदर कहीं एक मधुर स्वरलहरी गूंजी।

कुछ देर के बाद एक लगभग 35 वर्षीय महिला ने दरवाजा खोला।
अपने सामने कुछ अजनबियों को देख, उसने पूछ लिया- "कौन हैं आप लोग और आपको किससे मिलना है?"

“जी, हमें इस घर के बारे में कुछ पूछना है? क्या हम अंदर आ सकते हैं?” शलाका ने बिल्कुल साफ हिंदी बोलते हुए कहा।

वह महिला एक विदेशी को इतनी साफ हिंदी बोलते देख खुश हो गई और उन्हें अंदर आने का इशारा किया।

शलाका और जेम्स घर के अंदर आ गये। घर अंदर से काफी सजा हुआ था। उस महिला ने दोनों को सोफे पर बैठने का इशारा किया और स्वयं सामने वाले सोफे पर बैठ गई।

“जी अब बताइये कि आप क्या कह रहीं थीं?” उस महिला ने शलाका से पूछा।

“जी क्षमा चाहती हूं, पर मैं कुछ भी बोलने से पहले आपका परिचय जानना चाहती हूं।” शलाका ने विनम्र शब्दों में निवेदन करते हुए पूछा।

"मेरा नाम शारदा है, मैं ही इस घर की मालकिन हूं।" शारदा ने कहा।

"शारदा जी आज से 30 वर्ष पहले इस मकान में हमारे पिताजी रहते थे। उन्हों ने अपना कुछ सामान, इस घर के तहखाने में रखा था, जिसका पता हमें कुछ दिनों पहले चला है, इसलिये हम यहां आये हैं।” शलाका ने साफ झूठ बोलते हुए कहा।

“जी, पर हमने तो यह मकान, सिर्फ 9 वर्ष पहले ही खरीदा है और इसमें कोई भी तहखाना नहीं है। इसके पहले तो इस मकान में शर्मा जी रहते थे, जो कि अपना सब कुछ बेचकर यहां से हमेशा-हमेशा के लिये अमेरिका चले गये।” शारदा ने कहा- “पर क्या मैं पूछ सकती हूं कि ऐसा क्या था यहां? जिसे आप 30 वर्ष बाद ढूंढने यहां आये हैं?”

“जी, वह काँच का एक अष्टकोण था, जो कि हमारे पिता की आखिरी निशानी था।” शलाका ने अभिनय करते हुए कहा- “पर अब तो उसका मिलना बिल्कुल असंभव ही है।"

शलाका का चेहरा रोने वाले अंदाज में बन गया, जिसे देख शारदा बोल उठी- “आप परेशान मत होइये, मैं आपको शर्मा जी का पता और फोन नंबर दे देती हूं। आप एक बार उनसे पूछ कर देख लीजिये, हो सकता है कि उन्हें कुछ पता हो उस अष्टकोण के बारे में?"

“ठीक है, आप उनका ही पता दे दीजिये, मैं उनसे मिलकर पूछ लूंगी।” शलाका ने खड़े होते हुए कहा" वैसे क्या मैं आपका अंदर वाला कमरा, एक बार देख सकती हूं?"

"हां पर इतने वर्षों के बाद अब उस कमरे में क्या मिलेगा आपको?" शारदा ने आश्चर्य से शलाका को देखते हुए कहा।

"मेरी माँ की यादें...वह उसी कमरे में रहती थीं।" अब तो शलाका ने झूठ बोलने की हद ही कर दी।

जेम्स, शलाका के अद्वितीय अभिनय को देख मन ही मन मुस्कुरा रहा था, पर वह अब भी सबके सामने अपने भावों को सामान्य किये शांति से बैठा था।

“जी हां आप अंदर वाला कमरा देख सकती हैं।” शारदा ने शलाका को अंदर जाने की इजाजत दे दी और उठकर स्वयं भी शलाका के साथ चलने लगीं।

एक सेकेण्ड से भी कम समय में, शलाका ने जेम्स को गहरे अंदाज में देखा।

जेम्स समझ गया कि शलाका नहीं चाहती कि शारदा उसके पीछे-पीछे उस कमरे में जाये, इसलिये वह तुरंत बोल उठा- “आप घर में अकेली ही रहती हैं क्या? मेरा मतलब है कि भाई साहब कहां काम करते हैं?" जेम्स को बोलता देख शारदा वापस से सोफे पर बैठ गई।

“मेरे पति का कपड़ों का व्यापार है, वह इस सिलसिले में अक्सर बाहर ही रहते हैं, इसलिये पूरा घर मुझे ही संभालना पड़ता है।"

शलाका, शारदा को बातों में फंसा देखकर तुरंत अंदर के कमरे में पहुंच गई। शलाका ने उस कमरे के कोण को देख महसूस कर लिया कि यह वही कमरा था, जिसमें उसने आर्यन को उस दिव्य बालक को छिपाते हुए देखा था।

“आर्ची, तुरंत मेरी आँखों में पृथ्वी से धातु ढूंढने वाला स्कैनर डालो।” शलाका ने आर्ची से कहा।

आर्ची ने तुरंत शलाका की आँख में स्कैनर डाल दिया। अब शलाका तेजी से पूरे कमरे की जमीन को स्कैन करके, उसके नीचे देखने लगी।

पर पूरे कमरे को स्कैन करने के बाद भी उसे जमीन में किसी प्रकार का धातु का कोई टुकड़ा नहीं दिखाई दिया।

“यहां पर अमरत्व की धातु वाली शीशी नहीं है, इसका साफ मतलब है कि किसी ने उस अष्टकोण से उस दिव्य बालक को निकाल लिया है?...अब...अब तो...शारदा से नंबर लेकर, एक बार शर्मा से भी बात करनी होगी, हो सकता है कि उसे अष्टकोण का पता हो?" यह सोच शलाका ने अपने चेहरे पर फिर से रोने वाले भाव लाये और वापस जेम्स के पास आ गई।

"अच्छा शारदा जी, आप वो शर्मा जी का पता और नंबर दे दीजिये....मैं एक बार उनसे बात करके भी देख लेती हूं।” शलाका ने शारदा की ओर देखते हुए कहा "वैसे शर्मा जी के घर में कौन-कौन है?"

"कौन...कौन....क्या? बस 3 ही लोग हैं उनके परिवार में शर्मा जी, उनकी पत्नि गायत्री और उनका बेटा देवोम।" शारदा ने पास की टेबल पर रखी अपनी डायरी उठाई और उसके पन्ने पलटकर शर्मा जी का नंबर ढूंढने लगी।

"उनके और बच्चे नहीं हैं क्या?" जेम्स ने शारदा को देखते हुए पूछा।

"और बच्चे?....अरे 50 वर्ष की उम्र में तो उन्हें बेटा हुआ था...अब उसके बाद और बच्चे कहां से आते?" शारदा ने एक पन्ने पर शर्मा जी का पता लिखते हुए कहा।

शारदा की बात सुन, इस बार शलाका का माथा ठनका।

"इस उम्र में बेटा?” शलाका ने आश्चर्यचकित होने का अभिनय किया।

"हां...कुछ लोग तो कहते हैं कि उनके बुढ़ापे को देख ईश्वर ने ही उनकी सुन ली...पर जो भी कहो....देवोम है बहुत कमाल का? बिल्कुल देवताओं सा तेज है उसके चेहरे पर इसीलिये तो शर्मा जी ने उसका नाम देवोम रखा था।...किसी ने सही कहा है, ईश्वर की माया अपरम्पार है।"

यह कहकर शारदा ने एक कागज शलाका की ओर बढ़ दिया, इस कागज में लिखा था “महेन्द्र शर्मा, 127B, 6 स्ट्रीट, मैनहट्टन, न्यूयार्क, अमेरिका” इसके बाद एक फोन नंबर दिया हुआ था।

"जी आपके सहयोग के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद।” यह कहकर, शलाका ने वह कागज का टुकड़ा शारदा से ले लिया और जेम्स के साथ बाहर की ओर निकल गई।

जाने क्यों शलाका को विश्वास हो चला था कि देवोम ही वह दिव्य बालक है? अब वह तेजी से वापस रुद्र सागर की ओर चल दी।

“क्या अब हम न्यूयार्क जायेंगे?" जेम्स ने शलाका से पूछा।

“हां ! हम न्यूयार्क जायेंगे, पर अभी नहीं। अभी मुझे कुछ और काम निपटाने हैं। इसलिये पहले हमें वापस अंटार्कटिका चलना होगा।” शलाका ने अपना सिर हिलाते हुए कहा- “वैसे जब तक मैं उस दिव्य बालक को ढूंढ नहीं लेती, तब तक मुझे शांति नहीं मिलेगी?"

“शलाका !" जेम्स ने एक जगह रुकते हुए कहा “आप तो देवी हो। हो सकता है कि आपको भूख ना लगती हो?"

जेम्स की बात सुन शलाका एक झटके से रुकी और पलटकर जेम्स को देखने लगी। फिर मुस्कुराकर, एक पास वाले रेस्टोरेंट की ओर बढ़ गई।

जेम्स भी मुस्कुराकर शलाका के पीछे चल दिया।

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Raj_sharma

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Thor singh

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Chapter 4 से लेकर आगे के भाग तक कहानी पढ़कर सच में मज़ा आ गया। पहले तो न्यू ईयर पार्टी वाला सीन बहुत अच्छा लगा, ऐसा लगा जैसे मैं खुद उसी शिप पर मौजूद हूँ। माहौल, म्यूज़िक, डांस, सब कुछ बहुत अच्छे से लिखा गया है। फिर अचानक से मर्डर हो जाना कहानी को और भी ज्यादा इंटरेस्टिंग बना देता है।

मुझे सबसे ज्यादा मज़ा सुयश के इन्वेस्टिगेशन वाले सीन में आया। लॉकेट वाली बात और अंधेरे में निशाना लगाने वाला ट्विस्ट बहुत बढ़िया था। ऐसा लगा कि कहानी सिर्फ रहस्य नहीं है, बल्कि दिमाग लगाकर लिखी गई है।

शैफाली वाला किरदार कहानी का सबसे अलग और खास हिस्सा लग रहा है। उसका सुनकर चीज़ें समझ लेना, सपने देखना, और गोली के बारे में बताना ये सब पढ़कर कहानी और भी ज्यादा मिस्टिरियस हो जाती है। सच कहूँ तो अब सबसे ज्यादा क्यूरियोसिटी इसी बात की है कि शैफाली आखिर है क्या।

बारामूडा ट्रायंगल वाला पार्ट आते ही कहानी का लेवल और ऊपर चला गया। नीली रोशनी वाला यान, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम खराब होना, भंवर में फँसना ये सब पढ़कर बिल्कुल मूवी जैसा फील आया। ऐसा लगा जैसे एडवेंचर + मिस्ट्री + साइ-फाइ सब एक साथ चल रहा है।

मुझे ये भी अच्छा लगा कि कहानी में सिर्फ डर या रहस्य ही नहीं है, बीच-बीच में छोटे-छोटे नॉर्मल मोमेंट्स भी हैं, जैसे ब्रूनो वाला सीन या लोगों की बातें। इससे कहानी रियल लगती है।

अटलांटिस वाला ट्विस्ट तो सबसे ज्यादा अनएक्सपेक्टेड था। अब तो सच में जानने का मन कर रहा है कि आगे क्या होने वाला है और ये सब घटनाएँ आपस में कैसे जुड़ी हैं।

कहानी बहुत ही इंटरेस्टिंग चल रही है। सस्पेंस लगातार बना हुआ है और हर चैप्टर के बाद आगे पढ़ने का मन करता है।

Raj_sharma
 
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