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Thanks Bhainice update

Thanks Bhainice update
Bilkul sahi disha me soch rahe ho dost, kaalbahu se pahle inko kisi aur se takrana hoga, aur wo bhi koi kam mayavi nahi haiagar trishal aur kalika aasani se jeet jaate to unko shakti prapt karne ki jarurat hi nahi thi ..
kalbahu se saamna hone se pehle shayad aur powerful rakshaso se saamna hona tay hai dono ka ..
Great....Great....Great, kya gajab likha hai bhai, mesmerizing#128.
चैपटर-9 वेदान्त रहस्यम् :
(13 जनवरी 2002, रविवार, 21:30, मायावन, अराका द्वीप)
सभी ने अब बर्फ की घाटी को सकुशल पार कर लिया था।
जंगलों का सिलसिला एक बार फिर शुरु हो गया था। लेकिन शाम हो जाने की वजह से सुयश ने सभी को एक सुरक्षित स्थान पर ही रात बिताने के लिये रोक दिया था।
वह एक मैदानी क्षेत्र था, जिसमें काफी दूर तक एक ही घना पेड़ था। उसी घने पेड़ के नीचे इन सभी ने रात बिताने का निश्चय किया।
कुछ आगे सभी को फिर से एक ऊंची पहाड़ी नजर आने लगी थी, जिसकी चोटी एक अजीब सी चमक बिखेर रही थी।
सभी दिन भर जंगल से बटोरे फल को खाकर उसी पेड़ के नीचे सो गये। काफी रात हो चुकी थी, पर तौफीक को नींद नहीं आ रही थी।
वह बारी-बारी से सबको सोते हुए देख रहा था।
जेनिथ के प्रति तौफीक के दिमाग में बहुत सी उलझनें थीं। माना कि उसने बदला लेने के लिये, जेनिथ के आस-पास अपना जाल फैलाया, पर वह जेनिथ को मारना नहीं चाहता था।
लगातार जेनिथ के पास रहते-रहते उसे भी जेनिथ से कुछ लगाव सा हो गया था।
इसी लगाव के कारण उसे यह डर हो गया था कि कहीं लॉरेन जेनिथ को सबकुछ बता ना दे। इसी वजह से उसने लॉरेन का कत्ल किया था।
तौफीक जानता था कि अगर जेनिथ उसके बारे में सबकुछ जान गयी तो वह उससे नफरत करने लगेगी।
पर इस जंगल में आने के बाद सभी का उद्देश्य ही परिवर्तित हो गया। अब ना तो किसी से दुश्मनी बची थी और ना किसी से बदला लेने की चाहत।
इसी बातों को आधार मानकर तौफीक ने मगरमच्छ मानव से जेनिथ की जान बचाने की कोशिश की थी।
पर इधर कुछ दिनों से जेनिथ का व्यवहार तौफीक को समझ नहीं आ रहा था? उसे नहीं पता था कि अचानक जेनिथ उससे इतना दूर क्यों रहने लगी है? यही उलझन उसे आज सोने नहीं दे रही थी।
जंगल में गूंजती हुई जंगली जानवरों की आवाजें और झिंगुरों का शोर आपस में मिलकर सन्नाटे को भंग कर रहे थे।
तभी अचानक वातावरण में चल रही हवाओं में थोड़ा तेजी आ गयी।
पेड़ों के गिरे हुए सूखे पत्ते ‘खड़-खड़’ की आवाज के साथ इधर-उधर बिखरने लगे।
तभी एक अजीब सी आवाज ने तौफीक का ध्यान भंग किया-“फड़-फड़-फड़-फड़”
तौफीक ने ध्यान लगा कर सुनने की कोशिश की कि आखिर यह आवाज आ कहां से रही है?
“फड़-फड़-फड़-फड़।”तौफीक को वह आवाज दोबारा से सुनाई दी। लेकिन तौफीक इस बार पूरी तरह से चौकन्ना था।
वह आवाज उसी पेड़ के ऊपर से आ रही थी, जिसके नीचे वह सभी सो रहे थे।
तौफीक ने एक बार फिर से आवाज पर ध्यान दिया। उसे वह आवाज बड़ी विचित्र सी महसूस हुई। अब तौफीक की निगाहें पेड़ के ऊपरी हिस्से की ओर चली गईं।
धीरे-धीरे चल रही हवा में गूंजती उस ‘फड़-फड़’ की आवाज ने तौफीक का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लिया था।
तौफीक ने एक नजर फिर से सो रहे सभी लोगों पर मारी और फिर खड़ा होकर, धीरे-धीरे उस सपाट पेड़ पर चढ़ने लगा।
पेड़ सपाट होने की वजह से उस पर चढ़ना थोड़ा मुश्किल था, पर यहां पर तौफीक की आर्मी की ट्रेनिंग काम आ गयी।
कुछ ही देर में तौफीक उस आवाज के स्रोत तक पहुंच गया।
वह आवाज पेड़ की मोटे तने में मौजूद एक कोटर से आ रही थी। तौफीक ने कुछ देर तक सोचा और फिर अपना दाहिना हाथ पेड़ की उस कोटर में डाल दिया।
हाथ से किसी वस्तु का स्पर्श होते ही तौफीक ने उस वस्तु को बाहर की ओर खींच लिया।
वह वस्तु लाल रंग की मोटी जिल्द वाली एक किताब थी। उसी के पन्ने हवा के कारण खुल-बंद रहे थे, जिससे वह विचित्र सी फड़फड़ की आवाज हो रही थी।
तौफीक उस लाल किताब को लेकर नीचे उतर आया।
तौफीक ने पेड़ के पास बैठकर उस किताब को देखा। वह किताब किसी दूसरी भाषा में थी, जिसे तौफीक पढ़ नहीं पा रहा था।
तौफीक आगे के पृष्ठों को खोलकर देखने लगा।
हर पृष्ठ पर अलग-अलग चित्र बने थे, कुछ चित्र इंसानों के थे, तो कुछ चित्र स्थानों के। उन चित्रों के नीचे दूसरी भाषा में कुछ ना कुछ लिखा था।
तौफीक बिना समझे हुए पृष्ठों को पलटता जा रहा था।
तभी तौफीक को एक पेज पर, एक काँच के अष्टकोण में बंद, एक छोटे से बालक का चित्र दिखाई दिया।
वह बालक काँच में बंद होकर भी मुस्कुरा रहा था।
तौफीक को वह बालक कोई दिव्य आत्मा लगा। तौफीक ने फिर से पन्नों को पलटना शुरु कर दिया।
300 पृष्ठों की पूरी किताब पलटने के बाद तौफीक की नजर आखिरी पेज पर जाकर रुक गयी।
आखिरी पेज पर बहुत ही खूबसूरत सी किसी स्त्री की 2 आँखें बनीं थीं।
इतनी खूबसूरत आँखें देख तौफीक मंत्रमुग्ध हो गया और लगातार उन आँखों को देखने लगा।
कुछ सोचकर तौफीक ने धीरे से उन आँखों को अपने हाथों से स्पर्श किया।
तौफीक के उन आँखों को स्पर्श करते ही, उसे वह दोनों आँखें बहुत ठंडी सी प्रतीत हुईं और इससे पहले कि तौफीक कुछ कर पाता, उसे अपना शरीर उस किताब में खिंचता हुआ सा प्रतीत हुआ।
यह देख तौफीक के मुंह से चीख निकल गयी।
कुछ ही पलों में तौफीक पूरा का पूरा उस किताब में समा गया।
तौफीक के किताब में समाते ही, वह किताब वहीं जमीन पर गिर गयी और उसके खुले हुए पन्ने फड़फड़ा कर बंद हो गये।
तौफीक की चीख सुनकर सभी की नींद खुल गयी।
सभी ने अपने चारो ओर नजर डाली, पर तौफीक का कहीं नामो निशान नहीं था।
“क्या तुम लोगों को भी तौफीक की चीख सुनाई दी थी?” सुयश ने बारी-बारी सबको देखते हुए पूछा।
सभी ने समवेत सिर हिला दिया। तभी शैफाली की नजर वहां पड़ी उस लाल किताब पर गयी।
“कैप्टेन अंकल, वहां पड़ी हुई वह किताब कैसी है?” शैफाली ने कहा।
शैफाली की बात सुनकर सुयश ने आगे बढ़कर वह किताब उठा ली।
सुयश ने किताब को देखा। वह किताब संस्कृत भाषा में थी।
किताब के जिल्द पर उस किताब का नाम लिखा था, जिसे सुयश ने
आसानी से पढ़ लिया।
किताब का नाम था- “वेदान्त रहस्यम्”
“यह किताब यहां कहां से आयी ?” सुयश संस्कृत भाषा में लिखी किताब देखकर आश्चर्य में पड़ गया- “यह हममें से तो किसी की नहीं है। कहीं यह कोई रहस्यमयी किताब तो नहीं ?”
“कहीं इस किताब की वजह से ही तो तौफीक अंकल नहीं गायब हुए?” शैफाली ने कहा- “क्यों कि मैंने सोते समय तौफीक अंकल की चीख के अलावा भी एक आवाज सुनी थी, जो कि शायद इसी किताब के गिरने की आवाज थी।”
सुयश ने शैफाली की बात सुनी और किताब के पन्ने को पलट दिया।
सुयश ने सरसरी तौर पर किताब के पन्नों को पलटकर देखा।
तभी सुयश की नजर भी किताब के उसी पृष्ठ पर पड़ी, जिसमें एक छोटा बालक काँच के अष्टकोण में बंद दिखाई दे रहा था।
उस चित्र को देखते ही अचानक सुयश के सिर में बहुत तेज दर्द सा महसूस हुआ और उसके कानों में कुछ अजीब सी आवाजें सुनाई देने लगीं-
“मैं इस बालक को ऐसी जगह छिपाऊंगा, जहां तुम कभी भी नहीं पहुंच सकती। यही तुम्हारी करनी का उचित दंड होगा।” ...........
“नहीं...नहीं छोड़ दो उस बालक को...अब मैं कभी भी तुम्हारे सामने नहीं आऊंगी ...मुझे बस मेरा बालक दे दो.........मैंने तुम्हारे साथ कुछ भी गलत नहीं किया?...सबकुछ अंजाने में हुआ है। मुझे बस एक बार प्रायश्चित का मौका दो...मैं फिर से सब कुछ सहीं कर दूंगी।”
सुयश के सिर में कुछ आवाजें गूंज रहीं थीं और इसी वजह से उसके सिर का दर्द बढ़ता जा रहा था।
सुयश अपना सिर पकड़कर वहीं जमीन पर बैठ गया।
“कैप्टेन...कैप्टेन...क्या हुआ आपको?” जेनिथ ने चिल्ला कर कहा- “आप ठीक तो हैं ना?”
“शैफाली तुरंत उस किताब को बंद कर दो।” एक अंजानी आवाज वातावरण में गूंजी।
शैफाली ने आवाज की दिशा में देखा, उसे सामने देवी शलाका और तौफीक खड़े नजर आये।
शैफाली ने आश्चर्य से उस लाल किताब को बंद कर दिया और देवी शलाका व तौफीक को देखने लगी।
जेनिथ और क्रिस्टी की भी निगाहें अब शलाका के ऊपर थीं।
सुयश के सिर का दर्द किताब बंद होते ही खत्म हो गया। अब वो सिर उठाये एकटक शलाका को देख रहा था।
सुयश का दिल कर रहा था कि वह दौड़कर शलाका को गले से लगा ले, पर माहौल की गंभीरता को देखते हुए सुयश ने कुछ नहीं कहा। वह बस जमीन से उठकर खड़ा हो गया।
“तौफीक आप कहां गायब हो गये थे? आप ठीक तो हैं ना?” क्रिस्टी ने तौफीक को देखकर कहा।
तौफीक ने धीरे से सिर हिलाकर अपने सुरक्षित होने का इशारा किया।
सभी एक दूसरे को देख रहे थे, पर चारो ओर सन्नाटा छाया था, जिसे तोड़ा तौफीक की आवाज ने-
“कैप्टेन, मैंने रात में पन्ने फड़फड़ाने की आवाज सुनी, जो कि इस पेड़ से आ रही थी। मैंने ऊपर जा कर देखा तो मुझे यह किताब मिली। मैंने जब किताब के आखिरी पृष्ठ पर मौजूद 2 आँखों को छुआ, तो मैं खिंचकर उस किताब में समा गया। डर की वजह से मैने अपनी आँखें बंद कर लीं। जब मेरी आँखें खुलीं तो मैंने अपने आपको देवी शलाका के महल में पाया। मैंने जैसे ही इन्हें इस किताब के बारे में बताया, यह तुरंत मुझे लेकर यहां आ गयीं।” इतना कहकर तौफीक चुप हो गया।
“इस बात के लिये हम आपके आभारी हैं देवी शलाका।” सुयश ने शलाका को आभार प्रकट करते हुए कहा।
“तुम मुझे देवी क्यों बोल रहे हो ?” तुम मुझे सिर्फ शलाका कह सकते हो।”
शलाका की आँखों में सुयश के लिये प्यार का सागर लहरा रहा था- “अच्छा शैफाली, तुम अब वो लाल किताब मुझे दे दो, नहीं तो वो तुम
लोगों के लिये और कोई मुसीबत पैदा कर देगी।”
शैफाली ने सुयश कर ओर देखा। सुयश ने हां में सिर हिला कर शैफाली को स्वीकृति दे दी।
शैफाली उस लाल किताब को लेकर शलाका की ओर बढ़ी, तभी एक और जोर की आवाज गूंजी-
“नहीं शैफाली उसे वह लाल किताब मत देना।”
दूसरी ओर से आती हुई आवाज को सुन शैफाली सहित सभी ने नजर घुमाकर देखा।
दूसरी ओर एक और शलाका को देख सभी हैरान हो गये।
“दो-दो देवी शलाका !”
सभी कभी पहली वाली शलाका को तो कभी दूसरी वाली शलाका को देख रहे थे।
दोनों ही बिल्कुल एक जैसी थीं। यह देख सुयश ने आगे बढ़कर तुरंत शैफाली से वह लाल किताब ले लिया।
“तुम दोनों में से असली शलाका कौन है?” सुयश ने गरजते हुए पूछा।
“मैं हूं असली शलाका।” पहली वाली शलाका ने कहा।
सुयश यह सुन दूसरी वाली शलाका की ओर मुड़ा।
“मुझे लगता है कि तुम मुझे आसानी से पहचान जाओगे। क्यों कि एक ही गलती तुम जिंदगी में 2 बार नहीं करते।"
दूसरी वाली शलाका के शब्दों में जादू था, जिसे सुनकर सुयश के चेहरे पर मुस्कुराहट के भाव आ गये।
“अच्छा तो ऐसे नहीं पता चलेगा ।” सुयश ने कहा- “तुम दोनों ये बताओ कि जब मैं धेनुका का स्वर्ण दुग्ध लाने गया था, तो ऐमू का पीछा कौन सा पंछी कर रहा था?” यह सुनते ही पहली वाली शलाका की आँखें भय से चौड़ी हो गयीं-
“क्या तुम्हें सब कुछ याद आ गया?”
पहली शलाका को भयभीत देखकर सुयश दूसरी वाली शलाका की ओर मुड़ा- “क्या तुम बताना चाहोगी, इस प्रश्न का उत्तर?”
“धेनुका का स्वर्ण दुग्ध लेने, तुम मेरे साथ ही देवलोक में गये थे। जहां पर ऐमू का पीछा एक बाज कर रहा था, जो कि उसे मारना चाहता था।” दूसरी शलाका ने कहा।
यह सुन पहली शलाका ने गुस्से से अपने दाँत को पीसा और एक झमाके के साथ वहां से गायब हो गयी।
“मैंने कहा था कि तुम मुझे पहचान लोगे।” यह कहकर शलाका भागकर सुयश के पास आयी और उसके गले से लिपट गई- “अब मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाना। 5000 वर्ष तक मैंने तुम्हारा इंतजार किया है, अब मैं और नहीं सह सकती।
"नहीं बनना मुझे किसी द्वीप की देवी। l...नहीं होना मुझे अमर....मैं बस एक साधारण इंसान की जिंदगी जीना चाहती हूं, वह भी तुम्हारे साथ अकेले....इस दुनिया से दूर...किसी ऐसी जगह जहां मुझे और तुम्हें कोई ना जानता हो....मैं अपनी सभी शक्तियां तुम्हारे लिये छोड़ने को तैयार हूं.... पर अब...पर अब मुझे अकेले नहीं जीना है।”
शलाका की आँखों से झर-झर आँसू बह रहे थे। वह भावावेश में बोलती ही चली जा रही थी।
उसे कोई फिक्र नहीं थी कि वह कहां खड़ी है? उसे कोई चिंता नहीं थी कि कौन-कौन उसे देख रहा है?
वह तो बस अपने 5000 वर्षों के इंतजार को सुयश को व्यक्त करना चाहती थी।
सुयश ने भी शलाका को कसकर पकड़ रखा था।
दोनों की ही आँखों से आँसू बहे जा रहे थे, पर इस बार यह आँसू दुख के नहीं थे, ये सुख के आँसू थे।
दोनों की ही यह हालत देख जेनिथ, क्रिस्टी और शैफाली की भी आँखों में आँसू आ गये।
तौफीक तो इस बात पर खुश था कि फाइनली अब उन्हें इस रहस्यमय जंगल से छुटकारा मिल जायेगा।
थोड़ी देर तक दोनों ऐसे ही गले लगे रहने के बाद एक दूसरे से अलग हो गये।
“मैंने तो इतने समय से सोच रखा था कि जब देवी शलाका मिलेंगी तो मैं उनसे बहुत सारे वरदान मांगूगी, पर ये तो देवी नहीं आंटी निकलीं।” शैफाली ने भोलेपन से मुस्कुराते हुए कहा।
शैफाली की बात सुन शलाका मुस्कुरा दी।
“तुम अब भी इस जंगल से निकलने के सिवा, जो मांगना चाहो, मांग सकती हो शैफाली।” शलाका ने कहा।
“फिलहाल तो पिज्जा खाने का दिल कर रहा है।” शैफाली ने शैतानी भरे स्वर में कहा।
शैफाली की बात सुन शलाका ने अपना हाथ हवा में लहराया।
शलाका के ऐसा करते ही पिज्जा के 5 बॉक्स प्रकट हो गये।
“येऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ मजा आ गया। इसी बात पर बोलो देवी शलाका की जय।”
शैफाली की शैतानी शलाका को काफी भा रही थी।
“भाभी जी....म..म...मेरा मतलब है कि हे देवी, मेरी पुकार भी सुन लो।” क्रिस्टी भी खुश हो कर पूरा मजा लेने लगी- “मेरा एक छोटा सा प्रेमी कहीं जंगल में गायब हो गया है, उसे भी ढूंढकर मुझे दे दो और हो सके तो मेरे लिये एक अच्छी सी ड्रेस दे दो, यही गंदे कपड़े पहनकर मैं पागल हो गयी हूं।”
क्रिस्टी की बात सुनकर शलाका ने अपना हाथ ऊपर उठाया।
अब शलाका के हाथ में एक चमचमाता हुआ त्रिशूल नजर आने लगा।
जारी रहेगा_______![]()
#132.
“कैप्टेन...आपको क्या लगता है कि मुसीबत अब खत्म हो गई?” जेनिथ के शब्द सुन सभी ने उधर देखा, जिधर जेनिथ देख रही थी।
उधर देखते ही उनकी साँसें फिर से अटक गयीं क्यों कि हवा में तैरता हुआ वह बुलबुला अब ज्वालामुखी के अंदर गिरने वाला था।
“आसमान से गिरे...खजूर में अटके तो सुना था, पर कुंए से निकले और ज्वालामुखी में लटके नहीं सुना था।” क्रिस्टी के शब्दों में फिर निराशा झलकने लगी।
बुलबुला अब सीधे ज्वालामुखी के अंदर, उसके लावे में जाकर गिरा था। जहां से निकलना अब शायद ही संभव हो पाता।
सभी की नजरें ज्वालामुखी के अंदर की ओर गई।
प्रेशर कम हो जाने की वजह से लावा अब ज्वालामुखी के ऊपर से होकर नहीं बह रहा था।
ज्वालामुखी के लावे की सतह अब काफी कम होकर ज्वालामुखी के अंदर ही सीमित हो गई थी।
लग रहा था कि जैसे द्वीप की तरह वह ज्वालामुखी भी कृत्रिम है। क्योंकि ज्वालामुखी के अंदर वह लावा, पत्थरों से बने एक विशाल बैल के मुख से निकल रहा था।
सभी एक बार फिर लावे के जाल में फंस गये थे। ऐसा लग रहा था कि जैसे लावा उन्हें छोड़ना नहीं चाहता था।
ज्वालामुखी की दीवारें भी सपाट थीं और अंदर कोई ऐसा स्थान नहीं था, जहां वह बुलबुले से निकलकर खड़े हो सकें।
“अब क्या करें कैप्टेन?...हम एक बार फिर फंस गये।” जेनिथ ने कहा।
तभी सुयश को ज्वालामुखी का सारा लावा, ज्वालामुखी के अंदर ही एक दिशा की ओर बहकर जाता दिखाई दिया।
“शायद उस तरफ से कोई रास्ता मिल जाये?” सुयश ने सभी को लावा के बहने वाली दिशा में इशारा करते हुए कहा।
“पर कैप्टेन...यह भी तो हो सकता है कि उधर से वह लावा वापस पृथ्वी की कोर में जा रहा हो?”
तौफीक ने कहा- “और अगर ऐसा हुआ तो हम पाताल में चले जायेंगे, जहां से हमारे निकलने के आसार बिल्कुल खत्म हो जायेंगे।”
“हमारे पास उस रास्ते के सिवा और कोई रास्ता भी नहीं है तौफीक।”
सुयश ने तौफीक को समझाते हुए कहा- “ये भी तो हो सकता है कि उधर से हमें बचकर निकलने का कोई रास्ता मिल जाये?”
तौफीक ने एक गहरी साँस भरी और सुयश के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी।
अब सभी बुलबुले को धकेलकर उस दिशा में ले आये, जिधर से बहकर लावा पहाड़ों के अंदर कहीं जा रहा था।
बुलबुला अब लावे के साथ स्वतः ही तैरने लगा।
पहाड़ की ढलान लावे को गति दे रही थी। कुछ देर बाद वह लावा, आगे जा रहे एक लावे के झरने में गिरता दिखाई दिया।
लावा का झरना देखकर सभी और भयभीत हो गये।
तभी सुयश को झरने के पहले एक जगह पर कुछ खाली स्थान दिखाई दिया। जिसके ऊपर की ओर कुछ गुफा जैसे छेद दिखाई दे रहे थे।
वह स्थान थोड़ा ऊंचा होने के कारण लावा उस ओर नहीं जा रहा था।
“हमें अपने बुलबुले को उस खाली स्थान की ओर ले जाना होगा।” सुयश ने सभी को वह खाली स्थान दिखाते हुए कहा।
सभी अपने शरीर को मोड़ते हुए उस बुलबुले को खाली स्थान तक ले आये।
“यहां से आगे लावा का झरना है, जो कि पृथ्वी की कोर तक जाता हुआ हो सकता है, इसलिये हमें इस स्थान से ऊपर बने उन गुफाओं की ओर जाना होगा। शायद उससे हमें कहीं आगे निकलने का मार्ग दिखाई दे जाये। पर बुलबुले के अंदर रहकर हम उन गुफाओं तक नहीं जा सकते, इसलिये हमें अब बुलबुले से निकलना ही पड़ेगा।” सुयश ने सबको समझाते हुए कहा।
“पर कैप्टेन, हम लोग इस समय एक जीवित ज्वालामुखी के अंदर हैं, अगर यहां तापमान ज्यादा हुआ, तो बुलबुले से निकलते ही हम मारे जायेंगे।” जेनिथ ने कहा।
“तुम ठीक कह रही हो जेनिथ, पर मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि ऐसा कुछ नहीं होगा। क्यों कि यह एक बनाया गया कृत्रिम ज्वालामुखी है। यह ज्वालामुखी की तरह व्यवहार कर सकता है, पर ज्वालामुखी जितना तापमान नहीं बना सकता। इसलिये मैं विश्वास के साथ कहता हूं कि हम बाहर सुरक्षित रहेंगे।”
यह कहकर सुयश ने शैफाली को बुलबुले को हटाने का आदेश दे दिया।
हर बार की तरह सुयश इस बार भी सही था। उस स्थान पर गर्मी ज्यादा थी, पर इतनी गर्मी नहीं थी कि वह सहन नहीं कर पायें।
सभी को गर्मी की वजह से पसीना आने लगा था, पर शैफाली के शरीर का तापमान अभी भी नार्मल था।
शायद उसकी ड्रेस में कुछ ऐसा था जो उसे तापमान का अहसास ही नहीं होने दे रहा था।
अभी सब उन गुफाओं तक पहुंचने के बारे में सोच ही रहे थे कि तभी शैफाली को कुछ दूरी पर कोई सुनहरी चमकती हुई चीज दिखाई दी।
शैफाली बिना किसी से बोले उस दिशा की ओर बढ़ गयी।
सभी शैफाली को उस दिशा में जाते देख, उसके पीछे-पीछे चल दिये।
वह चमक लावे की राख में दबी, किसी सोने की धातु वाली वस्तु से आ रही थी।
शैफाली ने आगे बढ़कर उस वस्तु पर से राख को साफ करना शुरु कर दिया।
शैफाली को ऐसा करते देख, सभी उस वस्तु को साफ करने लगे।
सभी के प्रयासों के बाद वह वस्तु अब साफ-साफ नजर आने लगी थी। वह एक विशाल ड्रैगन का सोने का सिर था।
सभी हतप्रभ से खड़े उस विशाल ड्रैगन के सिर को देखने लगे।
“यह ज्वालामुखी के अंदर सोने का बना सिर कहां से आया।” तौफीक ने कहा- “यह तो पुरातन कला का अद्भुत नमूना लग रहा है।”
“यह नमूना नहीं है।” पता नहीं क्या हुआ कि अचानक शैफाली बहुत ज्यादा गुस्से में दिखने लगी।
शैफाली का यह प्रचंड रुप देख सभी डर गये।
“क्या हुआ शैफाली?” सुयश ने शैफाली के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा- “तुम ठीक तो होना?”
“हां कैप्टेन अंकल मैं ठीक हूं।” शैफाली ने नार्मल तरीके से कहा- “पता नहीं क्यों मुझे इस ड्रैगन के सिर को छूकर बहुत अपनापन महसूस हो रहा है।”
इस बार शैफाली के शब्द ने सबको डरा दिया। शैफाली अभी भी उस ड्रैगन के सिर को धीरे-धीरे सहला रही थी।
तभी भावनाओं में बहकर शैफाली की आँख से आँसू निकलने लगे।
वह आँसू उस ड्रैगन के सिर पर जा गिरे।
शैफाली के आँसुओं में जाने कौन सी शक्ति थी कि शैफाली के आँसू ड्रैगन के सिर पर पड़ते ही ड्रैगन के सिर से तेज रोशनी निकलकर शैफाली में समा गई और इसके बाद वह सोने का सिर धीरे-धीरे पिघलने लगा।
यह देख सुयश ने शैफाली को चेतावनी दी- “शैफाली तुम्हारे हाथ में मौजूद ड्रैगन का सिर पिघलने लगा है, अगर तुम उसे ज्यादा देर तक पकड़े रही तो तापमान की वजह से तुम्हारा हाथ भी पिघल सकता है। इसलिये उसे अपने हाथ से छोड़ दो।”
पर सुयश की चेतावनी का शैफाली पर कोई असर नहीं हुआ, वह उस ड्रैगन के सिर की आखिरी बूंद के पिघलने तक उसे पकड़े रही।
धीरे-धीरे ड्रैगन का पूरा सिर पिघलकर ज्वालामुखी के लावे में समा गया।
थोड़ी देर तक शैफाली वहां खड़ी रही, फिर सुयश के साथ उन गुफाओं के छेद की ओर चढ़ने लगी।
सभी समझ रहे थे कि शैफाली के दिमाग में कुछ उथल-पुथल चल रहा है, पर किसी की हिम्मत अभी उससे कुछ पूछने की नहीं हो रही थी।
राक्षसलोक: (14 साल पहले.....14 जनवरी 1988, गुरुवार, 08:30, योग गुफा, हिमालय)
त्रिशाल को कलिका का इंतजार करते हुए योग गुफा में बैठे आज 8 दिन बीत गये थे। तभी किसी के पैरों की धमक से त्रिशाल का ध्यान भंग हुआ।
त्रिशाल ने आँख खोलकर देखा। सामने हनुका खड़ा त्रिशाल को निहार रहा था।
“यति राज को त्रिशाल का प्रणाम।” त्रिशाल ने हनुका को देखकर हाथ जोड़कर अभिवादन किया।
“सदैव प्रसन्न रहो।” हनुका ने अपने हाथों को खोलकर आशीर्वाद देते हुए कहा- “लग रहा है देवी कलिका, यहां पर अभी तक नहीं पहुंची।”
“पिछले 8 दिन से मैं उनकी यहां पर प्रतीक्षा कर रहा हूं, पता नहीं कैसे उन्हें आने में देर हो रही है?” त्रिशाल ने अपना रोष प्रकट करते हुए कहा।
तभी एक दिशा से कलिका की आवाज आयी- “अब आपकी प्रतीक्षा का समय समाप्त हुआ त्रिशाल, मैं आ गयी।”
कलिका को सकुशल आते देख त्रिशाल खुश हो गया।
“आपके चेहरे पर फैली मुस्कान बता रही है कि प्रकाश शक्ति आपको मिल गयी है।” त्रिशाल ने कलिका के चेहरे को देखते हुए कहा।
कलिका ने त्रिशाल की बात सुन धीरे से सिर हिलाया।
“तो फिर ‘राक्षसलोक’ चलने की तैयारी करें। अब ‘कालबाहु’ के अंत का समय निकट आ चुका है।” त्रिशाल ने जोर से हुंकार भरी।
हनुका ने दोनों को आशीर्वाद दिया और फिर आकाश मार्ग से उड़कर कहीं गायब हो गया।
त्रिशाल और कलिका अब राक्षसताल की ओर चल दिये थे।
राक्षसताल मानसरोवर झील के बगल में ही था। वह योग गुफा से ज्यादा दूरी पर नहीं था, इसलिये त्रिशाल और कलिका कुछ ही देर में राक्षसताल तक पहुंच गये।
राक्षसताल का आकार चंद्रमा के समान प्रतीत हो रहा था।
दोपहर का समय था, जिसके कारण पानी की स्वच्छता दूर से ही नजर आ रही थी।
त्रिशाल और कलिका धीरे से राक्षसताल के पानी में उतर गये। राक्षसताल का पानी, बिल्कुल खारा था।
कुछ ही देर में दोनों राक्षसताल की तली तक पहुंच गये।
राक्षसताल की तली के अंदर एक पर्वत श्रृंखला डूबी हुई थी।
तभी त्रिशाल को 2 पर्वतों के बीच एक पतला सा रास्ता दिखाई दिया, जिसके दूसरी ओर से कुछ चमक सी आती हुई प्रतीत हो रही थी।
त्रिशाल और कलिका उस पतले रास्ते पर चल पड़े। कुछ आगे उन्हें पानी के अंदर, पहाड़ में बनी एक गुफा नजर आयी।
गुफा किसी विशाल राक्षस के मुंह जैसी प्रतीत हो रही थी। वह चमक उसी गुफा के अंदर से आ रही थी।
वैसे तो वह गुफा राक्षस के मुंह की सिर्फ आकृति मात्र थी, पर उसकी पत्थर पर बनी बड़ी-बड़ी आँखें और विशाल दाँत किसी भी मनुष्य को डराने के लिये काफी थे।
“क्या इसी रास्ते से होकर हमें राक्षस लोक जाना है?” त्रिशाल ने कलिका से पूछा।
“लग तो ऐसा ही रहा है....पर जरा एक मिनट ठहरिये...पहले मुझे पूरी तरह से संतुष्ट हो जाने दीजिये।” कलिका ने कहा और ध्यान से उस गुफा को देखने लगी।
तभी गुफा को ध्यान से देख रही कलिका को राक्षस की आँख की पुतली कुछ हिलती नजर आयी।
यह देख कलिका चीखकर बोली- “रुक जाइये त्रिशाल, यह राक्षसलोक का मार्ग नहीं है, यह स्वयं कोई राक्षस है, जो विशाल गुफा का भेष धारण करके यहां पर बैठा है। मैं अभी इसका सच बाहर लाती हूं।”
यह कहकर कलिका ने अपने सीधे हाथ को उस राक्षस की आँख की ओर करके एक झटका दिया।
कलिका के हाथ को झटका देते ही, उसके हाथ से सफेद रंग की तेज रोशनी निकलकर उस राक्षस की आँख पर पड़ी।
वह सफेद रोशनी इतनी तेज थी, कि उस गुफा बने राक्षस ने घबरा कर अपनी आँखें बंद कर ली।
त्रिशाल को समझने के लिये इतना काफी था। वह जान गया कि यह सच का कोई राक्षस है।
“चलो राक्षसलोक पहुंचने से पहले अपनी शक्तियों के प्रदर्शन का इससे अच्छा अवसर नहीं मिलेगा।” त्रिशाल ने कहा- “तो दोनों में से कौन करेगा इस राक्षस का अंत?”
“आप ज्यादा उतावले नजर आ रहे हो, आप ही कर लो पहले प्रयोग। मैं जब तक इस चट्टान पर बैठकर आराम कर रही हूं।”
यह कहकर कलिका सच में आराम से एक चट्टान पर जा कर बैठ गयी।
जारी रहेगा_______![]()
Let's Review Begin's
Aaryan ne kya galti ki, iska khulaasha to apun kar hi dega, lekin usme thoda samay lagega, ye pakka hai ki apun iska jabaab 100% degaGreat....Great....Great, kya gajab likha hai bhai, mesmerizing
Pahle us kitaab vedant rahasyam ka milna, fir taufik ka gayab hona, fil 2-2 shalaka, aur Suyash ka usme se asli ko pahchanna, aur fir shalaka ne ye kyu kaha ki tum ek hi gdlti 2 baar nahi karoge.?? Aakhir shalaka ko uska pyar mil gaya, bohot din baad kshani me pyaar mohabbat ka sama lota hai
Awesome update bhai ji![]()
Jaasusho wala dimaak kaam me lo mitra, sab samajh me aa jayega, apun pahle bhi ek baar hint de chuka hai uskiBahut hi gazab ki update he Raj_sharma Bhai,
Shaifali ka us sunhare dragon sehlana fir uske aansu se pighal jana aur usme se ek roshni nikalkar shaifali me sama jana.........
Kuch to gadbad he Daya................ye Dragon aage chalkar bahut hi kaam aane wala he shaifali ke..........
Kalika aur Trishal Rakshashlok jane se pehle warmup kar rahe he..........kalika is warmup ka pura maja le rahi he.......
Keep rocking Bro
Thank you very much bhai , aap padho, ummeed hai kahani aapko niraash nahi karegiBahut badhiya kahani hai bhai